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                <title>यूआईटी की देव नारायण योजना: आधे मकान खाली, आधे में गंदगी के ढेर, सुविधाओें पर लगा ताला</title>
                                    <description><![CDATA[अभी तक योजना में गिनती के ही पशु पालक और पशु शिफ्ट हो सके हैं। यही कारण है कि योजना में अभी भी अधिकतर मकान खाली व बंद पड़े हुए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/uit-s-dev-narayan-yojana--half-the-house-empty--half-of-the-dirt-piled-up--facilities-locked/article-21891"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/aadhe-makan-khali--uit-devnarayan-yojna..kota-news-6.9.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर विकास न्यास ने शहर को पशु मुक्त करने के लिए करीब 300 करोड़ रुपए खर्च कर बंधा धर्मपुरा में देव नारायण आवासीय योजना तो बना दी। वहां लोगों को जबरन शिफ्ट भी कर दिया। लेकिन वहां सुविधाओं के नाम पर अभी तक कुछ भी नहीं दिया गया है। यही कारण है कि योजना का लोकार्पण होने के ढाई महीने बाद भी आधे मकान खाली पड़े हैं। नगर विकास न्यास ने पशुओं व पशु पालकों को शहर से दूर करने के लिए बंधा धर्मपुरा में देव नारायण आवासीय योजना विकसित की है। योजना बनने के बाद और वहां सभी सुविधाएं विक सित करने का दावा करने के चलते भी जब  लोग वहां जाने को तैयार नहीं हुए तो न्यास अधिकारियों ने पूरा पुलिस व प्रशासनिक अमला लगाकर पशु पालकों को वहां शिफ्ट करवा दिया। हालत यह है कि न्यास अधिकारियों द्वारा पूरा जोर लगाने पर योजना शुरू होने के ढाई माह बाद तक भी अधिकतर पशु पालक वहां जाने को तैयार नहीं हैं। जो पशु पालक वहां चले भी  गए हैं तो उनमें से अधिकतर परेशान होकर वापस शहर की तरफ रूख करने का मन बना रहे हैं। स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने 19 जून को इस योजना का लोकार्पण किया था। उस समय पशु पालकों को उनके मकानों के कब्जे दिए गए थे। न्यास सचिव ने दावा किया था कि योजना शुरू होने के सात दिन में सभी पशु पालकों व पशुओं को योजना में शिफ्ट कर दिया जाएगा। लेकिन नतीजा सबके सामने है कि शहर से पशु कम होने की जगह अधिक नजर आने लगे हैं। अभी तक योजना में गिनती के ही पशु पालक और पशु शिफ्ट हो सके हैं। यही कारण है कि योजना में अभी भी अधिकतर मकान खाली व बंद पड़े हुए हैं।</p>
<p><strong>सफाई भी आठ-आठ दिन में</strong><br />योजना में लोगों को शिफ्ट तो कर दिया। लेकिन वहां सफाई की पुख्ता सुविधा नहीं की गई है। हालत यह है कि अधिकतर मकानों के बाहर बनी नालियां कचरे से अटी हुई हैं। सड़कों पर आठ-आठ दिन तक सफाई नहीं हो रही है। जिससे करोड़ों रुपए की नई बनी योजना ढाई महीने में ही दुर्दशा का शिकार होने लगी है। </p>
<p><strong>गोबर खरीद रहे लेकिन भुगतान अभी तक नहीं</strong><br />योजना में गोबर गैस प्लांट लगाया गया है। उसके लिए पशु पालकों से रोजाना एक रुपए किलो में गोबर तो खरीदा जा रहा है। हर पशु पालक के यहां से रोजाना 200 से 500 किलो तक गोबर क्रय किया जा रहा है। लेकिन करीब ढाई महीने में किसी भी पशु पालक को एक रुपए का भुगतान उनके बैंक खातों में नहीं किया गया है। प्रथम श्रेणी का पशु चिकित्सालय तो बना दिया लेकिन उस पर ताला लटका हुआ है। जिससे उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की जगह पर बोर्ड तो लगा दिया लेकिन वहां सिर्फ जमीन ही है। ऐसे में योजना में रह रहे परिवार के लोगों के बीमार होने पर उन्हें इलाज के लिए शहर में ही आना पड़ रहा है। </p>
<p><strong>घरों के बाहर पशुओं के झुंड व गोबर के ढेर</strong><br />देव नारायण योजना वैसे तो पशु पालकों के लिए ही बनी है। उस योजना में पशु पालकों को मकानों में ही पशुओं को रखने की जगह दी गई है। लेकिन हालत यह है कि पूरी योजना की सड़कों पर पशुओं के झुंड लगे हुए हैं। घरों से अधिक पशु सड़कों पर हैं। साथ ही घरों के बाहर गोबर के ढेर लगे होने से पूरी जगह गोबर की दुर्गंध फेल रही है। </p>
<p><strong>सैकड़ों बच्चों के भविष्य पर लटकी तलवार</strong><br />योजना में न्यास ने अंग्रेजी माध्यम का स्कूल तो बना दिया। लेकिन अभी तक उसे शुरू नहीं किया गया है। उसमें न तो स्टाफ है और न ही सुविधा। सिर्फ भवन बनाकर छोड़ दिया। जिससे योजना में रहने वाले परिवारों के अधिकतर बच्चे स्कूल ही नहीं जा पा रहे हैं। कई पशु पालक अपने बच्चों को दूध बेचने के समय शहर में लेकर आ रहे हैं और दूध बेचने के बाद वापस लेकर जा रहे हैं। लेकिन इसमें भी पशु पालकों को इतनी अधिक परेशानी हो रही है कि वे उस पीड़ा को बताते हुए भावुक तक हो गए। </p>
<p><strong>दूध डेयरी शुरू नहीं, शहर में आना पड़ रहा</strong><br />योजना में सभी पशु पालक हैं और हर पशु पालक के पास 5 से 10 तक पशु हैं जो सभी दूध देने वाले हैं। योजना में डेयरी तो बना दी लेकिन उसे शुरू नहीं करने से उनका दूध नहीं खरीदा जा रहा है। जिससे पशु पालकोंÞ को दूध बेचने के लिए शहर में आना पड़ रहा है। जिसमें उन्हें आधा घंटा आने व आधा घंटा वापस जाने में तो लग ही रहा है। साथ ही पेट्रोल का रोजाना का 100 से 200 रुपए खर्चा अधिक बढ़ गया। </p>
<p><strong>आवागमन का कोई साधन नही</strong><br />देव नारायण योजना शहर से दूर है। जहां सिर्फ पशु पालक ही रह रहे हैं। न्यास द्वारा वहां ता जाने के लिए सड़क और डिवाइडर तो बेहतर बनाई गई है लेकिन उस सड़क पर लोगों के आवागमन के लिए कोई साधन तक नहीं है।  रात के समय ही नहीं दिन में भी वहां न तो सिटी बस जा रही है और न ही आॅटो मैजिक। जिससे लोग बिना स्वयं के साधन के कहीं भी आ-जा ही नहीं पा रहे हैं। योजना तक जाने की सड़क पर बिजली के खम्बे तो लगे हैं लेकिन उनमें रोड लाइटें ही नहीं जल रही। जिससे रात के समय लोगों के वहां आने पर सड़क के बीच में भैसों के बैठे होने से आए दिन हादसे हो रहे हैं। योजना में भी अधिकतर रोड लाइटें बंद हैं। </p>
<p><strong>जवाब देने से बचते रहे न्यास सचिव</strong><br />देव नारायण आवासीय योजना में सुविधाओं को अभी तक भी शुरू नहीं करने के बारे में जब नगर विकास न्यास के सचिव राजेश जोशी से बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। मोबाइल पर मैसेज करने पर भी उसका कोई जवाब देना उचित नहीं समझा। वे आमजन की परेशानी का समाधान करने की जगह  जवाब देने से बचते रहे। </p>
<p><strong>लोगों की पीड़ा</strong><br />योजना में मकान तो अच्छे बने हैं। लेकिन यहां  स्कूल शुरू नहीं होने से बच्चे पढ़ने नहीं जा पा रहे हैं। डेयरी शुरू नहीं होने से दूध बेचने के लिए शहर जाना पड़ रहा है। जिससे रोजाना 100 रुपए  पेट्रोल का अतिरिक्त खर्चा बढ़ गया है। <br /><strong>- मंगल गुर्जर, पशु पालक</strong></p>
<p>योजना में आ तो गए लेकिन यहां रहना मुश्किल हो गया है। न तो जानवरों के लिए पूरा पानी मिल पा रहा है और न ही साफ सफाई की सुविधा है। शहर में आने-जाने का भी कोई साधन नहीं है। हालत यह है कि  योजना शहर से दूर होने के कारण ढाई महीने से शहर में रहने वाले रिश्तेदार और जानकार लोग तक मिलने नहीं आ पा रहे हैं।  यही हालत रही तो कुछ समय बाद अधिकतर पशु पालक यहां से वापस शहर में चले जाएंगे। <br /><strong>- रामलाल गुर्जर, पशु पालक</strong></p>
<p>यूआईटी ने मकान तो बनाकर दे दिए। लेकिन कोई सुविधा नहीं दी है। गोबर खरीदकर ले जा रहे हैं लेकिन अभी तक एक रुपए भी नहीं मिले।  पशुओं के मृत होने पर उन्हें उठाने के लिए एक से डेढ़ हजार रुपए तक देने पड़ रहे हैं। जबकि पहले यही काम 100-200 रुपए में हो जाता था। <br /><strong>- शांति बाई, पशु पालक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Sep 2022 15:16:27 +0530</pubDate>
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