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                <title>big problem - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>शोर का कहर-हमारी सांसों में जहर घोलता खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[शोर कहें या ध्वनि प्रदूषण आज गंभीर समस्या बनता जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-noise-of-the-noise-is-threatened-by-poison-in/article-122068"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/ne1ws7.png" alt=""></a><br /><p>शोर कहें या ध्वनि प्रदूषण आज गंभीर समस्या बनता जा रहा है। इसका सबसे दुखदायी पहलू यह है कि मौजूदा हालात में इसका स्तर तय मानकों को लगातार लांघता जा रहा है और एन जी टी के सख्त निर्देशों तथा सरकारी आदेशों के बावजूद इसमें कोई सुधार नहीं आ रहा है। गौरतलब यह है कि जैसे-जैसे हम अपनी सुविधाओं में बढ़ोतरी करते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हमारे ऊपर इनका नकारात्मक असर दिखाई पड़ता जा रहा है। वायु प्रदूषण से जहां इंसान की कार्यक्षमता और स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, वहीं ध्वनि प्रदूषण भी इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।</p>
<p><strong>शोर के कारण :</strong></p>
<p>दुनियाभर में हो रहे शोध-अध्ययन इस बात के सबूत हैं कि दुनिया में बढ़ रहा शोर केवल कानों तक ही सीमित नहीं रह गया है, शोर के कारण न केवल इंसान की उम्र कम हो रही है, बल्कि वे नींद में कमी, तनाव, अवसाद, दिल, दिमाग, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक और टायप-2 डायबिटीज का कारण भी बन रहा है। इसमें कार, ट्रेन और हवाई जहाज से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का योगदान सर्वाधिक है। ब्रिटेन की स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी का शोध यह खुलासा करता है कि, जो लोग लगातार ट्रेन, कार और हवाई जहाज के शोर का सामना करते हैं, उनके अंदर नींद में कमी, तनाव, अवसाद आदि परेशानियां बढ़ने लगती हैं। यही नहीं इनमें मधुमेह और दिल की बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है।</p>
<p><strong>शोध में खुलासा :</strong></p>
<p>76 फीसदी लोगों का मानना है कि शोर से उनकी याददाश्त पर काफी असर पड़ रहा है। यह भी देखा गया है कि शोर के माहौल में रहने से लोगों को 5 साल में दिल का दौरा पड़ने की संभावना बनी रहती है। 24 घंटे में ज्यादा शोर सुनने वाले लोगों के जल्दी बीमार होने की संभावना रहती है। शोर से जल्दी थकान, अनिद्रा, बहरापन और याददाश्त जाने का खतरा बना रहता है। लम्बे समय तक शोर झेलने के कारण डिमेंशिया का खतरा भी हो सकता है। यही नहीं डिप्रेशन का शिकार भी हो सकता है। लंदन स्थित सेंट जार्ज यूनिवर्सिटी के शोध में यह खुलासा हुआ है कि ध्वनि प्रदूषण का असर इंसान पर सिर्फ जागते समय ही नहीं होता है, बल्कि वह नींद में भी शरीर को प्रभावित करता है।</p>
<p><strong>तनावपूर्ण स्थिति :</strong></p>
<p>तेज आवाजों से हमारे शरीर की किसी खतरे या तनावपूर्ण स्थिति का सामना करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इससे तनाव हार्मोन रिलीज होते हैं, जो लम्बे समय तक शरीर में बने रहने से गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। इससे नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है जिससे दिल की धड़कन की गति बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों की मानें तो हमारा दिमाग सोते समय भी शोर सुनता है, इससे शरीर तनाव की अवस्था में बना रहता है। यह लम्बे समय तक जारी रहने पर दिल और दिमाग की कार्यप्रणाली को कमजोर कर सकता है। नतीजतन तनाव, चिड़चिड़ापन, नींद में बाधा और यहां तक कि अवसाद जैसी समस्यायें पैदा हो जाती हैं। ध्वनि प्रदूषण का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है।</p>
<p><strong>पर्यावरण को खतरा :</strong></p>
<p>दरअसल जिस आवाज से नींद टूट जाए, उसे क्रोनिक साउंड्स कहते हैं। जो लोग हाइवे के किनारे रहते हैं और दिन भर ट्रैफिक का शोर सुनते रहते हैं, उनको इसकी आदत सी पड़ जाती है। इसलिए ये आवाजें उनको परेशान नहीं करतीं, लेकिन उनका शरीर इन आवाजों से प्रतिक्रिया करता है और उनको हाइपर टेंशन, दिल का दौरा जैसी बीमारियां होती हैं। वहीं शांत इलाकों जैसे गांव-देहात में रह रहे लोग अचानक तीव्र आवाजों से परेशान हो जाते हैं। उनके लिए शोर ज्यादा प्रतिक्रिया करता है। उनके लिए यह खतरा शहरों में रहने वाले लोगों की अपेक्षा तीन गुणा ज्यादा बढ़ जाता है। यूनाइटेड नेशंस ने शहरी ध्वनि प्रदूषण को पर्यावरण के लिए नए खतरों में सबसे ज्यादा खतरनाक बताया है।</p>
<p><strong>नकारात्मक प्रभाव :</strong></p>
<p>डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 55 डेसीबल का हवाई जहाज का शोर इंसान के लिए ज्यादा खतरनाक है। 75 डेसीबल का शोर नुकसान दायक और 120 डेसीबल का शोर पीड़ा दायक है। 53 डेसीबल तक यातायात से होने वाले ध्वनि प्रदूषण से सेहत पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। देखा गया है कि शहरों में बढ़ते ट्रैफिक, ट्रेन और हवाई जहाज की आवाज शोर के प्रमुख कारणों में से एक है। 53 डेसीबल से अधिक आवाज स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। आजकल शहरों में ’सुपरलाक’ जैसे प्रयोग किये जा रहे हैं, जहां पैदल यात्रियों के लिए विशेष क्षेत्र बनाए गए हैं, ताकि शोर को कम किया जा सके। जरूरत इस बात की है कि शोर से बचने के लिए व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएं।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Jul 2025 12:44:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण पर प्लास्टिक प्रदूषण का शिकंजा</title>
                                    <description><![CDATA[दुनियाभर में जितने भी आविष्कार हुए, वो मानव जाती के विकास में सहयोग हेतु हुए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/plastic-pollution-screws-on-the-environment/article-119305"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/rt112roer6.png" alt=""></a><br /><p>दुनियाभर में जितने भी आविष्कार हुए, वो मानव जाती के विकास में सहयोग हेतु हुए, परंतु मानव ने अपनी आवश्यकताओं की सीमा को तोड़कर मनमानी शुरू कर दी और अपने साथ ही समस्त जीव सृष्टि के लिए विनाश का बिगुल फूंक दिया। ऐसा ही प्लास्टिक प्रदूषण आज हमारे पृथ्वी के लिए बड़ी समस्या बना है। प्लास्टिक प्रदूषण ने जीवन के लिए खतरा पैदा किया है और यह खतरा तेजी से घातक स्तर पर बढ़ रहा है, फिर भी लोग समझने को तैयार नहीं है। हम अक्सर देखते हैं कि विशिष्ट प्लास्टिक बैग और अन्य प्लास्टिक सामग्री पर प्रतिबंध के बावजूद अवैध तरीके से धड़ल्ले से उपयोग की जाती है। प्लास्टिक प्रदूषण जीवन चक्र को बाधित करके नुकसान पहुंचा रहा है। प्लास्टिक का इस्तेमाल लगभग सभी औद्योगिक गतिविधियों में, निर्माण में, वाहनों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि तक और सभी उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है।</p>
<p>दुनिया का अधिकतर प्लास्टिक प्रदूषण बोतलों, कैप, शॉपिंग बैग, कप, स्ट्रॉ जैसे सिंगल यूज उत्पादों से आता है। प्लास्टिक हजार साल तक नष्ट न होनेवाला अपशिष्ट है, चार दशकों में वैश्विक प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन में सात गुना वृद्धि हुई है। एशिया वह क्षेत्र है, जो सबसे अधिक अप्रबंधित प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है। प्लास्टिक प्रदूषण हमारे भोजन, पानी और हमारे द्वारा सांस ली जाने वाली ऑक्सीजन के माध्यम से भी हमारे शरीर में प्रवेश करता है। सौर विकिरण, हवाएं धाराओं और अन्य प्राकृतिक कारकों के कारण, प्लास्टिक माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक में टूट जाता है।</p>
<p>नैनोप्लास्टिक शरीर में सहज प्रवेश करने में सक्षम है। माइक्रोप्लास्टिक हमारे दिल, फेफड़े, लीवर, तिल्ली, गुर्दे और दिमाग में भी पाए गए हैं, और हाल ही में किए गए एक अध्ययन में नवजात शिशुओं के प्लेसेंटा में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। समुद्र में माइक्रोप्लास्टिक के टुकड़े होने के कारण, समुद्री जीव अक्सर प्लास्टिक निगल लेते हैं। जब समुद्री जलचर को मनुष्य खाते हैं, तो वह प्लास्टिक मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। भारत प्लास्टिक प्रदूषण में दुनिया का सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन गया है,जो कुल वैश्विक प्लास्टिक कचरे का लगभग 20 प्रतिशत है। प्लास्टिक बैग पशु मृत्यु को बढ़ावा देता है, यह बायोडिग्रेडेबल नहीं होते, प्लास्टिक बैग पेट्रोलियम उत्पादों से बनाए जाते हैं, इसके निर्माण के दौरान जहरीले रसायन निकलते है। प्लास्टिक बैग के बड़े जमाव से अक्सर जल निकासी व्यवस्था अवरुद्ध हो जाती है।</p>
<p>प्लास्टिक बैग बच्चों को फेफड़ों की जटिलताओं के जोखिम बढ़ाते है और महिलाओं में प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकते है, साथ ही प्लास्टिक पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है। प्लास्टिक बैग भूजल को प्रदूषित करते है, प्लास्टिक प्रदूषण प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला को बाधित करता है। प्लास्टिक बैग के उत्पादन में बहुत अधिक पानी का उपयोग किया जाता है। अनभिज्ञता या लापरवाही कहें, लोग अक्सर गर्म खाद्यपदार्थों की पैकेजिंग के लिए प्लास्टिक कैरीबैग का उपयोग सहजता से करते हैं। हम अपने आसपास देखते हैं कि गर्म पेय, चाय, कॉफी भी छोटी-छोटी कैरीबैग में लेकर जाते है। होटल, रेस्टोरेंट या सड़कों पर गर्मागर्म खाना भी प्लास्टिक प्लेट में खाते है या प्लास्टिक कैरीबैग में पार्सल के तौर पर उपयोग करते है, जो सेहत के लिए काफी घातक होता है।</p>
<p>प्लास्टिक बैग में गर्म खाद्यपदार्थ या अन्न सामग्री का उपयोग जहर के समान है, क्योंकि गर्म खाद्यपदार्थ प्लास्टिक के संपर्क में आते ही रासायनिक प्रक्रिया शुरू करते है, प्लास्टिक गर्म होते ही उससे निकलनेवाले घातक रसायन खाद्य पदार्थों में समाविष्ट हो जाते हैं और मनुष्य उस खाद्यपदार्थ का सेवन करके सीधे जानलेवा बीमारियों को आमंत्रित करता है। यह सब जानते हुए भी देश में बड़ी मात्रा में खाद्यपदार्थों के लिए प्लास्टिक का उपयोग बेखौफ तरीके से होता है। प्लास्टिक का उत्पादन उपभोक्ता की मांग को पूरा करने के लिए है, अगर हम उपभोक्ता ही प्लास्टिक से दूरी बना लें, तो समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है, प्लास्टिक के अन्य पर्याय को अपनाना और जागरूकता एवं पर्यावरण के बचाव के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। सबसे पहले अपना स्वार्थ और आलस छोड़ें, सरकारी नीतिनियमों का कड़ाई से पालन करें। फिर प्लास्टिक के संभवत पर्यायों का अवलंबन करें।</p>
<p>उपयोग करो और फेंक दो जैसी वस्तुओं को ना कहें। प्लास्टिक कैरीबैग को पूर्णत भूल जाएं, खाद्यपदार्थों के पैकेजिंग में प्लास्टिक का उपयोग टाले। प्लास्टिक आज सुविधा परंतु जीवनभर के लिए दुविधा है यह समझें। पर्यावरण हमें बेहतर जीवन देने के लिए है, अगर हम ही अपने पर्यावरण को बर्बाद करेंगे तो पर्यावरण भी हमें जीवन नहीं अपितु बर्बादी ही देगा, इस बात की गंभीरता को समझें और जागरूक नागरिक का फर्ज निभाएं।</p>
<p><strong>-डॉ. प्रितम गेडाम</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Jul 2025 12:16:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>बढ़ते वाहन, घटती रफ्तार ट्रैफिक का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और अव्यवस्थित यातायात प्रणाली के कारण प्रमुख शहरों में ट्रैफिक जाम आम हो गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-vehicle-decreasing-speed-traffic-crisis/article-109304"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/.521.png" alt=""></a><br /><p>भारत में बढ़ता ट्रैफिक एक गंभीर समस्या बन चुका है। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और अव्यवस्थित यातायात प्रणाली के कारण प्रमुख शहरों में ट्रैफिक जाम आम हो गया है। इससे समय की बर्बादी, आर्थिक नुकसान, पर्यावरण प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। ट्रैफिक जाम का एक प्रमुख कारण सार्वजनिक परिवहन की कमजोर स्थिति है। दिल्ली मेट्रो, मुंबई लोकल और कोलकाता मेट्रो जैसे कुछ सफल उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन अधिकांश भारतीय शहरों में सार्वजनिक परिवहन सीमित और अव्यवस्थित है। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के सम्बंध में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट के अनुसार, 2013 से 2018 के बीच दिल्ली में बसों की राइडरशिप में 16.9प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता ट्रैफिक जाम को और गंभीर बना रही है। लंदन और सिंगापुर ने सार्वजनिक परिवहन को इतना प्रभावी बना दिया है कि निजी वाहनों का उपयोग सीमित हो गया है, जबकि भारत में स्थिति उलट है। </p>
<p>हालांकि, कंजेशन चार्ज जैसे उपाय भारत में व्यवहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हैं क्योंकि सार्वजनिक परिवहन अभी पर्याप्त नहीं है और डिजिटल टोलिंग सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है। सड़क ढांचे की अपर्याप्तता भी ट्रैफिक समस्या को बढ़ा रही है। भारत का सड़क नेटवर्क विश्व में दूसरा सबसे बड़ा है, जिसकी कुल लंबाई 62,15,797 किलोमीटर से अधिक है, लेकिन इनमें से अधिकांश सड़कें संकरी, जर्जर और अतिक्रमण से प्रभावित हैं। जापान और दक्षिण कोरिया में सड़क रखरखाव योजनाएं इतनी व्यवस्थित हैं कि ट्रैफिक जाम बहुत कम होता है, जबकि भारत में सड़क परियोजनाओं की धीमी गति के कारण यह समस्या विकराल रूप ले रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था को भी ट्रैफिक जाम के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ता है। बोस्टन कंसल्टिंग गु्रप की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे चार प्रमुख भारतीय शहरों में ट्रैफिक जाम के कारण हर साल लगभग 1.47 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। </p>
<p>यह नुकसान ईंधन की बर्बादी, उत्पादकता में कमी और स्वास्थ्य सम्बंधी प्रभावों के कारण होता है। टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के अनुसार, बेंगलुरु के लोग सालाना औसतन 132 घंटे ट्रैफिक जाम में बिता देते हैं, जो उत्पादकता के लिए बड़ा नुकसान है। पर्यावरण प्रदूषण भी ट्रैफिक जाम की एक गंभीर परिणति है। दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। ट्रैफिक जाम के कारण वाहनों से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि होती है, जिससे वायु गुणवत्ता खराब होती है और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं। चीन ने इस समस्या से निपटने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता दी है और सार्वजनिक परिवहन को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाया है, जबकि भारत में इलेक्ट्रिक वाहन अभी भी बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की प्रक्रिया में हैं। भारत में 2023 के अंत तक लगभग 6,586 सार्वजनिक ईवी चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध थे, जबकि चीन में यह संख्या 6 मिलियन से अधिक थी। ईवी अपनाने की गति चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बैटरी उत्पादन और नीति समर्थन पर निर्भर करती है। इस समस्या के समाधान के लिए कई प्रभावी रणनीतियां अपनाई जा सकती हैं। </p>
<p>सबसे पहले सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को मजबूत करना अनिवार्य है। अधिक शहरों में मेट्रो नेटवर्क, इलेक्ट्रिक बसों और साइकिल ट्रैक को बढ़ावा देना चाहिए। भारत में हाई-ऑक्यूपेंसी व्हीकल लेन का प्रावधान किया जा सकता है, जिससे एक से अधिक यात्रियों वाले वाहनों को प्राथमिकता मिले और कार-पूलिंग को प्रोत्साहन मिले। सड़कों के बुनियादी ढांचे में सुधार भी आवश्यक है। फ्लाईओवर,  मल्टी-लेवल पार्किंग और स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल जैसी सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बिग डेटा का उपयोग करके ट्रैफिक को प्रभावी रूप से प्रबंधित किया जा सकता है। भारत में अभी तक केवल कुछ ही शहरों जैसे बेंगलुरु और पुणे में एआई आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट लागू हुआ है, जबकि चीन और जापान में यह प्रणाली पहले से ही उन्नत है। इसे देशभर में लागू करने के लिए आवश्यक तकनीकी और प्रशासनिक बदलावों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हालांकि इसका चरणबद्ध कार्यान्वयन जरूरी है। कार्य-समय में बदलाव और वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देना भी एक व्यवहारिक समाधान हो सकता है। यदि विभिन्न क्षेत्रों के कार्यालय और स्कूलों का समय अलग-अलग किया जाए, तो ट्रैफिक लोड को विभाजित किया जा सकता है। </p>
<p>हालांकि, यह समाधान केवल आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर तक सीमित रहेगा, जबकि फैक्ट्री, सर्विस सेक्टर और खुदरा उद्योग के संदर्भ में भी इस पर चर्चा होनी चाहिए। फ्लेक्सिबल ऑफिस टाइमिंग नीति लागू कर ट्रैफिक पीक टाइम को नियंत्रित किया जा सकता है। इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पेट्रोल और डीजल वाहनों की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढ़ाने के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना आवश्यक है। भारत में ईवी बैटरी निर्माण, चार्जिंग स्टेशन विस्तार और सरकारी नीतियों के प्रभाव पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत को वैश्विक अनुभवों से भी सीखने की जरूरत है, लेकिन केवल सतही तुलना करने के बजाय व्यवहारिकता पर ध्यान देना आवश्यक है।  </p>
<p><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Apr 2025 12:42:36 +0530</pubDate>
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                <title>20 साल से खड़ी-खड़ी कबाड़ हो गई 310 गाड़ियां</title>
                                    <description><![CDATA[ ट्रैफिक कार्यालय में रखे वाहनों पर उगी झाड़ियां]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/310-vehicles-have-become-junk-after-standing-idle-for-20-years/article-97120"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(4)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। ट्रैफिक पुलिस कार्यालय में 20 साल से 300 से ज्यादा गाड़ियां बेकार पड़ी हैं। जिनका कोई धणी-धोरी नहीं होने से धूल खा रही है। यह गाड़ियां खड़ी-खड़ी कबाड़ में तब्दील हो गई। हालांकि, कुछ शोरूम गाड़ियां भी हैं, जिनके कल-पुर्जे सही सलामत होने के बावजूद मालिक इन्हें लेने नहीं आ रहे। पुलिस के कहने पर भी वाहन मालिक इन्हें ले जाने को तैयार नहीं है। दरअसल, धारा 185 व 207 सहित विभिन्न मामलों में ट्रैफिक पुलिस द्वारा जब्त किए वाहन वर्ष 2004 से ही यातायात कार्यालय में खड़े हैं। जिन्हें छुड़ाने को वाहन मालिक भी तैयार नहीं है। इनकी नीलामी के लिए ट्रैफिक पुलिस इंतजार कर रही है। इसके बाद ही इन कंडम हो चुके वाहनों का निस्तारण हो सकेगा।</p>
<p><strong>वर्ष 2004 से 24 तक की गाड़ियां कबाड़</strong><br />सीएडी रोड स्थित ट्रैफिक पुलिस कार्यालय में वर्ष 2004 से 2024 तक की 310 गाड़ियां खड़ी है।  यह गाड़ियां शराब पीकर वाहन चलाने व कागजात के अभाव में जब्त की गई हैं। जिन्हें छुड़ाने के लिए उनके मालिक अब तक नहीं आए। जब पुलिसकर्मी आरटीओ के रिकॉर्ड के अनुसार उनके एड्रेस पर पहुंचते हैं तो अधिकतर संबंधित पते पर रहना नहीं मिलते। वहीं, कुछ मिलते हैं तो वह जुर्माना राशि देने से बचने के लिए वाहन छुड़ाने से इंकार कर देते हैं। ऐसे में यह गाड़ियां खड़ी-खड़ी कबाड़ में तब्दील हो रही है।</p>
<p><strong>पुलिस के लिए जी-का जंजाल बने जब्त वाहन</strong><br />नाम न छापने की शर्त पर पुलिसकर्मी ने बताया कि जब्तशुदा वाहन जी-का जंजाल बने हुए हैं। पहले ही स्टाफ की कमी से वर्कलोड बढ़ा हुआ है, ऊपर से 24 घंटे इन वाहनों की सुरक्षा में जवान तैनात करने पड़ते हैं। ऐसे में अन्य कार्य प्रभावित होते हैं।  इनमें सबसे ज्यादा कागजात के अभाव में जब्त किए वाहनों की संख्या है। ऐसे में लोग जुर्माना राशि से बचने के लिए छुड़ाने नहीं आते।   हालांकि, वाहनों के निस्तारण के प्रयास किए जा रहे हैं। </p>
<p><strong>जब्त वाहनों को न छुड़ाने के कारण</strong><br />-अधिकतर वाहन बिना कागजात की होती है या फिर अवधि पार है, जिनका नवीनीकरण करवाने व जुर्माना राशि चुकाने से बचने के लिए मालिक वाहनों को छुड़ाने नहीं आते। <br />- शराब पीकर वाहन चालने के मामले में भी  गाड़ियां जब्त हैं, जिसका जुर्माना कोर्ट से ही होता है। ऐसे में लोग कागजी कार्रवाई से बचने के लिए कोर्ट का रुख नहीं करते। <br />- कई वाहन फाइनेंस पर उठे होते हैं, जिनकी पहले से ही कुछ किश्ते चढ़ी होती हैं, किश्ते व जुर्माना राशि से बचने के लिए भी वाहन मालिक गाड़ी छुड़ाने नहीं आते। <br />- 2015 से पहले की गाड़ियों के रिकॉर्ड आरटीओ के पास नहीं होने से पुलिस वाहन मालिक तक नहीं पहुंच पाती और न ही कोई सम्पर्क हो पाता। ऐसे में गाड़ियां पड़ी रहती हैं। <br />- कई वाहन मालिक अपनी बाइक की री-सेल वैल्यू को देखते हुए जुर्माना राशि  चुकाने से इंकार कर देते हैं और नियमानुसार नीलाम किए जाने का सहमति पत्र पुलिस को दे देते हैं। <br />- कुछ वाहन चोरी व बिना कागजात के होते हैं। <br />- फाइनेंस वाहन के मालिक जब गाड़ी छुड़ाने में असमर्थता जताता है तो फाइनेंस कम्पनी को पत्र लिखा जाता है लेकिन वह भी जगह की तंगी का हवाला देते हुए जब्त वाहन को छुड़ाने में रुचि नहीं दिखाते।<br />- कई गाड़ियां ऐसी भी है, जो किसी के पास गिरवी रखी हुई थी, जब वह जब्त हुई तो कागजात उसके पास नहीं मिले और असली वाहन मालिक का कहीं ओर शिफ्ट हो जाना, या फिर जुर्माना राशि के बचने को छुड़ाने से मना कर देते हैं। </p>
<p><strong>किस वर्ष में कितने वाहन हुए जब्त</strong><br /><strong>वर्ष         वाहनों की संख्या</strong><br />2004    3 बाइक  <br />2005    1 बाइक<br />2006    2 ऑटो<br />2007    2 बाइक<br />2008    1 बाइक<br />2009    8<br />2010    1<br />2011    3<br />2012    1<br />2014    1<br />2015    1<br />2016    3<br />2017    44<br />2018    29<br />2019    34<br />2020    39<br />2021    31    <br />2022    12<br />2023    37<br />2024    39 (30 नवम्बर तक)<br /><strong>नोट-</strong> इनमें बिना कागजात के 154 गाड़ियां व शराब पीकर चलाने के मामले में 147 वाहन शामिल हैं। इसके अलावा 2 ट्रक व 8 ऑटो भी जब्त किए हुए हैं। </p>
<p><strong>8 साल में पहली बार गत वर्ष हुई 70 वाहनों की नीलामी</strong><br />ट्रैफिक पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, गत वर्ष करीब 70 वाहनों की नीलामी की गई थी।  वर्तमान में ट्रैफिक की करीब 43 फाइलें कोर्ट में लंबित हैं। अनुमति के अभाव में गाड़ियों की निलामी नहीं हो पा रही। जबकि, हर रोज 20 से 25 गाड़ियां यातायात नियमों के उल्लंघन में जब्त होकर यहां आ रही है। ऐसे में कार्यालय परिसर में वाहनों  को रखने की जगह नहीं कम पड़ने लगी है। वहीं, 24 घंटे इनकी निगरानी करनी पड़ती है। <br />हमने नियमानुसार फाइल लगा रखी है। जैसे ही निस्तारण की स्वीकृति मिलेगी वैसे ही वाहनों का नियमानुसार निस्तारण कर दिया जाएगा। <br /><strong>-अशोक मीणा, उपाधीक्षक पुलिस यातायात    </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Dec 2024 15:44:21 +0530</pubDate>
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                <title>सिर्फ नाम की ही आदर्श ग्राम पंचायत है कनवास</title>
                                    <description><![CDATA[इन रास्तों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि यहां से गुजरने वाले पैदल राहगीरों व वाहन चालकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kanwas-is-an-ideal-village-panchayat-only-in-name/article-95479"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(2)3.png" alt=""></a><br /><p> कनवास। कनवास ग्राम पंचायत को आदर्श ग्राम पंचायत घोषित हुए कई साल हो गए। लेकिन हकीकत यह है कि यह ग्राम पंचायत केवल नाम की ही आदर्श ग्राम पंचायत है। सरकार विकास का कितना ही ढोल पीटे, इस ग्राम पंचायत में लोगों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं। जानकारी के अनुसार कनवास के मुख्य बाजार सहित विद्यालय, मंदिर व मस्जिद के रास्ते पर नालियों और इंटरलॉकिंग की जर्जर हालत लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बन गई है। यह न केवल स्थानीय निवासियों के लिए परेशानी का कारण है, बल्कि यह स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इन रास्तों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि यहां से गुजरने वाले पैदल राहगीरों व वाहन चालकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। साथ ही दुपहिया वाहन चालकों को हमेशा दुर्घटना का भय बना रहता है। इंटरलॉकिंग उखड़ने से नालियों का गंदा पानी सड़क मार्ग पर बहता रहता है। जिससे विद्यालय में जाने वाले बच्चों, मंदिर व मस्जिद में पूजा व नमाज के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं सहित बाजार में जाने वाले लोगों के गंदे पानी व कीचड़ से कपड़े गंदे हो जाते हैं। </p>
<p><strong>स्कूटी चलाने लायक नहीं है रास्ता</strong><br />दुपहिया स्कूटी वाहन चालकों ने बताया कि कनवास की किसी भी गली, मोहल्ले, बाजार का रास्ता स्कूटी चलाने लायक नहीं है। समाज सेवी राम सिंह पंवार ने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत को तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। नालियों और इंटरलॉकिंग टाइल्स की मरम्मत और बदलने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। इसके अलावा, स्वच्छता और रखरखाव के लिए नियमित अभियान चलाए जाने चाहिए। स्थानीय निवासियों, जन प्रतिनिधियों को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए। </p>
<p><strong>मंदिर जाते समय होती है परेशानी</strong><br />स्थानीय निवासी बंसीलाल वर्मा ने बताया कि मैं जब रोज मंदिर जाता हूं तो पुरानी मिल के टंकी वाले रास्ते से पुराने बाजार होते हुए रास्ते में पूरणमल बैरवा, गोविंद राठौर के आगे की नाली पूरी तरह टूटी हुई है। इसी प्रकार पुराने बाजार की उखड़ी हुई इंटरलॉकिंग में पानी भरा रहता है। जैसे ही र्इंटों पर पैर रखते हैं तो पानी कपड़ों सहित मुंह पर आता है। बाहर से आने वाले अंजान राहगीर गंदगी का शिकार होते हैं। </p>
<p><strong>सीसी सड़क सहित नालियां पूरी तरह जर्जर</strong><br />ग्रामीणों ने बताया कि कनवास के राठौर मोहल्ला, छोटा बाजार की इंटरलॉकिंग पूरी तरह खराब हो चुकी है। वहीं मैन बाजार, गणेश चौक, गणेश चबूतरा, माहेश्वरी समाज मंदिर के सामने, नंदलाल पंडित के आगे वाला रास्ता, टंकी मोहल्ला, वार्ड नंबर 6, धूलेट चौराहे से लेकर पुराने थाने वाले रास्ते, वहीद पठान के आगे वाली नाली, पुरानी पंचायत मेन बाजार वाली नाली, कर्णेश्वर महादेव के बड़े मंदिर के पीछे मैन रास्ते की सीसी सड़क सहित नालियां पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सरकार स्वच्छता के लिए बड़े-बड़े अभियान चलाती है। लेकिन ग्राम पंचायत कनवास की उदासीनता की वजह से यह हालत देखने को मिल रहे है।</p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br /> ग्राम पंचायत की उदासीनता का खामियाजा स्थानीय निवासियों सहित बाहर से आने वालों को भुगतना पड़ रहा है। सड़क से निकलना काफी दुष्कर है। यह ग्राम पंचायत केवल नाम की आदर्श ग्राम पंचायत है। <br /><strong>-बंसीलाल, स्थानीय निवासी</strong></p>
<p> इस नाम की आदर्श ग्राम पंचायत में मात्र एक सर्किल सुभाष सर्किल है। ग्राम पंचायत कनवास की लापरवाही की वजह से इस एकमात्र सुभाष सर्किल पर भी सौंदर्य करण व साफ-सफाई का अभाव है। सर्किल और इसके आसपास के क्षेत्र में पिछले एक वर्ष से साफ-सफाई नहीं हो रही है। और ना ही रोड लाइटें लगाई जा रही हैं। <br /><strong>- कुशाल नामा, व्यापारी, सुभाष सर्किल निवासी </strong></p>
<p>ग्राम पंचायत कनवास में सड़कों व नालियों की समस्या का ग्राम सभा में प्रस्ताव लेकर समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जाएगा। सुभाष सर्किल के चौराहे की समस्या का भी जल्दी से जल्दी समाधान कर ग्रामीणों को राहत पहुंचाई जाएगी।<br /><strong>-बिरधी लाल मेरोठा, सेक्रेटरी, ग्राम पंचायत कनवास </strong></p>
<p><strong>ग्राम पंचायत सरपंच रीना खटीक </strong>से इस संबंध में जानकारी लेनी चाही। लेकिन उन्होंने ना तो फोन रिसीव किया और ना ही व्हाट्सएप पर मैसेज का जवाब दिया। </p>
<p>2023-24 की कार्य योजना में यह कार्य है कि नहीं इसको दिखाते हैं। बजट के आधार पर कार्य करवाया जाएगा। जनता से जुड़े हुए गंभीर समस्या को आज ही बजट देखकर हल करवाते हैं। <br /><strong>-कुशलेश्वर सिंह, विकास अधिकारी, पंचायत समिति सांगोद  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 21 Nov 2024 15:27:48 +0530</pubDate>
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                <title>बरसाती नालों में लगातार बढ़ रहा अतिक्रमण</title>
                                    <description><![CDATA[शहर के बीच से गुजर रहे साजीदेहड़ा नाले पर जगह जगह अतिक्रमियों ने मकान खड़े कर लिए हैं। जिससे नाले की चौड़ाई इतनी कम हो चुकी है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/continuously-increasing-encroachment-in-rain-drains/article-72405"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/transfer-(4)5.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर में अतिक्रमण एक बड़ी समस्या बनकर उभर रही हैं, जहां अतिक्रमी नालों से लेकर सरकारी भूखंडों तक को नहीं छोड़ रहे हैं। वहीं जहां लोगों अतिक्रमण किया हुआ है उसे लगातार बढ़ाते जा रहे हैं जिस प्रशासन आंख मंूदे बैठा हुआ है। कोटा के बरसाती नालों में बरसात के समय करोड़ों लीटर पानी बहकर आता है। ऐसे में इनका साफ और बाधा रहित होना जरुरी है। जिससे बारिश का पानी आमजन को नुकसान पहुंचाए बिना बहकर निकल सके। इसके लिए यूआईटी द्वारा कई नलों को डायवर्ट कर तो चंबल नदी में डाला गया। लेकिन शहर में कई छोटे बड़े नाले ऐसे मौजूद हैं जिनमें आज भी बरसात का पानी आता है। वहीं इन्हीं नालों पर अतिक्रमियों ने अपने बड़े मकान खडेÞ कर लिए हैं जिससे पानी तो अवरुद्ध होता है ही इसके अलावा कई बार जान माल का नुकसान भी देखने को मिलता है।</p>
<p><strong>नांता से लेकर गोविंद नगर तक अतिक्रमण</strong><br />शहर का कोई ऐसा बरसाती नाला नहीं बचा जिस पर भू माफियाओं ने अतिक्रमण न किया हुआ हो। शहर के बीच से गुजर रहे साजीदेहड़ा नाले पर जगह जगह अतिक्रमियों ने मकान खड़े कर लिए हैं। जिससे नाले की चौड़ाई इतनी कम हो चुकी है कि वहां से पानी भी नहीं निकलना मुश्किल हो रहा है। इसी तरह नांता इलाके से गुजर रहे नाले में भी कई स्थानों पर अतिक्रमियों ने अपने पक्के मकान खड़े कर लिए हैं, जिन पर कारवाई करने वाला कोई नहीं है। नांता के अलावा गोविंद नगर और प्रेम नगर के बीच से गुजर रहे नालों के पास रहने वालों लोगों ने अपने मकानों को नालों के बीच तक बढ़ा लिया है। जिससे नालों की चौड़ाई लगातार कम हो रही है।</p>
<p><strong>धीरे धीरे बढ़ रहा अतिक्रमण प्रशासन नहीं आ रहा नजर</strong><br />शहर के बरसाती नालों में पिछले कई सालों से अतिक्रमण हो रहा है, बीच में प्रशासन द्वारा अतिक्रमियों पर कारवाई भी की गर्ई लेकिन लंबे समय से कारवाई नहीं होने के चलते पिछले कुछ सालों में इन अतिक्रमण बढ़ गया है। जहां पहले एक दो कमरे हुआ करते थे वहां अब पूरी कॉलोनियां बस चुकी हैं। ऐसे ही प्रेम नगर में अतिक्रमियों ने नाले के उपर ही मकान खड़े कर लिए हैं। जिससे नाले की चौड़ाई मात्र 5 फुट की रह गई है। ऐसे में बारिश के मौसम में पानी घरों में घुस जाता है। वहीं कंसुआ से निकल रहे नाले में डीसीएम पुलिया के पास करीब 100 फीट चौड़े नाले में 50 फुट पर अतिक्रमियों ने दीवार तोड़कर कब्जा जाम लिया है।</p>
<p><strong>बरसात के मौसम में होते रहते हैं हादसे</strong><br />नालों पर मकान बनने से पानी अवरुद्ध होता है जिससे पानी दुसरे घरों और बस्तियों में घुस जाता है। ऐसे में सामान का नुकसान तो होता है ही कई बार जान पर भी बन आती है। कई बार हादसे होने के बाद भी प्रशासन द्वारा अतिक्रमियों पर कोई कारवाई नहीं की जा रही है।</p>
<p><strong>बारिश का पानी घुस जाता मकानों में</strong><br />गोविंद नगर नाले में लोगों ने दीवार तोड़ कर अतिक्रमण किया हुआ है। जो धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है। ऐसे में नाले अवरुद्ध होने से कई बार पानी मकानों तक आ जाता है, इन्हें हटाना चाहिए।<br /><strong>- मुकेश मेहता, प्रेम नगर</strong></p>
<p>अतिक्रमियों के खिलाफ कई बार शिकायत की है लेकिन कोई कारवाई नहीं होती है इनका विरोध करने पर धमकियां देते हैं। जिस कारण कोई विरोध नहीं कर पाता प्रशासन को इन कारवाई करनी चाहिए। <br /><strong>- भूपेंद्र राजावत, नांता</strong></p>
<p>कुछ नालों को चंबल में डायवर्ट कर दिया था। जिससे कई नालों में पानी की आवक कम हो गई है। वहीं जिन नालों में आवक ज्यादा है अगर उनमें अतिक्रमण हो रहा है तो अतिक्रमियों पर टीम बनाकर कारवाई की जाएगी और हटाया जाएगा। <br /><strong>- कुशल कोठारी, सचिव, यूआईटी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Mar 2024 17:33:05 +0530</pubDate>
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                <title>कोटा उत्तर वार्ड 53: कब्रिस्तान में बैठने की नहीं व्यवस्था, मिट्टी की पड़ रही जरुरत </title>
                                    <description><![CDATA[इस वार्ड की सबसे बड़ी समस्या सार्वजनिक शौचालय और क्षेत्र का कब्रिस्तान है। शौचालय कई सालों पहले बना था उसके बाद इसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया आज इसके हालात इतने खराब हो चुके है कि इसके बाहर से निकलना भी मुश्किल है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-north-ward-53--there-is-no-arrangement-for-sitting-in-the-cemetery--there-is-a-need-for-soil/article-32832"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-12/ward-53---kabristaan-mei-baidhane-ki-nahi-vyavastha-mitti-ki-pad-rahi-zaroorat...kota-news..20.12.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। स्वच्छता सर्वेक्षण सूची में भले ही नगर निगम कोटा उत्तर को निचला पायदान मिला हो लेकिन उसी निगम के क्षेत्र में आने वाले वार्ड 53 के हालात बीते सालों की अपेक्षा काफी सुधरे हैं परन्तु अभी कुछ कार्य होने शेष है। यहां के निवासियों की माने तो कुछ समय पहले तक वे लोग मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी तरसते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। कोटा नगर निगम उत्तर के वार्ड 53 में घन्टाघर, चश्मे की बावड़ी, मुसाफिर खाना, रघु पान वाले की गली, नारायण पान वाले की गली तथा शनि मन्दिर की गली आदि क्षेत्र आते हैं। इस वार्ड का प्रतिनिधित्व कोटा उत्तर के उप महापौर सोनू कुरैशी करते हैं। यहां रहने वालों की मानें तो कुछ सालों पहले तक इस वार्ड के कई इलाकों में सड़कों के हालात इतने बुरे थे कि वाहनों पर तो दूर पैदल तक चलना मुश्किल काम था। क्षेत्र के लोग पीने के पानी तक को मुंह ताकते थे। ना बिजली का पता ना पानी का। लेकिन वर्तमान पार्षद के अभी तक के कार्यकाल में कई ऐसे कार्य हुए है जिनसे लोगों को राहत मिली है। </p>
<p>जो सड़के सालों से अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही थी उनको ठीक करवाया गया है। वार्ड की लगभग 70 से 80 प्रतिशत सड़कें या तो नई बना दी गई है या उनको ठीक करवा दिया गया है। वहीं फिलहाल घरों में पीने की पानी की पूरी आपूर्ति होती है। हां, बेशक अभी भी वार्ड में कुछ सुधारों की महत्ती आवश्यकता है। फिलहाल इस वार्ड की सबसे बड़ी समस्या सार्वजनिक शौचालय और क्षेत्र का कब्रिस्तान है। चश्मे की बावड़ी क्षेत्र में बने सार्वजनिक शौचालय के हालात बद से बदत्तर है। बताया जाता है कि ये शौचालय कई सालों पहले बना था लेकिन उसके बाद इसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया और आज इसके हालात इतने खराब हो चुके है कि इसके बाहर से निकलना भी मुश्किल है। शौचालय के बाहर ही कचरे के ढेÞर लगे रहते है। गंदगी जमा रहती है। इसी प्रकार क्षेत्र में बने कब्रिस्तान में लोगों के बैठने की व्यवस्था नहीं है, कब्रिस्तान में मिट्टी डलवाये जाने की आवश्यकता है। </p>
<p><strong> इनका कहना है</strong><br />तीन चार सालों पहले तक हमारे वार्ड की सड़के खुदी पड़ी थी, कोई सुध लेने नहीं आता था लेकिन अब सड़कों के हालात काफी ठीक हो चुके हैं। पीने की पानी की समस्या भी पहले जितनी नहीं है। अब तो बस सार्वजनिक शौचालय को कैसे भी करके ठीक करवा दिया जाये तो लोगों को इस समस्या से भी निजात मिल जाये।<br /><strong>- मोहम्मद यूनुस अंसारी, वार्डवासी </strong></p>
<p>हमारी तरफ के इलाकों में सड़के नई बनी हैं। सफाई भी अब पहले से ठीक रहने लगी है। पीने का पानी आने लगा है। अब कब्रिस्तान को भी ठीक करवाना चाहिए। अभी हमारी तरफ और भी नालियों की भी जरूरत है। पार्षद ने अच्छे काम करवाये है।<br /> <strong> - मेहराज, निवासी वार्ड 53 </strong></p>
<p>वार्ड की सबसे बड़ी समस्या उधड़ी हुई सड़कें और पीने का पानी थी। इलाके की लगभग सभी सड़कों को ठीक करवा दिया गया है। अब तो क्षेत्र के मकानों की तीसरी मंजिल तब पानी पहुंच रहा है। मैं ख्ुाद देर रात तक लोगों की समस्याओं को सुनता हंू। निगम की ही नहीं अन्य समस्याओं को भी सुलझाने का प्रयास किया जाता है। सार्वजनिक शौचालय के जीर्णोद्धार की प्रक्रिया विचाराधीन है। जल्द ही लोगों को इस समस्या से भी निजात दिलवा दी जाएगी। <br /> <strong>- फरीदुद्दीन कुरैशी, पार्षद व उप महापौर। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Dec 2022 16:45:07 +0530</pubDate>
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