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                <title>biodiversity - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सरिस्का की ऐतिहासिक सफलता, अब देशभर के टाइगर रिजर्व अपनाएंगे राजस्थान मॉडल</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान का सरिस्का दुनिया में बाघ पुनर्स्थापन (Tiger Relocation) की सबसे सफल मिसाल बन गया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने शिरकत की। सरिस्का में बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर 56 हो चुकी है, जो अब अन्य अभयारण्यों के लिए रोल मॉडल है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/alwar/historic-success-of-sariska-now-tiger-reserves-across-the-country/article-158303"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/sariska.png" alt=""></a><br /><p>अलवर। राजस्थान में कभी बाघों से पूरी तरह खाली हो चुका सरिस्का अब दुनिया में बाघ पुनर्स्थापन की सबसे सफल मिसाल बनकर उभरा है। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के 18 वर्ष पूरे होने पर रविवार को सरिस्का बाघ अभयारण्य राष्ट्रीय स्तर के मंथन का केंद्र बना, जहां देशभर के बाघ संरक्षण विशेषज्ञ, वरिष्ठ वन अधिकारी और वैज्ञानिक जुटे। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला "बाघ पुनर्स्थापन : अवसर एवं चुनौतियां" का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने किया।</p>
<p>कार्यशाला में राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय बिग कैट गठबंधन (आईबीसीए) के महानिदेशक, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, क्षेत्रीय निदेशक और देश के प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिक शामिल हुए। इस दौरान सरिस्का मॉडल के आधार पर देश के अन्य बाघ-विहीन और कम बाघ घनत्व वाले बाघ अभयारण्य पुनर्स्थापन की रणनीति पर मंथन हुआ। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का का 18 वर्षों का सफर ऐतिहासिक रहा है। बेहतर निगरानी, मजबूत प्रबंधन और उत्कृष्ट आवास संरक्षण के कारण सरिस्का वर्तमान में देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि प्रत्येक बाघ अभयारण्य की अपनी अलग परिस्थितियां हैं और जहां बाघों की संख्या नहीं बढ़ रही है वहां विशेष रणनीति अपनाई जाएगी। यादव ने कहा कि बाघ संरक्षण के साथ-साथ जल संरक्षण, पक्षी संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और प्रकृति पर्यटन को भी समान महत्व देना होगा। बाघ अभयारण्य से जुड़े ग्रामीणों के कौशल विकास पर विशेष जोर देने की आवश्यकता है ताकि संरक्षण और आजीविका दोनों मजबूत हों। उन्होंने बताया कि सरिस्का परियोजना के 20 वर्ष पूरे होने पर बड़ा राष्ट्रीय आयोजन किया जाएगा।</p>
<p>राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने कहा कि सरिस्का में बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर 56 तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि है और जल्द ही यह आंकड़ा 60 तक पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने बाघ संरक्षण में ग्रामीणों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार से राजस्थान के लिए भी चीता परियोजना स्वीकृत करने की मांग रखी। एनटीसीए के सदस्य सचिव संजय कुमार ने कहा कि वर्ष 2004 में सरिस्का से बाघों के पूरी तरह समाप्त होने के बाद जो चूक हुई, उसे सुधारते हुए 2008 में दुनिया का पहला वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम शुरू किया गया। अब सरिस्का केवल बाघों का संरक्षण क्षेत्र नहीं बल्कि "स्रोत क्षेत्र" बन चुका है, जहां से भविष्य में बाघ अन्य अभयारण्यों तक पहुंच सकेंगे।</p>
<p>उन्होंने इस सफलता का श्रेय तत्कालीन एनटीसीए सचिव राजेश गोपाल, फील्ड डायरेक्टर पी. सोमशेखर और वैज्ञानिक प्रबंधन को दिया। इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने कहा कि बाघ पुनर्स्थापन का प्रयास रूस में सफल नहीं हो सका, लेकिन राजस्थान ने इसे दुनिया के सामने सफल मॉडल के रूप में स्थापित किया। उन्होंने कहा कि मजबूत आधारभूत ढांचा, प्रभावी निगरानी और शिकार पर नियंत्रण सफलता की सबसे बड़ी कुंजी हैं। उन्होंने जानकारी दी कि सितंबर में सरिस्का में 32 देशों के वन्यजीव विशेषज्ञों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित होगा।</p>
<p>कार्यशाला में बताया गया कि भारत वर्तमान में विश्व के करीब 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण कर रहा है। देश में 58 बाघ अभयारण्य में करीब 3,682 बाघ हैं। पिछले एक दशक में बाघ अभयारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो चुकी है और संरक्षित क्षेत्र 84 हजार 450 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों ने कहा कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं बल्कि पूरे जंगल और जैव विविधता का आधार है। इसलिए आवास पुनर्स्थापन, शिकार आधार मजबूत करने, वन्यजीव गलियारों, पुनर्प्रवेश, वन्यजीव स्थानांतरण और वैज्ञानिक प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यशाला में चीता परियोजना पर भी विशेष विचार-विमर्श हुआ।</p>
<p>दो दिवसीय कार्यशाला से प्राप्त सुझावों के आधार पर देश के बाघ-विहीन और कम बाघ घनत्व वाले क्षेत्रों के लिए नई वैज्ञानिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इससे एनटीसीए, राज्य वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय और मजबूत होगा और बाघ संरक्षण में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को नई मजबूती मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अलवर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 16:01:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>रणथम्भौर पहुंचे PCCF अरिजीत बनर्जी : बाघ और घड़ियाल संरक्षण व्यवस्थाओं का लिया जायजा, अधिकारियों को दिए निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान के वन बल प्रमुख अरिजीत बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व और पालीघाट का विस्तृत निरीक्षण किया। उन्होंने बाघों की मॉनिटरिंग, चम्बल नदी में घड़ियाल नेस्टिंग स्थलों और सुरक्षा तंत्र की समीक्षा की। बनर्जी ने फील्ड स्टाफ की सराहना करते हुए वन्यजीव आवास सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन के निर्देश दिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/pccf-arijit-banerjee-reached-ranthambore-took-stock-of-tiger-and/article-156262"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/अरिजीत-बनर्जी.png" alt=""></a><br /><p>सवाई माधोपुर। राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं वन बल प्रमुख (HoFF) अरिजीत बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व एवं पालीघाट क्षेत्र का दो दिवसीय विस्तृत निरीक्षण एवं भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने बाघ संरक्षण, वन्यजीव आवास प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, गश्ती व्यवस्था तथा घड़ियाल संरक्षण से संबंधित विभिन्न गतिविधियों का स्थलीय निरीक्षण कर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान किए।</p>
<p>भ्रमण के प्रथम दिवस बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व के विभिन्न महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने वन्यजीव आवासों, प्राकृतिक जल स्रोतों, एनीकटों, वन्यजीवों के लिए विकसित जल प्रबंधन संरचनाओं, कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग व्यवस्था तथा क्षेत्र में संचालित संरक्षण गतिविधियों का निरीक्षण किया। उन्होंने क्षेत्रीय अधिकारियों से बाघों की वर्तमान स्थिति, उनके विचरण क्षेत्र, मॉनिटरिंग प्रणाली, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम तथा आवास सुधार कार्यों के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की।</p>
<p>निरीक्षण के दौरान उन्होंने फील्ड स्टाफ द्वारा किए जा रहे नियमित गश्त कार्य, आधुनिक तकनीकों के उपयोग, वन अपराध नियंत्रण एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए अपनाए जा रहे उपायों की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों एवं कार्मिकों को संरक्षण कार्यों में निरंतर सतर्कता एवं वैज्ञानिक प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए।</p>
<p>दो दिवस बनर्जी ने पालीघाट क्षेत्र का दौरा कर चम्बल नदी तंत्र में संचालित घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रमों का निरीक्षण किया। उन्होंने घड़ियाल नेस्टिंग स्थलों, हाल ही में हैच हुए घड़ियाल शिशुओं की सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र एवं संरक्षण गतिविधियों का अवलोकन किया। उन्होंने घड़ियालों के प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा एवं संरक्षण को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर बल दिया तथा अधिकारियों को नियमित मॉनिटरिंग जारी रखने के निर्देश दिए।</p>
<p>इस अवसर पर उन्हें रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में बाघ संरक्षण, जैव विविधता प्रबंधन, वन्यजीव बचाव एवं उपचार, आवास विकास, सामुदायिक सहभागिता तथा संरक्षण शिक्षा से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी भी प्रस्तुत की गई। उन्होंने संरक्षण कार्यों में लगे अधिकारियों एवं वन कार्मिकों की प्रतिबद्धता, समर्पण एवं कठिन परिस्थितियों में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 17:00:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी ने भारत के जैव विविधता संरक्षण प्रयासों पर डाला प्रकाश, कहा- 'एक पेड़ मां के नाम' जैसी पहल जंगल जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर भारत की समृद्ध जैव विविधता पर गर्व जताया। उन्होंने कहा कि निरंतर प्रयासों से चीता, हिम तेंदुआ और स्लॉथ बीयर जैसी प्रजातियों का पुनरुद्धार हुआ है। 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान से प्रतिवर्ष 1.19 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र जुड़ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/world-environment-day-prime-minister-modi-threw-light-on-indias/article-156050"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/modi-1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को भारत की समृद्ध जैविक विविधता का उल्लेख करते हुए वन्यजीव संरक्षण एवं वन विस्तार में देश की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और कहा कि निरंतर प्रयासों ने देश भर में कमजोर प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने में मदद की है। पीएम मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि भारत अपनी विशाल जैव विविधता और विविध पारिस्थितिक तंत्रों पर गर्व करता है जो असंख्य प्रजातियों के साथ-साथ लाखों आजीविका का समर्थन करते हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत में हमें अपनी जैविक विविधता पर बहुत गर्व है। हमारे विविध पारिस्थितिकी तंत्र अनगिनत प्रजातियों और आजीविका का समर्थन करते हैं।" सरकार की संरक्षण पहलों का उल्लेख करते हुए, श्री मोदी ने लुप्तप्राय और कमजोर वन्यजीव प्रजातियों की रक्षा के उद्देश्य से विशेष पुनर्प्राप्ति कार्यक्रमों की सफलता की बात की । उन्होंने कहा कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, हिम तेंदुओं, स्लॉथ बीयर और चीतों के संरक्षण प्रयासों ने प्रदर्शित किया है कि दीर्घकालिक प्रतिबद्धता वन्यजीव आबादी और पारिस्थितिक आवासों के पुनरुद्धार में कैसे योगदान दे सकती है।</p>
<p>उन्होंने कहा, "विशेष पुनर्प्राप्ति में हमारे प्रयास भी उल्लेखनीय रहे हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, हिम तेंदुए, स्लॉथ बीयर और चीता के संरक्षण प्रयासों ने इस बात की झलक दी है कि निरंतर प्रतिबद्धता वन्यजीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने में कैसे मदद कर सकती है।"</p>
<p>प्रधानमंत्री ने पिछले साल शुरू किए गए 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के प्रभाव का भी हवाला दिया, जो नागरिकों को अपनी माताओं के सम्मान में पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस पहल ने देश के हरित क्षेत्र को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा, "'एक पेड़ मां के नाम' जैसी पहल ने हर साल लगभग 1.19 लाख हेक्टेयर जंगल जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।" यह टिप्पणी तब आई जब भारत ने पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया है। पिछले एक दशक में, सरकार ने वन क्षेत्र को बढ़ाने, लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा करने और ख़राब पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने के उद्देश्य से कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।</p>
<p>प्रमुख संरक्षण पहलों में से एक प्रोजेक्ट चीता है, जिसके तहत सात दशक से भी अधिक समय पहले देश में प्रजाति विलुप्त होने के बाद अफ्रीकी चीतों को भारत में फिर से लाया गया था। गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की सुरक्षा के प्रयासों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जबकि हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुओं और मध्य भारत में स्लॉथ बीयर के संरक्षण उपायों को आवास संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से तेज किया गया है। प्रधानमंत्री का संदेश विश्व पर्यावरण दिवस को चिह्नित करने वाले पोस्ट और पहल की एक श्रृंखला का हिस्सा है, जो जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्रवाई को प्रोत्साहित करने के लिए हर साल 5 जून को विश्व स्तर पर मनाया जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 17:28:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ग्रेट निकोबार परियोजना पर जयराम रमेश का पत्र: कांग्रेस ने जताई पर्यावरण पर चिंता, केंद्र से की समीक्षा की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अपर्याप्त पर्यावरण प्रभाव आकलन के कारण द्वीप की अनूठी जैव विविधता, समुद्री पारिस्थितिकी और आदिवासी समुदायों पर गंभीर और विनाशकारी संकट मंडरा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/jairam-ramesh-wrote-a-letter-to-bhupendra-yadav-appealing-for/article-155817"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/great-nicobar-project-ngt-clearance-malacca-trade-hub-2026.webp" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से इस पर पुनर्विचार करने और पर्यावरणीय पहलुओं का समुचित आकलन कराने की अपील की है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को बुधवार को पत्र लिखकर कहा कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी अपर्याप्त पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययनों पर आधारित है। उनका दावा है कि इससे द्वीप की जैव विविधता, समुद्री पारिस्थितिकी तथा स्वदेशी समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p>रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर पत्र साझा करते हुए कहा कि पिछले दो वर्षों से इस विषय पर उनका और मंत्री के बीच पत्राचार जारी है। परियोजना से संभावित पर्यावरणीय नुकसान पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए तथा संबंधित रिपोर्टों को सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि परियोजना के लिए तैयार पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट पर्याप्त प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित नहीं है तथा इसमें द्वीप की संवेदनशील पारिस्थितिकी से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की गई है।</p>
<p>रमेश ने गलाथिया खाड़ी क्षेत्र में तटीय कटाव संबंधी रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि परियोजना के दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र और व्यापक अध्ययन कराया जाना चाहिए। उन्होंने परियोजना से संबंधित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने तथा स्थानीय एवं आदिवासी समुदायों की चिंताओं को प्राथमिकता देने की मांग भी की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 14:06:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>विलायती बबूल के उन्मूलन के लिए योजना बने : मदन दिलावर</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान में पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण के लिए विलायती बबूल (जूलिफ्लोरा) के उन्मूलन की तैयारी शुरू हो गई है। पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर और वन मंत्री संजय शर्मा की अध्यक्षता में हुई बैठक में स्थानीय वनस्पति प्रजातियों को बचाने के लिए चरणबद्ध अभियान चलाने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/madan-dilawar-made-a-plan-for-the-eradication-of-foreign/article-154835"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/mmadan-dilawarr.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण एवं जैव विविधता संवर्धन की दिशा में राज्य में विलायती बबूल (जूलिफ्लोरा) के उन्मूलन को लेकर शनिवार को पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक में वन मंत्री संजय शर्मा के साथ  पंचायती राज राज्य मंत्री ओटाराम देवासी भी उपस्थित रहे। बैठक में दिलावर ने अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि चरणबद्ध कार्ययोजना बनाकर विलायती बबूल के उन्मूलन के लिए प्रभावी अभियान संचालित किया जाए। ताकि स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूती मिले। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 May 2026 14:36:21 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कांग्रेस का हमला: ग्रेट निकोबार परियोजना में पर्यावरण, आदिवासी अधिकार और पारदर्शिता नदारद, इन विषयों पर जवाब देने में वह विफल रही सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार विकास परियोजना को पारिस्थितिक आपदा करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने लेदरबैक कछुओं के आवास, आदिवासी अधिकारों और पारदर्शिता को दरकिनार किया है। राहुल गांधी की यात्रा के बाद, कांग्रेस ने पेड़ों की कटाई और पर्यावरणीय मंजूरी में हितों के टकराव पर सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/congress-attacks-government-fails-to-respond-on-issues-like-environment/article-152514"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/jairam-ramesh1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना में मोदी सरकार ने पर्यावरण, आदिवासियों के अधिकार, वित्तीय व्यवहार्यता और पारदर्शिता को पूरी तरह नजरअंदाज किया है और इन चिंताओं का जवाब देने में वह विफल रही है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान में कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की गत 28 अप्रैल की ग्रेट निकोबार यात्रा से सरकार विचलित हुई है, इसलिए उसने एक मई को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ध्यान भटकाने की कोशिश की है। सरकार संभावित पर्यावरणीय संकट से ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है।</p>
<p>जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप पारिस्थितिकी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और विशिष्ट क्षेत्र है। वहां गत पांच वर्षों में पक्षियों, सांपों, गिको (छिपकली) और केकड़ों सहित लगभग 50 नयी प्रजातियां खोजी गई हैं। गैलाथिया खाड़ी, जहां बंदरगाह प्रस्तावित है, तटीय विनियमन क्षेत्र-1-ए में आती है और यह लेदरबैक कछुओं का प्रमुख प्रजनन स्थल है। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया में भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं पर दबाव डाला गया और बाद में इन्हीं को परियोजना से जुड़े कार्य सौंपे गए, जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने कहा कि पेड़ों की कटाई के आंकड़ों को लेकर सरकार के अलग-अलग दावे सामने आए हैं और अब तक इसमें स्पष्टता नहीं है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर भिन्न आंकड़े दिए जाने से स्थिति संदिग्ध हो जाती है। उन्होंने प्रतिपूरक वनीकरण के प्रस्ताव को पर्यावरणीय दृष्टि से अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि निकोबार जैसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्र की भरपाई भिन्न भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षारोपण से नहीं की जा सकती और यह पर्यावरणीय सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि गैलाथिया खाड़ी को पहले वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में परियोजना के लिए इसे अधिसूचना से हटाकर इसकी श्रेणी बदली गई।</p>
<p>आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि निकोबारी समुदाय ने परियोजना को लेकर चिंता जताई है और शोंपेन जैसे संवेदनशील समुदाय की सहमति की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों की प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई। परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठाते हुए श्री रमेश ने कहा कि प्रस्तावित हवाई अड्डे और परियोजना के अन्य दावे अव्यावहारिक प्रतीत होते हैं और इससे जुड़े कई व्यावहारिक प्रश्न अनुत्तरित हैं। उन्होंने पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और सूचना के अधिकार के तहत भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसे परियोजना से जोड़ना उचित नहीं है और इस पर संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 17:59:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अजमेर के जंगलों में 1–2 मई को वन्यजीव गणना, 85 से अधिक वाटर होल्स पर नजर</title>
                                    <description><![CDATA[अजमेर वन विभाग 1 और 2 मई को जिले के 85 से अधिक वॉटर होल्स पर वन्यजीव गणना आयोजित करेगा। यह गणना 24 घंटे चलेगी, जिसमें वन कर्मी पग-मार्क और प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर आंकड़े जुटाएंगे। पुष्कर, किशनगढ़ और नसीराबाद सहित सभी क्षेत्रों के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/wildlife-census-in-ajmer-forests-on-1-2-may-keeping-an/article-151553"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/111200-x-600-px)-(3)29.png" alt=""></a><br /><p>अजमेर। वन विभाग की ओर से एक व 2 मई को जिले के जंगलों में वन्य जीव गणना की जाएगी। यह गणना वॉटर होल्स पद्धति से होगी। जिले के जंगलों के 85 से अधिक वाटर होल्स पर यह गणना होगी। वन कार्मिक वॉटर्स होल्स पर पानी पीने के लिए आने वाले जीवों को देखकर उनकी संख्या निर्धारित प्रपत्रों में दर्ज करेंगे। साथ भी उनके पग मार्ग, मल मूत्र को भी गणना का आधार बनाएंगे। उपवन संरक्षक पी बालामुरुगन ने बताया कि गणना 1 मई को सुबह 8:00 बजे शुरू होकर 2 मई को सुबह 8:00 बजे संपन्न होगी। अजमेर सहित ब्यावर, नसीराबाद, किशनगढ़, सरवाड़ व पुष्कर के जंगलों में वाटर होल्स पर होने वाली गणना के लिए टीमों का गठन किया गया है। प्रत्येक टीम के कार्मिकों को गणना का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। गणना के दिन अधिकारियों की टीम वॉटर होल्स का औचक निरीक्षण भी करेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अजमेर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 15:15:08 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>वन्यजीव संरक्षण के लिए चीन ने तैयार की नयी आद्रभूमि संरक्षण व्यवस्था, इकोलॉजिकल प्रयासों को मिलेगा बढ़ावा </title>
                                    <description><![CDATA[बीजिंग ने तालाबों व दलदलों की सुरक्षा हेतु बहु-स्तरीय व्यवस्था लागू की, जिससे 83 प्रतिशत से अधिक आद्रभूमि संरक्षित होकर वन्यजीव विविधता को सुरक्षित आवास मिलेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/china-has-prepared-a-new-wetland-conservation-system-for-wildlife/article-141825"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(14)2.png" alt=""></a><br /><p>बीजिंग। चीन की राजधानी बीजिंग ने अपने तालाब और दलदल स्थलों की सुरक्षा के लिए एक बहु-स्तरित संरक्षण व्यवस्था तैयार की है, जिससे उसकी वन्यजीव आबादी को प्रमुख आवास मिलेगा। बीजिंग नगर पालिका वानिकी और उद्यान ब्यूरो ने सोमवार को बताया कि यह नयी व्यवस्था उसके 83.15 प्रतिशत तालाबों और दलदलों (आद्रभूमि) को संरक्षित करती है। ब्यूरो के अनुसार, यह नयी व्यवस्था वन्यजीव विविधता संरक्षण और दूसरे इकोलॉजिकल प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए बीजिंग के प्राकृतिक रिजर्व, आद्रभूमि पार्क और दूसरे छोटे संरक्षित आद्रभूमि इलाकों का इस्तेमाल करता है। </p>
<p>पिछले पांच वर्षों में बीजिंग ने आद्रभूमि संरक्षण को बेहतर बनाने का काम जारी रखा गया है। अब तक, नगर पालिका की 61,200 हेक्टेयर आद्रभूमि में 50 प्रतिशत से ज्यादा स्थानीय पौधों की प्रजातियां और 76 प्रतिशत स्थानीय जंगली जानवरों की प्रजातियां रहती हैं। बीजिंग के ये नये प्रयास आद्रभूमि संरक्षण और बहाली में चीन की बड़ी योजना का हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में, देश ने कानूनी सुरक्षा उपायों को मजबूत किया है और आद्रभूमि संरक्षण के लिए अपनी प्रबंधन व्यवस्था में सुधार किया है। राष्ट्रीय वानिकी एवं चारागाह प्राधिकरण ने कल कहा कि इसका कुल आद्रभूमि क्षेत्र अब एशिया में पहले और दुनिया में चौथे स्थान पर है। </p>
<p>प्राधिकरण ने कहा कि 15वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2026-2030) के दौरान, चीन आद्रभूमि के लिए अपने कानूनी और नियामक ढांचे में और सुधार करेगा, आद्रभूमि संरक्षण के लिए निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करेगा, और आद्रभूमि पारिस्थितिक उत्पादों के मूल्य को महसूस करने के लिए तंत्र स्थापित करने में तेजी लाएगा।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 17:23:13 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण संघर्ष समिति का खेजड़ी बचाओ महापड़ाव शुरू, हजारों लोगों ने खेजड़ी वृक्ष बचाने के लिए मजबूत कानून बनाने की भरी हुंकार</title>
                                    <description><![CDATA[बीकानेर में पॉलिटेक्निक ग्राउंड पर खेजड़ी बचाओ महापड़ाव शुरू हुआ। अवैध कटाई रोकने और सख्त कानून की मांग को लेकर हजारों लोग जुटे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bikaner/khejri-bachao-mahapadav-of-environment-sangharsh-samiti-started-thousands-of/article-141760"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)2.png" alt=""></a><br /><p>बीकानेर। शहर के पॉलिटेक्निक कॉलेज ग्राउंड में खेजड़ी बचाओ महापड़ाव सोमवार से शुरू हो गया है। मुकाम पीठाधीश्वर रामानन्द आचार्य ने कहा यह आंदोलन एक दिन का नहीं है, महापड़ाव आगे भी जारी रहेगा। पर्यावरण संघर्ष समिति का यह आंदोलन सोलर प्लांट कंपनियों की ओर से खेजड़ी और अन्य हरे पेड़ों की अवैध कटाई को रोकने और पेड़ों के संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाने की मांग को लेकर किया जा रहा है। हजारों लोगों ने सोमवार को बीकानेर में एक स्वर में कहा कि खेजड़ी को बचाने के कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। </p>
<p>महापड़ाव स्थल पर राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्टÑ और मध्य प्रदेश से आए लोग जुटे हैं, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं। राज्य वृक्ष खेजड़ी बचाने के लिए शुरू हुए महापड़ाव के समर्थन में स्थाीनीय व्यापारिक संगठनों ने भी सोमवार को बाजार बंद रखा। शहरी क्षेत्र के सरकारी और निजी स्कूलों में आधे दिन की छुट्टी घोषित की गई। शिव विधानसभा क्षेत्र से विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने कहा कि उन्होंने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था, लेकिन मांगे मनवाने के लिये सरकार को झुकाने के लिए बड़े आंदोलन करने की जरूरत है। यदि बीकानेर से लोग विधानसभा घेराव करना की बात करते हैं तो मैं उस आंदोलन में सबसे आगे रहूंगा। संगरिया विधायक अभिमन्यु पूनिया, कांग्रेस के नेता व पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल, भंवर सिंह भाटी, पूर्व विधायक महेंद्र बिश्नोई सहित अनेक जनप्रतिनिधि महापड़ाव में समर्थन देने पहुंचे। </p>
<p><strong>बजट सत्र में कानून आए</strong></p>
<p>आंदोलन कारी खेजड़ी बचाने के लिए मजबूत कानून लाने की मांग कर रहे हैं। महापड़ाव स्थल पर हजारों की संख्या में लोग पहुंच चुके हैं और उनके आने का क्रम रात तक जारी रहा। आंदोलनकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री से वार्ता हो चुकी है। हमारी मांग पर बजट सत्र में कानून आए इसका इंतजार है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बीकानेर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 12:56:26 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कॉर्बेट नेशनल पार्क में दिखा दुर्लभ और खूबसूरत पक्षी''लॉन्ग टेल मिनिवेट'',पक्षी प्रेमियों में उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[रामनगर के कॉर्बेट नेशनल पार्क में दुर्लभ लॉन्ग टेल मिनिवेट पक्षी देखा गया। इसकी मौजूदगी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित वन्य आवास का संकेत मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(10)3.png" alt=""></a><br /><p>रामनगर। उत्तराखंड के रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक बेहद आकर्षक और  दुर्लभ पक्षी ''लॉन्ग टेल मिनिवेट' देखा गया है, जिसने पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान खींचा है। वन्य जीव प्रेमी संजय छिम्वाल बताते हैं कि कॉर्बेट और इसके आसपास के जंगलों में अब तक करीब 600 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह क्षेत्र पक्षी अवलोकन के लिए बेहद खास माना जाता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो पक्षी देखा गया है, वह लॉन्ग टेल मिनिवेट है, जो अपनी खूबसूरती और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है।</p>
<p>संजय के अनुसार लॉन्ग टेल मिनिवेट आमतौर पर पेड़ों की ऊँची चोटियों पर रहना पसंद करता है और जमीन पर बहुत कम उतरता है। इसका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े होते हैं, जिससे यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि इस पक्षी में सेक्सुअल डाइमॉफरजिम स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, यानी नर और मादा के रंग-रूप में फर्क होता है। नर लॉन्ग टेल मिनिवेट चटक लाल रंग का होता है, जबकि मादा हल्के पीले-हरे रंग की दिखाई देती है। आमतौर पर पक्षियों में नर का रंग ज्यादा चमकीला होता है, ताकि वह मादा को आकर्षित कर सके, और यही विशेषता इस पक्षी में भी देखने को मिलती है।</p>
<p>संजय ने आगे बताया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई पक्षी दुर्लभ श्रेणी में आते हैं, जिनकी विशेष सूची (वॉचर लिस्ट) तैयार की जाती है। इस सूची में हॉर्नबिल, बार्बेट और वुडपेकर जैसे पक्षियों के साथ-साथ मिनिवेट भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे पक्षियों का दिखना इस बात का संकेत है कि कॉर्बेट का जंगल आज भी जैव विविधता के लिए सुरक्षित और समृद्ध है। कॉर्बेट में लॉन्ग टेल मिनिवेट का दिखना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:55:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>एक साल में बढ़ी 3500 से ज्यादा देसी विदेशी परिंदों की संख्या,ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका पर बढ़ रहे शोध</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष की जनवरी के मुकाबले इस वर्ष सेंसेस में काउंट हुए 300 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-number-of-native-and-migratory-birds-increased-by-more-than-3500-in-one-year--research-on-the-role-of-birds-in-the-ecosystem-is-increasing/article-141087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/3322.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा के वेटलैंड्स अब सिर्फ जलस्रोत ही नहीं, बल्कि पक्षी संरक्षण और जैव विविधता की पहचान बन रहे हैं। मिड विंटर वाटर फोल पॉपुलेशन एस्टिमेशन के तहत जनवरी 2025 और जनवरी 2026 के तुलनात्मक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड (तालाब) पर एक साल में ही 3500 से ज्यादा देसी - विदेशी परिंदों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी न सिर्फ पर्यावरण के लिए शुभ संकेत है, बल्कि कोटा को पक्षी अनुसंधान के नए केंद्र के रूप में भी स्थापित कर रही है।</p>
<p><strong>एक साल में ही 8000 से 11,500 बढ़ी पक्षियों की संख्या</strong><br />शहर के तीन प्रमुख वेटलैंड उम्मेदगंज पक्षी विहार,अभेड़ा व जोहरा बाई का तालाब पर जनवरी 2025 में हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टमिशन हुआ था। जिसमें यहां 150 प्रजातियों के 8000 देसी विदेशी पक्षी काउंट हुए थे। जबकि, इस वर्ष 17 व 18 जनवरी को हुए सेंसस में 300 से ज्यादा प्रजातियों के 11,500 परिंदे काउंट हुए हैं, जो पिछले वर्ष की अपेक्षा उल्लेखनीय बढ़ोतरी है। इनमें स्थानीय प्रजातियों के साथ-साथ साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से आने वाले प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।</p>
<p><strong>अनुसंधान का केंद्र बने शहरी वेटलैंड</strong><br />शहर के वेटलैंड अनुसंधान का केंद्र बन रहे हैं। दुनियाभर से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आ रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से शहरी सीमा के वेटलैंड्स को पक्षियों के अनुकूल हैबीटाट के रूप में विकसित किए गए हैं। इसी का नतीजा है कि पिछले दिनों हुई गणना में विभिन्न 345 प्रजातियों के 11500 पक्षी काउंट किए गए। जबकि, यह संख्या मात्र उम्मेदगंज पक्षी विहार सहित तीन वेटलैंड की है। जबकि, शहरी क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक वेटलैंड हैं। जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का प्रवास रहता है।</p>
<p><strong>परिदों की पसंद बना अभेडा तालाब, 7000 पक्षियों का बसेरा</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के अधीन अभेडा तालाब तालाब पक्षियों की पहली पसंद बना हुआ है। गत 18 जनवरी को हुए मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन सेंसस में यहां 135 प्रजातियों के 7000 पक्षी काउंट हुए हैं। वहीं जोहरा बाई का तालाब में 70 प्रजातियों के 1500 परिंदे काउंट हुए हैं। जबकि वर्ष 2025 में इन दोनों जगहों से लगभग चार हजार से ज्यादा पक्षी नजर आए थे।</p>
<p><strong>इस बार उम्मेदगंज में पक्षियों की 50 प्रजाती ज्यादा बढ़ी</strong><br />उम्मेदगंज पक्षी विहार में गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष पक्षियों की 50 प्रजाति ज्यादा बढ़ी है। पिछले साल यहां 90 प्रजातियों के 3000 पक्षी काउंट किए गए थे जबकि इस वर्ष 18 जनवरी को 140 प्रजातियों के 3000 से ज्यादा पक्षी मिले हैं । इसकी मुख्य वजह वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट की ओर से करवाए डवलपमेंट कार्य हैं। अवैध फिशिंग, अतिक्रमण व संदिग्ध घुसपैठ पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाए जाना है। साथ ही पेड़ों की अवैध कटाई रुकने से पक्षियों का हैबीटाट न केवल सुरक्षित हुआ बल्कि भोजन की भी पर्याप्त उपलब्धता हो गई। पक्षियों के लिए तालाब में पर्याप्त मछलियां होने व अवैध गतिविधियां थमने से परिंदों का कुनबा आबाद हो गया।</p>
<p><strong>यह वेटलैंड बन रहे बर्ड्स वॉचिंग का डेस्टिनेशन</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर कहते हैं, उम्मेदगंज पक्षी विहार, अभेड़ा तालाब, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, सालकिया व जोहराबाई का तालाब, किशोर सागर, गैपरानाथ, गरड़िया महादेव सहित शहर के विभिन्न वेटलैंड वर्ड वॉचिंग का डेस्टिनेशन बन चुके हैं। यहां की फिजा विभिन्न प्रजातियों के देसी-विदेशी पक्षियों की चहचहाट से गुलजार रहती है। कोटा विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों व कई शिक्षण संस्थानों से विद्यार्थी और स्कॉलर्स ईको सिस्टम में पक्षियों की भूमिका, उनके व्यवहार, हैबीटाट, विशेषताएं, सिमटते वनों व वेटलैंड से पक्षियों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर पर शोध कर रहे हैं।</p>
<p><strong>यह पक्षी आए नजर</strong><br />वन्य जीव विभाग के सहायक वन संरक्षक पंकज कुमार ने बताया कि मिड विंटर वॉटर फॉल सेंसस के तहत जोहराबाई तालाब पर अच्छी तादाद में बार हेडेड गूज नजर आए है । गणना में लगभग 70 प्रजातियों के 1500 पक्षी देखे गए वही, अभेडा तालाब में 135 प्रजातियों के लगभग 7000 पक्षी देखे गए। पक्षी गणना में बार हेडेड गूज, ग्रे लेग गूज, नॉर्दन सावलर, गेडवेल, वुड सेंड पाइपर, ग्रीन सेंड पाइपर, स्पून बिल, मार्स हैरियर, कॉमन स्टर्लिंग, रोजी स्टर्लिंग, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर ,कॉटन पिग्मी गीज, व्हाइट आई, बजार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, इंपीरियल ईगल, ब्लू थ्रोट, स्केली ब्रेस्टड मुनिया, रेड मुनिया, क्रेस्टेड लार्क, कॉमरेंट, ई ग्रेट, सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए। वहीं उम्मीदगंज में 140 प्रजातियों के लगभग 3000 पक्षी नजर आए । जिसमें कॉमन पोचार्ड, टफ्टेड पोचार्ड, ग्रीन सेंक, रेड सेंक, व्हाइट वेगटेल, कैनरी फ्लाई केचर, लिटिल रिंग फ्लोवर , मार्स हैरियर, बजार्ड, भुटेड़ ईगल सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी नजर आए।</p>
<p><strong>यूरोप से कजाकिस्तान से आते हैं पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर ए एच जेडी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर इन दिनों देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, उद्पुरिया, बरधा डेम, गिरधरपुरा, बोराबांस का तालाब, सोखिया तालाब, किशोर सागर तालाब, उम्मेदगंज, अभेड़ा सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। यह पक्षी यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, हिमालय, उत्तरी अमेरिका, यूरोपियन व एशियाई देशों से आते हैं। उन्होंने बताया कि सर्दी के मौसम में हिमालय पार से विदेशी पक्षी माइग्रेशन में फीडिंग और ब्रीडिंग के लिए यहां आते है तथा सर्दी के बाद यथास्थान के लिए रवाना हो जाते है।</p>
<p>आर्दभूमि (वेटलैंड) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जीव जंतुओं के आवास होते हैं। प्रवासी पक्षियों के भी रहने के अनुकूल होते हैं। इनके लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र से ईको सिस्टम को नुकसान हो सकता है। इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है। इस बार तीनों वेटलैंड पर पिछले पिछले साल के मुकाबले इस साल 3500 से ज्यादा पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। हाल ही में हुए सेंसस में कुल 345 प्रजातियों के 11 हजार 500 बर्ड्स काउंट हुए हैं। उम्मीदगंज पक्षी विहार में अतिक्रमण, संदिग्ध घुसपैठ और अवैध फिशिंग रोकी है। जिससे पक्षियों को पर्याप्त भोजन मिलने लगा है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वाइल्ड लाइफ कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 16:30:04 +0530</pubDate>
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                <title>अरावली विवाद: पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने सीजेआई और राष्ट्रपति को लिखा पत्र, उठाए गंभीर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[वकील और पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने भारत के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट से अरावली के बारे में अपने फैसले पर फिर से विचार करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब सिर्फ़ वही ज़मीनें जो स्थानीय ज़मीन से 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंची हैं, उन्हें ही "अरावली" माना जाएगा - जिससे विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/aravalli-dispute-environmental-activist-hitendra-gandhi-writes-letter-to-cji/article-136841"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/aravalli-hiss-dispute.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर देशभर में बहस तेज हो गई है। वकील और पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। यह पत्र भारत के राष्ट्रपति को भी भेजा गया है। गांधी ने चेतावनी दी है कि ऊंचाई पर आधारित अरावली की संकीर्ण परिभाषा उत्तर-पश्चिम भारत में पर्यावरण संरक्षण को गंभीर रूप से कमजोर कर सकती है।</p>
<p>गौरतलब है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब केवल वही भूमि “अरावली” मानी जाएगी, जो अपने आसपास की स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हो। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों और पर्यावरणविदों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिभाषा से अरावली रेंज के करीब 90 प्रतिशत हिस्से को कानूनी संरक्षण से बाहर किया जा सकता है।</p>
<p>पर्यावरणविदों ने आशंका जताई है कि इससे खनन गतिविधियों, रियल एस्टेट परियोजनाओं और अवैध कब्जों को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे क्षेत्र में अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति होगी। अरावली को मरुस्थलीकरण रोकने, भूजल रिचार्ज बढ़ाने और प्रदूषण से राहत दिलाने वाली प्राकृतिक ढाल माना जाता है। यदि इसकी सुरक्षा कमजोर हुई, तो पानी की कमी, जैव विविधता के नुकसान और बढ़ते प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है।</p>
<p>अपने पत्र में हितेंद्र गांधी ने 20 नवंबर को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अरावली प्रणाली को एक पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल के रूप में पहचानने की दिशा में “महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य कदम” बताया। हालांकि, उन्होंने आदेश में अपनाई गई ऑपरेशनल परिभाषा पर गहरी चिंता जताई। गांधी का कहना है कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक की स्थानीय ऊंचाई को मानदंड बनाना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अपर्याप्त है।</p>
<p>उन्होंने तर्क दिया कि अरावली परिदृश्य के कई ऐसे हिस्से हैं जो ऊंचाई की इस संख्यात्मक सीमा को पूरा नहीं करते, लेकिन फिर भी पारिस्थितिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों को बाहर करने से पूरी अरावली प्रणाली की कार्यक्षमता और संरक्षण उद्देश्य को नुकसान पहुंच सकता है। गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह व्यापक पारिस्थितिक मानकों के आधार पर अरावली की परिभाषा पर पुनर्विचार करे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Dec 2025 17:59:22 +0530</pubDate>
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