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                <title>biodiversity - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>विलायती बबूल के उन्मूलन के लिए योजना बने : मदन दिलावर</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान में पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण के लिए विलायती बबूल (जूलिफ्लोरा) के उन्मूलन की तैयारी शुरू हो गई है। पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर और वन मंत्री संजय शर्मा की अध्यक्षता में हुई बैठक में स्थानीय वनस्पति प्रजातियों को बचाने के लिए चरणबद्ध अभियान चलाने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/madan-dilawar-made-a-plan-for-the-eradication-of-foreign/article-154835"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/mmadan-dilawarr.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण एवं जैव विविधता संवर्धन की दिशा में राज्य में विलायती बबूल (जूलिफ्लोरा) के उन्मूलन को लेकर शनिवार को पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक में वन मंत्री संजय शर्मा के साथ  पंचायती राज राज्य मंत्री ओटाराम देवासी भी उपस्थित रहे। बैठक में दिलावर ने अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि चरणबद्ध कार्ययोजना बनाकर विलायती बबूल के उन्मूलन के लिए प्रभावी अभियान संचालित किया जाए। ताकि स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूती मिले। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 May 2026 14:36:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कांग्रेस का हमला: ग्रेट निकोबार परियोजना में पर्यावरण, आदिवासी अधिकार और पारदर्शिता नदारद, इन विषयों पर जवाब देने में वह विफल रही सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार विकास परियोजना को पारिस्थितिक आपदा करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने लेदरबैक कछुओं के आवास, आदिवासी अधिकारों और पारदर्शिता को दरकिनार किया है। राहुल गांधी की यात्रा के बाद, कांग्रेस ने पेड़ों की कटाई और पर्यावरणीय मंजूरी में हितों के टकराव पर सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/congress-attacks-government-fails-to-respond-on-issues-like-environment/article-152514"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/jairam-ramesh1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना में मोदी सरकार ने पर्यावरण, आदिवासियों के अधिकार, वित्तीय व्यवहार्यता और पारदर्शिता को पूरी तरह नजरअंदाज किया है और इन चिंताओं का जवाब देने में वह विफल रही है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान में कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की गत 28 अप्रैल की ग्रेट निकोबार यात्रा से सरकार विचलित हुई है, इसलिए उसने एक मई को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ध्यान भटकाने की कोशिश की है। सरकार संभावित पर्यावरणीय संकट से ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है।</p>
<p>जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप पारिस्थितिकी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और विशिष्ट क्षेत्र है। वहां गत पांच वर्षों में पक्षियों, सांपों, गिको (छिपकली) और केकड़ों सहित लगभग 50 नयी प्रजातियां खोजी गई हैं। गैलाथिया खाड़ी, जहां बंदरगाह प्रस्तावित है, तटीय विनियमन क्षेत्र-1-ए में आती है और यह लेदरबैक कछुओं का प्रमुख प्रजनन स्थल है। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया में भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं पर दबाव डाला गया और बाद में इन्हीं को परियोजना से जुड़े कार्य सौंपे गए, जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने कहा कि पेड़ों की कटाई के आंकड़ों को लेकर सरकार के अलग-अलग दावे सामने आए हैं और अब तक इसमें स्पष्टता नहीं है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर भिन्न आंकड़े दिए जाने से स्थिति संदिग्ध हो जाती है। उन्होंने प्रतिपूरक वनीकरण के प्रस्ताव को पर्यावरणीय दृष्टि से अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि निकोबार जैसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्र की भरपाई भिन्न भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षारोपण से नहीं की जा सकती और यह पर्यावरणीय सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि गैलाथिया खाड़ी को पहले वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में परियोजना के लिए इसे अधिसूचना से हटाकर इसकी श्रेणी बदली गई।</p>
<p>आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि निकोबारी समुदाय ने परियोजना को लेकर चिंता जताई है और शोंपेन जैसे संवेदनशील समुदाय की सहमति की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों की प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई। परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठाते हुए श्री रमेश ने कहा कि प्रस्तावित हवाई अड्डे और परियोजना के अन्य दावे अव्यावहारिक प्रतीत होते हैं और इससे जुड़े कई व्यावहारिक प्रश्न अनुत्तरित हैं। उन्होंने पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और सूचना के अधिकार के तहत भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसे परियोजना से जोड़ना उचित नहीं है और इस पर संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 17:59:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अजमेर के जंगलों में 1–2 मई को वन्यजीव गणना, 85 से अधिक वाटर होल्स पर नजर</title>
                                    <description><![CDATA[अजमेर वन विभाग 1 और 2 मई को जिले के 85 से अधिक वॉटर होल्स पर वन्यजीव गणना आयोजित करेगा। यह गणना 24 घंटे चलेगी, जिसमें वन कर्मी पग-मार्क और प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर आंकड़े जुटाएंगे। पुष्कर, किशनगढ़ और नसीराबाद सहित सभी क्षेत्रों के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/wildlife-census-in-ajmer-forests-on-1-2-may-keeping-an/article-151553"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/111200-x-600-px)-(3)29.png" alt=""></a><br /><p>अजमेर। वन विभाग की ओर से एक व 2 मई को जिले के जंगलों में वन्य जीव गणना की जाएगी। यह गणना वॉटर होल्स पद्धति से होगी। जिले के जंगलों के 85 से अधिक वाटर होल्स पर यह गणना होगी। वन कार्मिक वॉटर्स होल्स पर पानी पीने के लिए आने वाले जीवों को देखकर उनकी संख्या निर्धारित प्रपत्रों में दर्ज करेंगे। साथ भी उनके पग मार्ग, मल मूत्र को भी गणना का आधार बनाएंगे। उपवन संरक्षक पी बालामुरुगन ने बताया कि गणना 1 मई को सुबह 8:00 बजे शुरू होकर 2 मई को सुबह 8:00 बजे संपन्न होगी। अजमेर सहित ब्यावर, नसीराबाद, किशनगढ़, सरवाड़ व पुष्कर के जंगलों में वाटर होल्स पर होने वाली गणना के लिए टीमों का गठन किया गया है। प्रत्येक टीम के कार्मिकों को गणना का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। गणना के दिन अधिकारियों की टीम वॉटर होल्स का औचक निरीक्षण भी करेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अजमेर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 15:15:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वन्यजीव संरक्षण के लिए चीन ने तैयार की नयी आद्रभूमि संरक्षण व्यवस्था, इकोलॉजिकल प्रयासों को मिलेगा बढ़ावा </title>
                                    <description><![CDATA[बीजिंग ने तालाबों व दलदलों की सुरक्षा हेतु बहु-स्तरीय व्यवस्था लागू की, जिससे 83 प्रतिशत से अधिक आद्रभूमि संरक्षित होकर वन्यजीव विविधता को सुरक्षित आवास मिलेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/china-has-prepared-a-new-wetland-conservation-system-for-wildlife/article-141825"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(14)2.png" alt=""></a><br /><p>बीजिंग। चीन की राजधानी बीजिंग ने अपने तालाब और दलदल स्थलों की सुरक्षा के लिए एक बहु-स्तरित संरक्षण व्यवस्था तैयार की है, जिससे उसकी वन्यजीव आबादी को प्रमुख आवास मिलेगा। बीजिंग नगर पालिका वानिकी और उद्यान ब्यूरो ने सोमवार को बताया कि यह नयी व्यवस्था उसके 83.15 प्रतिशत तालाबों और दलदलों (आद्रभूमि) को संरक्षित करती है। ब्यूरो के अनुसार, यह नयी व्यवस्था वन्यजीव विविधता संरक्षण और दूसरे इकोलॉजिकल प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए बीजिंग के प्राकृतिक रिजर्व, आद्रभूमि पार्क और दूसरे छोटे संरक्षित आद्रभूमि इलाकों का इस्तेमाल करता है। </p>
<p>पिछले पांच वर्षों में बीजिंग ने आद्रभूमि संरक्षण को बेहतर बनाने का काम जारी रखा गया है। अब तक, नगर पालिका की 61,200 हेक्टेयर आद्रभूमि में 50 प्रतिशत से ज्यादा स्थानीय पौधों की प्रजातियां और 76 प्रतिशत स्थानीय जंगली जानवरों की प्रजातियां रहती हैं। बीजिंग के ये नये प्रयास आद्रभूमि संरक्षण और बहाली में चीन की बड़ी योजना का हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में, देश ने कानूनी सुरक्षा उपायों को मजबूत किया है और आद्रभूमि संरक्षण के लिए अपनी प्रबंधन व्यवस्था में सुधार किया है। राष्ट्रीय वानिकी एवं चारागाह प्राधिकरण ने कल कहा कि इसका कुल आद्रभूमि क्षेत्र अब एशिया में पहले और दुनिया में चौथे स्थान पर है। </p>
<p>प्राधिकरण ने कहा कि 15वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2026-2030) के दौरान, चीन आद्रभूमि के लिए अपने कानूनी और नियामक ढांचे में और सुधार करेगा, आद्रभूमि संरक्षण के लिए निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करेगा, और आद्रभूमि पारिस्थितिक उत्पादों के मूल्य को महसूस करने के लिए तंत्र स्थापित करने में तेजी लाएगा।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 17:23:13 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण संघर्ष समिति का खेजड़ी बचाओ महापड़ाव शुरू, हजारों लोगों ने खेजड़ी वृक्ष बचाने के लिए मजबूत कानून बनाने की भरी हुंकार</title>
                                    <description><![CDATA[बीकानेर में पॉलिटेक्निक ग्राउंड पर खेजड़ी बचाओ महापड़ाव शुरू हुआ। अवैध कटाई रोकने और सख्त कानून की मांग को लेकर हजारों लोग जुटे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bikaner/khejri-bachao-mahapadav-of-environment-sangharsh-samiti-started-thousands-of/article-141760"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)2.png" alt=""></a><br /><p>बीकानेर। शहर के पॉलिटेक्निक कॉलेज ग्राउंड में खेजड़ी बचाओ महापड़ाव सोमवार से शुरू हो गया है। मुकाम पीठाधीश्वर रामानन्द आचार्य ने कहा यह आंदोलन एक दिन का नहीं है, महापड़ाव आगे भी जारी रहेगा। पर्यावरण संघर्ष समिति का यह आंदोलन सोलर प्लांट कंपनियों की ओर से खेजड़ी और अन्य हरे पेड़ों की अवैध कटाई को रोकने और पेड़ों के संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाने की मांग को लेकर किया जा रहा है। हजारों लोगों ने सोमवार को बीकानेर में एक स्वर में कहा कि खेजड़ी को बचाने के कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। </p>
<p>महापड़ाव स्थल पर राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्टÑ और मध्य प्रदेश से आए लोग जुटे हैं, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं। राज्य वृक्ष खेजड़ी बचाने के लिए शुरू हुए महापड़ाव के समर्थन में स्थाीनीय व्यापारिक संगठनों ने भी सोमवार को बाजार बंद रखा। शहरी क्षेत्र के सरकारी और निजी स्कूलों में आधे दिन की छुट्टी घोषित की गई। शिव विधानसभा क्षेत्र से विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने कहा कि उन्होंने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था, लेकिन मांगे मनवाने के लिये सरकार को झुकाने के लिए बड़े आंदोलन करने की जरूरत है। यदि बीकानेर से लोग विधानसभा घेराव करना की बात करते हैं तो मैं उस आंदोलन में सबसे आगे रहूंगा। संगरिया विधायक अभिमन्यु पूनिया, कांग्रेस के नेता व पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल, भंवर सिंह भाटी, पूर्व विधायक महेंद्र बिश्नोई सहित अनेक जनप्रतिनिधि महापड़ाव में समर्थन देने पहुंचे। </p>
<p><strong>बजट सत्र में कानून आए</strong></p>
<p>आंदोलन कारी खेजड़ी बचाने के लिए मजबूत कानून लाने की मांग कर रहे हैं। महापड़ाव स्थल पर हजारों की संख्या में लोग पहुंच चुके हैं और उनके आने का क्रम रात तक जारी रहा। आंदोलनकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री से वार्ता हो चुकी है। हमारी मांग पर बजट सत्र में कानून आए इसका इंतजार है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बीकानेर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 12:56:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>कॉर्बेट नेशनल पार्क में दिखा दुर्लभ और खूबसूरत पक्षी''लॉन्ग टेल मिनिवेट'',पक्षी प्रेमियों में उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[रामनगर के कॉर्बेट नेशनल पार्क में दुर्लभ लॉन्ग टेल मिनिवेट पक्षी देखा गया। इसकी मौजूदगी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित वन्य आवास का संकेत मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(10)3.png" alt=""></a><br /><p>रामनगर। उत्तराखंड के रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक बेहद आकर्षक और  दुर्लभ पक्षी ''लॉन्ग टेल मिनिवेट' देखा गया है, जिसने पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान खींचा है। वन्य जीव प्रेमी संजय छिम्वाल बताते हैं कि कॉर्बेट और इसके आसपास के जंगलों में अब तक करीब 600 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह क्षेत्र पक्षी अवलोकन के लिए बेहद खास माना जाता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो पक्षी देखा गया है, वह लॉन्ग टेल मिनिवेट है, जो अपनी खूबसूरती और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है।</p>
<p>संजय के अनुसार लॉन्ग टेल मिनिवेट आमतौर पर पेड़ों की ऊँची चोटियों पर रहना पसंद करता है और जमीन पर बहुत कम उतरता है। इसका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े होते हैं, जिससे यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि इस पक्षी में सेक्सुअल डाइमॉफरजिम स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, यानी नर और मादा के रंग-रूप में फर्क होता है। नर लॉन्ग टेल मिनिवेट चटक लाल रंग का होता है, जबकि मादा हल्के पीले-हरे रंग की दिखाई देती है। आमतौर पर पक्षियों में नर का रंग ज्यादा चमकीला होता है, ताकि वह मादा को आकर्षित कर सके, और यही विशेषता इस पक्षी में भी देखने को मिलती है।</p>
<p>संजय ने आगे बताया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई पक्षी दुर्लभ श्रेणी में आते हैं, जिनकी विशेष सूची (वॉचर लिस्ट) तैयार की जाती है। इस सूची में हॉर्नबिल, बार्बेट और वुडपेकर जैसे पक्षियों के साथ-साथ मिनिवेट भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे पक्षियों का दिखना इस बात का संकेत है कि कॉर्बेट का जंगल आज भी जैव विविधता के लिए सुरक्षित और समृद्ध है। कॉर्बेट में लॉन्ग टेल मिनिवेट का दिखना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:55:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एक साल में बढ़ी 3500 से ज्यादा देसी विदेशी परिंदों की संख्या,ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका पर बढ़ रहे शोध</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष की जनवरी के मुकाबले इस वर्ष सेंसेस में काउंट हुए 300 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-number-of-native-and-migratory-birds-increased-by-more-than-3500-in-one-year--research-on-the-role-of-birds-in-the-ecosystem-is-increasing/article-141087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/3322.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा के वेटलैंड्स अब सिर्फ जलस्रोत ही नहीं, बल्कि पक्षी संरक्षण और जैव विविधता की पहचान बन रहे हैं। मिड विंटर वाटर फोल पॉपुलेशन एस्टिमेशन के तहत जनवरी 2025 और जनवरी 2026 के तुलनात्मक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड (तालाब) पर एक साल में ही 3500 से ज्यादा देसी - विदेशी परिंदों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी न सिर्फ पर्यावरण के लिए शुभ संकेत है, बल्कि कोटा को पक्षी अनुसंधान के नए केंद्र के रूप में भी स्थापित कर रही है।</p>
<p><strong>एक साल में ही 8000 से 11,500 बढ़ी पक्षियों की संख्या</strong><br />शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड उम्मेदगंज पक्षी विहार,अभेड़ा व जोहरा बाई का तालाब पर जनवरी 2025 में हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टमिशन हुआ था। जिसमें यहां 150 प्रजातियों के 8000 देसी विदेशी पक्षी काउंट हुए थे। जबकि, इस वर्ष 17 व 18 जनवरी को हुए सेंसस में 300 से ज्यादा प्रजातियों के 11,500 परिंदे काउंट हुए हैं, जो पिछले वर्ष की अपेक्षा उल्लेखनीय बढ़ोतरी है। इनमें स्थानीय प्रजातियों के साथ-साथ साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से आने वाले प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।</p>
<p><strong>अनुसंधान का केंद्र बने शहरी वेटलैंड</strong><br />शहर के वेटलैंड अनुसंधान का केंद्र बन रहे हैं। दुनियाभर से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आ रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से शहरी सीमा के वेटलैंड्स को पक्षियों के अनुकूल हैबीटाट के रूप में विकसित किए गए हैं। इसी का नतीजा है कि पिछले दिनों हुई गणना में विभिन्न 345 प्रजातियों के 11500 पक्षी काउंट किए गए। जबकि, यह संख्या मात्र उम्मेदगंज पक्षी विहार सहित तीन वेटलैंड की है। जबकि, शहरी क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक वेटलैंड हैं। जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का प्रवास रहता है।</p>
<p><strong>परिदों की पसंद बना अभेडा तालाब, 7000 पक्षियों का बसेरा</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के अधीन अभेडा तालाब तालाब पक्षियों की पहली पसंद बना हुआ है। गत 18 जनवरी को हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन सेंसस में यहां 135 प्रजातियों के 7000 पक्षी काउंट हुए हैं। वहीं जोहरा बाई का तालाब में 70 प्रजातियों के 1500 परिंदे काउंट हुए हैं। जबकि वर्ष 2025 में इन दोनों जगहों से लगभग चार हजार से ज्यादा पक्षी नजर आए थे।</p>
<p><strong>इस बार उम्मेदगंज में पक्षियों की 50 प्रजाती ज्यादा बढ़ी</strong><br />उम्मेदगंज पक्षी विहार में गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष पक्षियों की 50 प्रजाति ज्यादा बढ़ी है। पिछले साल यहां 90 प्रजातियों के 3000 पक्षी काउंट किए गए थे जबकि इस वर्ष 18 जनवरी को 140 प्रजातियों के 3000 से ज्यादा पक्षी मिले हैं । इसकी मुख्य वजह वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट की ओर से करवाए डवलपमेंट कार्य हैं। अवैध फिशिंग, अतिक्रमण व संदिग्ध घुसपैठ पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाए जाना है। साथ ही पेड़ों की अवैध कटाई रुकने से पक्षियों का हैबीटाट न केवल सुरक्षित हुआ बल्कि भोजन की भी पर्याप्त उपलब्धता हो गई। पक्षियों के लिए तालाब में पर्याप्त मछलियां होने व अवैध गतिविधियां थमने से परिंदों का कुनबा आबाद हो गया।</p>
<p><strong>यह वेटलैंड बन रहे बर्ड्स वॉचिंग का डेस्टिनेशन</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर कहते हैं, उम्मेदगंज पक्षी विहार, अभेड़ा तालाब, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, सालकिया व जोहराबाई का तालाब, किशोर सागर, गैपरानाथ, गरड़िया महादेव सहित शहर के विभिन्न वेटलैंड वर्ड वॉचिंग का डेस्टिनेशन बन चुके हैं। यहां की फिजा विभिन्न प्रजातियों के देसी-विदेशी पक्षियों की चहचहाट से गुलजार रहती है। कोटा विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों व कई शिक्षण संस्थानों से विद्यार्थी और स्कॉलर्स ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका, उनके व्यवहार, हैबीटाट, विशेषताएं, सिमटते वनों व वेटलैंड से पक्षियों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर शोध कर रहे हैं।</p>
<p><strong>यह पक्षी आए नजर</strong><br />वन्य जीव विभाग के सहायक वन संरक्षक पंकज कुमार ने बताया कि मिड विंटर वॉटर फॉल सेंसस के तहत जोहराबाई तालाब पर अच्छी तादाद में बार हेडेड गूज नजर आए है । गणना में लगभग 70 प्रजातियों के 1500 पक्षी देखे गए वही, अभेडा तालाब में 135 प्रजातियों के लगभग 7000 पक्षी देखे गए। पक्षी गणना में बार हेडेड गूज, ग्रे लेग गूज, नॉर्दन सावलर, गेडवेल, वुड सेंड पाइपर, ग्रीन सेंड पाइपर, स्पून बिल, मार्स हैरियर, कॉमन स्टर्लिंग, रोजी स्टर्लिंग, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर ,कॉटन पिग्मी गीज, व्हाइट आई, बजार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, इंपीरियल ईगल, ब्लू थ्रोट, स्केली ब्रेस्टड मुनिया, रेड मुनिया, क्रेस्टेड लार्क, कॉमरेंट, ई ग्रेट, सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए। वहीं उम्मीदगंज में 140 प्रजातियों के लगभग 3000 पक्षी नजर आए । जिसमें कॉमन पोचार्ड, टफ्टेड पोचार्ड, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर , मार्स हैरियर, बजार्ड, भुटेड़ ईगल सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए।</p>
<p><strong>यूरोप से कजाकिस्तान से आते हैं पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर ए एच जेडी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर इन दिनों देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, उद्पुरिया, बरधा डेम, गिरधरपुरा, बोराबांस का तालाब, सोखिया तालाब, किशोर सागर तालाब, उम्मेदगंज, अभेड़ा सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। यह पक्षी यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, हिमालय, उत्तरी अमेरिका, यूरोपियन व एशियाई देशों से आते हैं। उन्होंने बताया कि सर्दी के मौसम में हिमालय पार से विदेशी पक्षी माइग्रेशन में फीडिंग और ब्रीडिंग के लिए यहां आते है तथा सर्दी के बाद यथास्थान के लिए रवाना हो जाते है।</p>
<p>आर्दभूमि (वेटलैंड) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जीव जंतुओं के आवास होते हैं। प्रवासी पक्षियों के भी रहने के अनुकूल होते हैं। इनके लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र से ईको सिस्टम को नुकसान हो सकता है। इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है। इस बार तीनों वेटलैंड पर पिछले पिछले साल के मुकाबले इस साल 3500 से ज्यादा पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। हाल ही में हुए सेंसस में कुल 345 प्रजातियों के 11 हजार 500 बर्ड्स काउंट हुए हैं। उम्मीदगंज पक्षी विहार में अतिक्रमण, संदिग्ध घुसपैठ और अवैध फिशिंग रोकी है। जिससे पक्षियों को पर्याप्त भोजन मिलने लगा है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वाइल्ड लाइफ कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 16:30:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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                <title>अरावली विवाद: पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने सीजेआई और राष्ट्रपति को लिखा पत्र, उठाए गंभीर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[वकील और पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने भारत के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट से अरावली के बारे में अपने फैसले पर फिर से विचार करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब सिर्फ़ वही ज़मीनें जो स्थानीय ज़मीन से 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंची हैं, उन्हें ही "अरावली" माना जाएगा - जिससे विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/aravalli-dispute-environmental-activist-hitendra-gandhi-writes-letter-to-cji/article-136841"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/aravalli-hiss-dispute.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर देशभर में बहस तेज हो गई है। वकील और पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। यह पत्र भारत के राष्ट्रपति को भी भेजा गया है। गांधी ने चेतावनी दी है कि ऊंचाई पर आधारित अरावली की संकीर्ण परिभाषा उत्तर-पश्चिम भारत में पर्यावरण संरक्षण को गंभीर रूप से कमजोर कर सकती है।</p>
<p>गौरतलब है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब केवल वही भूमि “अरावली” मानी जाएगी, जो अपने आसपास की स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हो। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों और पर्यावरणविदों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिभाषा से अरावली रेंज के करीब 90 प्रतिशत हिस्से को कानूनी संरक्षण से बाहर किया जा सकता है।</p>
<p>पर्यावरणविदों ने आशंका जताई है कि इससे खनन गतिविधियों, रियल एस्टेट परियोजनाओं और अवैध कब्जों को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे क्षेत्र में अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति होगी। अरावली को मरुस्थलीकरण रोकने, भूजल रिचार्ज बढ़ाने और प्रदूषण से राहत दिलाने वाली प्राकृतिक ढाल माना जाता है। यदि इसकी सुरक्षा कमजोर हुई, तो पानी की कमी, जैव विविधता के नुकसान और बढ़ते प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है।</p>
<p>अपने पत्र में हितेंद्र गांधी ने 20 नवंबर को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अरावली प्रणाली को एक पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल के रूप में पहचानने की दिशा में “महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य कदम” बताया। हालांकि, उन्होंने आदेश में अपनाई गई ऑपरेशनल परिभाषा पर गहरी चिंता जताई। गांधी का कहना है कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक की स्थानीय ऊंचाई को मानदंड बनाना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अपर्याप्त है।</p>
<p>उन्होंने तर्क दिया कि अरावली परिदृश्य के कई ऐसे हिस्से हैं जो ऊंचाई की इस संख्यात्मक सीमा को पूरा नहीं करते, लेकिन फिर भी पारिस्थितिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों को बाहर करने से पूरी अरावली प्रणाली की कार्यक्षमता और संरक्षण उद्देश्य को नुकसान पहुंच सकता है। गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह व्यापक पारिस्थितिक मानकों के आधार पर अरावली की परिभाषा पर पुनर्विचार करे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Dec 2025 17:59:22 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>रणथम्भोर क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण व सिंगल-यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित </title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड ने सवाई माधोपुर की बाघ संरक्षण समिति के सहयोग से हिम्मतपुरा के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण और मिशन LiFE के तहत सिंगल-यूज़ प्लास्टिक खत्म करने पर जोर दिया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/awareness-program-organized-on-biodiversity-conservation-and-single-use-plastic-ban/article-135776"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/sawai-madhopur-news-555.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड जयपुर द्वारा मुख्य प्रबंधक बी एल नेहरा के निर्देशन में बाघ संरक्षण एवं ग्रामीण विकास समिति सवाई माधोपुर के सहयोग से  शुक्रवार को रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व से सटी ग्राम पंचायत हिम्मतपुरा के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, नयापुरा में विस्तृत जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।</p>
<p>कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदाय, विद्यार्थियों एवं महिलाओं को वन्यजीव संरक्षण, स्थानीय जैव विविधता के महत्व, तथा मिशन LiFE के तहत सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के उपयोग को समाप्त करने की दिशा में जागरूक करना है ।  कार्यक्रम के दौरान बोर्ड प्रबंधक मनीष कुमार कुलदीप द्वारा बताया गया कि जैव विविधता मानव जीवन, पर्यावरण संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वन्यजीवों की सुरक्षा, प्राकृतिक आवासों के संरक्षण और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को पर्यावरण बचाने की मूल आवश्यकता है । इस अवसर पर करीब 40 गांवों की महिलाओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया।</p>
<p>उन्हें पर्यावरण-अनुकूल कैरी-बैग वितरित किए गए और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से होने वाले नुकसान, कचरा प्रबंधन, तथा घर-परिवार में प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली अपनाने के व्यावहारिक तरीकों के बारे में विस्तार से समझाया गया साथ ही जैव विविधता प्रबंध समिति के गठन एवं लोक जैव विविधता पंजिका के बारे में अवगत करवाया गया  । ग्रामीणों व महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़ने और अपने गांवों में जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया । </p>
<p>विद्यालय के विद्यार्थियों ने पोस्टर, स्लोगन और प्रश्नोत्तर गतिविधियों के माध्यम से अपनी समझ व जागरूकता का उत्साहपूर्वक प्रदर्शन किया। ग्रामीणों को भी प्लास्टिक प्रदूषण के खतरों और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। अंत में सभी प्रतिभागियों ने यह संकल्प लिया कि वे जैव विविधता की रक्षा, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक मुक्त समाज तथा स्वच्छ पर्यावरण बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।</p>
<p>इस अवसर पर राजस्थान जैव विविधता बोर्ड जयपुर के प्रबधंक मनीष कुमार कुलदीप , एनबीए  प्रशिक्षु  कुणाल राठी व विद्यालय के प्रधानाचार्य बुद्धिप्रकाश जैन व समस्त स्कूल स्टाफ तथा  बाघ संरक्षण एवं ग्रामीण विकास समिति के अध्यक्ष रूप सिंह मीना व सदस्य सौरभ बड़गोती , राजेश सैनी , संदीप , सुरेंद्र मीना , अजित कुमार बैरवा हिम्मतपुरा आदि मौजूद रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 18:09:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चीता लाने से पहले शेरगढ़ सेंचुरी में जैव विविधता का होगा वैज्ञानिक विश्लेषण, सेंचुरी में कीट-पतंगों से दीमक तक पर होगी रिसर्च </title>
                                    <description><![CDATA[ यह अध्ययन तय करेगा कि आने वाले वर्षों में यहां के जंगल को किस दिशा में विकसित किया जा सकता है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/before-bringing-in-cheetahs--a-scientific-analysis-of-the-biodiversity-will-be-conducted-in-shergarh-sanctuary--and-research-will-be-carried-out-on-everything-from-insects-to-termites-in-the-sanctuary/article-130683"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news-(4)12.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शेरगढ़ सेंचुरी में अब जंगल की हर धड़कन को समझने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने यहां के जंगल, वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्र की गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन शुरू करवा रही है। यहां लंबे समय से चीता पुनर्वास की मांग की जा रही है, ऐसे में चीता लाने से पहले जंगल की जैव विविधिता का बारीकी से अध्ययन कर डेटा बेस तैयार किए जाने की तैयारी की जा रही है। यह पहला मौका है जब इस अभ्यारण्य के हर हिस्से, घने पेड़-वनस्पतियां, दुर्लभ पक्षियों, प्राकृतिक जल स्रोतों, कीट-पतंगों से लेकर मिट्टी में रहने वाले दीमक तक का गहराई से अध्ययन किया जा रहा है। रिसर्च कार्य के लिए वन्यजीव विभाग कोटा ने वर्कआॅर्डर भी जारी कर दिया है। </p>
<p><strong>10 हजार हैक्टेयर में होगा अनुसंधान </strong><br />वाइल्ड लाइफ कोटा के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि शेरगढ़ में करीब 10 हजार हेक्टेयर के जंगल में डीप रिसर्च की जाएगी। इससे विभाग को न केवल आॅथेंटिक डाटा मिलेगा बल्कि जंगल के उचित प्रबंधन और पर्यावरण की प्लानिंग में भी सकारात्मक मदद मिल सकेगी। नतीजन, भविष्य में चीता पुनर्वास योजना जैसी संभावनाओं पर ठोस निर्णय लिए जा सकेंगे।</p>
<p><strong>इन 11 बिंदुओं पर होगी स्टडी</strong><br />- टरमाइट और टरमेटोरियम की गिनती: जंगल में कितनी तरह की दीमक प्रजातियां हैं और कितने बाम्बी (टरमेटोरियम) मौजूद है। यदि, अधिक बाम्बी मिलती है तो इसका मतलब होगा कि जंगल स्वस्थ है। <br />मधुमक्खियों की प्रजातियां: शेरगढ़ सेंचुरी में कितनी तरह की मधुमक्खियां हैं, किस पेड़ पर छत्ते बनते हैं और कितने छत्ते मौजूद हैं।<br />- शिकारी पक्षी (रैपटर्स): यहां कौन-कौन से शिकारी पक्षी हैं, वे किन पेड़ों पर रहते हैं और उनकी संख्या कितनी है।<br />- प्राकृतिक जल स्रोत: जंगल में कितने जल स्रोत हैं और किन स्थानों पर प्राकृतिक रूप से पानी भरता है।<br />- सूखे पेड़ों की संख्या: मृत पेड़ों की गणना होगी, जिनमें कई जीव अपना घोंसला बनाते हैं।<br />- डेन ट्री या गुफा वाले पेड़: पेड़ों के खोखले हिस्सों की पहचान की जाएगी, जिनमें मॉनिटर लिजर्ड या सियार जैसे जीव रहते हैं। <br />- पुराने विशाल पेड़ : जंगल में 200-300 वर्ष पुराने पेड़ों की पहचान की जाएगी। <br />- पुनरुत्थान: स्वत: पनपने वाले पेड़ों की गिनती और विदेशी प्रजातियां जैसे लेंटाना या सूबबुल से हो रहे प्रभाव का भी किया जाएगा।  <br />- वाइल्ड फ्रूट्स: जंगल में कौन-कौन से जंगली फल हैं और कौन से जानवर उनका सेवन करते हैं।<br />-  पक्षियों का विश्राम व्यवहार: कौन से पक्षी दिन में और कौन से रात में किस पेड़ पर विश्राम करते हैं। <br />- पक्षियों का विश्राम व्यवहार: कौन से पक्षी दिन में और कौन से रात में किस पेड़ पर विश्राम करते हैं। <br />- कीट-पतंगे, मच्छर और मक्खियां: कौन से फूलों वाले पौधों के आसपास यह पाए जाते हैं और किन समयों पर सक्रिय होते हैं।</p>
<p><strong>90 दिन जंगल में रहकर अध्ययन करेगी रिसर्च टीम </strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए 10 लाख रुपए का बजट जारी किया गया है। जिसमें से 8.5 लाख रुपए का वर्क आॅर्डर जारी हुआ है।  टीम के 10 सदस्य 90 दिन तक जंगल में रहकर वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे। उन्हें आवश्यक संसाधन भी वहीं उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि वे लगातार काम कर सकें। यह अध्ययन न केवल शेरगढ़ की जैव विविधता का साइंटिफिक डेटा तैयार करेगा बल्कि यह भी तय करेगा कि आने वाले वर्षों में यहां के जंगल को किस दिशा में विकसित किया जा सकता है।</p>
<p><strong>वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित होने पर रिसर्च को मिलेगी मान्यता</strong><br />उन्होंने बताया कि रिसर्च के लिए बायोलॉजिस्ट की टीम तैयार की गई है, जो पेड़-पौधे, पक्षियों, प्राकृतिक जल स्रोतों, कीट-पतंगों से दीमक तक का अनुसंधान करेगी।  हालांकि, इस स्टडी के डाटा को तभी मान्यता मिलेगी जब यह किसी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो संबंधित एजेंसी की सिक्योरिटी राशि जब्त कर ली जाएगी।</p>
<p><strong>वैज्ञानिक डेटा से होगा भविष्य की प्लानिंग</strong><br />यह रिसर्च न केवल शेरगढ़ अभ्यारण्य की पर्यावरणीय स्थिति को समझने में मदद करेगी बल्कि भविष्य में चीता या अन्य वन्यजीव पुनस्थापन योजनाओं की दिशा भी तय करेगी। राजस्थान के लिए यह महत्वपूर्ण प्रयास है, जिससे वैज्ञानिक आधार पर जंगल के प्रबंधन की दिशा तय होगी। शेरगढ़ में जैव विविधता की डीप स्टडी कार्य किया जा रहा है।  <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Oct 2025 16:04:07 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>औद्योगिकरण, जैव विविधता से ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि हुई : शर्मा</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान की चर्चा करते हुए कहा कि पिछले 115 वर्षों में औसत तापमान में 0.62 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो गई है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/sharma-increased-greenhouse-gases-due-to-industrialization-biodiversity/article-115794"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtroer-(3)20.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.एचएस शर्मा ने कहा है कि औद्योगिकरण, जैव विविधता में कमी, वन विनाश और कृषि क्षेत्र में कीटनाशकों के उपयोग से ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि हुई है। कार्बन उत्सर्जन औद्योगिक क्रांति के पहले 280 पीपीएम था, वह बढ़कर 407 पीपीएम तक पहुंच गया है। प्रो.शर्मा गुरुवार को परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसन्धान निदेशालय वेस्टर्न रीजन, परमाणु ऊर्जा विभाग जयपुर के सभागार में सम्बोधित कर रहे थे। उन्होेंने कहा कि देश और दुनिया में हो रहे शोध में स्पष्ट हुआ है कि वैश्विक औसत तापमान में 0.72 डिग्री की वृद्धि हुई है।</p>
<p>राजस्थान की चर्चा करते हुए कहा कि पिछले 115 वर्षों में औसत तापमान में 0.62 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो गई है। राजस्थान के पश्चिमी और दक्षिणी 25 जिलों में तापमान की वृद्धि तेजी से हुई है, वर्षा के प्रारूप में भी परिवर्तन हुआ है। पश्चिमी जिलों में 2001 के बाद वर्षा के प्रारूप में वृद्धि हुई है। भूमिगत जल स्त्रोतों की विपुल सम्भावनाएं खोजी जा सकती हैं। इस दिशा में राजस्थान सरकार और हरियाणा सरकार मिल कर कार्य करने की योजना है। क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने प्रोफेसर शर्मा को शॉल ओढ़ाकर कर स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। मंच संचालन रविंद्र कुमार वर्मा ने किया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 May 2025 11:41:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सात समंदर पार से कोटा पहुंचे विदेशी परिंदे</title>
                                    <description><![CDATA[विदेशों में बर्फबारी होने से माइग्रेट कर कोटा आ रहे पक्षी। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/foreign-birds-reached-kota-from-across-the-seven-seas/article-96894"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/9930400-sizee18.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों किमी का सफर कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। कजाकिस्थान, उजबेकिस्थान, साइबेरिया, मंगोलिया, रूस, चीन, उत्तरी अमेरिका सहित कई देशों से बड़ी संख्या में परिंदे शिक्षा नगरी की आबो-हवा में परवाज भर रहे हैं। यूरोपियन व एशियाई देशों में बर्फबारी होने से अपने अनुकूल वातावरण व भोजन की तलाश में यह परिंदे सात समंदर पार कर देश के विभिन्न राज्यों में अपना आशियाना बना रहे हैं। इन दिनों कोटा के दो दर्जन से अधिक वेटलैंड पर देसी-विदेशी पक्षियों पक्षियों का कलरव चहकने लगा है।  </p>
<p><strong>यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से आए पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, विदेशी पक्षियों का कारवां यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से कोटा पहुंचे हैं। इनमें कजाकिस्थान, उज्बेकिस्थान, साइबेरिया, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, स्वजरलैंड, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस सहित करीब एक दर्जन देशों से 10 हजार एयर किमी का सफर कर बड़ी संख्या में मेहमान प्रवास पर आए हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कॉमन कूट, स्पोर्ट बिल परपल, मुरहेंन रुद्दी शेल डक, वाइट आई पोचर्ड, स्पूनबिल, सारस क्रेन बारहेडेड, ओपन बिल स्टोर्क, वाइट आईबीज, ग्लॉसी आईबीज,  लेसर विस्लिंग, टील लिटिल ग्रीव, कोरमोरेंट पौंड हेरॉन, पर्पल हेरॉन दिखायी दे रहे हैं।</p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />जैदी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वेटलैंड देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, जोहरा बाई, गोपाल विहार, किशोर सागर दरा, रानपुर व लाखावा तलाब, उदपुरिया, बरधा बांध, गिरधरपुरा, बोराबांस तालाब सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कोटा की आबोहवा में बेखौफ परवाज भरते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। हाड़ौती का मौसम इन परिंदों के अनुकूल होने से इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।</p>
<p><strong>4 माह तक प्रवास पर रहेंगे यह पक्षी  </strong><br />पक्षी प्रेमी जुनैद शेख ने बताया कि यहां विदेशी पक्षियों में कॉमन कूट, रूडी शेल डक, बार हैडेड गूज, ग्रेलेक गूज, पिनटेल, कॉमन टील, कॉमन पोचार्ड, गार्गेनि टील, गढ़वाल कॉटन टील, इरेशियन करल्यू, स्टेपी ईगल, ब्लू थ्रोट, ग्रेलेक गूंज, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क शामिल हैं। इनके अलावा स्थानीय पक्षियों से भी तालाब गुलजार हो रहे हैं। इनमें लेसर विस्लिंग टील, स्पॉट बिल डक, आॅप्रबिल स्टॉर्क, इंडियन मुरहेन, वाइट आईबीज, इग्रेट वाटर शामिल हैं। मार्च तक इनका प्रवास रहेगा।</p>
<p><strong>उत्तरी अमेरिका ब्लू थ्रोट भी पहुंचा</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि मिस्त्र का राष्टÑीय पक्षी स्टेपी ईगल और उत्तरी अमेरिका से ब्लू थ्रोट पक्षी भी अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। वहीं, अलास्का, साइबेरिया व रूस से आए दुर्लभ प्रजाति के ब्लूथ्रोट पक्षियों ने डेरा डाल रखा है। इनके अलावा यूरेशियन करलेयु, रफ, व्हाइट आई पोचार्ड, व्हाइट टेल्ड लैपविग, स्पॉटेड ईगल, मार्श हैरियर, मार्श सैंड पेपर, बूटेड ईगल, रुडी शैल डक भी दस्तक दे चुके हैं।  </p>
<p><strong>यूरोपियन देशों में बर्फबारी से बढ़ा भोजन का संकट</strong><br />पक्षी प्रेमी हरफूल शर्मा बताते हैं, उत्तरी अमेरिका के अलास्का, हिमालयी क्षेत्र और ईस्ट साइबेरिया में अक्टूबर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। जिससे पक्षियों के लिए भोजन का संकट हो जाता है। ऐसे में तीखी सर्दी से बचने व भोजन की तलाश में ऐसे स्थानों पर आशियाना बनाते हैं, जहां इन क्षेत्रों के मुकाबले ठंड कम रहती है। विदेशी पक्षी तेज सर्दी से बचने को आशियाने की तलाश में यहां आए हैं। इनका प्रवास नवम्बर से शुरू हो जाता है, जो मार्च तक रहता है। </p>
<p><strong>रेड मुनिया बनी आकर्षण का केंद्र</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, अभेड़ा तालाब में कलरफूल पक्षी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में बर्ड्स वाचर पहुंच रहे हैं। यहां रेड मुनिया,  ब्लैक काइट, रेड वेंटेड, बुलबुल साइबेरियन, मुनिया सन बर्ड सहित कई कलरफूल बडर््स ने अभेड़ा में डेरा जमाया हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है।  </p>
<p><strong>रिसर्च का दायरा बढ़ा, शिकार पर अंकुश लगा  </strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशू शर्मा कहती हैं, बर्ड्स पर अनुसंधान लगातार बढ़ रहा है। प्रोजेक्ट वर्क व बर्ड्स वॉचिंग करने बड़ी संख्या में शोधार्थी वेटलैंड पर पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हैं। उनकी मौजूदगी होने से शिकार संबंधित समस्याओं पर अंकुश लगा है। वहीं, लोगों में अवेयरनेस भी बढ़ी है। इसी वजह से स्थानीय व प्रवासी पक्षियों की संख्या में अपेक्षाकृत इजाफा हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Dec 2024 15:21:42 +0530</pubDate>
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