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                <title>mukundra - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>मुकुंदरा और शेरगढ़ के जंगलों में आबाद हो रही उल्लुओं की दुनिया</title>
                                    <description><![CDATA[गराड़िया से गैपरनाथ तक चंबल की कराइयों में पर्यटकों को दिखाई दे रहे उल्लूओं के बच्चे।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-of-owls-flourishes-in-the-forests-of-mukundra-and-shergarh/article-148715"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/122200-x-60-px)-(2).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रात का सन्नाटा, पेड़ों की ऊंची डालियां और चट्टानों की दरारों में चमकती आंखें, यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि कोटा के जंगलों उल्लुओं की मौजूदगी का संकेत है। एक समय लोगों की नजरों से दूर रहने वाला आउल अब मुकुंदरा और शेरगढ़ के जंगलों में अच्छी संख्या में दिखाई देने लगे हैं। खास बात यह है कि अब चंबल सफारी करने वाले पर्यटकों को गरड़िया से गैपरनाथ तक चंबल की कराइयों में उल्लुओं के बच्चे भी नजर आ रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि यहां का जंगल इन पक्षियों के लिए सुरक्षित घर बनता जा रहा है। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व, भैंसरोडगढ़ और शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के जंगलों में इन दिनों उल्लुओं की दुनिया आबाद हो रही है। कालीसिंध-गागरोन क्षेत्र से लेकर चंबल नदी की कराइयों तक इनकी दुनिया फल-फूल रही है। </p>
<p><strong>अब तक नहीं हुआ उल्लुओं का सर्वे</strong><br />वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, उल्लू शिकारी पक्षी होता है, ईको सिस्टम में इसकी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि, इनकी वास्तविक संख्या का आंकड़ा वन विभाग के पास भी नहीं है, क्योंकि अब तक इनका सर्वे नहीं करवाया गया। लेकिन, फोरेस्ट अधिकारी व वाइल्ड लाइफर द्वारा इनकी संख्या अच्छी मात्रा में बताई जाती है। मुकुंदरा की कोलीपुरा रेंज में मोटल वुड प्रजाति का ऑउल पाया जाता है, जो काफी रेयर होता है।</p>
<p><strong>मुकुंदरा में 6 प्रजाति के आउल</strong><br />बायोलॉजिस्ट उर्वशी शर्मा बताती हैं, कालीसिंध-गागरोन से चंबल की कराइयों तक मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में उल्लूओं की 6 प्रजाति पाई जाती है। जिनमें इंडियन इगल ओवल, स्पोट्रेड ओवल, ब्राउन फिश ओउल, डस्की इगल ओवल, इंडियन स्कूप ओठल, बान ओवल शामिल हैं। उल्लूओं की कोई भी प्रजाति कॉमन नहीं है, यह सभी संकटग्रस्त हैं। गागरोन, जवाहर सागर, चंबल घड़ियाल सेंचुरी, भैंसरोडगढ़ व शेरगढ़ की कराइयों में उल्लूओं की आबादी पनप रही है।  </p>
<p><strong>270 डिग्री तक घुमा सकता है गर्दन</strong><br />उल्लू अपनी गर्दन को लगभग 270 डिग्री तक घुमा सकता हैं। साथ ही इस पक्षी की रात में देखने की क्षमता अन्य पक्षियों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती है। साथ ही इनकी सुनने की शक्ति भी काफी तेज होती है। ईको सिस्टम में इनका अहम योगदान है। यह कीट, पतंगे, चूहे खाकर इंसानों को बीमारियों से बचाते हैं। चूहे खेतों में घुसकर फसले बर्बाद करते हैं, ऐसे में चूहों का शिकार करने से यह किसान मित्र भी कहलाते हैं।</p>
<p><strong>चोटिल ऑउल का रेस्क्यू कर करा रहे इलाज</strong><br />बायोलॉजिस्ट उर्वशी ने बताया कि ट्यूरिस्ट को चंबल सफारी कराने के दौरान नदी किनारे जंगल को वॉच करते हैं। कोटा से गरड़िया महादेव और गैपरनाथ तक ऑउल के बच्चे नजर आते हैं। कई बार उड़ने की कोशिश में वह चट्टानों पर गिरकर घायल हो जाते हैं। गत वर्ष करीब 4 बेबी ऑउल घायल अवस्था में मिले थे, जिनका नयापुरा स्थित चिड़ियाघर में इलाज करवाया। ठीक होने के बाद वन्यजीव विभाग ने उसे उनके हैबीटाट में रिलीज कर किया। चंबल सफारी के दौरान उर्वशी अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक घायल उल्लुओं की जान बचा चुकी है।</p>
<p><strong>जन्म के डेढ़ माह बाद देख पाते हैं बेबी ऑउल</strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर बताते हैं, एक मेटिंग सीजन में मादा उल्लू करीब 15 अंडे देती है। जन्म के करीब डेढ़ माह बाद यह देख पाते हैं। जब उल्लू के बच्चे का जन्म होता है तो माता-पिता अपने बच्चों को खाना खिलाते हैं और उन्हें सीने से लगाकर गर्म रखते हैं। बच्चे करीब 1 साल तक माता-पिता के साथ रहते हैं।</p>
<p><strong>कोलीपुरा में दुर्लभ प्रजाति का मोटलवुड ऑउल</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, कोलीपुरा में दुर्लभ प्रजाति का मोटलवुड ओवल पाया जाता है। यह अपना घौंसला पेड़ों के अंदर हॉल करके बनाता है। मुकुंदरा के कोर एरिया कोलीपुरा के जंगलों में डायन का टोला व शिवकुडी इलाके में अच्छी संख्या में पाया जाता है। इसके अलावा अन्य ऑउल खण्हर बिल्डिंग, वीरान घरों में घौंसला बनाते हैं।</p>
<p><strong>रेडियो तरंगों से लगाता है शिकार का पता</strong><br />मुकुंदरा, भैंसरोडगढ़, शेरगढ़ में उल्लू अच्छी संख्या में आबाद हो रहे हैं। यह अपने शिकार का पता लगाने के लिए रेडियो तरंगे छोड़ता है, जो शिकार से टकराकर वापस आती है। इससे यह शिकार की वास्तिविक लॉकेशन को ट्रैस कर लेते हैं और एक ही निशाने में शिकार को दबोच लेते हैं। खास बात यह है, उल्लू के पंजे शिकार पकड़ने पर इंटरलॉक हो जाते हैं। इनकी उम्र 5 से 12 साल होती है। जब बच्चे अंडे से बाहर निकलते हैं तो वह गुलाबी रंग के होते हैं और एक माह तक अंधे रहते हैं। वह अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार होते हैं। उल्लू के दांत नहीं होते हैं, इसलिए सांप की तरह शिकार को निगलते हैं। बच्चे एक साल तक मां-बाप के साथ रहते हैं और 2 से 3 साल की उम्र में परिवार से अलग हो जाते हैं। चंबल के इलाकों से कई उल्लू रेस्क्यू होकर आते हैं, जिनका इलाज करवाकर वापस उनके हैबीटाट में छोड़ देते हैं। यह शेड्यूल वन का एनिमल है, लेकिन अभी तक इसका सर्वे नहीं हुआ है। हालांकि, वर्तमान में इनका सर्वे किए जाने की जरूरत है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 14:45:10 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जंगल सफारी के लिए मुकुंदरा को 50 लाख का बजट, अब शहर में ही मिलेगा जंगल सफारी का रोमांच</title>
                                    <description><![CDATA[ बोराबास के जंगलों में बनेगा 16 किमी लंबा सफारी रूट, 25 फीट ऊंचा बनेगा सफारी गेट, वन्यजीवों की होगी साइटिंग।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundra-receives-a-budget-of-50-lakh-rupees-for-a-jungle-safari--the-thrill-of-a-jungle-safari-will-now-be-available-within-the-city/article-145817"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/200-x-60-px)-(3)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में सफारी की हसरत पाले शहरवासियों के लिए खुश खबर है। जल्द ही शहर से सटे घने जंगलों में जंगल सफारी का रोमांच अनुभव किया जा सकेगा। मुकुंदरा की बोराबास रेंज में 16 किलोमीटर लंबा नया सफारी रूट विकसित किया जा रहा है। इसके लिए नगर विकास प्राधिकरण (केडीए) ने 50 लाख रुपए का बजट जारी किया है, जिससे यहां पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। इस पहल से न केवल शहरवासियों को 70 किलोमीटर दूर दरा अभयारण्य जाने की परेशानी से राहत मिलेगी, बल्कि कोटा की ऐतिहासिक विरासत, चंबल घाटियों और वन्यजीवों के अद्भुत नजारों के साथ वाइल्ड लाइफ ट्यूरिज्म को भी नई पहचान मिलेगी।</p>
<p><strong>अब नहीं लगाने पड़ेंगे 140 किमी के चक्कर</strong><br />वर्तमान में मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी केवल दरा अभयारण्य की रेंज में होती है। वहां जाने के लिए कोटा शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर कनवास जाना पड़ता है। एक ही जिप्सी होने के कारण कई बार पर्यटकों को बुकिंग नहीं मिलती और उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है। ऐसे में आने-जाने में करीब 140 किलोमीटर का चक्कर काटना पड़ जाता है। ऐसे में लंबे समय से शहर से सटे बोराबास के जंगलों में ही सफारी शुरू करने की मांग की जा रही थी, लेकिन बजट की कमी के कारण यहां जरूरी सुविधाएं विकसित नहीं हो पा रही थीं। अब केडीए द्वारा बजट मिलने के बाद यहां काम शुरू कर दिया गया है। जिससे सफारी रूट डवलप करना, साइन बोर्ड, चंबल के किनारे सुरक्षा रेलिंग, पब्लिक सुविधाएं, सेल्फी प्वाइंट, पर्यटकों के बैठने के लिए झौंपे बनवाए जाएंगे। इनमें सफारी रूट का काम भी शुरू करवा दिया है। वहीं, 12 लाख की लागत से 25 फीट उंचा सफारी गेट बनवाने का आॅर्डर भी दे दिया गया है।</p>
<p><strong>कोटा की जन्मस्थली कोट्या भील फोर्ट से होंगे रूबरू</strong><br />बोराबास में सफारी शुरू होने से पर्यटकों को कोटा की जन्मस्थली माने जाने वाले ऐतिहासिक कोट्या भील फोर्ट देखने का मौका भी मिलेगा। घने जंगलों के बीच स्थित यह सदियों पुराना किला पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण होगा। सफारी के दौरान पर्यटक चंबल नदी का विहंगम नजारा, गहरी घाटियां, कराईयां, पहाड़ियों और हरियाली से घिरे जंगलों के बीच प्रकृति के अनूठे नजारों का आनंद ले सकेंगे।</p>
<p><strong>30 फीट ऊंचे वॉच टावर से दिखेगा चंबल हैंगिंग ब्रिज का विहंगम नजारा</strong><br />क्षेत्रीय वन अधिकारी राजपाल शर्मा के अनुसार, सफारी रूट पर करीब 30 फीट ऊंचा दो मंजिला वॉच टावर बनाया जाएगा। यहां से पर्यटक चंबल हैंगिंग ब्रिज, भंवरकुंज और न्यू गरड़िया प्वाइंट का शानदार दृश्य देख सकेंगे। फिलहाल सफारी रूट पर मिट्टी और मुर्रम डालकर रास्तों को समतल किया जा रहा है तथा जगह-जगह साइन बोर्ड लगाए जा रहे हैं। अन्य जरूरी विकास कार्य भी तेजी से किए जा रहे हैं।</p>
<p><strong>सफारी के रूट में यह मिलेंगे व्यू प्वाइंट</strong><br />शर्मा ने बताया कि 16 किमी लंबे सफारी रूट में पर्यटकों को कोट्या भील फोर्ट, न्यू चंबल प्वाइंट, न्यू गरड़िया प्वाइंट, भंवरकुंज, अकेलगढ़ फोर्ट, चंबल किनारे दो मंजिला वॉच टावर, सेल्फी प्वाइंट, प्रकृति का विहंग्म नजारा, वन्यजीवों की साइटिंग सहित प्रकृति के अदभूत नजारें देखने को मिलेंगे।</p>
<p><strong>यह रहेगा 16 किमी का सफारी रुट्स</strong><br />क्षेत्रीय वन अधिकारी के अनुसार, दौलतगंज स्थित डायवर्जन चैनल के पास चौकी से सफारी के लिए पर्यटकों को एंट्री मिलेगी। यहां से चंबल नदी के किनारे कोटिया भील महल, चंबल व्यू प्वाइंट, गरड़िया व्यू प्वाइंट होते हुए रथकांकरा तक रुट रहेगा। यह रुट्स गत वर्ष अक्टूबर माह में ही तय किया गया था। जल्द ही सफारी शुरू किए जाने की तैयारी है।</p>
<p><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व की बोराबास रेंज का जंगल घना है, यहां सभी तरह के शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों का नेचुरल हैबिटेट है। यहां पर जल्दी ही सफारी शुरू किया जाना है। यहां आवश्यक सुविधाएं विकसित किए जाने के लिए नगर विकास प्राधिकरण से 50 लाख रुपए का बजट मिला है। जिससे डेवलपमेंट कार्य शुरू करवा दिया गया है।<br /><strong>- सुगनाराम जाट, मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 14:31:07 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का - मुकुंदरा में री-वाइल्डिंग की बड़ी छलांग - बाघिन एमटी- 7 अब 5 से 21 हेक्टेयर एनक्लोजर में शिफ्ट</title>
                                    <description><![CDATA[रेडियो-कॉलरिंग के बाद विस्तृत वन क्षेत्र में छोड़ा,  हर मूवमेंट पर होगी नजर,नवज्योति की खबरों के बाद चेता वन विभाग तो बाघिन को मिली आजादी की राह ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news--a-major-leap-forward-in-mukundra-s-rewilding-efforts---tigress-mt-7-now-shifted-from-a-5-hectare-enclosure-to-a-21-hectare-enclosure/article-144257"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/mukundra.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रणथंभोर में कभी मां को खोकर असहाय हुई मासूम शावक आज आत्मविश्वास से भरी युवा बाघिन बन चुकी है। संघर्ष से संकल्प तक की कहानी लिख रही बाघिन एमटी- 7 ने मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में री-वाइल्डिंग की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए बड़े एनक्लोजर में प्रवेश कर लिया है। एमटी- 7 अब आजादी की राह पर और आगे बढ़ गई है। वैज्ञानिक निगरानी और सख्त प्रोटोकॉल के बीच शनिवार को उसे 5 हेक्टेयर से 21 हेक्टेयर के बड़े एनक्लोजर में शिफ्ट कर दिया गया। यह सिर्फ स्थानांतरण नहीं, बल्कि खुले जंगल में उसकी स्वाभाविक वापसी की मजबूत दस्तक है।</p>
<p>दरअसल, मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में एक साल से चल रही री-वाइल्डिंग प्रक्रिया के तहत बाघिन को विशेषज्ञों की निगरानी में रेडियो कलरिंग के बाद 5 हेक्टेयर के एनक्लोजर से निकाल 21 हेक्टेयर के बड़े एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया। यह कदम बाघ संरक्षण और वैज्ञानिक पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p><strong>अब खुले जंगल से एक कदम दूर</strong></p>
<p>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक व फील्ड डायरेक्टर सुगनाराम जाट का कहना है कि बाघिन एमटी- 7 निर्धारित टारगेट से दो गुना यानी 100 से ज्यादा शिकार कर चुकी है। वह शिकार करने की कला में निपूर्ण हो चुकी है। ऐसे में जंगल की चुनौतियों व संघर्ष के बीच खुद को ढाल सके, इसके लिए विचरण क्षेत्र बढ़ाना आवश्यक था। एनटीसीए की परमिशन के बाद मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (सीडब्लूएलडब्ल्यू) से अनुमति मिलने पर शनिवार शाम विशेषज्ञों की निगरानी में बाघिन को चार गुना बड़े एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया। अब रेडियो कॉलर के माध्यम से बाघिन के हर एक मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है। रिवाल्डिंग को लेकर एनटीसीए के प्रोटोकॉल पूरे होने पर टाइग्रेस को खुले जंगल में रिलीज कर दिया जाएगा। <br /> <br /><strong>मां को खोने के बाद शुरू हुआ संघर्ष</strong></p>
<p>रणथंभोर की बाघिन टी - 114 की मौत के बाद 31 जनवरी 2023 को बाघिन एमटी- 7 को शावक अवस्था में कोटा लाया गया था। तब उसकी उम्र महज ढाई माह थी। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में उसकी परवरिश की गई। यहां करीब 22 माह तक नियंत्रित वातावरण में री-वाइल्डिंग की गई। जीवित शिकार के जरिए उसमें शिकार करने की कला विकसित की गई। इसके बाद 2 वर्ष की उम्र के पूरी करने के बाद दिसंबर 2024 को मुकुन्दरा के 5 हेक्टेयर री-वाइल्डिंग एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया। पिछले 14 महीनों में उसने सफल शिकार, स्वाभाविक व्यवहार और बेहतर अनुकूलन क्षमता का प्रदर्शन किया।</p>
<p><strong>एनटीसीए की हरी झंडी के बाद बढ़ा कदम</strong></p>
<p>सीसीएफ जाट ने बताया कि री-वाइल्डिंग प्रक्रिया का मूल्यांकन करने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की विशेषज्ञ टीम ने मुकुन्दरा आकर बाघिन के व्यवहार, शिकार क्षमता और स्वास्थ्य परीक्षण का निरीक्षण किया। संतोषजनक रिपोर्ट के आधार पर चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने की अनुमति दी गई।इसी क्रम में पहले चरण में उसे 5 हेक्टेयर से 21 हेक्टेयर के बड़े एनक्लोजर में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया।</p>
<p><strong>रेडियो-कॉलरिंग के बाद नई शुरूआत</strong></p>
<p>मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की अनुमति के बाद गठित विशेषज्ञ दल जिसमें फील्ड अधिकारी, पशु चिकित्सक और वन्यजीव जीवविज्ञानी शामिल थे, उन्होंने शनिवार शाम 5:30 बजे बाघिन को ट्रैंक्वलाइज किया।रेडियो कॉलर लगाने के साथ उसके स्वास्थ्य संबंधी सभी मानक दर्ज किए गए। इसके बाद उसे 21 हेक्टेयर के एनक्लोजर में छोड़ दिया गया, जहां उसकी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।</p>
<p><strong>अंतिम लक्ष्य: खुले जंगल में स्वतंत्र विचरण</strong></p>
<p>वन विभाग के अनुसार, भविष्य में बाघिन को खुले प्राकृतिक वन क्षेत्र में छोड़े जाने का अंतिम निर्णय उसके व्यवहार, प्रदर्शन और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर लिया जाएगा। यह पूरी कार्यवाही वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है और बाघ संरक्षण की दिशा में एक प्रेरक पहल मानी जा रही है।</p>
<p><strong> इसलिए खास है यह कदम </strong></p>
<p>अनाथ शावक को सफलतापूर्वक जंगल जीवन के लिए तैयार करना, चरणबद्ध री-वाइल्डिंग का वैज्ञानिक मॉडल,रेडियो-कॉलरिंग से सतत निगरानी और सुरक्षा,<br />मुकुन्दरा में बाघों की स्थायी उपस्थिति की दिशा में मजबूत प्रयास मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में एमटी -7 की यह नई शुरूआत न सिर्फ वन विभाग की प्रतिबद्धता को दशार्ती है, बल्कि यह उम्मीद भी जगाती है कि आने वाले समय में वह स्वतंत्र रूप से खुले जंगल की रानी बनकर विचरण करेगी।</p>
<p><strong>नवज्योति बनी आवाज तो आजादी की मंजिल हुई आसान</strong></p>
<p>बाघिन एमटी-7 को री- वाइल्डिंग के नाम पर 14 माह से 5 हेक्टेयर एनक्लोजर में रखा जा रहा था। यह क्षेत्र बाघिन के विचरण के लिहाज से छोटा था। जहां वह टेरिटरी बनाना, शिकार के लिए एक ही तरह के जानवरों की उपलब्धता होने से खुले जंगल में अलग अलग जानवरों का शिकार करने और वास्तविक चुनौतियों से निपटने के गुण विकसित होने के उद्देश्य पूरे नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित कर अधिकारियों का ध्यान इस और आकर्षित किया। इसके बाद वन विभाग ने बाघिन को 5 से 21 हेक्टेयर के वन क्षेत्र में रिलीज करने का निर्णय लिया।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 14:47:28 +0530</pubDate>
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                <title>30 लाख का एनक्लोजर तैयार, लेकिन बांधवगढ़ में बाघिन चिन्हित नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश में पिछले एक हफ्ते से टाइग्रेस की खोज जारी, फिर भी हाथ खाली।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/enclosure-worth-30-lakhs-ready-ban-enclosure-worth-30-lakh-rupees-is-ready--but-the-tigress-has-not-been-identified-in-bandhavgarhut-tigress-not-identified-in/article-144255"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/30-lack-kota.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। इंटरस्टेट टाइगर रीलोकेशन के तहत मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ से बाघिन लाने के लिए मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में 30 लाख की लागत से सॉफ्ट एनक्लोजर बनाकर तैयार कर लिया गया है। यह एनक्लोजर राउठा रेंज में एक हेक्टेयर में बनाया गया है।मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक और फील्ड डायरेक्टर सुगनाराम जाट का कहना है कि पिछले सप्ताह ही जामरा वैली में एनक्लोजर का निर्माण कार्य पूरा किया गया है। चारों ओर फेंसिंग की गई है। अंदर वाटर पॉइंट भी बनाया गया है। वहीं बाघिन की निगरानी के लिए दो मंजिला वॉच टावर बनाया गया है। पूरे एनक्लोजर को ग्रीन नेट से कवर किया गया है।</p>
<p><strong>दो मंजिला वॉच टावर बनाया, हर मूवमेंट पर होगी नजर</strong></p>
<p>मुकुंदरा में 30 लाख की लागत से तैयार किया गया एनक्लोजर के पास ही दो मंजिला वॉच टावर बनाया गया है। बाघिन को यहां शिफ्ट किए जाने के बाद वनकर्मियों द्वारा वॉच टावर से टाइग्रेस के हर मूवमेंट पर नजर रखी जाएगी। साथ ही आठ - आठ घंटे के अंतराल में डीएफओ कार्यालय में बने कंट्रोल रूम पर रिपोर्ट देनी होगी। बाघिन शिफ्टिंग से पहले विभाग प्रेबेस लाने की भी तैयारी की जा रही है।</p>
<p><strong>8 दिन से तलाश जारी फिर भी हाथ खाली</strong></p>
<p>सीसीएफ जाट ने बताया कि मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व प्रशासन पिछले आठ दिन से मुकुंदरा के लिए बाघिन सर्च कर रहे हैं लेकिन अब तक टाइग्रेस चिन्हित नहीं हुई है। सुबह छह बजे से शाम तक बाघिन को खोजा जा रहा है। टाइग्रेस को चिन्हित करने के बाद ही कोटा से टीम बांधवगढ़ के लिए रवाना होगी। स्थानीय स्तर पर तैयारियां पूरी कर ली गई है। मुकुंदरा से बांधवगढ़ की दूरी करीब सात सौ किमी है। ऐसे में सड़क मार्ग से टाइगर को शिफ्ट करने में 12 घंटे से ज्यादा का समय लग सकता है। ऐसे में हवाई मार्ग मुफीद रहता है, लेकिन रात के समय कोटा में लैंडिंग की सुविधा नहीं है, इसीलिए सड़क मार्ग का भी आॅप्शन भी रखा गया है। टाइगर ट्रांसलोकेशन में समय काफी मायने रखता है। बाघिन किस समय ट्रेंकुलाइज होती है, उससे ही तय होगा कि हवाई या सड़क मार्ग से आएगी।</p>
<p><strong>महाराष्ट्र से भी आएगी दो बाघिन</strong></p>
<p>उन्होंने बताया कि इंटर स्टेट टाइगर रीलोकेशन प्रोजेक्ट करीब 1 साल तक चल सकता है। इसमें पहली बाघिन को बीते साल दिसंबर में बूंदी के रामगढ़ टाइगर रिजर्व लाया गया था। अब फरवरी माह में कोटा के मुकुंदरा में बांधवगढ़ से एक बाघिन को लाई जानी है। इसके बाद मध्य प्रदेश के कान्हा रिजर्व से एक और बाघिन को बूंदी शिफ्ट किया जाएगा। इसके बाद दो बाघिनों को महाराष्ट्र से लेकर आना है। जिनमें ताडोबा-अंधेरी और पेंच महाराष्ट्र टाइगर रिजर्व से लाया जाना है। ऐसे में यह पूरा प्रोजेक्ट करीब एक साल तक चल सकता है।</p>
<p><strong>जेनेटिक बीमारियां से मिलेगी निजात</strong></p>
<p>इधर, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के अधिकारियों का कहना है कि जीन पूल में सुधार के लिए यह प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। राजस्थान में मौजूद अधिकांश बाघ व बाघिन रणथंभौर से निकले टाइगर्स की संतान हैं। ऐसे में समान जीन पूल के कारण बाघों में जेनेटिक बीमारियां बढ़ने का भी अंदेशा रहता है। शारीरिक रूप से कमजोर भी हो सकते हैं, इसलिए इंटर स्टेट टाइगर रीलोकेशन से जेनेटिक बीमारियां से निजात मिल सकेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 14:46:02 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>रणथंभौर से बाघ आया और 8 दिन में ही जंगल में छोड़ा लेकिन 13 महीनों से कैद बाघिन अब भी आजादी को तरसी, दो वर्ष पहले बाघ को रामगढ़ और बाघिन को मकुंदरा में किया था शिफ्ट</title>
                                    <description><![CDATA[ 50 की जगह 85 से ज्यादा किए शिकार, फिर भी किस्मत का नहीं हुआ फैसला।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-tiger-from-ranthambore-was-released-into-the-wild-in-just-8-days--but-the-tigress--captive-for-13-months--still-longs-for-freedom--two-years-ago--the-tiger-was-shifted-to-ramgarh-and-the-tigress-to-mukundra/article-140112"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(1)38.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रणथंभौर टाइगर रिजर्व से मुकुंदरा लाए बाघ को महज 8 दिन में ही खुले जंगल में छोड़ दिया गया लेकिन पिछले 13 महीनो से रिवाइल्डिंग के नाम पर सॉफ्ट एनक्लोजर में कैद बाघिन एमटी-7 को अब तक बंदिशों से आजादी नहीं मिली। जबकि, एनटीसीए की टीम गत वर्ष नवंबर में ही मुकुंदरा और रामगढ़ में रिवाल्डिंग बाघ- बाघिन की वास्तविक स्थिति का भौतिक आकलन कर चुकी है। इसके बावजूद टाइगर और टाइग्रेस की आजादी पर फैसला नहीं हो सका। इधर, वन्यजीव प्रेमियों का तर्क है, हार्ड रिलीज में अनावश्यक देरी से बाघिन के विकास पर विपरीत असर पड़ सकता है।</p>
<p>दरअसल,अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से रिवाल्डिंग के लिए दिसंबर 2024 में बाघिन को मुकुंदरा व बाघ को रामगढ़ टाइगर रिजर्व के सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट किया था। उस समय वन अधिकारियों ने बाघिन के 40 और बाघ द्वारा 50 शिकार सफलतापूर्वक कर लेने पर खुले जंगल में हार्ड रिलीज किया जाना निर्धारित किया था। लेकिन, टाइग्रेस एमटी-7 और टाइगर आरवीटीआर- 7 टारगेट से ज्यादा शिकार कर चुके है। इसके बावजूद उन्हें 5 हैक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में ही रखा जा रहा है। वर्तमान में दोनों की उम्र करीब 3 वर्ष हो चुकी है। जबकि इस उम्र के अन्य टाइगर- टाइग्रेस अपनी टेरीटरी बनाने के लिए जंगल का चप्पा-चप्पा छान लेते हैं ।</p>
<p><strong>90 से ज्यादा शिकार, फिर भी आजादी नहीं</strong><br />मुकुंदरा से मिली जानकारी के अनुसार, बाधिन एमटी-7 अब तक 85 से 90 के बीच सफलतापूर्वक शिकार कर चुकी है। जबकि, टारगेट 40 का ही था। वहीं बाघ रामगढ़ में करीब 110 शिकार कर चुका है। जिसका टारगेट 50 का ही था। शिकार किए गए वन्यजीवों की संख्या से स्पष्ट होता है कि बाघ बाघिन शिकार करना सीख चुकें है। ऐसे में उसे खुले जंगल में छोड़ दिया जाना चाहिए। ताकि, वह जंगल की विपरीत परिस्थितियों में खुद को ढाल सके।</p>
<p><strong>बाघिन अपने से दो गुना ऊंचे जानवर का कर चुकी शिकार</strong><br />टाइग्रेस एमटी-7 अब तक हिरण ही नहीं बल्कि अपने से आकर में दो गुना ऊंचे वन्यजीव नील गाय का भी शिकार कर चुकी है। जबकि, नील गाय का शिकार आसान नहीं होता है। बाघिन के लगातार शिकार किए जाने से 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में प्रे-बेस की भी कमी होती जा रही है। ऐसे में रिवाइल्डिंग के उद्देश्यों की सफलता के लिए उसे शीघ्र ही खुले जंगल में छोड़ा जाना आवश्यक है।</p>
<p><strong>इधर, ढाई साल के बाघ टेरिटरी बना रहे, उधर 3 वर्ष के पिंजरों में कैद</strong><br />वन्यजीव प्रेमी लोकेश कुमार का कहना है, बाघिन एमटी-7 और आरवीटीआर- 6 को अभेडा बायोलॉजिकल पार्क से पिछले साल दिसम्बर माह में शिफ्ट किया गया था। इस दरमियान दोनों खुले जंगल में विचरण करने की एनटीसीए के निर्धारित मापदंडों को सफलतापूर्वक पूरा कर चुके हैं। वर्तमान में दोनों की उम्र लगभग 3 साल हो चुकी है। इसके बावजूद वह 5- 5 हेक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर से बाहर नहीं निकल सके। जबकि, इस उम्र के अन्य बाघ-बाघिन खुद को एक्सप्लॉजर करते हैं और मां से अलग होकर अपनी टेरीटरी बनाने के लिए जंगल को सर्च करते हैं। इस बीच कई परिस्थितियों से गुजरने के दौरान बहुत कुछ सीखते हैं, जो जंगल में उनके सरवाइवल रेट को बढ़ाने में मददगार होते हैं। इसका उदाहरण रामगढ़ टाइगर रिजर्व में मध्य प्रदेश के पेंच रिजर्व से लाई गई बाघिन और मुकुंदरा में हाल ही में लाए बाघ की उम्र 3 साल से कम है दोनों ही खुले जंगल में अपनी टेरिटरी बना रहे हैं । ऐसे में इन दोनों रिवाइल्डिंग बाघ बाघिन को भी जल्द से जल्द हार्ड रिलीज किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>कैसे सीखेंगे शिकार ढूंढना व टेरीटरी बनाना</strong><br />बायोलॉजिस्ट रवि कुमार बताते हैं, पिछले एक साल से बाधिन दरा में 5 हैक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में रह रही है। जहां रिवाइल्डिंग के नाम पर सिर्फ शिकार करना ही सीखा है। लेकिन, शिकार ढूंढना नहीं सीख पा रही है। क्योंकि, सॉफ्ट एनक्लोजर में पहले से ही प्रे-बेस की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। जबकि, खुले जंगल में ऐसा नहीं होता है। वहां हर दिन चुनौतियों के बीच उन्हें भोजन ढूंढना पड़ता है, जो पिंजरे में कैद होने के कारण इस गुण का विकास नहीं हो पा रहा। वहीं, अनावश्यक देरी से टेरीटरी बनाने में भी उसे परेशानी का सामना करना पड़ेगा</p>
<p><strong>एनटीसीए की रिपोर्ट पर अटकी शिफ्टिंग</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में रिवाल्डिंग बाघ और बाघिन की खुले जंगल में शिफ्टिंग पर फैसला एनटीसीए की रिपोर्ट पर अटकी हुई है। जबकि नचा की टीम दो माह पहले ही मुकुंदरा और रामगढ़ में टाइगर और टाइग्रेस की फिजिकल एक्टिविटी का भौतिक आकलन कर चुकी है।<br />इसके बावजूद अब तक रिवाल्डिंग बाघ बाघिन की आजादी पर फैसला नहीं हो सका।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से दिसम्बर 2024 में रिवाइल्डिंग के लिए मुकुंदरा व रामगढ़ में शिफ्ट किए गए बाघ बाघिन को खुले जंगल में छोड़ा जाना है। हमारी और से सभी तैयारी पूरी है। एनटीसीए की रिपोर्ट का इंतजार है। जिसके आधार पर खुले जंगल में छोड़े जाने को लेकर निर्णय होगा।<br /><strong>सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 19 Jan 2026 17:01:11 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>टाइगर से चीते तक के खून से सने हाईवे और रेलवे ट्रेक, जंगल में तीन तरफ से मौत का जाल</title>
                                    <description><![CDATA[रफ़्तार की बली चढ़ रहे शेड्यूल - 1 के वन्यजीव:  मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों को ट्रक और ट्रेनो ने रौंदा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/highways-and-railway-tracks-stained-with-the-blood-of-animals-from-tigers-to-cheetahs--a-death-trap-surrounding-the-forest-on-three-sides/article-136384"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/etws-(1200-x-600-px)-(16).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा और रामगढ़ टाइगर रिजर्व से गुजरते नेशनल हाइवे और रेलवे ट्रेक वन्यजीवों की अकाल मौत का कारण बन रहे हैं। भोजन-पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकलते ही बेजुबान जानवर सड़कों पर तेज रफ्तार ट्रकों और पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की चपेट में आ रहे हैं। हालात इतने भयावह हैं कि बीते पांच वर्षों में यहां 51 से ज्यादा वन्यजीव अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं। इतना ही नहीं, लापरवाही का आलम यह है कि हाल ही में मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकले चीते की बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर अज्ञात कार की टक्कर से दर्दनाक मौत हो गई। इसके बावजूद बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कागजों से आगे नहीं बढ़ पाए। जबकि, अकाल मृत्यु के शिकार हुए वन्यजीवों में अधिकतर शेड्यूल वन श्रेणी के हैं। इन वन्यजीवों को भी सुरक्षा का उतना ही अधिकार प्राप्त है, जितना टाइगर को। इसके बावजूद वन अधिकारियों द्वारा इनकी सुरक्षा में कोताही बरती जा रही है।</p>
<p><strong>51 से ज्यादा वन्यजीवों को ट्रेन-ट्रकों ने कुचला</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वर्ष 2019 से 2025 तक टाइगर, पैंथर, भालू व मगरमच्छ, हायना सहित 50 से ज्यादा वन्यजीवों की सड़क व रेल दुर्घटनाओं में दर्दनाक मौत हो चुकी है। वहीं, वन्यजीव विभाग के अधीन सेंचुरी में भी वन्यजीव सुरक्षित नहीं है। यहां वर्ष 2023 व 24 में मगरमच्छ व मादा नील गाय को हाइवे पर बेलगाम दौड़ते भारी वाहन कुचल गए। बेजुबानों की दर्दनाक मौत के बावजूद वन अधकारियों द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। अकाल मृत्यु में सर्वाधिक संख्या पैंथर की है।</p>
<p><strong>इधर, ट्रेन से कटा टाइगर, उधर कार ने कुचला चीता</strong><br />मुकंदरा टाइगर रिजर्व के दरा रेंज से गुजर रही रेलवे ट्रेक वन्यजीवों के लिए मौत का ट्रैक बनती जा रही है। वर्ष 2003 में रणथम्भौर से चलकर मुकुंदरा आया ब्रोकन टेल टाइगर की ट्रेन की टक्कर से मौत हो गई थी। वहीं, हाल ही में एनक्लोजर से बाहर निकली कनकटी भी कुछ मिनटों के लिए दरा रेलवे ट्रेक पर आ गई थी। इसके बाद वह पूरी रात ट्रेक के पास झाड़ियों में बैठी रही। जिससे उसकी जान को खतरा था। इधर, आठ दिन पहले गत 7 दिसम्बर को बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर कूनो नेशनल पार्क से आया चीते को कार कुचल गई। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।</p>
<p><strong>11 केवी लाइन गिरी, करंट से लेपर्ड परिवार खत्म</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के बीच डाबी के डसालिया वनखंड से गुजर रही 11 केवी बिजली का तार टूटकर गिर गया। करंट की चपेट में आने से लेपर्ड का पूरा परिवार खत्म हो गया। यहां नर व मादा लेपर्ड के साथ दो शावकों की भी मौत हो गई थी। वहीं, 4 नेवलों की भी करंट की चपेट में आने से मुत्यु हो गई। इसी तरह 12 दिसम्बर 2023 को नेशनल हाइवे 148-डी पर अज्ञात भारी वाहन ने 1 वर्षीय मादा पैंथर को रौंद दिया।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से भालू के हो गए दो टुकड़े</strong><br />12 जनवरी 2020 को मुकुंदरा में दिल्ली-मुंबई रेलवे लाइन पर ट्रेन से कटकर 12 वर्षीय नर भालू की दर्दनाक मौत हो गई थी। ट्रेन की रफ्तार से भालू के शरीर के दो टुकड़े हो गए थे। यह दुर्घटना कमलपुरा स्टेशन के पास रेलवे लाइन पर डॉट के मोखे के ऊपर हुआ था।</p>
<p><strong>यह वन्यजीव हुए अकाल मौत के शिकार</strong><br /><strong>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व :</strong> ब्रोकन टेल टाइगर, पैंथर, नर व मादा भालू, जरख, सियार, मगरमच्छ, मादा नील गाय, सांभर, चीतल, मोर, जंगली बिल्ली सहित अनेक जानवरों की ट्रेन व भारी वाहनों की टक्कर से मौत हो गई। इनमें से अधिकतर जानवरों की मौत पटरी पार करते हुए ट्रेन की चपेट में आने से हुई है।<br /><strong>रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व :</strong> पैंथर, जंगली सूअर, नर व मादा नील गाय (बच्चा), मोर, मादा सांभर, सियार, चीतल शामिल हैं। यह तो वो एनीमल हैं, जिनकी मौत रिकॉर्ड में दर्ज हैं, इसके अलावा कई एनीमल तो ऐसे हैं, जिनकी मौत का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।<br /><strong>वाइल्ड लाइफ कोटा : </strong>वन्यजीव विभाग के अधीन अभयारणयों से मगरमच्छ व मादा नील गाय की मौत हुई है। यहां जंगलों से सटकर निकल रहे नेशनल, स्टेट व मेगा हाइवे गुजर रहे हैं। जिन्हें पार करते हुए मौत के शिकार हो गए।</p>
<p><strong>आंकड़ों में देखिए, ट्रेन से पैंथरों की दर्दनाक मौत</strong><br />- 5 मार्च 2023 को रामगढ़ टाइगर रिजर्व में भीमलत के पास बूंदी-चित्तौड़गढ़ रेलवे लाइन पर नर पैंथर की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई थी।<br />- 22 जनवरी 2021 को भीमलत के पास जालंधरी-श्रीनगर स्टेशन के बीच मादा पैंथर ट्रेन की चपेट में आ गई थी। जिससे उसका दम टूट गया।<br />- 11 मार्च 2021 को भीमलत के जंगलों में सीताकुंड वनक्षेत्र के जैतपुरा बांध के पास नर पैंथर की मौत हो गई।<br />- 30 अक्टूबर 2019 को भारी वाहन ने 7 माह के पैंथर शावक को हाइवे पर कुचल दिया।<br />-15 दिसम्बर 2025 : कोटा चित्तौड़ नेशनल हाइवे पर अज्ञात वाहन ने 4 वर्षीय मादा पैंथर को कुचल दिया। स्थिति नाजुक बनी हुई है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जंगल से बाहर निकलने पर रेलवे ट्रैक पार करते वक्त ट्रेन या हाइवे पार करते समय भारी वाहनों की चपेट में आने से जान गंवा बैठते हैं। बिजौलिया से करोंदी टोल के पास भालू की दुर्घटना में मौत होती रहती है। कई जगह से रिजर्व की दीवारें टूटी हुई हैं। यहां प्रोपर गश्त नहीं होती। जिसकी वजह से वनकर्मियों को वन्यजीवों की मौत का पता ही नहीं लग पाता। इनका मुखबिर तंत्र भी कमजोर है। फोरस्ट अधिकारियों को स्थानीय लोगों को साथ लेकर बेजुबानों की जान बचाने के प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>-विट्ठल सनाढ्य, वन्यजीव विशेषज्ञ बूंदी</strong></p>
<p>जब भी फोरेस्ट की तरफ से रेलवे ट्रैक के आसपास वन्यजीव के मूवमेंट की जानकारी मिलती है तो ट्रेनों की स्पीड कम कर दी जाती है। पटरियों के पास व पीछे की ओर क्रेश बेरियर वॉल बनाई गई है। हालांकि, कुछ जगहों पर छुटी हुई है। लेकिन, मथूरा से नागदा तक क्रेश बेरियर वॉल का काम चल रहा है।<br /><strong>-सौरभ जैन, सीनियर डीसीएम रेलवे कोटा</strong></p>
<p>वाइल्ड लाइफ में नए प्रोजेक्ट पर कई कंडीशन लगाते हैं, जिसमें एलीवेटेड रोड व टनल बने, अंडर पास बने। वहीं, लोकल सर्विस रोड की मरम्मत की मंजूरी के दौरान अधिक ब्रेकर बनवाते हैं, जिससे वाहनों की गति कम रहे और वन्यजीव को सड़क पार करने को समय मिल सके। इसके अलावा जहां कहीं इस तरह की घटनाएं होती है तो उसके संबंध में हाई आॅथोरिटी से बात कर उचित उपाए करवाएंगे।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Dec 2025 16:53:01 +0530</pubDate>
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                <title>अब मजबूत होगी बाघों की नस्ल, सुधरेगा जीनपूल, इंटर स्टेट बाघ ट्रांसलोकेशन से रुकेगी इन ब्रिडिंग</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश के माधव टाइगर रिजर्व में मुकुंदरा व रामगढ़ के अधिकारियों को दो दिन ट्रैनिंग दी गई। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-populations-will-be-strengthened--gene-pools-will-improve--and-interstate-tiger-translocations-will-prevent-inbreeding/article-128635"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/cop7y-of-news.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। बाघों में इनब्रीडिंग गंभीर समस्या है, जिससे बाघों का जीन पूल कमजोर हो रहा है और उनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है, जिसके कारण शावक अपेक्षाकृत कमजोर पैदा हो रहे हैं। लेकिन, अब कोटा के मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व की तस्वीर बदलेगी। वन विभाग व एनटीसीए से इंटर स्टेट बाघ ट्रांसलोकेशन की अनुमति मिलने के बाद मध्यप्रदेश से दो बाघिन लाने की तैयारियां शुरू हो गई है। हाड़ौती के दोनों टाइगर रिजर्व में मध्यप्रदेश से बाघिन आने पर न केवल इन ब्रिडिंग की समस्या खत्म होगी बल्कि जीनपूल में सुधार होने से बाघों की नस्ल भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत होगी।  दरअसल, इंटर स्टेट बाघ ट्रांसलोकेशन को लेकर मध्यप्रदेश के माधव टाइगर रिजर्व में मुकुंदरा व रामगढ़ के अधिकारियों को दो दिन ट्रैनिंग दी गई। जिसमें वाइल्ड लाइफ सीसीएफ सुगनाराम जाट व मुकुंदरा डीएफओ मूथू एस ने भाग लिया।  प्रशिक्षण में वन अधिकारियों को बाघिन के स्थानांतरण के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां व जरूरी एहतियात उपायों व तैयारियों की जानकारी दी गई।  गौरतलब है कि दैनिक नवज्योति ने इनब्रिडिंग को लेकर पूर्व में खबर प्रकाशित कर इसके नुकसान से वन प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था। जिसके बाद वन्यजीव प्रेमियों ने इंटर स्टेट बाघ ट्रांसलोकेशन की मांग उठाई। आखिरकार लंबे संघर्ष व इंतजार के बाद मध्यप्रदेश व महाराष्टÑ से बाघिन लाने का रास्ता साफ हुआ। </p>
<p><strong>नवम्बर के प्रथम सप्ताह में आएगी दो ट्राइग्रेस</strong><br />सीसीएफ जाट ने बताया कि मध्यप्रदेश व महाराष्टÑ से दो चरणों में बाघिन लाई जानी है। प्रथम फेस में नवम्बर माह के पहले सप्ताह में मध्यप्रदेश से एक-एक बाघिन मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व  में बाघिन लाई जाएगी। जिसे मुकुंदरा की राउंठा रेंज में बनने वाले एनक्लोजर में शिफ्ट कर सॉफ्ट रिलीज किया जाएगा। इसके बाद खुले जंगल में हार्ड रिलीज किया जाएगा। </p>
<p><strong>इसी माह में होगा एमटी-7 की हार्ड रिलीज का फैसला</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिलक पार्क से गत वर्ष दिसम्बर माह से रिवाइल्डिंग के लिए मुकुंदरा में शिफ्ट की गई बाघिन एमटी-7 को खुले जंगल में छोड़े जाने का फैसला इसी माह में होगा। क्योंकि, इसी अक्टूबर माह डब्ल्यूआईआई की टीम मुकुंदरा आएगी, जो बाघिन के व्यवहार, शिकार सहित फिजिकल वेरिफिकेशन कर हार्ड रिलीज को लेकर रिपोर्ट देगी। जिसके आधार पर खुले जंगल में छोड़े जाने को लेकर निर्णय होगा। </p>
<p><strong>इनब्रीडिंग से जुड़ी प्रमुख समस्याएं</strong><br /><strong>जीन पूल का कमजोर होना: </strong>प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व रिजर्व में अधिकांश बाघ रणथम्भौर से ही शिफ्ट किए गए हैं। ऐसे में अधिकांश बाघ एक ही जीन पूल से हैं, जिससे इनब्रीडिंग बढ़ रही है।</p>
<p><strong>प्रजनन क्षमता में गिरावट: </strong>इनब्रीडिंग के कारण बाघों की प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ रहा है। <br />शावकों की घटती उम्र और स्वास्थ्य: बायोलॉजिस्ट्स के अनुसार, नए पैदा होने वाले शावक कमजोर और बीमार हो रहे हैं, जिससे उनकी उम्र में गिरावट देखी जा रही है।  <br /><strong>बीमारियों का खतरा:</strong> इनब्रीडिंग बोन ट्यूमर जैसी बीमारियों का भी कारण बनती है, जो बाघों के लिए जानलेवा हो सकती हैं।</p>
<p><strong>बाघों की ट्रैकिंग व मॉनिटरिंग का दिया प्रशिक्षण</strong><br />संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक सुगनाराम जाट  ने बताया कि बाघ स्थानांतरण कार्यक्रम के अंतर्गत मध्यप्रदेश से मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघिन शिफ्ट की जानी है। ऐसे में बरती जाने वाली सावधानियां व जरूरी एहतियात   को लेकर 28 व 29 सितम्बर को मध्यप्रदेश के माधव टाइगर रिजर्व में ट्रैनिंग दी गई। जिसमें बाघों की ट्रैकिंग एवं मॉनिटरिंग के संबंध में प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक जानकारी दी गई।  </p>
<p><strong>समाधान और प्रयास</strong><br />बाघों का आदान-प्रदान: इनब्रीडिंग से निपटने के लिए मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच बाघों के आदान-प्रदान की अनुमति मिली है, जो एक सकारात्मक कदम है। बरहाल, मध्यप्रदेश से बाघिन लाने की तैयारियां शुरू हो चुकी है। माधव टाइगर रिजर्व में वन अधिकारियों को दो दिवसीय ट्रैनिंग भी दी गई है। </p>
<p><strong>वन अधिकारियों को यह दिया प्रशिक्षण </strong><br /><strong>बाघ ट्रैकिंग एवं मॉनिटरिंग की सीखाई तकनीक</strong><br />मध्यप्रदेश से बाघिनों को शिफ्ट करने के दौरान मॉनिटरिंग की विभिन्न विधियों का प्रशिक्षण दिया गया। जिसमें बाघों की गतिविधियों के पैटर्न की पहचान संबंधी व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। <br /><strong>रेडियो कॉलर का उपयोग करना </strong><br />रेडियो टेलीमेट्री के माध्यम से बाघों की ट्रैकिंग एवं मॉनिटरिंग की प्रक्रिया समझाई गई। वहीं, डेटा का एनालिसिस करना व हार्ड रिलीज के बाद बाघों की निगरानी के संबंध में तकनीकी जानकारी दी गई। <br /><strong>सॉफ़्ट रिलीज एनक्लोजर</strong><br />हार्ड रिलीज करने से पहले उस उन एनक्लोजरों का अवलोकन करना और सुरक्षा इंतजाम व अनूकूलन अवधि के दौरान अपनाई जाने वाली प्रोटोकॉल की जानकारी दी गई।<br /><strong>रिकॉर्ड संधारण, दस्तावेजीकरण </strong><br />ट्रैनिंग में वन अधिकारियों को अभिलेखों, रजिस्टरों एवं डिजिटल विधियों के माध्यम से बाघ मॉनिटरिंग का रिकॉर्ड संधारण करना सिखाया।  </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में मध्यप्रदेश से प्रथम चरण में दो बाघिन लाई जानी है। इसी को लेकर एमपी के माधव टाइगर रिजर्व में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम था। जिसमें बाघ स्थानांतरण से लेकर ट्रैकिंग, मॉनिटरिंग, डेटा एनालिसिस, जरूरी इंतजाम, सावधानियों को लेकर व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया गया। नवम्बर माह के प्रथम सप्ताह में बाघिन लाए जाने की संभावना है। <br /><strong>- सुगनाराम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक वन्यजीव कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Oct 2025 15:24:36 +0530</pubDate>
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                <title>अंतरराष्ट्रीय मंच पर छाने से महरूम रह गया मुकुंदरा, आईफा फिल्म फेयर में होना था गरड़िया महादेव का प्रमोशन</title>
                                    <description><![CDATA[आईफा फिल्म फेयर में राजस्थान के चुनिंदा पर्यटन स्थलों को प्रमोट किया जाना था।  जिसमें मुकुुंदरा की जन्नत गरड़िया महादेव को भी चयनित किया गया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundra-was-deprived-of-being-seen-on-the-international-stage/article-106862"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/2557rtrer-(3).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान का गुलाबी शहर जयपुर में फिल्म सितारों के बीच शुक्रवार से आईफा फिल्म फेयर का आगाज हो चुका है। जिसमें मरुस्थान के पर्यटन स्थलों की खूबसूरती से देश-दुनिया को रुबरू करवाया गया। लेकिन, चंबल की धरा पर बसा मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व अंतरराष्टÑीय मंच पर अपना जलवा बिखेरने से महरूम रह गया। हालांकि, चंबल रिवर फ्रंट आईफा की सिल्वर स्क्रीन पर अपनी चमक बिखेर रहा है। हालांकि, दुनिया को अपने अलौकिक सौंदर्य से रुबरू करवाने का मौका मुकुंदरा को भी मिला था। लेकिन, पर्यटन व वन विभाग की आपसी खींचतान के चलते यह मौका हाथ से निकल गया।  दरअसल, आईफा फिल्म फेयर में राजस्थान के चुनिंदा पर्यटन स्थलों को प्रमोट किया जाना था।  जिसमें मुकुुंदरा की जन्नत गरड़िया महादेव को भी चयनित किया गया था। जिसके लिए वीकेंट विद द स्टार्स कार्यक्रम के तहत मशहूर बॉलीवुड एक्टर्स द्वारा गरड़िया में शोर्ट फिल्म की शूटिंग की जानी थी। लेकिन वन विभाग द्वारा नि:शुल्क वीडियो शूट की परमिशन नहीं दिए जाने से फिल्मांकन नहीं हो सका।  </p>
<p><strong>आपसी खींचतान में फंसकर रह गया मुकुंदरा</strong><br /> आईफा में गरड़िया महादेव को प्रमोट करने के लिए शोर्ट फिल्म की शूटिंग की जानी थी। जिसके लिए कोटा पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक द्वारा मुकुंदरा डीएफओ को पत्र लिख फिल्मांकन की नि:शुल्क अनुमति  दिए जाने को लेकर गत 10 फरवरी को पत्र लिखा था। जिसके जवाब में वन विभाग ने सिक्योरिटी राशि व वीडियो शूट शुल्क जमा करवाने को कहा। इस पर दोनों में बात नहीं बनी और शूटिंग कैंसिल हो गई। </p>
<p><strong>3 मार्च को होनी थी शूटिंग </strong><br />वीकेंड विद द स्टार्स कार्यक्रम के तहत बॉलीवुड एक्टर वेब सीरीज पाताललोक फेम जयदीप अहलावत व सोशल मीडिया इनफ्लुएंजर आयशा अहमद द्वारा 3 मार्च  को गरड़िया महादेव में शोर्ट फिल्म की शूटिंग की जानी थी। जिसमें ड्रोन शोर्ट के जरिए कोटा के पर्यटन स्थलों की सूबसूरती, गौरवशाली इतिहास, विरासत,  धरोहर, महल सहित अन्य ऐतिहासिक स्थलों के वैभव को आईफा में वैश्विक स्तर पर प्रसारित करना था। लेकिन, नि:शुल्क शूटिंग की परमिशन नहीं मिलने से मुकुंदरा अंतरराष्टÑीय मंच पर छाने से महरूम रह गया। </p>
<p><strong>क्या कहते हैं जिम्मेदार</strong><br /> इस संबंध में उच्चाधिकारियों से निर्देश प्राप्त हुए थे कि नियमानुसार राशि जमा करवाए जाने पर शूटिंग की परमिशन देनी है। इसके लिए पर्यटन विभाग को पत्र भी लिखा गया लेकिन उनके द्वारा कोई रेस्पोंस नहीं दिया गया। जबकि, भरतपुर में भी तो नियमानुसार  राशि जमा करवाए जाने पर शूटिंग की परमिशन दी गई।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक  मुकुंदरा </strong></p>
<p>हमने गरड़िया महादेव में नि:शुल्क शोर्ट मूवी की शूटिंग करने की परमिशन मांगी थी, इसके लिए मुकुंदरा प्रशासन को पत्र लिखा था लेकिन उन्होंने सिक्योरिटी राशि व निर्धारित एंट्री फीस जमा करवाने पर परमिशन देने की बात कही गई। इस पर आईफा ने गरड़िया महादेव में शूटिंग कैंसिल कर दी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Mar 2025 16:52:03 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पैंथर-भालू से लेकर मगरमच्छ के खून से सने हाइवे और रेलवे ट्रैक, भोजन-पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकले बेजुबानों को ट्रेेन-ट्रकों ने कुचला </title>
                                    <description><![CDATA[मुकुंदरा-रामगढ़ टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों को ट्रक और ट्रेनों ने रौंदा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/highways-and-railway-tracks-stained-with-the-blood-of-panthers--bears-and-crocodiles/article-101540"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/2567rtrer.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व से गुजर रहे नेशनल हाइवे व रेलवे ट्रेक वन्यजीवों के खून से लाल हो रहे हैं। भोजन-पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकले बेजुबानों को सड़कों पर भारी वाहन तो पटरियों पर ट्रेनें कुचल रही हैं। वन अधिकारियों की घोर लापरवाही से वन्यजीव अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं। हालात यह हैं, पिछले पांच सालों में मुकुंदरा और रामगढ़ टाइगर रिजर्व में 50 से ज्यादा वन्यजीवों की ट्रेन व सड़क दुर्घटनाओं में दर्दनाक मौत हो चुकी है। जिसमें से अधिकतर जानवर शेड्यूल-1 श्रेणी के हैं। इसके बावजूद वन्यजीवों की सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा रहे।</p>
<p><strong>50 से ज्यादा वन्यजीवों को ट्रेन-ट्रकों ने कुचला</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वर्ष 2019  से 2024 तक पैंथर, भालू व मगरमच्छ सहित 50 से ज्यादा वन्यजीवों की सड़क व रेल दुर्घटनाओं में दर्दनाक मौत हो चुकी है। वहीं, वन्यजीव विभाग के अधीन सेंचुरी में भी वन्यजीव सुरक्षित नहीं है। यहां वर्ष 2023 व 24 में मगरमच्छ व मादा नील गाय को हाइवे पर बेलगाम दौड़ते भारी वाहन कुचल गए। बेजुबानों की दर्दनाक मौत के बावजूद वन अधकारियों द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। जिसकी वजह से आए दिन जंगली जानवर दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। जिसमें सर्वाधिक संख्या पैंथर की है।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से ब्रोकन टेल टाइगर की हो चुकी मौत</strong><br />मुकंदरा टाइगर रिजर्व के दरा रेंज से गुजर रही रेलवे ट्रेक वन्यजीवों के लिए मौत का ट्रैक साबित हो रही है। वर्ष 2023 में रणथम्भौर से चलकर मुकुंदरा आया ब्रोकन टेल टाइगर की ट्रेन की टक्कर से मौत हो गई थी। इसके बाद भी वन विभाग के अधिकारी वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह बने रहे। ब्रोकन टेल की मौत के बाद मई 2018 तक 17 वन्य जीवों की रेलवे ट्रैक पर मौत हो चुकी है।</p>
<p><strong>मुकुंदरा से 7 तो रामगढ़ से 25 किमी गुजर रही रेलवे ट्रैक</strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व से 7 किमी तो रामगढ़ विषधारी से करीब 20 से 25 किमी लंबी रेलवे ट्रैक गुजर रही है। कई जगहों पर रेलवे ट्रैक के दोनों ओर तार फेंसिंग नहीं है। वहीं, कोई सुरक्षा दीवार भी नहीं बनी हुई है। जिसके कारण आए दिन शेड्यूल वन श्रेणी के जानवर ट्रैन की चपेट में आने से अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। रामगढ़ की अपेक्षा मुकुंदरा में अधिकतर जानवरों की मौत ट्रेन से कटकर हुई है। </p>
<p><strong>11केवी लाइन गिरी, करंट से लेपर्ड परिवार खत्म</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के बीच डाबी के डसालिया वनखंड से गुजर रही 11केवी बिजली का तार टूटकर गिर गया। करंट की चपेट में आने से लेपर्र्ड का पूरा परिवार खत्म हो गया। यहां नर व मादा लेपर्ड के साथ दो शावकों की भी मौत हो गई थी। वहीं, 4 नेवलों की भी करंट की चपेट में आने से अकाल मुत्यु हो गई। इसी तरह 12 दिसम्बर 2023 को नेशनल हाइवे 148-डी पर अज्ञात भारी वाहन ने 1 वर्षीय मादा पैंथर को रौंध दिया। </p>
<p><strong>ट्रेन से कटकर भालू के हो गए दो टुकड़े</strong><br />12 जनवरी 2020 को मुकुंदरा में दिल्ली-मुंबई  रेलवे लाइन पर ट्रेन से कटकर 12 वर्षीय नर भालू की दर्दनाक मौत हो गई थी। ट्रेन की रफ्तार से भालू के शरीर के दो टुकड़े हो गए थे। यह दुर्घटना कमलपुरा स्टेशन के पास रेलवे लाइन पर डॉट के मोखे के ऊपर हुआ था।  रेलवे ट्रेक की दैनिक निगरानी के लिए जाने वाले रेलवे कीमैन की सूचना पर रिजर्व अधिकारियों को घटना पता लगा था।  </p>
<p><strong>कहां कौनसे एनीमल हुए दुर्घटनाग्रस्त</strong><br /><strong>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व :</strong> पैंथर, नर व मादा भालू, जरख, सियार, मगरमच्छ, मादा नील गाय, सांभर, चीतल, मोर, जंगली बिल्ली सहित अनेक जानवरों की ट्रेन व भारी वाहनों की टक्कर से मौत हो गई। इनमें से अधिकतर जानवरों की मौत पटरी पार करते हुए ट्रेन की चपेट में आने से हुई है।  <strong>रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व :</strong> पैंथर, जंगली सूअर, नर व मादा नील गाय (बच्चा), मोर, मादा सांभर, सियार, चीतल शामिल हैं। यह तो वो एनीमल हैं, जिनकी मौत रिकॉर्ड में दर्ज हैं, इसके अलावा कई एनीमल तो ऐसे हैं, जिनकी मौत का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।</p>
<p><strong>वाइल्ड लाइफ कोटा :</strong> वन्यजीव विभाग के अधीन अभयारणयों से मगरमच्छ व मादा नील गाय की मौत हुई है। यहां जंगलों से सटकर निकल रहे नेशनल, स्टेट व मेगा हाइवे गुजर रहे हैं। जिन्हें पार करते हुए अकाल मौत के शिकार हो गए। </p>
<p><strong>आंकड़ों में देखिए, ट्रेन से पैंथरों की दर्दनाक मौत </strong><br />- 5 मार्च 2023 को रामगढ़ टाइगर रिजर्व में भीमलत के पास बूंदी-चित्तौड़गढ़ रेलवे लाइन पर नर पैंथर की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई थी। <br />- 22 जनवरी 2021 को भीमलत के पास जालंधरी-श्रीनगर स्टेशन के बीच मादा पैंथर ट्रेन की चपेट में आ गई थी। जिससे पैंथर की पूछ और बायां पैर कटकर अलग हो गया। 8 घंटे ट्रैक पर तड़पती रही, बाद में उसका दम टूट गया।<br />- 11 मार्च 2021 को भीमलत के जंगलों में सीताकुंड वनक्षेत्र के जैतपुरा बांध के पास नर पैंथर को ट्रैन ने टक्कर मार दी। जिससे वह लहुलुहान हो गया। जिसे इलाज के लिए अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क ले गए, जहां उसकी मौत हो गई। <br />- 30 अक्टूबर 2019 को भारी वाहन ने 7 माह के पैंथर शावक को हाइवे पर कुचल दिया। </p>
<p><strong>क्या कहते हैं विशेषज्ञ</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जानवर भोजन की तलाश में जंगल से बाहर निकलते हैं और सड़क या ट्रैक पार करते समय भारी वाहन  व ट्रेन चपेट में आने से अकाल मौत का शिकार हो जाते हैं। बिजौलिया से करोंदी टोल के पास हर साल भालू की दुर्घटना में मौत होती है। कई जगह से रिजर्व की दीवारें टूटी हुई हैं। यहां प्रोपर गश्त नहीं होती। जिसकी वजह से वनकर्मियों को वन्यजीवों की मौत का पता ही नहीं लग पाता। इनका मुखबिर तंत्र भी कमजोर है। फोरस्ट अधिकारियों को स्थानीय लोगों को साथ लेकर बेजुबानों की जान बचाने के प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>-विट्ठल सनाढ्य, वन्यजीव विशेषज्ञ बूंदी</strong></p>
<p>रिजर्व क्षेत्र की सुरक्षा दीवारें जगह-जगह से टूटी हुई हैं, जिनकी प्राथमिकता से मरम्मत करवाकर 6 फीट ऊंची की जाए। ग्रासलैंड व प्रेबेस डवलप करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि, वन्यजीवों को जंगल में ही पर्याप्त भोजन मिल सके। इसके अलावा रेलवे ट्रेक व हाइवे पर जानवरों को आने से रोकने के लिए अंडरपास बनाए जाए और अधिक से अधिक वाटर प्वाइंट बनाए जाना चाहिए। यह विकास कार्य होंगे तो जानवरों को जंगल से बाहर निकलने की जरूरत नहीं  पड़ेगी।<br /><strong>-पृथ्वीराज सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ </strong></p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />फोरेस्ट के बीच से जो हाइवे गुजर रहे हैं, वहां स्पीड ब्रेकर बनाए जाएंगे। रिजर्व एरिया से निकलने वाली रेलवे ट्रैक जहां संभव होगा, वहां फेंसिंग करवाई जाएगी, ताकि जानवरों को दुर्घटनाओं से बचाया जा सके। इसके अलावा रिजर्व के एक जंगल से दूसरे जंगल में जाने के लिए बजाए सड़क पर आने के अंडर पास बेहतर विकल्प हो सकता है। इसके लिए प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे जाएंगे। <br /><strong>-रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग कोटा </strong></p>
<p>वन्यजीवों की सुरक्षा के बेहतर प्रबंध किए जा रहे हैं। हाइवे वाले एरिया में वाहनों की स्पीड धीमी किए जाने के प्रयास कर रहे हैं। वहीं, ट्रेन वाली घटना पहले अधिक होती थी, जो अब बहुत कम हो गई है। स्पीड धीमी रखने के लिए रेलवे को लगातार लिखा जाता है।  <br /><strong>-मुथुएस, डीएफओ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jan 2025 16:19:10 +0530</pubDate>
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                <title>पिंजरे से निकल जंगल में लगाई आजादी की छलांग</title>
                                    <description><![CDATA[बाघिन 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में रहकर जंगल के तौर-तरीके सीखेंगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/leaped-out-of-the-cage-and-entered-the-jungle-for-freedom/article-97416"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(3)15.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पल रही बाघिन टी-114 की मादा शावक को आखिरकार 25 महीने बाद पिंजरे से आजादी मिल ही गई। नर शावक के रामगढ़ शिफ्ट होने के 8 दिन बाद बुधवार को मादा शावक को भी मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दरा रेंज में सॉफ्ट रिलीज कर दिया गया। यहां बाघिन 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में रहकर जंगल के तौर-तरीके सीखेंगी। साथ ही घात लगाकर शिकार करने की कला व जंगल की चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों में खुद को ढाल सकेगी। असल में रिवाइल्डिंग बेहतर तरीके से हो सकेगी। </p>
<p><strong>दोपहर 1 बजे लगाई खुले जंगल में छलांग</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में सुबह 8 बजे से ही शिफ्टिंग को लेकर हलचल तेज हो गई थी। सुबह 9 बजे वन अधिकारी व एनटीसीए द्वारा गठित टीम के सदस्य पिंजरे में पहुंच गए थे। 9 बजकर 15 मिनट पर डॉट लगाकर बाघिन को ट्रैंकुलाइज किया। स्वास्थ्य परीक्षण कर ब्लड व डीएनए सैंपल लिए। साथ ही वजन किया। बाघिन का वजन 160 किलो था। इसके बाद रेडियोकॉर्लर लगाकर 11 बजे मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के लिए रवाना कर दिया। दोपहर 1 बजे दरा रेंज पहुंचे और 1.12 मिनट पर बाघिन ने 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में आजादी की छलांग लगाई। </p>
<p><strong>रिवाइल्डिंग केंद्र बनकर उभरेगा मुकुंदरा</strong><br />उन्होंने बताया कि राजस्थान का यह पहला रिवाइल्डिंग का प्रयास है। सफल हुए तो प्रदेश में कोटा रिवाइल्डिंग केंद्र के रूप में उभरकर सामने आएगा।  प्रदेश के अन्य जंगलों में जहां कहीं भी अनाथ शावक होंगे तो भविष्य में उन्हें कोटा में लगाकर रिवाइल्ड किए जा सकेंगे। वनकर्मी व अधिकारी पूरी शिद्दत से सफल रिवाइल्डिंग में जुटे हैं। तत्कालीन सीसीएफ शारदा प्रताप सिंह का विजन शावकों की रिवाइल्डिंग में काफी अहम रहा। </p>
<p><strong>एनक्लोजर में छोड़े 16 चीतल</strong><br />वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. तेजेंद्र सिंह रियाड़ ने बताया कि बाघिन को मुकुंदरा में सॉफ्ट रिलीज कर दिया गया है। बाघिन के आने से पहले ही एनक्लोजर में 16 चीतल छोड़ दिए गए थे। जल्द ही यहां नीलगाय भी छोड़ने की योजना है। वैसे, यह अपने भाई नर बाघ के मुकाबले काफी एक्टिव है। बायोलॉजिकल पार्क में जब इनके सामने शिकार छोड़ते थे तो यही सबसे पहले शिकार तक पहुंचती थी। यदि, बाघिन 50 शिकार सफलतापूर्वक कर लेती है तो हार्ड रिलीज किया जा सकता है। मादा शावक चिकित्सकों की गहन निगरानी में रहेगी। इस दौरान उसके व्यवहार, गतिविधियां, भोजन लेने की मात्रा, घात लगाकर शिकार कर पा रही या नहीं सहित तमाम गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी।  </p>
<p><strong>एनक्लोजर में लगे कैमरा ट्रैप </strong><br />दरा रेंज के पांच हैक्टेयर एनक्लोजर को ग्रीन नेट से पूरी तरह से कवर किया गया है। वहीं, जगह-जगह कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। रेडियोकॉर्लर के सिग्नल व तीन मंजिला वॉच टॉवर से 24 घंटे निगरानी की जा रही है। साथ ही मानव दखल से बिलकुल दूर व जीरो मॉबिलिटी सुनिश्चित की गई है। बाघिन की निगरानी के लिए टीम तैनात कर दी गई है। शिफ्टिंग के दौरान  सीसीएफ रामकरण खैरवा, मुकुंदरा डिसीएफ मूथु एस, आरवीटीआर डीएफओ संजीव शर्मा, डब्ल्यू डब्ल्यूएफ से राजशेखर, वन्यजीव चिकित्सक डॉ, राजीव गर्ग, तेजेंद्र सिंह रियाड़ सहित बायोलॉजिकल पार्क के सहायक वनपाल मनोज शर्मा, सुरेंद्र सैनी, कमल प्रजापति, बुधराम जाट सहित अन्य वनकर्मी मौजूद रहे।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />एनटीसीए से मंजूरी मिलने के बाद मादा शावक को मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में शिफ्ट कर दिया गया है। बाघिन टी-114 की मौत के बाद मादा शावक को फरवरी 2023 को रणथम्भौर से अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क शिफ्ट किया गया था। जहां दो साल से रिवाइल्डिंग  की जा रही थी। अब यह सब एडल्ट की श्रेणी में है। एनटीसीए की गाइड लाइन की पालना करते हुए मुकुंदरा में शिफ्ट किया गया है।  <br /><strong>-मूथू एस, डीएफओ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Dec 2024 15:43:36 +0530</pubDate>
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                <title>साउथ ईस्ट एशिया में वल्चर की सबसे बड़ी ब्रिडिंग कॉलोनी मुकुंदरा </title>
                                    <description><![CDATA[चंबल में इस समय 200 के करीब इंडियन वल्चर है। करीब 50 की संख्या में व्हाइट रुम्पेड वल्चर की संख्या 50 के करीब है। गिद्दों की यह प्रजाति चंबल पर नेस्टिंग करती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundra--the-largest-breeding-colony-of-vultures-in-south-east-asia/article-23948"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/south-east-asia-mei-valchar-ke-sabse-badei-breeding-colony-mukundara...kota-news-22-09-2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। लोंग बिल्ड वल्चर दुनिया में भले ही खतरे में हो लेकिन चंबल की कराईयों के बीच काफी संख्या में गिद्द हैं। साउथ ईस्ट एशिया की सबसे बड़ी ब्रिडिंग कॉलोनी है। मोटे अनुमान के तौर पर चंबल में इस समय 200 के करीब इंडियन वल्चर है। करीब 50 की संख्या में व्हाइट रुम्पेड वल्चर  है। गिद्दों की यह प्रजाति चंबल पर नेस्टिंग करती है। हाड़ौती में किंग वल्चर की संख्या 20 से 25 है। पॉम सिवेट भी खासी संख्या में हैं।</p>
<p><strong>सवा दो सौ पक्षियों का कलरव</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि मुकुन्दरा हिल्स में पक्षी की सवा दौ सौ प्रजातियां है। इनमें क्रेसअ‍ेड सरपेंट, ईगल, शॉर्ट टोड,पैराडाइज फ्लाई केचर, सारस क्रेन, स्टोक बिल किंग फिशर, कलर्ड स्कोप्स आउलग्रीन पीजन, गोल्एन ओरिओल,बैबलर,गागरोनी तोता, टुईंया तोता, एलेक जेन्डेरियन पैराकीट, रूडी शेल्डक, वाइट पैलिकन, ग्रेट फलेमिंगो, नोर्दन शावलर, नोर्दन पिंटटेल, बार एडेड गूज, ग्रेलेक गूज, गारगेनी टील समेत पक्षियों की कई प्रजातियां हैं।</p>
<p><strong>मुकुंदरा को मिला प्रकृति का वरदान </strong><br />ऐसा है मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व मुकुन्दरा हिल्स को 9 अप्रेल 2013 को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यह करीब 760 वर्ग किमी में चार जिलों कोटा, बूंदी, झालावाड़ व चित्तौडगढ़ में फैला है। करीब 417 वर्ग किमी कोर और 342 वर्ग किमी बफर जोन है। इसमें मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान, दरा अभयारण्य, जवाहर सागर व चंबल घडिाल अभयारण्य का कुछ भाग शामिल है।</p>
<p><strong>अनूठा है मुकुंदरा</strong><br />जेडीबी कॉलेज में वनस्पति एसोसिएट प्रोफेसर पूनम जायसवाल ने बताया कि मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में शुष्क, पतझड़ी वन, पहाडिां, नदी, घाटियों के बीच तेंदू, पलाश, बरगद, पीपल, महुआ, बेल, अमलताश, जामुन, नीम, इमली, अर्जुन, कदम, सेमल और आंवले के घने वृक्ष हैं। साथ ही पादक विविधता अधिक मात्रा में है। औषधी पौधों की भरमार है। </p>
<p><strong>दुर्लभ वन्यजीव भी हैं यहां</strong><br />चम्बल नदी किनारे बघेरे, भालू, भेडिा, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, काले हरिन, दुर्लभ स्याहगोह, निशाचर सिविट केट और रेटल जैसे दुर्लभ वन्यजीव भी देखने को मिलेंगे। इसके अलावा, चीतल, भालू, पैंथर सांभर, जंगली बिल्ली, सियार, जरख, लंगूर, नेवला, झाउ चूहा, जंगली खरगोश, गिल्हरी, चिंटीखोर यानी पैंगोलिन, सिही जंगली चूहा सहित कई वन्यजीव हैं।</p>
<p>मोटे अनुमान के तौर पर चंबल में इस समय 200 के करीब इंडियन वल्चर है। करीब 50 की संख्या में व्हाइट रुम्पेड वल्चर की संख्या 50 के करीब है। गिद्दों की यह प्रजाति चंबल पर नेस्टिंग करती है। हाड़ौती में किंग वल्चर की संख्या 20 से 25 है। पॉम सिवेट भी खासी संख्या में हैं।<br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Sep 2022 14:41:58 +0530</pubDate>
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