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                <title>migration - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>लखनऊ में रसोई गैस की किल्लत और महंगाई से ठप हुए छोटे कारोबार, मजदूरों का पलायन तेज</title>
                                    <description><![CDATA[लखनऊ में रसोई गैस की किल्लत और आसमान छूती कीमतों ने छोटे दुकानदारों और प्रवासी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। आजमगढ़, देवरिया और बस्ती से आए ठेला-खोमचा संचालक ब्लैक में महंगे सिलेंडर और अनियमित आपूर्ति के कारण धंधा बंद कर गांव लौटने को मजबूर हैं। हजरतगंज से गोमतीनगर तक व्यापार ठप होने से गंभीर आजीविका संकट पैदा हो गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/migration-of-small-business-workers-stalled-due-to-shortage-of/article-147692"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/lpg-in-lucknow.png" alt=""></a><br /><p>लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रसोई गैस की गहराते संकट और बढ़ती कीमतों ने छोटे कारोबारियों और प्रवासी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। हालात ऐसे हो गए हैं कि पूर्वांचल के जिलों से आए कई मजदूर और ठेला-खोमचा संचालक अपने व्यवसाय बंद कर गांव लौटने को मजबूर हैं।</p>
<p>आजमगढ़, बस्ती, देवरिया, मऊ, बलिया, जौनपुर और कुशीनगर जैसे जिलों से आए लोगों का कहना है कि गैस की अनियमित आपूर्ति और ब्लैक में दोगुने दाम पर सिलेंडर मिलने से रोजी-रोटी चलाना मुश्किल हो गया है। हजरतगंज में बन-मक्खन चाय की दुकान चलाने वाले राकेश मौर्य बताते हैं कि कमाई घट रही है और गैस पर खर्च बढ़ता जा रहा है।</p>
<p>इंदिरा नगर में फास्ट फूड का ठेला लगाने वाले बस्ती निवासी अरविंद मिश्रा कहते हैं कि 10 दिन से सिलेंडर नहीं मिला, जिससे काम पूरी तरह बंद हो गया है। रोजाना 500 रुपये तक कमाने वाले अरविंद अब किराया तक नहीं चुका पा रहे हैं और गांव लौटने का फैसला कर चुके हैं। निशातगंज में चाट बेचने वाले देवरिया निवासी राहुल वर्मा का कहना है कि गैस ब्लैक में बहुत महंगी मिल रही है। मजबूरी में उन्होंने इंडक्शन चूल्हा खरीदा, लेकिन उससे काम की रफ्तार धीमी हो गई है और ग्राहक इंतजार नहीं करते।</p>
<p>गोमतीनगर में बलिया के मनोज सिंह ने बताया कि गैस दोगुने दाम पर मिल रही है, ऐसे में दुकान चलाना असंभव हो गया है। चौक क्षेत्र में कबाब-पराठा बेचने वाले कुशीनगर के मोहम्मद आरिफ के अनुसार, गैस खत्म होने पर उन्होंने लकड़ी से खाना बनाने की कोशिश की, लेकिन मकान मालिक ने इसकी अनुमति नहीं दी, जिससे उनकी आमदनी पूरी तरह प्रभावित हो गई।</p>
<p>संकट का असर केवल ठेला-खोमचा चलाने वालों तक सीमित नहीं है। ट्रांसपोर्ट नगर, टॉकटोरा इंडस्ट्रियल एरिया और चिनहट जैसे इलाकों में दिहाड़ी मजदूर भी भारी संकट में हैं। कई मजदूर बैग और बिस्तर के साथ शहर छोड़ते नजर आ रहे हैं। सरोजिनी नगर और अमौसी की छोटी इकाइयों में काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि काम होने के बावजूद महंगी गैस के कारण जीवन यापन मुश्किल हो गया है।</p>
<p>चिनहट में पैकेजिंग यूनिट में काम करने वाले उन्नाव के मनोज कुमार कहते हैं कि गैस उपलब्ध भी हो तो इतनी महंगी है कि खरीद पाना संभव नहीं। एक होटल में काम कर रहे बहराइच के शंकर सोनी एक हफ्ते से सिलेंडर भरवाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन डीलर स्टॉक न होने की बात कह रहे हैं।</p>
<p>बर्लिंगटन स्थित गुप्ता चाट कॉर्नर के संचालकों ने बताया कि उनका सिलेंडर खत्म होने वाला है और दुकान बंद होने की कगार पर है। वहीं हुसैनगंज में बाटी-चोखा बेचने वाले एक परिवार ने दुकान बंद कर गांव लौटने का फैसला कर लिया है। लखनऊ में एलपीजी संकट ने छोटे व्यापारियों और मजदूरों के सामने गंभीर आजीविका संकट खड़ा कर दिया है। यदि जल्द ही आपूर्ति और कीमतों पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो शहर में श्रमिकों का पलायन और छोटे व्यवसायों का बंद होना और तेज हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:07:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>मणिपुर से अमूर फाल्कन दक्षिण अफ्रीका पहुंचे : संरक्षण के लिए उनके प्रवास को किया जा रहा ट्रैक, वापसी यात्रा पर निगरानी जारी</title>
                                    <description><![CDATA[अमूर फाल्कन के तीन टैग पक्षी मणिपुर से उड़कर नौ-दस दिनों में सुरक्षित दक्षिण अफ्रीका पहुँचे। मणिपुर वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान के सैटेलाइट अध्ययन में आहू, अपापंग और अलंग स्वस्थ पाए। शोधकर्ता उनकी वापसी यात्रा की निगरानी जारी रखे हुए।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/amur-falcon-reached-south-africa-from-manipur-their-migration-is/article-144919"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/1200-x-60-px)-(15).png" alt=""></a><br /><p>इंफाल। प्रवासी पक्षियों के अध्ययन के लिए ट्रैक किए जा रहे तीन अमूर फाल्कन पक्षी मणिपुर से सफलतापूर्वक दक्षिण अफ्रीका पहुंच गए हैं और सुरक्षित तथा स्वस्थ हैं। मणिपुर अमूर फाल्कन ट्रैकिंग प्रोजेक्ट के दूसरे चरण के तहत, आठ नवंबर 2025 को इन पक्षियों को सैटेलाइट ट्रांसमीटर के साथ टैग किया गया था। उल्लेखनीय है कि मणिपुर वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा चल रहे सैटेलाइट-आधारित प्रवास अध्ययन के हिस्से के रूप में इन पक्षियों को तामेंगलोंग जिले के चिउलुआन बसेरा स्थल में टैग करने के बाद छोड़ दिया गया था। तामेंगलोंग जिले के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी कि आहू, अपापंग और अलंग नाम के तीनों पक्षी अफ्रीका में अपने प्रवास में सुरक्षित हैं और सफलतापूर्वक आवाजाही कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, टैग किए गए ये पक्षी लगभग नौ से दस दिनों के रिकॉर्ड समय में अफ्रीका पहुँच गए, जो इस प्रजाति की उल्लेखनीय लंबी दूरी की प्रवास क्षमता को प्रदर्शित करता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के डॉ. आर. सुरेश कुमार ने बताया कि तीनों फाल्कन वर्तमान में सक्रिय हैं और अपने शीतकालीन आवासों में बेहतर स्थिति में हैं।</p>
<p><strong>तीनों पक्षियों की वापसी यात्रा का दस्तावेजीकरण :</strong></p>
<p>नवीनतम ट्रैकिंग सूचना के अनुसार, आहू वर्तमान में सोमालिया में है, अपापंग जिम्बाब्वे में है और अलंग बोत्सवाना में है। अधिकारियों ने उल्लेख किया कि पिछले शीतकालीन चक्र के दौरान, एक अन्य टैग किए गए पक्षी, चिउलुआन-2 ने 14 अप्रैल, 2025 को अपने प्रजनन स्थलों की ओर उत्तर की ओर प्रवास शुरू किया था। शोधकर्ता इन तीनों पक्षियों की वापसी यात्रा का दस्तावेजीकरण करने और उनकी अंतरमहाद्वीपीय यात्रा पर और अधिक वैज्ञानिक सूचना एकत्र करने के लिए उनकी निगरानी जारी रखेंगे। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 13:01:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यूरोप व सेंट्रल एशिया से 10 हजार किमी का सफर कर कोटा पहुंचे विदेशी परिंदे, पक्षियों की चहचहाट से गुलजार हो रहे वेटलैंड</title>
                                    <description><![CDATA[विदेशी परिंदों को रास आ रही कोटा की आबोहवा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/foreign-birds-have-traveled-10-000-kilometers-from-europe-and-central-asia-to-kota--filling-wetlands-with-their-chirping/article-135158"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)-(5)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों किमी का सफर कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। इन दिनों शहर के वेटलैंड विदेशी परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कजाकिस्तान से रूस सहित कई देशों से बड़ी संख्या में पक्षी माइग्रेट कर शिक्षा नगरी की आबो-हवा में परवाज भर रहे हैं। यूरोपियन व एशियाई देशों में बर्फबारी होने से अपने अनुकूल वातावरण व भोजन की तलाश में यह परिंदे सात समंदर पार कर देश के विभिन्न राज्यों में अपना आशियाना बना रहे हैं। वहीं, कोटा के दो दर्जन से अधिक वेटलैंड पर देसी-विदेशी पक्षियों का कलरव चहकने लगा है।</p>
<p><strong>यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से आए पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, विदेशी पक्षियों का कारवां यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से कोटा पहुंचे हैं। इनमें कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, साइबेरिया, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, स्वजरलैंड, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस सहित करीब एक दर्जन देशों से 10 हजार एयर किमी का सफर कर बड़ी संख्या में मेहमान प्रवास पर आए हैं। वर्तमान में कॉमन कूट, स्पोर्ट बिल परपल, मुरहेंन रुद्दी शेल डक, वाइट आई पोचर्ड, स्पून बिल, सारस क्रेन, बारहेडेड, ओपन बिल स्टोर्क, वाइट आईबीज, ग्लॉसी आईबीज, लेसर विस्लिंग, टील लिटिल ग्रीव, कोरमोरेंट, पौंड हेरॉन, पर्पल हेरॉन दिखायी दे रहे हैं।</p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />जैदी ने बताया कि शहर व ग्रामीण इलाकों के विभिन्न वेटलैंड देसी विदेशी पक्षियों के कलरव से गूंज रहे हैं। इनमें आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, जोहरा बाई, गोपाल विहार, किशोर सागर दरा, रानपुर व लाखावा तलाब, उदपुरिया, बरधा बांध, गिरधरपुरा, बोराबांस तालाब सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कोटा की आबोहवा में परवाज भरते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। हाड़ौती का मौसम इन परिंदों के अनुकूल होने से इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।</p>
<p><strong>मार्च तक प्रवास पर रहेंगे यह पक्षी</strong><br />कॉमन कूट, रूडी शेल डक, बार हैडेड गूज, ग्रेलेक गूज, पिनटेल, कॉमन टील, कॉमन पोचार्ड, गार्गेनि टील, गढ़वाल कॉटन टील, इरेशियन करल्यू, स्टेपी ईगल, ब्लू थ्रोट, ग्रेलेक गूंज, ब्लैक स्टॉर्क सहित कई विदेशी परिंदें शामिल हैं। इनके अलावा स्थानीय पक्षियों से भी तालाब गुलजार हो रहे हैं। इनमें लेसर विस्लिंग टील, स्पॉट बिल डक, पेंटेर्ड स्टॉर्क, पर्पल मुरहेंन, इंडियन मुरहेन, वाइट आईबीज, इग्रेट वाटर शामिल हैं। इनका प्रवास मार्च तक रहेगा।</p>
<p><strong>उत्तरी अमेरिका ब्लू थ्रोट, कजाकिस्तान से स्टेपी ईगल</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि मिस्त्र का राष्ट्रीय पक्षी स्टेपी ईगल और उत्तरी अमेरिका से ब्लू थ्रोट पक्षी भी अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। वहीं, अलास्का, साइबेरिया व रूस से आए दुर्लभ प्रजाति के ब्लूथ्रोट पक्षियों ने डेरा डाल रखा है। इनके अलावा यूरेशियन कर्लियु, व्हाइट आई पोचार्ड, व्हाइट टेल्ड लैपविग, स्पॉटेड ईगल, मार्श हैरियर, मार्श सैंड पेपर, बूटेड ईगल, रुडी शैल डक भी दस्तक दे चुके हैं।</p>
<p><strong>रेड मुनिया बनी आकर्षण का केंद्र</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, अभेड़ा तालाब में कलरफूल पक्षी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में बर्ड्स वॉचर पहुंच रहे हैं। यहां रेड मुनिया, ब्लैक काइट, रेड वेंटेड, बुलबुल साइबेरियन, मुनिया सन बर्ड सहित कई कलरफूल पक्षियों ने अभेड़ा व बायोलॉजिकल पार्क के जंगलों में डेरा जमाया हुए है, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है।</p>
<p><strong>बर्फबारी से बचने व भोजन की तलाश में आते पक्षी</strong><br />शेख बताते हैं, उत्तरी अमेरिका के अलास्का, हिमालयी क्षेत्र और ईस्ट साइबेरिया में अक्टूबर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। जिससे बढ़ने वाली तीखी सर्दी से बचने के लिए ये पक्षी ऐसे स्थानों पर आशियाना बनाते हैं, जहां इन क्षेत्रों के मुकाबले ठंड कम रहती है। विदेशी पक्षी तेज सर्दी से बचने को आशियाने की तलाश में यहां आए हैं। इनका प्रवास नवम्बर से शुरू हो जाता है, जो मार्च तक रहता है। इसके बाद यह वापस अपने मुल्क लौट जाते हैं।</p>
<p><strong>बर्ड्स के व्यवहार व हैबीटाट पर बढ़ रहा अनुसंधान</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशू शर्मा कहती हैं, बर्ड्स पर अनुसंधान लगातार बढ़ रहा है। प्रोजेक्ट वर्क व बर्ड्स वॉचिंग करने बड़ी संख्या में शोधार्थी वेटलैंड पर पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हैं। वन्यजीव विभाग द्वारा भी उम्मेदगंज में प्राकृतिक हैबीटाट डवलपमेंट पर कार्य कर रहा है। </p>
<p><strong>इसी एक ही पेड़ पर एक साथ दिखे 12 प्रजातियों के पक्षी</strong><br />सेवानिवृत प्राणीशास्त्र प्रोफेसर डॉ. सुरभि श्रीवास्तव ने बताया कि इन दिनों स्टेशन क्षेत्र में देसी विदेशी परिंदे बड़ी संख्या में नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक ही पेड़ पर 12 प्रजातियों के पक्षी एक साथ नजर आए हैं। इनमें 3 प्रजातियों की हैरॉन, 4 प्रजातियों के इग्रेट और 3 प्रजातियों के कोरमोरेंट सहित अन्य पक्षी शामिल हैं। वहीं, कजाकिस्तान व सेंट्रल एशिया से रोजी स्टारलिंग व साइबेरियन स्टोन चैट बर्ड्स भी दिखाई दे रही है। कोटा देसी विदेशी पक्षियों को कोटा की आबोहवा रास आ रही है। उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से सौगरिया क्षेत्र में सड़क का काम चल रहा है, शोर अधिक होने से इस एरिया में पक्षियों की संख्या कम हो गई है। सड़क मरम्मत कार्य जल्द करवाया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Dec 2025 14:30:30 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title> कोटा के 4 तालाबों पर दो दिन में मिले 150 प्रजातियों के 8 हजार परिंदे, अब ई-बर्ड ऐप से पक्षियों की गणना  </title>
                                    <description><![CDATA[वन्यजीव विभाग के डीसीएफ ने बताया कि बर्ड्स पर रिसर्च की दृष्टि से शहर के तलाब बर्ड्स डेस्टिनेशन प्वाइंट बन रहे हैं। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/8-thousand-birds-of-150-species-found-in-two-days-on-4-ponds-of-kota/article-105367"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer-(3)43.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के वैटलेंड अब बर्ड्स डेस्टिनेशन प्वाइंट्स बन रहे हैं। देश-विदेश से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आ रहे हैं। इसका खुलासा हाल ही में वन्यजीव विभाग की ओर से करवाए गए मिड विंटर वाटर फोल पोपुलेशन ऐस्टीमेशन-2025 की रिपोर्ट से हुआ। ऐस्टीमेशन के तहत शहर के 4 तालाबों पर करवाई गई गणना में 150 प्रजातियों के 8 हजार से ज्यादा देसी-विदेशी परिदें काउंट हुए हैं। आंकड़ों के मुताबिक महज चार तालाबों पर ही हजारों की तादाद में परिंदे मिले हैं, जबकि यहां तीन दर्जन से अधिक तालाब हैं, जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का समूह देखने को मिल  रहे हैं।  </p>
<p><strong>इन तालाबों पर मिले 8 हजार परिंदे</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीसीएफ अनुराग भटनागर ने बताया कि बर्ड्स पर रिसर्च की दृष्टि से शहर के तलाब बर्ड्स डेस्टिनेशन प्वाइंट बन रहे हैं। गत 30 व 31 जनवरी को मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टीमेशन-2025 के तहत पक्षियों की गणना करवाई गई थी। जिसमें जोराबाई, अभेड़ा व सालकिया तालाब व उम्मेदगंज पक्षी विहार को मिलाकर करीब 150 प्रजातियों के 8000 से ज्यादा पक्षी नजर आए हैं। ऐसे में यह वैटलैंड न केवल रिसर्च की दृष्टि से बल्कि बर्ड्स वॉचिंग के लिए बेहतर डेस्टिनेशन के रूप में विकसित हो रहे हैं। </p>
<p><strong>अब ई-बर्ड ऐप से पक्षियों की गणना </strong><br />कोटा जिले के किस कोने में कौनसे प्रजातियों के पक्षियों की संख्या कम या अधिक है, इसकी जानकारी एकत्रित किए जाने के लिए वन्यजीव विभाग की ओर से ई-बर्ड ऐप लॉन्च किया है। जिसके जरिए शहरवासी पक्षियों से जुड़ सकेंगे। वह अपने घर आंगन में आने वाले पक्षियों को देख उनका डेटा इस ऐप में फीड कर सकते हैं। जिससे ऐप पर पक्षियों का डेटा एकत्रित हो सकेगा। साथ ही यह भी पता लग पाएगा कि हमारे इलाके में किस तरह के पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है।  </p>
<p><strong>शोधार्थियों के लिए तैयार होगा डेटा </strong><br />डीसीएफ भटनागर ने बताया कि इस ऐप के जरिए एकत्रित होने वाला डेटा बर्ड्स पर रिसर्च करने वाले विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। ऐप में हर साल जिले में आने वाले विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों की संख्या, हैबीटाट, दिनचर्या, व्यवहार सहित कई जानकारी मिल पाएगी। क्योंकि, इस ऐप को पक्षी विशेषज्ञ भी समय-समय पर अपडेट कर रहे होते हैं।  </p>
<p><strong>इन प्रजातियों के यह पक्षी आए नजर</strong><br />जोराबाई तालाब, अभेड़ा व सालकिया तालाब पर गत 30 जनवरी को करवाई गई पक्षी गणना में देश-विदेश से आए विभिन्न प्रजातियों के प्रवासी पक्षी नजर आए। यहां 65 प्रजातियों के विदेशी पक्षियों सहित 80 अन्य प्रजातियों के 5000 पक्षी नजर स्पोर्ट हुए। जिसमें कोमन पोचार्ड, क्रेस्टेड पोचर्ड, टफ्टेड पोचार्ड, लिटिल गीब, गल, स्टार्क,  लिटिल रिंग फ्लॉवर, रफ, कॉमन टील, ब्लू थ्रोट, विस्किर्ड टर्न, रिवर टर्न, कॉमन कूट, गेडवेल, गागीर्नी, इंडियन कर्सर,कॉटन पिग्मी गीज, बुटेड ईगल,ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, टावनी ईगल, मार्स हैरियर, इंडियन वाइट आई, ब्लू फ्लाई कैचर, हनी बजार्ड, ग्रे हेडेड कैनरीफ्लाई कैचर, यूरेशियन कर्लुव सहित कई पक्षी शामिल है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/8-thousand-birds-of-150-species-found-in-two-days-on-4-ponds-of-kota/article-105367</link>
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                <pubDate>Mon, 24 Feb 2025 16:56:33 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>चौमहला से मजदूर पलायन को मजबूर, सरकार से उद्योग लगाने की आस</title>
                                    <description><![CDATA[रेल और सड़क कनेक्टिविटी होने के बाद भी युवा बेरोजगार।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/laborers-forced-to-migrate-from-chaumhala/article-104033"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer-(4)17.png" alt=""></a><br /><p>चौमहला। गंगधार उपखंड क्षेत्र की प्रमुख व्यापारिक मंडी एवं दिल्ली मुंबई सेंट्रल रेलवे लाइन पर स्थित चौमहला क्षेत्र में कोई बड़ा उद्योग नहीं होने से बेरोजगारों के सामने रोजगार व मजदूरों के सामने दूसरी जगह पलायन का संकट बना हुआ है। क्षेत्र में बिजली, पानी, सड़क व रेल जैसे बुनियादी ढांचे की उपलब्धता व  चंबल, शिप्रा, छोटी काली सिंध जैसी प्रमुख नदियां होते हुए भी कस्बा बरसों से एक अदद उद्योग को तरस रहा है। क्षेत्र के पढ़े लिखे बेरोजगार युवा और मजदूर वर्ग के लोग नई सरकार से उद्योग की आस लगाए बैठे हैं। झालावाड़ जिले की डग विधान सभा क्षेत्र के गंगधार उपखंड के चौमहला क्षेत्र में  रोजगार के कोई  प्रमुख साधन बड़ा उद्योग नहीं होने के कारण क्षेत्र के पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं और मजदूरों के पास जीवन यापन का कोई ठोस आधार नहीं है। इस कारण यहां के युवा बेरोजगार व मजदूर पलायन कर अपने दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए जा रहे हैं।</p>
<p>क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, जलवायु उद्योग के लिए काफी अनुकूल है। साथ ही बिजली, पानी की भी समुचित उपलब्धता है। वहीं चौमहला झालावाड़ जिले की डग विधान सभा क्षेत्र के गंगधार उपखंड की मुख्य व्यापारिक मंडी है। तहसील गंगधार क्षेत्र में 116 गांव आते हैं। जिसकी आबादी करीब सवा लाख  है। डग व गंगधार तहसील मिलाकर 191 गांव हैं जिसकी आबादी करीब दो लाख है। इतने बड़े क्षेत्र के लिए आजादी के बाद से कोई उद्योग नहीं होने से लोगों को अपना घर बार छोड़ कर दूसरी जगह जाना पड़ता है। क्षेत्र के बाशिंदों का कहना है कि चौमहला क्षेत्र में कोई बड़ा उद्योग खुलना चाहिए। जिससे क्षेत्र का समुचित विकास हो सके। इसके लिए सभी दलों के जनप्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से प्रयास करने चाहिए।</p>
<p><strong>व्यापार संघ ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र</strong><br />खाद्य एवं किराना व्यापार संघ अध्यक्ष पवन पिछोलिया ने मुख्य मंत्री, सांसद दुष्यंत सिंह, विधायक कालूराम मेघवाल को पत्र लिख कर आगामी बजट में चौमहला क्षेत्र में औद्योगिक इकाई स्वीकृत करने की मांग की है। पत्र में लिखा कि प्रयास कर बजट में चौमहला क्षेत्र में किसी बड़े उद्योग की स्वीकृति कराई जाए।  पत्र में बताया कि क्षेत्र में पानी की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है व बड़े बांध प्रस्तावित हैं। औद्योगिक इकाई के लिए पठारी भूमि, दिल्ली मुंबई रेल मार्ग, नदियों की उपलब्धता है।</p>
<p><strong>रेल व सड़क कनेक्टिविटी उपलब्ध</strong><br />क्षेत्र में दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे 8 लाइन, गरोठ उज्जैन इंदौर फोर लाइन समीप ही है। जिससे देश के हर कोने में वाहन से माल की सप्ेलाई हो सकती है। वहीं चौमहला पश्चिम रेलवे के दिल्ली-मुंबई मुख्य व सीधी रेल लाइन पर स्थित है। क्षेत्र में भयंकर बेरोजगारी है। जिससे श्रमिकों की उपलब्धता की भी कोई समस्या नहीं है। रोजगार नहीं होने से श्रमिक अन्य राज्यों में मजदूरी के जाते हैं। अगर यहां कोई बड़ा उद्योग लगता है तो आसानी के साथ श्रम बल भी उपलब्ध होगा और क्षेत्र के लोगों को अपना घर, गांव व कस्बा छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना पड़ेगा। क्षेत्र में शांत वातावरण के सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। बड़ा उद्योग लगाने से क्षेत्र का विकास होगा।</p>
<p>क्षेत्र में कोई उद्योग नहीं होने से बेरोजगारी है। श्रमिक मजदूरी के लिए अन्य राज्यों में पलायन करते है। यहां बिजली, पानी, पठारी जमीन के साथ रेल व सड़क का साधन उपलब्ध है। यहां कोई उद्योग फैक्ट्री खुलनी चाहिए। इसको लेकर मुख्यमंत्री,सांसद, विधायक को भी पत्र लिखा है।<br /><strong>- पवन पिछोलिया, अध्यक्ष खाद्य एवं किराना व्यापार संघ चौमहला</strong></p>
<p>कोई औद्योगिक इकाई खुले इसके लिए  प्रयास किए जा रहे है। इस विषय में विधायक को ज्ञापन भी दिया गया है। उद्योग खुलने से बेरोजगारी कम होगी रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।<br /><strong>- गौतम जैन, भाजपा मंडल अध्यक्ष</strong></p>
<p>चौमहला क्षेत्र में कोई औद्योगिक इकाई खुलती है। क्षेत्र का विकास होगा। बेराजगारी कम होगी।<br /><strong>- जगदीश अग्रवाल, ग्रेन व्यवसाई</strong></p>
<p>क्षेत्र में औद्योगिक इकाई खुले इसके लिए प्रयास जारी है।<br /><strong>- कालूराम मेघवाल, विधायक डग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>झालावाड़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 16:46:37 +0530</pubDate>
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                <title>सात समंदर पार से कोटा पहुंचे विदेशी परिंदे</title>
                                    <description><![CDATA[विदेशों में बर्फबारी होने से माइग्रेट कर कोटा आ रहे पक्षी। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/foreign-birds-reached-kota-from-across-the-seven-seas/article-96894"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/9930400-sizee18.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों किमी का सफर कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। कजाकिस्थान, उजबेकिस्थान, साइबेरिया, मंगोलिया, रूस, चीन, उत्तरी अमेरिका सहित कई देशों से बड़ी संख्या में परिंदे शिक्षा नगरी की आबो-हवा में परवाज भर रहे हैं। यूरोपियन व एशियाई देशों में बर्फबारी होने से अपने अनुकूल वातावरण व भोजन की तलाश में यह परिंदे सात समंदर पार कर देश के विभिन्न राज्यों में अपना आशियाना बना रहे हैं। इन दिनों कोटा के दो दर्जन से अधिक वेटलैंड पर देसी-विदेशी पक्षियों पक्षियों का कलरव चहकने लगा है।  </p>
<p><strong>यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से आए पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, विदेशी पक्षियों का कारवां यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से कोटा पहुंचे हैं। इनमें कजाकिस्थान, उज्बेकिस्थान, साइबेरिया, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, स्वजरलैंड, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस सहित करीब एक दर्जन देशों से 10 हजार एयर किमी का सफर कर बड़ी संख्या में मेहमान प्रवास पर आए हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कॉमन कूट, स्पोर्ट बिल परपल, मुरहेंन रुद्दी शेल डक, वाइट आई पोचर्ड, स्पूनबिल, सारस क्रेन बारहेडेड, ओपन बिल स्टोर्क, वाइट आईबीज, ग्लॉसी आईबीज,  लेसर विस्लिंग, टील लिटिल ग्रीव, कोरमोरेंट पौंड हेरॉन, पर्पल हेरॉन दिखायी दे रहे हैं।</p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />जैदी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वेटलैंड देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, जोहरा बाई, गोपाल विहार, किशोर सागर दरा, रानपुर व लाखावा तलाब, उदपुरिया, बरधा बांध, गिरधरपुरा, बोराबांस तालाब सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कोटा की आबोहवा में बेखौफ परवाज भरते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। हाड़ौती का मौसम इन परिंदों के अनुकूल होने से इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।</p>
<p><strong>4 माह तक प्रवास पर रहेंगे यह पक्षी  </strong><br />पक्षी प्रेमी जुनैद शेख ने बताया कि यहां विदेशी पक्षियों में कॉमन कूट, रूडी शेल डक, बार हैडेड गूज, ग्रेलेक गूज, पिनटेल, कॉमन टील, कॉमन पोचार्ड, गार्गेनि टील, गढ़वाल कॉटन टील, इरेशियन करल्यू, स्टेपी ईगल, ब्लू थ्रोट, ग्रेलेक गूंज, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क शामिल हैं। इनके अलावा स्थानीय पक्षियों से भी तालाब गुलजार हो रहे हैं। इनमें लेसर विस्लिंग टील, स्पॉट बिल डक, आॅप्रबिल स्टॉर्क, इंडियन मुरहेन, वाइट आईबीज, इग्रेट वाटर शामिल हैं। मार्च तक इनका प्रवास रहेगा।</p>
<p><strong>उत्तरी अमेरिका ब्लू थ्रोट भी पहुंचा</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि मिस्त्र का राष्टÑीय पक्षी स्टेपी ईगल और उत्तरी अमेरिका से ब्लू थ्रोट पक्षी भी अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। वहीं, अलास्का, साइबेरिया व रूस से आए दुर्लभ प्रजाति के ब्लूथ्रोट पक्षियों ने डेरा डाल रखा है। इनके अलावा यूरेशियन करलेयु, रफ, व्हाइट आई पोचार्ड, व्हाइट टेल्ड लैपविग, स्पॉटेड ईगल, मार्श हैरियर, मार्श सैंड पेपर, बूटेड ईगल, रुडी शैल डक भी दस्तक दे चुके हैं।  </p>
<p><strong>यूरोपियन देशों में बर्फबारी से बढ़ा भोजन का संकट</strong><br />पक्षी प्रेमी हरफूल शर्मा बताते हैं, उत्तरी अमेरिका के अलास्का, हिमालयी क्षेत्र और ईस्ट साइबेरिया में अक्टूबर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। जिससे पक्षियों के लिए भोजन का संकट हो जाता है। ऐसे में तीखी सर्दी से बचने व भोजन की तलाश में ऐसे स्थानों पर आशियाना बनाते हैं, जहां इन क्षेत्रों के मुकाबले ठंड कम रहती है। विदेशी पक्षी तेज सर्दी से बचने को आशियाने की तलाश में यहां आए हैं। इनका प्रवास नवम्बर से शुरू हो जाता है, जो मार्च तक रहता है। </p>
<p><strong>रेड मुनिया बनी आकर्षण का केंद्र</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, अभेड़ा तालाब में कलरफूल पक्षी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में बर्ड्स वाचर पहुंच रहे हैं। यहां रेड मुनिया,  ब्लैक काइट, रेड वेंटेड, बुलबुल साइबेरियन, मुनिया सन बर्ड सहित कई कलरफूल बडर््स ने अभेड़ा में डेरा जमाया हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है।  </p>
<p><strong>रिसर्च का दायरा बढ़ा, शिकार पर अंकुश लगा  </strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशू शर्मा कहती हैं, बर्ड्स पर अनुसंधान लगातार बढ़ रहा है। प्रोजेक्ट वर्क व बर्ड्स वॉचिंग करने बड़ी संख्या में शोधार्थी वेटलैंड पर पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हैं। उनकी मौजूदगी होने से शिकार संबंधित समस्याओं पर अंकुश लगा है। वहीं, लोगों में अवेयरनेस भी बढ़ी है। इसी वजह से स्थानीय व प्रवासी पक्षियों की संख्या में अपेक्षाकृत इजाफा हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Dec 2024 15:21:42 +0530</pubDate>
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                <title>विदेशों से कोटा पहुंचे वल्चर, चम्बल बनी आशियाना </title>
                                    <description><![CDATA[हर साल दुनियाभर से प्रवास पर आते हैं गिद्ध। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/vultures-reached-kota-from-foreign-countries--chambal-became-their-home/article-95845"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(1)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दुनिया के कई देशों से वचर्ल्स कोटा में दस्तक दे चुके हैं। चंबल की कराइयों में विभिन्न प्रजातियों के गिद्धों  की दुनियां आबाद हो रही है। मुकुंदरा की वादियों में आशियाना बसाया है। कोटा से रावतभाटा के जंगलों व चंबल की कराइयों में विभिन्न प्रजातियों के करीब 1200 से ज्यादा वल्चर नजर आ रहे हैं।  वहीं, हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस वल्चर विश्व के 19 देशों से मुकुंदरा में प्रवास पर आए हैं। </p>
<p><strong>हवा में बैक्टेरिया फैलने से रोकता है वल्चर</strong><br />बड्स रिसर्चर हर्षित कहते हैं, वल्चर्स का झुंड मृत जानवर के शरीर को मात्र 20 से 25 मिनट में ही चट कर जाते हैं। जिससे मृत जानवरों के अवशेष से बैक्टेरिया हवा में फैल नहीं पाते। यही वजह है कि जंगलों में दुर्गंध नहीं होती। पारिस्थितिक तंत्र में गिद्दों की भूमिका अहम है। </p>
<p><strong>इन देशों से कोटा आए वल्चर</strong><br />जैदी बताते हैं, विश्व के 19 देशों से तीन प्रजातियों के वल्चर मुकुंदरा में प्रवास पर आए हैं। जिनमें हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस शामिल हैं। यह वल्चर चीन, साइबेरिया, उत्तरी अमेरिका, यूरोप, इटली, मंगोल, इंडोनेशिया, उज्बेकिस्तान, आस्ट्रिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, स्वट्जरलैंड व कोरिया, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, अजरबेजान सहित कई देशों से आए हैं। इन देशों में बर्फबारी के कारण सर्दी तेज होने से खुद को बचाने व भोजन की तलाश में प्रवास पर आते हैं। </p>
<p><strong>इंसानों को एंथ्रेक्स वायरस से बचाता है गिद्ध</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशु शर्मा ने बताया कि गिद्दोें को प्राकृतिक सफाईकर्मी कहा जाता है। इनके पेट में शक्तिशाली एसिड होता है, जो हड्डियों के साथ हैजे और ऐंथ्रैक्स जैसे जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। ये जीवाणु इंसानों के लिए जानलेवा होता है। एक गिद्ध सालभर में करीब 120 किलो मांस खा सकता है। उनके झुंड को मृत जानवर के एक शव को निपटाने में महज 20 से 25 मिनट लगते हैं। उनका पाचन तंत्र मांस को पचाकर अच्छी खाद बनाता है, यानी वे मिट्टी में पोषक तत्व भी छोड़ते हैं।</p>
<p><strong>दो सौ से ज्यादा पक्षियों का गूंजता कलरव</strong><br />पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, मुकुन्दरा हिल्स में पक्षी की दौ सौ से ज्यादा प्रजातियां है। इनमें क्रेसअ‍ेड सरपेंट, ईगल, शॉर्ट टोड,पैराडाइज फ्लाई केचर, सारस क्रेन, स्टोक बिल किंग फिशर, कलर्ड स्कोप्स आउलग्रीन पीजन, गोल्एन ओरिओल, बैबलर, गागरोनी तोता, टुईंया तोता, एलेक जेन्डेरियन पैराकीट, रूडी शेल्डक, वाइट पैलिकन, ग्रेट फलेमिंगो, नोर्दन शावलर, नोर्दन पिंटटेल, बार एडेड गूज, ग्रेलेक गूज, गारगेनी टील समेत कई प्रजातियों के पक्षियों का कलरव गूंजता है। मुकुंदरा, जैव विविधता से भरपूर होने के साथ बायोडायवरसिटी पक्षियों के अनुकूल है।</p>
<p><strong>मुकुंदरा में पाई जाती है वल्चर की 4 प्रजातियां</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा का कहना है, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में वल्चर्स की 4 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें इंडियन लॉन्ग बिल्ड वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, किंग वल्चर, व्हाइट बेक्ड वल्चर शामिल हैं, जो स्थानीय हैं। वहीं, विदेशों से आने वाले वल्चर्स में तीन प्रजाति शामिल हैं। जिनमें  हिमालयन ग्रिफॉन वल्चर, यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस ग्रिफॉन वल्चर्स यूरोपियन देशों से प्रवास पर आए हैं, जो मार्च माह तक रहते हैं। स्थानीय वल्चर की संख्या में अपेक्षाकृत इजाफा हुआ है। </p>
<p><strong>तीन दर्जन से ज्यादा नजर आए अंडे </strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी के अनुसार, गरडिया महादेव, गेपरनाथ, भैंसरोडगढ़, जवाहर सागर व राणा प्रताप सागर के आईलैंड, गिरधरपुरा , बोराबांस सहित चंबल की कराइयों में लोंग बिल्ड वल्चर अधिक संख्या में नजर आने लगे हैं। आॅक्टूबर माह से नेस्टिंग शुरू हो जाती है। इन जगहों पर तीन दर्जन से अधिक गिद्दों के अंडे नजर आने लगे हैं। यह अपने घौंसले चट्टानों के बीच दरारों व पेड़ों पर बनाते हैं। एक महीने बाद अंडों से चूजे बाहर आएंगे। ऐसे में इनकी संख्या बढ़ना प्रकृति के जीवन चक्र के लिए अच्छे संकेत माने जाते हैं। </p>
<p><strong>मुकुंदरा में 1500 से ज्यादा संख्या </strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशु शर्मा ने बताया कि मुकुंदरा  के जंगलों में सबसे ज्यादा संख्या इजिप्शियन वल्चर की है। यह वल्चर प्रजातियों में सबसे छोटे कद का होता है। अनंतपुरा व अभेड़ा डम्पिंग यार्ड व बोराबांस के इलाकों में ज्यादा नजर आते हैं। कोटा से रावतभाटा तक इनकी संख्या करीब 1200 है। वहीं, लोंग बिल्ड वल्चर 500 से 600 तथा वाइट रेम्पर्ड 200 से 250 के बीच संख्या में है। वहीं, किंग वल्चर सबसे कम देखने को मिलते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 15:31:28 +0530</pubDate>
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                <title>उदपुरिया में उजड़ी जांघिल पक्षियों की बस्ती, दुर्दशा का शिकार हुआ तालाब</title>
                                    <description><![CDATA[लगातार घटती पेड़ों की संख्या से जांघिलों ने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो गए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/colony-of-wild-birds-destroyed-in-udpuriya--pond-becomes-victim-of-plight/article-58354"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/kota-news3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती में पेंटेर्ड स्टॉर्क बर्ड की जन्मस्थली कहलाने वाला उदपुरिया तालाब इन दिनों दुर्दशा का शिकार हो रहा है। पेड़ों की अवैध कटाई के कारण जांघिलों की बस्ती उजड़ गई। तालाब जलकुंभी से अटा पड़ा है तो पानी किनारे जगह जगह गंदगी के ढेर लगे हैं। कूड़े कचरे से उठती दुर्गंध से तालाब का मनोहारी वातारण दूषित हो गया। पूर्व में तालाब किनारे लगभग 50 पेड़ हुआ करते थे, लेकिन, स्थानीय पंचायत प्रशासन व पर्यटन विभाग की अनदेखी के चलते आज एक भी नहीं बचा। हालात यह हैं कि शाम ढलते ही तलाब किनारे नशेड़ियों की महफिल सजती है। यहां जगह-जगह शराब की खाली बोतलों का ढेर लगा हुआ है। यदि, पर्यटन विभाग ध्यान दे तो उदपुरिया तालाब हाड़ौती का कैलादेवी पक्षी विहार के रूप में उभर सकता है। </p>
<p><strong>2015 के बाद से नहीं बनाए घौंसले</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि पेंटर्न स्टोक बर्ड यानी जांघिल प्रवासी पक्षी हैं, इनका प्रवास अगस्त से फरवरी तक रहता है। पहली बार 1995 में जांघिलों ने उदपुरिया में दस्तक दी थी। वर्ष 2015 तक इन्होंने यहां लगातार बस्ती बसाई। इस दरमियानयहां 6 हजार के लगभग नन्हें मेहमान जन्मे थे। वहीं, कई सीजन में 250 से अधिक नीड़ बनाए और 600 बच्चों ने उदपुरिया में जन्म लिया था। लेकिन, 2015 के बाद से यहां मानवीय दखल व अतिक्रमण बढ़ने की वजह से इन्होंने यहां घौंसले नहीं बनाए और उदपुरिया छोड़ बारां जिले के सोरसन की तरफ रूख कर लिया। जबकि, वर्ष 2010 में इन्होंने उदपुरिया तालाब किनारे पेड़ों पर करीब 250 घौसलें बनाए थे। लेकिन, धीरे-धीरे पेड़ों की संख्या कम होती चली गई और घौंसलों की भी संख्या घटती चली गई। </p>
<p><strong>पर्यटन केंद्र बन सकता है उदपुरिया</strong><br />जैदी बताते हैं, प्रशासन व जिला पर्यटन विभाग ध्यान दे तो उदपुरिया तालाब कैलादेवी पक्षी विहार जैसा खूबसूरत पर्यटन केंद्र बन सकता है। उदपुरिया अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया। तालाब की पाल जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गई। लगातार घटती पेड़ों की संख्या से जांघिलों ने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो गए। </p>
<p>इसी का नतीजा है, कि वर्ष 2015 से जांघिलों ने उदपुरिया से मुंह मोड़ लिया और बारां जिले के अमलसरा व सोरसन क्षेत्र के तालाबों को बस्तियां बनाकर आबाद किया। वहीं, गोदल्याहेड़ी गांव के राजपुरा तालाब किनारे पेड़ों पर अपना आशियाना बनाया। इसके अलावा मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व क्षेत्र, रामगंजमंडी, उंडवा, चित्तौड़, जोधपुर समेत व अन्य जगहों पर भी इनकी मौजूदगी है।  </p>
<p><strong>पर्यटन विभाग को ध्यान देने की जरूरत</strong><br />स्थानीय निवासी पक्षी प्रेमी श्याम जांगिड़ कहते हैं, यहां पक्षियों का आना अच्छा संकेत है। लेकिन, पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन की ओर से तालाब के आसपास सुरक्षित जगहों पर पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए पौधरोपण करवाए जाना चाहिए। साथ ही इनकी पंसदीदा विलायती बबूल के पेड़ लगाए जाए ताकि, यहां पर्याप्त घोंसले बनाने के लिए इन्हें जगह मिल सके। वहीं, अतिक्रमण हटवाकर व जलकुंभी हटाकर तालाब की सफाई करवानी चाहिए।</p>
<p><strong>जांघिलों की विशेषताएं</strong><br />20 नीड़ बना लेते हैं एक पेड़ पर<br />20 से 25 बरस है औसत आयु<br />3 से 5 अंडे देते हैं एक बार में<br />2 वर्ष में बच्चे हो जाते हैं वयस्क<br />6 हजार बच्चे जन्मे 22 साल में<br />वर्तमान में  उदपुरिया में एक भी जाघिल नहीं है</p>
<p><strong>अपने खर्चे पर कर रहे पक्षियों की निगरानी</strong><br />हाड़ौती नेचुरल सोसाइटी के सदस्य श्याम जांगिड़ स्वयं के खर्चे पर उदपुरिया में जांघिल पक्षियों की देखभाल कर रहे हैं। साथ ही अवैध शिकार, संदिग्ध घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को पाक्षियों की विशेषताएं, इतिहास से रूबरू करवाते हैं।  इसी तरह राजपुरा तालाब में मौजूद पेटेंर्ड स्टॉर्क बर्ड की सुरक्षा में सुरेश नागर तैनात हैं। नागर अपने स्तर पर ही इन पक्षियों की निगरानी करते हैं।</p>
<p><strong>जलकुंभी से अटा और गंदगी से दबा सौंदर्य</strong><br />शहर से करीब 30 किमी दूर दीगोद तहसील के गांव उदपुरिया का तालाब वर्तमान में अतिभेंट चढ़ चुका है। तालाब की पाल पर जगह-जगह ग्रामीणों ने मवेशियों के बाड़े व कच्चे बना लिए हैं। वहीं, तालाब किनारे पेड़ों की भी अवैध कटाई की जा रही है। तालाब पूरी तरह से जलकुंभी से अटा पड़ा है। जिसे साफ करवाने में स्थानीय प्रशासन भी सुध नहीं ले रहा। हालात यह हैं, पहले तालाब के बीचोंबीच करीब 50 पेड़ हुआ करते थे, जो आज एक भी नहीं है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Sep 2023 15:38:12 +0530</pubDate>
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                <title>मेक्सिकन सीमा से भाग कर अमेरिका में प्रवेश कर रहे भारतीय</title>
                                    <description><![CDATA[टेक्सास और कैलिफोर्निया में भारतीय नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक आव्रजन वकील दीपक अहलूवालिया ने कहा कि कुछ प्रवासी आर्थिक कारणों से अमेरिका आ रहे हैं जबकि कई लोग उत्पीडऩ से भाग रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/indians-entering-america-after-fleeing-the-mexican-border/article-26095"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/50600643_605.jpg" alt=""></a><br /><p>वाशिंगटन। मैक्सिकन सीमा से भाग कर बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय अमेरिका में प्रवेश कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान 16,000 से अधिक भारतीय प्रवासी अमेरिका में इस रास्ते से प्रवेश कर चुके हैं। पिछले अक्टूबर में शुरू हुए 2022 के वित्तीय वर्ष की शुरुआत के बाद से, मैक्सिकन सीमा पर रिकॉर्ड 16,290 भारतीय नागरिकों को अमेरिकी हिरासत में लिया गया है। वर्ष 2018 में पिछला उच्च स्तर (भारतीयों के भागकर अमेरिका में प्रवेश करने का) 8,997 दर्ज किया गया था। विशेषज्ञ इस वृद्धि के कई कारणों की ओर इशारा करते हैं। इनमें भारत में भेदभाव का माहौल, महामारी-युग के प्रतिबंधों का अंत, वर्तमान अमेरिकी प्रशासन शरण चाहने वालों के प्रति सकारात्मक रूख और पहले से स्थापित तस्करी नेटवर्क में बढोतरी आदि शामिल हैं। टेक्सास और कैलिफोर्निया में भारतीय नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक आव्रजन वकील दीपक अहलूवालिया ने कहा कि कुछ प्रवासी आर्थिक कारणों से अमेरिका आ रहे हैं जबकि कई लोग उत्पीडऩ से भाग रहे हैं।</p>
<p>भागने वाले समूह में मुस्लिम, ईसाई और 'निम्न-जाति के हिंदुओं से लेकर भारत के एलजीबीटी समुदाय के सदस्य शामिल हैं, जो चरम हिंदू राष्ट्रवादियों या अलगाववादी आंदोलन के समर्थकों और पंजाब क्षेत्र के किसानों के हाथों हिंसा से डरते हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि हाल के वर्षों में इनमें से कई समूहों की स्थिति खराब हुई है। वकील अहलूवालिया ने कहा कि प्रवासी अक्सर अमेरिका को बेहतर जीवन के लिए 'अंतिम प्रवेश द्वार के रूप में देखते हैं, लेकिन भारत और अमेरिका के बीच लंबी दूरी, अमेरिका की यात्रा को बेहद चुनौतीपूर्ण बनाती है। परंपरागत रूप से अमेरिकी-मैक्सिकन सीमा पर पहुंचने वाले भारतीय प्रवासी 'डोर-टू-डोर तस्करी सेवाओं का उपयोग करते हैं, जिसमें भारत से दक्षिण अमेरिका की यात्रा की व्यवस्था की जाती है। भारतीयों को अक्सर पूरे रास्ते निर्देशित किया जाता है, और अपने साथी देशवासियों के साथ छोटे समूहों में यात्रा करते हैं। जो एक ही भाषा बोलते हैं, न कि व्यक्तिगत रूप से या केवल परिवार के सदस्यों के साथ। ये नेटवर्क अक्सर भारत-आधारित 'ट्रैवल एजेंटों से शुरू होते हैं, जो लैटिन अमेरिका में आपराधिक समूहों को भागीदार बनाने के लिए यात्रा के कुछ हिस्सों को आउटसोर्स करते हैं।</p>
<p>वाशिंगटन डीसी स्थित माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टिट्यूट की एक विश्लेषक जेसिका बोल्टर ने कहा कि भारतीय प्रवासियों की संख्या भी एक 'लहर प्रभाव के परिणामस्वरूप बढ़ रही है जो तब होता है जब इन सेवाओं का उपयोग करने वाले सफलतापूर्वक अपने दोस्तों या भारत में रहने वाले अपने परिवार को इसकी सलाह देते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्वाभाविक रूप से फैलता है और अधिक प्रवासियों को आकर्षित करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Oct 2022 18:40:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>श्रीलंका से हर घंटे 32 लोग कर रहे हैं पलायन</title>
                                    <description><![CDATA[जयसूर्या ने लोगों से अपील की कि वे देश में जारी आर्थिक संकट को देखते हुये हर रोज आने वाली दिक्कतों जैसे बिजली कटौती, ईंधन और विदेशी मुद्रा की कमी, कृषि और उद्योग का पतन और मछुआरों की समस्यायों पर ध्यान दें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/32-people-are-migrating-from-sri-lanka-every-hour/article-24531"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/q-86.jpg" alt=""></a><br /><p>कोलंबो। गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे श्रीलंका से हर घंटे 32 नागरिक रोजी रोटी और बेहतर भविष्य की तलाश में अन्य देशों का रूख कर रहे हैं। नेशनल मूवमेंट फॉर जस्ट सोसाइटी के चेयरमैन कारू जयसूर्या ने सोमवार को प्रकाशित एक अखबार में यह सनसनीखेज खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि पुट्टलम जिले के चिलाव में पिछले आठ महीनों में 500 से अधिक डॉक्टर देश छोड़कर जा चुके हैं। आर्थिक मोर्चे पर व्याप्त निराशा के भाव से श्रीलंकाई नागरिकों का देश के प्रति मोहभंग हो रहा है और यही कारण है कि सैकड़ों की तादाद में इंजीनियर और बुद्धिजीवी अन्य देशों का रूख कर चुकें हैं। जयसूर्या ने कहा श्रीलंका में विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए आवश्यक सुविधाओं की कमी के कारण, माता-पिता अब अपने बच्चों के साथ विदेश जाने के लिए अपनी संपत्ति बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ये देश के तेजी से पतन के संकेत हैं।<br /><br />कोई देश इस तरह से विकसित या समृद्ध नहीं हो सकता है। प्रत्येक नागरिक को इन मुद्दों की गहरी समझ होनी चाहिए। जयसूर्या ने लोगों से अपील की कि वे देश में जारी आर्थिक संकट को देखते हुये हर रोज आने वाली दिक्कतों जैसे बिजली कटौती, ईंधन और विदेशी मुद्रा की कमी, कृषि और उद्योग का पतन और मछुआरों की समस्यायों पर ध्यान दें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Sep 2022 11:20:24 +0530</pubDate>
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