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                <title>lord krishna - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>lord krishna RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सर्दी से बचाव : गोविन्द देव जी ने ओढ़ी रजाई, गुनगुने जल से किया स्नान, ठाकुरजी के समक्ष अंगीठी भी रखी गई</title>
                                    <description><![CDATA[गोविन्द देवजी मंदिर में सर्दी की शुरुआत के साथ ठाकुरजी को शुक्रवार रात से रूई की रजाई ओढ़ाई गई। सुबह मंगला झांकी के बाद भगवान को गुनगुने जल से स्नान, जामा पोशाक, शाल और साफा धारण कराया गया। सर्दी से बचाव हेतु अंगीठी सेवा शुरू की गई। ठाकुरजी चांदी की गुमटी के बड़े सिंहासन पर विराजमान हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/to-protect-himself-from-cold-govind-dev-ji-covered-himself/article-131762"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/ews-(3)10.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। शहर के आराध्य गोविन्द देवजी मंदिर में ठाकुरजी को शुक्रवार रात से हल्की रूई की रजाई ओढ़ाई गई और सुबह मंगला झांकी के बाद भगवान को गुनगुने जल से स्नान कराया गया।</p>
<p>भगवान को सुबह से ही जामा पोशाक, शाल और साफा धारण कराया गया। सर्दी से बचाव के लिए ठाकुरजी के समक्ष अंगीठी की सेवा शुरू की गई। मंदिर के सेवाधिकारी मानस गोस्वामी ने बताया कि ठाकुरजी को पारंपरिक चांदी की गुमटी के बड़े सिंहासन पर विराजमान किया गया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Nov 2025 11:40:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी गोकुल</title>
                                    <description><![CDATA[गोकुल उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित एक पवित्र ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/sakshi-gokul-of-shri-krishnas-bal-leelas/article-110960"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/257rtrer-(2)44.png" alt=""></a><br /><p>गोकुल यानी जगतजननी गौ माता के कुटुंब का निवास। यमुना नदी के किनारे बसे गोकुल गांव में घुसते ही ऐसा लगा जैसे द्वापर युग पुन लौटकर आ गया हो। गोकुल उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित एक पवित्र ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल है। यह आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक समृद्धि का एक मनोरम मिश्रण है। गोकुल भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की लीलाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां आज भी भगवान कृष्ण का बचपन का घर, संकरी गलियां, यमुना नदी और असंख्य मंदिर कृष्ण की चंचल युवावस्था की कहानियों से गूंजते हैं। </p>
<p>गोकुल में भगवान कृष्ण ने पूतना वध, शकटासुर वध, और माखन चोर की लीलाओं सहित कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, जिसका जिक्र आज भी किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि गोकुल के गांवों को एक भूलभुलैया की तरह डिजाइन किया गया है, जिससे कृष्ण की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। जब मथुरा के राजा कंस ने अपनी ही बहन देवकी के बेटे श्रीकृष्ण को मारने का आदेश दिया, तब वसुदेव ने जन्म के तुरंत बाद श्रीकृष्ण को मथुरा से गोकुल लाकर नंद बाबा और यशोदा के पास रखा। गोकुल में ही नंद और यशोदा के वहां भगवान श्रीकृष्ण का बचपन बीता। कृष्ण भक्ति के पुष्टिमार्ग के संस्थापक संत महाप्रभु वल्लभाचार्यजी ने गोकुल में कई साल बिताए थे, जिससे उनकी आध्यात्मिक यात्रा में बढ़ोतरी मिली थी। </p>
<p>वल्लभाचार्य और उनके पुत्र गोसाईं विठ्ठलनाथ ने गोकुल में भव्य वल्लभ हवेली का निर्माण करवा कर ठाकुरजी श्रीनवनीतप्रिया को स्थापित किया। प्रसिद्ध चौरासी खंभा मंदिर गोकुल में नंदा टीला के नाम से जानी जाने वाली एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर को नंद भवन, नंद महल और चौरासी खंबा मंदिर जैसे कई नामों से जाना जाता है। इस मंदिर का यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि ये 84 खंबों पर टिका हुआ है। मंदिर की दीवारें कृष्ण की तस्वीरों और पेंटिंग से भरी पड़ी हैं और कृष्ण के बचपन से जुड़े कई दृश्य इन दीवारों पर आप देख सकते हैं। इसे एक दरबार के रूप में उपयोग किया जाता था, जहां राजा अपने मंत्रियों और जनता से मिलते थे। </p>
<p>यह गोकुल में कृष्ण के बचपन के अतीत के सबसे महत्वपूर्ण पुरातत्व अवशेष हैं। एक मान्यता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण अपने माता-पिता को चार धाम की यात्रा का सुख गोकुल में ही देना चाहते थे, जिस के चलते उन्होंने भगवान विश्वकर्मा से उनके घर में 84 खंबे लगाने को कहा। विश्वकर्मा जी ने कहा, कि इन खंबों को कलियुग में कोई गिन नही पाएगा। जो कोई कोशिश करेगा, उसकी गिनती में या तो एक खंबा कम आएगा या ज्यादा। तब से ये मान्यता चली आ रही है, कि जो जातक इस मंदिर के दर्शन करेगा, उसे चार धाम की यात्रा का फल मिलेगा। मंदिर के 84 खंबे 84 लाख योनियों का भी प्रतीक माने जाते हैं, जिनसे गुजरने के बाद इंसान को मनुष्य रूप मिलता है।1018 ई. में महमूद गजनवी ने महावन पर आक्रमण कर चौरासी खंभा यानी नंद भवन को नष्ट-भ्रष्ट  कर दिया था। इसके बाद से यह अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सका।</p>
<p>चौरासी खंभा मंदिर से पूर्व दिशा में कुछ ही दूर यमुना जी के तट पर ब्रह्मांड घाट नाम का रमणीक स्थल है। मान्यता के अनुसार यहां श्री कृष्ण ने मिट्टी खाने के बहाने यशोदा को अपने मुख से समग्र ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे। यहीं से कुछ दूर लता वल्लरियों के बीच मनोहारी चिंताहरण शिव के दर्शन हैं। यहीं पूतना, तृणावर्त, शकटासुर नामक असुरों का वध कर श्री कृष्ण ने उनका उद्धार किया। पास ही नंद की गोशाला में कृष्ण और बलदेव का नामकरण हुआ। यहीं पास में ही घुटनों पर बलराम, कृष्ण चले, यहीं पर मैया यशोदा ने चंचल बाल कृष्ण को ऊखल से बांधा, कृष्ण ने यमलार्जुन का उद्धार किया। यहीं अढ़ाई-तीन वर्ष की अवस्था तक श्री कृष्ण और बलराम की बालक्रीड़ाएं हुईं। </p>
<p>बृहदवन या महावन गोकुल की लीलास्थलियों का ब्रह्मांड पुराण में भी वर्णन किया गया है। रमण रेती गोकुल के निकट एक अन्य प्राचीन पवित्र स्थान है, जहां पर भगवान कृष्ण और उनके भाई बलराम अपने बचपन के दौरान खेला करते थे। रमण रेती की पवित्र रेत में खेलने या बैठने से मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण ने यशोदा को अपने मुंह में ब्रह्मांड दिखाया था। ब्रह्मांड घाट एक शांत और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान है। ब्रह्माण्ड कुंड का डिजाइन पारंपरिक है, जिसमें पानी तक नीचे जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियां हैं, जो प्राचीन भारतीय वास्तुकला की याद दिलाती हैं। आप यहां पर शांति के साथ घूम सकते हैं और ध्यान कर सकते हैं। यहां पर एक प्राचीन मंदिर भी है जिसका नाम है ब्रह्माण्ड विहारी मंदिर। यमुना नदी पर सूर्यास्त का मनमोहक व्यू आपका दिल जीत लेगा। यहां पर घूमने का सबसे अच्छा समय सुबह जल्दी या देर शाम हैं। ब्रह्मांड कुंड कृष्ण भक्तों के लिए एक अनमोल स्थान है, जहां कोई भी कृष्ण के बचपन के गहन क्षणों को याद कर सकता है। एक अन्य ऐतिहासिक स्थल ठकुरानी घाट यमुना नदी के किनारे स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान कृष्ण और उनकी लीलाओं से जुड़े कई पवित्र प्रसंग घटित हुए थे।  </p>
<p><strong>-डॉ गोरधन लाल शर्मा</strong><br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Apr 2025 12:50:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कल्कि 2898 एडी का थीम गीत, भगवान कृष्ण की स्तुति का मथुरा में हुआ विमोचन</title>
                                    <description><![CDATA[नाग अश्विन द्वारा निर्देशित, कल्कि 2898 एडी में अमिताभ बच्चन, कमल हसन, प्रभास, दीपिका पादुकोण और दिशा पाटनी सहित कई शानदार कलाकार हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/kalki-2898-ads-theme-song-praising-lord-krishna-released-in/article-82819"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/u1rer-(5)2.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरस्टार प्रभास की आने वाली फिल्म कल्कि 2898 एडी का थीम गीत, भगवान कृष्ण की स्तुति का मथुरा में विमोचन किया गया।</p>
<p>कल्कि 2898 एडी रिलीज से पहले ही खूब चर्चा बटोर रही है। इसकी रिलीज से सिर्फ दो दिन पहले, दर्शकों और सिनेप्रेमियों के बीच फिल्म देखने की ललक अपने चरम पर पहुंच गया है। दर्शकों के उत्साह को बढ़ाते हुए, निर्माताओं ने अब इस फिल्म का एक नया गाना थीम ऑफ कल्कि पेश किया है, जो भगवान कृष्ण की स्तुति है। भावपूर्ण और दिव्य गीत गौतम भारद्वाज द्वारा गाया गया है, संगीत संतोष नारायण का है और गीत कुमार के हैं। यह गाना मथुरा की पवित्र भूमि पर लॉन्च किया गया था, जो भगवान कृष्ण की जन्मस्थली के रूप में बहुत महत्व रखती है।</p>
<p>नाग अश्विन द्वारा निर्देशित, कल्कि 2898 एडी में अमिताभ बच्चन, कमल हसन, प्रभास, दीपिका पादुकोण और दिशा पाटनी सहित कई शानदार कलाकार हैं। वैजयंती मूवीज द्वारा निर्मित यह फिल्म 27 जून, 2024 को दुनिया भर के सिनेमाघरों में रिलीज होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Jun 2024 16:03:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मार्गशीर्ष माह शुरू, महीने भर होगी भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना</title>
                                    <description><![CDATA[इस माह में श्री कृष्ण का ध्यान और उपासना सच्चे मन से करने पर मिलती है सभी पापों से मुक्ति ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/margashirsha-month-will-start-and-worship-of-lord-krishna-will/article-63041"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/shree-krisna.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सनातन धर्म में मार्गशीर्ष माह का विशेष धार्मिक महत्व है। लोकभाषा में इस माह को अगहन भी कहा जाता हैं। ये माह भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय है। इस माह में श्री कृष्ण का ध्यान और उपासना सच्चे मन से करने पर सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही अमोघ फल की प्राप्ति होती है। ज्योतिषाचार्य डॉ. महेंद्र मिश्रा ने बताया कि स्कंद पुराण के अनुसार भगवान की कृपा प्राप्त करने की कामना रखने वाले श्रद्धालुओं को अगहन मास में कुछ धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए। इस माह में किए गए व्रत-उपवास से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। पुराणों के अनुसार इस महीने कम से कम तीन दिन तक ब्रह्म मुहूर्त में किसी पवित्र नदी में स्नान करने से प्राणी की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। स्त्रियों के लिए यह स्नान पति की लंबी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य देने वाला माना गया है।</p>
<p><strong>शंख पूजन का मिलेगा विशेष लाभ</strong> <br />इस महीने में शंख पूजन का विशेष महत्व है। साधारण शंख को श्रीकृष्ण को पांचजन्य शंख के समान समझकर उसकी पूजा करने से सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है। शंख में गंगाजल भरकर भगवान की आरती के बाद इस जल को पूरे घर में छिड़क दें। ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होगी, जिससे घर में सुख-समृद्धि आएगी।</p>
<p><strong>मंत्र साधना से मिलेगी सफलता</strong> <br />अगहन मास में जप, तप, ध्यान एवं दान करना शीघ्र फलदाई माना गया है। भगवान श्री कृष्ण की भक्ति और उनके मंत्रों का जाप करना इस माह में बहुत पुण्यदायी है। नमो भगवते वासुदेवाय: एक चमत्कारी मंत्र है। इस मंत्र का मार्गशीर्ष माह में जरूर जाप करें। संतान से जुड़ी हर परेशानी को दूर करने के लिए मार्गशीर्ष माह में कृष्णाय नम: मंत्र का दिन में 108 बार जप करना लाभकारी रहेगा।</p>
<p><strong>तुलसी पूजा-गीता पाठ भी करें</strong> <br />कार्तिक की तरह इस माह में भी नित्य प्रति सुबह तुलसी को जल देने एवं शाम के समय घी का दीपक जलाने से श्रीकृष्ण की कृपा आप पर बनी रहती है। शास्त्रों के अनुसार विशेष रूप से इस मास में गीता का पाठ करने से श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Nov 2023 10:13:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जन्माष्टमी आज :  कोटा के असली राजा माने जाते हैं भगवान श्रीकृष्ण</title>
                                    <description><![CDATA[रियासतकाल से ही कोटा कृष्ण भक्ति का प्रधान  केन्द्र रहा है। महाराव भीमसिंह प्रथम कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उन्होंने कोटा का नाम नंदग्राम कर दिया था। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/janmashtami-today--lord-krishna-is-considered-the-real-king-of-kota/article-19603"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/kota-ke-asli-raja-bhagwan-krishna..kota-news-19.8.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। जन्माष्टमी का पावन त्यौहार आज शहर में अत्यंत उत्साह और जोश के साथ मनाया जा रहा है। भगवान कृष्ण के जन्म जन्माष्टमी पर पुराने कोटा का नंदग्राम इलाके का कोना-कोना कृष्णमय हो उठता है। कोटा में  जन्माष्टमी  परंपरा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। रात 12 बजे जैसे ही कान्हा का जन्म होता है नंदग्राम श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठता है। कान्हा के प्रेम में रंगे भक्त भी अपने घर में श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों की झांकियां सजाकर घर को मंदिर बना देते हैं। भगवान श्री कृष्ण को माखन-मिश्री, पंजिरी, सूखे मेवों आदि के भोग लगाए जा रहे हैं। कोटा सिर्फ शिक्षा नगरी ही नहीं है बल्कि श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था का भी केन्द्र है। रियासतकाल से ही कोटा कृष्ण भक्ति का प्रधान  केन्द्र रहा है। महाराव भीमसिंह प्रथम कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उन्होंने कोटा का नाम नंदग्राम कर दिया था। शहर के परकोटे के भीतर पाटनपोल में श्री प्रथम बल्लमपीठ श्री मथुराधीश जी का मंदिर स्थित है। इसी क्षेत्र में रियासतकालीन श्री बृजनाथ जी भगवान का मंदिर, श्री फूल बिहारी जी का मंदिर, श्री महाप्रभु जी का बड़ा मंदिर, भगवान लक्ष्मीनारायण मंदिर चारभुजा जी का मंदिर सहित कई प्राचीन मंदिर है। जिनके  प्रति आस्था लोगों में आज भी है। वल्लभ संप्रदाय की प्रमुख पीठ श्री मथुराधीश जी होने से यहां  जन्माष्टमी पर अवकाश नहीं होता बल्कि अगले दिन नंद उत्सव पर कोटा मेंअवकाश रहता है। किशोरपुरा दरवाजे से लेकर बड़े मथुराधीश जी मंदिर तक का क्षेत्र नंदग्राम कहलाता है। नंदग्राम में करीब 150 छोटे-बडेÞ कृष्ण मंदिर है। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर शहर के प्राचीन कृष्ण मंदिरों के प्रति लोगों की क्यों है आस्था इस बारे में  जानते हैं।</p>
<p><strong>भगवान श्री बृजनाथ जी  : महाराव भीमसिंह थे कृष्ण के अनन्य भक्त</strong><br />जब महाराव भीमसिंह प्रथम ने वल्लभ कुल की दीक्षा ली थी तब ही उन्होंने इस मंदिर की स्थापना की और बृजनाथ जी को यहां विराजमान किया। उन्होंने अपने शासनकाल में 17वीं शताब्दी में ही मंदिर का निर्माण किया। उसके बाद महाराव दुर्जनशाल सिंह मथुराधीश जी को लेकर आए। मथुराधीश जी की स्थापना से भी पहले की स्थापना बृजनाथ जी की है। ये वह प्रतिमा है जिसे महाराव भीमसिंह प्रथम हमेशा अपने साथ रखते थे। जहां भी वह युद्ध में जाते थे अपने साथ हाथी के ओहदे पर भगवान श्री बृजनाथ जी की प्रतिमा को साथ में रखते थे। यहां से ही कोटा कृष्ण भक्ति का केन्द्र बनना शुरू हुआ। उसके बाद उन्होंने कोटा का नाम बदल कर नंदग्राम कर दिया। वह कृष्ण के इतने परम भक्त थे की शेरगढ़ (बारां) को राधा जी का स्थान बरसाना बना दिया और उन्होंने उसे बरसाना नाम दे दिया। यहां से ही कोटा में वल्लभ कुल की परंपरा की शुरूआत हुई। उसके बाद फिर दुर्जनसाल सिंह के समय मथुराधीश जी कोटा पधारे और प्रथम पीठ की स्थापना हुई उसके बाद से कोटा वल्लभ कुल के प्रमुख स्थलों में से एक माना जाने लगा। क्योंकि वल्लभ कुल की प्रथम पीठ कोटा में मथुराधीश जी के रूप में विराजमान है। इस तरह कोटा कृष्ण भक्ति का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया।  महाराव भीमसिंह के समय से ही कोटा राजपरिवार में परंपरा रही जब भी राज दरबार लगता था तो सिंहासन  भगवान कृष्ण  के लिए ही लगता था। महाराव भीमसिंह प्रथम के समय से कोटा में प्रचलन प्रारंभ हुआ कि जो असली राजा है या असली मालिक है कोटा के वह भगवान कृष्ण  है। कोटा में आज भी मथुराधीश जी वाला क्षेत्र नंदग्राम कहलाता है इसी वजह से कोटा में जन्माष्टमी का अवकाश दूसरे दिन नंद महोत्सव पर होता है। <br /><strong>-पं. आशुतोष दाधीच , क्यूरेटर, राव माधोसिंह म्यूजियम गढ़ पैलेस</strong></p>
<p><strong>भगवान मथुराधीश जी : पाटन पोल द्वार के पास रुक गया था प्रभु का रथ </strong><br />वल्लभ संप्रदाय में भगवान श्री कृष्ण के सप्त स्वरूपों की सेवा की जाती है। पाटनपोल स्थित श्री मथुराधीश मंदिर वल्लभ संप्रदाय की प्रथम पीठ और तीर्थ है। जिसके अनुयायी देश विदेश में मौजूद हैं। संवत 1795 में कोटा के महाराज दुर्जनशाल ने प्रभु को कोटा पधराया था। कोटा नगर में पाटनपोल द्वार के पास प्रभु का रथ रुक गया तो तत्कालीन आचार्य गोस्वामी गोपीनाथ महाराज ने आज्ञा दी कि प्रभु की यहीं विराजने की इच्छा है। तब कोटा राज्य के दीवान द्वारकादास राय ने अपनी हवेली को गोस्वामी जी के सुपुर्द कर दिया था। गोस्वामी जी ने उसी हवेली में कुछ फेरबदल कराकर प्रभु को विराजमान किया। तब से अभी तक प्रभु इसी हवेली में विराजमान हैं। यहाँ वल्लभ कुल सम्प्रदाय की रीत के अनुसार सेवा होती है । इससे पहले ठाकुर जी की प्रतिमा को महाराव दुर्जनसाल बूंदी से लेकर आए थे। मंदिर में प्रतिदिन मंगला आरती, ग्वाल, राजभोग, आरती, उत्थापन, शयन के दर्शन होते हैं। हालांकि शयन के दर्शन रामनवमी से बंद रहते है तथा कार्तिक सुदी अष्टमी में खुलने लग जाते है । मंदिर पर सामान्य दिनों में 2 हजार, अवकाश वाले दिनों में 3 से 4 हजार, पर्वों पर 10 से 12 हजार एवं सम्पूर्ण वर्ष में लगभग 12 से 15 लाख भक्त दर्शन करते हैं।  <br /><strong>- गोस्वामी मिलन कुमार बावा, श्री मथुराधीश मंदिर प्रथम पीठ</strong></p>
<p><strong>लक्ष्मीनारायण मंदिर : एक साथ विराजे हैं भगवान नारायण-मां लक्ष्मी</strong><br />कोटा गढ़ के समीप स्थित भगवान लक्ष्मीनारायण मंदिर 600 साल प्राचीन है। इस मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही विराजमान है। यहां लक्ष्मीनाथ जी (युगल जोड़ी) की छवि है। भगवान नारायण अ ौर मां लक्ष्मी एक साथ विराजमान है। जन्माष्टमी पर यहां बहुत बढ़िया उत्सव होता है। तीनों मंदिरों की श्रृंखला यहां एक साथ है। लक्ष्मीनारायण जी, चारभुजा जी और श्रीनाथ जी तीनों ही क्रमबद्ध है और यहां से ही नंदग्राम की शुरूआत होती है। जो मुख्य मथुराधीश जी मंदिर तक नंदग्राम में करीब 150 छोटे-बडे कृष्ण मंदिर है। <br /><strong>- पं. विमल शर्मा, पुजारी, लक्ष्मीनारायण मंदिर</strong></p>
<p><strong>300 वर्ष प्राचीन श्री फूल बिहारी जी का मंदिर </strong><br />पाटनपोल स्थित श्री फूल बिहारी जी का मंदिर 300 वर्ष प्राचीन है। इस मंदिर की स्थापना तत्कालीन कोटा नरेश रामसिंह ने की थी। उनकी महारानी फूल कंवर बाई की इच्छानुसार संवत् 1918 तदानुसार शाके 1784 बैसाख का महीना यानि शुक्ल पक्ष की छठे दिन सोमवार को इस मंदिर की स्थापना की गई। फूल कंवर रानी के कृष्ण इष्टदेव थे। रानी की इच्छा थी की कृष्ण का मंदिर बनवाऊं। वह मीरा बाई की तरह ही कृष्ण की भक्त थी। अष्टधातु की बांसुरी बजाते हुए छोटी मूर्ति कृष्ण की खड़े स्वरूप में है।  ये पुष्टि मार्गी मंदिर है। वल्लभ संप्रदाय के प्रथम पीठ के अनुसार ही सेवा की जाती है। <br /><strong>- अश्विनी कुमार,मुखिया,श्री फूल बिहारी जी मंदिर</strong></p>
<p><strong>चरण चौकी : चार महीने बिराजे थे श्रीनाथ जी </strong><br />श्रीनाथ जी की चरण चौकी कोटा से 18 किमी दूर डाढ़ देवी मार्ग पर मोतीपुरा गांव में स्थापित है। यहां श्री नाथ जी के चरण पूजे जाते है। यहां श्रीनाथ जी चार महीने बिराजे इसलिए इस स्थान की बहुत आस्था लोगों में है।श्रीनाथ जी ठाकुर जी का मंदिर बना हुआ है प्राचीन स्थान है। श्रीनाथजी के  चरण की आज भी पूजा होती है। संवत 1726 में जब मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा मंदिरों को तोड़ने का अभियान शुरू किया गया था तब बृज भूमि से सभी विग्रह हिन्दूृ राजाओं के रियासत में लाए गए थे। औरंगजेब ने जब मथुरा पर चढ़ाई की तब मथुरा परिक्रमा परिसर में जतीपुरा में श्रीनाथजी का मंदिर था। वहां से मूर्ति आगरा ,मुरैना गई। मुरैना के बाद तीसरा स्थान कोटा चरण चौकी है जहां चार महीना श्रीनाथजी बिराजे थे। यहां के बाद मूर्ति किशनगढ़, वहां से जोधपुर चौपासनी गई। श्रीनाथजी की मूर्ति सीहाड़ लेकर गए जहां पर उनका भव्य मंदिर बनवाया गया जो आज श्री नाथद्वारा कहलाता है । <br /><strong>- जयनारायण गुर्जर, सदस्य मोतीपुरा चरण चौकी मंदिर ट्रस्ट</strong></p>
<p><strong>चारभुजा जी का मंदिर : पूरी होती है मनोकामना</strong><br />गढ़ के पास स्थित चारभुजा जी का मंदिर करीब 250 साल पुराना है। काफी वर्षों पूर्व यह मंदिर हमारे परिवार को राजपूत समाज के किसी व्यक्ति ने दान में दिया और कहा कि इसकी सेवा आप करें। तब से ही इस मंदिर की सेवा कर रहे हैं। वर्तमान में हमारी चौथी पीढ़ी यहां सेवा कर रही है। इस मंदिर में विराजमान चारभुजा जी बाल स्वरूप में है। लोगों की आस्था इस मंदिर के प्रति है कि मन में जो भी मांगते हैं वह कामना पूरी हो जाती है। जन्माष्टमी पर यहां काफी उत्साह का माहौल रहता है। अष्टमी पर जन्माष्टमी तथा नवमी व दशमी को नंदोत्सव मनाया जाता है। <br /><strong>- पं. मुनीश कुमार शुक्ला, पुजारी चारभुजा मंदिर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Aug 2022 14:53:00 +0530</pubDate>
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