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                <title>global politics - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                            <item>
                <title>अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम का दावा: कहा भारत ने टैरिफ में कटौती पूरी तरह से हासिल की; मजबूत मूल्य निर्धारण शक्ति को समर्थन मिलने की उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली में अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में आयात शुल्क कटौती भारत के संतुलित रवैये का परिणाम है, इससे द्विपक्षीय व्यापार को नई गति मिलेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/us-senator-lindsey-graham-claims-india-has-fully-achieved-tariff/article-141769"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(2)2.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने सोमवार को कहा कि भारत ने भारत-अमेरिका के नए व्यापार समझौते के तहत घोषित आयात शुल्क में कटौती पूरी तरह से हासिल की है। उन्होंने इस कटौती को यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर रूस से तेल खरीद को लेकर भारत द्वारा किए गए पुनर्संतुलन से जोड़ा। यूक्रेन युद्ध 24 फरवरी, 2026 को अपने पाँचवें वर्ष में प्रवेश करेगा।</p>
<p>लिंडसे ग्राहम ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति की तारीफ करते हुए कहा कि रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव काम करता दिख रहा है। उन्होंने भारत के साथ हालिया व्यापार समझौते की ओर इशारा किया, जिसके तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर आपसी आयात शुलक को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। </p>
<p>उन्होंने कहा, राष्ट्रपति ट्रम्प, बहुत बढिय़ा। मुझे लगता है कि इस युद्ध को खत्म करने के बारे में आपका संदेश-पुतिन के उन ग्राहकों से जो उनकी युद्ध मशीन को मदद देने का काम कर रहे थे उन्हें सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा।</p>
<p>सीनेटर ग्राहम ने दावा किया कि भारत के आचरण ने आयात शुल्क में कटौती को पूरी तरह जायज ठहराया है और उन्होंने उम्मीद जताई कि अन्य देश भी इसी राह पर चलेंगे। उन्होंने कहा, अपने व्यवहार के जरिए भारत ने इस कटौती का हक़ उससे कहीं ज्यादा साबित किया है। मुझे उम्मीद है कि रूसी तेल खरीदने वाले अन्य बड़े देश भी भारत की दिशा का अनुसरण करेंगे।</p>
<p>उन्होंने व्यापार निर्णय को व्यापक भू-राजनीतिक उद्देश्यों से जोड़ते हुए कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तभी बातचीत की मेज पर आएंगे जब दबाव बढ़ेगा। लिंडसे ग्राहम की यह टिप्पणी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा दिन में पहले यह घोषणा करने के बाद आई है कि अमेरिका और भारत एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति दोस्ती और सम्मान के कारण आपसी आयात शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है।   </p>
<p>इस घोषणा ने लगभग 11 महीने की अनिश्चितता को खत्म कर दिया, जिसने द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को दो दशकों से अधिक समय में सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत, अमेरिका भारतीय सामानों पर आयात शुल्क को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा। भारत और अमेरिका ने कहा कि यह समझौता भारतीय निर्यातकों को तत्काल राहत प्रदान करेगा। </p>
<p>राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस समझौते की पुष्टि करते हुए कहा, हमने अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापारिक समझौते पर सहमति जताई है, जिसके तहत अमेरिका कम आयात शुल्क लगाएगा, इसे 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया जाएगा। इसी तरह वे भी अमेरिका के खिलाफ अपने आयात शुल्क और नॉन-टैरिफ बाधाओं को कम करके शून्य करेंगे।</p>
<p>आयात शुल्क में कमी से होने से अमेरिकी बाजार में भारतीय सामानों की प्रतिस्पर्धात्मकता बेहतर होने, मांग बढऩे, मार्जिन का दबाव कम होने और निर्यात-उन्मुख क्षेत्र के लिए मजबूत मूल्य निर्धारण शक्ति को समर्थन मिलने की उम्मीद है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 13:26:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारत के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस को दी 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी, सामने आई चौकाने वाली वजह</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने से इनकार करने पर फ्रांसीसी वाइन और शैंपेन पर 200% टैरिफ की धमकी दी है। उन्होंने मैक्रों का ग्रीनलैंड पर असहमति वाला निजी संदेश भी लीक किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/if-you-dont-join-the-board-of-peace-trump-threatens/article-140230"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/donald-trumpp.png" alt=""></a><br /><p>वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ समय सभी देशों पर ट्रेरिफ लगा रहे हैं, इससे पहले उन्होंने भारत को भी 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। इसी बीच अब ट्रंप ने फ्रांस के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए फ्रेंच वाइन और शैंपेन पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है। बता दें कि यह चेतावनी फ्रांस द्वारा ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने से इनकार करने के बाद सामने आई है। </p>
<p>मीडिया से रूबरू होते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, अगर फ्रांस ने दुश्मनाना रवैया अपनाया तो भारी टैरिफ लगाया जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि इससे फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को बोर्ड में शामिल होने पर मजबूर होना पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार, इस विवाद को और हवा तब मिली जब ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर मैक्रों का एक निजी संदेश साझा किया। बता दें कि संदेश में ग्रीनलैंड को लेकर असहमति जताई गई थी और दावोस में G7 नेताओं के साथ मुलाकात का प्रस्ताव भी रखा गया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Jan 2026 14:16:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>क्या वैश्विक राजनीति का अखाड़ा बनेगा ग्रीनलैंड</title>
                                    <description><![CDATA[वेनेजुएला में सैन्य अभियान के बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, उसके तेल भंडारों पर नियंत्रण के बाद क्या अब ग्रीनलैंड का नंबर आने वाला है ? ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/will-greenland-become-an-arena-for-global-politics/article-139425"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/donald-trump.png" alt=""></a><br /><p>वेनेजुएला में सैन्य अभियान के बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, उसके तेल भंडारों पर नियंत्रण के बाद क्या अब ग्रीनलैंड का नंबर आने वाला है? यह आशंका इसलिए बलवती हो रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे के प्रस्ताव को दोहराया है। यह उनकी अमेरिका प्रथम नीति का हिस्सा है जो राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों पर केंद्रित है। चुनाव दौरान उनके ड्रील बेबी ड्रील नारे का मर्म अब दुनिया को समझ में आने लगा है। खरीद का प्रस्ताव भी ट्रंप ने पहली बार वर्ष 2019 में ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था। पिछले साल कहा था-मुझे लगता है हमें यह मिल जाएगा। किसी न किसी तरह से किसी दूसरे तरीके से ही। पहले खरीद का प्रस्ताव, फिर नकद भुगतान योजना प्रति व्यक्ति दस हजार से एक लाख डॉलर तक का। विदेश मंत्री मार्को रुबियो डेनिश अधिकारियों से बातचीत की योजना बना रहे हैं।</p>
<p><strong>ग्रीनलैंड पर दावा : </strong></p>
<p>इसके पीछे यह सोच भी हो सकती है कि डेनमार्क ने वर्ष 1917 में कैरेबियन क्षेत्र में अपनी कई कॉलोनियों को अमेरिका को बेचा था। ऐतिहासिक रूप से अमेरिका ने वर्ष 1867,1946 और 1950 में भी ग्रीनलैंड पर दावा किया था। लेकिन ट्रंप ने इसे आधुनिक स्वरूप दिया है। ग्रीनलैंड के प्रति रुख आक्रामक और रणनीतिक रूप से प्रेरित रहा है। ताकि चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियों के बीच नाटो क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। यूरोपीय देशों का विरोध इस पर यूरोपीय देशों में खलबली मची हुई है। उनके नेताओं ने ट्रंप के प्रस्ताव पर कड़ा विरोध जाहिर किया है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और यूनाइटेड किंगडम के नेताओं ने इस मामले पर डेनमार्क के साथ खड़ा होने का दावा किया हैं। डेनमार्क के प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने कहा है कि ग्रीनलैंड अपने लोगों का है और यहां के मामलों पर केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड का अधिकार है।</p>
<p><strong>अमेरिकी उपराष्ट्रपति :</strong></p>
<p>इस पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि ट्रंप को यूरोपीय देश हल्के में नहीं लें। कुछ शत्रु देश ग्रीनलैंड में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यह जगह सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया को मिसाइली हमलों से बचाने के लिए जरूरी है। दूसरी ओर राष्ट्पति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूयार्क टाइम्स को दिए अपने साक्षात्कार में कहा है कि उनमें जो आक्रामकता है, सिर्फ और सिर्फ खुद वही रोक सकते हैं। वे किसी अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून और संधि को नहीं मानते। यह क्षेत्र डेनमार्क का स्व-शासित क्षेत्र है। डेनमार्क नाटो का सदस्य राष्ट्र है। उन्होंने चेताया कि अमेरिकी कब्जा नाटो का अंत हो सकता है। यानी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी हमारी सुरक्षा व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।</p>
<p><strong>सबसे बड़ा द्वीप है :</strong></p>
<p>डेनमार्क जिसने 300 सालों तक ग्रीनलैंड पर नियंत्रण बनाए रखा, वह आज उतनी बड़ी सैन्य शक्ति नहीं है जितनी 17वीं सदी में था। ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है जो रूस की पनडुब्बियों और चीन के जहाजों पर निगरानी रखने के लिए आदर्श है। ट्रंप के अनुसार यह क्षेत्र चीनी और रूसी नौसेनाओं से घिरा हुआ है, इसलिए अमेरिकी नियंत्रण जरूरी है। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है जो उत्तरी धु्रव के पास स्थित है और औपचारिक रूप से डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है। इसका स्थान उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक समुद्र के बीच में है जिस वजह से यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तरी अमेरिका-यूरोप के बीच मुख्य नौसैनिक और वायु मार्गों के नजदीक है। यह रूस की उत्तरी नौसेना और चीन के आर्कटिक में बढ़ते प्रभाव की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण चोक पॉइंट में पड़ता है।</p>
<p><strong>संसाधनों का खजाना :</strong></p>
<p>इसका विशाल क्षेत्र में असंख्य प्राकृतिक संसाधन जैसे दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और खनिज पाए जाते हैं जो आधुनिक तकनीक, रक्षा और ऊर्जा उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। 36 अरब टन दुर्लभ खनिज, 60 लाख टन ग्रैफाइट, 2.35 लाख टन लीथियम, 28 अरब कच्चे तेल का भंडार है। जलवायु परिवर्तन से तेजी से पिघलते आर्कटिक बर्फ की वजह से यह क्षेत्र पहले से अधिक सुलभ हो गया है जिससे नई शिपिंग लाइंस और संसाधन खनन संभावनाएं खुल गई हैं। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर आक्रामक रुख अपनाता है तो नाटो गठबंधन में भरोसे की कमी पैदा कर सकता है। कुछ ग्रीनलैंड के नेताओं का मानना है कि अमेरिकी दबाव स्वायत्तता और आजादी की आकांक्षा को तेज करेगा जो एक स्वतंत्र देश बनने की दिशा में हो सकता है।</p>
<p><strong>स्वायत्तता मजबूत है :</strong></p>
<p>ग्रीनलैंड के नेता जेन्स फ्रेडरिक नेलसन ने विलय को खारिज करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने चेतावनी दी है कि हमला नाटो का अंत होगा। ग्रीनलैंड का रक्षा कानून 1952 का है, जो आक्रमण पर गोली चलाने की अनुमति देता हैं। यहां 57 हजार की जनसंख्या है। लेकिन स्वायत्तता मजबूत है। यहां की रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के पास है। रक्षा मंत्री ने चेतावनी दी है कि कोई विदेशी ताकत यहां हमला करती है, तो उसका जवाब गोली से मिलेगा। उसके संसाधनों पर कब्जा करने से अमेरिका को आर्कटिक क्षेत्र में अपना वर्चस्व बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन असफलता नाटो और यूरोप से संबंधों को बिगाड़ देगी। पनामा और कनाडा जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी उनकी नजर, विस्तारवाद के रूप में मानी जाएगी। कुल मिलाकर ट्रंप का रुख दृढ़ है, लेकिन कूटनीतिक बाधाएं बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठते हैं- क्या शक्तिशाली देशों को कमजोर क्षेत्रों पर नियंत्रण का अधिकार है? क्या स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना भू-राजनीतिक निर्णय लेने उचित हैं।</p>
<p><strong>-महेशचंद्र शर्मा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 13 Jan 2026 12:42:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी: डोनाल्ड ट्रंप</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रपति ट्रंप ने एयर फोर्स वन पर कहा कि रूस और चीन के खतरे को देखते हुए अमेरिका को ग्रीनलैंड की आवश्यकता है। डेनमार्क ने इस दावे को 'तर्कहीन' बताकर सिरे से खारिज कर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/greenland-is-strategically-important-for-america-donald-trump/article-138528"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/trump.png" alt=""></a><br /><p>वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को फिर दोहराया कि अमेरिका को रणनीतिक दृष्टिकोण के मद्देनजर ग्रीनलैंड की आवश्यकता है। विमान एयर फोर्स वन पर पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी के कारण ग्रीनलैंड अमेरिकी सुरक्षा के लिए अत्यंत जरूरी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत है, क्योंकि इस समय यह बहुत रणनीतिक जगह है और वहां हर जगह रूस और चीन के जहाज फैले हुए हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से उन्हें ग्रीनलैंड की आवश्यकता है और डेनमार्क इसे संभालने में सक्षम नहीं होगा। उन्होंने दावा भी किया कि यूरोपीय संघ भी उनके इस विचार का समर्थन करता है और वह इस बात को जानते हैं।</p>
<p>ट्रंप की यह टिप्पणी वेनेजुएला में वाशिंगटन के सैन्य अभियान के बाद आई है। एक संप्रभु देश के खिलाफ अमेरिकी सेना की इस कार्रवाई ने ग्रीनलैंड को लेकर उन आशंकाओं को फिर बढ़ा दिया है, जिसके बारे में ट्रंप बार-बार कह चुके हैं कि वह आर्कटिक में इसकी रणनीतिक स्थिति के मद्देनजर इसका विलय करना चाहते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ने पहले भी कई बार कहा है कि वह अटलांटिक महासागर स्थित एक विशाल और संसाधन संपन्न द्वीप ग्रीनलैंड अपने देश में विलय करना चाहते हैं। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वशासित क्षेत्र है। </p>
<p><strong>किसी का भी विलय करने का कोई अधिकार नहीं  </strong></p>
<p>ट्रंप के इस बयान के बाद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने अमेरिका के राष्ट्रपति से इस क्षेत्र को धमकी देना बंद करने का आग्रह किया है। फ्रेडरिक्सन ने एक बयान में कहा कि अमेरिका के ग्रीनलैंड पर कब्जा करने को आवश्यक बताया जाना पूरी तरह से तर्कहीन है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका को डेनमार्क साम्राज्य के तीन देशों में से किसी का भी विलय करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अमेरिका से एक ऐतिहासिक रूप से करीबी सहयोगी और दूसरे देश तथा वहां के लोगों के खिलाफ धमकियां बंद करने का पुरजोर आग्रह करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि वे बिक्री के लिए नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि वर्तमान में दुर्लभ खनिज सामग्री की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का दबदबा है। इसलिए अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने और इन महत्वपूर्ण संसाधनों पर चीन के नियंत्रण का मुकाबला करने के एक बड़े अवसर के रूप में देखता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Jan 2026 11:40:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राहुल गांधी ने की जर्मनी के पूर्व चांसलर Olaf Scholz से मुलाकात, भारत-जर्मनी रिश्तों पर हुई चर्चा </title>
                                    <description><![CDATA[लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जर्मनी के पूर्व चांसलर ओलाफ स्कोल्ज से मुलाकात कर वैश्विक राजनीति, व्यापार और भारत-जर्मनी संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने बर्लिन में लोकतंत्र, नेतृत्व और शिक्षा पर भी अपने विचार रखे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/rahul-gandhi-may-meet-former-german-chancellor-olaf-scholz-to/article-136523"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/rahul-ghandhi-meet-jarmani.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार को जर्मनी के पूर्व चांसलर ओलाफ स्कोल्ज के साथ मुलाकात कर वैश्विक मामलों, व्यापार और बदलती दुनिया में भारत-जर्मनी संबंधों को मजबूत करने पर विस्तार से चर्चा की। राहुल गांधी ने बर्लिन के हर्टी स्कूल में छात्रों, विद्वानों और शिक्षाविदों को संबोधित करते हुए बदलते विश्व में नेतृत्व, लोकतंत्र और वैश्विक जिम्मेदारी पर चर्चा की। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक स्थितियों के साथ ही भारतीय लोकतंत्र की स्थिति पर अपने विचार भी रखे।</p>
<p>राहुल गांधी ने समावेशी और समान शिक्षा के महत्व पर जोर दिया और मजबूत वैश्विक सहयोग की आवश्यकता का उल्लेख किया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक अनुभवों को भी साझा किया। गौरतलब है कि, राहुल गांधी 15 से 20 दिसंबर से जर्मनी के दौरे पर हैं और वह भारतीय मूल के लोगों के साथ मुलाकात और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। राहुल गांधी जर्मनी में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के एक कार्यक्रमों में भी शामिल हुए। इस यात्रा के दौरान उन्होंने बीएमडब्ल्यू मुख्यालय का दौरा कर संयंत्र की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी ली।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Dec 2025 15:41:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>चीनी सर्विलांस बैलून के साइड इफेक्ट</title>
                                    <description><![CDATA[ चीन का कहना है कि अमेरिका के इस कदम से  चीन-अमेरिकी रिश्ते गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। कोई दोराय नहीं कि चीन-अमेरिकी संबंधों में चल रही तनातनी के बीच बैलून प्रकरण ने एक तरह से आग में घी डालने का काम किया है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/side-effects-of-chinese-surveillance-balloons/article-37515"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-02/e2.jpg" alt=""></a><br /><p>अटलांटिक महासागर के ऊपर उड़ रहे चीन के सर्विलांस बैलून को नष्ट कर दिए जाने के बाद चीन-अमेरिकी संबंधों में तनाव का नया दौर शुरू हो गया है। सर्विलांस बैलून को नष्ट कर दिए जाने की घटना से  चीन इस कदर आहत हुआ है कि उसने वाशिंग्टन को अंजाम भुगतने की धमकी दे दी है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैसी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद चीन-अमेरिका रिश्तों में कड़वाहट का जो दौर शुरू हुआ है, वह चीन-अमेरिकी संबंधों के इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंच गया हैं। पेलोसी के ताइवान दौरे को लेकर भी चीन अमेरिका को भारी कीमत चुकाने की धमकी दे चुका है। <br /><br />चीन का कहना है कि अमेरिका के इस कदम से  चीन-अमेरिकी रिश्ते गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। कोई दोराय नहीं कि चीन-अमेरिकी संबंधों में चल रही तनातनी के बीच बैलून प्रकरण ने एक तरह से आग में घी डालने का काम किया है। सवाल यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और ताईवान मसले के बाद चीन-अमेरिका संबंधो पर बैलून प्रकरण के साइड इफेक्ट किस रूप में सामने आएंगे। पूरे घटनाक्रम का बारिकी से विश्लेषण करें तो साफ  तौर पर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सुरक्षा बलों द्वारा बैलून को  गिराए जाने के बाद जिस तरह से चीन की ओर से प्रतिक्रिया आई है, वह आवश्यकता से अधिक कठोरता लिए हुए है। बड़ी सामान्य सी बात है कि अमेरिका या किसी दूसरे प्रतिद्वंद्वी राष्टÑ का गुब्बारा चीन की हवाई सीमाओं में प्रवेश कर जाता तो चीन की क्या प्रतिक्रिया होती। क्या उसकी पीपल्स लिब्रेशन आर्मी चुपचाप उसे चीनी आसमान में उड़ते हुए देखती रहती। हालांकि, चीन बार-बार सफाई दे रहा था कि यह मौसम संबंधी जानकारियां जुटाने वाला सामान्य गुब्बारा है, जो हवा के बहाव की वजह से अमेरिकी सीमा में चला गया, लेकिन इसे मार गिराए जाने के बाद जिस तरह की तल्ख प्रतिक्रिया चीन की ओर से आई है, उससे इन आशंकाओं को बल मिलता है कि निसंदेह बैलून का मकसद कुछ ओर ही था। बैलून चाहे जासूसी के मकसद से अमेरिकी सीमाओं में आया हो या रस्ता भटकने के कारण, लेकिन इसने चीन-अमेरिकी रिश्तों की सामान्य होती प्रक्रिया पर जरूर पानी फैर दिया है!<br /><br />सच तो यह है कि पिछले एक दशक में चीन-अमेरिकी संबंध लगातार तल्ख हुए हैं। पूर्व राष्टÑपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में कारोबारी युद्ध के चलते दोनोें देशों के रिश्ते प्रभावित हुए। साल 2021 राष्टÑपति जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद भी रिश्तों में तल्खीयत बनी रही। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल से दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तनाव के नए मोर्चें खुल गए। रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी  अमेरिका की भृकुटियां तनी हुई हैं। ताइवान के मोर्चें पर भी चीन के आक्रामक रूख ने दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य नहीं होने दिया। लेकिन इन सबके बावजूद कूटनीति अपना काम करती रही और धीरे-धीरे रिश्तों पर जमी बर्फ  के पिघलने के आसार दिखने लगे थे। पांच साल बाद अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के चीन जाने का कार्यक्रम तय हुआ, लेकिन बैलून प्रकरण ने ब्लिंकन के दौरे की भी हवा निकाल दी है। हालांकि, इस बात की संभावना बहुत कम थी कि ब्लिंकन के दौरे से रसालत में जा चुके चीन-अमेरिका संबंधों में कोई बहुत बड़ा परिर्वतन होने वाला था, लेकिन ब्लिंकन का दौरा हो पाना ही अपने आप में एक बड़ी बात होती। शस्त्रु देशों की खुफिया व रणनीतिक जानकारी प्राप्त करने में जासूसी गुब्बारों के प्रयोग किए जाने का इतिहास काफी पुराना रहा है। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 1794 में आॅस्ट्रीयन और डच सैनिकों के खिलाफ  फनेरस की लड़ाई में पहली बार जासूसी गुब्बारों का इस्तेमाल किया गया।  1861 से 1865 के बीच अमेरिकी नागरिक युद्ध के दौरान भी जासूसी गुब्बारों के इस्तेमाल किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जासूसी गुब्बारों का प्रयोग किया गया था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान ने बम ले जाने वाले गुब्बारे छोड़े थे। इनमें से कई अमेरिका और कनाडा तक पहुंचे थे। युद्ध में जापानी सेना ने इन गुब्बारों को जरिए अमेरिकी क्षेत्र में बमबारी की कोशिश की थी। हालांकि, इनकी सीमित नियंत्रण क्षमताआें की वजह से अमेरिका के सैन्य निशानों को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन कुछ बम रियाशी क्षेत्रों में गिरे थे जिसकी जद में आने से कई आम नागरिकों की जान चली गई थी। शीतयुद्ध के दौरान सोवियत संघ और अमेरिका द्वारा ऐसे गुब्बारों का इस्तेमाल किया गया था।  सच तो यह है कि सर्विलांस बैलून खुफिया जानकारी एकत्र करने का सबसे  विश्वसनीय और सस्ता तरीका है। एडवांस कैमरे से युक्त होने के कारण यह बैलून  क्लोज-रेंज यानी पास की निगरानी के लिए बेहद उपयुक्त होते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि यह सैटेलाइट के मुकाबले ज्यादा आसानी से और ज्यादा देर तक किसी इलाके को स्कैन कर सकते हैं। 24000 से 37000 फिटकी ऊंचाई पर उड़ सकने में सक्षम होने के कारण जमीन से इनकी निगरानी करना बेहद मुश्किल होता हैं। चीन का जासूसी गुब्बारा जो अमेरिका के आसमान में उड़ रहा था उसकी क्षमता 60 हजार फिट थी।                        <br /><br />-डॉ. एन.के. सोमानी<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Feb 2023 09:55:33 +0530</pubDate>
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                <title>नए दौर में भारत-मिस्र संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, आईटी, फार्मास्युटिकल्स, कृषि, उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में भारत और मिस्र के बीच बहुआयामी साझेदारी मजबूत हो रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/india-egypt-relations-in-a-new-era/article-36037"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-01/q-1014.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत-मिस्र संबंधों के लिहाज से साल 2023 ऐतिहासिक बनने वाला हैं। ऐतिहासिकता की दो बड़ी वजह है-प्रथम, भारत और मिस्र अपने राजनयिक संबंधों की स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर चुके हैं। द्वितीय, 75 वर्षों की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि की हैसियत से भाग लेने के लिए भारत का दौरा किया हैं। सीसी की भारत यात्रा के दौरान भारत-मिस्र के बीच साइबर सुरक्षा, सूचना प्रौद्यागिकी, संस्कृति, युवा मामले और प्रसारण के क्षेत्रों में समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इसके अतिरिक्त दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग को और मजबूत करने और आतंकवाद के मुकाबले से संबंधित सूचनाओं के आदान-प्रदान बढ़ाने पर सहमति हुई। मिस्र के साथ द्विपक्षीय संबंधों में यह एक महत्वपूर्ण अवसर है, जब भारत अपनी सैन्य कूटनीति के फलक पर मध्य पूर्व एवं उत्तर अफ्रीकी देशों के साथ अपने सुरक्षा संबंधों का विस्तार कर रहा है।<br /><br />मिस्र के साथ भारत के संबंध हमेशा से ही सौहार्दपूर्ण रहे हैं। 15 अगस्त, 1947 को भारत को आजादी मिलने के अगले तीन दिनों में दोनों देशों ने औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए थे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के बीच गहरे दोस्ताना संबंध थे। दोनों नेताओं ने यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी। रणनीतिक स्तर पर भी दोनों देशों के बीच गहरे संबंध थे। नासिर के कार्यकाल में 1956 के अभूतपूर्व स्वेज संकट के दौरान भारत का मिस्र के प्रति सहयोगात्म रूख रहा। कुल मिलाकर कहे तो 50 और 60 का दशक भारत-मिस्र संबंधों का स्वर्ण काल था। लेकिन 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध से जब काहिरा ने सोवियत संघ के नेतृत्व वाले गुट से दूरी बनाते हुए अमेरिका के करीब जाना शुरू किया तो भारत-मिस्र संबंधों में भी शून्यता का भाव भरने लगा। घरेलू मुद्दे और जूदा भू-राजनीतिक विचारों की वजह से शून्यता का यह भाव अगले कुछ दशकों तक बरकरार रहा। कमोबेश यही स्थिति होस्री मुबारक के शासनकाल में रही। कहा जाता है कि होस्री जब तक सत्ता में रहे तब तक काहिरा-नई दिल्ली संबंध ठंडे बस्ते में ही रहे।<br /><br />हालांकि, शीतयुद्ध के दौरान आए इस ठंडेपन ने रिश्तों की खाई को अधिक गहरा नहीं होने दिया और अलग-अलग दौर के भू-राजनीतिक परिदृश्यों के बीच भारत-मिस्र संबंध कमोबेश आगे बढ़ते रहे। कोविड-19 और उसके बाद आए डेल्टा लहर के भयानक दौर ने द्विपक्षीय संबंधों को ठंडे बस्ते से बाहर निकालने में उत्प्रेरक के तौर पर काम किया। डेल्टा लहर के उस भयावह वक्त में मिस्र उन चंद देशों में से एक था जिसने भारत को मेडिकल आॅक्सिजन की सप्लाई मुहैया करवाई।<br /><br />बहुपक्षीय मंचों पर मिस्र के साथ हमारा उत्कृष्ट सहयोग है। क्षेत्रीय और दूसरे अनेक वैश्विक मुद्दों पर भी दोनों देशों का साझा दृष्टिकोण है। दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों की स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर चुके हैं। इसके बावजूद यह प्रश्न परेशान करने वाला है कि अरब जगत की इस बड़ी शक्ति के साथ संबंधों के मामले में भारत इतना संजिदा क्यों बना रहा। राजनयिक संबंधों का साढ़े सात दशकों का निर्विवाद काल कोई छोटी बात नहीं है, फिर भी विदेश नीति के मोर्चें पर मिर्स्र हमारा प्रमुख सहयोगी क्यों नहीं बन सका, यह प्रश्न भी विचारणीय है। भारत अपनी  लुक वेस्ट’ पॉलिसी को लेकर किस कदर उदासीन रहा है इसका अनुमान इस बात से ही हो जाता है कि पिछले डेढ दशक में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने मिस्र की यात्रा नहीं की। आखिरी बार 2009 में तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मिस्र गए थे। इस लिहाज से भी राष्टÑपति सीसी का भारत दौरा ऐतिहासिक माना जा रहा  है। मिस्र परंपरागत रूप से भारत के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है। मार्च 1978 से दोनों देश मोस्ट फेवर्ड नेशन क्लॉज पर आधारित द्विपक्षीय व्यापार समझौते से बंधें हुए हैं। हाल के वर्षों में भारत-मिस्र व्यापार संबंधों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 3.15 बिलियन डॉलर के वर्तमान भारतीय निवेश के साथ भारत मिस्र में सबसे बड़े निवेशक के तौर पर उभर कर आया है। भारत की तीन प्रमुख कंपनियों ने मिस्र में ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए 18 बिलियन डॉलर के एमओयू पर हस्ताक्षर किए है। भारत ने मिस्र से खनिज तेल, उर्वरक,  अकार्बनिक रसायन और कपास जैसे उत्पादों का आयात करता है जबकि आयरन एंड स्टील, लाइट व्हीकल्स और कॉटन यार्न का मिस्र को निर्यात करता है। मिस्र के पास सोने, तांबे, चांदी, जस्ता और प्लेटिनम का बड़ा भंडार है। सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, आईटी, फार्मास्युटिकल्स, कृषि, उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में भारत और मिस्र के बीच बहुआयामी साझेदारी मजबूत हो रही है। <br /><br />-डॉ. एन.के. सोमानी<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/india-egypt-relations-in-a-new-era/article-36037</link>
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                <pubDate>Mon, 30 Jan 2023 11:02:07 +0530</pubDate>
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