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                <title>dussehra - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>फेज-2 में न टॉय पैवेलियन बना न फूड जोन आया : दशहरा मैदान की अधिकतर दुकानें खाली, मैदान में उड़ रही धूल</title>
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                        <![CDATA[फेज दो में दुकानों के साथ ही कई नए तरह के झूले भी लगाने का दावा किया गया था।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/neither-a-toy-pavilion-nor-a-food-zone-was-built-in-phase-2--most-of-the-shops-in-the-dussehra-ground-are-empty--and-dust-is-flying-in-the-ground/article-128896"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(4)9.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर निगम की ओर से दशहरा मेला शुरु हुए  करीब 15 दिन का समय हो चुका है। ऐसे  में दशहरे के दिन से फेज एक में तो मेला पूरी तरह से भर गया है। जबकि फेज दो में दिल्ली की इवेंट कम्पनी ने अस्थायी दुकानें तो बना दी। लेकिन उनमें न तो टॉय पैवेलियन बना और न ही फूड जोन। अधिकतर दुकानें खाली पड़ी है। साथ ही मैदान में भी धूड़ उड़ रही है। नगर निगम की ओर से आयोजित दशहरा मेले की विधिवत शुरुआत तो 22 सितम्बर को मेला उद्घाटन के साथ ही नवरात्र के  पहले दिन कर दी गई थी। हालांकि उस समय फेज एक में भी गिनती की ही दुकानें लगी थी। लेकिन 2 अक्टूबर को दशहरे के दिन से पूरा मेला परिसर भर गया। यहां अधिकतर दुकानों से लेकर झूले तक लग चुके है। दशहरा बीते भी 4 दिन का समय हो चुका है। ऐसे में शनिवार व रविवार को मेले में काफी भीड़ रही। </p>
<p><strong>नहीं जमा फेज दो में मेला</strong><br />इधर नगर निगम की ओर से दशहरा मैदान फेज दो पुराना पशु मेला स्थल पर नव उत्सव नाम से नवाचार किया गया था। यहां मेले में दुकानें लगाने के लिए दिल्ली की इवेंट कम्पनी को करीब 65 लाख रुपए में टेंडर  दिया गया। निगम अधिकारियों व मेला समिति की ओर से दावा किया गया कि यहां नव उत्सव में करीब 250 से 300 दुकानें लगाई जाएगी। जिनमें टॉय पेवेलियन व देश के अलग-अलग रा’यों के विशेष खाद्य पदार्थ और उत्पाद आएंगे। जिससे लोगों को यहां हर प्रदेश के स्वाद का आनंद मिल सकेगा। </p>
<p><strong>दुकानें बनाई, अधिकतर खाली</strong><br />दिल्ली की जिस इवेंट कम्पनी को टेंडर दिया गया। उसने मैदान में टेंट सिटी की तरह की छोटी-छोटी अस्थायी दुकानें तो बना दी। लेकिन अधिकतर दुकानें खाली पड़ी है। यहां गिनती की ही दुकानें लग सकी है। जिस तरह से नगर निगम ने फेज दो में दुकानों का प्रचार किया था। उसके चलते यहां लोग तो आ रहे हैं लेकिन खाली दुकानें देखकर निराश होकर लौट रहे हैं। लोगों का कहना है कि यहां तो ऊंट ही ऊंट नजर आ रहे है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली लठ व पशुओं के सामानों की कुछ ही दुकानें लगी है जो हमेशा से लगती रही है। ऐसे में यह शहर का मेला कम ग्रामीण मेला अधिक नजर आ रहा है। यहां कच्ची जमीन होने से धूल ही धूल उड़ रही है। </p>
<p><strong>नहीं लगे झूले</strong><br />फेज दो में दुकानों के साथ ही कई नए तरह के झूले भी लगाने का दावा किया गया था। जिससे यहां भी दुकानदारों का व्यापार चल सके। लेकिन अभी तक तो एक भी झूला नहीं लगा। यहां सिर्फ सर्कस लगा हुआ है। वह भी पहले तो दूर से ही नजर आ रहा था लेकिन बड़ी संख्या में बनी दुकानों के कारण वह पीछे दबकर रह गया। </p>
<p><strong>कम्पनी संचालक को ही लानी हैं दुकानें</strong><br />इधर नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि इवेंट कम्पनी को टेंडर दिया है। उसे ही यहां दुकानें लानी है। इसी शर्त पर उसे टेंडर दिया गया है। उसने ही यहां दुकानें लाने के लिए कहा था। उन दुकानों का किराया निगम द्वारा तय दर पर निगम  में जमा होना है। अधिकारियों का कहना है कि यहां कुछ दुकानें तो आ गई है। शेष दुकानें भी एक दो दिन में आने की जानकारी दी जा रही है। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Oct 2025 17:10:57 +0530</pubDate>
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                <title>अहंकार के प्रतीक रावण के पुतले को फूंका : ‘अन्याय पर न्याय’ की जीत का दिया संदेश, 51 फीट का रावण बारिश में भीगने से कई जगह से फट गया कागज </title>
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                        <![CDATA[गुलाबी नगरी में अहंकार, अन्याय और दंभ के प्रतीक रावण के पुतले का जगह-जगह दहन कर समाज में ‘अन्याय पर न्याय’ की जीत का संदेश दिया गया। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/the-message-of-the-victory-of-justice-on-injustice-to/article-128570"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। गुलाबी नगरी में अहंकार, अन्याय और दंभ के प्रतीक रावण के पुतले का जगह-जगह दहन कर समाज में ‘अन्याय पर न्याय’ की जीत का संदेश दिया गया। शहर के अनेक हिस्सों में शाम ढलने के साथ ही हल्की-हल्की बारिश होने से रावण के पुतले कुछ जगह भीग गए, लेकिन शहरवासियों का उत्साह कम नहीं हुआ। राम ने जैसे ही रावण की नाभि पर अग्नि बाण छोड़ा, उसके साथ ही रावण धू-धू कर जलने लगा और पटाखों की अनुगूंज से वातावरण गुंजायमान हो गया। रावण के दहन के साथ ही ‘जयश्री राम’ के जयघोष के साथ वातावरण गूंज उठा।  </p>
<p>आदर्शनगर, विद्याधरनगर, न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, शास्त्री नगर में राष्ट्रपति मैदान, झोटवाड़ा में नांगल जैसा बोहरा, कालवाड़ रोड, प्रतापनगर, सांगानेर सहित शहर में सैकड़ों स्थानों पर रावण के पुतले जलाए गए। लोगों ने परिवार सहित रावण दहन के दृश्य का आनंद लिया। कई स्थानों पर दशहरा मेलों का आयोजन हुआ, जहां खाने-पीने और बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले एवं स्टॉल्स का विशेष प्रबंध किया गया। आदर्शनगर दशहरा मैदान में 105 फीट ऊंचे रावण और 90 फीट ऊंचे कुंभकरण के पुतलों का दहन हुआ। रावण दहन से पूर्व रंगीन आतिशबाजी का नजारा देखने को मिला। नियाग्रा फॉल्स जैसे झरने, स्टार वार जैसी झलक और आकाश में धूमकेतु, चमकीली अशरफि यां और फू लों की वर्षा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। जैसे ही भगवान श्रीराम के स्वरूप ने रावण की नाभि में अग्निबाण छोड़ा, रावण धू-धू कर जल उठा। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयकारों के बीच दृश्य को अपनी आंखों में कैद कर लिया। इसके बाद राम मंदिर में भगवान श्रीराम का राजतिलक सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>बारिश से रावण दहन में हुई परेशानी :</strong></p>
<p>शहर में कई जगह छिटपुट और कुछेक जगह तेज बारिश ने रावण दहन में खलल डाल दिया। रावण पानी में भीग गए और उसमें रखे पटाखे भी भीगने से रावण को जलाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। आदर्श नगर में रावण दहन के दौरान बारिश होने से लोगों ने कुर्सियों को सिर पर रख लिया और जब तक बारिश होती रही, उसका छाते के रूप में इस्तेमाल करते रहे।</p>
<p><strong>ऑनलाइन रूपी रावण का दहन :</strong></p>
<p>वैशाली नगर व्यापार मंडल समिति की ओर से आम्रपाली सर्किल पर ऑनलाइन रूपी रावण का दहन किया गया। जयपुर व्यापार मंडल अध्यक्ष डॉ. ललित सांचौरा ने कहा कि आज के समय में व्यापारियों के लिए तथा आम जनता के लिए अगर कोई रावण है तो वे विदेशी ऑनलाइन कंपनिया हैं, जो इस स्वदेशी भारतीय बाजार को खत्म किया जा रहा है। भारत डेढ़ सौ करोड़ जनसंख्या का देश है, यहां पर सभी व्यक्तियों को रोजगार चाहिए, जिसके चलते गिनी-चुनी ऑनलाइन विदेशी कंपनिया झूठे प्रचार कर अधिकतर सेल का हिस्सा अपने नाम कर रही है, जिसके चलते बेरोजगारी और स्वदेशी स्थानीय दुकान बंद होने के कगार पर है। अगर यही चलता रहा तो लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे, अर्थव्यवस्था ठप हो जाएगी। रावण दहन के समय व्यापार मंडल महासचिव वीरेंद्र राघव, रमेश शर्मा, दिलीप सिंह एवीरेंद्र सिंह लोग मौजूद रहे।</p>
<p><strong>मुरलीपुरा में रामलीला का समापन, रावण का दहन :</strong></p>
<p>मुरलीपुरा सर्किल पर चल रही ग्यारह दिवसीय रामलीला का गुरुवार रात समापन हुआ। आदर्श रामलीला मंडल समिति की ओर से आयोजित रामलीला में अंतिम दिन रावण वध की लीला ने माहौल को भक्तिमय कर दिया। इसके बाद 60 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े। जैसे ही राम ने तीर चलाया, अग्नि की लपटों में घिरा रावण का पुतला धू-धू कर जलने लगा। आसमान में आतिशबाजियां छूटने लगीं और  जय श्रीराम के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। इसके बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने की झांकी निकाली गई और उनका राजतिलक किया गया। मंच पर फू लों की वर्षा के बीच कलाकारों ने राजा राम का राज्याभिषेक किया।  समिति अध्यक्ष अभिनव शर्मा और समाजसेवी राकेश शर्मा ने मंच पर पहुंचकर रामलीला के सभी कलाकारों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया।</p>
<p><strong>जलता हुआ रावण नीचे गिर गया :</strong></p>
<p>आदर्श नगर में जलता हुआ रावण जमीन पर गिर गया। उसके बाद उसमें से धुंआ निकलता रहा। गनीमत रही कि कोई रावण के आस-पास नहीं था, नहीं तो बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Oct 2025 10:15:40 +0530</pubDate>
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                <title>दशहरा पर रोडवेज बसों के रूट में बदलाव, व्यवस्था दोपहर 2 बजे से रात 11 बजे तक रहेगी लागू</title>
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                        <![CDATA[दशहरा पर्व को देखते हुए शहर में ट्रैफिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए रोडवेज बसों के रूट बदले गए हैं। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/changes-in-the-route-of-roadways-buses-on-dussehra-will/article-128492"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/roadways2.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। दशहरा पर्व को देखते हुए शहर में ट्रैफिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए रोडवेज बसों के रूट बदले गए हैं। यह व्यवस्था आज दोपहर 2 बजे से रात 11 बजे तक लागू रहेगी। इस दौरान दिल्ली रोड से आने वाली बसें चंदवाजी तिराहा से एक्सप्रेस हाईवे, रोड नंबर 14, सीकर रोड, चौमू तिराहा, पानीपेच, चिंकारा, कलेक्ट्री होते हुए शहर में प्रवेश करेंगी। वहीं, सिंधी कैम्प से दिल्ली जाने वाली बसें गवर्मेंट हॉस्टल, चौमू हाउस चौराहा, स्टेच्यू सर्किल, पृथ्वीराज रोड, नारायण सिंह तिराहा, रामबाग चौराहा, जेडीए चौराहा, शांति पथ और जवाहर नगर बाईपास होकर आगे बढ़ेंगी।</p>
<p>आगरा रोड से आने वाली बसें रोटरी सर्किल से जवाहर नगर बाईपास, रॉयल्टी तिराहा, केवी-3 तिराहा, ओटीएस चौराहा, गोपालपुरा, लक्ष्मी मंदिर, सहकार मार्ग और 22 गोदाम से गुजरेंगी। इसी तरह, सिंधी कैम्प से आगरा जाने वाली बसों का रूट भी बदला गया है। अब यह बसें गवर्मेंट हॉस्टल से होकर चौमू हाउस सर्किल, स्टेच्यू सर्किल, पृथ्वीराज रोड, नारायण सिंह सर्किल, रामबाग चौराहा, जेडीए चौराहा, शांति पथ और जवाहर नगर बाईपास से रवाना होंगी। सिंधी कैम्प मुख्य प्रबंधक राकेश राय ने इस संबंध में सभी डिपो को जानकारी भेज दी है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 15:20:39 +0530</pubDate>
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                <title>सोनी सब के कलाकारों ने दशहरा के यादगार पल किए साझा : त्योहार के बताए मायने, जानें कलाकारों ने क्या-क्या कहा  </title>
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                        <![CDATA[सोनी सब के कलाकारों ने दशहरा के अपने यादगार पल प्रशंसकों के साथ साझा किए हैं।  ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/the-artists-of-soni-sab-did-memorable-moments-of-dussehra/article-128539"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(1)6.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। सोनी सब के कलाकारों ने दशहरा के अपने यादगार पल प्रशंसकों के साथ साझा किए हैं। सोनी सब के कलाकार करुणा पांडे, ऋषि सक्सेना, गौरी टोंक और समृद्ध बावा ने साझा किया है कि दशहरा उनके लिए क्या मायने रखता है।</p>
<p>‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ में पुष्पा की भूमिका निभा रही करुणा पांडे ने कहा- दशहरा एक शक्तिशाली अनुस्मारक है कि अच्छाई हमेशा जीतती है, चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। बचपन में मुझे रामलीला देखना और रावण दहन देखना बहुत पसंद था, यह हमेशा प्रतीकात्मक लगता था, जैसे हम अपने जीवन की सारी नकारात्मकता को जला रहे हों। आज भी मैं दशहरे को एक ऐसा दिन मानती हूं, जब मैं रुक कर बीते वर्ष पर विचार करती हूं और उन चीजों को छोड़ देती हूं, जो मुझे पीछे खींचती हैं। यह सकारात्मकता और नई शुरुआत का समय होता है।</p>
<p>‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ में अश्विन की भूमिका निभा रहे समृद्ध बावा ने कहा- मेरे लिए दशहरा एक बहुत ही आशाजनक पर्व है। यह याद दिलाता है कि चाहे हालात कितने भी कठिन हों, सही रास्ता हमेशा जीत की ओर ले जाता है। मुझे याद है बचपन में हमारी कॉलोनी में छोटा सा रावण दहन होता था और सभी बच्चे, बुर्जुग उसे देखने के लिए इकट्ठा होते थे। इसके बाद मस्ती, भोजन और हंसी का दौर चलता था। आज भी मैं अपने परिवार के साथ समय बिताकर और उन सरल पलों को संजोकर इसे मनाता हूं।</p>
<p>‘इत्ती सी खुशी’ में संजय की भूमिका निभा रहे ऋषि सक्सेना ने साझा कहा- मेरे लिए दशहरा हमेशा समुदाय और एकता का पर्व रहा है। जोधपुर में, जहां मैं बड़ा हुआ, दशहरा बहुत भव्य तरीके से मनाया जाता है। हर जगह रावण के पुतले दिखाई देते हैं और पूरा शहर उत्सव की रोशनी से जगमगाता है। मुझे याद है कि मैं अपने परिवार के साथ रावण दहन देखने जाता था, मेरे पिता मुझे कंधों पर बैठाकर दिखाते थे। इसके बाद मिठाइयों, त्योहार के भोजन और पारिवारिक मिलन का आनंद लिया जाता था। यह उन त्योहारों में से एक है, जो वास्तव में सभी को एक साथ लाता है और सत्य व धर्म की शक्ति की याद दिलाता है।</p>
<p>‘इत्ती सी खुशी’ में नंदिनी की भूमिका निभा रही गौरी टोंक ने कहा- मुझे दशहरा हमेशा इसके गहरे अर्थ के कारण पसंद रहा है। यह केवल रावण की हार नहीं है, बल्कि हमारे भीतर के रावण भय, अहंकार और नकारात्मकता पर विजय पाने का प्रतीक है। बचपन में मुझे अपने परिवार के साथ रामलीला देखना बहुत अच्छा लगता था और आज भी मैं कोशिश करती हूं कि अपने बच्चों के साथ कम से कम एक पंडाल या रावण दहन कार्यक्रम में जरूर जाऊं। यह उन्हें मूल्यों और अच्छाई की बुराई पर विजय के महत्व को सिखाने का एक सुंदर तरीका है।</p>
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                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 15:15:17 +0530</pubDate>
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                <title>दशहरा विशेष : दैनिक नवज्योति ने श्री करनी नगर विकास समिति के बच्चों के साथ मनाया दशहरा, ड्रॉइंग प्रतियोगिता का आयोजन </title>
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                        <![CDATA[बच्चों ने दशहरे के महत्व को समझा और उसे अपनी कला में व्यक्त किया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dussehra-special--dainik-navjyoti-celebrated-dussehra-with-the-children-of-shri-karni-nagar-vikas-samiti/article-128481"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । दशहरा का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस खास अवसर पर दैनिक नवज्योति ने श्री करनी नगर विकास समिति के बाल गृह के बच्चों के साथ उत्साहपूर्ण ढंग से दशहरा उत्सव मनाया। इस आयोजन का उद्देश्य बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना था। इस उत्सव के दौरान समिति के बच्चों के बीच दशहरा थीम पर ड्रॉइंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों ने पूरे उत्साह और आत्मविश्वास के साथ भाग लिया। बच्चों ने अपनी कला के माध्यम से रावण के पुतले को सजाने और उसे तैयार करने का अनूठा अवसर प्राप्त किया। समिति के कुछ बड़े बच्चों रामनिवास, राजेश, गौरव, कमल और दीपक ने मिलकर रावण का पुतला बनाया। लकड़ी, गत्ते, कागज और अन्य सामग्रियों से रावण का पुतला तैयार किया गया, जिसे बाद में सजाया गया और आतिशबाजी के साथ जलाया गया।</p>
<p><strong>रचनात्मकता में भागीदारी</strong><br />दशहरा उत्सव के तहत आयोजित ड्रॉइंग प्रतियोगिता में बच्चों ने रावण के दस सिर, राम के धनुष-बाण से रावण का वध और रावण का जलना जैसे दृश्य चित्रित किए। किसी ने रावण को जलते हुए दिखाया, तो किसी ने राम और रावण के युद्ध को अपनी कला के माध्यम से प्रस्तुत किया। इन चित्रों के माध्यम से बच्चों ने दशहरे के महत्व को अच्छे से समझा और उसे अपनी कला में व्यक्त किया।</p>
<p><strong>खुशी का माहौल</strong><br />इस आयोजन में बच्चों ने पटाखे भी चलाए, जिसमें सभी बच्चे उत्साहपूर्वक शामिल हुए। फुलझड़ी, अनार और चकरी चलाते हुए बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठे और यह पल उनके लिए अविस्मरणीय बन गया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री करनी नगर विकास समिति की संयोजिका सुमन भंडारी, बाल गृह के सुपरवाइजर महेश मीना और विष्णु सक्सेना का सराहनीय योगदान रहा।</p>
<p><strong>समिति के ही बच्चे गोविंद (कक्षा सात) द्वारा स्वरचित कविता-</strong><br /><strong>त्यौहारों का देश हमारा </strong><br />तरस रहा माटी का कण कण, उमड़ रही रसधार है<br />त्यौहारों का देश हमारा, हमको इसे प्यार है,<br />मनभावन सावन आते है, होते खेल तमाशे है<br />दीपावली में दीपदान, फुलझड़ी, खील बताशे हैं,<br />आता है हर वर्ष दशहरा, होते खेल तमाशे है,<br />त्यौहारों का देश हमारा हमको इसे प्यार है।</p>
<p><strong>प्रतियोगिता के परिणाम</strong><br />इस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया रोहित कुमार बैरवा (प्रथम वर्ष) ने, जबकि द्वितीय स्थान पर कान्हा जाटव (कक्षा 7) और तृतीय स्थान पर ललित बैरवा (कक्षा 9) रहे। इसके साथ ही, सांत्वना पुरस्कार के लिए रोहित सिंह (कक्षा 4), अंकित मेघवाल (कक्षा 8), और अंकित पांचाल (कक्षा 5) का चयन किया गया। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 15:01:17 +0530</pubDate>
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                <title>धर्म और सत्य की विजय का प्रतीक दशहरा : देश के अलग-अलग कोनों में उत्सव की अनूठी झलक, कहीं सिंदूर खेला तो कहीं सोना पत्ती की भेंट </title>
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                        <![CDATA[मैसूर पैलेस को हजारों बल्बों से सजाया जाता है और भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसमें हाथियों पर सजीव देवी की मूर्तियां बैठाई जाती हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/dussehra-symbolized-the-victory-of-religion-and-truth-dussehra-played/article-128488"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(12)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर डेस्क। भारत विविधताओं का देश है और यहां हर पर्व अपने अनोखे रंग और परंपरा के साथ मनाया जाता है। नवरात्र के बाद विजयादशमी या दशहरा का पर्व शक्ति, धर्म और सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। भले ही इसकी जड़ें एक ही हैं-रावण पर राम की विजय और महिषासुर पर दुर्गा का वध, लेकिन अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है।</p>
<p><strong>उत्तर भारत: रावण दहन और रामलीला</strong><br />उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में दशहरा का मुख्य आकर्षण रामलीला और रावण दहन होता है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार में बड़े-बड़े मैदानों में अस्थायी मंच सजाए जाते हैं जहां रामायण का नाट्य रूपांतरण होता है। विजयादशमी की शाम को विशालकाय पुतलों-रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण-का दहन किया जाता है।</p>
<p><strong>गुजरात: नवरात्र से विजयादशमी तक</strong><br />गुजरात में दशहरा का उत्सव पूरे नवरात्रि की उमंग से जुड़ा हुआ है। नौ रातों तक गरबा और डांडिया रास की धूम रहती है। दसवें दिन विजयादशमी पर लोग अपने शस्त्र और औजारों की पूजा करते हैं। इस दिन को नए कार्य की शुरूआत के लिए शुभ माना जाता है। ग्रामीण इलाकों में अब भी रामलीला और रावण दहन का आयोजन होता है।</p>
<p><strong>महाराष्ट्र: सीमेगा उत्सव और देवी की विदाई</strong><br />महाराष्ट्र में दशहरा को सीमेगा उत्सव कहा जाता है। यहां लोग अपनी सीमाओं से बाहर जाकर सोना (अक्षत या अपराजिता के पत्ते) एक-दूसरे को भेंट करते हैं और कहते हैं, सोना जैसा उज्ज्वल जीवन हो। यह परंपरा मराठा इतिहास से जुड़ी है, जब विजयादशमी को युद्ध के लिए शुभ दिन माना जाता था। पुणे और नासिक जैसे शहरों में दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन भी विजयादशमी पर ही होता है। महाराष्ट्र में, विजयदशमी को नए काम और पढ़ाई शुरू करने के लिए बेहद शुभ माना जाता है।</p>
<p><strong>दक्षिण भारत: आयुध पूजा -सांस्कृतिक कार्यक्रम</strong><br />कर्नाटक की राजधानी मैसूर का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है। मैसूर पैलेस को हजारों बल्बों से सजाया जाता है और भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसमें हाथियों पर सजीव देवी की मूर्तियां बैठाई जाती हैं। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में, बोम्मई कोलु या गोलू की परंपरा है, जहां घरों में गुड़ियों की सीढ़ीनुमा सजावट की जाती है। लोग अपने औजारों, किताबों और गाड़ियों की पूजा करते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शमी पूजा की जाती है, जहां लोग शमी के पेड़ की पूजा करते हैं और एक-दूसरे को उसकी पत्तियां सोना के रूप में भेंट करते हैं, जो समृद्धि का प्रतीक है।</p>
<p><strong>पूर्वोत्तर भारत: आदिवासी और स्थानीय रंग</strong><br />असम, त्रिपुरा और नागालैंड जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में दशहरा स्थानीय परंपराओं के साथ घुल-मिल गया है। असम में दुर्गा पूजा का रंग अधिक गहरा होता है, जबकि त्रिपुरा और मणिपुर में पारंपरिक नृत्य और संगीत के साथ विजयादशमी मनाई जाती है।</p>
<p><strong>पश्चिम बंगाल: दुर्गा पूजा का विसर्जन</strong><br />पश्चिम बंगाल में दशहरा का रूप सबसे भव्य दिखाई देता है। यहां पर दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार दस दिनों तक चलता है और देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस पर विजय के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को विजयदशमी कहते हैं। बंगाल में पांच दिनों तक चलने वाली यह पूजा भव्य पंडालों, खूबसूरत मूर्तियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से रमी होती हैं। विजयदशमी के दिन, देवी की मूर्तियों को एक जुलूस के साथ नदी या तालाब में विसर्जित किया जाता है। इस दिन सिंदूर खेला का रिवाज है, जहां महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर देवी के आशीर्वाद की कामना करती हैं।</p>
<p><strong>हिमाचल प्रदेश: कुल्लू दशहरा</strong><br />हिमाचल प्रदेश का कुल्लू दशहरा अनोखा है क्योंकि यहां रावण दहन नहीं होता। विजयादशमी के दिन से यहां सात दिन का मेला शुरू होता है, जिसमें देवताओं की शोभायात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह पर्व सामूहिकता और स्थानीय देव संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 12:57:38 +0530</pubDate>
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                <title>सत्य की जीत का सन्देश देता है दशहरा</title>
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                        <![CDATA[भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहां अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/dussehra-gives-the-message-of-victory-of-truth/article-128508"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(4)2.png" alt=""></a><br /><p>भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहां अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। यहां साल भर अनेक त्योंहार मनाए जाते हैं, जो न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक भी होते हैं। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है और इसका भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान है। दशहरा का पर्व भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसे विजयादशमी कहा जाता है, जिसका अर्थ है विजय प्राप्त करने वाला दसवां दिन। रामायण के अनुसार भगवान राम ने रावण का वध कर अपनी पत्नी सीता को उसके बंदीगृह से मुक्त कराया था। यह पर्व यह संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो अंत में जीत सत्य और धर्म की ही होती है। यह त्योहार लोगों को नैतिक मूल्यों, सत्यए और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। दशहरा अथवा विजयदशमी पर्व को भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में। दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा का पर्व है। शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है।</p>
<p><strong>रावण का संहार :</strong></p>
<p>दशहरा भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसी दिन भगवान राम ने बुराई के प्रतीक दस सिर वाले रावण का संहार किया था, तो देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार करने वाले महिषासुर का 10 दिन तक चले भयंकर युद्ध के बाद मां दुर्गा ने वध किया था। इसीलिये इसको विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं। इस दिन शस्त्र पूजा की जाती है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का समापन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक व शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में फसल उगाकर अनाज घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के लिये वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए उनका पूजन करता है। भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है।</p>
<p><strong>विशेष पूजा :</strong></p>
<p>बंगाल, ओडिशा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह बंगालियों, ओडिया और आसमिया लोगों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। बंगाल में दशहरा पूरे पांच दिनों के लिए मनाया जाता है। ओडिशा और असम मे चार दिन तक त्योहार चलता है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं। देश के नामी कलाकारों को बुलवा कर दुर्गा की मूर्ति तैयार करवाई जाती हैं। यहां दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और प्रसाद वितरण किया जाता है। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर लगाती हैं व सिंदूर से खेलती हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। अन्त में देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं, जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है। इस दिन विद्यालय जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन शुभ माना जाता है। लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त समझते हैं। इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है।</p>
<p><strong>मैसूर का दशहरा :</strong></p>
<p>कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालिकाओं से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग टार्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा का आनंद लेते हैं। पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। अन्य स्थानों की ही भांति यहां भी दस दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। स्त्रियां और पुरुष सभी ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि वाद्य यंत्रों को लेकर बाहर निकलते हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूम धाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है। बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय ना मानकरलोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं,जो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह पर्व पूरे 75 दिन चलता है। यहां दशहरा श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। बस्तर में यह समारोह लगभग 15वीं शताब्दी से शुरु हुआ था। इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है।</p>
<p><strong>-रमेश सर्राफ धमोरा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 12:35:14 +0530</pubDate>
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                <title>संस्कृति, संवाद और संस्कारों की जीवंत पाठशाला है रामलीला मंचन, दशहरा मैदान में राघवेन्द्र कला संस्थान कर रहा रामलीला का मंचन</title>
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                        <![CDATA[कलाकारों के जीवंत अभिनय से लोगों को मिल रही संस्कृति से जुड़ने की सीख।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/ramlila-is-a-vibrant-school-of-culture--dialogue-and-values--raghavendra-kala-sansthan-is-staging-ramlila-at-dussehra-maidan/article-128242"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(6)10.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। भारतीय संस्कृति और परंपरा की आत्मा यदि कहीं सजीव होकर प्रकट होती है तो वह है रामलीला मंचन। यह केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि समाज को संस्कार, मयार्दा और जीवन मूल्यों से जोड़ने वाला सशक्त माध्यम है। रामलीला मंचन की दुनिया में निर्देशक बृजराज गौतम का नाम एक जाना-पहचाना चेहरा है। उन्होंने बताया कि वे पिछले 40 साल से निर्देशन कर रहे है जिसमें उन्होंने रामलीला में नारद, रावण और दशरथ जैसे अहम किरदार निभाए हैं। खासतौर पर रावण का किरदार उन्होंने लगातार 35 वर्षों तक किया है। गौतम मानते हैं कि दशरथ, राम और रावण जैसे रोल दर्शकों की निगाहों का केंद्र होते हैं। वे संवाद लिखते समय हमेशा यही ध्यान रखा कि दर्शकों तक कुरीतियों, व्याभिचार और गंदी आदतों के खिलाफ संदेश पहुंचे। साथ ही नैतिकता और भारतीय संस्कृति का परिचय भी मिले। श्रीराम का किरदार निभा रहे वैभव गौतम ने बताया कि  बदलते दौर में जब परिवारों में विघटन, राग-द्वेष और आपसी दूरी बढ़ रही है, तब राघवेंद्र कला संस्थान इन मंचनों के जरिए लोगों को पुन: भारतीयता और परिवारिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। दैनिक नवज्योति से विशेष बातचीत करते हुए बताया कि इस मंचन के दौरान किस तरह अपने अंदर महानयकों का भाव उतारते है तथा किस तरह से जीवंत कलाकारों के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पेश है मुख्य अंश:</p>
<p><strong>24 वर्षों से श्रीराम का अभिनय कर रहे वैभव गौतम</strong><br />वैभव गौतम का रामलीला से जुड़ाव बचपन से रहा है। तीन वर्ष की उम्र में मंच पर कदम रखने वाले गौतम ने छोटे-राम, लक्ष्मण, वानर और राक्षस जैसे किरदार निभाए। मात्र 11 साल की उम्र में उन्हें भरत की भूमिका मिली और पिछले 24 वर्षों से वे श्रीराम का अभिनय कर रहे हैं। मेडिकल क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद वे राम के सौम्य, धैर्यवान और करुणामयी स्वभाव को मंच पर उतारने के लिए विशेष अभ्यास करते हैं। लक्ष्मण शक्ति प्रसंग में उनके वास्तविक आंसू बहते हैं। उनके अनुसार, राम का अभिनय केवल भूमिका नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन है।</p>
<p><strong>विरंचि दाधीच निभा रहे हनुमान का किरदार</strong><br />विरंचि दाधीच पिछले चार वर्षों से रामलीला में हनुमान का सशक्त किरदार निभा रहे हैं। मात्र पांच वर्ष की आयु से रामलीला से जुड़ाव होने के बावजूद वे नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ और हनुमान चरित्र से जुड़ी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। राजकीय सेवा में कार्यरत होने के बावजूद हर वर्ष दो माह का समय रामलीला के लिए निकालते हैं। उनका कहना है कि मंच पर हनुमान बनकर सेवा करना उनके लिए गर्व और सौभाग्य की बात है।</p>
<p><strong>ऋषिराज गौतम 8 साल से लक्ष्मण का किरदार कर रहे है</strong><br />राघवेंद्र कला संस्थान से करीब 30 वर्षों से जुड़े ऋषिराज गौतम अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।  वे पिछले 8 साल से रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं। चरित्र की भक्ति और संयम बनाए रखने के लिए नौ दिन लहसुन-प्याज का सेवन नहीं करते और योगा व जिम से फिट रहते हैं। उनके बच्चे भी रामलीला में अभिनय कर चुके हैं।</p>
<p><strong>40 साल से रामलीला में बृजराज गौतम</strong><br />निर्देशक और कलाकार बृजराज गौतम पिछले 40 वर्षों से रामलीला में नारद, रावण और दशरथ जैसे किरदार निभा रहे हैं। उनका मानना है कि रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज सुधार और नैतिक मूल्यों का संदेश है। गौतम के अनुसार दशरथ का जीवन आदर्श है—उन्होंने प्रेम के बावजूद राम को गुरुकुल और विश्वामित्र के पास भेजा तथा वचन पालन के लिए अपना सुख त्याग दिया। वे कहते हैं कि हर पात्र, चाहे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान या रावण ही क्यों न हो, जीवन में चरित्र निर्माण, संस्कार, संबंध और आचरण की सीख देता है।</p>
<p><strong>अश्वथामा दाधीच: 35 वर्षों से रावण का जीवंत अभिनय</strong><br />अश्वथामा दाधीच पिछले 35 वर्षों से रामलीला संस्था से जुड़े हैं और पिछले आठ वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने अंगद, विश्वामित्र, दशरथ जैसे कई प्रमुख किरदार भी निभाए हैं, लेकिन रावण का किरदार उन्हें सबसे चुनौतीपूर्ण लगता है। इसके लिए उन्होंने रामचरित मानस, वाल्मीकि रामायण और रावण संहिता का गहन अध्ययन किया। 20 किलो अतिरिक्त वेशभूषा, प्रभावी बॉडी लैंग्वेज और दमदार आवाज के अभ्यास से उनका अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। अश्वथामा मानते हैं कि वे रावण की तरह विद्या के क्षेत्र में संतुलित और समर्पित रहने का प्रयास करते हैं। वे संस्कृत के ज्ञाता भी हैं।</p>
<p><strong>पवन दोसाया: अभिनय से मेकअप तक का सफर</strong><br />राघवेंद्र कला संस्थान से 1988 से जुड़े पवन दोसाया ने पेंटिंग और मेकअप के माध्यम से कला जगत में पहचान बनाई। अब तक 30 फिल्मों और 1500 एलबम में उनका योगदान रहा है। वे संस्थान में बाली, जयंत, काल्यादेव और विदूषक जैसे किरदार निभा रहे हैं।  बाली, सुग्रीव का भाई है जो उसे भगा देता है। जयंत, श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए कौआ का रूप धारण करता है। वहीं विदूषक केवल जोकर नहीं होते बल्कि राजा के सलाहकार माने जाते हैं, जो हंसी-मजाक में भी बड़ी और गंभीर बातें कह देते हैं।</p>
<p><strong>गोविंद तिवारी: 35 वर्षों से शिव, केवट और परशुराम</strong><br />गोविंद तिवारी ने मंच पर विभिन्न पौराणिक पात्र निभाए हैं। शिव और केवट में संगीत प्रधानता है, जबकि परशुराम में वीर रस का अभिनय। वे पात्र को पूरे समर्पण और मन से जीवंत करते हैं।</p>
<p><strong>रंगलाल मेहरा : रामलीला मंचन से समाज सुधार का संदेश</strong><br />राघवेन्द्र कला संस्था के महासचिव रंगलाल मेहरा पिछले 25 वर्षों से समाज को संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का काम कर रहे हैं। उनके अनुसार रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सुधार का माध्यम है। निषाद, जनक, विभीषण और मारीच जैसे पात्रों के माध्यम से दर्शकों तक संस्कार और जीवन मूल्य पहुँचते हैं।</p>
<p><strong>दीपक शर्मा: रामलीला से जीवन मूल्य</strong><br />दीपक शर्मा पिछले छह वर्षों से मेघनाथ, मारीच, शतानंद और धावल जैसे प्रमुख पात्र निभा रहे हैं। उनका कहना है कि रामलीला ने उन्हें जीवन शैली को ढालने और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा दी।</p>
<p><strong>संतोष कुमार जैन: संस्कार और परंपरा से जुड़ाव</strong><br />राघवेंद्र कला संस्थान से 12 वर्षों से जुड़े संतोष कुमार जैन ने बताया कि संस्था से जुड़कर उन्होंने कई महत्वपूर्ण किरदार निभाए हैं। उन्होंने गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र और सुग्रीव जैसे पात्र निभाए। उनके बच्चे भी मंच से जुड़े हैं। उनकी 16 वर्षीय बेटी पिछले तीन वर्षों से रामलीला में सक्रिय है और गौरीमाता, छोटी सीता, राक्षसी, शबरी और अग्निदेव जैसे विभिन्न किरदार निभा चुकी है।</p>
<p><strong>मुक्ता कुलश्रेष्ठ: कौशल्या और शबरी से मिली पहचान</strong><br />वर्ष 2006 से महिलाओं की भागीदारी की पहल के साथ जुड़ी मुक्ता कुलश्रेष्ठ ने मां कौशल्या और शबरी के रूप में दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। उनके अनुसार ऐसे पवित्र पात्रों को निभाना आस्था और संस्कारों को दृढ़ करता है।</p>
<p><strong>उमेश जोशी 15 वर्षों से निभा रहे कुम्भकर्ण का किरदार </strong><br />रामलीला मंचन में कुम्भकर्ण का पात्र हमेशा दर्शकों को रोमांचित करता है। राघवेन्द्र कला संस्थान से जुड़े उमेश जोशी पिछले 15 वर्षों से इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को निभा रहे हैं। जोशी ने बताया कि कुम्भकर्ण का रोल आसान नहीं होता। खरार्टों की आवाज निकालना और मदमस्त हाथी की चाल में चलना काफी कठिन है। लेकिन जब दर्शक तालियां बजाते हैं तो सारी मेहनत सफल हो जाती है। उन्होंने हंसते हुए कहा कि अब तो लोग मुझे आॅफिस में भी कुम्भकर्ण कहकर बुलाने लगे हैं। रामलीला से जुड़े इस अनुभव को वह अपने जीवन का अनमोल हिस्सा मानते हैं।</p>
<p><strong>40 वर्षों से रामलीला में विदूषक बनकर हंसा रहे भुवनेश जोशी </strong><br />भुवनेश जोशी पिछले चार दशकों से रामलीला मंचन में विदूषक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों को रुलाना या डराना आसान होता है, लेकिन हंसाना सबसे कठिन कार्य है। इसी चुनौती को उन्होंने जीवन का हिस्सा बना लिया। जोशी बताते हैं कि उनका पात्र जोकरनुमा होता है, जिसे देखकर और आवाज सुनकर दर्शक उत्साहित हो जाते हैं। लंबे समय से लगातार इस भूमिका को निभाते हुए वे आज भी दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहे हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य है इस मंचन के माध्यम से संस्कृति अऔर परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखना है, वहीं समाज में सभी परिवारों को संस्कारों से जोड़ना है। </p>]]>
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                                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 16:31:49 +0530</pubDate>
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                <title>दशहरा मेले में इस बार नहीं लगेगा महंगाई का तड़का, खाद्य पदार्थ और झूलों की नहीं बढ़ेगी रेट</title>
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                        <![CDATA[मेला समिति ने दुकानों का किराया नहीं बढ़ाया है गत वर्ष के समान ही दुकानों का किराया लिया गया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-dussehra-fair-will-not-be-affected-by-inflation-this-time--food-prices-and-swings-will-not-increase/article-127868"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(1)29.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । एक ओर जहां महंगाई लगातार बढ़ रही है। वहीं उसका असर इस बार दशहरे मेले में नहीं दिखाई देगा। दशहरा मेले में महंगाई का तड़का नहीं लगेगा। विशेष रूप से खाद्य पदार्थ और झूलों पर। दशहरा मेले का विधिवत शुभारम्भ तो दो दिन पहले नवरात्र के दिन से हो गया है लेकिन अभी तक भी मेले में पूरी दुकानें नहीं लग पाई है। बाहर से आने वाले दुकानदार अभी तक बहुत कम संख्या में आए। हालांकि स्थानीय व्यापारी व दुकानदारों द्वारा अपने हिसाब से दुकानें तैयार की जा रही है। जिससे खाने-पीने की दुकानों के साथ ही झूले ही लग पाए हैं।  दशहरा मैदान के फेज एक में झूला मार्केट से लेकर मैदान में अन्य निर्धारित स्थानों पर हर साल लगने वाले परम्परागत झूले लग रहे है। वहीं नसीराबाद का कचौड़ा, पकौड़ी व सोफ्टी और फास्ड फूड की दुकानें लगना शुरु हो गई है।  दुकानदारों का कहना है कि इस बार मेले में खाद्य पदार्थ व झूलों की रेट नहीं बढ़ाई गई है। खाद्य पदार्थ के दुकानदार सुनील वैष्णव ने बताया कि नसीराबाद का कचौड़ा व गोभी के पकौड़े, गुलाब जामुन व अन्य खाद्य पदार्थों की कीमत इस बार भी वही है जो गत वर्ष थी।  सोफ्टी के  दुकानदार प्रमोद लोधा का कहना है कि मेला समिति ने दुकानों का किराया नहीं बढ़ाया है। गत वर्ष के समान ही इस बार भी दुकानों का किराया लिया गया है। इस कारण से सोफ्टी की दरों में भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। जिससे 30 से 50 रुपए के बीच ही सोफ्टी की रेट है। हालांकि कई दुकानदार 20 रुपए में भी बेचते हैं।  वहीं झूला संचालक जाकिर हुसैन ने बताया कि मेले में जहां परम्परागत रूप से जो झूले आते हैं उनकी संख्या पहले से भी अधिक हो गई है। करीब 60 से ज्यादा झूले लगेंगे। ऐसे में इस बार भी झूलों की रेट नहीं बढ़ाई गई है। जितनी रेट गत वर्ष थी उतनी ही रखी गई है। 30-40 रुपए से लेकर 80 रुपए तक ही रेट है। </p>
<p><strong>नए झृूलों की रेट अधिक है</strong><br />वहीं मेला समिति के अध्यक्ष विवेक राजवंशी ने बताया कि मेला समिति की ओर से इस बार मेले में आवंटित दुकानों का किराया नहीं बढ़ाया गया है। इसका मकसद मेले में आने वाले व्यापारियों के साथ ही आमजन पर आर्थिक भार नहीं बढ़ाना है। इस बार भी झूला संचालकों से पुरानी दर पर ही झूले संचालित करने को कहा गया है।  उन्होंने बताया कि इस बार मेले में कई नए व आकर्षक झूले भी लगेंगे जो पहली बार आएंगे। ये झूले बड़े होने से इनकी रेट सामान्य झूलों से कुछ अधिक है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Thu, 25 Sep 2025 14:51:59 +0530</pubDate>
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                <title>कोटा के ऐतिहासिक पशु मेले का खत्म हो रहा अस्तित्व, पहले जगह बदलने से फिर लम्पी ने लगाई रोक </title>
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                        <![CDATA[दशहरा मेले में इस बार भी पशु मेला लगना मुश्किल]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-existence-of-kota-s-historic-cattle-fair-is-coming-to-an-end/article-118595"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/458.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर निगम कोटा दक्षिण व उत्तर की ओर से इस बार 132 वां राष्ट्रीय दशहरा मेला तो 22 सितम्बर से आयोजित किया जाएगा। लेकिन इसके साथ ही लगने वाला आकर्षण का केन्द्र पशु मेले का अस्तित्व खत्म होने से उसका लगना मुश्किल है।  नगर निगम की ओर से हर साल दशहरे पर आयोजित होने वाले मेले के दौरान सबसे अधिक आकर्षण का केन्द्र रहता था पशु मेला। इस मेले में शहर ही नहीं दूरदराज से पशु बिकने के लिए आते थे। पशु पालक न केवल पशुओं को बेचने वरन् उन्हें खरीदने वाले भी काफी लोग आते थे। पशु पालकों व किसानों का मेले में आने पर आकर्षण बने। इसके लिए पशु मेला स्थल पर ही निगम की ओर से किसान रंगमंच का आयोजन किया जाता था। जहां किसानों से संबंधित ही सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। जानकारों के अनुसार दशहरा मेले के विजयश्री रंगमंच पर आयोजित होने वाले मुख्य कार्यक्रमों की तरह ही किसान रंगमंच पर भी  काफी भीड़ रहती थी। देर रात तक लोग उन कार्यक्रमों का आनंद लेते थे।  लेकिन अब न तो पशु मेला लग रहा है और न ही किसानों के लिए कार्यक्रम हो रहे है। किसान रंगमंच बनता है और उस पर कार्यक्रम भी होते हैं लेकिन वह किसानों के लिए न होकर स्थानीय व आर्केस्ट्रा पार्टी के कार्यक्रम होने लगे हैं। </p>
<p><strong>निगम को होती थी आय</strong><br />जानकारों के अनुसार पशु मेले का आयोजन नगर निगम की ओर से किया जाता था। इसके लिए अलग से व्यवस्था व अधिकारियों कर्मचारियों की नियुक्ति होती थी। मेले में आने वाले पशु पालकों की पर्ची कटती थी। जिससे निगम को आय भी होती थी। हालांकि यह आय बहुत कम होती थी। वहीं पशुओं के लिए  चारा व भूसे का भी इंतजाम होता था। साथ ही बाहर से आने वाले लोगों के लिए दाल बाटी व देशी खाना बनता था। मेले में अलग ही आकर्षण रहता था। </p>
<p><strong>बंधा धर्मपुरा व देव नारायण में किया था शिफ्ट</strong><br />नगर निगम की ओर से पहले जहां दशहरा मैदान  के भाग पुलिस कंट्रोल रूम के पास ही पशु मेला लगता था। उस मैदान को अभी भी पशु मेला स्थल के नाम से ही जानते हैं। निगम की ओर से इस पशु मेले को पहले तो सीएडी रोड पर ही अतिक्रमण से मुक्त करवाई गई बकरा मंडी की जगह पर संचालित किया गया। लेकिन वहां पशु पालकों की संख्या काफी कम रही। इसके बाद इसे बंधा धर्मपुरा और फिर देव नारायण आवासीय योजना में शिफ्ट किया गया। लेकिन यह मेला वहां भी अपनी पहचान नहीं बना सका। उसके बाद एक बार पशुओं में आए लम्पी रोग को देखते हुए रा’य सरकार पशु पालक विभाग की ओर से पशु मेला लगाने पर रोक लगाई थी। उसके बाद दूसरे साल भी इसी रोग के कारण मेला नहीं लग सका। वहीं अब हालत यह है कि पशु मेला अपना अस्तित्व ही होता जा रहा है। जिससे इस बार भी पशु मेले लगना मुश्किल ही है। </p>
<p><strong>पशुओं से संबंधित सामानों की बिक्री भी हुई कम</strong><br />पशु मेला नहीं लगने  व किसानों के मेले में कम आने से अब पशुओं से संबंधित सामानों की बिक्री भी कम हो गई है। पशु पालक देवलाल गुर्जर का कहना है कि दशहरा मेले का आकर्षण होता था पशु मेला। लेकिन उसे धीरे-धीरे जबरन समाप्त किया  गया है। हालत यह है कि अब पशुओं से संबंधित सामान बेचने वाले कुछ पुराने लोग मेले में आते हैं लेकिन उनकी बिक्री तक कम होने से उनका खर्चा ही नहीं निकल पाता। पहले जेबड़ा, घंटी, दराती व अन्य सजावटी सामान भी खूब बिकते थे।  बंधा धर्मपुरा निवासी पशु पालक रामलाल गुर्जर का कहना है कि दशहरा मेले के साथ पशु मेला तो लगना चाहिए। वह भी दशहरा मेले के आस-पास ही। जिससे लोग मेला घूमने आएं तो पशु मेला भी देख ले। लेकिन देव नारायण या बंधा धर्मपुरा में पशु मेला लगाने का कोई मतलब नहीं है। यहां तो दशहरा मेले के अलावा कभी भी लगाया जा सकता है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />पशु मेले का आकर्षण धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। लम्पी रोग ने भी इस मेले में पशुओं को आने से रोका तो अब पशु पालकों की रूचि भी कम दिखने लगी है। ऐसे में दशहरा मेले में वही कार्यक्रम व आयोजन किए जा रहे हैं जिनका आकर्षण अधिक है। पशु मेले के आयोजन पर अभी तक कोई निर्णय तो नहीं हुआ है। फिर भी मेला समिति की अगली बैठक में पशु मेले पर चर्चा की जाएगी। समिति जैसा निर्णय करेगी उसके हिसाब से काम किया जाएगा। <br /><strong>- विवेक राजवंशी, अध्यक्ष मेला उत्सव व आयोजन समिति </strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Jun 2025 15:15:44 +0530</pubDate>
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                <title>दशहरा से दीपावली तक हुआ 2500 करोड़ का व्यापार</title>
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                        <![CDATA[वाहन, सोना चांदी, बर्तनों की जमकर हुई बिक्री]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-got-2500-crores-business-from-dussehra-to-deepawali/article-94463"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/6633-copy44.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा । शहर में नवरात्रा, दशहरा से लेकर छह दिवसीय दीपोत्सव त्यौहार पर इस बार जमकर बाजारों में धन बरसा।  जिससे व्यापारियों में खासा उत्साह नजर आ रहा है। दीपोत्सव के बाद अब व्यापारियों को देव उठनी एकादशी के अबूझ मुहूर्त पर अच्छे कारोबार की आस लगाई जा रही है। व्यापार महासंघ के महासचिव अशोक माहेश्वरी ने बताया कि जहां पिछले साल  1200 सौ करोड़ का कारोबार हुआ था इस बार अच्छी फसले होने से 2500 करोड़ के लगभग का  कारोबार नवरात्रा, दशहरा, पुष्य नक्षत्र व पांच दिवसीय दीपोत्सव के दौरान हुआ। जिससे व्यापारियों के चेहरे खिले हुए है।  मंदी की मार झेल रहे सर्राफा व्यापारियों के चेहरे पर रौनक लौट आई। दशहरा से लेकर दीपावली तक 2000 करोड़ की कारोबार होने का अनुमान लगाया जा रहा था। लेकिन इसबार  दीपावली तक 2500 करोड़ रुपए के लगभग व्यापार होने का अनुमान है। 500 करोड़ का रियल स्टेट में बरसा धन:  अशोक माहेश्वरी ने बताया कि शहर में धनतेरस के शुभ मुहूर्त में लोगों ने प्लाट, जमीन, फ्लेट, दूकानों के सौदे किए। कोटा में रियल स्टेट में लंबे समय बाद अच्छी बुकिंग देखी गई। जानकारों के अनुसार इस बार दो करोड़ से अधिक कारोबार धन तेरस पर हुआ। वहीं नवरात्रा से लेकर दीपावली तक 500 करोड़ के कारोबार होने का अनुमान है।</p>
<p><strong>100 करोड़ का बरसा सर्राफा बाजार में धन</strong><br />शहरवासियों ने दशहरा, पुष्य नक्षत्र व धनतेरस के विशेष योग में सोना चांदी के सिक्के मुर्तियों की खरीद की। इस बार चांदी के सिक्कों की जगह चांदी की मूर्तियों की खरीद ज्यादा हुई। शहर के सर्राफा बाजार, रामपुरा बाजार, चौथमाता सर्राफा बाजार में लोगों ने ज्वैलेरी, चांदी के सिक्के, चांदी मूर्तियों की खरीदारी की।  ग्राहकों को सोने चांदी की दुकानों में पहुंचने में परेशानी हुई। धनतेरस पर 100 करोड़ का व्यापार होने का अनुमान है। जो पिछले साल से 15 फीसदी ज्यादा है।  इस बार चांदी की हनुमान चालीसा रिद्धि- सिद्धि के साथ गणेश जी, इसके अलावा चांदी के गिलास, कटोरी और अन्य आयटम की भी काफी डिमांड रही। </p>
<p><strong>एक हजार करोड़ के वाहन बिके </strong><br />शहर में आॅटोमोबाइल क्षेत्र में इस बार अच्छी ग्राहकी रही। इसबार सबसे ज्यादा चौपहिया वाहनों की बिक्री हुई। करीब 2 हजार से अधिक कार बिकी। वहीं करीब 150 के आसपास ट्रैक्टर, 100 के लगभग ई रिक्शा व 2500 हजार दुपहिया वाहनों की बिक्री हुई। दुपहिया वाहन के मैनेजर लोकेश जांगिड ने बताया कि पुष्य नक्षत्र, दशहरा, दीपावली तक करीब 2500 हजार दुपहिया वाहन बिके। वहीं चौपहिया वाहनों के मैनेजर रविंद्र मेहरा ने बताया कि नवरात्रा से लेकर दीपावली तक करीब 2 हजार चौपहिया वाहन की बिक्री हुई है। इस बार एक हजार करोड के टर्न ओवर होने की संभावना है। <br /> <br /><strong>फर्नीचर मार्केट में बूम 25 करोड़ का हुआ कारोबार</strong><br />फर्नीचर मार्केट के अध्यक्ष इलियास अंसारी ने बताया कि इस बार नवंबर व दिसंबर में  शादियां बंपर होने से फर्नीचर मार्केट में बूम आया हुआ है। दशहरा के अबुझ मुहूर्त के बाद धनतेरस पर सबसे ज्यादा फर्नीचर की बुकिंग हुई है। शादी वाले जमकर खरीदारी कर रहे हैं। धनतेरस पर 20 से 25 करोड़ के बीच कारोबार हुआ है। </p>
<p><strong>400 करोड़ रुपए का किराना बाजार में बरसा धन</strong><br />शहर के अग्रसेन बाजार में इस बार लोग जमकर खरीदारी की। नवरात्रि से लेकर दीपावली तक किराना बाजार में 400 करोड़ रुपए धन बरसा है। </p>
<p><strong>अन्य बाजारों में 80 करोड़ का धन</strong><br />शहर के अन्य बाजारों में करीब 80 करोड़ का करोबार हुआ। जिसमें श्रृंगार प्रसाधन, ब्लॉथ मार्केट, जूते सजावट के समान,  मेकअप, पूजन सामाग्री और मिठाई, कार सजावट बाजार  सम्मलित है। </p>
<p><strong>रेडिमेड गारमेंट्स में 50 करोड़ का कारोबार </strong><br />रेडिमेड व्यवसायी अनिल कुमार जैन ने बताया कि अक्टूबर के पहले सप्ताह से रेडिमेड गारमेंट्स बाजार में अच्छी ग्राहकी चल रही है। धनतेरस की पूर्व संध्या पर लोगों ने जमकर खरीदारी की।   धनतेरस 50 करोड़ का कारोबार होने का अनुमान बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक इस बार लंबी वेरायटी बाजार में आई है। महिलाओं के परिधान में इस बार कुछ नये डिजायन और कुर्तिया आई हैं जो युवतियों काफी पसंद आ रही है। </p>
<p><strong>इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार को लगा 80 करोड़ का बूस्टर डोज</strong><br />सबसे ज्यादा भीड़ इलेक्ट्रानिक्स बाजार में  देखी गई। मंदी की मार झेल रहे इलेक्ट्रानिक्स बाजार को धनतेरस की बूस्टर डोज लगने से फिर से गति पकड़ ली।  इलेक्ट्रॉनिक्स व्यवसायी सत्यनारायण गुप्ता ने बताया कि इस बार दिवाली काफी अच्छी रहने वाली है। नवरात्रा के बाद से ही अच्छी ग्राहकी चल रही है। धनतेरस से लेकर दिवाली तक 3 दिन में करीब 80 करोड़ का कारोबार होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इस बार एलईडी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन सहित अन्य सामान खूब बिक रहे हैं। कंपनियों ने भी नए उत्पाद के साथ आकर्षक आॅफर लॉन्च किए हैं। धनतेरस पर 50 करोड़ का कारोबार हुआ है। </p>
<p><strong>बर्तन बाजार रहा गुलजार, 50 करोड़ के बिके बर्तन</strong><br />धनतेरस पर शहर के रामपुरा, इंदिरा बाजार, बर्तन बाजार में सबसे ज्यादा भीड़ रही। लोगों ने धनतेरस पर सोना चांदी के बाद सबसे ज्यादा स्टील, पीतल, तांबा कांसा के बर्तनों की खरीदी की। वहीं कई लोगों ने दिसंबर में होने वाली शादियों के लिए बर्तनों की बुकिंग कराई। </p>
<p><strong>फैक्ट फाइल</strong><br /><strong>नवरात्रा से दशहरा तक :</strong> 250 करोड़<br /><strong>पुष्य नक्षत्र :</strong> 250 करोड़ का कारोबार<br />धनतेरस, रूप चौदस, दीपावली 2 हजार करोड़ रुपए का कारोबार</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 Nov 2024 14:15:56 +0530</pubDate>
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                <title>दशहरे की निपटी, भुगतान की रामलीला उलझी </title>
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                        <![CDATA[आयोजक लगा रहे निगम अधिकारियों के चक्कर।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dussehra-is-over--payment-of-ramlila-is-entangled/article-84165"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/photo-size9.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर निगम कोटा उत्तर व दक्षिण की ओर से अक्टूबर 2023 में आयोजित दशहरा मेला और उस दौरान आयोजित रामलीला तो निपट चुकी है। लेकिन उसके 9 माह बाद अभी तक भी एक रामलीला मंडली का भुगतान तक नहीं हुआ है। नगर निगम की ओर से आयोजित दशहरा मेले के दौरान कोटा उत्तर व दक्षिण क्षेत्र में करीब आधा दर्जन से अधिक स्थानों पर रामलीलाओं का मंचन किया गया। हालांकि शुरुआत में अधिकारी रामलीला आयोजन के पक्ष में नहीं थे। लेकिन पार्षदों व मेला आयोजन समिति के विरोध के चलते एनवक्त पर रामलीला मंचन की स्वीकृति जारी की गई। </p>
<p><strong>अभी तक नहीं हुआ भुगतान, लगा रहे चक्कर</strong><br />आदर्श नवयुवक रामलीला समिति निमोदा हरिजी  दीगोद के अध्यक्ष किशन गोपाल गोचर ने बताया कि नगर निगम की ओर से दिए गए दिशानिर्देशानुसार समिति की ओर से आर.के. पुरम् में 15 अक्टूबर से 23 अक्टूबर 2023 तक रामलीला का मंचन किया गया। रामलीला समाप्त हुए 9 महीने हो गए हैं। लेकिन अभी तक भी रामलीला मंचन का भुगतान निगम की ओर से नहीं किया गया है। जबकि अन्य आयोजन कर्ताओं को निगम की ओर से निर्धारित राशि 3 लाख रुपए का भुगतान किया जा चुका है। गोचर ने बताया कि उन्होंने जिला कलक्टर, निगम आयुक्त, मेला समिति अध्यक्ष और महापौर सभी को कई बार लिखित में पत्र दे दिए। 3 लाख रुपए के भुगतान के लिए निगम में काफी समय से चक्कर काट रहे हैं।  लेकिन अधिकारी भुगतान ही नहीं कर रहे। जबकि रामलीला के कलाकार उनसे राशि की डिमांड कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें निगम से राशि मिलेगी तभी तो वे कलाकारों को भुगतान करेंगे। </p>
<p><strong>गणेश स्थापना 17 से पहले होगी</strong><br />इधर इस साल होने वाले दशहरा मेले के लिए गणेश स्थापना 17 जुलाई से पहले होगी। 17 जुलाई को देव शयनी एकादशी है। उससे पहले मेले की गणेश स्थापना की जानी है। जिससे देव शनन के चार माह के भीतर भी मेले से संबंधित तैयारी या आयोजन किए जा सकें। निगम अधिकारियों का कहना है कि अभी तक गणेश स्थापना की तारीख तय नहीं हुई है। </p>
<p><strong>विधानसभा चुनाव की आचार संहिता</strong><br />पिछले साल दशहरा मेला शुरु होने से पहले ही  विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो गई थी। दशहरा मेले की शुरुआत 15 अक्टूबर को हुई थी। लेकिन आचार संहिता 9 अक्टूबर को ही लागू हो गई थी। ऐसे में पहले जहां मेले  का आयोजन मेला समिति के हाथ में था वहीं आचार संहिता लगते ही आयोजन अधिकारियों के हाथों में चला गया।</p>
<p><strong>आचार संहिता में पोस्टर विमोचन का अडंगा</strong><br />वार्ड 30 आर.के. पुरम् के पार्षद मोहनलाल नंदवाना का कहना है कि आयोजन समिति द्वारा उनके वार्ड में ही रामलीला का मंचन किया गया। रामलीला पूरी की गई लेकिन उनका भुगतान नहीं किया जा रहा है। आयोजक जब उनसे मिले तो उन्होंने निगम अधिकारियों से चर्चा की। अधिकारियों का कहना है कि आयोजन समिति द्वारा विधानसभा चुनाव की आचार संहिता के दौरान रामलीला शुरू होने से पहले उसका पोस्टर विमोचन कांग्रेस नेत्री से करवाया था। जिसकी शिकायत निगम में हुई है। आचार संहिता उल्लंघन करने के कारण भुगतान अटका हुआ है। पार्षद का कहना है कि जब अधिकारियों से आचार संहिता संबंधी कोई रिपोर्ट या जांच में दोषी पाए जाने की रिपोर्ट के बारे में जानकारी ली जा रही है तो वे उस बारे में कुछ नहीं कह रहे हैं। जबकि समिति के कलाकार जरा सी राशि के लिए निगम के चक्कर लगाकर परेशान हो रहे हैं। पार्षद नंदवाना का कहना है कि पोस्टर का विमोचन आयोजन से पहले हो गया था। आयोजन स्थल पर भी नहीं हुआ था। उसके बाद भी इस तरह का बहाना बनाकर कलाकारों का भुगतान रोकना गलत है।  इधर निगम अधिकारियों का कहना है कि आचार संहिता उल्लंघन के आरोप के कारण ही भुगतान अटका हुआ है। अभी तक उसका कोई निर्णय नहीं हुआ है। जब तक कोई निर्णय नहीं होगा भुगतान किया जाना संभव नहीं है। इसके अलावा अन्य सभी का भुगतान किया जा चुका है। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Tue, 09 Jul 2024 16:41:24 +0530</pubDate>
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