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                <title>glaciers - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>ग्लेशियरों पर मंडराता विलुप्ति का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[दुनियाभर के ग्लेशियर खत्म होने के कगार पर हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-threat-of-extinction-hovering-over-glaciers/article-119077"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/rtroer5.png" alt=""></a><br /><p>दुनियाभर के ग्लेशियर खत्म होने के कगार पर हैं। वे तेजी से पिघल रहे हैं, बल्कि खोखले भी हो रहे हैं। अगर इनके पिघलने और खोखले होने की यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले दशकों में दुनिया एक एक बूंद पानी को तरस जाएगी। दरअसल जलवायु की प्रचंड आंधी ग्लेशियरों को निगल रही है। यह महज बर्फ का पिघलना नहीं है, बल्कि एक ऐसी सुनामी है, जो हमारी दुनिया को उलट-पुलट करने को तुली है। इससे जहां बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ जाता है, वहीं इससे बुनियादी ढांचे के साथ साथ कृषि उत्पादन,जलीय और स्थलीय दोनों प्रकार के पारिस्थितिकीय तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों की मानें तो 2000 से लेकर 2023 के बीच बर्फ के यह पहाड़, जिन्हें हम ग्लेशियर कहते हैं, 650,000 करोड़ टन बर्फ खो चुके हैं। यह सिलसिला थमा नहीं है, लगातार जारी है। वेनेजुएला पहला देश है, जिस पर जलवायु परिवर्तन का इतना गहरा असर हुआ कि उसने अपने सभी ग्लेशियर खो दिए। ग्लेशियर पिघलने के मामले में वह चाहे अंटार्कटिका हो, आर्कटिक हो, ग्रीनलैंड हो, आल्पस हो या राकीज,आइसलैंड हो, हिंदूकुश हो या फिर स्विट्जरलैंड हो या ब्रिटेन हो, हरेक की हालत एक जैसी ही है।</p>
<p>कहीं कोई बदलाव नहीं है। साल 2010 के पहले आर्कटिक और अंटार्कटिका में जो बर्फ की चादर बिछी होती थी, उसमें अब लाखों वर्ग किलोमीटर की कमी हो गई है। अंटार्कटिका का सबसे बड़ा हिमखंड अपनी जगह से खिसक रहा है। यह अभी दक्षिण जार्जिया के गर्म जल की ओर बढ़ रहा है और यहां यह टूटकर पिघलने की प्रक्रिया में है वैज्ञानिक मानते हैं कि यह सब जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है, जिसने समुद्र का जलस्तर बढ़ने का खतरा पैदा कर दिया है। ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने से दुनियाभर में समुद्र के जलस्तर में बदलाव हुआ, साथ में मौसम के पैटर्न में भी बदलाव सामने आया है। इसका असर दुनियाभर के ईकोसिस्टम और समुदायों पर हुआ है। स्विटजरलैंड के प्रसिद्ध रोन ग्लेशियर सहित आल्पस पर्वत श्रृंखला के कई ग्लेशियरों में बर्फ के नीचे अजीबोगरीब सुरंगेंऔर गड्ढे हो गए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्थिति दुनियाभर के ग्लेशियरों की हो सकती है। तेजी से बढ़ रहे तापमान के कारण अब ग्लेशियर सिर्फ पिघल नहीं रहे हैं, वे अब भीतर से खोखले भी हो रहे हैं। ग्लेशियर मानीटरिंग समूह ग्लैमास के प्रमुख एवं ज्यूरिख के ईटीएच जैड इंस्टीटयूट के व्याख्याता मैथिलस हुस ने कहा है कि पहले छेद बर्फ के बीच बनते हैं और फिर वे बड़े बनते हैं।</p>
<p>हिंदूकुश क्षेत्र के ग्लेशियर से नवम्बर से मार्च तक बर्फ में 23.6 फीसदी की रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हुई है। यह बीते 23 सालों में सबसे कम है। नतीजतन पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में जल संकट का खतरा मंडरा रहा है। बर्फबारी में यह गिरावट लगातार तीसरे साल दर्ज की गयी है। जलवायु बदलाव और स्थलाकृति के कारण मध्य हिमालय का एक ग्लेशियर तेजी से खिसक रहा है। लम्बे समय से पिघल रहे ग्लेशियरों की चिंताओ के बीच यह नया संकट है। दरअसल ग्लेशियर आगे की ओर खिसकने की घटनाएं अभी तक अलास्का, कराकोरम और नेपाल से सामने आती थीं। वैज्ञानिक इसे ग्लोबल वार्मिंग, तापीय इफेक्ट और उस इलाके की टोपोग्राफी को मुख्य वजह मान रहे हैं। वैज्ञानिक इस ग्लेशियर का उद्गम भारत में और निकास तिब्बत की ओर मानते हैं। इससे तिब्बत से लेकर धौलीगंगा तक बाढ़ का खतरा बना हुआ है।</p>
<p> वैज्ञानिक ग्लेशियर में इस बदलाव की स्थिति को निचले इलाकों के लिए बेहद खतरनाक मानते हैं। ऐसी घटनाएं आबादी क्षेत्र में भीषण बाढ़ और तबाही का सबब बन सकती हैं। असलियत में ग्लोबल वार्मिंग वैश्विक स्तर पर मौजूद ग्लेशियरों पर तो नुकसान पहुंचा रही है,वह हिमालयी क्षेत्र में 37,465 वर्ग किलोमीटर में फैले कुल 9575 ग्लेशियरों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है, जो अब तेजी से पिघलने लगे हैं। ये ध्रूवीय क्षेत्र के बाहर दुनिया के सभी पर्वतीय क्षेत्र मे जमे ताजे पानी के सबसे बड़े भंडार हैं। इसे एशिया की जल मीनार और विश्व का तीसरा ध्रुव भी कहते है। एशिया की 10 प्रमुख नदियों को पानी देने वाले इन ग्लेशियरों से सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी तीन नदियां विभाजित हुई हैं। कश्मीर में भी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। यहां भी पानी का संकट है। मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलें खतरे की घंटी बजा ही रही हैं। फिर नदियों का जलस्तर भी कम हो रहा है। यह चिंतनीय है। गौरतलब कि सूखे के मौसम में यही बर्फ नदियों में पानी का स्रोत होती हैं।</p>
<p>ऐसे में बर्फ में इस भारी गिरावट का असर भारत या आसपास के देशों के लगभग दो अरब लोगों की जलापूर्ति पर पड़ेगा। यूनेस्को ने भी चेताया है कि ग्लेशियरों के पिघलने की यदि मौजूदा दर बनी रही तो इसके परिणाम अभूतपूर्व और विनाशकारी होंगे। ग्लेशियरों की इस बदहाली को देखते हुए जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपील की है कि वे ग्लेशियर बचाने हेतु आगे आएं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा है कि ग्लेशियर बचाने हेतु जल्द कदम उठाना जरूरी है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि हमारी बारहमासी नदियों का स्रोत यही ग्लेशियर हैं। आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद हिमालय में पृथ्वी पर यह बर्फ और हिम का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है। अगर इसे नहीं बचाया गया तो 144 सालों बाद अगला महाकुंभ संभवत रेत पर आयोजित करना होगा।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jul 2025 12:30:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तबाही का सबब बनेंगी ग्लेशियर पिघलने से बनी झीलें</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र महासचिव हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से बेहद चिंतित हैं। उनकी चिंता का सबब यह है कि दुनिया के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते सदी के अंत तक हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर 75 फीसदी तक नष्ट हो जाएंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/lakes-formed-by-melting-glaciers-will-cause-devastation/article-70812"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/photo37.png" alt=""></a><br /><p>संयुक्त राष्ट्र महासचिव हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से बेहद चिंतित हैं। उनकी चिंता का सबब यह है कि दुनिया के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते सदी के अंत तक हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर 75 फीसदी तक नष्ट हो जाएंगे। संयुक्त राष्टÑ महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण बीते 30 साल में नेपाल के पहाड़ों से एक तिहाई बर्फ  खत्म हो गई है। गौरतलब है कि बीते साल के आखिर में गुटारेस ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के आसपास के क्षेत्र का दौरा किया था। उस समय उन्होंने सोलुखुंबू इलाके का दौरा करने के बाद हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों के पिघलने से हो रहे खतरों से आगाह करते हुए कहा था कि दो प्रमुख कार्बन प्रदूषकों भारत और चीन के बीच इस हिमालयी क्षेत्र में स्थित नेपाल के ग्लेशियर पिछले दशक में 65 फीसदी से अधिक तेजी से पिघले हैं। आज जरूरत जीवाश्म ईंधन के युग को समाप्त करने की है। ग्लेशियरों के पिघलने का मतलब है तेजी से समुद्र का बढ़ना और विश्व समुदाय पर बढ़ता खतरा। इसीलिए मैं दुनिया की छत से इस वैश्विक खतरे के प्रति आगाह कर रहा हूं। क्योंकि दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार यह चेता चुके हैं कि पिछले 100 वर्षों में पृथ्वी का तापमान 0.74 डिग्री सैल्सियस के औसत से बढ़ चुका है। लेकिन दक्षिण एशिया के हिमालयी क्षेत्र में गर्मी औसत से भी अधिक रही है। इसमें हो रही दिनोंदिन बढ़ोतरी बडेÞ खतरे का संकेत है। सबसे बड़ा खतरा ग्लेशियरों के पिघलने से बन रही झीलों से है जो तबाही का सबब बन रही हैं। 2013 में आई केदारनाथ आपदा इसकी जीती-जागती मिसाल है।</p>
<p>अब उत्तराखण्ड को लें, बीते दिनों उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून स्थित राज्य सचिवालय में आपदा प्रबंधन सचिव डॉ. रंजीत कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में हुई बैठक में विशेषज्ञों ने राज्य के ग्लेशियरों और झीलों पर पेश रिपोर्ट में कहा कि वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा राज्य के ग्लेशियरों की निगरानी से यह खुलासा हुआ है कि तापमान बढ़ोतरी की वजह से ग्लेशियर न केवल तेजी से पिघल रहे हैं बल्कि वह तेजी से पीछे भी हट रहे हैं। इनके द्वारा खाली की गई जगह पर ग्लेशियरों द्वारा लाए गए मलबे के बांध या मोरेन के कारण झीलें आकार ले रही हैं। इनसे जोखिम लगातार बढ़ रहा है। यहां पर केदारताल, भिलंगना और गौरीगंगा ग्लेशियरों ने आपदा के लिहाज से खतरे की घंटी बजाई है। वैज्ञानिकों ने इन्हें संवेदनशील बताया है और कहा है कि गंगोत्री ग्लेशियर के साथ ही इस इलाके में 13 ग्लेशियर झीलें भी जोखिम के लिहाज से चिन्हित हुई हैं जो भयावह खतरे का सबब हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि देश के उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र में लद्दाख का पैंगोंग इलाका जो पर्यटन की दृष्टि से ख्याति प्राप्त, बहुत ही आकर्षक और मनमोहक है, में स्थित ग्लेशियरों के पिघलने से इस इलाके में तबाही के बादल मंडराने लगे हैं। यह इलाका ग्लेशियरों का भंडार है। इस बात का खुलासा कश्मीर यूनीवर्सिटी के जियोइनफार्मेटिक्स डिपार्टमेंट के अध्ययन में हुआ है। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन तो अहम कारण है ही, चीन द्वारा पैगोंग इलाके में झील पर पुल का निर्माण भी एक अहम समस्या है जिसके चलते पारिस्थितिकी का संकट भयावह होता जा रहा है। यह इलाका ग्लेशियरों से केवल छह किलोमीटर दूर है। इसलिए इस संवेदनशील पर्वतीय इलाके में मानवीय गतिविधियों पर रोक बेहद जरूरी हो गई है। यदि इस पर अंकुश नहीं लगा तो ग्लेशियर तो सिकुडेÞंगे हैं ही,यहां की मिट्टी में नमी भी कम हो जाएगी और इससे कृषि के साथ-साथ वनस्पति भी प्रभावित होगी। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यहां दुनिया की सबसे ऊंची खारे पानी की झील है। सबसे बड़ी और अहम बात यह है कि जम्मू-काश्मीर और लद्दाख के इस इलाके में कुल मिलाकर 12,000 के करीब ग्लेशियर हैं। ये ग्लेशियर 2000 के करीब हिमनद झीलों का निर्माण करते हैं। इनमें 200 तो ऐसे हैं जिनमें पानी बढ़ने से इनके फटने की हमेशा आशंका बनी रहती है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। यदि कभी ऐसा हुआ तो उत्तराखंड जैसी त्रासदी की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। यह भी जान लेना जरूरी है कि पैंगोंग झील का 45 किलोमीटर का इलाका भारतीय क्षेत्र में आता है। पैंगोंग के इसी इलाके में बरसों से चीन द्वारा लगातार निर्माण कार्य किया जा रहा है। पैंगोंग झील के पार पुल का निर्माण उसी का ही हिस्सा है। विशेषज्ञों की चिंता का सबब यही है कि ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने की खातिर इस संवेदनशील इलाके में ईंधन से चलने वाले वाहनों पर तत्काल रोक लगाई जाए। भारत के साथ लगातार दो सालों से चलते गतिरोध के कारण चीन द्वारा यहां पर बेतहाशा निर्माण किया जा रहा है। पैंगोंग झील के पास चीन द्वारा जो निर्माण किए जा रहे हैं, उनकी दूरी ग्लेशियरों से केवल छह किलोमीटर ही है। ऐसे संवेदनशील इलाके में भारी पैमाने पर निर्माण कार्य किए जाने से ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा बढ़ गया है। इससे लद्दाख के इस इलाके में गंभीर परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता। ट्रांस हिमालयन लद्दाख के पैंगोंग इलाके में भारतीय सीमा में आने वाले इन 87 ग्लेशियरों में 1990 के बाद आई कमी के शोध-अध्ययन जो जर्नल फ्रंटियर इन अर्थ साइंस में प्रकाशित हुआ है।        </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Feb 2024 12:10:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तिब्बत और लद्दाख के ग्लेशियरों पर मंडरा रहा खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[प्रोफेसर कांग शिचांग का यह अध्ययन नेचर कम्यूनिकेशन जर्नल में प्रकाशित हुआ है। उसमें प्रोफेसर कांग कहते हैं कि बर्फ  में ब्लैक कार्बन का जमाव सतहों की सफेदी को काफी कम कर देता है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/glaciers-of-tibet-and-ladakh-are-in-danger/article-36700"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-02/q-61.jpg" alt=""></a><br /><p>देश के उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र में तिब्बत और लद्दाख के पैंगोंग इलाके में स्थित ग्लेशियरों के पिघलने से इस इलाके में तबाही के बादल मंडराने लगे हैं। चाइनीज ऐकेडेमी आफ साइंस के प्रोफेसर कांग शिचांग की मानें तो ब्लैक कार्बन ऐरोसेल ने दक्षिण एशियाई मानसून क्षेत्र में जल वाष्प परिवहन को बदल कर रख दिया है। इससे तिब्बती पठार के हिमनद या उन्हें ग्लेशियर कहें को काफी हद तक प्रभावित किया है। इस सदी में इसमें काफी तेजी आई है। प्रोफेसर कांग शिचांग का यह अध्ययन नेचर कम्यूनिकेशन जर्नल में प्रकाशित हुआ है। उसमें प्रोफेसर कांग कहते हैं कि बर्फ  में ब्लैक कार्बन का जमाव सतहों की सफेदी को काफी कम कर देता है। </p>
<p>यह ग्लेशियरों और बर्फ  के पिघलने की दर में तेजी लाता है। इस तरह इस क्षेत्र में यह जल विज्ञान संबंधी प्रक्रिया और जल संसाधनों की प्रकृति को बदल देता है। नतीजतन तिब्बती पठार के हिमनदों को मिलने वाला लाभ अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहा है। दरअसल तिब्बती पठार से भरे इस दक्षिण एशियाई इलाका में समूची दुनिया में ब्लैक कार्बन उत्सर्जन का सबसे उच्चतम स्तर है। यह ओटोमोबाइल तथा कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाला एक पार्टिकुलेट मैटर है, जो मध्य और ऊपरी वायुमंडल को गर्म करता है, जिससे उत्तरी-दक्षिणी तापमान में काफी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जो खतरनाक संकेत के साथ गंभीर चिंता का विषय है। </p>
<p>इधर कश्मीर यूनिवर्सिटी के जियोइनफार्मेटिक्स डिपार्टमेंट के अध्ययन में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन तो अहम कारण है ही, चीन द्वारा पैंगोंग इलाके में झील पर पुल का निर्माण भी एक अहम समस्या है जिसने हालात को और भयावह बनाने का काम किया है। इसके चलते पारिस्थितिकी का संकट भी और भयावह होता जा रहा है। अहम सवाल यह है कि यह इलाका ग्लेशियरों से केवल छह किलोमीटर दूर है। इसलिए इस संवेदनशील पर्वतीय इलाके में मानवीय गतिविधियों पर रोक बेहद जरूरी हो गया है। यदि इस पर अंकुश नहीं लगा तो ग्लेशियर तो सिकुडेंगे हैं ही, यहां की मिट्टी में नमी कम हो जाएगी, इससे कृषि के साथ-साथ वनस्पति भी प्रभावित होगी। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।</p>
<p>गौरतलब है कि लद्दाख का पैंगोंग का यह इलाका पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक और मनमोहक है। यहां दुनिया की सबसे ऊंची खारे पानी की झील है, जो सबसे ख्यात प्राप्त पर्यटन स्थल है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के इस इलाके में कुल मिलाकर 12,000 के करीब ग्लेशियर हैं। ये ग्लेशियर 2000 के करीब हिमनद झीलों का निर्माण करते हैं। इनमें 200 में पानी बढ़ने से इनके फटने की आशंका है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यदि ऐसा हुआ तो उत्तराखंड जैसी त्रासदी की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। पैंगोंग झील का 45 किलोमीटर का इलाका भारतीय क्षेत्र में आता है। पैंगोंग के इसी इलाके में चीन द्वारा लगातार निर्माण कार्य किया जा रहा है। पैंगोंग झील के पार पुल का निर्माण उसी का हिस्सा है।</p>
<p>विशेषज्ञों की चिंता का सबब यही है कि ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने की खातिर इस संवेदनशील इलाके में ईंधन से चलने वाले वाहनों पर तत्काल रोक लगाई जाए। भारत के साथ लगातार दो सालों से चलते गतिरोध के कारण चीन यहां पर बेतहाशा निर्माण किया जा रहा है। पैंगोंग झील के पास चीन द्वारा जो निर्माण किए जा रहे हैं, उनकी दूरी ग्लेशियरों से केवल छह किलोमीटर ही है। ऐसे संवेदनशील इलाके में भारी पैमाने पर निर्माण कार्य किए जाने से ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा बढ़ गया है। इससे लद्दाख के इस इलाके में गंभीर परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता।</p>
<p>ट्रांस हिमालयन लद्दाख के पैंगोंग इलाके में भारतीय सीमा में आने वाले इन 87 ग्लेशियरों में 1990 के बाद आई कमी के शोध-अध्ययन जो जर्नल फ्रंटियर इन अर्थ साइंस में प्रकाशित हुआ है, के मुताबिक इस इलाके में स्थित 87 ग्लेशियर हर साल 0.23 फीसदी की दर से पिघल कर सिकुड़ते जा रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंतनीय बात यह है कि यह इलाका भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील है। फिर इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि ग्लेशियरों के पिघलने से झीलों में पानी बढेगा। उस हालत में उनमें सीमा से अधिक पानी होने से वह किनारों को तोड़कर बाहर निकलेगा। दूसरे शब्दों में झीलें फटेंगीं। उस दशा में पानी सैलाब की शक्ल में तेजी से बहेगा। नतीजन आसपास के गांव-कस्बे खतरे में पड़ जाएंगे। यानी उनको तबाही का सामना करना पडेगा। उत्तराखंड की त्रासदी की तरह उस दशा में सब कुछ तबाह हो जाएगा। इसलिए इस मुद्दे पर प्राथमिकता के आधार पर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Feb 2023 10:47:12 +0530</pubDate>
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