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                <title>mukundra hills tiger reserve - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जरा देखूं तो कैसा है मेरा घर का आंगन, टाइग्रेस ने किया शिकार, रास आ रहा मुकुंदरा</title>
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                        <![CDATA[बाघिन ने एनक्लोजर का चप्पा चप्पा छाना, नए घर का किया मुआयना]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/let-me-see-how-my-courtyard-looks--the-tigress-hunted--enjoying-mukundra/article-145341"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/kota-news.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से शिफ्ट किए हुए बुधवार को पांच दिन हो गए हैं। बाघिन को अपना नया आशियाना खूब रास आ रहा है। बाघिन ने आते ही दूसरे दिन रविवार को पाड़े का शिकार किया। वह सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही अपने नए घर का मुआयने पर निकलती है। राउंठा रेंज की झामरा घाटी में बने एक हेक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में बुधवार को चहल कदमी करती नजर आई। वह नए माहौल में ढलने की कोशिश करती दिखी। इस बीच कुछ समय वाटर प्वाइंट के पास रुकी और प्यास बुझाकर फिर से दौरे पर निकल पड़ी। यह सिलसिला दिनभर चलता रहा। भूख लगी तो एनक्लोजर में छोड़े गए पाड़े का शिकार कर पेट भरा। टाईग्रेस की एक-एक गतिविधियां एनक्लोजर के पीछे बने दो मंजिला वॉच टावर से कर्मचारी नोट कर अधिकारियों को रिपोर्ट करते रहे। हालांकि, बाघिन अभी पांच दिनों तक समान्य व्यवहार में विचरण करती नजर आई। अधिकारियों व कर्मचारियों की टीम लगातार बाघिन की सघन मॉनिटरिंग में जुटी है।</p>
<p><strong>रौब से घूमी, दौड़ कर किया शिकार</strong></p>
<p>डीएफओ मुथू एस ने बताया कि मुकुंदरा का माहौल बाघिन को रास आ रहा है। व्यवहार भी सामान्य रहा और बाड़े में रौब के साथ मूवमेंट करती दिखाई दी। कभी वॉटर पॉइंट पर तो कभी झाड़ियों के पीछे आराम करती नजर आई। एनक्लोजर में छोड़े गए वैट का दौड़कर शिकार किया। वन्यजीव चिकित्सक ने बाघिन का भौतिक रूप से स्वास्थ्य परीक्षण भी किया। जिसमें वह पूरी तरह से स्वस्थ मिली। दोपहर को उसने कुछ समय तक आराम किया फिर शाम 5 बजे बाद विवरण करती देखी गई।</p>
<p><strong>24 घंटे वॉच टावर से हर मूवमेंट पर नजर</strong></p>
<p>मुकुंदरा अधिकारियों का कहना है कि 24 घंटे बाघिन के हर एक मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है। उसकी एक्टिविटी को वॉच टावर पर तैनात वनकर्मी नोट कर डीएफओ कार्यालय में बने कंट्रोल रूम पर रिपोर्ट करते रहे हैं। यहां 8-8 घंटे की शिफ्ट में गठित 3 टीमों द्वारा टाइग्रेस के मूवमेंट पर की नजर रखी जा रही हैं। जिसमें वह कितने बजे से कितनी बजे तक घूमी, कितनी बार पानी पिया। कब से कब तक आराम किया। दिनभर में उसका व्यवहार कैसा रहा, भोजन-पानी व एक्टिवनेस सहित अन्य गतिविधियां नोट की गई। इन एक्टिविटी के आधार पर तैयार रिपोर्ट का एनालिसिस किया जाता है, फिर हार्ड रिलीज पर फैसला किया जाता है।</p>
<p><strong>1135 वर्ग किमी में फैला मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>
<p>मुकुन्दरा हिल्स को 9 अप्रैल 2013 को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। वर्तमान में यह 1135 वर्ग किमी में चार जिलों कोटा, बूंदी, झालावाड़ व चित्तौडगढ़ में फैला है। इसमें 793 वर्ग किमी कोर और 342 वर्ग किमी बफर जोन है। पहले मुकुंदरा का दायरा 760 वर्ग किमी था लेकिन दो वर्ष पूर्व भैंसरोडगढ़ अभयारण्य को शामिल कर लिया गया। जिससे टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल बढ़कर 1135 वर्ग किमी हो गया।</p>
<p><strong>सप्ताहभर बाद हार्ड रिलीज पर फैसला</strong></p>
<p>सीसीएफ सुगनाराम जाट ने बताया कि बाघिन को सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट करने के साथ ही विशेषज्ञों की टीम 24 घंटे उसकी निगरानी कर रही है। उसके व्यवहार, स्वास्थ्य और नए वातावरण में ढलने की प्रक्रिया पर लगातार नजर रखी जा रही है। सब कुछ संतोषजनक रहने पर 7 दिन बाद बाघिन को खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। बाघिन की मॉनिटरिंग के लिए 8- 8 घंटे की शिफ्ट में 3 टीमें गठित की गई है।</p>
<p><strong>अब मुकुंदरा में 7 बाघ</strong></p>
<p>बांधवगढ़ से बाघिन आने के साथ ही मुकुंदरा में अब बाघों की संख्या 7 हो गई है। इनमें 2 बाघ, 4 बाघिन और एक 10 माह का नर शावक शामिल है। वर्तमान में टाइग्रेस एमटी- 6 अपने शावक के साथ कोलीपुरा रेंज में तो बाघिन एमटी-8 हाल ही में रणथंभोर से लाए बाघ एमटी - 9 के साथ दरा रेंज में 82 वर्ग किमी के जंगल में विचरण कर रहे हैं। दोनों को कई बार साथ देखा गया है। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि निकट भविष्य में यहां श्रावकों के जन्म से बाघों का कुनबा बढ़ेगा।</p>
<p><strong>कमजोर जेनेटिक आधार को मजबूत करना उद्देश्य</strong></p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, इंटर स्टेट बाघ ट्रांसलोकेशन का मुख्य उद्देश्य बाघों की आनुवंशिक विविधता बढ़ाना, कमजोर जेनेटिक आधार को मजबूत करना, भविष्य में संख्या स्थिर और स्वस्थ रखना है। ऐसे में अंतरराज्यीय स्थानांतरण से राजस्थान के टाइगर रिजर्व में दीर्घकालिक रूप से मजबूत बाघ आबादी विकसित करने में मदद मिलेगी।</p>
<p><strong>मार्च - अप्रैल में लाए जाएंगे 250 चीतल</strong></p>
<p>सीसीएफ जाट ने बताया कि मुकुंदरा में अभी प्रेबेस अच्छी संख्या अच्छी है। लेकिन इनकी संख्या बढ़ाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। हाल ही में भरतपुर के घना नेशनल पार्क से 9 चीतल लाए हैं। मार्च - अप्रैल तक 250 चीतल लाए जाएंगे। भोमा लगाया हुआ है। उसमें जैसे जैसे प्रेबेस आएंगे वैसे ही मुकुंदरा में शिफ्ट किए जाएंगे।</p>
<p><strong>बाधिन पूरी तरह स्वस्थ</strong></p>
<p>बाघिन पूरी तरह से स्वस्थ है। सॉफ्ट एनक्लोजर में सामान्य व्यवहार में विचरण कर रही है। उसने एनक्लोजर में छोड़े गए वैट का शिकार किया। टीम द्वारा टाइग्रेस की 24 घंटे मॉनिटरिंग की जा रही है। पशु चिकित्सक द्वारा समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण भी किया जा रहा है। सप्ताहभर बाद उच्च अधिकारियों के निर्देश पर हार्ड रिलीज करने का निर्णय किया जाएगा।</p>
<p><strong>- मुथू एस, डीएफओ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 14:09:43 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा की सलतनत में एक और बाघ टी-2408 की एंट्री : रणथम्भौर से युवा बाघ शिफ्ट, बाघिन कनकटी का बनेगा जोड़ीदार ; आबाद होगा जंगल</title>
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                        <![CDATA[मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के लिए दिन खुशियों भरा रहा। रणथम्भौर से युवा बाघ टी-2408 को मुकुंदरा में शिफ्ट किया गया। टाइगर को दोपहर 2.30 बजे करीब विशेषज्ञों की निगरानी  में दरा अभयारणय में 21 हैक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया। 7 दिन बाद हार्ड रिलीज किया जाएगा। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/entry-of-another-tiger-t-2408-in-the-sultanate-of-mukundra/article-139041"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px-(8)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के लिए  शुक्रवार का दिन खुशियों भरा रहा। रणथम्भौर से युवा बाघ टी-2408 को मुकुंदरा में शिफ्ट किया गया। टाइगर को दोपहर 2.30 बजे करीब विशेषज्ञों की निगरानी में दरा अभयारणय में 21 हैक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया। 7 दिन बाद हार्ड रिलीज किया जाएगा। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, कोटा से वन विभाग की टीम अल सुबह 3 से 4 बजे करीब रणथम्भौर के लिए रवाना हो गई थी, जो 6 बजे तक पहुंची।</p>
<p>जहां दोनों जिलों की संयुक्त टीम 7 बजे खंडार रेंज के लाहपुर वन क्षेत्र में पहुंची और बाघ की ट्रेकिंग शुरू की। इसके बाद वन विभाग की टीम ने 8 बजे बाघ को ट्रेस ट्रेकुंलाइज किया। इसके बाद मेडिकल बोर्ड में शामिल चिकित्सकों की टीम ने बाघ का स्वास्थ्य परीक्षण किया और करीब 9 बजे के आसपास बाघ को सड़क मार्ग से रणथम्भौर से मुकुंदरा के लिए रवाना हो गए। दोपहर तक टीम दरा पहुंची और वन विशेषज्ञों की निगरानी में 2.30 बजे सॉफ्ट एनक्लोजर में शिफ्ट किया। </p>
<p><strong>इनका कहना है...</strong><br />एनटीसीए के निर्देश पर रणथम्भौर के लाहपुर वन क्षेत्र से बाघ टी-2408 को मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के दरा में 21 हैक्टेयर के एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया है। बाघ पूरी तरह से स्वस्थ्य है। सात दिन उसकी 24 घंटे मॉनिटरिंग की जाएगी। इसके बाद खुले जंगल में हार्ड रिलीज किया जाएगा। इस बाघ को मिलाकर अब मुकुंदरा में 6 बाघ हो गए हैं। जिनमें 3 बाघिन, 1 शावक और 2 नर बाघ शामिल हैं। बाघों की सुरक्षा और रिजर्व का विकास के लिए लगातार प्रयासरत हैं। </p>
<p><strong>यह है टी -2408 का इतिहास</strong><br />वन विभाग के अनुसार बाघ टी-2408 का जन्म रणथम्भौर की खण्डार रेंज में वर्ष 2022 में हुआ था। यह बाघ, बाघिन टी-93 का बेटा है और इसकी उम्र करीब 4 साल है। </p>
<p><strong>जीन पूल मजबूत करना उद्देश्य</strong><br />वन अधिकारियों ने बताया कि नेशनल टाइगर कनजर्वेशन अथोरियटी(एनटीसीए) की ओर से जारी की गई गाइडलाइन के तहत बाघ की रणथम्भौर से मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में शिफ्टिंग का उद्देश्य प्रदेश में बाघों में जीन पूल में बदलाव लाना और जैव विविधता को बरकरार रखना है। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sat, 10 Jan 2026 11:52:36 +0530</pubDate>
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                <title>रामगढ़ से पिछड़ा मुकुंदरा, 1 जिप्सी के भरोसे जंगल सफारी, 100 किमी चक्कर काटकर भी निराश लौट रहे पर्यटक </title>
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                        <![CDATA[दो साल बाद भी मुकुंदरा की बोराबांस में शुरू नहीं हुई सफारी, दरा जाकर भी शहरवासियों को नहीं मिल रही सफारी की बुकिंग।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundra-lags-behind-ramgarh--jungle-safari-relies-on-only-1-jeep--tourists-return-disappointed-after-traveling-100-km/article-137745"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/500-px)-(2)10.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी शुरू हुए करीब दो साल बीत चुके हैं, इसके बावजूद सफारी परवान नहीं चढ़ी। जबकि, रामगढ़ टाइगर रिजर्व हाउस फुल चल रहा है। नतीजन, राजस्व और पर्यटकों की संख्या में मुकुंदरा, रामगढ़ टाइगर रिजर्व से पिछड़ रहा है। इसकी बड़ी वजह मुकुंदरा की सफारी 1 ही जिप्सी के भरोसे चल रही है। जबकि, रामगढ़ में 6 जिप्सी पर्यटकों को जंगल की सैर करवा रही है। दरअसल, मुकुंदरा में एक ही रेंज दरा में जंगल सफारी करवाई जा रही है, जो कोटा शहर से करीब 48 किमी दूर है और टिकट बुकिंग भी आॅफलाइन है। ऐसे में पर्यटक दरा जाता है तो जिप्सी पहले से ही बुक रहती है। ऐसे में उन्हें 48 किमी जाना और वापस आने में करीब 100 किमी का चक्कर काट बैरंग लौटना पड़ता है।</p>
<p><strong>रुट्स बने फिर से शहर से सटे बोराबास में शुरू नहीं हुई सफारी</strong><br />शहरी सीमा से सटे रावतभाटा रोड स्थित मुकुंदरा की बोराबास रेंज में जंगल सफारी शुरू किए जाना प्रस्तावित है। इसके रुट्स भी बन चुके हैं। हाल ही में रुट्स संशोधित भी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद यहां 2 साल बाद भी सफारी शुरू नहीं हो सकी। जबकि, यह जंगल शहर के नजदीक होने से पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो सकता है। इसके बावजूद मुकुंदरा प्रशासन द्वारा यहां सफारी शुरू नहीं की जा रही। पर्यटकों को शहर से 48 किमी दूर दरा जाना पड़ता है, जहां भी एक ही जिप्सी होने से बुकिंग नहीं मिल पाती। ऐसे में उन्हें बैरंग लौटना पड़ता है।</p>
<p><strong>बोराबास में है चम्बल व जंगल का विहंगम व्यू प्वाइंट्स</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है कि शहर से सटी बोराबास रेंज का जंगल काफी घना है। यहां चंबल व जंगल के कई विहंग्म व्यू प्वाइंट है। इसके अलावा पैंथर, भेड़िया, भालू, जरख, फॉक्स सहित अन्य बड़े वन्यजीवों का हैबीटाट है, जिनकी सफारी के दौरान साइटिंग होने से पर्यटकों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा। इधर, पर्यटकों का कहना है कि मुकुंदरा प्रशासन यदि, रावतभाटा रोड स्थित बोराबांस रैंज में स्वीकृत रुट्स पर सफारी शुरू करें तो हमें दरा जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। समय की बचत होगी और ट्यूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p><strong>यह रहेगा 15 किमी का सफारी रुट्स</strong><br />बोराबास रेंजर राजपाल शर्मा ने बताया कि यहां दौलतगंज स्थित डायवर्जन चैनल के पास चौकी से सफारी के लिए पर्यटकों को एंट्री मिलेगी। यहां से चंबल नदी के किनारे कोटिया भील महल, चंबल व्यू प्वाइंट, गरड़िया व्यू प्वाइंट होते हुए रथकांकरा तक रुट रहेगा। यह रुट्स गत अक्टूबर माह में ही तय किया गया था। जल्द ही सफारी शुरू किए जाने की तैयारी है।</p>
<p><strong>दरा में एक जिप्सी के भरोसे सफारी</strong><br />दरा सेंचुरी में जंगल सफारी के लिए मात्र एक ही जिप्सी है, जो सुबह की पारी में 6 से 9 बजे तथा दोपहर 3 से 6 बजे तक रहती है। पर्यटकों को एंट्री व टिकट दरा रेंज कार्यालय से लेना होता है। यहीं से बुकिंग आॅफलाइन की जाती है। कोटा शहर से जाने वाले पर्यटकों को वहां जाकर पता लगता है कि जिप्सी एडवांस बुक हैं, ऐसे में उन्हें सफारी का मौका अगले दिन मिल पाएगा या फिर दोपहर की पारी तक इंतजार करना होगा। दोनों ही सूरत में पर्यटकों का समय व्यर्थ हो जाता है। मजबूरन उन्हें बैरंग लौटना पड़ता है। यदि, यहां जिप्सियों की संख्या बढ़ाई जाए तो भी लोगों को राहत मिल सकती है।</p>
<p><strong>ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों से झलकता प्राचीन वैभव</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि प्राकृतिक छटा के साथ मुकुन्दरा विरासत से भरा पड़ा है। रिजर्व में 12वीं शताब्दी का गागरोन किला, 17वीं शताब्दी का अबली मीणी का महल, पुरातात्विक सर्वे के अनुसार 8वीं-9वीं शताब्दी का बाडोली मंदिर समूह, भैंसरोडगढ़ फोर्ट, 19वीं शताब्दी का रावठा महल, शिकारगाह समेत कई ऐतिहासिक व रियासतकालीन इमारतें, गेपरनाथ, गरड़िया महादेव मंदिर भी है, जो कला-संस्कृति व प्राचीन वैभव को दशार्ते हैं। ऐसे में इन रुट्स पर सफारी शुरू होने से पर्यटक विरासत से रुबरू हो सकेंगे।</p>
<p><strong>इधर, रामगढ़ में दोनों स्लॉट की सफारी हाउस फुल</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व के रेंजर सुमीत कुमार ने बताया कि नवम्बर व दिसम्बर माह से जंगल सफारी हाउस फुल चल रही है। सफारी के लिए यहां 6 जिप्सी संचालित की जा रही है। सुबह की 6 से 9 और शाम की 3 से 6 बजे की दोनों पारी में पर्यटकों को जबरदस्त रुझान देखने को मिल रहा है।</p>
<p><strong>क्या कहते हैं पर्यटक</strong><br />दरा में जंगल सफारी के लिए बुकिंग आॅफलाइन है, जो पर्यटन के लिहाज से सही नहीं है। शहर से 48 किमी का सफर कर दरा पहुंचते हैं तो वहां जाकर जिप्सी एडवांस बुक होने की बात पता चलती है, जिससे आना-जाना मिलाकर 100 किमी का चक्कर व्यर्थ हो जाता है। मुकुंदरा प्रशासन को बोराबास रैंज में सफारी शुरू करनी चाहिए।<br /><strong>-अशोक कुमार, महावीर नगर तृतीय</strong></p>
<p>दरा बहुत दूर पड़ता है। ऐसे में रावतभाटा रोड स्थित बोराबास या कोलीपुरा रेंज में प्रस्तावित रुट पर जंगल सफारी शुरू की जानी चाहिए। ताकि, पर्यटकों का समय व पेट्रोल का पैसा बच सके। साथ ही बुकिंग प्रणाली भी आॅनलाइन होनी चाहिए, जिससे व्यक्ति सफारी से पहले बुकिंग की करंट स्टेटस को देख ट्रैवलिंग प्लान बना सके।<br /><strong>-राम नारायण माहेश्वरी, दादाबाड़ी छोटा चौराहा</strong></p>
<p>मैं अपने साथियों के साथ कुछ दिनों पहले सफारी के लिए दरा गया था। वहां जाकर पता लगा कि जिप्सी एडवांस में ही बुक हो चुकी है। ऐसे में शाम का स्लॉट मिलने पर सफारी मिल सकती थी। जिसके लिए दोपहर 3 बजे तक का इंतजार करना पड़ता। ऐसे में वापस बैरंग लौटना पड़ा। यदि, बुकिंग व्यवस्था आॅनलाइन होती या फिर जिप्सी की संख्या अधिक होती तो उसी दिन सफारी का मौका मिल जाता। विभाग को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने और शहरी सीमा में स्थित रावतभाटा रोड के जंगलों में सफारी शुरू की जानी चाहिए।<br /><strong>-चेतन सैन, प्रहलाद मीणा कैशवपुरा</strong></p>
<p>बोराबास रेंज में जंगल सफारी शुरू की जानी है। यहां के रुट्स भी तय कर दिए हैं, अब यहां रास्ते, वाच टावर, एंट्री गेट सहित पब्लिक फेसेलिटी डवलपमेंट के लिए कार्य किए जा रहे हैं। हमारी कोशिश वित्तिय वर्ष की समाप्ती से पहले सफारी शुरू किए जाने की कोशिश है। पर्यटन बढ़ाने के लिए हमारी तरफ से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व  </strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Dec 2025 14:58:45 +0530</pubDate>
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                <title>बारिश ने रोकी कनकटी की खुले जंगल में एंट्री, पानी के तेज बहाव से टूटी फेंसिंग </title>
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                        <![CDATA[ पानी के तेज बहाव से 82 स्क्वायर किमी के एनक्लोजर की जगह-जगह से टूटी दीवार]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/rain-stopped-kanakati-s-entry-into-the-open-forest/article-122194"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/1ne1ws-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रणथम्भौर से मुकुंदरा शिफ्ट की गई बाघिन कनकटी की 8 हजार 200 हैक्टेयर के खुले जंगल में एंट्री पर बारिश ने ब्रेक लगा दिए। जबकि, बाघिन को सॉफ्ट एनक्लोजर में रखे हुए करीब एक माह से ज्यादा समय बीत चुका है। हालांकि, उसे हार्ड रिलीज की तैयारी भी थी लेकिन हाड़ौती में हो रही भारी बारिश के चलते पानी के तेज बहाव से 82 स्क्वायर किमी के एनक्लोजर की चार दीवारी जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गई। दीवारों की मरम्मत होने के बाद ही उसे 21 हैक्टेयर से हार्ड रिलीज किया सकेगा। </p>
<p><strong>पानी के तेज बहाव से टूटी फेंसिंग </strong><br />संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक सुगनाराम जाट ने बताया कि पानी के तेज बहाव से 82 स्क्वायर किमी की दीवारें जगह-जगह से टूट गई है। जिसकी मरम्मत करवाई जा रही है। लेकिन, बारिश के कारण कार्य पूरा होने में समय लग रहा है। वहीं, एनक्लोजर के पास से ऐरु नदी व नाले गुजर रहे हैं। जिनमें पानी के तेज बहाव से 15 किमी के दायरे में बनी चेनलिंग फेंसिंग क्षतिग्रस्त हो गई। उसकी मरम्मत के बाद ही बाघिन को हार्ड रिलीज किया जाएगा। </p>
<p><strong>बाघिन एमटी-7 ने किए 50 शिकार</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से लाई गई बाघिन एमटी-7 दरा में पांच हैक्टेयर एनक्लोजर में है। रिवाइल्डिंग के दौरान वह अब तक करीब 50 शिकार कर चुकी है। वर्तमान में उसकी उम्र ढाई साल हो चुकी है। ऐसे में उसे भी खुले जंगल में शिफ्ट किया जाना है। लेकिन, इससे पहले एनटीसीए से विशेषज्ञों की टीम अगस्त तक मुकुंदरा आएगी, जो बाघिन का शेड्यूल, व्यवहार, शिकार की संख्या सहित अन्य जरूरी मापदंड का निरीक्षण किया जाएगा। इसके बाद ही टाइग्रेस एमटी-7 के हार्ड रिलीज पर फैसला हो सकेगा। </p>
<p><strong>कोलीपुरा व दामोदरपुरा गांव का चल रहा सर्वे</strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व  में बसे गांवों का सर्वे किया जा रहा है। वर्तमान में कोलीपुरा व दामोदरपुरा गांव का सर्वे किया जा रहा है। यहां के बाशिंदों की संख्या, परिवार के सदस्य, जमीन, पशु सहित खेत-खलियान का आकलन किया जा रहा है। इसके बाद ग्रामीणों से विस्थापन के आवेदन लिए जाएंगे। चूंकी, रिलोकेशन प्रक्रिया स्वैछिक है, ऐसे में जिनकी स्वीकृति मिलेगी, उन्हें नियमानुसार पैकेज देकर विस्थापित किया जाएगा। </p>
<p><strong>महाराष्टÑ-मध्यप्रदेश से बाघिन, रणथम्भौर से बाघ</strong><br />महाराष्टÑ और मध्यप्रदेश से दो बाघिन लाई जानी है। वहीं, रणथम्भौर से एक बाघ लाने की एनटीसीए से परमिशन मिल चुकी है। जिनकी शिफ्टिंग भी बारिश के बाद की जाएगी। इनके आने के बाद मुकुंदरा में दो बाघ और पांच बाघिन हो जाएगी। </p>
<p><strong>दीवार मरम्मत के लिए मिला 20 लाख का बजट</strong><br />उन्होंने बताया कि 82 स्क्वायर किमी के एनक्लोजर में 35 किमी की दीवार पक्की है और 15 किमी में चेनलिंग फेंसिंग हो रही है। जिनकी मरम्मत के लिए 50 लाख का बजट मांगा था लेकिन 20 लाख का बजट स्वीकृत हुआ है। बारिश के दौरान मरम्मत कार्य प्रभावित हो रहा है। हालांकि, बीच-बीच में मरम्मत करवाई जा रही है। वहीं, बाघिन एमटी-5 की 24 घंटे मॉनिटरिंग की जा रही है। </p>
<p>बारिश के दौरान पानी के तेज बहाव से 82 स्क्वायर किमी के एनक्लोजर की दीवार जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गई है। जिसकी मरम्मत कार्य चल रहा है, जो पूरा होने के बाद ही बाघिन एमटी-8 (कनकटी) को हार्ड रिलीज किया जाएगा। वहीं, महाराष्टÑ व मध्यप्रदेश से दो बाघिन और रणथम्भौर से एक बाघ लाया जाना है। जिसकी एनटीसीए से परमिशन मिल चुकी है। संभव: बारिश के बाद शिफ्टिंग होने की उम्मीद है।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक मुकुंदरा </strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 31 Jul 2025 16:34:12 +0530</pubDate>
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                <title>वन विभाग का कमाल - जंगल में ढूंढने की बजाए कागजों में खोज रहे बाघ</title>
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                        <![CDATA[वन्यजीव प्रेमी बोले-मर चुके बाघ और शावक।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/forest-department-s-wonder---tigers-are-being-searched-on-papers-instead-of-searching-in-the-forest/article-104581"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/pze-(1)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व का सबसे पहला बाघ एमटी-1 पिछले पांच साल से लापता है। जिसे जंगल में ढूंढने के बजाए कागजों में खोजा जा रहा है। हालांकि, जीवित होने का आज तक कोई साक्ष्य वन विभाग नहीं दे सका। टाइगर जिंदा है या मर चुका, सवाल के जवाब पर वन अधिकारियों ने चुप्पी साध रही है। विभाग का कमाल देखिए, बाघिन एमटी-2 व एमटी-4 के तीन शावकों को भी लापता ही बताया जा रहा है, जो जंगल की विषम परिस्थितियों के मध्यनजर न केवल शावक बल्कि बाघ एमटी-1 के भी जिंदा होने की संभावना न्ग्गणय है। इसके बावजूद कागजों में लापता घोषित कर भ्रम की स्थिति बना रखी है।   वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है, जंगल में बाघ की उम्र करीब 13 से 14 साल होती है। एमटी-1 जब गायब हुआ तब उसकी उम्र करीब  6 से 7 साल के बीच थी और लापता हुए 5 साल बीत गए। इस तरह उसकी उम्र 12 साल होती है। ऐसे में एमटी-1 के जीवत होने की संभावना बिलकुल भी नहीं है। वहीं, शावक भी मर चुके हैं। वन विभाग को मृत घोषित कर भ्रम की स्थिति से पर्दा हटाना चाहिए। </p>
<p><strong>जिंदा होता तो मिलता सुराग </strong><br />वाइल्ड लाइफ रिसर्चर रवि कुमार ने बताया कि  बाघ एमटी-1 मर चुका है, यह बात विभागीय अधिकारी भी जानते हैं लेकिन स्वीकार नहीं करते।  जब एमटी-1 दरा एनक्लोजर से गायब हुआ तो रणथम्भौर और मुकुंदरा की टीम ने संयुक्त अभियान चलाकर उसकी खौज की थी लेकिन कहीं भी उसका पगमार्क, स्केट, किल, स्क्रेच मार्क नहीं मिला। इतना ही नहीं, यदि वह मुकुंदरा से बाहर निकलता तो जंगल में लगे कैमरा ट्रैप में तस्वीर कैद होती। हकीकत तो यह है कि एमटी-1 जीवित नहीं है। यदि होता तो इतने सालों में कुछ तो सुराग मिलता। </p>
<p><strong>टाइगर की लाइफ 14 साल तो अब जिंदा कैसे </strong><br />वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट दौलत सिंह शेखावत बताते हैं, जंगल में बाघ की उम्र 13 से 14 साल के बीच होती है। क्योंकि, यहां की परिस्थितियां बिलकुल विपरीत होती है। 3 अप्रेल 2018 को  एमटी-1 को रामगढ़ से ट्रैंकुलाइज कर मुकुंदरा लाया गया था तो उसकी उम्र करीब पांच साल थी। जब वर्ष 2020 में लापता हुआ तो उसकी उम्र करीब 7 वर्ष हो गई और लापता हुए पांच साल हो गए। यानी, वर्तमान में बाघ की उम्र 12 साल हो जाती है। जब जंगल में लाइफ ही 12 से 13 साल है तो फिर वह जिंदा कैसे हुआ।  कितने साल तक लापता रहने पर बाघ को मृत घोषित किया जाए, इस संबंध में एसओपी जारी करनी चाहिए ताकि, भ्रम की स्थिति न बनी रहे।</p>
<p><strong>बाघ 19 अगस्त 2020 को हुआ था लापता</strong><br />रणथम्भौर टाइगर रिजर्व से बूंदी के रामगढ़ विषधारी   टाइगर रिजर्व में आया बाघ एमटी-1 को 3 अप्रेल 2018 को ट्रैंकुलाइज कर मुकुंदरा शिफ्ट किया गया था। इसके बाद 19 अगस्त 2020 को दरा अभयारणय  के बंद एनक्लोजर से गायब हो गया। इसके बाद कई साल तक सर्चिंग की लेकिन कुछ भी सुराग नहीं लगा। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि बाघ मुकुंदरा से बाहर ही नहीं गया और सघन वन क्षेत्र में चला गया, जहां उसकी मौत हो गई और बॉडी अन्य जीव जंतु खा गए। ऐसे में वनकर्मियों को उसकी डेड बॉडी नहीं मिली। </p>
<p><strong>प्रदेश में 16 बाघ लापता</strong><br />जानकारी के अनुसार, प्रदेशभर के टाइगर रिजर्व से करीब 16 बाघ लापता है, जिनका अभी तक पता नहीं चल सका। जबकि, वन विभाग के पास अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी है, इसके बावजूद लापता बाघों को नहीं खोज पा रहा। वन्यजीवी विशेषज्ञों का तर्क है, जब बाघों की नियमित ट्रैकिंग की जाती है, उन पर नजर रखी जाती है तो फिर लापता बाघों का पता क्यों नहीं रहता।</p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू </strong><br />विभाग बाघों को लापता बताता है तो लापता की परिभाषा भी तय करनी चाहिए। बाघ जिस उम्र में लापता हुआ तब से अब तक यदि उसकी  आयु 12 से 13 साल हो गई और उसका कहीं सुराग नहीं मिले तो ऐसी स्थिति में बाघ के जीवित होने की संभावना नहीं होती। क्योंकि, जंगल में बाघ की उम्र ही करीब 13 से 14 साल होती है। लापता बाघों को खोजने के  लिए विशेषज्ञों की टीम गठित हो और प्रोटोकॉल के तहत विस्तृत जांच होने के बाद भी सुराग नहीं मिले तो विभाग को एफआर लगाने का प्रावधान अमल में लाकर बाघ को मृत घोषित करना चाहिए। ताकि, भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके। वहीं, टाइगर रिजर्व  में बसे गांवों में से बाघ मित्र बनाए जाना चाहिए। ताकि, जंगल के अंदर और बाहर पेरीफेरी से लगते गांवों में होने वाली गतिविधियों की सूचना मिल सके। दुधवा नेशनल पार्क और पीलिभीत सेंचुरी में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ व वन विभाग की ओर से बाघ मित्र बनाए गए हैं, जिससे उनका निगरानी तंत्र मजबूत हुआ है। जंगल से कोई भी जानवर  इधर से उधर होता है तो अधिकारियों को तुरंत सूचना मिल जाती है। यही मुकुंदरा में किया जाना चाहिए।<br /><strong>- दौलत सिंह शक्तावत, वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट</strong></p>
<p>इस तरह की कोई गाइड लाइन नहीं है कि कितनी अवधि तक लापता होने वाले बाघ को मृत मान लिया जाए। रही बात एमटी-1 की तो उसे सर्च किया जा रहा है। <br /><strong>- सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Feb 2025 17:44:58 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा की सफारी में आए केवल 250 पर्यटक, रामगढ़ भर रही उड़ान </title>
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                        <![CDATA[एक साल में मुकुंदरा में 250 पर्यटक, रामगढ़ में 3 माह में ही 900 ने की सफारी। 
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                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukundra-s-safari-is-bullock-cart--ramgarh-is-flying/article-100282"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/257rtrer-(1)12.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी शुरू हुए करीब 13 महीने से ज्यादा समय बीत चुका है। इसके बावजूद  पर्यटकों का रुझान नहीं बढ़ सका। अब तक यहां मात्र 250 पर्यटक ही सफारी के लिए आए हैं। जबकि, रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में पिछले तीन माह में ही 900 पर्यटक जंगल सफारी का लुफ्त उठा चुके। दोनों टाइगर रिजर्व में पर्यटकों की संख्या में रात-दिन का अंतर अधिकारियों के प्रबंधन और सफारी के प्रति इच्छा शक्ति का भाव प्रकट करता है।  </p>
<p><strong>मुकुंदरा में 1 तो रामगढ़ में 9 जप्सी से सफारी</strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी के लिए 4 रुट्स निर्धारित किए हुए हैं। लेकिन  सफारी मात्र दरा रेंज में एक रुट्स पर ही चल रही है। जहां एक ही जिप्सी के भरोसे पर्यटकों को सफारी करवाई जा रही है। छह से ज्यादा पर्यटकों के आने पर दूसरी गाड़ी नहीं मिलती है और उन्हें दोपहर की अगली पारी के लिए 6 घंटे इंतजार करना पड़ता है। जबकि, रामगढ़ टाइगर रिजर्व में 9 जिप्सी रजिस्टर्ड हैं। यहां आने वाले पर्यटकों को आसानी से बुकिंग मिल जाती है। लेकिन, मुकुंदरा में विजिटर्स को भटकना पड़ता है। </p>
<p><strong>13 माह में मुकुंदरा ने 2.20 लाख तो रामगढ़ ने 3 माह में ही कमा लिए 7.24 लाख </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी अक्टूबर 2023 में शुरू की गई थी। तब से अब तक 13 महीने में करीब 2 लाख 20 हजार रुपए का ही राजस्व मिला है। जबकि, रामगढ़ टाइगर रिजर्व की बात करें तो यहां वर्ष 2023 में अक्टूबर से दिसम्बर तक मात्र तीन महीने में 7 लाख 24 हजार रुपए का राजस्व प्राप्त हो चुका है। हालांकि, आरवीटीआर में 9 जप्सी रजिस्टर्ड है। जबकि, एमएचटीआर में सिर्फ 1 जिप्सी के भरोसे ही पर्यटकों को सफारी करवाई जा रही है। दोनों रिजर्व में पर्यटकों की संख्या व राजस्व के आंकड़ों में रात-दिन का अंतर अधिकारियों की कार्यप्रणाली, कार्य दक्षता, प्रबंधन और रुचि को प्रदर्शित करता है।</p>
<p><strong>यहां 13 माह में 250 और वहां 3 माह में 900 पर्यटकों ने की सफारी </strong><br />जंगल सफारी के प्रति रुझान वन अधिकारियों के प्रबंधन और इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। मुकुंदरा और रामगढ़ दोनों टाइगर रिवर्ज में सफारी बफर जोन में करवाई जाती है। इसके बावजूद एक साल में मुकुंदरा में पर्यटकों की संख्या निराशाजनक रही, जबकि रामगढ़ में पिछले तीन महीने के ही आंकड़े उत्साहवर्धक रहे हैं। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में 1 अक्टूबर 2023 से अब तक मात्र 250 पर्यटक ही सफारी के लिए दरा पहुंचे हैं। इसके ठीक विपरीत रामगढ़ टाइगर रिजर्व में गत वर्ष अक्टूबर से दिसम्बर तक के तीन माह में ही 900 विजिटर्स सफारी कर चुके हैं। </p>
<p><strong>मुकुंदरा डीएफओ ने नहीं दिया जवाब</strong><br />मामले को लेकर नवज्योति ने मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के डीएफओ मुथू एस को फोन किया था लेकिन उन्होंने रिसीव नहीं किया। </p>
<p><strong>मुकुंदरा में पर्यटकों की संख्या में कमी के कारण</strong><br />- मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के बफर जोन में सफारी के लिए 4 रुट तय किए गए हैं लेकिन 1 ही रुट दरा अभयारण्य में सफारी करवाई जा रही है, जो शहर से करीब 70 किमी दूर है। जिसकी वजह से पर्यटक जाने में रुचि नहीं दिखाते। <br />- दरा अभयारणय में एक ही जिप्सी के भरोसे सफारी चल रही है। पर्यटकों को दोपहर की पारी के लिए 6 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। <br />- शहर के बीच मुकुंदरा के शेष 3 रुट्स पर सफारी शुरू नहीं किया जाना सबसे बड़ा कारण है।<br />- वर्तमान में मुकुंदरा में तीन टाइगर हैं। जिनमें से बाघ  एमटी-5 व बाघिन एमटी-6 का मूवमेंट बोराबांस, कोलीपुरा व जवाहर सागर रेंज में रहता है। जिस रुट पर सफारी है वहां टाइगर नहीं है। हालांकि, दरा में 5 हैक्टेयर के एनक्लोजर में अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से शिफ्ट की गई बाघिन है, जिसकी रिवाइल्डिंग की जा रही है। ऐसे में यहां पर्यटकों को टाइगर देखने को नहीं मिलते। <br />- सफारी को आने वाले पर्यटकों में मुख्यत: टाइगर आकर्षण रहता है, लेकिन इस रुट्स में टाइगर नहीं होने से भी पर्यटक यहां नहीं आते। <br />- मुकुंदरा में जंगल सफारी का प्रचार प्रसार की भारी कमी है। <br />- दरा में ट्यूरिस्ट सेंटर नहीं होने से लोगों को कहां से टिकट मिलेंगे और कहां से जिप्सी मिलेगी, इसकी जानकारी नहीं मिल पाती। <br />- बुनियादी सुविधाओं व वन अधिकारियों में इच्छा शक्ति का अभाव।<br />- दरा रेंज में सफारी रुट पर सावनभादौ डेम भी आता है, जहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, वन्यजीव व मगरमच्छों की अच्छी साइटिंग होती है। लेकिन इस क्षेत्र में पर्यटकों के लिए कहीं भी कैफेटेरिया नहीं है। </p>
<p>मुकुंदरा और रामगढ़ दोनों ही सफारी को लेकर प्राइमरी स्टेज पर हैं। अभी पूरी तरह से सुविधाएं भी विकसित नहीं हुई हैं। यहां न तो बेहतर ट्रैक है और न ही अच्छी गाड़ियां रजिस्टर्ड हैं। हालांकि, दोनों ही रिजर्व में सफारी का प्रचार-प्रसार किया जाएगा। रही बात टाइगर की तो मुकुंदरा में तीन और रामगढ़ में दो टाइगर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।<br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग कोटा</strong></p>
<p>रामगढ़ टाइगर रिजर्व में सफारी के प्रति पटर्यटकों में रुझान बढ़ रहा है। यहां पिछले तीन महीने अक्टूबर से दिसम्बर 2024 तक 900 पर्यटकों ने जंगल सफारी कर चुके हैं। जिनसे सरकार को 7.24 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ है। यहां पर्यटकों की  संख्या बढ़ें, इसके लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। <br /><strong>- संजीव शर्मा, डीएफओ रामगढ़ टाइगर रिजर्व</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jan 2025 16:14:17 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा के जंगल में बिछेगा वन्यजीवों की सुरक्षा का जाल</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा पहले के मुकाबले और अधिक बढ़ जाएगी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/wildlife-safety-net-in-mukundra-forest/article-98925"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/5554-(2)23.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व का दायरा अब 760 वर्ग किमी से बढ़कर 953 वर्ग किमी हो गया है। भारत सरकार का गजट नोटिफिकेशन जारी होने के बाद भैंसरोडगढ़ अभयारणय भी मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में शामिल हो गया है। ऐसे में भैंसरोडगढ़ में अब टाइगर रिजर्व के नियम कानून लागू होंगे। जिससे जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा पहले के मुकाबले और अधिक बढ़ जाएगी। टाइगर रिजर्व में फेस-4 मॉनिटरिंग होने से प्रोटेक्शन के साथ बजट की उपलब्धता भी बढ़ेगी। गौरतलब है कि अभी तक मुकुंदरा का दायरा 760 वर्गकिमी तक फैला हुआ था, लेकिन भैंसरोडगढ़ सेंचुरी शामिल होने से इसका क्षेत्रफल 953 वर्गकिमी हो गया है। </p>
<p><strong>जंगल और वन्यजीवों की बढ़ेगी सुरक्षा </strong><br />उन्होंने बताया कि सेंचुरी और टाइगर रिजर्व के नियम अलग-अलग होते हैं। टाइगर रिजर्व में शामिल होने से जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा अधिक बढ़ जाती है। क्योंकि, रिवर्ज में फेस-4 मॉनिटरिंग होती है। विकास कार्यों के लिए बजट ज्यादा मिल सकेगा। बड़े-बड़े एनक्लोजर बनाए जा सकेंगे। दीवारें पक्की हो जाएंगी, जिससे जंगल का प्रोटेक्शन मजबूत होगा। वहीं, शिकार की संभावना भी बहुत कम हो जाएगी। फिल्ड स्टाफ की संख्या बढ़ेगी। इसके अलावा अन्य डवलपमेंट कार्य भी ज्यादा होंगे। </p>
<p><strong>193 वर्ग किमी में फैला भैंसरोडगढ़</strong><br />वन्यजीव कोटा के डीसीएफ अनुराग भटनागर ने बताया कि भैंसरोडगढ़ सेंचुरी को अब टाइगर रिजर्व का स्टेटस मिल गया है। यह सेंचुरी 193 वर्ग किमी में फैली हुई है। हमने पूर्व में इसके प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेजे थे। जहां से मंजूरी मिलने के बाद भैंसरोडगढ़ को टाइगर रिर्जव में शामिल कर लिया गया है। हालांकि, इसका संचालन वाइल्ड लाइफ कोटा द्वारा किया जाएगा। लेकिन, नियम-कानून टाइगर रिजर्व के लागू होंगे। जिससे भैंसरोडगढ़ को फायदा होगा। </p>
<p><strong>पैंथर व जंगली सूअर की संख्या अधिक</strong><br />भैंसरोडगढ़ के जंगल में हिरण प्रजाति को छोड़ अन्य मांसाहारी जानवरों की संख्या अधिक है। जिनमें पैंथर, जंगली सूअर, हायना, जरख सहित अन्य वन्यजीवों की संख्या ज्यादा है। हालांकि, हिरण प्रजाति के शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या कम है। जिनकी संख्या बढ़ाने के लिए 5-5 हैक्टेयर के एनक्लोर बनाकर उनमें 8 से 10 जोड़ों को रखा जानी की आगामी कार्य योजना है। </p>
<p><strong>हिरण की पसंदीदा घास की हो रही रिसर्च</strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि अभयारणय में कई तरह की घास हैं। कौनसी घास चरने योग्य है, हिरण किस घास को खाना ज्यादा पसंद करते हैं, इसका पता लगाने के लिए रिसर्च वर्क करवा रहे हैं। इसके लिए टैंडर भी निकाल दिया है। बायोलॉजिस्ट ने काम भी शुरू कर दिया है। अगले 4 माह में रिपोर्ट मिल जाएगी। ऐसे में हिरण की पसंदीदा घास को ही ज्यादा लगाया जाएगा। इसके अलावा भैंसरोडगढ़ में  शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या में तेजी से हुई गिरावट के क्या कारण है, इसका पता लगाने के लिए भी रिसर्च वर्क शुरू करवा दिया है।</p>
<p><strong>भैंसरोडगढ़ से हो सकती है चीतों की एंट्री </strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यप्रदेश से राजस्थान तक 400 वर्ग किमी के क्षेत्र में चीता लैंडस्केप बनाया जाएगा। इसके लिए कार्य योजना तैयार की जा रही है। अगले चरण में दक्षिणी अफ्रीका या नामीबिया से चीते गांधी सागर में लाए जाएंगे, जो भैंसरोडगढ़ से जुड़ा हुआ है। ऐसे में जब चीते एनक्लोजर से बाहर निकलेंगे तो सौ फीसदी यह राजस्थान में भैंसरोडगढ़ के जंगल में एंट्री करेंगे। यहां का भगौलिक वातावरण चीते के अनूकूल है। पूर्व में भी चीता कूनों से निकल बारां के शाहबाद के जंगल तक आ चुका है। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Dec 2024 16:30:59 +0530</pubDate>
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                <title>5 माह से बाघ एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर खराब, परमिशन के बाद भी नहीं बदला टाइगर सुरक्षा में घोर लापरवाही </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[मुकुंदरा से गायब हुआ बाघ एमटी-1 का आज तक नहीं लगा सुराग]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-mt-5-s-radio-collar-is-not-working-for-the-last-5-months--even-after/article-97107"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(5)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व का एकलौता नर बाघ एमटी-5 की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरती जा रही है।  पिछले 5 महीने से बाघ का रेडियो कॉर्लर खराब है, जिसे बदलने की मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक से परमिशन भी मिल चुकी है। इसके बावजूद रेडियो कॉर्लर नहीं बदला गया। मुकुंदरा का पहला बाघ एमटी-1 पूर्व में 82 वर्ग किमी के क्लोज एनक्लोजर से गायब हो गया था। जिसका आज तक पता नहीं चला, क्योंकि उसका रेडियो कॉर्लर खराब था। जबकि, बाघ एमटी-5 खुले में विचरण कर रहा है और लगातार लंबी दूरी तय करता है। पहले भी वह चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा होते हुए मध्यप्रदेश की सीमा तक जा चुका है। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही से मुकुंदरा में फिर से एमटी-1 की कहानी दोहराई जाने का खतरा मंडरा रहा है।  </p>
<p><strong>जुलाई से ही खराब है रेडियो कॉर्लर </strong><br />जानकारी के अनुसार, बाघ एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर गत जुलाई माह से ही काम नहीं कर रहा है। जिसकी जानकारी होते हुए भी जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अब तक बदला गया। इधर, जीपीएस कोर्डिनेट नहीं मिलने से मॉनिटरिंग टीम को भी उसके मूवमेंट का पता नहीं लगता। जबकि, वह लंबी दूरी तय करता रहा है। ऐसे में उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। सबसे ज्यादा खतरा रात के समय है। क्योंकि, बाघ रात के समय ही बाघ 30 से 40 किमी का मूवमेंट करता है। </p>
<p><strong>कैमरा ट्रेप व पगमार्क के भरोसे मॉनिटरिंग  </strong><br />टाइगर मॉनिटरिंग में लगे वनकर्मी बाघ की मॉनिटरिंग कैमरा ट्रैप के फुटेज व पगमार्क, स्केट  व स्क्रेच मार्क के भरोसे ही कर रहे हैं। जबकि, रात के समय पगमार्क व स्क्रेच मार्क दिखाई नहीं देते। ऐसे में जीपीएस बेस्ड रेडियो कॉर्लर से मिलने वाले सेटेलाइट कोर्डिनेट व सिग्नल से मॉनिटरिंग  की जाती है लेकिन रेडियो कॉर्लर खराब होने से वनकर्मियों को जीपीएस सिग्नल के अभाव में बाघ के मूवमेंट का पता नहीं लग पा रहा। ऐसे में बाघ कहीं सघन वनक्षेत्र में चला जाए तो उसे ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।</p>
<p><strong>मध्यप्रदेश की बोर्डर तक जा चुका एमटी-5</strong><br />गत 8 फरवरी को टाइगर एमटी-5 चंबल नदी पार कर जवाहर सागर सेंचुरी से भीलवाड़ा के सघन वनक्षेत्र में पहुंच गया था। यह वनक्षेत्र मध्यप्रदेश की बॉर्डर पर स्थित है। मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग टीम को रेडियो सिग्नल मिलने के बाद ही बाघ की लॉकेशन का पता लग पाया था। इसके बाद ही भीलवाड़ा व नीमच वन विभाग के सहयोग से मुकुंदरा प्रशासन बाघ तक पहुंच पाया था। यदि, फिर से एमटी-5 इतनी लंबी दूरी तय कर लेता है तो मुकुंदरा के लिए बाघ को फिर से खोज पाना आसान नहीं होगा। </p>
<p><strong>गत वर्ष 10 दिन तक गायब रहा था बाघ </strong><br />28 आॅक्टूबर 2023 में टाइगर के गले में लगे रेडियो कॉलर के जीपीएस फिक्सेस नहीं मिलने से वह 10 दिन तक गायब रहा था। इस दरमियान बाघ का कहीं भी मूवमेंट नहीं मिला। इसके बाद 3 नवम्बर 2023 की सुबह रेडियो सिग्नल भी बंद हो गए थे।  तब वनकर्मी पगमार्क के भरोसे चित्तौड़, झालावाड़ और बूंदी वन मंडल व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्रों में खोज रही थी, लेकिन बाघ जवाहर सागर रेंज के सघन वनक्षेत्र में मिला था। क्योंकि, गत 8 नवम्बर की सुबह जवाहर सागर के सघन वन क्षेत्र में रेडियो सिग्नल मिलने से बाघ की लोकेशन ट्रैस हो पाई थी। ऐसे में रेडियोकॉर्लर खराब होने से उसके गायब होने की आशंका प्रबल हो जाती है।</p>
<p><strong>रेडियो कॉर्लर की अनदेखी से दो बड़े नुकसान</strong><br /><strong>एमटी-1 का आज तक नहीं लगा सुराग</strong><br />मुकुंदरा का पहला बाघ एमटी-1 वर्ष 2020 में 84 हैक्टेयर एनक्लोजर से अचानक गायब हो गया था। जिसका रेडियो कॉर्लर खराब होने की वजह से आज तक पता नहीं चल सका। जबकि, रेडियो कॉर्लर खराब होने की तत्कालीन डीएफओ को जानकारी थी, इसके बावजूद उसे बदला नहीं गया।  जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही से गायब हुआ बाघ का आज तक पता नहीं चल सका। अब वर्तमान में वही गलती फिर से दोहराई जा रही है। </p>
<p><strong>कंकाल में बदल गई बाघिन आरवीटीआर-2</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व की बाघिन आरवीटीआर-2 का रेडियोकॉर्लर पिछले डेढ़ साल से खराब था। जिसका पता होने के बावजूद अधिकारी लापरवाह बने रहे और रेडियोकॉर्लर नहीं बदला। जिसका नतीजा, गत 16 अक्टूबर को बाघिन के कंकाल के रूप में मिला। बाघिन की मौत एक माह पहले ही मौत हो गई थी। वह लंबे समय से उसका कोई मूवमेंट नहीं मिल रहा था। इसके बाजवूद उसे ढूंढा नहीं गया। यदि, रेडियोकॉर्लर सही होता तो जीपीएस सिग्नल मिलने से उसकी लॉकेशन ट्रेस हो जाती और उसकी जान बचाई जा सकती थी। </p>
<p><strong>क्या कहते हैं वन्यजीव प्रेमी</strong><br />बाघों की रहस्यमयी मौत से चर्चा में रहे मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के इकलौते बाघ एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर 5 महीने से खराब होना गंभीर चिंता का विषय है। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ की अनुमति के बावजूद रेडियो कॉर्लर नहीं बदलना अधिकारियों की गंभीर लापरवाही का प्रत्यक्ष उदारहण है। इससे बाघ की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। एनटीसीए को तत्काल संज्ञान लेकर बाघ की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।   साथ ही वन्यप्राणी प्रबंधन प्रशिक्षण के लिए सिफारिश सिफारिश करनी चाहिए।<br /><strong>-अजय दुबे, वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट भोपाल</strong></p>
<p>वर्ष 2020 में मुकुंदरा का पहला बाघ एमटी-1 82 वर्ग किमी के क्लोज एनक्लोजर से गायब हो गया था। जिसका आज तक पता नहीं लगा। क्योंकि,  उसका रेडियोकॉर्लर खराब था। अब लापरवाही की यही कहानी फिर से एमटी-5 के साथ दोहराई जा रही है। जबकि, यह बाघ तो खुले में विचरण कर रहा है। खुदा न खास्ता एमटी-5 के साथ कुछ हादसा हो गया तो अधिकारी स्टाफ की कमी का हवाला देकर हाथ खड़े कर लेंगे। जिम्मेदार अधिकारी वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति बिलकुल भी गंभीर नहीं है। <br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, एडवोकेट एवं पर्यावरणविद् </strong></p>
<p><strong>दो -तीन बार प्रयास किया, सफल नहीं हो पाए</strong><br />हां, रेडियो कॉर्लर खराब है, जिसे बदलने के लिए तीन-चार बार कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो सके। चूंकि, रेडियोकॉर्लर बदलने के लिए ट्रैंकुलाइज करने की जरूरत होती है।  ऐसे में पहले इसे अनुकूल स्थान पर लाने के लिए शिकार बांधा था, बाघ आया लेकिन रुका नहीं। इस वजह से ट्रैंकुलाइज नहीं कर पाए। हालांकि, कोशिश जारी है। बाघ की मॉनिटरिंग की जा रही है।<br /><strong>-रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग </strong></p>
<p>एमटी-5 का रेडियो कॉर्लर बदलने का प्रयास कर रहे हैं। बाघ के पीछे एक टीम भी लगा रखी है। पहले भी एक बार रेडियोकॉर्लर बदलने का प्रयास किया था, हालांकि सफल नहीं हो सके। अभी बायोलॉजिकल पार्क से मादा शावक को मुकुंदरा में शिफ्ट किया जाना है। इसके बाद फिर से रेडियोकॉर्लर बदलने की कोशिश की जाएगी। बाघ की नियमित मॉनीटरिंग की जा रही है।<br /><strong>-मुथूएस, डीएफओ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व </strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Dec 2024 15:22:44 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा ना इंसानों के काम का रहा ना बाघ ही बस पाए</title>
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                        <![CDATA[परियोजना की घोषणा होने के तुरंत बाद आनन फानन में यहां पर सारी तैयारियां की गई, और तीन बाघ यहां पर रणथंभौर से लाकर छोड़े गए ।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/mukundra-was-neither-useful-to-humans-nor-tigers-could-settle-here/article-95947"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(1)10.png" alt=""></a><br /><p> झालावाड़। झालावाड़ और कोटा जिले के मध्य फैली सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व, इन दोनों के बदली आंसू बहा रही है। परियोजना में ना तो बाघ रह रहे हैं ना हीं इंसान। परियोजना की घोषणा लगभग 7 साल पहले हुई थी, जब तत्कालीन सीएम द्वारा इस परियोजना में गहरी रुचि दिखते हुए इसको जमीन पर उतारने की तैयारी की गई। परियोजना की घोषणा होने के तुरंत बाद आनन फानन में यहां पर सारी तैयारियां की गई, और तीन बाघ यहां पर रणथंभौर से लाकर छोड़े गए जबकि एक बाघ खुद चलता हुआ यहां आ पहुंचा। कुछ दिनों बाद बाघों के एक जोड़े ने दो शावकों को जन्म दिया, इस प्रकार से देखते ही देखते यहां बाघों का कुनबा बढ़कर की 6 की संख्या तक जा पहुंचा। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार ने पूरा मामले में जल्दबाजी की और बिना पूरी तैयारी के यहां बाघों को छोड़ दिया। जबकि परियोजना के सबसे संपन्न क्षेत्र दरा के घाटी गांव से लेकर मशालपुरा गांव तक लोगों का विस्थापन नहीं हो पाया था, यहां लोग आज भी रह रहे हैं।</p>
<p>सूत्र बताते हैं कि बाघों की मौजूदगी मनुष्यों को रास नहीं आई तथा दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बनते रहे और अंत में चार बाघ मौत के मुंह में समा गए, जबकि दो बाघों का रेस्क्यू करके यहां से ले जाया गया। जिसमें से भी एक बाघिन की बाद में मौत हो गई। अब यहां बार-बार बाघ छोड़े जाने की बात उठती आई है, लेकिन हालात आज भी नहीं बदले हैं। परियोजना क्षेत्र में आज भी काफी लोग निवास कर रहे हैं, जो मुआवजा कम होने की बात कह कर यहां से निकलना नहीं चाहते। अधिकांश लोग इलाका छोड़कर जा चुके हैं लेकिन जो लोग यहां पर रह रहे हैं उनका साफ तौर पर कहना है कि जो मुआवजा सरकार द्वारा उनको दिया जा रहा है वह पर्याप्त नहीं है। लोग कहते हैं कि उनकी जमीनें यहां पर बहुत ज्यादा है, ऐसे में मुआवजा राशि उनके लिए कम पड़ रही है। वह स्पेशल पैकेज की मांग करते हैं या सरकार से मुआवजा बड़ा कर दिए जाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन पूरे मामले के चलते परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है और हालात ऐसे हो गए हैं कि ना तो यह इलाका बाघों के काम आ रहा है ना ही इंसानों के। बस्तियां उजड़ गई है लेकिन बाघ भी नहीं बस पाए हैं। <br />   <br />परियोजना के मशालपुरा गांव में लगभग 7 परिवार इस वक्त रह रहे हैं, जो साफ तौर पर कहते हैं कि उनको मुआवजा पर्याप्त नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि 15 लाख रुपए प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सरकार ने मुआवजा दिया है, ऐसे में जिन लोगों की यहां जमीन नहीं थी वह 15-15 लाख रुपए लेकर चले गए, लेकिन जो अब यहां बचे हैं उनकी काफी जमीन यहां पर हैं, ऐसे में उनके नुकसान की पूर्ति 15 लाख रुपए से नहीं हो सकती, इसलिए वह यहां से नहीं जाएंगे। लोगों को आरोप है कि वोट डालने के लिए सरकार 18 साल के व्यक्ति को बालिग मानती है जबकि टाइगर रिजर्व में मुआवजे के लिए आयु सीमा 21 वर्ष रखी गई, ऐसे में कई परिवारों को काफी नुकसान हो रहा है और वह यहां से जाना नहीं चाहते। माना जाता है खुद का फैसलाटाइगर रिजर्व परियोजना में सरकार के पास ऐसा कोई नियम नहीं है कि वह वहां रहने वाले लोगों को जबरदस्ती बाहर निकाल सकें। पूरा मामला स्वैच्छिक है यदि व्यक्ति अपनी मर्जी से जाना चाहता है तभी वह यहां से जाएगा और उसको मुआवजा मिलेगा, लेकिन जो व्यक्ति वहां मर्जी से रहना चाहते हैं उनको वहां से निकला नहीं जा सकता, ऐसे में यहां रहने वाले लोगों पर सरकार और प्रशासन का कोई अंकुश नहीं है और वह इनको यहां से नहीं हटा पा रहे हैं, तथा यहां रहने वाले लोगों का साफ कहना है कि उन्हें स्पेशल पैकेज या स्पेशल मुआवजा जब तक नहीं मिलेगा तब तक वह यहां से नहीं जाएंगे, ऐसे में टाइगर रिजर्व परियोजना पर तलवार लटकी हुई है, क्योंकि बाघ और इंसान एक बार यहां पर साथ रहे तो बाघ खत्म हो गए थे,अब दोबारा अगर यहां बाघों को छोड़ा जाता है तो वह एक तरह का जोखिम लेना ही कहलाएगा।</p>
<p><strong>इनका कहना है </strong><br />परियोजना क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों से कैंप लगाकर बातचीत की गई थी तथा आगे भी कैंप आयोजित करके उनसे समझाइश की जा रही है, कुछ लोग वहां से जाने को राजी हो गए हैं लेकिन कुछ वहां से जाना नहीं चाहते, प्रशासन के स्तर पर लगातार प्रयास कर रहे हैं तथा उनकी मांगों से सरकार को भी अवगत करवाया जा रहा है। <br /><strong>- अजय सिंह राठौड़, जिला कलेक्टर, झालावाड़।</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>झालावाड़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Nov 2024 16:26:25 +0530</pubDate>
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                <title>दोगलापन : विकास ही नहीं लापता बाघों को खोजने में भी मुकुंदरा दरकिनार</title>
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                        <![CDATA[5 साल से लापता है मुकुंदरा का बाघ एमटी-1 व 2 शावक ।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/hypocrisy--mukundra-is-ignored-not-only-in-development-but-also-in-finding-the-missing-tigers/article-95844"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के साथ हर मोर्चे पर सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है। बाघों की शिफ्टिंग हो या विकास कार्य सभी में मुकुंदरा को उपेक्षित रखा गया। लेकिन अब लापता बाघों को खोजने में भी एमएचटीआर को दरकिनार कर दिया गया। दरअसल, रणथम्भौर से पिछले एक साल में14 बाघ लापता हो गए तो उन्हें खोजने के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने जांच कमेटी गठित कर दी। लेकिन, मुकुंदरा का बाघ एमटी-1 व 2 शावक पिछले पांच साल से लापता हैं, जिन्हें ढूंढने तक का प्रयास नहीं किया जा रहा। तीन सदस्यीय जांच कमेटी न सिर्फ रणथम्भौर के लापता बाघों को खोज रही बल्कि टाइगर मॉनिटरिंग के समस्त रिकॉर्ड को भी खंगाल रही। वहीं, रणथम्भौर प्रशासन ने उन्हें ढूंढने के अब तक क्या प्रयास किए, अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही की भी जांच कर रही है। लेकिन, मुकुंदरा के 82 वर्ग किमी के एनक्लोजर से बाघ एमटी-1 अचानक गायब हो जाता है, जिसका कहीं सुराग नहीं मिलता फिर भी तत्कालीन अधिकारियों की लापरवाही की जांच करना तक मुनासिब नहीं समझा। वन्यजीव विशेषज्ञों का मत है कि वन विभाग का टॉप मैनेजमेंट ही मुकुंदरा को पनपने नहीं देना चाहता। </p>
<p><strong>5 साल से लापता बाघ एमटी-1 व शावक </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व की दरा रैंज में 82 हैक्टेयर के एनक्लोजर से बाघ एमटी-1 19 अगस्त 2020 के बाद से अचानक गायब हो गया। जिसको ढूंढने के सार्थक प्रयास नहीं किए गए। वहीं, इससे पहले 3 अगस्त 2020 को बाघिन एमटी-2 का एक शावक लापता हो गया। इसके अगले ही महीने 22 मई को एमटी-4 का शावक भी गायब हो गया। जिनका आज तक कोई सुराग नहीं लगा। हालांकि, वन अधिकारी दबी जुबान से बाघ एमटी-1 व दोनों शावकों के मृत मान रहे हैं लेकिन अधिकारिक रूप से घोषणा नहीं कर रहे। ऐसे में आज भी यह बाघ व शावक वन विभाग के कागजों में जिंदा है।</p>
<p><strong>रेडियोकॉलर की बैट्री खराब थी फिर भी नहीं बदली</strong><br />वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक बाघ एमटी-1 के गले में लगे रेडियोकॉलर की बैट्री खराब हो चुकी थी। जिसकी जानकारी तत्कालीन डीएफओ सहित क्षेत्रिय वन अधिकारियों को थी। इसके बावजूद उसकी बैट्री नहीं बदली गई। वहीं, दरा रैंज में करोड़ों का ई-सर्विलांस सिस्टम भी लगा हुआ है, जो 24 घंटे जंगल की निगरानी, बाघ का मूवमेंट व अवैध गतिविधियों पर नजर रखने और तत्काल अधिकारियों को सूचना देने का काम करता है। इसके बावजूद बाघ अचानक एनक्लोजर से गायब हो जाता है और अत्याधुनिक संसाधन होने के बावजूद किसी को भी पता नहीं लगता। जबकि, टाइगर मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग के लिए टीमें भी गठित थी। इसमें तत्कालीन अधिकारियों की घोर लापरवाही उजागर हुई, इसके बावजूद उनकी भूमिका की न तो जांच हुई और न ही लापरवाही बरतने वाले दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई। </p>
<p><strong>3 करोड़ का सर्विलांस, 20 कैमरा टावर फिर भी टाइगर गायब </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिर्जव 6 रेंजों में बांटा गया है। जिसमें दरा, जवाहर सागर, कोलीपुरा, रावंठा, बोराबांस व गागरोन रेंज शामिल है। टाइगर रिजर्व की निगरानी के लिए 3 करोड़ का ई-सर्विलांस एंड एंटी पोचिंग सिस्टम, 20 कैमरा टावर और 200 से ज्यादा कैमरा ट्रैप लगे हुए हैं। दरा रेंज में ही सर्विलांस लगा है, जिससे सभी रेंजों में लगे कैमरा टावर जुड़े हैं। इसकी मॉनीटरिंग डीओआईटी डिपार्टमेंट करता है। इसके लिए यहां सेंटलाइज कमाण्ड सेंटर बना हुआ है। जिससे 24 घंटे जंगल की एक-एक गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। सभी कैमरे टावर नाइट विजन हैं। अत्याघुनिक तकनीक से लैस होने के बावजूद टाइगर व शावकों का लापता होना और खोज नहीं पाना, वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />हर महीने टाइगर एमटी-1 व दोनों शावकों के लापता होने की रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेजी जाती है। हमारे स्तर पर बाघ व शावक को ढूंढने का प्रयास किया जा रहा है। <br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग </strong></p>
<p>इस संबंध में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक से बात की जा सकती है।<br /><strong>- मूथू एस, डीएफओ, मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>
<p><strong>क्या कहते हैं वन्यजीव प्रेमी</strong><br />82 वर्ग किमी के एनक्लोजर से अचानक बाघ एमटी-1 के  लापता होना निश्चित रूप से तत्कालिन अधिकारियों की घोर लापरवाही है। वह जानते थे कि एमटी-1 शिकार हो चुका है। इसलिए, अपनी लापरवाही छिपाने के लिए उसे कागजों में लापता बताकर जिंदा दर्शाते रहे। इसके बाद पदस्थापित होने वाले अधिकारियों ने भी यही परिपाटी चलाई। वर्तमान में भी इसे लापता ही दर्शाया जा रहा है।  ऐसे में रणथम्भौर की तर्ज पर एमटी-1 के लापता होने की जांच की जानी चाहिए। वन विभाग के टॉप मैनेजमेंट को मुकुंदरा के प्रति दोहरा रवैया नहीं अपनाना चाहिए। <br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, मुकुंदरा एवं पर्यावरण समिति अध्यक्ष</strong></p>
<p>वैसे तो एमटी-1 जीवित नहीं है। यह बात वन अधिकारी भी मानते हैं। यदि, उनकी नजर में बाघ एमटी-1 व दोनों शावक लापता हैं तो उन्हें ढूंढने के लिए रणथम्भौर की तरह जांच कमेटी गठित करनी चाहिए। उन्हें खोजने का प्रयास न करना ही जीवित न होने का प्रमाण दर्शाता है। वन अधिकारियों की कथनी-करनी में स्पष्ट अंतर नजर आता है, लेकिन टॉप मैनेजमेंट को नजर नहीं आना, समझ से परे है। <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p>वन विभाग के पास अत्याधुनिक संसाधन होने के बावजूद बाघ तलाश न पाना अधिकारियों की घोर लापरवाही का नतीजा है। उनकी कार्य क्षमता, कार्य कुशलता, कार्य के प्रति गंभीरता पर सवाल उठता है। वन अधिकारी काम को बोझ समझने की प्रवृति के आदि हो चुके हैं। ऐसे में विभाग को अधिकारियों द्वारा करवाए गए कार्यों की प्रति वर्ष मूल्यांकन करवाना चाहिए ताकि उनकी वर्क परफॉर्मेंस का पता लग सके। रणथम्भौर के अलावा मुकुंदरा व सरिस्का से भी टाइगर लापता है, उन्हें भी खोजने के प्रयास करना चाहिए। यदि, नहीं तो उन्हें मृत घोषित करें और इसके जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाए।<br /><strong>- बाबू लाल जाजू, प्रदेश प्रभारी, पीपुल फॉर एनीमल</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 16:03:33 +0530</pubDate>
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                <title>मुकुंदरा में शिकारी सक्रिय, भालू तक चढ़े हत्थे</title>
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                        <![CDATA[पिछले 5 साल में 2 दर्जन से ज्यादा वन्यजीव व जलीय जीवों का हुआ शिकार  ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/hunters-are-active-in-mukundra--even-bears-have-been-caught/article-94603"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/6630400-sizee-(12).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रणथम्भौर में बाघ का शिकार व रामगढ़ में बाघिन की रहस्यमयी मौत की घटनाओं  ने टाइगर रिजर्व और वन्यजीवों की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े कर दिए। मुकुन्दरा में पूर्व में बाघ एमटी-1 व 2 शावक गायब हो चुके है, जिनकी शिकारियों द्वारा हत्या किए जाने की आशंका प्रबल होती है। जबकि, करोड़ों रुपए के सुरक्षा उपकरणों व मॉनिटरिंग के लिए कर्मचारियों का लावजमा  होने के बावजूद बेजुबानों की जान शिकारियों के फंदे में फंसकर जा रही है। शिकारियों की जद से मुकुंदरा भी अधूता नहीं है। एमएचटीआर में पिछले पांच सालों में दो दर्जन से अधिक वन्यजीव व जलीय जीवों का शिकार हो चुका है। ऐसे में मुकुंदरा प्रशासन को रणथम्भौर व रामगढ़ रिजर्व जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होंगे। वहीं, इंसान और जंगली जानवरों के बीच टकराव रोकने की दिशा में रिलोकेशन प्रक्रिया को गति देने के सार्थक प्रयास करना चाहिए।  </p>
<p><strong>दो दर्जन वन्यजीव व जलीय जीव का शिकार</strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में वर्ष 2018 से 2022 तक दो दर्जन से अधिक वन्यजीव व जलीय जीवों का शिकार हो चुका है। शिकारियों की जड़ें बफर तक सीमित न होकर कोर एरिया तक जम चुकी है। यहां भालू से लेकर नील गाय तक को शिकारियों ने बेरहमी से फंदे में फंसा मौत के घाट उतार दिया। अधिकतर शिकारियों को वन विभाग पकड़ नहीं सका। </p>
<p><strong>भालू को उतारा मौत के घाट </strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में वर्ष 2021-22 में अज्ञात शिकारियों ने भालू को मौत के घाट उतार दिया। शिकारियों ने जंगल में कई जगह लोहे के फंदे लगाए थे। जिसमें पैर फंसने पर घात लगाए बैठे  शिकारियों ने भालू पर धारधार हथियारों से हमला कर हत्या कर दी। वनकर्मियों को वारदात का पता गश्त के दौरान लगा। मौके पर भालू के पंजे व शरीर के अवशेष ही मिले थे। शेष हिस्सा नहीं मिला। इसके बाद अज्ञात शिकारियों के खिलाफ वन अधिनियम में मामला दर्ज किया लेकिन आरोपियों का सुराग नहीं लगा सके। </p>
<p><strong>नीलगाय से राष्टÑीय पक्षी मोर तक का शिकार </strong><br />मुकुंदरा में गत पांच वर्षों में नीलगाय से लेकर राष्टÑीय पक्षी मोर तक का शिकार हो चुका है। खरगोश के शिकार के 4 मामले दर्ज हुए हैं। वहीं, पाटागोह के 4, मोर का 1, भालू-1, नीलगाय-1, अज्ञात शिकार 1 तथा शिकार के प्रयास के 2 मामले दर्ज हुए हैं। वहीं, जलीय जीव में सबसे ज्यादा 15 मामले अवैध मतस्य आखेट के दर्ज हुए हैं। </p>
<p><strong>अब तक 7 आरोपियों को ही सजा</strong><br />वन विभाग शिकार के अब तक दो मामलों के 7 आरोपियों को ही जेल तक पहुंचा सका है। इनमें वर्ष 2021 में 4 आरोपियों ने वन्यजीवों का शिकार करने का प्रयास किया था, जिन्हें गश्त के दौरान वनकर्मियों ने दबोच लिया। आरोपियों के खिलाफ वन अधिनियम में मामला दर्ज कर कोर्ट में पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। हालांकि, सभी आरोपी वर्तमान में जमानत पर बाहर हैं। इसी तरह वर्ष 2021-22 में तीन आरोपियों ने बंदूक से वन्यजीवों का शिकार करने का प्रयास किया, जिसे भी जेल भेजा गया।  वहीं, फरवरी 2024 में नीलगाय के संभवत: एक आरोपी को पकड़ सके। जबकि, शेष आरोपी गिरफ्त से बाहर हैं। </p>
<p><strong>वनप्रेमी बोले- विस्थापन व मॉनिटरिंग हो सुदृढ़</strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में कई गांव बसे हैं। ग्रामीणों की आड़ में संदिग्ध घुसपैठ भी बढ़ती है। वहीं, कोलीपुरा, राउंठा व बोराबांस रेंज में बसे गांववासियों के मवेशी कोर एरिया में विचरण करते हैं। जिन्हें लाने के लिए इंसान भी जंगल में जाते हैं, इससे इंसान और वन्यजीव के बीच संघर्ष की स्थिति बनती है। जिससे रणथम्भौर जैसी घटनाओं की स्थिति उत्पन्न होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में टाइगर रिजर्व में बसे गांवों को जल्द से जल्द विस्थापित करना चाहिए।<br /><strong>-देवव्रत सिंह, अध्यक्ष पगमार्क फाउंडेशन</strong></p>
<p>वर्तमान में मुकुंदरा में दो बाघ हैं, जिनकी निगरानी व मॉनिटरिंग की सुदृढ़ व्यवस्था हो। जंगल की अलग-अलग शिफ्टों में गश्त व पेट्रोलिंग की जाए। संदिग्धों की घुसपैठ रोकने के लिए जंगल में आने-जाने के रास्तों पर चौकियां बनाकर सख्त पहरा होना चाहिए। वहीं, करोड़ों के एंटी पोचिंग सिस्टम, कैमरा ट्रैप व कैमरा टावर के फुटेज की नियमित आॅर्ब्जरवेशन व एनालिसिस हो। टाइगर के अलावा अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एक्शन प्लान तैयार कर हैबीटॉट डवलपमेंट के प्रयास किए जाने चाहिए। <br /><strong>-एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p>मुकुंदरा में वर्तमान में दो टाइगर हैं। जिनकी मॉनिटरिंग के लिए दो-दो टीम लगा रखी है, जो बाघ-बाघिन पर नजर रखते हैं। रणथम्भौर व रामगढ़ की घटना के बाद बाघों की सुरक्षा और मजबूत कर दी है। वहीं, टाइगर की टेरीटेरी में किसी भी मवेशी का मूवमेंट नहीं है। यदि, कोई मांसाहारी वन्यजीव किसी मवेशी का शिकार करता है तो उसका तुरंत मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था है। साथ ही गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया भी तेज कर दी है।<br /><strong>-मुथूएस, डीएफओ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Nov 2024 15:47:49 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का - मुकुंदरा के बफर जोन से अवैध कब्जे ध्वस्त</title>
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                        <![CDATA[200 हैक्टेयर जंगल में नेचुरल हैबीटॉट करेंगे होगा डवलप । 
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---illegal-encroachments-demolished-from-mukundra-s-buffer-zone/article-92259"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/4427rtrer-(1)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व  के बफर जोन में लंबे समय से हो रहे अवैध कब्जे वन विभाग ने धवस्त कर दिए। वहीं, दो किमी के दायरे में जगह-जगह से टूटी दीवारों की मरम्मत इसी सप्ताह से करवाई जाएगी। साथ ही अतिक्रमण व अवैध गतिविधियों की रोकथाम के लिए यहां चौकी-नाके का निर्माण करवाया जाएगा। इसके लिए विभाग को बजट भी जारी हो चुका है। बता दें, गत 23 जून को दैनिक नवज्योति ने मुकुंदरा के बफर जोन में अवैध कब्जे शिर्षक से खबर प्रकाशित कर अधिकारियों व प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था। खबर प्रकाशित होने के बाद अधिकारियों ने अवैध कब्जे कटाने व दीवारों की मरम्मत करवाने के लिए प्रस्ताव बनाकर मुख्यालय भिजवाएं थे। दरअसल, रावतभाटा रोड स्थित बोराबास रेंज के जंगल में नयागांव से डायवर्जन चैनल तक जगह-जगह लोगों ने अवैध कब्जे कर बाड़े बना रखे थे।  यहां लंबे समय से खनन, अतिक्रमण, कटान सहित अवैध गतिविधियां हो रही थी। </p>
<p><strong>चौकी-नाके बनेंगे, तैनात होंगे वनकर्मी</strong><br />डायवर्जन चैनल के पास चौकी व नाके का निर्माण करवाया जाना प्रस्तावित है। इस वर्ष यह काम प्राथमिकता से करवाया जाएगा। चौकी बनने से यहां पांच से छह वनकर्मी व बोर्डर होमगार्ड तैनात हो सकेंगे। जिससे जंगल की मॉनिटरिंग पहले से बेहतर हो सकेगी। साथ ही नियमित गश्त बढ़ने से अवैध गतिविधियों पर अंकुश लग सकेगा।</p>
<p><strong>अब छह फीट ऊंची होगी सुरक्षा दीवार</strong><br />बोराबास रेंज के रेंजर जनक सिंह ने बताया कि  कुछ दिन पहले ही नयागांव, दौलतगंज व डायवर्जन चैनल तक जंगल में हो रहे अवैध कब्जोें को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिए हैं। ऐसे में अब यहां  नयागांव से डायवर्जन चैनल तक करीब दो किमी के दायरे में टूटी सुरक्षा दीवारों की मरम्मत करवाने का काम शुरू किया जाएगा। साथ ही दीवारों की ऊंचाई दो  फीट और बढ़ाई जाएगी। इस तरह से पक्की दीवार की ऊंचाई 4 फीट से बढ़कर अब 6 फीट हो जाएगी। मरम्मत व निर्माण के लिए एस्टीमेट बनाकर उच्चाधिकारियों को भिजवा दिए गए हैं। इसी सप्ताह से काम शुरू हो जाएगा। </p>
<p><strong>पहले समझाइश फिर कार्रवाई</strong><br />रेंजर सिंह ने बताया कि पिछले महीने से अतिक्रमियों को अपने कब्जे हटाने के लिए नोटिस देकर समझाइश की गई थी। इसके बाद गत 29 व 30 सितम्बर को प्रशासन व पुलिस के सहयोग से अतिक्रमण  हटा दिए गए। दीवारों की मरम्मत होने से जंगल में अवैध प्रवेश बंद हो जाएगा।</p>
<p><strong>इन क्षेत्रों में होता है अवैध खनन </strong><br />मुकुंदरा की बोराबांस रेंज 12 हजार 684 हैक्टेयर में फैली हुई है। लेकिन, नयागांव से डायवर्जन चैनल तक करीब 500 मीटर के दायरे में ही 60 से ज्यादा जगहों से सुरक्षा दीवार टूटी हुई है। माफियाओं ने दीवारें तोड़ आने-जाने का रास्ता बना लिया है। नयागांव में पटवार घर के पीछे, दौलतगंज में बालाजी मंदिर के पीछे, मोदी लॉ कॉलेज के सामने वाला क्षेत्र, डायवर्जन चैनल से सटा इलाका, भंवरकुंज के आसपास का क्षेत्र व नृहसिंह माता मंदिर सहित कई इलाकों में अवैध खनन होता है।दीवारों की मरम्मत होने व ऊंचाई बढ़ने से अवैध गतिविधियों पर लगाम लग सकेगी।</p>
<p><strong>यहां से शुरू होगी जंगल सफारी </strong><br />बोराबास रैंज में डायवर्जन चैनल से जंगल सफारी का रुट प्रस्तावित है। इसलिए यहां चौकी का निर्माण करवाया जाएगा। फिलहाल मुकुंदरा में सफारी अभी दरा में ही चल रही है, जो शहर से करीब 50 किमी दूर पड़ता है। ऐसे में सफारी के प्रति लोगों का रुझान नहीं है। जबकि, बोराबास रेंज शहर से सटी है और इस जंगल में लैपर्ड और भालूओं की संख्या अधिक है। सफारी शुरू होने से पर्यटकों को वन्यजीवों की साइटिंग आसानी से हो सकेगी। </p>
<p><strong>ग्रासलैंड व वाटर प्वाइंट होंगे डवलप</strong><br />रावतभाटा रोड स्थित नयागांव से बोराबांस नाके के बीच जंगल पठारी क्षेत्र है। वहीं, प्राकृतिक वाटर प्वाइंट गर्मियों में सूखे रहते हैं।  जिसकी वजह से वन्यजीव रोड के सामने आवंली रोजड़ी आबादी इलाके में रुख करते हैं। कई बार वन्यजीव वाहनों की चपेट में आ जाते हैं। लेकिन अब मुकुंदरा प्रशासन द्वारा जंगल के 200 हैक्टेयर वनक्षेत्र में ग्रासलैंड व आर्टिफिशियल वाटर प्वाइंटों का निर्माण करवाया जाएगा।  </p>
<p><strong>खत्म होने से बचेगा वन्यजीवों का हैबीटॉट</strong><br />बोराबास रेंज के जंगलों में लेपर्ड, हिरण, लोमड़ी, भालू, हायना, नीलगाय सहित कई वन्यजीवों का नेचुरल हैबीटॉट है। अवैध खनन, वाहनों का शौर, पत्थर तोड़ने की आवाज, घुसपैठ सहित अन्य संदिग्ध गतिविधियों से उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। साथ ही जैव विविधता भी खत्म हो रही है। वन्यजीवों का जीवन चक्र प्रभावित होने से उनका अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है। ऐसे में विभाग द्वारा यहां ग्रासलैंड विकसित किया जाएगा। जिससे जंगली जानवरों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित हो सकेगा।</p>
<p>यह एरिया काफी सेंसेटिव है। यहां लोगों की समझाइश कर प्रशासन के सहयोग से अवैध कब्जे हटा दिए गए हैं। इसी सप्ताह में दीवारों की मरम्मत कार्य शुरू करवा दिया जाएगा। साथ ही दीवारों की 2-2 फीट ऊंचाई बढ़ाई जाएगी। इसके लिए एस्टीमेट बनाकर उच्चाधिकारियों को भिजवा दिए हैं।<br /><strong>- जनक सिंह, रेंजर बोराबास, मुकुंदरा टाइगर  रिजर्व</strong></p>]]>
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                <pubDate>Fri, 04 Oct 2024 17:19:08 +0530</pubDate>
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