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                <title>Ganeshotsav - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Ganeshotsav RSS Feed</description>
                
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                <title>गणेशोत्सव राष्ट्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय संस्कृति की आत्मा उसके पर्व और उत्सवों में समाई हुई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/ganeshotsav-also-important-from-national-point-of-view/article-126037"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_400-px)4.png" alt=""></a><br /><p>भारतीय संस्कृति की आत्मा उसके पर्व और उत्सवों में समाई हुई है। यहां प्रत्येक त्योहार केवल आस्था का अंग नहीं होता बल्कि जीवन, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य बिठाने का माध्यम बनता है। इन्हीं में से एक है गणेश उत्सव। जिसे भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में बसे भारतीय बड़े उत्साह से मनाते हैं। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तक चलने वाला यह पर्व सामान्यत: दस दिन का होता है। परंतु इस वर्ष गणेश उत्सव दस दिनों के बजाय तेरह दिनों तक चलेगा। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब परंपरा 10 दिनों की है, तब इस बार 13 दिन क्यो,इसका उत्तर हमें गणेशोत्सव की गहन परंपरा, धार्मिक ग्रंथों और पंचांग गणना में मिलता है। गणेशोत्सव दस दिनों का क्यों होता है, यह समझने के लिए हमें भारतीय ग्रंथों के गूढ़ संकेतों को जानना होगा। इस बार चतुर्थी से चतुर्दशी का अंतराल 13 दिनों का बन रहा है।</p>
<p><strong>भक्तों का उत्साह :</strong></p>
<p>यद्यपि परंपरा में दस दिन मूल मंत्र है किन्तु अनंत चतुर्दशी का पूजन ही अंतिम है, इसीलिए भक्तों का उत्साह इस बार लंबे समय तक बना रहेगा। अब प्रश्न आता है कि इस बार उत्सव 10 के बजाय 13 दिनों का क्यों है। इसका उत्तर पंचांग और चंद्रगति की गणना में मिलता है। भारतीय कैलेंडर चंद्रमास पर आधारित है। कभी-कभी तिथियों के संयोग और क्रम बदलने से पर्व की अवधि बढ़ जाती है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को थी,जबकि अनंत चतुर्दशी 8 सितंबर को आएगी। इस प्रकार चतुर्थी से चतुर्दशी तक कुल 13 दिन का अंतराल है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, यह कोई विरोधाभास नहीं है। गणेश जी की स्थापना चतुर्थी पर ही की जाती है और उनका विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर ही होता है। इस बीच कितने दिन आते हैं, यह पंचांग की स्थिति पर निर्भर करता है। कई बार 10 की बजाय 11 या 12 दिन भी हो सकते हैं। इस बार 13 दिनों की अवधि बनना भक्तों के लिए सौभाग्य का ही प्रतीक है। मानो यह विघ्नहर्ता का आशीर्वाद ही है कि उनका प्रवास इस बार और लंबा होगा। अतिरिक्त तीन दिन अनंत का आशीर्वाद हैं।</p>
<p><strong>जीवन और ब्रह्मांड :</strong></p>
<p>संख्या दस हमारे जीवन और ब्रह्मांड से गहरे रूप में जुड़ी है। हिन्दू दर्शन में दस दिशाओं का वर्णन है, दस इंद्रियां कही गई हैं और दस अवतारों की परंपरा आती है। संख्या दस का अर्थ है संपूर्णता। दस दिशाएं, दस इंद्रियां और दशावतार, ये सभी जीवन और ब्रह्मांड की पूर्णता का संकेत हैं। संख्या दस संपूर्णता और पूर्ण चक्र का प्रतीक है। गणेश चतुर्थी से प्रारंभ होकर दस दिनों तक की पूजा यही दर्शाती है कि जीवन की सभी इंद्रियों, दिशाओं और गुणों को संयमित करके अंतत: आत्मा को शुद्ध कर लिया जाए। दस दिनों में प्रत्येक दिन साधना का एक चरण है, कहीं संयम, कहीं विनम्रता, कहीं धैर्य, कहीं ज्ञान, कहीं परिवार और परंपरा का सम्मान। अनंत चतुर्दशी को विसर्जन का विधान इसीलिए रखा गया कि दस दिन की साधना पूरी होने के बाद जीवन की अस्थिरता और अनित्यता की शिक्षा भी स्मरण हो।</p>
<p><strong>महाभारत की रचना :</strong></p>
<p>व्यास ऋषि ने जब महाभारत की रचना का संकल्प लिया, तब उन्होंने गणपति से इसे लिपिबद्ध करने का निवेदन किया। गणेश ने इसे स्वीकार किया पर यह शर्त रखी कि वे बिना रुके लिखेंगे। व्यास ने यह कहा कि वे श्लोक तभी लिखेंगे, जब उन्हें उसका अर्थ समझ आए। इस प्रकार लेखन का कार्य शुरू हुआ और लगातार दस दिनों तक गणपति बिना रुके लिखते रहे। दसवें दिन यह कार्य पूर्ण हुआ और तब गणेश को जल स्रान कराया गया। यही कथानक भी दस दिनों के उत्सव का एक आधार माना जाता है। गणेश जी का स्वरूप और उसमें छिपी शिक्षाएं भी दस दिनों की साधना को गहन बनाती हैं। उनका बड़ा मस्तक हमें बुद्धि और विवेक की ओर प्रेरित करता है। छोटे नेत्र ध्यान और एकाग्रता का महत्व बताते हैं। विशाल कान धैर्य का संदेश हैं जबकि छोटा मुख संयम और अल्पभाषिता की शिक्षा देता है। हाथी का सिर शक्ति और स्थिरता का प्रतीक है तो उनका वाहन मूषक विनम्रता और लघुता में भी सामर्थ्य की व्याख्या करता है। इन प्रतीकों का चिंतन और आत्मसात दस दिनों तक किया जाता है, जिससे साधक का जीवन संतुलन और ज्ञान से भर उठ करता है।</p>
<p><strong>जनचेतना का माध्यम :</strong></p>
<p>गणेशोत्सव केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनचेतना का माध्यम बनाया। ब्रिटिश शासन में जब सामूहिक आयोजन वर्जित थे, तब तिलक ने गणेश उत्सव के सार्वजनिक आयोजन आरंभ किए, जिससे समाज में एकता, भक्ति और राष्टÑप्रेम का समन्वय हुआ। आज भी पंडालों में सामूहिक आरती, दान और सेवा गतिविधियां इसी सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाती हैं। यह पर्व लोगों को एक साथ लाता है, जाति-पाति के भेदभाव को खो देता है और एकता ही शक्ति है,का वास्तविक संदेश देता है। गणेश उत्सव इस दार्शनिक गहराई का उत्सव है। 10 दिनों का इसका महत्व सनातन है पर जब पंचांग की गति इसे 13 दिन का बना दे तो हमें इसे और अधिक आशीर्वाद के रूप में देखना चाहिए।</p>
<p><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Sep 2025 12:11:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>शहर में विसर्जन के लिए बने अलग कुंड तो स्वच्छ रहेंगे जलाशय</title>
                                    <description><![CDATA[प्रति वर्ष की भांति अनन्त चतुर्दशी, कृष्ण जन्मोत्सव, गणेशोत्सव और नवरात्रि में सार्वजनिक पांडालों में विराजित विशाल और छोटी बड़ी लाखों प्रतिमाओं को फिर से चंबल, किशोर सागर तथा छोटे बड़े जलाशयों में  विसर्जन किया जाएगा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/if-a-separate-pool-is-made-for-immersion-in-the-city--the-reservoir-will-remain-clean/article-18332"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/shahar-mei-visarjan-k-liye-bane-alag-kund..kota-news-8.8.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा स्मार्ट सिटी बनने की ओर अग्रसर है। प्रति वर्ष की भांति अनन्त चतुर्दशी, कृष्ण जन्मोत्सव, गणेशोत्सव और नवरात्रि में सार्वजनिक पांडालों में विराजित विशाल और छोटी बड़ी लाखों प्रतिमाओं को फिर से चंबल, किशोर सागर तथा छोटे बड़े जलाशयों में विसर्जन किया जाएगा। ऐसे में इन मूर्तियों से निकलने वाले रसायन और अघुलनशील प्लास्टर ऑफ पेरिस, मालाएं, कपड़ा और अन्य सामान तालाबों में समर्पित किया जाएगा। इससे फिर हमारे जलाशय प्रदूषित होंगे और जलीय जीव जंतुओं के जीवन पर संकट आएगा। ऐसे में शहर के लोगों को मिलकर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि हमारी धार्मिक भावनाएं भी बनी रहें और हमारे जलाशय स्वच्छ बने रहें। इसी मुददे को लेकर नवज्योति ने शहर के लोगों से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके अंश। उच्च न्यायालय के निर्देश अनुसार स्थानीय प्रशासन करे काम राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस संबंध में सरकार को निर्देश दे रखे हैं। करीब आठ नौ वर्ष पहले हमारी ही याचिका पर हाई कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि विसर्जन के लिए अलग से कुंड का निर्माण कराया जाए। भीलवाड़ा शहर में यह व्यवस्था कायम है। यदि अलग कुंड में विसर्जन होता है तो जलीय जीव जंतुओं को कोई नुकसान नहीं होगा और हमारी धार्मिक भावनाएं भी बनी रहेगी। कोटा में स्थानीय प्रशासन को भी इस संबंध में हाई कोर्ट के निर्देशानुसार निर्णय लेना चाहिए। -बाबू लाल जाजू, पर्यावरणविद</p>
<p>ना बिक्री पर रोक लग सकी ना क्रेज हुआ कम कोरोना काल से मजदूर और निम्न वर्ग आमदनी के संकट से परेशान है। जो लोग मूर्ति बनाकर अपने और अपने परिवारों का जीवन यापन करते हैं उन पर रोक लगाना मानवीय दृष्टि से ठीक नहीं। ऐसे में बीच का रास्ता निकालना ही अच्छा समाधान है। हर शहर में सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि नदी,तालाबों में प्रदूषण भी ना हो और धार्मिक भावनाएं बनी रहें। सात ही लोगों को रोजगार भी मिलता रहे। इसका एक मात्र समाधान विसर्जन के समय अस्थाई व्यवस्था की जाए जैसी भीतरिया कुन्ड में पिछले वर्ष की गई थी। अथवा कोई ऐसा कुन्ड बनाया जाए जहां विसर्जन हो सके और और फिर उसकी सफाई कर दी जाए। -राकेश राकू, चंबल बचाओ संघर्ष समिति</p>
<p>सरकार की ओर से प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां बनाने और बिक्री पर रोक लगा रखी है उसके बावजूद प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों का ना तो क्रेज कम हुआ ना ही मांग घटी। हर साल हम अभियान चलाकर पीओपी मूर्तियां ना बने इसके लिए पुलिस व प्रशासन की मदद से कलाकारों से मिलकर रोकने का प्रयास करते हैं। लेकिन फिर भी शहर में गणेशोत्सव से पहले बड़ी संख्या में मूर्तिया बिकने आती ही है। हालांकि अब लोगों में जागृति आने लगी है और मिट्टी प्रतिमाएं ही खरीद रहे हैं लेकिन नगर निगम व यूआईटी को चाहिए की गणेशोत्सव में मूर्तियों के विसर्जन के लिए सरकार हर शहर में एक कुंड तैयार करें । जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों का विसर्जन किया जाए। उसके बाद उस कुंड से मूर्तियों व पानी की निकासी कर कुंड को खाली कर दें तो मूर्तिकारों को रोजगार बना रहेगा। दूसरा शहर के नदी तालाब प्रदूषण होने से बच जाएंगे। शहर के भीतरियां कुंड व किशोर सागर तालाब पर ये कुंड निर्माण करें तो अन्नत चर्तुदशी पर होने वाले विसर्जन से जल भी दूषित नहीं होगा और लोगों की धार्मिक आस्था भी बनी रहेगी। इन कुंड का बाकी समय खाद बनाने में उपयोग कर निगम दोहरा लाभ उठा सकती है। -डॉ. सुधीर गुप्ता, संयोजक</p>
<p>हम लोग संस्थान स्थाई ठिकाना बने सरकार की ओर से पीओपी की मूर्तियां बनाने और बिक्री पर रोक लगा दी है। साथ ही मूर्तियों की ऊंचाई को लेकर कलाकारों को नोटिस दिए जा रहे है। ऐसे में कुंभकारों का रोजगार छीनता जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि नगर निगम की ओर से भीतरिया कुंड, किशोर सागर तालाब पर अलग से ऐसे कुंड का निर्माण किया जाना चाहिए जिससे प्रतिमाओं के विसर्जन का स्थाई ठिकाना बनाया जा सके। उसे समय समय पर साफ कर देने से जल प्रदूषण भी नहीं होगा। साथ ही मूर्तियों की मिट्टी भी पुन: बगीचों में काम आएगी। -कुंदन चीता, हाडौती पर्यावरण समिति</p>
<p>प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के विसर्जन के लिए बने स्थाई कुंड सरकार ने प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों की बिक्री पर रोक लगाने के बाद आजकल मूर्तिकार पानी में घुलने और कच्चे रंगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिससे विजर्सन के बाद मूर्ति पानी में गल जाए और उसके कलर से जलीय जीवों को नुकसान भी नहीं हो। बड़ी मूर्तियों में नारियल की जूट का प्रयोग किया जाता है जिससे मूर्तियां पानी में विसर्जन के बाद भी घुलती नहीं है। पिछले दो साल से कलाकारों ऐसी मूर्तियां बनाना बंद कर दिया है। अब पानी में घुलनशील मिट्टी की मूर्तिया तैयार कर रहे है। हालांकि प्लास्टर ऑफ पेरिस स्थानीय कलाकार ना भी बनाए तो बाहर से त्यौहारों पर ये बिकने आती ही है। सस्ती होने से लोगों में अभी इसका क्रेज कम नहीं हुआ ना ही मांग घटी है। नगर निगम की ओर गणेशोत्सव में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के लिए भीतरिया कुंड, किशोर सागर तालाब में स्थाई पक्का गणेश कुंड तैयार करें जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों का विसर्जन जा सके। मूर्तियों के गलने के बाद उस पानी को खाली कर उसकी मिट्टी उपयोग किया जा सकता है। जिससे मूर्तिकारों को रोजगार बना रहेगा। दूसरा शहर के नदी तालाब प्रदूषण होने से बच जाएंगे। - शंकर,मूर्तिकार कोटा</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Aug 2022 19:06:55 +0530</pubDate>
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                <title>पीओपी मूर्तियों पर प्रतिबंध ने छीना मूर्तिकारों का रोजगार </title>
                                    <description><![CDATA[ पीओपी की मूर्तियों पर प्रतिबंध का बड़ा नुकसान मूर्तिकारों को हो रहा है। सरकार की ओर से पीओपी की मूर्तियों की बनाने और बिक्री पर रोक लगा दी साथ ही मूर्तियों की ऊंचाई को लेकर कलाकरों को नोटिस दिए जा रहे है। ऐसे में कुंभकारों का रोजगार छीनता जा रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/ban-on-pop-idols-snatched-employment-of-sculptors/article-18325"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/pop-murtiyo-par-pratibandh-nei-chhina-murtikaro-ka-rojgar-..kota-news-8.8.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा । पिछले दो सालों से कोरोना संक्रमण ने मूर्तिकारों का व्यवसाय ठप पड़ा है। दो साल से बड़े आयोजन नहीं होने से पहले ही संकट गुजर रहे मूर्तिकारों पर नये नियमों का बोझ भारी पड़ रहा है। पीओपी की मूर्तियों पर प्रतिबंध का बड़ा नुकसान मूर्तिकारों को हो रहा है। सरकार की ओर से पीओपी की मूर्तियों की बनाने और बिक्री पर रोक लगा दी साथ ही मूर्तियों की ऊंचाई को लेकर कलाकरों को नोटिस दिए जा रहे है। ऐसे में कुंभकारों का रोजगार छीनता जा रहा है। मूर्तिकारों कहना कि कोरोना संक्रमण काल में पिछले दो साल से सारे धार्मिक समारोह पर पाबंदी के चलते मूर्तिकार बेरोजगार हो गए है। जन्माष्टमी, गणेश उत्सव, नवरात्रि, दीपावली होने वाले सार्वजनिक कार्यक्रमों पर कोरोना के चलते प्रतिबंध सीधा असर मूर्तियां बनाने वाले कलाकारों पर पड़ा है। कृष्ण जन्मोत्सव व गणेशोत्सव में सजने वाले सावर्जनिक पांडाल पिछले दो साल से बंद होने से इन कलाकारों की कमर ही टूट चुकी है। अब सब ठीक होने लगा तो मूर्तियों की ऊंचाई तो कभी पीओपी की मूर्तियों के प्रतिबंध के नाम पर मूर्तिकारों को नोटिस दिए जा रहे है।</p>
<p>कोरोना पहले ही कई लोगों नेअपना धंधा बदल लिया है कुछ अपनी पुस्तैनी विरासत को बचाने में लगे हुए है। 25 साल पहले 50 से अधिक मूर्तिकार जोधपुर से कोटा आकर बसे तब से बना रहे मूर्तियां प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तियों पर बेन लगने के बाद कोटा के मूर्तिकारों ने पानी में घुलनशील वाली मिट्टी से मूर्तियां बनाना शुरू कर दिया। पिछले दो साल से कोरोना के चलते पहले ही मूर्तिकार आर्थिक तंगी से गुजर रहे है। उस पर अब मूर्तियों की ऊंचाई को लेकर नोटिस दिए जा रहे है। हालांकि प्रशासन ने अब 12 फीट की प्रतिमाओं छूट देकर राहत दी है। पिछले दो साल साल दशहरा मेला नहीं लगा, जिससे 50 से अधिक परिवारों का रोजगार छीन गया। दशहरा मेले में प्लास्टर आॅफ पेरिस की विभिन्न सजावटी मूर्तियां, गमले, सजावटी वॉल पेटिंग बिक जाती थी, लेकिन कोरोना से शहर के विभिन्न धार्मिक उत्सवों पर भरने वाले मेलों पर प्रतिबंध लगा दिया। जिससे इन कलाकारों को गली मोहल्लों में मूर्तिया बेचना पड़ रहा है। 25 साल पहले जोधपुर से 50 से अधिक परिवार यहां आकर बस गए पहले पत्थर की मूर्तियां बनाया करते थे। लेकिन उनकी मांग कम हुई तो अपने हुनर को जिंदा रखने के लिए मिट्टी व प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तिया बनाना शुरू किया।</p>
<p>अब प्लास्टर ऑफ पेरिस के साथ पानी में घुलनशील मिट्टी मिलाकर जोधपुर की बारीक कलाकारी को मिट्टी की मूर्तियों में उकेर रहे है। - सूरजमल, मूर्तिकार सरकार आर्थिक पैकेज दे तो बच सकेगा हुनर मूर्तिकार कालूमल ने बताया कि कोरोना संक्रमण से शहर में मूर्तिकार बेरोजगार हो गए है। सरकार नियमों से प्लास्टर ऑफ पेरिस का माल जब्त होने का खतरा बना रहता है। मिट्टी मूर्तियों बनाने में लागत ज्यादा आती है ऐसे में लोग महंगी मूर्तियों खरीदते नहीं है। जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां 51 रुपए से 250 रुपए में बिकती है। वही मिट्Þटी की छोटी प्रतिमाए भी 125 रुपए से शुरू होती है। एक व दो फीट की मूर्ति 300 से 1000 रुपए बिकती है। सरकार हम कलाकारों को आर्थिक पैकेज दे और हमारे माल को बेचने के लिए एक प्लेटफार्म तैयार करें तभी मूर्तिकारों का हुनर बच पाएगा। कोरोना काल में कई परिवारों ने अपना धंधा बदल लिया है। पहले शहर में तीज त्यौहारों पर आयोजित मेलों और सार्वजनिक उत्सवों में कलाकारों की कलाकृतियां बिक जाती जिससे घर चल जाता था। नये नये नियमों से मूर्तिकारों धंधा छीनता जा रहा है। मूर्तियों की बिक्री के लिए तैयार हो हाट बाजार शहर में मूर्तिकारों के माल बेचने के लिए एक हाट बाजार तैयार हो जाए तो सभी कलाकारों का माल एक जगह बिकेगा । दूसरी ओर बाहर से आने वाली पीयूपी की मूर्तियों की बिक्री पर रोक लग सकेंगी। सड़को पर बिकने पीयूपी मूर्तियों की बिक्री पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही स्थाई मूर्तिकारों को पूरे साल रोजगार मिलेगा। जिससे ग्राहकों को इधर उधर नहीं भटकना पड़ेगा। साथ रोड किनारे माल बेचने की समस्या से निजात मिल जाएंगी। अभी मूर्तियों के लिए सीएडी चौराहा, दशहरा मैदान रोड, घोडेवाले बाबा चौक, कुन्हाड़ी, तालाब रोड पर कलाकारों को फूटपाथ पर दुकाने लगानी पड़ती है। हाट बाजार तैयार हो जाए तो माल बेचने में आसानी होगी। साथ ही प्लाटर ऑफ पेरिस की बाहर से आकर बिकने वाली मूर्तियों धर पकड़ में भी निगम को आसानी हो जाएगी। -महेंद्र लुहार, मूर्तिकार प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों केविसर्जन के लिए बने स्थाई कुंड सरकार ने प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तियों की बिक्री पर रोक लगाने के बाद आजकल मूर्तिकार पानी में घुलने और कच्चे रंगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिससे विजर्सन के बाद मूर्ति पानी में गल जाए और उसके कलर से जलीय जीवों को नुकसान भी नहीं हो। बड़ी मूर्तियों में नारियल की जूट का प्रयोग किया जाता है जिससे मूर्तियां पानी में विसर्जन के बाद भी घुलती नहीं है। पिछले दो साल से कलाकारों ऐसी मूर्तियां बनाना बंद कर दिया है। अब पानी में घुलनशील मिट्टी की मूर्तिया तैयार कर रहे है। हालांकि प्लास्टर आॅफ पेरिस स्थानीय कलाकार ना भी बनाए तो बाहर से त्यौहारों पर ये बिकने आती ही है। सस्ती होने से लोगों में अभी इसका क्रेज कम नहीं हुआ ना ही मांग घटी है। नगर निगम की ओर गणेशोत्सव में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के लिए भीतरिया कुंड, किशोर सागर तालाब में स्थाई पक्का गणेश कुंड तैयार करें जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों का विसर्जन जा सके। जिससे मूर्तिकारों को रोजगार बना रहेगा। दूसरा शहर के नदी तालाब प्रदूषण होने से बच जाएंगे। </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 08 Aug 2022 17:54:08 +0530</pubDate>
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