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                <title>dilemma - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सिद्दारमैया ने जाते-जाते शिवकुमार, राहुल के लिए खड़ी की मुश्किलें, पढ़ें क्या है पूरा मामला ?</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 'सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण रिपोर्ट' को मंजूरी देकर कांग्रेस नेतृत्व को बड़ी उलझन में डाल दिया है। इस फैसले से राहुल गांधी और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार असहज स्थिति में हैं, क्योंकि वोक्कालिगा समुदाय की नाराजगी और नया आरक्षण समीकरण पार्टी के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/siddaramaiah-created-problems-for-shivkumar-rahul-while-leaving-read-what/article-155452"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/dkk.png" alt=""></a><br /><p>बेंगलुरु। कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने जाते-जाते राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की तैयार की गयी 'सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण रिपोर्ट' को मंजूर कर कांग्रेस नेतृत्व को असमंजस की स्थिति में खड़ा कर दिया है। उल्लेखनीय है कि सियासत में कभी-कभी ऐसे लम्हे आते हैं जब कोई सरकारी फाइल सिर्फ आगे नहीं बढ़ती, बल्कि उसका अपना एक अलग वजूद बन जाता है। कर्नाटक की जातिगत सर्वेक्षण रिपोर्ट भी एक ऐसा ही मोहरा है। जहां निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जिस अफसरशाही इत्मीनान और राजनीतिक अंतिम रूप के साथ इसे मंजूर किया है, उसने खामोशी से वही काम करना शुरू कर दिया है, जो आंकड़े अक्सर सबसे बेहतर तरीके से करते हैं- </p>
<p><strong>ताकतवरों की नींद उड़ाना।</strong></p>
<p>रिपोर्ट की मंजूरी देने की एक आम प्रक्रिया है लेकिन इसके भीतर ज्यादा दिलचस्प हलचल छिपी हुई है। राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी अब खुद को ऐसी असहज स्थिति में पा रहे हैं, जहां उन्हें एक ऐसे दस्तावेज़ पर जवाब देना भारी पड़ रहा है। वे उसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। कर्नाटक के सियासी मिजाज के मंझे खिलाड़ी सिद्दारमैया ने शायद वही किया है, जो तजुर्बेकार सियासतदान अक्सर सबसे बेहतर तरीके से करते हैं एक ऐसा माहौल छोड़ जाना, जो कानूनी तौर पर तो बिल्कुल साफ-सुथरा हो लेकिन राजनीतिक रूप से काफी उलझा हुआ हो। यह रिपोर्ट एक बार मंजूर होने के बाद अब सिर्फ कोई सुझाव नहीं रह गयी है। यह एक ऐसा सवाल बन चुकी है, जो जवाब के इंतजार में है।</p>
<p>शिवकुमार के लिए यह मुद्दा फिलहाल सबसे अहम है और सीधे उनके क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। राज्य का जातीय समीकरण कभी भी हवा-हवाई नहीं होता। यह उन समुदायों के रूप में सामने आता है, जो पुरानी बातें याद रखते हैं, ऐतराज जताते हैं और एकजुट होते हैं। वोक्कालिगा समुदाय का एक वर्ग, जो पहले भी जातीय सर्वेक्षण को लेकर हुए विवादों को लेकर संवेदनशील रहा है, इसके क्रियान्वयन की दिशा में उठाए जाने वाले किसी भी कदम पर कड़ी और सतर्क निगाह रख सकता है। पद्धति और आंकड़ों पर बहस भले ही दफ्तरों में हो, लेकिन पहचान और प्रतिनिधित्व का सवाल सड़कों पर तय होता है।</p>
<p>राहुल गांधी की परेशानी का स्तर थोड़ा अलग है। जातिगत जनगणना के हक में उनका लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक रुख अब इसे अमली जामा पहनाने में टेडी खीर नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी आदत के मुताबिक, इस सूरत-ए-हाल को नीति के विकास के रूप में नहीं, बल्कि एक सियासी विरोधाभास के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। उनका तर्क है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एक भाषा बोलती है और राज्यों में दूसरी। कांग्रेस जैसा लाजिमी है, इस बात से सरासर इनकार करती है।</p>
<p>अब कांग्रेस के सामने दो रास्ते खुलते हैं, और दोनों में से कोई भी रास्ता आरामदेह नहीं है। अगर इस रिपोर्ट को लागू नहीं किया जाता है, तो इसके प्रशासनिक ईमानदारी और फिर उसके बाद आने वाली राजनीतिक हिचकिचाहट का एक और भारतीय उदाहरण बन जाने का खतरा है। इसने पिछड़े समुदायों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों के बीच जो उम्मीदें जगाई हैं, वे इतनी आसानी से खत्म नहीं होंगी। ऐसी सूरत में इस रिपोर्ट को इस बात के लिए कम याद किया जायेगा कि इसमें क्या कहा गया था, बल्कि इस बात के लिए ज्यादा याद किया जायेगा कि इसके साथ क्या नहीं किया गया।</p>
<p>अगर इसे लागू किया जाता है, तो इसके नतीजे ज्यादा त्वरित और साफ तौर पर दिखाई देने वाले होंगे। आरक्षण का नये सिरे से निर्धारण समुदायों का प्रतिनिधित्व और जनसांख्यिकीय दावे सक्रिय रूप से राजनीति के केंद्र में आ जायेंगे। समर्थन और विरोध दोनों एक साथ खड़े होंगे। कानूनी पेचीदगियां सामने आ सकती हैं। प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं तथा गठबंधन को संभालना और भी मुश्किल हो जायेगा। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए इसका मतलब पार्टी के अनुशासन और अपने समुदाय की भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी और श्री गांधी के लिए इसका मतलब अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को उसकी तमाम अपरिहार्य उलझनों के साथ प्रशासनिक हकीकत में बदलना होगा। दोनों ही सूरतों में दबाव खत्म नहीं होता दिखाई दे रहा है।</p>
<p>यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में सिद्दारमैया के इस रिपोर्ट को मंजूर किये जाने को सिर्फ कागजी या प्रक्रियात्मक कार्रवाई से बढ़कर देखा जा रहा है। इस जिम्मेदारी को पार्टी के भीतर खामोशी लेकिन मजबूती के साथ दूसरों के कंधों पर डालने के तौर पर देखा जा रहा है- एक तजुर्बेकार सियासतदान का यह तय करने का तरीका कि एक बार जो फैसला ले लिया गया, वह आराम से सिर्फ उनका ही होकर न रह जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 14:09:14 +0530</pubDate>
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                <title>टेक्नीशियन संवर्ग की विभिन्न पदों की सूची कर्मचारियों के लिए दुविधा, एसीआर ने कर्मचारियों को किया परेशान </title>
                                    <description><![CDATA[लैब टेक्नीशियन संघ प्रदेशाध्यक्ष जितेन्द्र सिंह ने बताया कि अंतरिम वरिष्ठता सूची देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सूची निकालते समय केवल सूची प्रकाशन का ही ध्यान रखा जा रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/list-of-various-posts-of-technician-cadre-dilemma-for-the/article-14341"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/neww-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सरकार ने पदोन्नति में एक वर्ष की शिथिलता का प्रावधान 31 अगस्त तक रखा है। इसकी पालना के मद्देनजर चिकित्सा विभाग द्वारा जारी की गई लैब टेक्नीशियन संवर्ग की विभिन्न पदों की वरिष्ठता सूची कर्मचारियों के लिए एक नयी दुविधा साबित हो रही है। लैब टेक्नीशियन संघ प्रदेशाध्यक्ष जितेन्द्र सिंह ने बताया कि अंतरिम वरिष्ठता सूची देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सूची निकालते समय केवल सूची प्रकाशन का ही ध्यान रखा जा रहा है। पूर्व में प्राप्त हो चुकी एसीआर को भी अप्राप्त बताकर कर्मचारियों को परेशान किया जा रहा है। सिंह ने बताया कि तकनीकी सहायक की पदोन्नति के दौरान एसीआर जमा की जा चुकी थी। पदोन्नति सूची जारी होना संभव हो पाया था, फिर तकनीकी सहायक से वरिष्ठ तकनीकी सहायक की वरिष्ठता सूची प्रकाशन में उन्हीं कर्मचारियों से एसीआर को भी अप्राप्त दर्शाना न केवल विभाग की घोर लापरवाही को दर्शाता है वरन कार्मिको के लिए परेशानी का सबब बन रहा है।</p>
<p>राज्य सरकार ने इस वर्ष सभी एसीआर ऑनलाइन भिजवायें जाने का आदेश जारी किया था। उस आदेश की पालना में प्रदेश के समस्त लैब टेक्नीशियन संवर्ग कर्मचारियों ने अपनी अपनी एसीआर ऑनलाइन भिजवा दी है। फिर भी जारी की गयी सूचियों में अधिकांश को अप्राप्त दिखाया जा रहा है और कर्मचारियों को हार्ड काॅपी के साथ निदेशालय के चक्कर काटने को मजबूर किया जा रहा है। पूर्व की पदोन्नतिओं में भी इस तरह से कार्मिको को बाद में रिव्यू या डिफर डीपीसी की कह कर के सालों इंतजार करना पड़ता है। संगठन महामंत्री तरुण सैनी ने सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि पदोन्नति में ए सी आर माँगें जाने के प्रावधान को समाप्त किया जाये इसके स्थान पर कर्मचारी की सर्विस बुक के आधार पर विभागाध्यक्ष से ही पूर्व की भांति सेवा का संतोषप्रद प्रमाण-पत्र प्राप्त कर  इस औपचारिकता पूर्ण करा लिया जावे, कर्मचारी को बेववजह सक्षम अधिकारी से निदेशालय स्तर तक चक्कर काटने को मजबूर ना किया जाएं।<br /><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Jul 2022 15:12:07 +0530</pubDate>
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