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                <title>bird sanctuary - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>दो करोड़ की पक्षीशाला बनाई, पक्षियों की स्वीकृति नहीं आई</title>
                                    <description><![CDATA[पक्षीशाला में पक्षी नहीं होने से इसका आकर्षण समाप्त होता जा रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/built-a-birdhouse-worth-two-crores--but-the-birds-were-not-approved/article-71457"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/transfer-(7)14.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर विकास न्यास की ओर से विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल आॅक्सीजोन सिटी पार्क में आकर्षण का केन्द्र पक्षी शाला तो बना दी लेकिन उसमें पक्षियों को लाने की अभी तक भी सीजेड से स्वीकृति ही नहीं मिली है। पार्क का उद्घाटन हुए 5 माह का समय हो गया। ऐसे में यहां घूमने आने वालों को खाली पक्षी शाला देखकर निराश होना पड़ रहा है। न्यास की ओर से आईएल की जमीन पर करीब 71 एकड़ में आॅक्सीजोन सिटी पार्क का निर्माण किया गया है। 100 करोड़ से अधिक की लागत से बने इस पार्क में हरियाली के साथ ही आकर्षण का केन्द्र के रूप में विशाल पक्षी शाला भी बनाई गई। यह इतनी बड़ी है कि दूर से ही नजर आ रही है। लेकिन उसमें पक्षी नहीं होने से इसका आकर्षण समाप्त होता जा रहा है।  पार्क में रोजाना हजारों की संख्या में स्थानीय लोग व बाहर से पर्यटक घूमने के लिए आ रहे हैं। ऐसे में जब वे पक्षीशाला देखने जा रहे हैं तो उन्हें वहां पक्षी नजर नहीं आने पर निराश होना पड़ रहा है। </p>
<p><strong>5 माह पहले हुआ था उद्घाटन</strong><br />विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले सिटी पार्क का उद्घाटन किया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी व तत्कालीन स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल 13 सितम्बर 2023 को पार्क का उद्घाटन किया था। पार्क का उद्घाटन हुए 5 माह से अधिक का समय हो गया। लेकिन अभी तक भी पक्षी शाला में पक्षी नहीं आए हैं। </p>
<p><strong>अंडाकार आकार में बनी है पक्षीशाला</strong><br />पार्क में पक्षी शाला अंडाकार आकार में बनाई गई है। जानकारी के अनुसार पक्षी शाला की ऊंचाई 30.5 मीटर, चौड़ाई 28 मीटर और लम्बाई करीब 46.20 मीटर है। करीब 200 टन वजनी पक्षी शाला को तैयार करने में 2 करोड़ रुपए  खर्च हुए हैं। यहां देशी विदेशी पक्षियों को रखने के लिए उसी अनुरूप वातावरण देने का प्रयास किया गया है। लेकिन बिना पक्षियों के यह एक ढांचा बनकर रह गया है। </p>
<p><strong>इस तरह के पक्षियों को लाने की है योजना</strong><br />न्यास अधिकारियों के अनुसार पक्षी शाला में करीब दो दर्जन से अधिक प्रजातियों के देशी विदेशी पक्षियों को लाने की योजना है। जिनमें मकाऊ पेरेट, कॉकटेल,लव बर्ल्ड, जेब्रा फिन्चेल,गोल्डन तीतर,रेनबो लेगीकोट,रंचिक  पेरेट समेत कई तरह के पक्षी शामिल हैं। </p>
<p><strong>आवेदन किया है स्वीकृति का इंतजार</strong><br />पक्षी शाला में दो दर्जन से अधिक प्रजातियों के करीब 200 पक्षी रखे जाएंगे। पार्क का उद्घाटन होने से पहले ही पक्षियों को लाने के लिए सेन्ट्रल जू अथोरिटी(सीजेड) में आवेदन कर दिया था। लेकिन उसके बाद विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लग गई। उसके बाद रा’य में सरकार बदल गई। जिससे स्वीकृति में समय लग रहा है। इस संबंध में उच्च स्तर पर अधिकारियों से वार्ता की जा रही है। जैसे ही स्वीकृति मिल जाएगी वैसे ही पक्षियों को लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। <br /><strong>- रविन्द्र माथुर, अधीक्षण अभियंतानगर विकास न्यास</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Feb 2024 17:36:31 +0530</pubDate>
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                <title> रिसर्च की दुनिया में मील का पत्थर साबित होगा 2 करोड़ का स्मृति वन</title>
                                    <description><![CDATA[वन मंडल की ओर से अनंतपुरा स्थित स्मृति वन विहार में 87 लाख की लागत से पक्षी विहार का निर्माण किया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/smriti-van-worth-rs-2-crore-will-prove-to-be-a-milestone-in-the-world-of-research/article-59096"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/resarch-ki-duniya-me-meel-ka-patthar-sabit-ho-rha-h-2-crore-ka-smruti-van...kota-news-09-10-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा की धरती पर100 हैक्टेयर में ऐसा जंगल विकसित किया जा रहा है, जो न केवल शहर की आबोहवा को प्यूरिफाई करेगा बल्कि रिसर्च की दुनिया में मिल का पत्थर भी साबित होगा। शिक्षा नगरी में प्रदेश का पहला बटरफ्लाई गार्डन व पक्षी विहार बनाया जा रहा है। वन विभाग का महत्वकांशी प्रोजेक्ट स्मृति वन आकार लेने लगा है। यहां 2 करोड़ की लागत से लवकुश वाटिका, पक्षी विहार, बटरफ्लाई गार्डन, विभिन्न प्रजातियों के औषद्यीय प्लांट व संकटग्रस्त पौधे, भूलभूलैया, चेतना मार्ग सहित अन्य कार्य अपने स्वरूप में नजर आने लगे हैं। यहां अमेरिका से लेकर अफ्रीकन   देशों के करीब 250 से ज्यादा पक्षी व 15 से ज्यादा प्रजातियों की तितलियों को यहां बसाया जाएगा। वाइल्ड लाइफ स्टूडेंट्स को पक्षियों के नेचुरल हैबीटॉट, व्यवहार सहित  कई बिंदुओं को समझने व जानने का अवसर मिलेगा। </p>
<p><strong>87 लाख से 2 बीघा में बन रहा पक्षी विहार</strong><br />वन मंडल की ओर से अनंतपुरा स्थित स्मृति वन विहार में 87 लाख की लागत से पक्षी विहार का निर्माण किया जा रहा है। जहां विदेशी पक्षियों के रहवास के लिए 4 एनक्लोजर बनाए जाने हैं, जिसके लिए टैंडर कर दिए गए हैं। वहीं, वर्तमान में पक्षी विहार का फाउंडेशन तैयार हो चुका है। इसके अलावा वाटर पौंड भी बनाया जा रहा है। साथ ही इनकी देखरेख के लिए आॅफिस तैयार हो गया है। </p>
<p><strong>यह होंगे पक्षी होंगे आकर्षण का केंद्र</strong><br />दो बीघा जमीन पर बन रहे पक्षी विहार में  100 जोड़े तोते, 50 जोड़े अफ्रीकन कलरफूल लव बर्ड्स, 30 जोड़े मिक्स कलर क्रोकटेल बर्ड्स, 5 जोडेÞ सन कोन्योर, 10 जोड़े यलो साइड कोन्योर, 10 जोड़े पाइनेप्पल कोन्योर, 20 जोड़े इकोटिक क्वाइल, 2 जोड़े तुर्की बर्ड्स सहित आॅस्ट्रेलियन बर्ड्स यहां शहरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहेंगे। इनकी देखरेख के लिए पक्षी क्लिनिक भी बनाई जा रही है। इसके अलावा शहरभर में रेस्क्यू किए जाने वाले पक्षियों का इलाज भी यहां किया जाएगा। </p>
<p><strong>रिसर्च में यह मिलेगा शोधार्थियों को फायदा</strong><br />डीएफओ पांडे का कहना है कि हर साल बड़ी संख्या में शोधार्थी पक्षियों पर अनुसंधान करने के लिए हाड़ौती के वनक्षेत्रों में आते हैं। पक्षी विहार तैयार होने पर उनका रुझान स्मृति वन में बढ़ेगा। यहां विभिन्न प्रजातियों के देशी-विदेशी, प्रवासी व अप्रवासी पक्षियों के हैबीटॉट,  व्यवहार, प्रवृति, भोजन, स्पेशलिटी सहित पर्यावरण संरक्षण में पक्षियों की भूमिका सहित अन्य जानकारियों को जानने समझने का मौका मिल सकेगा। </p>
<p><strong>अमेरिका से तुर्की तक 5 देशों के रहेंगे पक्षी</strong><br />वन मंडल के उपवन संरक्षक जयराम पांडे ने बताया कि कोटा शहर में प्रदेश का पहला  पक्षी विहार व बटर फ्लाई वाटिका बनाई जा रही है। यहां पक्षी विहार में पांच देशों के विभिन्न प्रजातियों के 250 से ज्यादा पक्षियों को लाकर बसाया जाएगा। इनमें आॅस्ट्रेलिया, अफ्रीकन, साउथ अमेरिका, यूएसए और तुर्की के पक्षियों को रखा जाएगा। इनके हैबीटॉट के लिए तमाम संसाधन व जरूरी इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके अलावा स्मृति वन में  22 हजार से ज्यादा पेड़-पौधे लगे हैं, जिन पर देश-विदेशों के प्रवासी व अप्रवासी पक्षियों  की आबादी बसने लगी है। आगामी समय में यह प्रोजेक्ट बर्ड्स पर रिसर्च करने वाले शौधार्थियों के लिए अनुसंधान में मील का पत्थर साबित होगा।</p>
<p><strong>12 बीघा में महकेगा  तितलियों का संसार</strong><br />12 बीघा जमीन पर आकार ले रहा बटरफ्लाई गार्डन में 15 प्रजातियों की तितलियों का खूबसूरत संसार महकेगा। यहां होस प्लांट (तितलियों का पसंद आने वाले पौधे) लगाए जा रहे हैं। बाहर से बटरफ्लाई लार्वा लाया जाएगा। जिन्हें पत्तियों सहित यहां लगे होस प्लांट की किसी भी एक पत्ती से जोड़कर उनका रहवास बनाया जाएगा। इसी पौधे पर उन्हें भोजन मिलता रहेगा। ऐसे में धीरे-धीरे बटरफ्लाई जोन में इनकी आबादी पनप सकेगी। इनके लिए पास ही में पानी का पौंड भी बनाया गया है।  डीएफओ ने बताया कि रिसर्चर को बटरफ्लाई के व्यवहार व प्रजातियों को जानने, पौधों के पुन: उत्पादन और फूल से बीज बनने तक में तितलियों की भूमिका के बारे में जान सकेंगे।  </p>
<p><strong>इन प्रजातियों की होगी बटरफ्लाई</strong><br />प्रदेश के पहले बटर फ्लाई गार्डन में जिजेरिया न्यास्ना, कैटोप्सिलया पोमोना, फलांता फलांथा, पेपिलियो पॉलीट्स, एराडने मेरियोन सहित 15 प्रजातियों की तितलियां यहां बसाई जाएगी। यहां का वातावरण इनके अनुकूल बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में होस प्लांट लगाए गए हैं। इसके अलावा पेड-पौधे, वनस्पतियां व हाड़ौती में पाई जाने वाली संकटग्रस्त पौधों की 200 से ज्यादा प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। </p>
<p><strong>चट्टानों का सीना चीर 100 हैक्टेयर में बसाया जंगल</strong><br />यह वन विभाग का महत्वकांशी प्रोजेक्ट है। 100 हैक्टेयर की पथरीली वन भूमि को खनन माफियाओं के चंगुल से आजाद कर शहरवासियों के लिए खूबसूरत जंगल  विकसित किया है ताकि वे खुद को प्रकृति  के बीच महसूस कर सके। यहां प्रदेश का पहला बटरफ्लाई वाटिका, पक्षी विहार, लवकुश वाटिका, सर्वधर्म वाटिका, स्मृति वन, किड्स प्ले जॉन बनाया है। पथरीली जमीन पर हरियाली का बिछौना बिछाया है। आशा है, स्मृति वन शिक्षा नगरी का एजुकेशन उद्देश्य को पूरा करेगी। यहां रेप्टाइल्स, बर्ड्स, तितलियां, जलीय पक्षी, दुलर्भ वनस्पति, औषधीय पौधे, जीव-जंतुओं की दुनिया जानने-समझने का मौका मिलेगा। <br /><strong>- जयराम पांडे, उपवन संरक्षक, वनमंडल कोटा</strong></p>
<p><strong>क्या कहते हैं रिसर्चर</strong><br />100 हैक्टेयर में फैले स्मृति वन में बटरफ्लाई गार्डन व पक्षी विहार बनाना वन विभाग का सराहनीय कदम है। यह इलाका पथरीला होने के कारण पूर्व में बंजर था लेकिन आज यहां जंगल आकार ले रहा है। शोधार्थियों को पक्षियों व तितलियों की दुनिया जानने-समझने का मौका मिल सकेगा साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। बाहर से प्रवासी अप्रवासी पक्षी आएंगे। इनकी संख्या में हो रही कमी दूर हो सकेगी। शहरवासियों को प्रदूषित होते वातावरण से निजात मिल सकेगी। <br /><strong>- हर्षित शर्मा, बर्ड्स रिसर्चर</strong></p>
<p>अतिक्रमण व पेड़ों की कटाई के कारण प्रवासी व अप्रवासी पक्षियों की संख्या पहले की तुलना में घटती जा रही है। पेंटेर्ड स्टॉर्क, ब्लैक आईबीज, कैटल इग्रेट, मिडन ईग्रेट, लिटिल ईग्रेट व लार्ज ईग्रेट, जांघिल सहित अन्य प्रजातियों के पक्षी शहर के विभिन्न इलाकोें में आते हैं लेकिन हैबीटॉट खत्म होने से संख्या में कमी होती चली गई। ऐसे में स्मृति वन में जंगल विकसित होने से पक्षियों की बढ़ोतरी होगी और विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का कलरव गूंजेगा। <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Oct 2023 18:10:24 +0530</pubDate>
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                <title>उदपुरिया में उजड़ी जांघिल पक्षियों की बस्ती, दुर्दशा का शिकार हुआ तालाब</title>
                                    <description><![CDATA[लगातार घटती पेड़ों की संख्या से जांघिलों ने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो गए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/colony-of-wild-birds-destroyed-in-udpuriya--pond-becomes-victim-of-plight/article-58354"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/kota-news3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती में पेंटेर्ड स्टॉर्क बर्ड की जन्मस्थली कहलाने वाला उदपुरिया तालाब इन दिनों दुर्दशा का शिकार हो रहा है। पेड़ों की अवैध कटाई के कारण जांघिलों की बस्ती उजड़ गई। तालाब जलकुंभी से अटा पड़ा है तो पानी किनारे जगह जगह गंदगी के ढेर लगे हैं। कूड़े कचरे से उठती दुर्गंध से तालाब का मनोहारी वातारण दूषित हो गया। पूर्व में तालाब किनारे लगभग 50 पेड़ हुआ करते थे, लेकिन, स्थानीय पंचायत प्रशासन व पर्यटन विभाग की अनदेखी के चलते आज एक भी नहीं बचा। हालात यह हैं कि शाम ढलते ही तलाब किनारे नशेड़ियों की महफिल सजती है। यहां जगह-जगह शराब की खाली बोतलों का ढेर लगा हुआ है। यदि, पर्यटन विभाग ध्यान दे तो उदपुरिया तालाब हाड़ौती का कैलादेवी पक्षी विहार के रूप में उभर सकता है। </p>
<p><strong>2015 के बाद से नहीं बनाए घौंसले</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि पेंटर्न स्टोक बर्ड यानी जांघिल प्रवासी पक्षी हैं, इनका प्रवास अगस्त से फरवरी तक रहता है। पहली बार 1995 में जांघिलों ने उदपुरिया में दस्तक दी थी। वर्ष 2015 तक इन्होंने यहां लगातार बस्ती बसाई। इस दरमियानयहां 6 हजार के लगभग नन्हें मेहमान जन्मे थे। वहीं, कई सीजन में 250 से अधिक नीड़ बनाए और 600 बच्चों ने उदपुरिया में जन्म लिया था। लेकिन, 2015 के बाद से यहां मानवीय दखल व अतिक्रमण बढ़ने की वजह से इन्होंने यहां घौंसले नहीं बनाए और उदपुरिया छोड़ बारां जिले के सोरसन की तरफ रूख कर लिया। जबकि, वर्ष 2010 में इन्होंने उदपुरिया तालाब किनारे पेड़ों पर करीब 250 घौसलें बनाए थे। लेकिन, धीरे-धीरे पेड़ों की संख्या कम होती चली गई और घौंसलों की भी संख्या घटती चली गई। </p>
<p><strong>पर्यटन केंद्र बन सकता है उदपुरिया</strong><br />जैदी बताते हैं, प्रशासन व जिला पर्यटन विभाग ध्यान दे तो उदपुरिया तालाब कैलादेवी पक्षी विहार जैसा खूबसूरत पर्यटन केंद्र बन सकता है। उदपुरिया अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया। तालाब की पाल जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गई। लगातार घटती पेड़ों की संख्या से जांघिलों ने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो गए। </p>
<p>इसी का नतीजा है, कि वर्ष 2015 से जांघिलों ने उदपुरिया से मुंह मोड़ लिया और बारां जिले के अमलसरा व सोरसन क्षेत्र के तालाबों को बस्तियां बनाकर आबाद किया। वहीं, गोदल्याहेड़ी गांव के राजपुरा तालाब किनारे पेड़ों पर अपना आशियाना बनाया। इसके अलावा मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व क्षेत्र, रामगंजमंडी, उंडवा, चित्तौड़, जोधपुर समेत व अन्य जगहों पर भी इनकी मौजूदगी है।  </p>
<p><strong>पर्यटन विभाग को ध्यान देने की जरूरत</strong><br />स्थानीय निवासी पक्षी प्रेमी श्याम जांगिड़ कहते हैं, यहां पक्षियों का आना अच्छा संकेत है। लेकिन, पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन की ओर से तालाब के आसपास सुरक्षित जगहों पर पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए पौधरोपण करवाए जाना चाहिए। साथ ही इनकी पंसदीदा विलायती बबूल के पेड़ लगाए जाए ताकि, यहां पर्याप्त घोंसले बनाने के लिए इन्हें जगह मिल सके। वहीं, अतिक्रमण हटवाकर व जलकुंभी हटाकर तालाब की सफाई करवानी चाहिए।</p>
<p><strong>जांघिलों की विशेषताएं</strong><br />20 नीड़ बना लेते हैं एक पेड़ पर<br />20 से 25 बरस है औसत आयु<br />3 से 5 अंडे देते हैं एक बार में<br />2 वर्ष में बच्चे हो जाते हैं वयस्क<br />6 हजार बच्चे जन्मे 22 साल में<br />वर्तमान में  उदपुरिया में एक भी जाघिल नहीं है</p>
<p><strong>अपने खर्चे पर कर रहे पक्षियों की निगरानी</strong><br />हाड़ौती नेचुरल सोसाइटी के सदस्य श्याम जांगिड़ स्वयं के खर्चे पर उदपुरिया में जांघिल पक्षियों की देखभाल कर रहे हैं। साथ ही अवैध शिकार, संदिग्ध घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को पाक्षियों की विशेषताएं, इतिहास से रूबरू करवाते हैं।  इसी तरह राजपुरा तालाब में मौजूद पेटेंर्ड स्टॉर्क बर्ड की सुरक्षा में सुरेश नागर तैनात हैं। नागर अपने स्तर पर ही इन पक्षियों की निगरानी करते हैं।</p>
<p><strong>जलकुंभी से अटा और गंदगी से दबा सौंदर्य</strong><br />शहर से करीब 30 किमी दूर दीगोद तहसील के गांव उदपुरिया का तालाब वर्तमान में अतिभेंट चढ़ चुका है। तालाब की पाल पर जगह-जगह ग्रामीणों ने मवेशियों के बाड़े व कच्चे बना लिए हैं। वहीं, तालाब किनारे पेड़ों की भी अवैध कटाई की जा रही है। तालाब पूरी तरह से जलकुंभी से अटा पड़ा है। जिसे साफ करवाने में स्थानीय प्रशासन भी सुध नहीं ले रहा। हालात यह हैं, पहले तालाब के बीचोंबीच करीब 50 पेड़ हुआ करते थे, जो आज एक भी नहीं है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Sep 2023 15:38:12 +0530</pubDate>
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                <title>ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं मिलने से दम तोड़ रहा केवलादेव पक्षी अभयारण्य : रामनिवास</title>
                                    <description><![CDATA[रामनिवास मीना ने कहा है, कि ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं मिलने से देश भर में प्रसिद्ध भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य दम तोड रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/karauli/keoladeo-bird-sanctuary-ramniwas-dying-due-to-not-getting-national/article-29468"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-11/12-todabhim-04.jpg" alt=""></a><br /><p>भरतपुर/टोडाभीम। पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना किसान संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष भामाशाह रामनिवास मीना ने कहा है, कि ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं मिलने से देश भर में प्रसिद्ध भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य दम तोड रहा है। इस बारे में सरकार को गंभीरता से मंथन करना चाहिए। सरकार का यही रवैया रहा तो उत्तरी-पूर्वी राजस्थान की प्राकृतिक धरोहरों का अस्तित्व संकट में पड जाएगा। </p>
<p>पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना किसान संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष रामनिवास मीना संघर्ष समिति के महामंत्री भरतसिंह डागुर, प्रदेश मीडिया प्रभारी दीनदयाल सारस्वत व अन्य पदाधिकारियों के साथ शनिवार को भरतपुर के केवलादेव पक्षी अभयारण्य पहुंचे और पानी के अभाव में अभयारण्य के हालातों से साक्षात हुए। अभयारण्य के हालात जानने के बाद प्रदेशाध्यक्ष मीना ने कहा कि ईआरसीपी में पूर्वी राजस्थान के जो 13 जिले शामिल हैं, उनमें भरतपुर भी प्रमुख रूप से सम्मलित है। घना पक्षी अभयारण्य में पानी का अभाव होने से साइबेरियन सारस सहित कई अन्य प्रजातियों के पक्षियों ने भी आना बंद कर दिया है। इसके साथ अभयारण्य में मात्र बारिश के दिनों में ही हरियाली रहती है। ऐसे में अभयारण्य के प्रति सरकार की अनदेखी का रवैया ऐसा ही रहा तो देश की प्रमुख प्राकृतिक धरोहरों में शामिल घना पक्षी अभयारण्य का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। प्रदेशाध्यक्ष मीना ने कहा कि सरकार को घना में पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने के लिए ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करना चाहिए।</p>
<p>चंबल का पानी नहरों के माध्यम से भरतपुर तक आएगा तो घना पक्षी अभयारण्य को नया जीवन मिलेगा। प्रदेशाध्यक्ष मीना के साथ उपस्थित प्रदेश महामंत्री भरतसिंह डागुर एवं प्रदेश मीडिया प्रभारी दीनदयाल सारस्वत ने भी कहा कि ईआरसीपी प्रदेश के 13 जिलों के किसानों की उन्नति का अहम रास्ता है। इसके साथ ही प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण देने का भी बडा माध्यम है। इसे समझते हुए केन्द्र सरकार को ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने का कार्य शीघ्र करना चाहिए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>करौली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Nov 2022 11:52:54 +0530</pubDate>
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