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                <title>रेडियो का आविष्कार : एक नई क्रांति की शुरुआत</title>
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                        <![CDATA[रेडियो का इतिहास किसी एक आविष्कारक की कहानी नहीं, बल्कि मानव जिज्ञासा और निरंतर प्रयोग की सामूहिक यात्रा की कहानी है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-invention-of-radio-marked-the-beginning-of-a-new/article-143010"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(24).png" alt=""></a><br /><p>रेडियो का इतिहास किसी एक आविष्कारक की कहानी नहीं, बल्कि मानव जिज्ञासा और निरंतर प्रयोग की सामूहिक यात्रा की कहानी है। यह यात्रा उस समय शुरू हुई, जब मनुष्य ने पहली बार सोचा कि क्या आवाज भी हवा में बिना तार के भेजी जा सकती है। उन्नीसवीं सदी के वैज्ञानिकों ने इस प्रश्न को गंभीरता से लिया। जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने विद्युत चुंबकीय तरंगों का सिद्धांत दिया, हेनरिक हर्ट्ज़ ने इन तरंगों के अस्तित्व को प्रयोगों के माध्यम से सिद्ध किया और फिर कई वैज्ञानिकों ने इन तरंगों को संदेशवाहक बनाने का काम आगे बढ़ाया। इसी शृंखला में गुग्लिएल्मो मार्कोनी का नाम सामने आता है, जिन्होंने इन तरंगों के माध्यम से संदेश भेजकर रेडियो के व्यावहारिक रूप को जन्म दिया।</p>
<p><strong>विज्ञान का चमत्कार था : </strong></p>
<p>बीसवीं सदी के आरंभ में न केवल संकेत, बल्कि मानवीय आवाज और संगीत भी हवा की अदृश्य लहरों पर चलने लगे। यह विज्ञान का चमत्कार था, लेकिन कुछ ही दशकों में यह समाज का परिचित और आत्मीय साथी बन गया। रेडियो के आविष्कार का मूल उत्स साधारण नहीं था। यह केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं थी कि तरंगें कितनी दूर तक जाएंगी, बल्कि यह भी कि मनुष्य एक दूसरे से कैसे जुड़े रहेंगे। तार बिछाने की सीमाएं थीं, टेलीग्राफ और टेलीफोन महंगे और सीमित थे। रेडियो ने बिना तार के संवाद की संभावना पैदा की। जहाज़ों, सैनिकों और दूरस्थ क्षेत्रों तक संदेश पहुंचाना संभव हुआ। धीरे धीरे इस तकनीक ने प्रयोगशालाओं की दीवारें लांघीं और घरों तक पहुंच गई।</p>
<p><strong>दिलों में जगह बनाई :</strong></p>
<p>परंतु प्रश्न केवल यह नहीं है कि रेडियो कैसे बना अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसने लोगों के दिलों में जगह कैसे बना ली। इसका उत्तर बहुत सरल भी है और गहरा भी। रेडियो ने मनुष्य की सबसे मूल अनुभूति आवाज को अपने केंद्र में रखा। मनुष्य के लिए आवाज़ हमेशा से निकटता और भरोसे का प्रतीक रही है। मां की लोरी, किसान की पुकार, बाज़ार की चहल पहल और प्रेम की फुसफुसाहट सब आवाज में ही बसे हैं। रेडियो ने इन्हें मशीन के भीतर कैद नहीं किया, बल्कि तरंगों पर सवार कर दूर दूर तक पहुंचा दिया। जब किसी अनजाने शहर में बैठा उद्घोषक कोई गीत सुनाता या खबर पढ़ता, तो वह श्रोता के कमरे का हिस्सा बन जाता। यही निकटता रेडियो को सिर्फ एक यंत्र नहीं रहने देतीय वह साथी बन जाता है। रेडियो दिलों में इसलिए भी बसा क्योंकि उसने देखने से पहले सुनना सिखाया।</p>
<p><strong>संचार का लोकतंत्रीकरण :</strong></p>
<p>टीवी और मोबाइल चित्रों के माध्यम हैं, जबकि रेडियो कल्पना का माध्यम है। रेडियो पर कहानी सुनने वाला बच्चा अपने मन में पात्रों के चेहरे रचता है। गीत सुनने वाला श्रोता अपनी स्मृतियों के साथ उसे जोड़ लेता है। रेडियो के सुनने का अनुभव बहुत व्यक्तिगत लगता है। लाखों लोग एक ही कार्यक्रम सुनते हैं, पर हर श्रोता उसे अपने हिसाब से जीता है। यह भी याद रखना चाहिए कि रेडियो का प्रसार उन समाजों में हुआ, जहां पढ़ना लिखना अभी सबके लिए सहज नहीं था। इसलिए रेडियो ने उन्हें भी दुनिया से जोड़ा जो किताबें नहीं पढ़ सकते थे या अखबार नहीं खरीद सकते थे। यह माध्यम सस्ता था, बिजली के बिना भी चल जाता था और किसी विशेष कौशल की आवश्यकता नहीं थी। इसने संचार के लोकतंत्रीकरण में बड़ी भूमिका निभाई।</p>
<p><strong>भाषाओं का सम्मान किया :</strong></p>
<p>रेडियो ने लोगों के दिलों में जगह इसलिए भी बनाई क्योंकि वह जीवन के हर छोटे बड़े क्षण का साक्षी बना। सुबह के भक्ति संगीत से लेकर रात के फिल्मी गीतों तक, खेत में काम करते किसान से लेकर फैक्ट्री में कामगार तक, हर कोई कहीं न कहीं रेडियो की धुन से जुड़ा। युद्धकाल हो या शांति का समय, चुनाव हो या त्योहार, रेडियो हमेशा साथ रहा। आपदाओं के समय जब अन्य संचार माध्यम बंद हो जाते,तब रेडियो चेतावनी और राहत का संदेशवाहक बनकर खड़ा रहता। इस भरोसे ने उसे केवल तकनीक नहीं रहने दिया वह सुरक्षा और सहारे की भावना से भी जुड़ गया। एक और बड़ा कारण यह है कि रेडियो ने बोलियों और भाषाओं का सम्मान किया। उसने स्थानीयता को स्थान दिया। लोकगीत,लोककथाएं, सूफी और भक्ति परंपराएं रेडियो के माध्यम से नई पीढ़ियों तक पहुंचीं। जब कोई श्रोता अपनी भाषा में अपनी ही तरह का गीत सुनता है तो उसे लगता है कि यह माध्यम उसका है।</p>
<p><strong>रेडियो विश्वास का नाम है :</strong></p>
<p>रेडियो का आविष्कार विज्ञान की उपलब्धि था,लेकिन उसका अपनापन मनुष्य की अनुभूति की देन है। रेडियो यह प्रमाणित करता है कि कभी कभी अदृश्य माध्यम ही हमारी आंतरिक दुनिया के सबसे निकट पहुंच जाते हैं। अंततः कहा जा सकता है कि रेडियो ने तकनीकी चमत्कार से शुरू होकर भावनात्मक सम्बन्ध तक की यात्रा तय की। उसने यह साबित किया कि तरंगों पर चलने वाली आवाज भी मनुष्यों के बीच पुल बना सकती है। यह पुल समय, दूरी और वर्ग की सीमाएं पार कर जाता है। शायद इसी वजह से रेडियो आज भी केवल मशीन नहीं, स्मृति, विश्वास और साथ का नाम है। यही वह कारण है कि उसके आविष्कार की कहानी केवल विज्ञान के इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि समाज के साझा मन की कहानी भी है।</p>
<p><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 12:15:36 +0530</pubDate>
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                <title>पैंथरों की हरकत पर नजर रखेगा जीएसएस रेडियो कॉलर</title>
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                        <![CDATA[मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में  पैंथरों की संख्या करीब 100 तक  है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/gss-radio-collars-will-monitor-the-panthers--movements/article-139908"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)37.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में तेंदुआ यानि पैंथर की तादात लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में कोटा के शहरी क्षेत्र में भी अब इनकी आवाजाही होने लगी है। इस कारण वन विभाग की ओर शहर में इनके मूवमेंट पर नजर रखने के लिए पैंथरों के गले में स्वदेशी जीएसएस रेडियो कॉलर लगाया जाएगा। पैंथर एक चालाक और ताकतवर शिकारी है, जो दिन के उजाले और रात के अंधेरे में भी शिकार करने में माहिर है। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में अब इनकी संख्या करीब 100 तक पहुंच चुकी है, जो अच्छे जंगल और भरपूर शिकार की वजह से तेजी से बढ़ रही है, लेकिन ये तेंदुए अब जंगल की सीमा पार कर कोटा शहर की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। तेंदुए (पैंथर) अक्सर शहर के थर्मल प्लांट, राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी और श्रीनाथपुरम जैसे इलाकों में नजर आ जाते हैं।</p>
<p><strong>इन पैंथरों पर ही लगेगा रेडियो कॉलर</strong><br />तेंदुओं के बढ़ते मूवमेंट से इंसानों और पैंथरों के बीच टकराव का खतरा बढ़ रहा है, इसलिए वन विभाग ने एक सरल लेकिन प्रभावी कदम उठाया है। कुछ चुनिंदा पैंथरों के गले में भारत में ही बना हल्का जीएसएम रेडियो कॉलर लगाया जाएगा। यह छोटा-सा कॉलर मोबाइल नेटवर्क से काम करता है और पैंथर की हर हरकत को ट्रैक कर बताता है कि वो शहर की तरफ क्यों और कब जा रहे हैं, अगर यह योजना सफल हुई, तो इससे न सिर्फ पैंथरों की सुरक्षा होगी, बल्कि लोगों को भी खतरे से बचाया जा सकेगा। उपवन संरक्षक (डीसीएफ) मुथु सोमासुंदरम ने बताया कि सभी पैंथरों पर कॉलर लगाना संभव नहीं है, इसलिए केवल उन पैंथरों को कॉलर लगाया जाएगा जो बार-बार शहरी या आबादी वाले क्षेत्रों में घूमते हैं या मनुष्यों से टकराव का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा मुख्य उद्देश्य शहरी सीमा में विचरण करने वाले पैंथरों की निगरानी करना है। इससे उनके मूवमेंट रूट का पता चलेगा और यह भी समझ आएगा कि वे शहर की ओर क्यों आ रहे हैं।</p>
<p><strong>पैंथर की लोकेशन होगी रीयल-टाइम में ट्रैक</strong><br />विभागीय अधिकारियों के अनुसार इसके लिए बेंगलुरु की कंपनी आर्कटुरस द्वारा विकसित स्वदेशी जीएसएम बेस्ड रेडियो कॉलर का परीक्षण शुरू किया गया है। कंपनी ने ट्रायल के लिए एक कॉलर मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व को उपलब्ध कराया है। इस कॉलर की कीमत 40 से 50 हजार रुपये है, जो विदेशी कॉलरों की तुलना में बहुत किफायती है। यह रेडियो कॉलर पूरी तरह मोबाइल नेटवर्क यानी जीएसएम पर आधारित है। इसमें एक सिम कार्ड लगा होता है, जो पैंथर की लोकेशन को रीयल-टाइम में ट्रैक करने में मदद करता है। यदि मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता, तो यह काम नहीं करता, लेकिन शहरी इलाकों के आसपास नेटवर्क अच्छा होने से यह काफी प्रभावी साबित होगा। इस कॉलर का वजन केवल 500 ग्राम के आसपास है, जो पैंथर के गले के आकार के अनुरूप है। वहीं, टाइगरों के लिए इस्तेमाल होने वाला रेडियो कॉलर जीपीएस बेस्ड होता है, जिसका वजन 1 किलो से अधिक है और कीमत 7 से 8 लाख रुपए तक पहुंच जाती है। जीपीएस कॉलर सैटेलाइट के जरिए काम करता है और मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर नहीं होता है। पैंथर छोटे आकार के होते हैं, इसलिए उनके लिए हल्का और सस्ता कॉलर ज्यादा उपयुक्त है।</p>
<p><strong>शहर में इन क्षेत्रों में पैंथरों का मूवमेंट</strong><br />कोटा शहर में पैंथरों का मूवमेंट कई जगहों पर नियमित रूप से देखा जा रहा है। इनमें थर्मल पावर प्लांट के आसपास, राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी के नजदीक, श्रीनाथपुरम इलाका और आर्मी एरिया प्रमुख हैं। अभी तक पैंथरों से कोई बड़ा कॉन्फ्लिक्ट नहीं हुआ है, लेकिन सतर्कता जरूरी है। यदि कोई घटना होती है, तो पैंथर को ट्रैंक्विलाइज (बेहोश) करके इस रेडियो कॉलर को उसके गले में पहना दिया जाएगा। इससे उसकी आगे की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकेगी। विभागीय अधिकारियों के अनुसार फिलहाल यह योजना परीक्षण चरण में है। यदि ट्रायल सफल रहा तो और अधिक जीएसएम बेस्ड स्वदेशी कॉलर मंगाए जाएंगे। यह पूरी तरह भारतीय तकनीक है. यदि सफल हुई तो प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। पुरानी गणना के अनुसार मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में 95 से 100 पैंथर थे, लेकिन यह आंकड़ा कुछ साल पुराना है। वर्तमान में पैंथर सेंसस चल रहा है और मई तक नई रिपोर्ट आने की उम्मीद है। संभावना है कि संख्या में इजाफा हुआ होगा।पहले भैंसरोडगढ़ सेंचुरी को रिजर्व में शामिल नहीं किया गया था, अब इसे जोड़कर गणना हो रही है।</p>
<p>मुकुंदरा रिजर्व में अच्छा हैबिटेट और पर्याप्त शिकार की उपलब्धता पैंथरों की संख्या बढ़ाने में मदद कर रही है। यह नई पहल स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक मजबूत कदम है। इससे पैंथर और मनुष्य के बीच सामंजस्य बढ़ेगा और दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।<br /><strong>- मुथु सोमासुंदरम, उपवन संरक्षक</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sat, 17 Jan 2026 15:21:12 +0530</pubDate>
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                <title>5 माह से बाघ एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर खराब, परमिशन के बाद भी नहीं बदला टाइगर सुरक्षा में घोर लापरवाही </title>
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                        <![CDATA[मुकुंदरा से गायब हुआ बाघ एमटी-1 का आज तक नहीं लगा सुराग]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-mt-5-s-radio-collar-is-not-working-for-the-last-5-months--even-after/article-97107"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(5)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व का एकलौता नर बाघ एमटी-5 की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरती जा रही है।  पिछले 5 महीने से बाघ का रेडियो कॉर्लर खराब है, जिसे बदलने की मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक से परमिशन भी मिल चुकी है। इसके बावजूद रेडियो कॉर्लर नहीं बदला गया। मुकुंदरा का पहला बाघ एमटी-1 पूर्व में 82 वर्ग किमी के क्लोज एनक्लोजर से गायब हो गया था। जिसका आज तक पता नहीं चला, क्योंकि उसका रेडियो कॉर्लर खराब था। जबकि, बाघ एमटी-5 खुले में विचरण कर रहा है और लगातार लंबी दूरी तय करता है। पहले भी वह चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा होते हुए मध्यप्रदेश की सीमा तक जा चुका है। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही से मुकुंदरा में फिर से एमटी-1 की कहानी दोहराई जाने का खतरा मंडरा रहा है।  </p>
<p><strong>जुलाई से ही खराब है रेडियो कॉर्लर </strong><br />जानकारी के अनुसार, बाघ एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर गत जुलाई माह से ही काम नहीं कर रहा है। जिसकी जानकारी होते हुए भी जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अब तक बदला गया। इधर, जीपीएस कोर्डिनेट नहीं मिलने से मॉनिटरिंग टीम को भी उसके मूवमेंट का पता नहीं लगता। जबकि, वह लंबी दूरी तय करता रहा है। ऐसे में उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। सबसे ज्यादा खतरा रात के समय है। क्योंकि, बाघ रात के समय ही बाघ 30 से 40 किमी का मूवमेंट करता है। </p>
<p><strong>कैमरा ट्रेप व पगमार्क के भरोसे मॉनिटरिंग  </strong><br />टाइगर मॉनिटरिंग में लगे वनकर्मी बाघ की मॉनिटरिंग कैमरा ट्रैप के फुटेज व पगमार्क, स्केट  व स्क्रेच मार्क के भरोसे ही कर रहे हैं। जबकि, रात के समय पगमार्क व स्क्रेच मार्क दिखाई नहीं देते। ऐसे में जीपीएस बेस्ड रेडियो कॉर्लर से मिलने वाले सेटेलाइट कोर्डिनेट व सिग्नल से मॉनिटरिंग  की जाती है लेकिन रेडियो कॉर्लर खराब होने से वनकर्मियों को जीपीएस सिग्नल के अभाव में बाघ के मूवमेंट का पता नहीं लग पा रहा। ऐसे में बाघ कहीं सघन वनक्षेत्र में चला जाए तो उसे ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।</p>
<p><strong>मध्यप्रदेश की बोर्डर तक जा चुका एमटी-5</strong><br />गत 8 फरवरी को टाइगर एमटी-5 चंबल नदी पार कर जवाहर सागर सेंचुरी से भीलवाड़ा के सघन वनक्षेत्र में पहुंच गया था। यह वनक्षेत्र मध्यप्रदेश की बॉर्डर पर स्थित है। मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग टीम को रेडियो सिग्नल मिलने के बाद ही बाघ की लॉकेशन का पता लग पाया था। इसके बाद ही भीलवाड़ा व नीमच वन विभाग के सहयोग से मुकुंदरा प्रशासन बाघ तक पहुंच पाया था। यदि, फिर से एमटी-5 इतनी लंबी दूरी तय कर लेता है तो मुकुंदरा के लिए बाघ को फिर से खोज पाना आसान नहीं होगा। </p>
<p><strong>गत वर्ष 10 दिन तक गायब रहा था बाघ </strong><br />28 आॅक्टूबर 2023 में टाइगर के गले में लगे रेडियो कॉलर के जीपीएस फिक्सेस नहीं मिलने से वह 10 दिन तक गायब रहा था। इस दरमियान बाघ का कहीं भी मूवमेंट नहीं मिला। इसके बाद 3 नवम्बर 2023 की सुबह रेडियो सिग्नल भी बंद हो गए थे।  तब वनकर्मी पगमार्क के भरोसे चित्तौड़, झालावाड़ और बूंदी वन मंडल व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्रों में खोज रही थी, लेकिन बाघ जवाहर सागर रेंज के सघन वनक्षेत्र में मिला था। क्योंकि, गत 8 नवम्बर की सुबह जवाहर सागर के सघन वन क्षेत्र में रेडियो सिग्नल मिलने से बाघ की लोकेशन ट्रैस हो पाई थी। ऐसे में रेडियोकॉर्लर खराब होने से उसके गायब होने की आशंका प्रबल हो जाती है।</p>
<p><strong>रेडियो कॉर्लर की अनदेखी से दो बड़े नुकसान</strong><br /><strong>एमटी-1 का आज तक नहीं लगा सुराग</strong><br />मुकुंदरा का पहला बाघ एमटी-1 वर्ष 2020 में 84 हैक्टेयर एनक्लोजर से अचानक गायब हो गया था। जिसका रेडियो कॉर्लर खराब होने की वजह से आज तक पता नहीं चल सका। जबकि, रेडियो कॉर्लर खराब होने की तत्कालीन डीएफओ को जानकारी थी, इसके बावजूद उसे बदला नहीं गया।  जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही से गायब हुआ बाघ का आज तक पता नहीं चल सका। अब वर्तमान में वही गलती फिर से दोहराई जा रही है। </p>
<p><strong>कंकाल में बदल गई बाघिन आरवीटीआर-2</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व की बाघिन आरवीटीआर-2 का रेडियोकॉर्लर पिछले डेढ़ साल से खराब था। जिसका पता होने के बावजूद अधिकारी लापरवाह बने रहे और रेडियोकॉर्लर नहीं बदला। जिसका नतीजा, गत 16 अक्टूबर को बाघिन के कंकाल के रूप में मिला। बाघिन की मौत एक माह पहले ही मौत हो गई थी। वह लंबे समय से उसका कोई मूवमेंट नहीं मिल रहा था। इसके बाजवूद उसे ढूंढा नहीं गया। यदि, रेडियोकॉर्लर सही होता तो जीपीएस सिग्नल मिलने से उसकी लॉकेशन ट्रेस हो जाती और उसकी जान बचाई जा सकती थी। </p>
<p><strong>क्या कहते हैं वन्यजीव प्रेमी</strong><br />बाघों की रहस्यमयी मौत से चर्चा में रहे मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के इकलौते बाघ एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर 5 महीने से खराब होना गंभीर चिंता का विषय है। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ की अनुमति के बावजूद रेडियो कॉर्लर नहीं बदलना अधिकारियों की गंभीर लापरवाही का प्रत्यक्ष उदारहण है। इससे बाघ की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। एनटीसीए को तत्काल संज्ञान लेकर बाघ की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।   साथ ही वन्यप्राणी प्रबंधन प्रशिक्षण के लिए सिफारिश सिफारिश करनी चाहिए।<br /><strong>-अजय दुबे, वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट भोपाल</strong></p>
<p>वर्ष 2020 में मुकुंदरा का पहला बाघ एमटी-1 82 वर्ग किमी के क्लोज एनक्लोजर से गायब हो गया था। जिसका आज तक पता नहीं लगा। क्योंकि,  उसका रेडियोकॉर्लर खराब था। अब लापरवाही की यही कहानी फिर से एमटी-5 के साथ दोहराई जा रही है। जबकि, यह बाघ तो खुले में विचरण कर रहा है। खुदा न खास्ता एमटी-5 के साथ कुछ हादसा हो गया तो अधिकारी स्टाफ की कमी का हवाला देकर हाथ खड़े कर लेंगे। जिम्मेदार अधिकारी वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति बिलकुल भी गंभीर नहीं है। <br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, एडवोकेट एवं पर्यावरणविद् </strong></p>
<p><strong>दो -तीन बार प्रयास किया, सफल नहीं हो पाए</strong><br />हां, रेडियो कॉर्लर खराब है, जिसे बदलने के लिए तीन-चार बार कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो सके। चूंकि, रेडियोकॉर्लर बदलने के लिए ट्रैंकुलाइज करने की जरूरत होती है।  ऐसे में पहले इसे अनुकूल स्थान पर लाने के लिए शिकार बांधा था, बाघ आया लेकिन रुका नहीं। इस वजह से ट्रैंकुलाइज नहीं कर पाए। हालांकि, कोशिश जारी है। बाघ की मॉनिटरिंग की जा रही है।<br /><strong>-रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग </strong></p>
<p>एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर बदलने का प्रयास कर रहे हैं। बाघ के पीछे एक टीम भी लगा रखी है। पहले भी एक बार रेडियोकॉर्लर बदलने का प्रयास किया था, हालांकि सफल नहीं हो सके। अभी बायोलॉजिकल पार्क से मादा शावक को मुकुंदरा में शिफ्ट किया जाना है। इसके बाद फिर से रेडियोकॉर्लर बदलने की कोशिश की जाएगी। बाघ की नियमित मॉनीटरिंग की जा रही है।<br /><strong>-मुथूएस, डीएफओ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व </strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Dec 2024 15:22:44 +0530</pubDate>
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                <title>राष्ट्रीय प्रसारण दिवस आज : वक्त ने बदला आकाशवाणी कार्यक्रम का स्वरूप</title>
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                        <![CDATA[ वक्त बदला और टीवी आ गया...और आ गए सैंकड़ो टीवी चैनल। आज रेडियो का वक्त भले ही बदल गया हो लेकिन अभी भी लोगों के बीच रेडियो की जगह कम नहीं हुई हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/time-changed-the-nature-of-akashvani-program/article-15879"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/a-8.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा ।  उलझे-बिखरे अहसासों का,ताना-बाना बुनना हैं,जीवन तेरी यही कहानी रेडियो जैसे सुनना हैं। वो भी एक जमाना था, जब लोग गलियों के चौराहों पर, गाँव की नुक्कड़ और चौपालों पर इकट्ठे होकर रेडियो सुनते थे। उस समय न तो कोई टीवी हुआ करता था और न ही कोई और मनोरंजन का साधन। लेकिन वक्त बदला और टीवी आ गया...और आ गए सैंकड़ो टीवी चैनल। आज रेडियो का वक्त भले ही बदल गया हो लेकिन अभी भी लोगों के बीच रेडियो की जगह कम नहीं हुई हैं। आज भी लोग मीडियम वेव,या शार्ट वेव कम सुनते होंगे। लेकिन एफएम रेडियो का बोल-बाला आज भी हैं। लोगों के रेडियो सुनने का तरीका बदल गया हैं। खेती, शिक्षा, मनोरजंन टेक्नोलॉजी में रेडियो का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं। गाँवो की चौपालों में, नुक्कड़ों व खेतों में आज भी रेडियो की धुन कही ना कहीं सुनाई दे ही जाती हैं। जब कभी त्यौहार मनाया जाए तब रेडियो ने हमारी खुशियां दुगुनी की हैं। जब कभी देश आपातकाल या बुरे वक्त से गुजरा, तो सही जानकारियां उपलब्ध कराते हुए हमें सांत्वना देने वाला भी रेडियो ही तो था। सुबह के 6 बजे से रात को सोने तक दिनभर हर अच्छे और बुरे वक्त का साथी रहा यह रेडियो, और आज भी हैं। <br /><br /><strong>हाड़ौती में गूंज रहा आकाशवाणी</strong><br />ऑल इंडिया रेडियो ने अपने कोटा स्टेशन को स्थानीय रेडियो स्टेशन के रूप में शुरू किया। 4 जनवरी 1987 को सुबह के घंटों में 1 किलोवाट ट्रांसमीटर के माध्यम से, 189.39 मीटर बैंड पर मध्यम तरंग आवृत्ति बैंड पर यानी 1584 किलो हर्ट्ज पर एकल प्रसारण के साथ शुरू किया गया था। यह फ्रिक्वेंसी हड़ौती के पूरे क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करती हैं। इसमें हर वर्ग के लिए मिश्रित प्रोग्राम हैं। यह वो दिन था जब कोटा में संकेतवाणी मंगल ध्वनी से राष्ट्रगान के साथ प्रसारण की शुरूआत हुई। आज भी यह प्रकिया लगातार जारी हैं। बाद में कुछ वर्षों के बाद, लोकप्रिय मांगों पर, शाम और दिन के समय में भी विविध भारती कार्यक्रमों को प्रसारित करने के लिए प्रसारण बढ़ाया गया। अब नियमित प्रसारण के तीनों सत्रों में विविध भारती कार्यक्रमों के अलावा स्थानीय कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया जा रहा हैं।<br /><br /><strong>20 किलोवाट ट्रांसमीटर में हुआ अपग्रेड</strong><br />कोटा एआईआर स्टेशन को वर्ष 2006 में 212.31 मीटर बैंड यानी 1413 किलो हर्ट्ज फ्रिक्वेंसी पर मीडियम वेव फ्रÞीक्वेंसी बैंड पर 20 किलोवाट ट्रांसमीटर में अपग्रेड किया गया था। लेकिन कुछ आंतरिक कारणों से मुख्य रूप से अपर्याप्त तकनीकी कर्मचारियों की स्थिति के कारण इस ट्रांसमीटर तक केवल दिन के समय के प्रसारण को बढ़ाया गया था। <br /><br /><strong>एक दिन रेडियो जॉकी बनने का अवसर</strong><br />आजादी के अमृत महोत्सव के तहत युवाओं को अपनी आवाज को प्रसारित करने के लिए आॅल इंडिया रेडियो द्वारा आकाशावाणी केन्द्र में मंच प्रदान किया जा रहा हैं। आकाशवाणी स्टेशन में स्थानीय कॉलेजों, विश्वविद्यालयों के युवाओं को प्रोग्रामिंग में भाग लेने के लिए प्रेरित भी किया जा रहा हैं। इस कार्यक्रम में स्टेशन पर युवाओं के बीच संवाद और संभाषण सहित अनेक विषयों पर प्रतियोगिता करवाई जाती हैं। इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले विजेता प्रतिभागियों को आकाशवाणी द्वारा पुरस्कार दिया जाता हैं। <br /><br /><strong>आकाशवाणी में हर वर्ग के लिए कार्यक्रम</strong><br />कोटा आकाशवाणी केंद्र के कार्यक्रम प्रमुख हरिओम मीणा का कहना हैं कि हम अपने श्रोताओं के जीवन को समृद्ध बनाने के उद्देश्य से इंफोटेनमेंट कार्यक्रम डालते हैं। हमारा एफएम 102 टऌ ९ हर वर्ग की जरूरतों को पूरा करता हैं। हम भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत पर विशेष जोर देते हुए कला और संस्कृति को भी बढ़ावा देते हैं। हमारे चैनल पर कुल प्रसारण का लगभग 40 प्रतिशत संगीत शामिल हैं। जिसमें शास्त्रीय संगीत, प्रकाश, लोक, फिल्म और स्थानीय भाषाओं और बोलियों का संगीत शामिल हैं। समाचार और समसामयिक कार्यक्रम प्रसारण समय का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। रेडियो नाटक और नाटक, स्वास्थ्य और पारिवारिक कार्यक्रम, महिलाओं और बच्चों पर कार्यक्रम, ग्रामीण जनता को सशक्त बनाने के उद्देश्य से खेत और घरेलू कार्यक्रम हमारे चैनलों के अन्य महत्वपूर्ण खंड हैं। हमारा चैनल सभी रेडियो चैनलों में सबसे अधिक सुलभ होने के कारण, अपने दर्शकों तक उस भाषा में पहुंचने का प्रयास करता हैं जो सभी को सबसे ज्यादा समझ में आती है यानी हिंदी।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Jul 2022 17:13:30 +0530</pubDate>
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