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                <title>quality education - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>आरटीई की राह में निजी स्कूलों की मनमानी, 5 महीने बाद भी सैकड़ों बच्चों को नहीं मिला प्रवेश</title>
                                    <description><![CDATA[शिक्षा मंत्री के गृह जिले में दांव पर लगा बच्चों का भविष्य, भटक रहे अभिभावक।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/private-schools-flout-rte-norms--hundreds-of-children-denied-admission-even-after-five-months/article-162059"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/111200-x-600-px)-(3)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए आरटीई (शिक्षा का अधिकार) कानून बनाया, लेकिन शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के गृह जिले में हीतई स्कूल कानून की जमकर धज्जियां उड़ा रहे है। आरटीई लॉटरी में चयनित होने के 5 महीने बाद भी जिले में सैंकड़ों बच्चों को स्कूलों में प्रवेश नहीं मिला। कोई फीस मांग रहा तो कोई नॉन आरटीई के एडमिशन नहीं होने का बहाना बनाकर अभिभावकों को टरका रहे हैं। वहीं, जिम्मेदार शिक्षा अफसर भी निजी स्कूलों की मनमानी के आगे लाचार नजर आ रहे हैं। हालात यह हैं, विभाग के माध्यमिक व प्रारंभिक कार्यालय में शिकायतों का ढेर लगा हुआ है। राहत दिलाने की बजाए अफसर स्कूलों को पत्र भेज जवाब मांग रहे हैं लेकिन स्कूल संचालकों द्वारा अधिकतर शिकायतों का जवाब तक नहीं दे रहे। मजबूरन अभिभावकों ने जिला कलक्टर व राजस्थान सरकार के सम्पर्क पोर्टल 181 पर भी शिकायत कर चुके, लेकिन अब तक कोई राहत नहीं मिली। नतीजन, नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए पांच महीने बीत गए लेकिन घर बैठे सैकड़ों बच्चे हर रोज अभिभावकों से सिर्फ एक सवाल पूछ रहे हैं—पापा, मैं कब स्कूल जाऊंगा?</p>
<p><strong>7 दिन बाद भी निदेशालय ने नहीं दिया मार्गदर्शन</strong><br />शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, लगातार मिल रही शिकायतों के बाद शिक्षा विभाग ने कुछ निजी स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किए, लेकिन स्कूलों ने इनका जवाब तक नहीं दिया। इसके बाद विभाग ने शिक्षा निदेशालय, बीकानेर से मार्गदर्शन मांगा, लेकिन सात दिन बाद भी कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिलने से कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।</p>
<p><strong>मासूमों का सवाल, मैं कब स्कूल जाऊंगा?</strong><br />आरटीई में चयनित होने के बाद भी महीनों से घर बैठे मासूम बच्चों का यही सवाल अब शिक्षा अफसरों की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया। सरकार की योजना का लाभ पाने के बजाय यह बच्चे विभागीय लापरवाही और निजी स्कूलों की मनमानी के बीच अपना पूरा शैक्षणिक सत्र गंवाने की कगार पर हैं। उनका एक ही सवाल हैं, आखिर, मैं कब स्कूल जाऊंगा?</p>
<p><strong>अभिभावक बोले-सुविधा की जगह दुविधा बना कानून</strong><br />कंसुआ निवासी अब्दुल गफ्फार का आरोप है, वर्ष 2023 में बच्चे का आरटीई केतहत कंसुआ स्थित निजी स्कूल में एचकेजी में एडमिशन हुआ था। बच्चा आज तीसरी क्लास में पहुंच गया। लेकिन, मार्च 2026 से स्कूल संचालक तीन वर्ष पूर्व एचकेजी की फीस मांग रहा है। आरटीई का हवाला देने पर बच्चे को स्कूल में एंट्री देने से रोक दिया। वहीं, गत वर्ष कक्षा-2 की परीक्षा में दो पेपर के बाद आगे के पेपर देने के लिए परीक्षा में भी बैठने नहीं दिया।</p>
<p>बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह ने बताया कि दोस्त धर्मेंद्र गोस्वामी के बेटे अर्नव का आरटीई लॉटरी में पहला नंबर है। डॉक्यूमेंट वेरिफाई होे गए और पोर्टल पर चयनित लिखा हुआ भी आ गया है। इसके बावजूद स्कूल संचालक द्वारा जयपुर द्वारा हमें पीपी-4 की सीटें अलॉट नहीं होने का हवाला देते हुए एडमिशन देने से मना कर दिया। अब हम क्या करें, 4 माह से बच्चा घर बैठा है।</p>
<p>मानपुरा निवासी नसरुद्दीन का कहना है, पोर्टल पर प्रवेशित होने के बावजूद एडमिशन नहीं मिला। दस्तावेज जमा करवाने गए तो स्कूल संचालक ने प्री-प्राइमरी कक्षा संचालित नहीं होने की बात कहते हुए एडमिशन देने से इंकार कर दिया। जबकि, फॉर्म भरते समय स्कूल की प्रोफाइल में प्री-प्राइमरी कक्षा का विवरण होने पर ही हमने नर्सरी के लिए आवेदन किया था।</p>
<p>इस तरह की शिकायतें मिल रहीं हैं। संबंधित स्कूलों को पत्र भेज जवाब मांग रहे हैं। फीस मांगने, नॉन आरटीई के एडमिशन नहीं होने सहित अन्य शिकायतों की वास्तविकता भी परखी जा रही है। वहीं, इस संबंध में शिक्षा निदेशालय बीकानेर को पत्र भेज मार्गदर्शन मांगा है, वहां से जो निर्देश प्राप्त होंगे, उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।<br /><strong>-रामचरण मीणा, जिला शिक्षाधिकारी माध्यमिक कोटा</strong></p>
<p><strong>आरटीई उप निदेशक ने नहीं दिया जवाब</strong><br />नवज्योति ने इस संबंध में शिक्षा निदेशालय बीकानेर में राजस्थान की आरटीई उपनिदेशक चंद्रकिरण को फोन कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन फोन अटैंड नहीं किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 15:31:38 +0530</pubDate>
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                <title>सीएम भजनलाल ने जर्जर विद्यालय भवनों के पुनर्निर्माण के लिए 300 करोड़ की स्वीकृति पर पीएम मोदी का जताया आभार</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रदेश के जर्जर विद्यालय भवनों के कायाकल्प हेतु ₹300 करोड़ की केंद्रीय सहायता के लिए प्रधानमंत्री मोदी का आभार जताया। इस बजट से स्कूलों में आधुनिक बुनियादी ढांचे और सुरक्षित वातावरण का निर्माण होगा। सीएम ने कहा कि केंद्र का यह सहयोग राजस्थान में गुणात्मक शिक्षा और छात्र सुविधाओं को नई ऊंचाई देगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/cm-bhajanlal-expressed-his-gratitude-to-pm-modi-for-accepting/article-147437"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/bhajanlal-sharma3.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रदेश में जर्जर विद्यालय भवनों के पुनर्निर्माण के लिए केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा 300 करोड़ रुपये की स्वीकृति के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार व्यक्त किया है।</p>
<p>राजस्थान सीएम भजनलाल शर्मा ने कहा कि प्रदेश में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मजबूत आधारभूत संरचना का निर्माण हमारी प्राथमिकता है। हमारा उद्देश्य है कि प्रत्येक विद्यार्थी को सुरक्षित, आधुनिक और प्रेरणादायक शैक्षणिक वातावरण मिले, ताकि वे अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ सकें।</p>
<p>मुख्यमंत्री ने कहा कि पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में केंद्र सरकार के इस सहयोग से प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक सुधार होगा तथा विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:55:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>विश्व शिक्षक दिवस विशेष : ज्ञान से ही प्राप्त होती है जीवन जीने की राह गुरु, कच्ची बस्ती के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहे </title>
                                    <description><![CDATA[ऐसे शिक्षक जो बच्चों को सिर्फ पढ़ाई नहीं कराते, बल्कि उनको जिंदगी जीने का सही तरीका भी सिखाते है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/world-teacher-s-day-special--the-path-to-life-is-found-only-through-the-knowledge-of-a-teacher/article-128890"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(2)10.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। विश्व शिक्षक दिवस पर शहर  के कुछ ऐसे शिक्षक जो कि विद्यार्थियों शिक्षा प्रदान करने के लिए हर संभव प्रयास कर उनका जीवन संवारने के लिए प्रयासरत है। वहीं भारतीय संस्कृति में जो स्थान गुरु को प्राप्त है वह माता-पिता और ईश्वर को भी नहीं है। मनुष्य के जन्मदाता चाहे माता-पिता ही है परंतु उसको जीवन जीने की राह गुरू ज्ञान से ही प्राप्त होती है। गुरु के अभाव में मनुष्य का जीवन अंधकारमय हो जाता है। शहर में कुछ ऐसे शिक्षक भी है जो शहर की कच्ची बस्ती में रहने वाले बच्चों को हर संभव प्रयास कर शिक्षा से जोड़ने का प्रयास कर रहे है। इसी कड़ी में शहर के कुछ ऐसे शिक्षक जो बच्चों को सिर्फ पढ़ाई नहीं कराते, बल्कि उनको जिंदगी जीने का सही तरीका भी सिखाते है। इसी कड़ी में हम आपको रूबरू करते है ऐसे शिक्षकों से। </p>
<p><strong>कच्ची बस्ती के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहे </strong><br />मेरे पिताजी जोधपुर में बस कंडक्टर थे और व बस में बैठने वाले प्रत्येक बच्चें की आर्थिक मदद किया करते थे। और पढ़ाई के लिए बच्चों को मोटिवेट करते थे। ये कहना है राजभंवर के संस्था के संचालकनर्ता महेंद्र सिंह का उन्होने बताय कि कच्ची बस्ती में रहने वाले व अभावकर्ता बच्चे जो कि शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते है उनको शिक्षा देने के लिए सन 2012 से नि:शुल्क शिक्षा देने की शुरूआत की। अभी शहर में करीब हमारे तीन से चार जगह पर नि:शुल्क शिक्षा देने के लिए पढ़ाई केंद्र चल रहे है। बच्चों को हम नि:शुल्क पाठ्यसामग्री देते है। साथ ही बच्चे के माता पिता को भी हम समय- समय पर बुलाकर शिक्षण गतिविधि दिखाते है। संचालनकर्ता सिंह ने बताया कि मेरे पिता कहते थे कि हमे ईश्वर ने सक्षम बनाया है तो हमारे अंदर कुछ ना कुछ देने का भाव होना चाहिए। इसी के चलते हम करीब एक लाख बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाने का हमारा लक्ष्य है। </p>
<p><strong>इंजीनियरिंग की जॉब छोड़कर बच्चों को नि:शुल्क पढाÞ रहे</strong><br />शहर के रंगबाडी सर्किल के नजदीक कमजोर व गरीब तबके के बच्चों को अक्षय वैष्णव द्वारा की टीम द्वारा करीब 6 वर्ष से निरंतर  नि:शुल्क पढ़ाया जाता है। आदर्श विद्यार्थी सेवा के संचालन कर्ता ने बताया कि 7 दोस्तों के साथ मिलकर नि:शुल्क कोचिंग की शुरूआत की। अक्षय वैष्णव ने बताया कि जब मैंने देखा की प्रतिभावन बच्चे जो कि गरीबी कि वजह से महंगी कोचिंग की फीस जमा नहीं कर सकते हंै उनको देखकर हम दोस्तों के मन में ख्याल आया है कि क्यो ना कि शहर में इन बच्चों को पढ़ने के लिए नि:शुल्क कोचिंग की शुरूआत की जाएं तो तब जाकर संस्था की शुरूआत की। शुरूआत में हमने 9 वीं व 10 वीं के 300 विद्यार्थियों को नि:शुल्क पढ़ाये जाने का संकल्प लिया। अब तक संस्था करीब 2000 विद्यार्थियों को नि:शुल्क शिक्षा दी जा चुकी हैं।  साथ ही संस्था द्वारा गाड़िया लुहार बस्तियों में जाकर बच्चों को पढ़ाने कार्य कर रही है और शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जा रहा हैं। संस्था के संचालनकर्ता को दो बार जिला प्रशासन द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। संचालनकर्ता ने बताया कि हमारे संस्था के विद्यार्थी यहां से पढ़ने के बाद विभिन्न उच्च संस्थानों मे नौकरी कर रहे है। </p>
<p><strong>एलईडी पर करा रहा शिक्षण कार्य</strong><br />शहर के राजकीय उच्च माध्यमिक विघालय सकतपुरा में पिछले साल दो स्मार्ट क्लास रूम बनाएं गए है। जिसमें पहले कक्षा एक से लेकर पांचवीं तक के बच्चों को एलईडी पर शिक्षक रामेश्वर नावर खाली क्लांश में बच्चों को कुछ ना कुछ गतिविधियां जरूर करते है। इसी के साथ दसवीं से लेकर बारहवीं तक के बच्चों को भी अध्यापक जगमोनह टीचरों का अभाव होने के बाद भी बच्चों को एलईडी को  शिक्षा प्रदान करने का कार्य बखूबी कर रहे । स्कूल की प्रिंसिपल अंजू सक्सेना ने बताया कि स्कूल में अध्यापकों का अभाव होने के बाद भी बच्चों को हम कलात्मक व रचनात्मक शिक्षा प्रदान करते है व उनको खेल- खेल में भी शिक्षा प्रदान करने का ध्यान रखते है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Mon, 06 Oct 2025 17:30:40 +0530</pubDate>
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                <title>परिवार समाज शिक्षक सरकार सब दोषी</title>
                                    <description><![CDATA[ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व आत्म निर्भर बनाने वाली शिक्षा तभी मिलेगी जब बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान दिया जाएगा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/family--society--teachers--government--all-are-guilty/article-82876"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/u1rer-(13).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। वर्तमान शिक्षा नीति में विद्यार्थियों को गुणवत्ता युक्त व रोजगारमुखी शिक्षा क्यों नहीं मिल पा रही है। इसको लेकर दैनिक नवज्योति की ओर से शिक्षाविदों की एक परिचर्चा आयोजित की गई।  मंथन से निकल कर आया कि शिक्षा का वर्तमान ढ़ांचा जो तैयार किया गया है वो रोजगारमुखी नहीं है। यह ढ़ांचा बोरोजगारों की भीड़ बढ़ाने वाला है। अंको की होड बढ़ रही है, योग्यता की होड कम हो गई है। योग्यता के कोई मापदन्ड नहीं हैं। कोई आटोनॉमस बॉडी नहीं है। एक ऐसी संस्था हो जिसमें देश के नामी शिक्षाविद शामिल हों वह ऐसी नीति तैयार करें जो स्टूडेंट का सर्वांगीण विकास करने के साथ उसे आत्मनिर्र्भर भी बना सके।  बिना रिसर्च के पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे है। बच्चों का हित सवोपरि नहीं रखा जा रहा है। शिक्षा व्यवसायीकरण हो गया है। शिक्षा कू बुनियाद में ही बदलाव की आश्यकता है। समाज की मानसिकता में बी बदलाव की जरूरत है। शिक्षा में प्रेक्टिकल पार्ट कम हुआ है। भवन, स्टाफ, संसाधन की कमी। पढ़ाई में समयबद्धता की कमी आई है। स्टूडेंट्स डिग्री ले तो लेते हैं लेकिन प्रेक्टिल नहीं मिलने से डिग्री बेकार साबित हो रही है। पाठ्यक्रम में बच्चों की रूचि का ध्यान नहीं रखा गया है। रिटायर्ड शिक्षाविद की कमेटी बनाए जो शिक्षा को क्वॉलिटी और रोजगारमुखी बना सकें। </p>
<p><strong>अंकों की नहीं, ज्ञान की होड़ बढ़े </strong><br />वर्तमान में जिस तरह की शिक्षा दी जा रही है वह संख्या बल अधिक होने से सभी को शिक्षा का अधिकार के तहत दी जा रही है। जिसमें अधिक से अधिक अंक लाने की होड़ मची हुई है। जबकि अधिक अंक लाना न तो शिक्षा का मापदंड है और न ही पैमाना। अंकों की जगह वास्तविक ज्ञान की हौड़ होनी चाहिए। जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके और वह उसे आत्म निर्भर बना सके। सरकार ने नई शिक्षा नीिित लागू की है जिसमें बच्चों को कई तरह की सुविधाएं दी गई है। लेकिन उस नीति का सही ढंग से क्रियावयन हो और उसी अनुरूप सुविधाएं भी की जाएं। बच्चों को आत्म निर्भर बनाने वाली शिक्षा के लिए उन्हें तकनीकी व व्यवहारिक ज्ञान दिया जाना अति आवश्यक है। नई शिक्षा नीति सरकार ने जल्दबाजी में लागू की है। कोविड का समय होने से इस पर चर्चा तक नहीं की गई। इसमें कई खामियां हैं। बदलाव की आवश्यकता है। मल्टीपल चवॉइस बच्च्े को देना ठीक है लेकिन कैसे इस पर भी विचार होना चाहिए। <br /><strong>- संजय भार्गव, शिक्षा विद् व पूर्व प्राचार्य जेडीबी कॉलेज</strong></p>
<p><strong>प्रायोगिक शिक्षा जरूरी</strong><br />बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए जिस तरह से मेडिकल में प्रेक्टीकल अधिक कराया जाता है। उसी तरह से शिक्षा प्राप्त कर व्यक्ति को यदि आत्म निर्भर बनाना है तो उसके लिए प्रायोगिक शिक्षा जरूरी है। जबकि वर्तमान में जो शिक्षा दी जा रही है वह काफी पुराने ढर्रे पर है। मेडिकल फील्ड में भी पुराना ढर्रा ही जारी है। मेडिकल में भी नये कोर्स शुरू किए जाने चाहिए। मसलन पैशेंट डॉक्टर रिलेशन सिखाया जाए।  शिक्षा में डमी स्कूल की पद्धति को समाप्त किया जाना चाहिए। कक्षा में जाकर जो कुछ सीखने को मिलता है वह बिना कक्षा में जाए या आॅनलाइन नहीं मिल सकता। हर विभाग में पद व नौकरियां तो हैं पद रिक्त हैं लेकिन उनके लिए योग्य व्यक्तियों की कमी है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व आत्म निर्भर बनाने वाली शिक्षा तभी मिलेगी जब बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान दिया जाएगा। <br /><strong>- दीपिका मित्तल, चीफ एकेडमिक आॅफिसर मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>मल्टीपल च्वॉइस तो दे दी उसके संसाधन उपलब्ध नहीं </strong><br />शिक्षा को रोजगारमुखी बनाने के लिए नई शिक्षा नीति लागू की है लेकिन इसमें अभी काफी सुधार और बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा की बात करें तो कृषि में रोजगार की काफी संभावनाए है। सरकार ने अभी 40 कृषि महाविद्यालय तो खोल दिए लेकिन उसमें मात्र 15 लेक्चर लगाए ऐसे में गुणवत्ता युक्त शिक्षा कहां से मिलेगी। बिना इंट्रास्टक्चर के क्वॉलेटी एजुकेशन संभव नहीं है। तीन दशक पहले तक 12 वीं कृषि में इतने प्रेक्टिकल होते थे। लैब में कितना काम कराया जाता है। आज लैब में रखे उपकरण जंग खा रहे है। ना तो प्रयोगशाला सहायक है ना ही पढ़ाने वाले प्रोफेसर। अभी बीएससी एग्रीक्चर करने के बाद भी उसके पास रोजगार नहीं होता है। ऐसे में युवाओं को रोजगारमुखी शिक्षा कैसे मिलेगी। देश की इकोनोमी कृषि पर है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।  इनक्यूबेशन सेंटर नहीं है। बच्चे कहां सीखेंगे। नई शिक्षा नीति में बदलाव की आवश्कता है कृषि के चार क्रेडिट पढ़ने बाद यहां का बच्चा कॉमर्स कॉलेज कैसे जा सकता है। दो क्रेडिट कम्प्यूटर के  लिए कहां जाएगा। नई शिक्षा नीति पर कोई ज्यादा रिसर्च नहीं हुई है। इसको बिना व्यवहारिकता में लाने में परेशानी आ रही है। बच्चों को मल्टीपल चॉइस तो दे दी उसके संसाधन उपलब्ध नहीं कराए।                      <br /><strong> - मूलचंद जैन, डीन कृषि महाविद्यालय कोटा</strong></p>
<p><strong>बुनियादी शिक्षा बच्चे की मजबूत होगी तभी मिलेगी गुणवत्ता युक्त शिक्षा</strong><br />गुणवत्ता युक्त शिक्षा की बुनियाद ही प्रारंभिक शिक्षा है। यहां से ही क्वॉलेटी एजुकेशन मिलेगी तभी बच्चा अपना गोल सेट कर रोजगारमुखी शिक्षा की ओर अग्रसर होगा। आज सबसे बड़ी समस्या डमी स्कूल है। जिससे बच्चों की बुनियादी शिक्षा कमजोर हो रही है। बच्चा 5 वीं में आने के साथ ही उसका संघर्ष शुरू हो जाता है। हम सिस्टम की खामियां निकालकर अपने दायित्व से नहीं बच सकते है। गुरुकुल पद्धति पर काम होना चाहिए।जब तक बेसिक यूनिट मजबूत नहीं होगी। शिक्षा में गुणवत्ता नहीं आएगी। शिक्षा में बदलाव के लिए सेवानिवृत शिक्षाविदो की एक कमेटी बननी चाहिए जो शिक्षा में आ रही परेशानी के साथ शिक्षा को कैसे रोजगारमुखी बनाए ऐसी एक कमेटी बननी चाहिए पूरे देश में जो शिक्षा को रोजगारमुखी बनाने में सहायक हो। आज स्कूल में शिक्षा का वातावरण नहीं मिल रहा है। एक होड चल रही डॉक्टर, इंजीनियर बनाने की। कोचिंग व्यवस्था से बच्चों को पूरी शिक्षा नहीं मिल पा रही है।                    <br /><strong>- संदीप अग्रवाल, स्पिंग डेल्स स्कूल संचालक</strong></p>
<p><strong>समग्र शिक्षा से ही निकलेंगी बहुमुखी प्रतिभाएं</strong><br />नई शिक्षा नीति से खाफी बदलाव आएगा। इसमें समय लगेगा लेकिन चीजें सुधरेंगी। कुछ खामियां अवश्य हैं लेकिन शिक्षा नीति के बारे में एटलीस्ट सोचा तो गया। बच्चा क्लास में नियमित रहे इसकी व्यवस्था भी नई नीति में की गई है। मल्टीपल च्वाइस भी दी गई है। पहले जहां स्कूलों में शुरुआत से ही बच्चों को समग्र शिक्षा दी जाती थी। जिससे उसका सर्वांगीण विकास होता था। नैतिक शिक्षा से लेकर सामाजिक विज्ञान तक पढ़ाया जाता था। उस समग्र शिक्षा की आज आवश्यकता है। उसे से बहुमुखी प्रतिभाएं निकलकर आएंगी। यह तभी संभव होगा जब बच्चे नियमित कक्षाओं में जाएंगे।  इंटरनेट पर ज्ञान का भंडार है लेकिन वहां से व्यवहारिक ज्ञान नहीं मिल सकता वह कक्षा में शिक्षक से ही मिलता है। घर परिवार से लेकर शिक्षण संस्थान तक में बच्चों का समग्र विकास करने की जरूरत है। जिससे वे गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के साथ आत्म निर्भर बन सकें।  <br /><strong>- रीना दाधीच, कुल सचिव एवं एनईपी समन्वयक, कोटा विश्वविद्यालय</strong></p>
<p><strong>आत्म निर्भरता के लिए तकनीकी शिक्षा जरूरी</strong><br />बच्चे की प्रतिभा को उसके माता पिता व परिवार जन ही पहचान सकते हैं। माता पिता को बच्चों की रूचि के हिसाब से ही उसे शिक्षा दिलानी चाहिए। वह जिस भी फील्ड में जाना चाहता है उसे जाने देना चाहिए। जिससे वह अपना बेस्ट दे सकेगा। थौपी गई शिक्षा से बच्चा मानसिक तनाव में आकर गलत कदम भी उठा सकता है। बच्चों को यदि तकनीकी शिक्षा दी जाए तो वह उसे आत्म निर्भर बनाने में अधिक सहायक होगी। सिर्फ डिग्री लेना ही पर्याप्त नहीं है। हाथ का हुनर होगा तो बच्चा कभी बेरोजगार नहीं रह सकता। हमारी शिक्षा नीति में इन सब जरूरतों की ओर देखना चाहिए।  सैद्धांतिक शिक्षा के साथ प्रायोगिक शिक्षा भी दी जाएगी तो वह व्यक्ति को आत्म निर्भर बनाने में अधिक सहायक होगी। जिससे वह अपना बेस्ट दे सकेगा। आज प्रैक्टिल की ज्यादा जरूरत है। हम इस क्षेत्र में काम भी कर रहे हैं।  अभिभावकों को भी बच्चें की रुचि देखना चाहिए। उन पर प्रेशर नहीं डालना चाहिए। <br /><strong>- सीमा चौहान, प्राचार्य जेडीबी आर्ट्स कॉलेज </strong></p>
<p><strong>शिक्षा नीति आधी अधूरी व्यवस्थाओं के चलते मजाक बनकर रह गई</strong><br />वर्तमान में गुणवत्ता युक्त शिक्षा नहीं मिलने के कई कारण है। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि हमारी सरकार की ओर से जो पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है। वो व्यवहारिक नहीं होता है। इसको रोजगारमुखी के साथ समाज के अनुकूल बनाने की आवश्यकता है। इसके बारे में आयुक्तालय को अवगत भी कराया गया है। विश्व विद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम के फेल  होने का कारण मुख्य कारण एक ही दिन में पाठ्यक्रम को तैयार कर लागू कर दिया जाता है। जबकि होना यह चाहिए की इसपर पूरी रिसर्च होने के बाद समाजोपयोगी पाठ्यक्रम तैयार हो जिससे युवाओं को रोजगार मिल सकें। महाविद्यालय तो सरकार लगातार खोल रही है लेकिन इसमें स्टाफ भवन और अन्य संसाधन की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। ऐसे में क्वॉलेटी एजुकेशन कहां से मिल पाएगी। शिक्षकों पढ़ाई के समय कम हो रहा है। वर्तमान में शिक्षा पर 6 प्रतिशत खर्च होना चाहिए हो रहा 2 प्रतिशत हो रहा है। वर्तमान में शिक्षा नीति आधी अधूरी व्यवस्थाओं के चलते मजाक बनकर रह गई है। <br /><strong>- गीताराम शर्मा, एबीआरएसएम के अध्यक्ष व निदेशक आयुक्तालय कोटा</strong></p>
<p><strong>क्वालिटी एजुकेशन</strong><br /><strong>शिक्षा को रोजागारमुखी बनाएं</strong><br />क्वॉलेटी एजुकेसन के साथ रोजगारमुखी शिक्षा की बात करनी जरुरी है। क्लास में व्यवसायिक शिक्षा भी शिक्षा देनी चाहिए है। शिक्षा मुल्यांकन परक्ष होनी चाहिए। बच्चों को पहले दिन से क्वॉलेटी एजुकेशन मिलनी चाहिए। साथ कॉलेज में उपस्थित बढ़नी चाहिए। कॉलेज में शिक्षा के पर्याप्त उपकरण के संसाधन होने चाहिए। शिक्षा में कौशल विकास की व्यवस्था की आवश्यकता है। कोर्स में 30 प्रतिशत इंड्रस्टी  विषय को समायोजित करना चाहिए।  बच्चों को रोजगारमुखी शिक्षा के लिए केस स्टेडी सफल उद्योगवाले लोगों का अध्ययन करना चाहिए। युवाओं को ऐसी शिक्षा दी जाए जो अपने पांव पर खड़ा होने की शिक्षा की सबसे ज्यादा जरुरी है। अभी युवा अपने पांव पर खड़ा नहीं हो पाए। हमने विदेशों से क्रेडिट सिस्टम तो ले लिया है और नई शिक्षा नीति बना दी लेकिन इस शिक्षा को रोजगारमुखी नहीं बना पाए। इसका कारण है जो तीन साल का पाठ्यक्रम बनाया जा रहा है जिसमें हम केरियर आबजेक्टिव नहीं डाल रहे है। बच्चा किस दिशा में जाएगा। उसका उददेश्य ही उसको बच्चे पता नहीं है। रोजागार के लिए उद्देश्य परख विषय डाला जाए।          <br /><strong>- अनुज विलियम, शिक्षाविद्</strong></p>
<p><strong>नई शिक्षा प्रणाली के अनुरूप शिक्षक नहीं ढले है</strong><br />वर्तमान में सरकार ने नई शिक्षा प्रणाली लागू तो कर दी है। लेकिन इस नई शिक्षा नीति के अनुरूप शिक्षक तैयार नहीं कर पाए है। अभी कई शिक्षक अपडेट नहीं है। सिस्टम में तो बदलाव हो गया है लेकिन पढ़ाई और इसके संस्थागत ढांचे में अभी काफी बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा में प्रायोगिक शिक्षा ज्यादा होनी चाहिए। हिस्ट्री में टूरिज्म को जोड़ा जाए। साथ ही हेरिटेज टूरिज्म कोर्स चलना चाहिए जिससे युवाओं रोजगार मिल सकें। शिक्षा ऐसी हो जिससे युवा आॅलराउडर बन सकें। जिससे देश समाज में एक अच्छा इंसान के साथ रोजगार मुखी व्यक्ति मिलेगा। शिष्य और गुरु के बीच संवाद कायम होना जरुरी है। डमी स्कूल और कोचिंग शिक्षा जगह बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना ज्यादा जरुरी है।  अभी बच्चों को मशीन बना दिया है। उन्हें व्यवहारिक ज्ञान से दूर रखा जा रहा है। 2010 तक शिष्य गुरु का सम्मान करता था। लेकिन अब गुरु शिष्य के रिश्ते कमजोर हो रहे है। <br /><strong>- डॉ. सुषमा आहुजा, समाजसेविका, सोशल क्लब</strong></p>
<p><strong>मंथन के बिंदु</strong><br />- नई शिक्षा नीति जल्द लागू हो<br />- नई शिक्षा नीति की खामियों पर काम किया जाए<br />- वर्तमान व्यवस्था के लिए समाज, सरकार, शिक्षक,परिवार सब जिम्मेदार<br />- शिक्षा के बुनियादी ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत<br />- कोर्स में रोजगार से जुडने संबंधी पाठ्य.क्रम शामिल हो<br />- इनफ्रास्ट्क्चर मजबूत किया जाए।<br />- इन्क्यूबैशन सेन्टर बनाए जाएं<br />- मल्टीपल च्वाइस कोर्स करवाएं लेकिन ऐसी व्यवस्था भी करें<br />- डमी स्कूल व्यवस्था बंद हो<br />- डाक्टर इंजीनियर ही नहीं अन्य रोजगार के रास्ते शिक्षा के माध्यम से बताए जाएं।</p>
<p><strong>नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन हो </strong><br />सरकार ने जो नई शिक्षा नीति लागू की है वह काफी अच्छी है। उस शिक्षा नीति का क्रियांवयन भी सही ढंग से किया जाए तो उसका लाभ होगा। बच्चे को स्कूल से ही ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वह अपना सर्वांगीण विकास कर सके। वह तभी होगा जब बच्चा नियमित कक्षा में जाएगा। फिर चाहे वह स्कूल हो या कॉलेज। बिना कक्षा में जाए उसे व्यवहायिक ज्ञान नहीं मिल सकता।  विशेष रूप से उच्च शिक्षा में बच्चे की कक्षा में उपस्थिति को अनिवार्य कर दिया जाए तो उससे काफी हद तक बच्चे की शिक्षा का स्तर सुधर सकता है। डमी स्कूलों में प्रवेश न हो इसके लिए अभिभावकों को ही विचार करना होगा। बचपन से ही कोचिंग भेजने की परम्परा गलत होती जा रही है। बच्चे की प्रतिभा को शिक्षक से अधिक उसके माता पिता समझते हैं। <br /><strong>- दिनेश विजय, निदेशक मां भारती ग्रुप </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Jun 2024 12:00:04 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का - स्कूली शिक्षा में कोटा प्रदेश में दूसरे नम्बर पर आया</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी स्कूलों में क्वालिटी एजुकेशन मिलने को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार अभियान चलाया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-news---kota-came-second-in-the-state-in-school-education/article-64272"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/asar-khabar-ka---schooli-siksha-me-kota-pradesh-me-dusre-no.-pr-aya...kota-news-16-12-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शिक्षा नगरी के लिए खुशखबरी है। स्कूली शिक्षा में कोटा प्रदेश में दूसरे नम्बर पर रहा। राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद द्वारा जारी की गई रैंकिंग में कोटा 50.91 अंक हासिल कर राज्य में दूसरे पायदान पर अपना स्थान बनाने में कामयाब हुआ। जबकि, राजधानी जयपुर अपनी रैंकिंग संभाल नहीं पाया और 26वें नम्बर पर पहुंच गया। वहीं, 55 अंकों के साथ चुरू प्रदेश में अव्वल रहा। इधर, भीलवाड़ा 49.96 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। गौरतलब है कि दैनिक नवज्योति ने सरकारी विद्यालयों में क्वालिटी एजुकेशन को लेकर अभियान चलाया था। जिसके बाद शिक्षा अधिकारियों ने शैक्षणिक व्यवस्थाओं में सुधार के प्रयास किए और व्यवस्थाओं को लेकर लगातार मॉनिटरिंग की। जिसकी बदौलत जिले को यह उपलब्धि हासिल हुई। </p>
<p><strong>12 पैरामीटर पर आंका मूल्यांकन</strong><br />राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद द्वारा प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों के मूल्यांकन के लिए 12 तरह के पैरामीटर तय किए थे। जिसकी कसौठी पर ही विद्यालयों का शैक्षणिक स्तर परखा गया। बता दें, हर माह शिक्षा विभाग को स्कूलों से जुड़ी हर जानकारी शाला दर्पण पोर्टल पर अपलोड करनी होती है। जिसके आधार पर मूल्यांकन कर रैंकिंग जारी की जाती है। </p>
<p><strong>यह हैं पैरामीटर</strong><br />- जिले के प्रत्येक स्कूलों में कितने विद्यार्थियों ने इंसपायर अवॉर्ड, एसटीएसई,एनटीएसई, इंदिरा प्रियदर्शनी, गार्गी पुरस्कार, साइंस एग्जिबिशन, कल्चर आटर्् फेस्टिवल, एनएमएस योजना में कितना स्कोर किया। इसके 10 नम्बर थे। <br />- गत माह में कुल नामांकनों की संख्या में विद्यार्थियों की औसत उपस्थिति का प्रतिशत।<br />- वर्तमान माह में विद्यार्थियों को पुस्तकालय की पुस्तकों का वितरण करने वाले विद्यालयों का प्रतिशत।<br />- कुल नामांकन में कितने प्रतिशत विद्यार्थियों की वृद्धि हुई। <br />- जिले में उजियारी पंचायतों का प्रतिशत क्या रहा।<br />- कितने प्रतिशत विद्यार्थियों का जनाधार प्रमाणीकरण हो गया।<br />- ज्ञान संकल्प पोर्टल के माध्यम से प्राप्त राशि पर आधारित अंक।<br />- पीटीएम में अभिभावकों की उपस्थिति ।<br />- एसएमसी, एसडीएमसी बैठक आयोजित करने वाले विद्यालयों का प्रतिशत।<br />- आईसीटी लैब, स्मार्ट कक्षा-कक्ष युक्त विद्यालयों का प्रतिशत<br />- क्या विद्यालयों में खेल मैदान विकसित है तथा उपयोग में लिया जा रहा है। सहित कई पैरामीटर पर जिलों को रैंकिंग दी गई। </p>
<p><strong>11वें से 2 नम्बर पर पहुंचा कोटा</strong><br />शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, राजस्थान शिक्षा परिषद द्वारा यह रैंकिंग प्रतिमाह जारी की जाती है। नवम्बर में जिला 9वें तथा आॅक्टूबर में 11वें नम्बर था। शिक्षा विभाग के तमाम अधिकारी रैंकिंग सुधार में जुटे रहे और अथक प्रयासों के बाद दिसम्बर में कोटा सबको पछाड़ते हुए दूसरे नम्बर पर अपना स्थान बनाया। </p>
<p><strong>नवज्योति ने चलाया अभियान</strong><br />सरकारी स्कूलों में क्वालिटी एजुकेशन मिलने को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार अभियान चलाया। वहीं, भौतिक साधन-संधान व शाला भवनों की जर्जर हालातों से रुबरू करवाकर ज्वलंत मुद्दे पर अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया और प्रदेश में घटती रैंकिंग में सुधार के लिए प्रेरित किया। इसके बाद अधिकारियों ने जोश और जुनून के साथ व्यवस्थाओं में सुधार के कार्य किए। जर्जर भवनों का जीर्णोंद्धार करवाया। भामाशाहों के सहयोग से नए कक्षा कक्ष, नए महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल, स्मार्ट क्लास रूम व शिक्षकों की कमी दूर कर शिक्षा की गुणवत्ता पर फोकस किया। जिसका नतीजा यह रहा कि कोटा दूसरे नम्बर पहुंच गया। </p>
<p>शिक्षा के क्षेत्र में कोटा का प्रदेश में दूसरे नम्बर पर रहना जिले के बड़ी उपलब्धि है। हर माह शिक्षा अधिकारियों व संदर्भ व्यक्ति से जिला रैंकिंग समीक्षा बैठक की और सुविधाओं में विस्तार कर लगातार की जा रही मॉनिटरिंग की बदौलत जिले को यह उपलब्धि हासिल हुई है। अब कोटा को प्रदेश में पहले स्थान पर लाना उद्देश्य है। <br /><strong>- उषा पंवार, अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक अधिकारी, समग्र शिक्षा कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Dec 2023 20:12:19 +0530</pubDate>
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                <title>सपने पूरे कर रहा महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल</title>
                                    <description><![CDATA[शिक्षा विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार अंगे्रजी माध्यम से सरकारी स्कूलों में 30 से ज्यादा स्कूल जिले के ग्रामीण इलाकों में खोले गए हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mahatma-gandhi-english-medium-school-is-fulfilling-dreams/article-57446"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/sapne-pure-kr-rha-mahatma-gandhi-english-medium-school...kota-news-18-09-2023.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। बदलते दौर के साथ शिक्षा का माध्यम भी तेजी से बदलने लगा है। हिन्दी की जगह अंग्रेजी माध्यम अभिभावकों की प्राथमिकता में शुमार हो गई। लेकिन, बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाने का ख्वाब महंगी फीस के कारण पूरा नहीं कर पाने वाले अभिभावकों के सपने अब महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल पूरा कर रहा है। वहीं, बुनियादी शिक्षा से क्वालिटी एजुकेशन की नींव भी मजबूत हो रही है। समय की मांग को देखते हुए गहलोत सरकार ने प्रदेशभर में सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूल खोल दिए। इससे गरीब तबके के विद्यार्थियों का अंग्रेजी माध्यम स्कूल में तालिम हासिल करने की राह आसान हो गई।</p>
<p><strong>कोटा को मिले 52 इंग्लिश मीडियम स्कूल</strong><br />कोटा जिले को पिछले पांच साल में 52 राजकीय महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूलों की सौगात मिली है। जिले में सबसे पहला स्कूल वर्ष 2019 में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय मल्टीपरपज गुमानपुरा को हिन्दी से अंग्रेजी माध्यम में तब्दील किया था। जिसके प्रति लोगों का जबरदस्त रुझान देखने को मिला। इससे उत्साहित सरकार ने अगले शैक्षणिक सत्र 2020-21 में 7 सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूल खोल दिए। इस तरह जिले में 2019 से 2023 तक कुल 52 महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल चुके हैं।</p>
<p><strong>20 से ज्यादा स्कूलों में चल रही बाल वाटिकाएं</strong><br />महात्मा गांधी स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए सरकार ने निजी स्कूलों की तर्ज पर सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में भी प्री प्राइमरी कक्षाएं संचालित कर दी। जिसे बाल वाटिका का नाम दिया गया। यहां तीन वर्ष की उम्र से बच्चों को नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी में एडमिशन दिया जा रहा है। जिले में 20 से ज्यादा सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में प्री-प्राइमरी कक्षाएं चल रही हैं। तीनों कक्षाओं में 75-75 सीटें हैं, जो वर्तमान फुल हो चुकी हैं।</p>
<p><strong>महंगी फीस से मिली निजात</strong><br />निजी स्कूलों में मोटी फीस होने के कारण कई प्रतिभाएं उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती थी। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ा नहीं पाने से निराश रहते थे। ऐसे अभिभावकों के सपने पूरे करने के लिए सरकार ने जिलेभर में इंग्लिश मीडियम स्कूल खोल दिए। जहां बच्चों को पढ़ाने के लिए वेल क्वालिफाई शिक्षक लगाए गए हैं। </p>
<p><strong>30 से ज्यादा स्कूल ग्रामीण अंचल में</strong><br />शिक्षा विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार अंगे्रजी माध्यम से सरकारी स्कूलों में 30 से ज्यादा स्कूल जिले के ग्रामीण इलाकों में खोले गए हैं। जहां लेवल-1 व लेवल-2 के शिक्षकों को तैनात किया गया है। इन स्कूलों में बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी पढ़ रहे हैं। </p>
<p><strong>अभिभावकों में खुशी, सपने हुए साकार</strong><br />दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार चलाने वाले संजय नगर निवासी शंभू लाल का कहना है, प्राइवेट स्कूल की फीस महंगी होने के कारण कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी बेटी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ सकेगी।  सरकार ने महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलकर उन्हें संबल दिया है। बिजली पार्ट्स की दुकान पर काम करने वाले बोरखेड़ा निवासी शकील कहते हैं, आर्थिक तंगी के कारण बच्चों को प्राइवेट स्कूल में नहीं पढ़ा पाने का मलाल रहता था, लेकिन सरकार ने इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलकर बच्चों के भविष्य की राह आसान कर दी। रामचंद्रपुरा निवासी राधेश्याम सेगर, कन्हैया लाल व नल का काम करने वाले रविंद्र कुमार, राजेंद्र नागर ने बताया कि हमारे बच्चे महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ रहे हैं। उनमें अंग्रेजी सीखने का उत्साह व ड्रेसअप सेंस भी बढ़ा है। बच्चों की एक्टिविटी में बदलाव आ रहा है। अंग्रेजी में कविता सुनाते हैं तो खुशी होती है। शिक्षा विभाग ने पांचवे चरण के शैक्षणिक सत्र 2023-24 में 15 स्कूल खोले।जिनमें गत 31 जुलाई को ही शिक्षक लगाकर अध्यापन कार्य शुरू करवा दिया। इन विद्यालयों में शुरूआती फेस में कक्षा एक से आठवीं तक अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाया जा रहा है। जिसके लिए लेवल-1 व लेवल-2 के शिक्षकों की नियुक्ती की गई है। </p>
<p><strong>सरकारी स्कूलों की ओर बढ़ा रुझान</strong><br />शिक्षक माशूक अली व शिव प्रकाश ने बताया कि महात्मा गांधी स्कूल खुलने से गरीब तबके व मध्यम वर्ग के लोगों को निजी स्कूलों की मनमानी व मोटी फीस से निजात मिली है। 5 से 8 किमी दूर रहने वाले अभिभावक भी अपने बच्चों का यहां दाखिला करवा रहे हैं। क्वालिटी एजुकेशन के साथ किताबें तक मुफ्त में मिल रही है। ऐसे में विद्यार्थियों व अभिभावकों का रुझान सरकारी स्कूलों की ओर तेजी से बढ़ा है।  </p>
<p>गवर्नमेंट अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की निश्चित तौर पर डिमांड बढ़ी है। हाड़ौती में पिछले पांच साल में कुल 183 स्कूल खुले हैं। इनमें से कई स्कूलों में तो बाल वाटिकाएं संचालित हो रही है। वहीं, शहर में कई ऐसे हिन्दी माध्यम स्कूल हैं, जिनमें बिल्डिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर अच्छी स्थिति में है, उन्हें भी अंग्रेजी मीडियम में परिवर्तित किया जा सकता है। <br /><strong>- अजीम पठान, रिटायर्ड शिक्षक</strong></p>
<p>एक तरफ सरकारी स्कूलों में नामांकन के लिए प्रवेशोत्सव जैसे अभियान चलाने पड़ रहे, वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी अंग्रेजी स्कूल में बच्चों को एडमिशन दिलाने के लिए अभिभावक दौड़भाग कर रहे हैं। पिछले साल माहात्मा गांधी वोकेशनल व मल्टीपरपज इंग्लिश मीडियम स्कूलों में बच्चों के एडमिशन के लिए अभिभावक कतारों में नजर आए थे। अधिकतर स्कूलों में एडमिशन के लिए लॉटरी निकालनी पड़ी थी। महात्मा गांधी स्कूलों की संख्या में और बढ़ोतरी होनी चाहिए।  <br /><strong>- लियाकत अली खान, रिटायर्ड शिक्षक  </strong></p>
<p>गत वर्ष मल्टीपरपज में नर्सरी से कक्षा 1 के लिए 25 सीटों पर 1800 आवेदन आए थे। 20 किमी दूर से भी अभिभावकों ने आवेदन किए थे। बम्पर आवेदन के चलते लॉटरी निकाल कर निर्धारित सीटों पर एडमिशन दिए थे। हालांकि बड़ी संख्या में बच्चे एडमिशन से महरूम रह गए थे।  सरकार के इस प्रयास से शिक्षा जगत में बड़ा बदलाव आया है। इसी का नतीजा है कि शहर के बड़े निजी स्कूलों के विद्यार्थी भी यहां एडमिशन ले रहे हैं और वर्तमान में पढ़ रहे हैं। <br /><strong>- राहुल शर्मा, प्रिंसिपल, माहात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम मल्टीपरपज स्कूल</strong></p>
<p><strong>पहले पेपर फिर इंटरव्यू, पास होने के बाद शिक्षकों को दी पोस्टिंग</strong><br />जिले में 52 माहात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल संचालित हो रहे हैं। जिनमें शिक्षक भी ऐसे लगाए हैं, जो खुद इंग्लिश मीडियम से पढ़े हंै। ऐसे में वे जिस टेक्निक से पढ़े उसी टेक्निक के साथ वे बच्चों को पढ़ा रहे हैं। वहीं, सरकार ने शिक्षकोें के लिए अब रिटर्न पेपर और इंटरव्यू अनिवार्य कर दिया है। इसमें पास होने वाले लेवल-1 व लेवल-2 के शिक्षकों को महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पोस्टिंग दी गई है। इस योजना से उन अभिभावकों के सपने पूरे हो रहे हैं, जो महंगी फीस के कारण अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में नहीं पढ़ा पा रहे थे। अंग्रेजी माध्यम के स्कूल समय की डिमांड है। ऐसे में सरकार ने सैंकड़ों अभिभावकों को तोहफा देकर उनके बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन उपलब्ध करवा रही है। वहीं, बाल वाटिका खोलने का उद्देश्य बुनियादी ढांचा मजबूत करना है ताकि कम उम्र से ही बच्चे अंग्रेजी माध्यम से रूबरू हो सके और आगे की पढ़ाई इंग्लिश में करने के लिए तैयार हो सके।<br /><strong>- शशि मीणा, उप निदेशक, महात्मा गांधी प्रकोष्ठ, सहायक निदेशक कार्यालय शिक्षा विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Sep 2023 18:34:45 +0530</pubDate>
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                <title>2 करोड़ रुपए मिले तो बदले स्कूलों की दशा </title>
                                    <description><![CDATA[योजना के तहत प्रत्येक स्कूल को दो-दो करोड़ रूपए का बजट मिलना है। जिससे वे अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के साथ कॉन्वेंट स्कूलों की तरह सुविधाएं विकसित कर सकें। इसके तहत प्रत्येक जिले के हर ब्लॉक से दो विद्यालयों का चयन कर उन्हें आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित किया जाना है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/if-you-get-2-crore-rupees-then-the-condition-of/article-46541"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/2-crore-rupaye-mile-to-badle-schoolo-ki-dasha...kota-news-24-05-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। पीएम-श्री योजना में चयनित जिले 9 राजकीय विद्यालयों को अपनी किस्मत बदलने का इंतजार है। इन स्कूलों की दशा और दिशा तभी बदल सकती है जब उन्हें सरकार से बजट मिले। लेकिन, बजट कब और कितनी किस्तों में मिलेगा, फिलहाल इसका जवाब शाला प्रधान व समग्र शिक्षा अधिकारियों के पास भी नहीं है। राशि के अभाव में मरम्मत,आधुनिक लैब सहित कई विकास कार्य अटके पड़े हैं। दरअसल, योजना के तहत प्रत्येक स्कूल को दो-दो करोड़ रूपए का बजट मिलना है। जिससे वे अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के साथ कॉन्वेंट स्कूलों की तरह सुविधाएं विकसित कर सकें।  </p>
<p><strong>क्या है पीएम-श्री योजना</strong><br />पीएम-श्री योजना का पूरा नाम प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया है। यह केंद्र सरकार की योजना है। इसके तहत प्रत्येक जिले के हर ब्लॉक से दो विद्यालयों का चयन कर उन्हें आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित किया जाना है। प्रथम चरण में योजना को पांच सालों के लिए 2022 से 2027 तक के लिए लागू किया गया है। योजना में चयनित सभी सरकारी स्कूलों को मॉडल स्कूल के रूप में विकसित करना है। जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को रोचक तरीके से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। </p>
<p><strong>पीएम-श्री स्कूलों में ये सुविधाएं होंगी विकसित</strong><br />पीएम-श्री योजना में चयनित स्कूलों में बच्चों को स्मार्ट क्लास, डिजिटल क्लारूम, हाईटेक कम्प्यूटर लैब, लैबोरेटरी, सुसज्जित लाइब्रेरी, नीट एंड क्लीन शौचालय, स्मार्ट प्लेग्राउंड, चमचमाता स्कूल परिसर, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर सहित सभी आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। इन सभी स्कूलों में यह सुविधाएं 2 करोड़ के बजट से विकसित की जाएंगी। साथ ही क्वालिटी एजुकेशन पर पहले से ज्यादा फोकस किया जाएगा, इसके लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा। वहीं, व्यवहारिक के साथ प्रायोगिक व व्यवसायिक शिक्षा से भी बच्चों को अपग्रेड रख विद्यार्थियों का भविष्य संवारना है।  </p>
<p><strong>इन स्कूलों का हुआ चयन </strong><br />जिले में पांच ब्लॉक हैं, प्रत्येक ब्लॉक से दो-दो स्कूलों का चयन पीएम-श्री योजना में किया गया है। जिनमें पहला अपर प्राइमरी और दूसरा सीनियर सैकंडरी स्तर के विद्यालय हैं। इनमें खैराबाद ब्लॉक का राजकीय सीनियर सैकंडरी स्कूल जुल्मी, सुल्तानपुर ब्लॉक में राजकीय सीनियर सैकंडरी स्कूल कोटसुवां, इटावा ब्लॉक में राजकीय अपर प्राइमरी स्कूल, इटावा ग्राम पंचायत में राजकीय सीनियर सैकंडरी स्कूल इटावा,  कैथून ग्राम पंचायत में राजकीय सीनियर सैकंडरी स्कूल कैथून, कोटा शहर में राजकीय बालिका सीनियर सैकंडरी स्कूल श्रीपुरा, लाडपुरा ब्लॉक में राजकीय प्राइमरी स्कूल पारलिया की ढांणी, सांगोद ब्लॉक में राजकीय प्राथमिक स्कूल रामनगर कनवास, सांगोद ग्राम पंचायत में राजकीय सीनियर सेकंडरी स्कूल सांगोद शामिल हैं। </p>
<p><strong>शिक्षा की गुणवत्ता में होगा सुधार</strong><br />शिक्षाविदों के अनुसार पीएम-श्री योजना की गाइड लाइन के तहत चयनित स्कूलों को करोड़ों का बजट जारी कर आधारभूत ढांचा बदला जाएगा। पढ़ने और पढ़ाने के तरीकों में बदलाव किए जाएंगे। जिससे शिक्षा की गुणत्ता में और बढ़ोतरी होगी। समग्र, एकीकृत व वास्तविक जीवन की स्थितियों पर आधारित पढ़ाई कराई जाएगी। ताकि, प्राथमिक कक्षा से 12वीं पास करते-करते बच्चों का पूरी तरह विकास हो सके और वे कॅरियर की दिशा तय कर पाएं। यह व्यवस्था शिक्षकों के लिए भी अहम होगी। </p>
<p>पीएम श्री योजना में श्रीपुरा गर्ल्स स्कूल का चयन गत माह 11 अप्रेल को हुआ था। मार्च माह में बजट मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी लेकिन अभी तक बजट नहीं मिला और न ही इससे संबंधित कोई जानकारी मिल रही है। यदि, बजट उपलब्ध हो जाता है तो सबसे पहले स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना है। दीवारे व कक्षा कक्ष की मरम्मत करवानी है। साथ ही व्यवसायिक ट्रैड व कम्प्यूटर लैब विकसित करनी है। <br /><strong>-आभा शर्मा, प्राचार्य गर्ल्स सीनियर सैकंडरी स्कूल श्रीपुरा </strong></p>
<p>मुख्यालय ने इस संबंध में एक कमेटी गठित की है। जिसमें समग्र शिक्षा अधिकारी, जिला कलक्टर, सीईओ, पीडब्ल्यूडी एक्सईएन सहित अन्य अधिकारी शामिल हैं। कलक्टर की अध्यक्षता में कमेटी की मिटिंग होनी है, जिसके बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। <br /><strong>- डॉ. उषा पंवार, अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक अधिकारी, समग्र शिक्षा कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 May 2023 14:43:04 +0530</pubDate>
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                <title>300 करोड़ से होगा जर्जर स्कूलों का कायाकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी स्कूलों में बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन देने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी व कोचिंग करवाना शामिल हैं। इसके अलावा नि:पाठयपुस्तक, साइकिल, स्कूटी, यूनिफॉर्म, मिड-डे मील, मींस स्कोलर शिप, गार्गी पुरस्कार व काली बाई योजना के तहत छात्राओं को नि:शुल्क स्कूटियां वितरित की जाती है।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/300-crores-will-rejuvenate-the-dilapidated-schools/article-24991"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/300-carore-se-hoga-jarjar-schools-ka-kayakalp-,-kota-news-30-09-2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान सरकार सरकारी स्कूलों में क्वालिटी एजुकेशन देने के लिए गंभीर है। सरकार का पूरा फोकस चहुंओर शिक्षा का उजियारा करने को है। विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, इसके लिए बड़े स्तर पर हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही नए-नए नवाचार भी किए जा रहे हैं। जिसकी झलक बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम में सामने आए हैं। सरकारी स्कूलों का रिजल्ट अन्य स्कूलों के मुकाबले बेहतर रहा है। वहीं, जर्जर हो रहे स्कूलों का कायाकल्प करने के लिए 250-300 करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। जिसके तहत प्रदेशभर में खस्ताहाल स्कूलों को चिन्हित कर उनका इंस्फ्रास्ट्रेक्चर मजबूत किया जाएगा।  इसके लिए सभी जिलों से सूचनाएं मांगी जा रही है। जहां भी जर्जर स्कूल भवन हैं, उनका पहली प्राथमिकता से काया कल्प किया जाएगा। यह जानकारी गुरूवार को यूआईटी आॅडिटोरियम में सीएफसीएल की ओर से आयोजित समवर्तिका कार्यक्रम में स्कूल शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव पवन कुमार गोयल  ने दैनिक नवज्योति से साझा की। अतिरिक्त मुख्य सचिव गोयल ने कहा, सरकारी स्कूलों में बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन देने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी व कोचिंग करवाना शामिल हैं। इसके अलावा नि:पाठयपुस्तक, साइकिल, स्कूटी, यूनिफॉर्म, मिड-डे मील, मींस स्कोलर शिप, गार्गी पुरस्कार व काली बाई योजना के तहत छात्राओं को नि:शुल्क स्कूटियां वितरित की जाती है।  </p>
<p><strong>खत्म होगा लाखों बच्चों का यूनिफॉर्म का इंतजार</strong><br />शिक्षा विभाग का नया सत्र शुरू हुए करीब तीन माह का समय हो गया है। प्रदेशभर के सैंकड़ों विद्यार्थियों का स्कूल यूनिफॉर्म का इंतजार अब जल्द ही खत्म होने वाला है। अतिरिक्त मुख्य सचिव गोयल ने कहा कि अक्टूबर माह में सभी सरकारी स्कूलों के बच्चों को यूनिफॉर्म मिल जाएगी। सरकार ने इसके लिए बजट जारी कर दिया है। गौरतलब है कि कोटा जिले के 1 हजार 374 सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा 1 से 8वीं तक के 1 लाख 18 हजार 905 बच्चों को तीन माह से स्कूल ड्रेस नहीं मिल पाई है। राज्य सरकार ने पिछले वर्ष कक्षा एक से आठ तक पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे को दो-दो स्कूल ड्रेस देने की घोषणा की गई थी, जो इस सत्र से देनी थी। सरकार के स्तर पर विद्यार्थियों की ड्रेस के लिए कपड़ा प्रदान किया जाना था, जबकि सिलाने की जिम्मेदारी स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की तय की गई थी। इसके लिए 30 जुलाई तक राजकीय स्कूलों में नामांकन करवाने वाले बच्चों का रिकॉर्ड भी शिक्षा विभाग से मांगा था। विभाग ने रिकॉर्ड तो भिजवा दिया, लेकिन सरकार अब तक ड्रेस के लिए कपड़ा नहीं भिजवा पाई है। सरकार की इस घोषणा के चलते अभिभावक भी असमंजस में है और बच्चों की स्कूल ड्रेस तक नहीं सिलवा पा रहे हैं।</p>
<p><strong>6ठी से 8वीं तक की छात्राओं को मिलेगा दुपट्टा</strong><br />राजस्थान स्कूल शिक्षा अभियान के तहत मिलने वाली दो ड्रेस के लिए प्रत्येक विद्यार्थी पर 600 रुपए के बजट का प्रावधान किया गया था। छात्रों को हल्की नीले शर्ट व गहरी भूरी नेकर या पेंट दी जानी है। छात्राओं को हल्की नीली शर्ट या कुर्ता, गहरी भूरी सलवार या स्कर्ट दी जाएगी। कक्षा पांच तक छात्राओं को दुपटटा नहीं दिया जाएगा। जबकि कक्षा छह से आठ तक की छात्राओं को गहरी भूरा दुपट्टा (चुन्नी) दिया जाना है। पांचवीं तक के छात्रों को शर्ट व नेकर, छह से आठ तक शर्ट और पेंट देने की योजना थी। प्रति विद्यार्थी सरकार अधिकतम 600 रु. खर्च करेगी, इसमें दो यूनिफार्म के कपड़े की कीमत 425 रुपए तय की गई है, जबकि स्कूल कमेटी को सिलाई के लिए 175 रुपए दिए जाने हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Sep 2022 16:18:34 +0530</pubDate>
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                <title>हाड़ौती के 10 कॉलेज में हालात भयावह: मैं ही प्रिंसिपल, मैं ही चपरासी</title>
                                    <description><![CDATA[ हाड़ौती के बारां, बूंदी, कोटा और झालावाड़ में कई ऐसे राजकीय महाविद्यालय हैं, जहां प्रिंसिपल से लेकर चपरासी तक का सारा काम एक ही शिक्षक के कंधों पर है। संभाग के करीब 10 कॉलेजों में इक्का- दुक्के प्रोफेसर ही लगे हैं। सबसे खराब स्थिति उन महाविद्यालयों की है, जहां एक ही शिक्षक मौजूद हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-situation-in-10-colleges-of-hadoti-is-appalling--i-am-the-principal--i-am-the-peon/article-18705"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/hadoti-ke-10-colleges-mei-haalaat-bhayawah...kota-news-11.8.2022-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। प्रदेशभर में सरकार नए-नए कॉलेज खोल क्वालिटी एजुकेशन देने का दावा कर रही है लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। छात्रों को एडमिशन तो दे दिए लेकिन पढ़ाने को शिक्षक ही नहीं लगाए। बिना गुरु ज्ञान मिलना तो दूर उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दरअसल, हाड़ौती के बारां, बूंदी, कोटा और झालावाड़ में कई ऐसे राजकीय महाविद्यालय हैं, जहां प्रिंसिपल से लेकर चपरासी तक का सारा काम एक ही शिक्षक के कंधों पर है। संभाग के करीब 10 कॉलेजों में इक्का- दुक्के प्रोफेसर ही लगे हैं। सबसे खराब स्थिति उन महाविद्यालयों की है, जहां एक ही शिक्षक मौजूद हैं। ऐसे में वे शिक्षक बीमार पढ़ जाए तो कॉलेज का ताला खुलना तक मुश्किल हो जाता है। हालांकि तमाम मुश्किलों के बावजूद शिक्षक विद्या धर्म का पालन कर अपना दायित्व निभा रहे हैं। इटावा महाविद्यालय एक शिक्षक के भरोसे 600 विद्यार्थी जिले के इटावा में सरकार ने आर्ट्स कॉलेज तो खोल दिया लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिए स्थाई प्रोफेसरों की नियुक्ति नहीं की। यहां कार्यवाहक प्राचार्य नरेंद्र कुमार मीणा ही एकमात्र फैकल्टी हैं। जिन्हें बच्चों को पढ़ाने से लेकर प्रशासनिक कार्य भी इन्हीं को करना पड़ता है।</p>
<p>एक संविदा पर तो विद्या संबल योजना के तहत 4 अस्थाई शिक्षक लगाकर काम चलाऊ व्यवस्था की है। साधन-संसाधनों का भी टोटा है। प्राचार्य मीणा का कहना है, विषयवार कई शिक्षकों की कमी है। जिससे पढ़ाई प्रभावित हो रही है। सरकार को कोटा से पांच प्रोफेसर तो ट्रांसफर कर यहां लगाना चाहिए। वर्तमान में यहां 600 बच्चे पढ़ रहे हैं। मांगरोल कॉलेज : ताला भी प्रिसिंपल ही खोलती हैं वही लगाती हैं कॉलेज शिक्षा सहायक निदेशक डॉ. रघुराज सिंह परिहार के मुताबिक, मांगरोल में 2016 में सरकार ने कॉलेज खोला था। यहां 20 जनों का स्टाफ स्वीकृत है, जिनमें प्रिंसिपल, 7 असिस्टेंट प्रोफेसर के अलावा नॉन टीचिंग स्टाफ शामिल है। यहां एकमात्र असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रिचा मीणा ही कार्यरत हैं। उन्हें कार्यवाहक प्रिसिपल बनाया हुआ है। कॉलेज में करीब 600 विद्यार्थी हैं, प्रोफेसरों के अभाव में विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। कॉलेज का ताला भी प्रिसिंपल्\महाविद्यालय जर्जर भवन में संचालित हो रहा है। बच्चों की सुरक्षा को भी खतरा है। छबड़ा कॉलेज : प्रशासनिक कार्य व पढ़ाई एक साथ छबड़ा कॉलेज की स्थिति बहुुत खराब है। प्रिंसिपल करुणा जोशी ने बताया कि वर्ष 2016 में कॉलेज खुला था लेकिन, प्रोफेसर नहीं लगाए। यहां प्रशासनिक कार्यों के लिए कौशल किशोर को लगा रखा है लेकिन उन्हें छिपाबड़ौद नोडल आॅफिसर बना रखा है। जिससे कॉलेज का प्रशासनिक कार्य भी मुझे ही करना पड़ता है। साथ ही बच्चों को पढ़ाती भी हूं। इन दिनों यहां प्रवेशित विद्यार्थियों को एडमिशन दे रहे हैं। साथ ही दस्तावेज भी जांच रहे हैं। वर्तमान में महाविद्यालय में करीब 600 विद्यार्थी हैं। प्रोफेसरों के बिना इनकी पढ़ाई कैसी होगी, इसका अंदाजा खुद लगा सकते हैं। केलवाड़ा कॉलेज : एक साल से एक ही प्रोफेसर बारां जिले के केलवाड़ा में 2008 में कॉलेज खुला था। अगस्त 2021 तक यहां 6 फैकल्टी थी, लेकिन इसके बाद यहां से लगातार ट्रांसफर होते रहे वर्तमान में एक ही फैकल्टी मांगीलाल महावर के रूप में मौजूद है। इनके अलावा कॉलेज में कोई अन्य स्टाफ नहीं है। ऐसे में चपरासी से लेकर प्रिंसिपल तक का सारा काम इन्हीं को करना पड़ता है। वहीं, कॉलेज में 900 बच्चों का नामांकन है। लेकिन, फैकल्टी के अभाव में उनकी कक्षाएं नहीं लग पाती। परीक्षा से एडमिशन तक की निभा रहे जिम्मेदारी केलवाड़ा प्रिसिंपल महावर का कहना है, केलवाड़ा महाविद्यालय परीक्षा केंद्र भी है। यहां वर्तमान में 2700 विद्यार्थियों की तीन शिफ्ट में परीक्षाएं चल रही है। हालात यह हैं, एग्जाम से लेकर प्रथम वर्ष के बच्चों को एडमिशन देने तक का सारा काम उन्हें ही करना पड़ रहा है। दस्तावेज भी जांच रहे हैं। परीक्षा संचालन के लिए 35 लोगों को वीक्षक के रूप में लगा रखा है। उन्होंने बताया कि 25 जून को उन्हें तेज बुखार था लेकिन परीक्षाएं चल रही थी, ऐसे में दवाइंया लेकर कॉलेज आ गए। हालांकि 30 जून को प्रतिनियुक्ति पर दो फैकल्टी परीक्षा करवाने के लिए लगाई है, ये परीक्षा के बाद वापस चले जाएंगे। कनवास कॉलेज : 8 में से 2 ही कक्षाएं चलती हैं कनवास आर्ट्स कॉलेज 2018 में खुला था। यहां मात्र दो ही शिक्षक कार्यरत हैं। इनमें एक संविदा पर हैं। जबकि, वर्तमान में 600 विद्यार्थी महाविद्यालय में पढ़ रहे हैं। प्रिंसिपल ललित किशोर नामा ने बताया कि वे प्रशासनिक कार्य करने के साथ संस्कृत भी पढ़ा रहे हैं। वहीं, संविदा पर एक हिन्दी व्याख्याता को लगा रखा है। उच्चाधिकारियों को पत्र के माध्यम से यहां शिक्षक लगाने की मांग कर चुके हैं लेकिन समाधान नहीं हुआ। यहां बच्चों को केवल संस्कृत व हिन्दी की पढ़ाई ही करवा पाते हैं, अन्य विषय के विद्यार्थियों की कक्षाएं संचालित नहीं करवा पा रहे। बच्चे आते हैं तो खाली कक्षाओं में बैठे रहते हैं या फिर आते नहीं है। पढ़ाई करवाना तो दूर सेलेबस पूरा करवाना ही चुनौती है। हिंडोली : डेढ़ साल से एक ही प्रोफेसर चला रहे कॉलेज हिंडोली में वर्ष 2020 में आर्ट्स कॉलेज खुला था। यहां बूंदी कॉलेज से प्रोफेसर रमेशचंद मीणा को डेपुटेशन पर हिंडोली भेज दिया था, इसके बाद से वे ही प्रिंसिपल और फैकल्टी हैं। प्राचार्य मीणा ने बताया कि नवम्बर 2021 में कोटा से एक शिक्षक को ट्रांसफर कर यहां लगाया था लेकिन वे स्टे ले आए। वहीं, बूंदी से मई 2022 में एक फैकल्टी को तबादले पर यहां लगाया लेकिन वे भी कोर्ट से स्टे लेने से उन्होंने भी कॉलेज ज्वाइन नहीं किया। वर्तमान में यहां बूंदी कॉलेज से एक लैब असिस्टेंट व एक चपरासी लगाया हुआ है। उन्होंने कहा कि मुझे 1 महीने के लिए यहां भेजा गया था। बाद में लगातार आदेश जारी कर डेपुटेशन को बढ़ाते रहे। अब तो इसका आदेश देना ही भूल गए है। एक माह के चक्कर में डेढ़ साल से यहीं पर हूं। सरकार स्टाफ भी नहीं बढ़ा रही। शाहबाद : दो प्रोफेसर के भरोसे 600 विद्यार्थी शाहबाद में दो फैकल्टी है, यह कॉलेज बारां शहर से करीब 80 किमी दूर हैं, साथ ही सहरिया बाहुल्य क्षेत्र में है। यहां प्रिंसिपल को मिलाकर कुल 8 पद स्वीकृत हैं। प्रोफेसर डॉ. संजय लक्की को कार्यवाहक प्राचार्य बना रखा है। यह कॉलेज एमपी बॉर्डर पर होने व आने जाने के साधन नहीं होने के कारण यहां कोई शिक्षक आना ही नहीं चाहता। झालावाड़: कहीं एक तो कहीं दो फैकल्टी झालावाड़ जिले में भी इसी तरह के हालात हैं। पिडावा कॉलेज में एक फैकल्टी तैनात है, यहां पर करीब 480 विद्यार्थी हैं। इसी तरह से चौमहला व खानपुर में दो-दो फैकल्टी हैं। स्कॉलरशिप से लेकर एडमिशन तक सब पेंडिंग कॉलेजों में स्टाफ नहीं होने से बच्चों को पढ़ाई के अलावा अन्य कई कार्याे में परेशान होना पड़ता है। इक्के दुक्के स्टाफ पर ही पूरी जिम्मेदारी होने के चलते स्टूडेंट्स के भी कई काम पेंडिंग रह जाते। इनमें बच्चों की स्कॉलरशिप, आॅनलाइन पोर्टल, फीस डिपॉजिट, एग्जाम और एडमिशन से लेकर कई तरह के कार्य शामिल है। कॉलेजों में कोई एक्टिविटी करवाने के बारे में तो यह फैकल्टी सोच भी नहीं सकती। कॉलेज में क्लासेज नहीं लगने के चलते बच्चे भी केवल एडमिशन ही लेकर खानापूर्ति कर रहे हैं। हाड़ौती के कई कॉलेजों से फैकल्टी बढ़ाने को लेकर लगातार पत्र मिलते हैं, जिन्हें आयुक्तालय शिक्षा सचिव और शिक्षा मंत्री को भेज फैकल्टी व स्टाफ लगाने का आग्रह करते हैं, लेकिन अभी ऐसा संभव नहीं हो पाया है। कॉलेजों में फीस जमा करने से लेकर कई काम अटक जाते हैं। अव्यवस्थाओं से नाराज विद्यार्थी हमसे आकर शिकायत करते हैं, जिसका भी समाधान बड़ी मुश्किल से निकाला जाता है। प्रोफेसरों के अभाव में बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन मिलना तो दूर उनका पाठ्यक्रम पूरा करवाना ही चुनौती बनी रहती है। निश्चित रूप से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। - रघुराज सिंह परिहार, सहायक निदेशक कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Aug 2022 15:06:35 +0530</pubDate>
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                <title>जर्जर भवन में हर पल मौत का खतरा, जोखिम में कर रहे पढ़ाई</title>
                                    <description><![CDATA[शहर का पाटनपोल राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय 87 साल से जर्जर रियासतकालीन भवन में चल रहा है। भवन इतना जर्जर हो चुका कि पीडब्ल्यूडी ने इसे असुरक्षित घोषित कर दिया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/danger-of-death-every-moment-in-dilapidated-building--studying-at-risk/article-17242"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/jarjar-bhawan-mei-har-pal-maut-ka-saya-patanploe-school..kota-news-1.8.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर का पाटनपोल राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय 87 साल से जर्जर रियासतकालीन भवन में चल रहा है। भवन इतना जर्जर हो चुका कि पीडब्ल्यूडी ने इसे असुरक्षित घोषित कर दिया। यहां कभी बड़ा हादसा हो सकता है। स्कूल में 130 बच्चे व स्टाफ की जान हमेशा खतरे में रहती है। स्कूल सन् 1935 से दो मंजिला रियासतकालीन भवन संचालित हो रहा है। बरसों से मरम्मत नहीं होने से भवन जर्जर होकर खंडर में तब्दील होता जा रहा है। भवन की टूटती छतों की पट्टियां, जगह- जगह से गिरता प्लाटर, तिबारियों में सीलन की दुर्गंध, दीवारों में गहरे गडढेÞ़, जंग लगे लोहे के पिल्लर पर टिकी छत कभी भी टूट सकती है। बारिश में बरसों पुरानी वायरिंग से हर समय करंट का खतरा रहता है। करीब दो शताब्दी पुराने इस भवन में  बरसों से सीनियर सैकंडरी स्कूल संचालित हो रहा यहां 130 बच्चों का नामांकन और कक्षा-कक्ष के नाम पर छोटी-छोटी 7 तिबारियां है, जिनमें बैठने की जगह तक नहीं है। पीडब्ल्यूडी ने हाल ही में सर्वे कर इस भवन को असुरक्षित घोषित कर दिया। साथ ही स्कूल के प्रधानाचार्य को जर्जर भवन की मरम्मत करवाने या स्कूल को अन्य भवन में शिफ्ट करने की सख्त हिदायत दी है। उधर सरकार ने  26 जुलाई को स्कूल को हिंदी मीडियम से इंग्लिश मीडियम में बदल दिया। ऐसे असुरक्षित भवन में क्वालिटी एजुकेशन मिलना तो दूर बच्चों की जान संकट में आ गई। <br /><br /><strong>तिबारियों में एग्जास नहीं, सीलन की बदबू से परेशान</strong><br />यहां 10 फीट लंबी और 8 फीट चौड़ी तिबारी में एक साथ 10वीं-11वीं की कक्षाएं चलती है। दोनों कक्षाओं को मिलाकर करीब 20 स्टूडेंट्स हैं। एक बैंच पर तीन बच्चों को बिठाया जाता है। स्कूल तो इंग्लिश मीडियम है लेकिन पढ़ाई हिन्दी मीडियम में हो रही है। वहीं, खिड़कियां व रोशनदान नहीं होने से सीलनभरी दीवारों से उठती दुर्गंध से बच्चों व शिक्षकों का बुरा हाल है। <br /><br /><strong>एक साथ 5 कक्षाएं, खतरे में बच्चों की जान</strong><br />कक्षा-कक्ष नाम की कोई जगह नहीं है। यहां छोटी-छोटी तिबारियां है, जिनमें 11वीं तक की क्लासें चलती हैं। 16 फीट लंबी और 8 फीट चौड़ी तिबारी में 1 से 5वीं तक की कक्षाएं एक साथ लगती है, जबकि बच्चों की संख्या 35 है। इस जगह में एक साथ इतने बच्चों को बिठाना संभव नहीं है। वहीं, दीवारों पर बड़े-बड़े गड्ढ़े हो रहे हैं। छतों की पट्टियां बीच-बीच में से तड़क रही है। <br /><br /><strong>कभी भी हो सकता हादसा</strong><br />पिछले सप्ताह पीडब्ल्यूडी अधिकारियों ने पाटनपोल स्कूल का सर्वे किया था। बिल्डिंग के एक-एक हिस्से की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी करवाई। जिसकी तीन दिन पहले ही सर्वे रिपोर्ट यूसीईई आॅफिसर व शाला प्रधान को सौंप भवन को असुरक्षित घोषित किया। अधिकारियों ने रिपोर्ट में बताया कि यह भवन स्कूल चलाने लायक नहीं है। रियासतकालीन भवन पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। छतों की पट्टियां टूटी हुई है। दीवारों में गहरे गडढेÞ हो रहे हैं। बरसात में कभी भी हादसा हो सकता है। <br /><br /><strong>ऊपरी मंजिल पर दो आंगनबाड़ी, सांप का खतरा</strong><br />स्कूल की दूसरी मंजिल पर क्षतिग्रस्त तिबारियां हैं। जिनमें दो आंगनबाड़ी चलती है। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां है, जिसके पत्थर हिल रहे हैं। दोनों आंगनबाड़ी को मिलाकर 15 से 18 बच्चे हैं। बारिश में दीवारें ढहने का खतरा है। तिबारियों में एक फीट तक पानी भर जाता है। छतों की पट्टियां व छज्जे टूटे हैं। दीवारों में सीलन व गडढ़े हो रहे, जिन्हें पोस्टरों से ढका है। आंगनबाड़ी कार्यकताओं ने बताया कि यहां कई बार सांप आ चुके हैं। जिन्हें भगाने पर वे दीवारों में हो रहे गडढ़ों में छिप जाते हैं। यहां हर पल जान का जोखिम रहता है। <br /><br /><strong>विज्ञान-एबीएल किट व लाइब्रेरी नहीं</strong> <br />कक्षा 6 से 10वीं के छात्रों को साइंस के टॉपिक चित्रों व उपकरणों के माध्यम से पढ़ाने व समझाने के लिए विज्ञान किट अनिवार्य है। समग्र शिक्षा विभाग ने सभी स्कूलों को यह किट उपलब्ध कराने के दावे किए। लेकिन, शहर के कई स्कूलों में यह किट नहीं है। इसी तरह प्राइमरी बच्चों को बेहतर बुनियादी शिक्षा देने के लिए एबीएल किट दिया जाता है, जो इस यहां नहीं मिला। इस किट में नंबर, अक्षर व एबीसीडी के खिलौने होते हैं, जिन्हें दिखाकर बच्चों को आखर ज्ञान दिया जाता है। <br /><br /><strong>कक्षा-कक्षों में सीलन, टपकी छतें</strong><br />दादाबाड़ी स्कूल में कक्षा-कक्ष क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। बरसात में छतें टपक रही है। दीवारों में सीलन है। बच्चों को बिठाने के लिए पर्याप्त क्लासरूम नहीं है। ऐसे में पढ़ाई प्रभावित हो रही है। जगह-जगह से प्लास्टर उखड़ा पड़ा है। <br /><br /><strong>तिरपाल से ढकी लैब</strong><br />स्कूल में सीनियर सैकंडरी है। यहां 12वीं विज्ञान के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री व बायोलॉजी लैब है। फिजिक्स लैब की छतें टपक रही है। ऐसे में वहां रखे उपकरणों को तिरपाल से ढक रखा है। वहीं, परखनली, जार, स्लाइड सहित अन्य उपकरणों का उपयोग नहीं होने से धूल खा रहे हैं। <br /><br /><strong>1935 से चल रहा स्कूल</strong><br /> यह स्कूल सन 1935 से चल रहा है। जबकि, बिल्डिंग इससे भी कई वर्षों पुरानी है। हाल ही में पीडब्ल्यूडी ने जर्जर स्कूल भवन का सर्वे कर जांच रिपोर्ट में स्कूल भवन को असुरक्षित घोषित किया है। हमने यूसीईईओ, बीसीईईओ, डीईओ सहित ज्वाइंट डायरेक्टर को लिखित में सूचना देकर मार्गदर्शन मांगा है। वहां से मिले निदेर्शों के अनुसार काम करेंगे। <br /><strong>-मंदाकिनी शर्मा, प्रिंसिपल पाटनपोल उ. मा.विद्यालय</strong><br /><br />बारिश के मौसम में हादसे की आंशका<br /> पाटनपोल स्कूल का भवन जर्जर अवस्था में है, बारिश के दिनों में हादसे की आशंका रहती है। इसकी सूचना मिली है, जल्द ही इस संबंध में निर्णय लेकर स्कूल को अन्य भवन में शिफ्ट करने की वैकल्पिक व्यवस्था करेंगे, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। साथ ही इंग्लिश मीडियम की सुविधाएं विकसित की जाएगी ताकि सरकार का उद्देश्य सफल हो सके। <br /><strong>-प्रदीप चौधरी, जिला शिक्षाधिकारी माध्यमिक</strong><br /><br /><strong>जमीन के लिए नहीं करते कोशिश</strong><br /> रमसा द्वारा शहर में कई जगह नए विद्यालय भवन बनाए जा रहे हैं। सरकार स्कूलों में बेहतर सुविधाएं दे रही है। असल में समस्या, शाला प्रधानों में दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव है। जिनके पास खुद का भवन नहीं है, वहां के प्रिसिंपल जमीन अलॉटमेंट के लिए प्रयास ही नहीं करते। वे यूआईटी, नगर निगम, शिक्षा विभाग व जिला कलक्टर के पास तक नहीं जाते। केवल, उच्चाधिकारियों के नाम पत्र लिखते हैं। सरकारी काम व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत होते हैं। स्कूल की जमीन प्रिंसिपल के नाम ही अलॉट होती है, उन्हें बच्चों के भविष्य के लिए थोड़ी तो मेहनत करनी ही चाहिए। जमीन अलॉटमेंट पत्र मिलते ही हम बजट व भवन निर्माण स्वीकृति के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजेंगे और स्वीकृति मिलते ही नया विद्यालय भवन बनवाने के लिए काम शुरू करवा देंगे।  <br /><strong>-शंभूदयाल गुप्ता, सहायक अभियंता रमसा कोटा</strong><br /><br /><strong>असुरक्षित है भवन</strong><br /> सप्ताहभर पहले ही पाटनपोल स्कूल का सर्वे किया था। दो मंजिला भवन का निरीक्षण कर जांच रिपोर्ट प्रधानाचार्य को सौंपी है। यह रियासतकालीन भवन पूरी तरह से जर्जर है। दीवारों में गहरे गड्ढेÞ व छतों की पट्टियां टूटी है। यह भवन स्कूल के लिए पूरी तरह से असुरक्षित है। रिपोर्ट के माध्यम से प्रधानाचार्य को चेताया कि वे या तो भवन की मरम्मत करवाएं या विद्यालय को अन्य भवन में शिफ्ट करें। बरसात में कभी भी हादसा हो सकता है। <br /><strong>-सीपी अग्रवाल, एईएन पीडब्ल्यूडी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Aug 2022 17:24:33 +0530</pubDate>
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