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                <title>global warming - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>यूरोप में भीषण गर्मी का कहर: AC पर छिड़ी बहस, EU ने कहा- फैसला जनता की पसंद; Heatwave से 1300 मौतें</title>
                                    <description><![CDATA[यूरोप में रिकॉर्ड गर्मी और 1,300 से अधिक मौतों के बाद एयर कंडीशनर के बढ़ते उपयोग पर बहस तेज हो गई है। हालांकि यूरोपीय आयोग ने एसी के पक्ष या विपक्ष में कोई रुख अपनाने से इनकार किया। आयोग ने कहा कि उपभोक्ताओं की पसंद में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, जबकि ऊर्जा दक्षता और जलवायु नीति पर काम जारी रहेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/extreme-heat-wreaks-havoc-in-europe-debate-on-ac-started/article-158467"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/eu.png" alt=""></a><br /><p>ब्रसेल्स। यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में एयर कंडीशनर (एसी) के बढ़ते उपयोग पर छिड़ी बहस के बीच यूरोपीय आयोग ने इस मुद्दे पर कोई पक्ष लेने से इनकार किया है। आयोग ने कहा कि उपभोक्ताओं की पसंद तय करना यूरोपीय संघ (ईयू) की कार्यपालिका की भूमिका नहीं है। आंकड़ों के अनुसार यूरोपीय संघ में केवल लगभग 20 प्रतिशत घरों में एयर कंडीशनर लगे हैं, जबकि अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत या उससे अधिक है।</p>
<p>यूरोप में हाल में पड़ी भीषण गर्मी से कम से कम 1,300 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद घरों और सार्वजनिक स्थानों पर शीतलन सुविधाओं की कमी राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गई है। रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय आयोग की जलवायु मामलों की प्रवक्ता अन्ना-काइसा इतकोनेन ने कहा, "हम जानते हैं कि यूरोपीय संघ के अधिकांश आवासीय भवनों और अपार्टमेंटों में एयर कंडीशनर नहीं हैं। पारंपरिक रूप से इनका निर्माण इस तरह नहीं हुआ है, विशेषकर इसलिए क्योंकि हमारे अधिकांश आवास काफी पुराने हैं।"</p>
<p>उन्होंने कहा, "एयर कंडीशनर के पक्ष या विपक्ष में आयोग का कोई विशेष रुख नहीं है। हालांकि भवनों और आवासों के नवीनीकरण, ऊर्जा दक्षता और आवास नीति के तहत इस मुद्दे पर काम किया जा रहा है।" जब इस विषय के बढ़ते राजनीतिक महत्व को देखते हुए क्या आयोग को कोई स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए, तो प्रवक्ता ने कहा कि आयोग की प्राथमिकता जलवायु तटस्थता की दिशा में प्रभावी और दक्ष परिवर्तन सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं तो आयोग अपने तटस्थ रुख की समीक्षा कर सकता है।</p>
<p>उन्होंने कहा, "यह भी देखना होगा कि आयोग की शक्तियों की सीमा क्या है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।" इतकोनेन ने कहा, "पिछले सप्ताह की भीषण गर्मी संभवतः इस पूरे ग्रीष्मकाल की शुरुआत भर है। इसलिए यह संभव है कि यह विषय राजनीतिक स्तर पर चर्चा का मुद्दा बने और सदस्य देशों के संकेतों के अनुरूप आयोग भी आवश्यक कदम उठाए।" उन्होंने स्पष्ट किया कि निजी घरों में एयर कंडीशनर लगाने जैसे मामलों में आयोग लोगों के व्यक्तिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। एयर कंडीशनर के विरोधियों का कहना है कि इससे बिजली की मांग बढ़ती है, विद्युत ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, वातावरण में गर्म हवा निकलती है और जलवायु संकट के मूल कारणों का समाधान नहीं होता। वहीं समर्थकों का तर्क है कि भीषण गर्मी के दौरान रहने योग्य परिस्थितियां बनाए रखने और श्रम उत्पादकता बनाए रखने के लिए एयर कंडीशनर एक आवश्यक साधन है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 12:52:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>बेहद गंभीर समस्या है ग्लोबल वार्मिंग</title>
                                    <description><![CDATA[कॉरपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर हमारे सामने दो बेहद गंभीर समस्याएं खड़ी कर दी हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/global-warming-is-a-very-serious-problem/article-129728"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news-(5)4.png" alt=""></a><br /><p>कॉरपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर हमारे सामने दो बेहद गंभीर समस्याएं खड़ी कर दी हैं। इनमें से पहली है पर्यावरण क्षरण की समस्या, जो जलवायु परिवर्तन के रूप में हमारे सामने है। ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव जलवायु परिवर्तन, प्रदूषित वायु, घटते और प्रदूषित जल संसाधन, मिट्टी का क्षरण और उत्पादकता में कमी, खाद्य गुणवत्ता में गिरावट, वनों की आग, बाढ़ और सूखा, समुद्री अम्लीकरण, समुद्री तूफानों की तीव्रता और प्रचंडता में वृद्धि, निरंतर वनों की कटाई, बढ़ता मरुस्थलीकरण, जैव विविधता का ह्रास आदि के रूप में हम देख रहे हैं। दूसरी समस्या अमानवीयकरण से जुड़ी है, जिसका सामना हम गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी, भुखमरी, महंगाई, अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई, भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों का अभाव, बढ़ती बीमारियों का प्रकोप, बेहद खराब जीवन-स्थिति आदि के रूप में कर रहे हैं। इन सबके कारण आम जनता हताश और निराश है। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करें।</p>
<p><strong>कॉरपोरेट व्यवस्था :</strong></p>
<p>लोगों की इसी स्थिति का फायदा उठाकर सत्ताधारी शक्तियां उनमें नफरत के बीज बोती हैं। घुसपैठ, हमारी सबसे बड़ी समस्या है, जैसी बातें कहना इसी तरह, अमीर देशों के लोगों को अप्रवासियों के खिलाफ भड़काना कि वे आपकी नौकरियां छीन रहे हैं और आपकी संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं, अश्वेत लोगों को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनाना, वगैराह वगैराह। कॉरपोरेट व्यवस्था चलाने वाली सरकारें, पार्टियां और कॉरपोरेट कंपनियां खुद को विकास के निर्माता और जनहितैषी बताकर अपना चरित्र छिपाने की कोशिश करती हैं, लेकिन कभी-कभी ये लोगों के गुस्से का शिकार हो जाती हैं। दक्षिण एशिया की हालिया घटनाएं इसकी पुष्टि करती हैं। सार्क देशों, पहले श्रीलंका, बांग्लादेश और हाल ही में नेपाल में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शन इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। इन देशों के लोगों, खासकर युवाओं के त्याग और बलिदान का मूल्य तभी आंका जा सकता है, जब सभी नागरिक समय की मांग के मुताबिक प्रकृति-हितैषी और मानव-हितैषी एजेंडे पर काम करें और विकास के कॉरपोरेट मॉडल को नकारकर प्राकृतिक संसाधनों और मानव संसाधनों के विकास का एक नया मॉडल प्रस्तुत करें।</p>
<p><strong>भ्रष्टाचार को रोकना :</strong></p>
<p>यहां हम अपनी समझ के अनुसार कुछ बातें दुनिया भर के लोगों, खासकर सार्क देशों, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका के लोगों के साथ साझा करना चाहेंगे। बांग्लादेश और नेपाल में जल्द ही आम चुनाव होने वाले हैं। यहां चुनावों का निष्पक्ष और जन-हितैषी होना अति आवश्यक है। राजनीतिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए, चुनावों को धनबल और बाहुबल से अलग रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए, चुनाव सरकारी खर्च पर होने चाहिए और किसी भी उम्मीदवार,पार्टी या उनके समर्थकों के निजी खर्च पर रोक लगाई जानी चाहिए। दूसरा उम्मीदवारी की जमानत राशि नकद नहीं होनी चाहिए, बल्कि जमानत संसद के लिए पांच हजार और विधानसभाओं के लिए एक हजार मतदाताओं के हस्ताक्षर के रूप में होनी चाहिए, यह संख्या बढ़ाई या घटाई जा सकती है। तीसरा, उम्मीदवार के लिए कम से कम 50प्रतिशत वोट प्राप्त करना अनिवार्य किया जाना चाहिए, भले ही इसके लिए दूसरे दौर का चुनाव ही क्यों न कराना पड़े। चौथा, जनता को सीधे चुने गए उम्मीदवार को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए, यानि जब उसके निर्वाचन क्षेत्र के कम से कम 25प्रतिशत मतदाता उसके खिलाफ लिखित शिकायत करें, तो उसे बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>जनता के प्रति जवाबदेह :</strong></p>
<p>किसी भी उम्मीदवार को दो बार से ज्यादा चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। चुने गए उम्मीदवारों को पारदर्शी तरीके से जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। ऐसा करके हम राजनीतिक सत्ता आम लोगों के हाथों में ले सकेंगे, जिससे लोगों का सशक्तिकरण होगा। इन सार्क देशों में सरकार बनने के बाद उसे कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए, ताकि पूंजी से ज्यादा महत्व प्रकृति,पर्यावरण को दिया जाए। हमारा पहला सुझाव है कि पूरे सार्क और उसमें शामिल प्रत्येक देश में प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, जैसे वायु प्रदूषण रोकना, जल क्षरण और प्रदूषण रोकनाय भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण रोकना, जैव विविधता के विरुद्ध चल रहे सभी कार्यों और गतिविधियों को रोकने के लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार करना। इन पर्यावरणीय संसाधनों की पुनर्प्राप्ति, विकास और सुरक्षा के लिए एक कार्ययोजना संबंधित सार्वजनिक एजेंसियों द्वारा तैयार और कार्यान्वित की जानी चाहिए, जिसमें हर प्रदूषणकारी तकनीक को रोकना शामिल हो, चाहे वह कितनी भी उत्पादक और लाभदायक क्यों न लगे।</p>
<p><strong>सुरक्षा की धारणा :</strong></p>
<p>राष्ट्रीय सुरक्षा की धारणा में खाद्य सुरक्षा को अधिक महत्व देते हुए केंद्रीय और प्रांतीय बजट का 50प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक सहकारी कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए आरक्षित किया जाए। सार्क देशों का एजेंडा विश्व शांति स्थापित करना होना चाहिए, जिसके लिए संबंधित सार्क सदस्य देशों के बीच सभी विवादोंजैसे जम्मू-कश्मीर विवाद और प्रत्येक देश के भीतर के विवादों का बातचीत के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान किया जाना चाहिए। हमारा प्रयास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वीटो शक्ति को समाप्त करके संयुक्त राष्ट्र का लोकतंत्रीकरण करना होना चाहिए। मानव जाति के उत्पीड़ित, दबे-कुचले वर्गों जैसे गरीब, भूखे, बेरोजगार, विकलांग आदि के पुनर्वास हेतु एक ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए, जिसके लिए तीन बुनियादी कदम उठाए जाएं। आर्थिक क्षेत्र में प्रत्येक उत्पीड़ित व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार होना चाहिए,अर्थात विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा परिभाषित गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को बेतुके आय अंतर को घटाकर 1-5 के अनुपात में लाकर इसे तर्कसंगत बनाया जाए।</p>
<p><strong>सशक्त बनाया जाए :</strong></p>
<p>सामाजिक सुरक्षा भत्ता प्रति व्यक्ति प्रति दिन 2 डॉलर से अधिक निर्धारित किया जाए। राजनीतिक क्षेत्र में लोगों को सशक्त बनाया जाए और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए, पार्टियों, कंपनियों और नौकरशाही की शक्तियों को सीमित किया जाए, विभिन्न संस्थानों, कारखानों और परियोजनाओं के प्रबंधन में वहां कार्यरत श्रमिकों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का एक-तिहाई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए, सार्क देशों के बीच भाईचारे के संबंध स्थापित करके रक्षा बजट में कटौती की जाए। सांस्कृतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार, कालाधन और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था तथा सभी प्रकार की अवैध गतिविधियों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए, लोगों के मन में मानवीय और पर्यावरणीय मूल्यों का संचार करना चाहिए, ताकि एक विवेकशील मानव समुदाय का निर्माण हो सके। सार्क देशों में निर्णय सर्वसम्मति से होने चाहिए। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना, जिसके तहत सभी सामाजिक संस्थाओं में सभी स्तरों पर महिलाओं को 50प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जाए। सभी संस्थानों में दिव्यांगों को आवश्यक आरक्षण उपलब्ध कराना है। ऐसा करके हम अपने सुनहरे भविष्य की ओर अग्रसर होंगे।</p>
<p><strong>-सुखदेव सिंह</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Oct 2025 12:49:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जलवायु संकट : लक्ष्यों में बदलाव करना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[ग्लोबल वार्मिंग आधिकारिक रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर गई। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/climate-crisis-goals-will-have-to-change/article-111969"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/rtrer-(6).png2310.png" alt=""></a><br /><p>ग्लोबल वार्मिंग आधिकारिक रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर गई। साल 2024 अब तक का मानव इतिहास में दर्ज सबसे गर्म साल रहा। ज्यादातर जलवायु सूचकांक ऐसे टिपिंग पॉइंट के करीब पहुंच गए हैं जहां से वापसी मुमकिन नहीं है। ऐसी संभावना है 2025 पिछले साल का रिकॉर्ड भी तोड़ सकता है। पिछले साल अजरबेजान की राजधानी बाकू में हुए जलवायु परिवर्तन महासम्मेलन में अमीर देशों ने फाइनेंस के नाम पर केवल 300 बिलियन डॉलर का वादा किया, वह भी कई शर्तों के साथ। दूसरी ओर अमेरिका में जलवायु संकट को हौव्वा बताने वाले डोनाल्ड ट्रंप फिर से राष्ट्रपति चुने गए हैं, जो विकासशील देशों के लिए एक नई चुनौती है। जलवायु संकट से सबसे बुरे प्रभाव झेलती प्रभावित भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए इन घटनाओं ने एक बात साफ कर दी, कि जलवायु संकट से निपटने के लिए उन्हें खुद ही फाइनेंस की व्यवस्था करनी होगी। भारत उन देशों में है, जहां जलवायु परिवर्तन के सबसे नुकसानदेह परिणाम हो रहे हैं और राजस्थान जैसे राज्यों को निर्माण, कृषि और व्यापार में इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। आर्थिक सर्वे में भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि क्लाइमेट फाइनेंस की कमी से देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों में बदलाव करना होगा। </p>
<p>जीवाश्म ईंधन का प्रयोग बंद करने के अलावा, भारत के लिए एक मजबूत और प्रभावी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने, स्वच्छ  ऊर्जा अपनाने की गति बढ़ाने और खतरों से घिरे समुदायों का संरक्षण करने के लिए क्लाइमेट फाइनेंस महत्वपूर्ण है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय फाइनेंस न मिलने पर ऐसी क्या वैकल्पिक रणनीतियां हैं जो भारत फाइनेंस पैदा करने के लिए अपना सकता है, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को वैश्विक स्रोतों जैसे डेवलपमेंट बैंक, सॉवरेन वेल्थ फंड, पेंशन और निजी इक्विटी का उपयोग करना चाहिए, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर बैंकों, एनबीएफसी और बड़े निवेशकों के माध्यम से फंड जुटाना चाहिए। उनका मानना है कि पूंजीगत लागत को कम करना, क्रेडिट एक्सेस और डेवलपमेंट बैंको में सुधार कर फंडिंग को सस्ता बनाना, महंगे कर्ज लेने से बेहतर है। </p>
<p>विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, सूखे, बाढ़ और भूस्खलन से एशिया में आर्थिक नुकसान तेजी से बढ़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अकेले 2021 में मौसम संबंधी जोखिमों के कारण कुल 3,560 करोड़ डॉलर की क्षति हुई, जिससे लगभग 5 करोड़ लोग प्रभावित हुए। उसी साल एशिया में 100 से अधिक प्राकृतिक घटनाओं में लगभग 4,000 मौतें हुईं। भारत सरकार का अनुमान है कि पेरिस समझौते के तहत उसे अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान को पूरा करने के लिए उसे 2030 तक 2.5 लाख करोड़ डॉलर की जरूरत होगी, यानि हर साल 17,000 करोड़ डॉलर। चूंकि भारत ने अपने एनडीसी में संशोधन कर लिया है इसलिए यह राशि भी कम पड़ सकती है। बाकू सम्मेलन में जारी एक स्वतंत्र विशेषज्ञ रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक चीन को छोड़कर उभरते बाजारों और विकासशील देशों को क्लाइमेट एक्शन के लिए हर साल 5 लाख करोड़ डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। इसी सम्मेलन में ग्लोबल साउथ के देशों ने 1.3 लाख करोड़ डॉलर के फाइनेंस की मांग की थी, जबकि उन्हें मिले केवल 30,000 करोड़ डॉलर, जो 2035 तक दिए जाएंगे। </p>
<p>फाइनेंस में इस बड़ी कमी की भारत सरकार और जलवायु विशेषज्ञों ने कड़ी आलोचना की थी। भारत जैसे 140 करोड़ से अधिक की जनसंख्या और उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देश को बुनियादी शिक्षा, रोजगार और गरीबी उन्मूलन जैसे कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर फंड्स की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र की 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अपने सकल घरेलू उत्पाद  जीडीपी का 10 प्रतिशत खर्च करना होगा। यानि प्रति व्यक्ति लगभग 2 डॉलर प्रतिदिन। चूंकि सरकार ज्यादातर घरेलू फंडिंग पर निर्भर होगी, इसलिए भारत के जलवायु लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने फरवरी 2025 में संसद में कहा था कि भारत को अबतक 116 करोड़ डॉलर का फाइनेंस मिल चुका है, जो उसकी जरूरत 17,000 करोड़ डॉलर  का एक प्रतिशत भी नहीं है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर क्लाइमेट एक्शन की फंडिंग के लिए भारत घरेलू स्रोतों पर निर्भर है। पिछले साल क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत ने चुनौतियों के बावजूद ग्रीन फाइनेंस जुटाने में अच्छी प्रगति की है। कर्ज की अधिक लागत विकासशील देशों के लिए एक बड़ी चुनौती है। </p>
<p>फाइनेंस के लिए भारत को लंबी अवधि के कम ब्याज वाले लोन, अधिक इक्विटी निवेश और ज्यादा तेजी से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जरूरत है। चुनौती बड़ी है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी योजना और स्मार्ट नीतियों की मदद से भारत सतत विकास के एक मजबूत मॉडल का निर्माण कर सकता है।</p>
<p><strong>-हृदयेश जोशी </strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Apr 2025 11:57:48 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदेश में प्रदूषण के कारण बढ़ रहा ग्लोबल वार्मिंग और तापमान</title>
                                    <description><![CDATA[औद्योगिक अपशिष्ट को ट्रीटमेंट करके ही बाहर निकालना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/global-warming-and-temperature-increasing-due-to-pollution-in-the/article-80585"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/yy211rer-(11).png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। बढ़ते प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ती जा रही है, जिससे कई तरह की आपदाएं देखने को मिल रही हैं। वर्तमान में पड़ रही भीषण गर्मी का कारण भी ग्लोबल वार्मिंग को माना जा रहा है। वहीं, औद्योगिक इकाइयों से भी काफी मात्रा में विषैली गैस निकलती हैं, जिसका दुष्प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ रहा है।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या को दूर करने के लिए थिंक ग्लोबली- एक्ट लोकली के तर्ज पर अधिक से अधिक पौधे लगाने चाहिए। पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए ही हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है लेकिन इसको हर रोज मनाने की जरूरत है।</p>
<p><strong>वर्तमान में तापमान बढ़ रहा</strong><br />प्रदूषण के कारण प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, जैसे वर्तमान में तापमान बढ़ रहा है। यह ग्लोबल वार्मिंग की समस्या है। जैव विविधता का ह्रास है। यह मुख्य समस्या है, इनका निदान स्थानीय स्तर पर करना चाहिए। अधिक से अधिक पौधरोपण करना चाहिए, जिससे पर्यावरण में हरियाली होगी और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निजात मिलेगी। औद्योगिक अपशिष्ट को ट्रीटमेंट करके ही बाहर निकालना चाहिए।</p>
<p><strong>फैक्ट्रियों से निकला दूषित पानी खतरनाक </strong><br />औद्योगिक इकाइयों से मुख्यत: सल्फर व नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ ही कार्बन डाइ ऑक्साइड व मीथेन गैस बाहर निकलती है। यह पानी के साथ मिलकर अम्लीय वर्षा के रूप में एसिड के साथ धरती पर आते हैं, जिससे धरती बंजर हो जाती है। मनुष्य में इन गैस के कारण अनेक प्रकार से दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। औद्योगिक इकाइयों से जो अपशिष्ट जल निकलता है, उससे जल प्रदूषण होता है। इस अपशिष्ट पानी में हेवी मेटल के साथ ही आयल व ग्रीस मिला हुआ होता है, जो भूमि के अंदर मिट्टी को प्रदूषित करते हैं। वहीं, जल के तंत्र (वॉटर बॉडी) को पोल्यूट करते हुए ग्राउंड वाटर को भी प्रदूषित करते हैं। यह प्रदूषण खाद्य श्रृंखला के माध्यम से आगे स्थानांतरित होता है, जिससे मानव जीवन पर खतरनाक प्रभाव पड़ता है। </p>
<p><strong>यह प्रमुख समस्या वैश्विक </strong><br />राजस्थान विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो.राम अवतार शर्मा ने बताया कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ के कारण ही वर्तमान में तापमान 45 से 50 डिग्री पहुंच गया है। यह प्रमुख समस्या वैश्विक है। बहुत ज्यादा ग्लोबल वार्मिंग होगी, तो आने वाले दिनों में अनेक दुष्परिणाम हमें और दिखाई पड़ेंगे। हिमखंड पिघलेंगे और कई तरह की आपदाएं सामने आएंगी। वहीं, अतिवृष्टि और अनावृष्टि का कारण भी ग्लोबल वार्मिंग है। साथ ही फसलों में भी ग्लोबल वार्मिंग का असर देखने को मिलेगा और उत्पादन कम होगा।<br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Jun 2024 15:56:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कॉप-28 जलवायु नियंत्रित करने के लिए कमर कसे</title>
                                    <description><![CDATA[वैज्ञानिक और पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में वैश्विक तापमान और बढ़ेगा इसलिए अगर दुनिया अब भी नहीं सतर्क होगी तो इक्कीसवीं सदी को भयानक आपदाओं से कोई नहीं बचा पाएगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/cop-28-gearing-up-to-control-climate/article-63616"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/gan2.png" alt=""></a><br /><p>धरती की पर्यावरण चिंताओं पर विचार और समस्याओं के समाधान के लिए दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) में आयोजित हो रहा संयुक्त राष्टÑ जलवायु सम्मेलन- कॉप-28 बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग का असर हमारे जीवन पर साफ-साफ दिखने लगा है। 2021 में हुए पेरिस समझौते में दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस पर ही रोकने की बात की गई थी, इस साल 38 से भी अधिक दिन ऐसे रहे हैं जिनमें तापमान औसत से डेढ़ डिग्री ज्यादा रहा था। इस साल तापमान में वृद्धि, महासागर की गर्मी, अंटाकर्टिका की बर्फ  का घटना आदि ने ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को चिन्ताजनक स्तर तक पहुंचा दिया है। जिससे समुद्र किनारे बसे अनेक नगरों एवं महानगरों के डूबने का खतरा मंडराने लगा है, बार-बार बाढ़, सूखा एवं भूस्खलन हो रहा है। इसलिए, विकसित देशों को अपना कार्बन उत्सर्जन कम करने और ग्रीन एनर्जी में निवेश करने की आवश्यकता है। पर्यावरण के बिगड़ते मिजाज एवं जलवायु परिवर्तन के घातक परिणामों ने जीवन को जटिल बना दिया है।<br /><br />वैज्ञानिक और पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में वैश्विक तापमान और बढ़ेगा इसलिए अगर दुनिया अब भी नहीं सतर्क होगी तो इक्कीसवीं सदी को भयानक आपदाओं से कोई नहीं बचा पाएगा। रोम में सम्पन्न हुए जी-20 सम्मेलन में सभी देश धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस कम करने पर राजी हुए हैं। इसके अलावा उत्सर्जन को नियंत्रण करने के तथ्य निर्धारित किए गए हैं। जी-20 ने तो शताब्दी के मध्य तक कार्बन न्यूट्रेलिटी तक पहुंचने का वादा भी किया है। कहीं बाढ़, कहीं सूखा तो कहीं बेमौसम बरसात के चलते 2023 को दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक एक ऐसा वर्ष मान रहे हैं, जहां से पृथ्वी का पर्यावरण एक अज्ञात क्षेत्र यानी संकटकालीन परिवेश में प्रवेश कर रहा है। जाहिर है कि कॉप-28 में अब निर्णायक एवं कार्यकारी स्तर पहुंचना होगा, सिर्फ  लुभावनी योजनाओं एवं भाषणों से काम नहीं चलने वाला, जैसा कि अभी इसमें शामिल 198 देश और उनके प्रतिनिधि कोरी खानापूर्ति करते आए हैं। कॉप की बैठकें भले ही अच्छे भविष्य की रूपरेखा बनाने के लिए आयोजित होती रही हों, लेकिन एक पेरिस समझौते को छोड़ दें तो अभी तक इसमें समस्या के समाधान के लिए बहुत काम नहीं हो पाया है। सभी प्रतिनिधि देशों को इस विकराल एवं ज्वलंत समस्या से निजात पाने के लिए न केवल कमर कसनी होगी, बल्कि आर्थिक सहयोग भी करना होगा। <br /><br />भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कॉप-28 में भाग लेने दुबई पहुंच गये हैं। उन्होंने ग्लासगो में आयोजित हुए अंतरराष्टÑीय जलवायु सम्मेलन (सीओपी 26) में बढ़ते पर्यावरण संकट में पिछड़े देशों की मदद की वकालत की ताकि गरीब आबादी सुरक्षित जीवन जी सके। मोदी ने अमीर देशों को स्पष्ट संदेश दिया कि धरती को बचाना उनकी प्राथमिकता होनी ही चाहिए, वे अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। दरअसल कार्बन उत्सर्जन घटाने के मुद्दे पर अमीर देशों ने जैसा रुख अपनाया हुआ है, वह इस संकट को गहराने वाला है। जलवायु परिवर्तन के घातक प्रभावों ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जलवायु संकट से निपटने के लिए अमीर एवं शक्तिशाली देशों की उदासीनता एवं लापरवाह रवैया को लेकर भारत की चिंता गैरवाजिब नहीं है। दुनिया को जलवायु परिवर्तन की चुनौती को गंभीरता से लेना होगा और इसके दुष्प्रभाव को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे। अभी तक अपने स्वार्थ की वजह से दुनिया के कई देश इस दिशा में तेजी से कदम नहीं उठाते, खासतौर पर अमीर देश। दरअसल, नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने के लिए ग्रीन एनर्जी में भारी-भरकम निवेश करना होगा और प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का इस्तेमाल घटाना होगा। लेकिन इससे कुछ समय के लिए आर्थिक ग्रोथ में कमी आ सकती है। इस वजह से भी एक हिचक कई देशों में दिखती है, जिसके कारण आने वाली पीढ़ियों एवं धरती पर पर्यावरण का भविष्य खराब हो सकता है। <br /><br />भारत में ग्लोबल तापमान के चलते होने वाला विस्थापन अनुमान से कहीं अधिक है। मौसम का मिजाज बदलने के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राथमिक आपदाओं की तीव्रता आई हुई है। भारत में जलवायु परिवर्तन पर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ ॉर एनवायरमेंट एंड डवलपमेंट की जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि बाढ़-सूखे के चलते फसलों की तबाही और चक्रवातों के कारण मछली पालन में गिरावट आ रही है। देश के भीतर भू-स्खलन से अनेक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। भू-स्खलन उत्तराखंड एवं हिमाचल जैसे दो राज्यों तक सीमित नहीं बल्कि केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, सिक्किम और पश्चिम बंगाल की पहाड़ियों में भी भारी वर्षा, बाढ़ और भू-स्खलन के चलते लोगों की जानें गई हैं, इन प्राकृतिक आपदाओं के शिकार गरीब ही अधिक होते हैं, गरीब लोग प्राथमिक विपदाओं का दंश नहीं झेल पा रहे और अपनी जमीनों से उखड़ रहे हैं। गरीब लोग सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर चुके हैं। विस्थापन लगातार बढ़ रहा है। महानगर और घनी आबादी वाले शहर गंभीर प्रदूषण के शिकार हैं, जहां जीवन जटिल से जटिलतर होता जा रहा है।             <br /><br />-ललित गर्ग<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Dec 2023 13:26:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेहद खतरनाक है दुनिया का बढ़ता तापमान</title>
                                    <description><![CDATA[जहां सामान्यतया मार्च के महीने में अंटार्कटिका का तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस रहता है, वहीं साल 2022 के 18 मार्च को यहां का तापमान माइनस 12.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/china-will-not-improve--we-have-to-be-alert/article-56083"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/global-temperature.png" alt=""></a><br /><div>ग्लोबल वार्मिंग का भीषण असर पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। कहीं जंगल की आग है तो कहीं भीषण बाढ़। कहीं सूखे के हालात हैं तो कहीं ग्रीष्म लहर नए रिकॉर्ड बना रही है। कहीं पूरे सीजन की बरसात एक हफ्ते में हो रही है तो कहीं दूर-दूर तक बारिश का नामोनिशान तक नहीं है। मनुष्यों ने अपनी गतिविधियों से तथा विकास के नाम पर प्रकृति से इस कदर छेड़छाड़ की है कि धरती की आबोहवा अब पूरी तरह बदल चुकी है। जहां आमतौर पर जुलाई में दुनिया का औसत तापमान 16 डिग्री सेल्सियस होता है, वहीं ये 6 जुलाई को 17.08 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया और जुलाई के 30 दिनों में धरती का औसत तापमान 17 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जुलाई का महीना अब तक के इतिहास का सबसे गर्म महीना रहा है, जो पिछले साल की जुलाई से करीब 1.20 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है। यह अब तक का धरती का सबसे अधिक औसत तापमान है। विश्व मौसम संगठन के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पिछले एक लाख 20 हजार साल का सबसे गर्म महीना है। यानी पिछले एक लाख 20 हजार सालों में धरती का तापमान इतना अधिक कभी नहीं रहा। इससे पहले सबसे गर्म दिन का रिकॉर्ड अगस्त 2016 में बना था, जब दुनिया का औसत तापमान 16.92 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। दरअसल विश्व का औसत तापमान पूरे वर्ष आमतौर पर 12 डिग्री सेल्सियस से 17 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही रहता है। वर्ष 1979 से लेकर वर्ष 2000 के बीच दुनिया का औसत तापमान 16.2 डिग्री सेल्सियस रहा। धरती के बढ़ते तापमान को देखते हुए हमारी चिंता का बढ़ना स्वाभाविक है, क्योंकि यह एक विस्फोटक रूप ले सकता है। चीन, जापान, कंबोडिया, साउथ कोरिया, फिलीपींस, भारत और पाकिस्तान में बाढ़ आई, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए, कई जानें गईं और बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। एक ओर एशिया के इन हिस्सों में बाढ़ की स्थिति थी, तो दूसरी ओर पश्चिमी देशों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी तथा भीषण लू चल रही थी। दरअसल हमारी धरती इतनी गर्म हो रही है कि संयुक्त राष्टÑ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस पर अपनी गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि यह मानवता के इतिहास का सबसे गर्म समय है। उत्तरी अमेरिका, एशिया, अफ्रीका, और यूरोप के बड़े हिस्से इस समय भयंकर गर्मी से जूझ रहे हैं। पूरी दुनिया के लिए यह मुसीबत का समय है। उन्होंने कहा कि अब ग्लोबल वार्मिंग का दौर बीत चुका है, ये ग्लोबल बॉयलिंग का दौर है। अब न तो गर्मी बर्दाश्त करने लायक बची है और ना ही हवा सांस लेने लायक। उन्होंने यह भी कहा कि अब जीवाश्म ईंधन से होने वाले मुनाफे को काबू करने और जलवायु को ठीक करने में हो रही शिथिलता अस्वीकार्य है। ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताते हुए अमेरिका के प्रेसिडेंट जो बाइडेन ने भी कहा है कि अब कोई भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से इन्कार नहीं कर सकता। जो लोग अभी भी जलवायु परिवर्तन की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और इसके अस्तित्व से इन्कार कर रहे हैं, वे मानवता के लिए खतरनाक हैं।</div>
<div><br />बढ़ते तापमान का सबसे बुरा असर अंटार्कटिका जैसे इलाकों पर पड़ रहा है। जहां सामान्यतया मार्च के महीने में अंटार्कटिका का तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस रहता है, वहीं साल 2022 के 18 मार्च को यहां का तापमान माइनस 12.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। दरअसल पृथ्वी की जलवायु में हो रहे परिवर्तन की गंभीरता का अंदाजा अंटार्कटिका महाद्वीप के टूटते ग्लेशियरों को देखकर लगाया जा सकता है। इन ग्लेशियरों के टूटने का असर अमेरिका से लेकर एशिया तक पड़ रही भयंकर गर्मी के रूप में और दक्षिणी यूरोप के जंगलों में लगने वाली भयंकर आग के रूप में दिखाई पड़ रहा है। अंटार्कटिका में दुनिया के पहाड़ों पर मौजूद सभी ग्लेशियरों की तुलना में 50 गुना ज्यादा बर्फ  मौजूद है। इन ग्लेशियरों के पिघलने से पृथ्वी का तापमान करीब 60 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इस गर्मी को झेल पाना आम इंसान के बस की बात नहीं होगी। ग्लेशियरों के पिघलने से दुनियाभर में पीने के शुद्ध पानी के खत्म होने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। ये ग्लेशियर प्राचीन काल से पृथ्वी पर बर्फ के एक विशाल भंडार के रूप में मौजूद हैं। वर्तमान समय में पृथ्वी पर करीब दो लाख ग्लेशियर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी प्रकार होता रहा तो एशिया के ज्यादातर ग्लेशियरों की एक तिहाई बर्फ पिघल सकती है। इससे पीने के पानी का संकट तो पैदा होगा ही साथ ही समुद्र का जल स्तर भी बहुत बढ़ जाएगा। एक अध्ययन के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वर्ष 1980 के बाद से समुद्र का जल स्तर करीब 9 इंच बढ़ गया है। समुद्र का जल स्तर अधिक बढ़ जाने से समुद्र तट के आसपास के इलाकों के डूब जाने का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसलिए जानकारों का कहना है कि समय अब ये सोचने का नहीं है कि धरती गर्म हो रही है, बल्कि जल्दी से जल्दी जलवायु परिवर्तन के कारणों का पता लगाने का है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारणों का पता लगाकर ही ऐसे उपाय अपनाए जा सकते हैं, जिससे धरती के तापमान को कम करने में मदद मिलेगी।<br /><br />-रंजना मिश्रा</div>
<div>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Sep 2023 12:28:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[ संयुक्त राष्ट्र की अंतर सरकारी समिति की बैठक में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने चेतावनी देते हुए कहा कि पृथ्वी अभी जिस मोड़ पर है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/un-report-threatens-to-increase-global-warming/article-40418"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/sun---copy.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र ने एक नई रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट ग्लोबल वार्मिंग पर हुए शोध के तरीके से प्रस्तुत सार पर आधारित है। इसके अनुसार दुनिया को खतरनाक ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए यह ध्यान रखना होगा कि समय हाथ से निकलता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की अंतर सरकारी समिति की बैठक में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने चेतावनी देते हुए कहा कि पृथ्वी अभी जिस मोड़ पर है। वहां से उसे वापस नहीं लाया जा सकता है। उन्होंने प्रतिनिधियों से कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति प्राप्त सीमा 1.5 डिग्री सेल्सियस (2.7 फारेनहाइट) से अधिक होने का खतरा है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों जैसे- मीथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, ऑक्साइड और क्लोरो-फ्लूरो-कार्बन के बढ़ने के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में होने वाली वृद्धि को ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है। इसकी वजह से जलवायु परिवर्तन भी होता है। इससे लोगों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में बढ़ोतरी हो रही हैं। गर्म हवाएं और बाढ़ स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में वृद्धि होने का कारण बन रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Mar 2023 12:04:03 +0530</pubDate>
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                <title>विश्व भर में समुद्र की गर्मी में रिकार्ड वृद्धि</title>
                                    <description><![CDATA[वैज्ञानिक चेंग ने अध्ययन के महत्व को समझाते हुए कहा कि अगर दुनिया को आगामी वर्षों में गर्मी से बचाना चाहते हैं तो समुद्र की गर्मी और लवणता में बदलाव को लेकर जागरूकता फैलाना जरूरी है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटा जा सके।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/record-rise-in-ocean-heat-around-the-world/article-37492"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-02/site-photo-size-(5)5.jpg" alt=""></a><br /><p>बीजिंग। विश्व भर में समुद्र की गर्मी में रिकार्ड बढ़ोतरी दर्ज की गयी है और 2022 अब तक के इतिहास में सबसे गर्म साल रहा। हाल ही में एक ताजा अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है।        </p>
<p>अध्ययन वायुमंडलीय विज्ञान में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका एडवांस के अनुसार, मुख्य रूप से चीन, अमेरिका और इटली में 16 संस्थानों के 24 वैज्ञानिकों की एक टीम वायुमंडल में बढ़ती गर्मी का कारण जानने पर अध्ययन किया था।  </p>
<p>अध्ययन के मुताबिक गर्म समुद्र के स्तर में  वृद्धि होना इस खतरे का अंदेशा है कि महासागरों में जब ज्यादा गर्मी बढ़  जाती है तब वे कार्बन को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है। जिससे अधिक  मानव-उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में बना रहता है और ग्लोबल  वार्मिंग बढ़ जाती है।</p>
<p>चीनी विज्ञान अकादमी के तहत वायुमंडलीय भौतिकी संस्थान में अध्ययन और शोधकर्ता चेंग लिङ्क्षजग ने कहा कि वर्ष 2021 की तुलना में 2022 सबसे गर्म वर्ष रहा। पृथ्वी के महासागरों के ऊपरी दो हजार मीटर ने बड़ी मात्रा में गर्मी को अवशोषित किया है। </p>
<p>जलवायु परिवर्तन की मात्रा निर्धारित करने के लिए महासागर का गर्म होना एक प्रमुख संकेतक है क्योंकि 90 प्रतिशत से अधिक वैश्विक गर्मी महासागरों में समाप्त हो जाती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि महासागरों के भीतर गर्मी में वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग का और सबूत है।</p>
<p>वैज्ञानिक चेंग ने कहा कि 2017 के बाद से हर साल समुद्र के गर्म होने का रिकॉर्ड टूट रहा है।         </p>
<p>वैज्ञानिक चेंग ने अध्ययन के महत्व को समझाते हुए कहा कि अगर दुनिया को आगामी वर्षों में गर्मी से बचाना चाहते हैं तो समुद्र की गर्मी और लवणता में बदलाव को लेकर जागरूकता फैलाना जरूरी है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटा जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Feb 2023 16:11:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>पृथ्वी के तापमान में वृद्धि : खतरे के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते उद्योगों एवं विध्वंस होते वनों एवं जंगलों के कारण विश्व ‘बढ़ते तापमान’ एवं जलवायु परिवर्तन जैसी ज्वलन्त समस्याओं से जूझता हुआ विनाश के कगार पर खड़ा है। गत एक शताब्दी के दौरान पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 0.74 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है एवं गत पचास वर्षों के दौरान वैश्विक तापमान में वृद्धि दुगुनी हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/earths-temperature-rise-danger-signs/article-24940"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/p-64.jpg" alt=""></a><br /><p>चिन्ताजनक तथ्य है कि इक्कीसवीं सदी में तापमान में वृद्धि तीन से पांच डिग्री सेल्सियस होने का अनुमान है, जो कि समस्त विश्व के लिए खतरनाक स्थिति होगी। अमेरिकन अर्थशास्त्री एवं पर्यावरणविद् प्रोफेसर फ्रें क एंकरमैन ने भी विश्व समुदाय को आगाह किया है कि वैश्विकतापमान में वृद्धि की अनदेखी खतरनाक साबित होगी। हम अगर हालात पर नियंत्रण नहीं करते तो ये सारा आर्थिक ढांचा आगामी कुछ दशकों में बर्बाद हो जाएगा। पचास साल बाद शायद हम इस अर्थव्यवस्था को संचालित करने लायक हालत में नहीं बचेंगें। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते उद्योगों एवं विध्वंस होते वनों एवं जंगलों के कारण विश्व ‘बढ़ते तापमान’ एवं जलवायु परिवर्तन जैसी ज्वलन्त समस्याओं से जूझता हुआ विनाश के कगार पर खड़ा है। वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण सम्पूर्ण पृथ्वी में परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं, कहीं भारी वर्षा हो रही हैं, तो कहीं गर्मी और लू के थपेड़ों से लोग त्रस्त हैं, कई स्थानों पर अकाल व सूखे की छाया मंडरा रहीं है तो कई स्थानों पर कंपकंपाती ठंड है, कहीं गलेश्यिर टूट रहे हैं, तो कहीं समुद्र के जलस्तर में तीव्र बढ़ोतरी के कारण तटीय इलाकों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। चिन्ताजनक अनुमान व्यक्त किया गया है कि गत एक शताब्दी के दौरान पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 0.74 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है एवं गत पचास वर्षों के दौरान वैश्विक तापमान में वृद्धि दुगुनी हो गई है।</p>
<p><br />मानव विकास रिपोर्ट में भी आईपीसीसी के अध्ययन के आधार पर यह चेतावनी समस्त विश्व को दी गई है कि यदि वर्तमान प्रवृत्ति के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग जारी रही तो जलवायु परिवर्तन के घातक परिणाम सामने आएंगे। इस रिपोर्ट में विशेष रूप से विकासशील और निर्धन देशों को सतर्क किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के सर्वाधिक घातक प्रभाव इनको सहन करने पड़ेंगें, क्योंकि इनके पास ऐसी मुसीबतों का मुकाबला करने के लिए न तो पर्याप्त साधन उपलब्ध है और न ही कोई प्रभावी उपाय विद्यमान हैं।नि:संदेह रूप से भौतिकवाद की यह आंधी समस्त मानव जाति के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा रही है। आज हमारी धरती वैश्विक ताप के शिकंजे में फंसती जा रही है जिसका मूलभूत कारण प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन व तीव्र गति से औद्योगिक  विकास के लिए सतत प्रयत्नशील होना है। मानव की भौतिकवादी प्रवृत्ति के कारण भी जलवायु में परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं। आज का मानव फ्र ीज, टीवी, कूलर, एसी, कम्प्यूटर व कार मोटरों का गुलाम बन गया है। यही नहीं, ये सब उपकरण ‘परिस्थति निर्धारक तत्व’ बन गए हैं। इन सब की वजह से वातावरण अनवरत प्रदूषित होता जा रहा है, गाड़ियों से निकलता धुंआ पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है, वहीं कारखानों से  उगलती चिमनियां पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो रही हैं। क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस से वातावरण को नुकसान पहुंच रहा है।</p>
<p><br />कृषि कार्यों, घरेलू कार्यों तथा वाहनों में डीजल, पैट्रोल व अन्य ऊर्जा स्रोेतों का उपयोग तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण लकड़ी, गैस व कैरोसिन का उपयोग उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। इन सब की वजह से वातावरण में कार्बन-डाई आक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ती जा रही हैं। वातावरण में कार्बन की मात्रा अधिक संचित होने के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। समस्त विश्व में तूफान, चक्रवात, सुनामी व वनों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ती जा रही है जो मानव सभ्यता के लिए खतरे के संकेत हैं। निसंदेह रूप से, वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण लोगों की पेयजल जैसी बुनियादी आवश्यकताएं पूरी नहीं होगी, क्योंकि स्वच्छ जल के भंडार हिमनद निरन्तर पिघलते जा रहे हैं। तापमान में परिवर्तन का प्रमुख दुष्प्रभाव विभिन्न देशों में बढ़ते जल संकट के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा अनुमान है कि अफ्रीका में वर्ष 2030 तक जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 7 करोड़ से लेकर 25 करोड़ लोगों को पानी का अभाव झेलना पड़ सकता है। विभिन्न शोध अध्ययनों के आधार पर ऐसा अनुमान प्रस्तुत किया गया है कि हमारे देश के कुछ हिस्सों यथा कच्छ, सौराष्ट एवं राजस्थान में जल संकट की स्थिति भयावह होने के कारण सूखे की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जबकि देश के दूसरे हिस्सों में बाढ़ की विभीषिका तबाही उत्पन्न हो सकती है, जिससे संक्रामक बीमारियों एवं महामारियों का प्रकोप बढ़ जाएगा।  बाढ़, तूफान व सूखा पड़ने से फसलों का चक्र नष्ट हो जाएगा एवं समुद्री जल स्तर बढ़ने से तटीय प्रदेशों के जलमग्न हो जाने जैसे घातक प्रभाव निरन्तर बढ़ते जाएंगें।आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापमान में वृद्धि के फलस्वरूप वर्षा के प्रतिरूप में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों एवं आंकड़ों के विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि विश्व में बढ़ते तापमान के कारण उत्पादन में कमी दर्ज की जा रही है, फसल चक्र अनियमित व असंतुलित होता जा रहा है। वर्तमान में पृथ्वी का पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से परिवर्तित हो रहा है। मानव एवं पशुओं की दिनचर्या एवं जीवन चक्र असंतुलित होता जा रहा है।      </p>
<p>       <br />-डॉ. (श्रीमती) अनीता मोदी<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Sep 2022 12:09:22 +0530</pubDate>
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