<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://dainiknavajyoti.com/nature/tag-34631" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Dainik Navajyoti Rising Rajasthan RSS Feed Generator</generator>
                <title>nature - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
                <link>https://dainiknavajyoti.com/tag/34631/rss</link>
                <description>nature RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अजमेर के जंगलों में 1–2 मई को वन्यजीव गणना, 85 से अधिक वाटर होल्स पर नजर</title>
                                    <description><![CDATA[अजमेर वन विभाग 1 और 2 मई को जिले के 85 से अधिक वॉटर होल्स पर वन्यजीव गणना आयोजित करेगा। यह गणना 24 घंटे चलेगी, जिसमें वन कर्मी पग-मार्क और प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर आंकड़े जुटाएंगे। पुष्कर, किशनगढ़ और नसीराबाद सहित सभी क्षेत्रों के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/wildlife-census-in-ajmer-forests-on-1-2-may-keeping-an/article-151553"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/111200-x-600-px)-(3)29.png" alt=""></a><br /><p>अजमेर। वन विभाग की ओर से एक व 2 मई को जिले के जंगलों में वन्य जीव गणना की जाएगी। यह गणना वॉटर होल्स पद्धति से होगी। जिले के जंगलों के 85 से अधिक वाटर होल्स पर यह गणना होगी। वन कार्मिक वॉटर्स होल्स पर पानी पीने के लिए आने वाले जीवों को देखकर उनकी संख्या निर्धारित प्रपत्रों में दर्ज करेंगे। साथ भी उनके पग मार्ग, मल मूत्र को भी गणना का आधार बनाएंगे। उपवन संरक्षक पी बालामुरुगन ने बताया कि गणना 1 मई को सुबह 8:00 बजे शुरू होकर 2 मई को सुबह 8:00 बजे संपन्न होगी। अजमेर सहित ब्यावर, नसीराबाद, किशनगढ़, सरवाड़ व पुष्कर के जंगलों में वाटर होल्स पर होने वाली गणना के लिए टीमों का गठन किया गया है। प्रत्येक टीम के कार्मिकों को गणना का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। गणना के दिन अधिकारियों की टीम वॉटर होल्स का औचक निरीक्षण भी करेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अजमेर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/wildlife-census-in-ajmer-forests-on-1-2-may-keeping-an/article-151553</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/wildlife-census-in-ajmer-forests-on-1-2-may-keeping-an/article-151553</guid>
                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 15:15:08 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2026-04/111200-x-600-px%29-%283%2929.png"                         length="1758814"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कॉर्बेट नेशनल पार्क में दिखा दुर्लभ और खूबसूरत पक्षी''लॉन्ग टेल मिनिवेट'',पक्षी प्रेमियों में उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[रामनगर के कॉर्बेट नेशनल पार्क में दुर्लभ लॉन्ग टेल मिनिवेट पक्षी देखा गया। इसकी मौजूदगी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित वन्य आवास का संकेत मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(10)3.png" alt=""></a><br /><p>रामनगर। उत्तराखंड के रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक बेहद आकर्षक और  दुर्लभ पक्षी ''लॉन्ग टेल मिनिवेट' देखा गया है, जिसने पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान खींचा है। वन्य जीव प्रेमी संजय छिम्वाल बताते हैं कि कॉर्बेट और इसके आसपास के जंगलों में अब तक करीब 600 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह क्षेत्र पक्षी अवलोकन के लिए बेहद खास माना जाता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो पक्षी देखा गया है, वह लॉन्ग टेल मिनिवेट है, जो अपनी खूबसूरती और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है।</p>
<p>संजय के अनुसार लॉन्ग टेल मिनिवेट आमतौर पर पेड़ों की ऊँची चोटियों पर रहना पसंद करता है और जमीन पर बहुत कम उतरता है। इसका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े होते हैं, जिससे यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि इस पक्षी में सेक्सुअल डाइमॉफरजिम स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, यानी नर और मादा के रंग-रूप में फर्क होता है। नर लॉन्ग टेल मिनिवेट चटक लाल रंग का होता है, जबकि मादा हल्के पीले-हरे रंग की दिखाई देती है। आमतौर पर पक्षियों में नर का रंग ज्यादा चमकीला होता है, ताकि वह मादा को आकर्षित कर सके, और यही विशेषता इस पक्षी में भी देखने को मिलती है।</p>
<p>संजय ने आगे बताया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई पक्षी दुर्लभ श्रेणी में आते हैं, जिनकी विशेष सूची (वॉचर लिस्ट) तैयार की जाती है। इस सूची में हॉर्नबिल, बार्बेट और वुडपेकर जैसे पक्षियों के साथ-साथ मिनिवेट भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे पक्षियों का दिखना इस बात का संकेत है कि कॉर्बेट का जंगल आज भी जैव विविधता के लिए सुरक्षित और समृद्ध है। कॉर्बेट में लॉन्ग टेल मिनिवेट का दिखना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099</guid>
                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:55:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2026-01/1200-x-600-px%29-%2810%293.png"                         length="561245"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खतरे का संकेत है प्रकृति से छेड़छाड़</title>
                                    <description><![CDATA[जहां तक जंगलों के खत्म होने का सवाल है, उसकी गति देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जायेगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जायेंगे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/tampering-with-nature-is-a-sign-of-danger/article-84135"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/environment.png" alt=""></a><br /><p>प्रकृति के साथ छेड़छाड़ आज समूची दुनिया के लिए भयावह खतरे का सबब बन चुकी है। तापमान में वृद्धि, मौसम में बदलाव और जलवायु परिवर्तन इसके जीवंत प्रमाण हैं। इन प्रकोपों से दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही है। लाखों-करोड़ो़ं लोग इसके चलते अनचाहे मौत के मुंह में जाने को विवश हैं। मौसम में आये बदलाव ने इस संकट के भयावह रूप धारण करने में प्रमुख भूमिका निबाही है। असलियत में इस सबके पीछे मानवीय गतिविधियां पूरी तरह जिम्मेदार हैं जिसने दुनिया को तबाही के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। प्रकृति की बदहाली इसका जीता-जागता सबूत है। दुनिया में जिस तेजी से पेड़ों की तादाद कम होती जा रही है, हकीकत में उससे पर्यावरण तो प्रभावित हो ही रहा है, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, कृषि और मानवीय जीवन ही नहीं, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी भीषण खतरा पैदा हो गया है। जैव विविधता का संकट पर्यावरण ही नहीं, हमारी संस्कृति और भाषा का संकट भी बढ़ा रहा है। विश्व बैंक ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से संबंधित रिपोर्ट में कहा है कि पर्यावरण प्रदूषण के चलते हो रही तापमान में बढ़ोतरी के लिए दैनंदिन घटती जैव विविधता और मानवीय गतिविधियां सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जैव विविधता घटने की वजह से धरती दैनंदिन गर्म होती जा रही है जिससे अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के साथ साथ दुनिया में तीसरे सबसे अधिक बर्फ के भंडार माने जाने वाले कनाडा के ग्लेशियर संकट में हैं। इनके पिघलने से इस सदी के अंत तक दुनिया भर के समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी हो जायेगी जिससे दुनिया के समुद्र तटीय बड़े शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जायेगा।  </p>
<p>जहां तक जंगलों के खत्म होने का सवाल है, उसकी गति देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जायेगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जायेंगे। हकीकत यह है कि हर साल दुनिया में एक करोड़ हेक्टेयर जंगल लुप्त होते जा रहे हैं। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है। जबकि जैव विविधता का संरक्षण हमें बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहता है। समृद्ध जैव विविधता हमारे अस्तित्व का आधार है। यह हमारे बेहतर भविष्य के लिए भी बेहद जरूरी है। इसीलिए जैव विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है। यहां इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि यदि वनों की कटाई पर अंकुश नहीं लगा तो प्रकृति की लय बिगड़ जायेगी और उस स्थिति में वैश्विक स्तर पर तापमान में दो डिग्री की वृद्धि को रोक पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। ऐसी स्थिति में सूखा और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम से आर्थिक हालात और भी प्रभावित होंगे जिसकी भरपायी आसान नहीं होगी। सबसे बड़ी बात यह कि पेड़ों का होना हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बेहद जरूरी है। यह न केवल हमें गर्मी से राहत प्रदान करते हैं बल्कि जैव विविधता को बनाये रखने, कृषि की स्थिरता सुदृढ़ करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने और जलवायु को स्थिरता प्रदान करने में भी अहम योगदान देते हैं। फिर भी हम पेड़ों के दुश्मन क्यों बने हुए हैं, यह समझ से परे है। बीते कई बरसों से दुनिया के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और वनस्पति व जीव विज्ञानी चेता रहे हैं कि अब हमारे पास पुरानी परिस्थिति को वापस लाने के लिए समय बहुत ही कम बचा है। यह भी कि हम जहां पहुंच चुके हैं वहां से वापस आना आसान काम नहीं है। कारण वहां से हमारी वापसी की उम्मीद केवल और केवल पांच फीसदी से भी कम ही बची है।</p>
<p>दुनिया में समृद्ध जैव विविधता वाली जमीन कब्जाने की घटनाओं में साल 2008 के बाद से तेजी से बढ़ोतरी हुयी है। ये घटनायें उप सहारा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों पर असंगत रूप से प्रभाव डालती हैं। यह प्रवृत्ति मध्य पूर्वी यूरोप, उत्तरी और लैटिन अमेरिका व दक्षिणी एशियाई इलाकों में भूमि असमानता को बढ़ा रही है। इससे जहां छोटे, मध्यम स्तर के खाद्य उत्पादकों को तेजी से अव्यवहार्य बना रही है, वहीं किसान विद्रोह, ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन, गरीबी और खाद्य असुरक्षा की भावना में बढ़ोतरी हुयी है। इस बारे में मानसिक स्वास्थ्य की जानी मानी प्रोफेसर एंड्रिया मेचली का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में हम वैश्विक स्तर पर जैव विविधता में तेजी से गिरावट को देख रहे हैं। जैव विविधता न सिर्फ हमारे प्राकृतिक वातावरण के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐसे वातावरण में रहने वाले लोगों के मानसिक कल्याण के लिए भी उतनी ही अहम है। इसलिये इस बात पर गंभीरता से विचार किये जाने की जरूरत है कि जैव विविधता धरती और मानव स्वास्थ्य के लिए सह-लाभ के तत्व हैं और इसे महत्वपूर्ण बुनियादी मान कर इसकी रक्षा करनी चाहिए। </p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/tampering-with-nature-is-a-sign-of-danger/article-84135</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/tampering-with-nature-is-a-sign-of-danger/article-84135</guid>
                <pubDate>Tue, 09 Jul 2024 11:22:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-07/environment.png"                         length="559683"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी भी और कर्तव्य भी : राज्यवर्धन</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने कहा कि जलवायु की रक्षा के लिए, पर्यावरण की रक्षा के लिए हमारे प्रयासों का संगठित होना बहुत ज़रूरी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/conservation-of-nature-and-environment-is-the-responsibility-and-duty/article-80515"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/yy211rer-(3).png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने गुरुवार  विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर क्षेत्रवासियों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पौधारोपण किया।</p>
<p>कर्नल राज्यवर्धन राठौड़  ने प्रकृति संरक्षण के प्रति सजग बनकर सभी से अपना अमूल्य योगदान देने की विनम्र अपील की।<br />कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ जी ने कहा, मनुष्य का प्रकृति से अटूट संबंध है। प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी है। मोदी सरकार ने इस दिशा में अनेकों प्रयासों से समाज में जागृति लाने का अभूतपूर्व कार्य किया है। जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए जो वैश्विक प्रयास चल रहे हैं, उनमें भारत एक आशा की किरण बनकर के उभरा है। </p>
<p>कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने कहा कि जलवायु की रक्षा के लिए, पर्यावरण की रक्षा के लिए हमारे प्रयासों का संगठित होना बहुत ज़रूरी है। देश का एक-एक नागरिक जब जल, वायु और जमीन के संतुलन को साधने के लिए एकजुट होकर प्रयास करेगा, तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित पर्यावरण दे पाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/conservation-of-nature-and-environment-is-the-responsibility-and-duty/article-80515</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/conservation-of-nature-and-environment-is-the-responsibility-and-duty/article-80515</guid>
                <pubDate>Wed, 05 Jun 2024 14:45:25 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-06/yy211rer-%283%29.png"                         length="431683"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रीराम के प्रकृति-प्रेम की सकारात्मक ऊर्जा</title>
                                    <description><![CDATA[सनातन शास्त्रों में निहित है कि त्रेता युग में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/positive-energy-of-shri-rams-love-for-nature/article-75281"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/transfer-(4)16.png" alt=""></a><br /><p>हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के रामनवमी बहुत ही शुभ दिन होता है। सनातन शास्त्रों में निहित है कि त्रेता युग में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ था। धार्मिक मत है कि सभी प्रकार के मांगलिक कार्य इस दिन बिना मुहूर्त विचार किए भी सम्पन्न किए जा सकते हैं। रामनवमी पर पारिवारिक सुख-शांति और समृद्धि के लिए व्रत भी रखा जाता है। भगवान श्रीराम की पूजा करने से साधक के सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। साथ ही साधक भगवान श्रीराम की कृपा के भागी बनते हैं। पर्यावरण की विकराल होती समस्या के संदर्भ में भगवान श्रीराम का प्रकृति प्रेम एवं पर्यावरण संदेश इस समस्या के समाधान का एक बड़ा माध्यम बन सकता है, ऐसा हुआ तो हमारा रामनवमी मनाना सार्थक होगा। श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास से हमें पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा मिलती है। जन्म, बचपन, शासन एवं मृत्यु तक उनका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति-प्रेम एवं पर्यावरण चेतना से ओत-प्रोत है। आज देश एवं दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान श्रीराम के प्रकृति प्रेम एवं पर्यावरण संरक्षण की शिक्षाओं से मिलता है। भारतीय संस्कृति में हरे-भरे पेड़, पवित्र नदियां, पहाड़, झरनों, पशु-पक्षियों की रक्षा करने का संदेश हमें विरासत में मिला है। स्वयं भगवान श्रीराम व माता सीता 14 वर्षों तक वन में रहकर प्रकृति को प्रदूषण से बचाने का संदेश दिया। ऋषि-मुनियों के हवन-यज्ञ के जरिए निकलने वाले ऑक्सीजन को अवरोध पहुंचाने वाले दैत्यों का वध करके प्रकृति की रक्षा की। जब श्रीराम ने हमें प्रकृति के साथ जुड़कर रहने का संदेश दिया है तो हम वर्तमान में क्यों प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम प्रकृति की रक्षा करें। गोस्वामी तुलसीदास ने 550 साल पहले रामचरित मानस की रचना करके श्रीराम के चरित्र से दुनिया को श्रेष्ठ पुत्र, श्रेष्ठ पति, श्रेष्ठ राजा, श्रेष्ठ भाई, प्रकृति प्रेम और मर्यादा का पालन करने का संदेश दिया है। रामचरित मानस एक दर्पण है जिसमें व्यक्ति अपने आपको देखकर अपना वर्तमान सुधार सकता है एवं पर्यावरण की विकराल होती समस्या का समाधान पा सकता है।</p>
<p>भारतीय समाज का तानाबाना दो महाकाव्यों रामायण एवं महाभारत के इर्द-गिर्द बुना गया है। इनमें जीवन के साथ मृत्यु को भी अमृतमय बनाने का मार्ग दिखाया गया है। इनमें सशरीर मोक्ष मार्ग के अद्भुत एवं विलक्षण उदाहरण हैं। रामायण में प्रभु श्रीराम चलते हुए सरयू नदी में समा जाते हैं और महाभारत में युधिष्ठिर हिमालय को लांघकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इन दोनों ही घटनाओं में महामानवों ने मृत्यु का माध्यम भी प्रकृति यानी नदी एवं पहाड़ को बनाकर जन-जन को प्रकृति-प्रेम की प्रेरणा दी है। लेकिन हम देख रहे हैं कि आज हमने मोक्षदायी नदी और पहाड़ों की ऐसी स्थिति कर दी है कि वहां मोक्ष तो क्या जीवन जीना भी कठिन हो गया है। क्या हम नदियों एवं पहाड़ों को मोक्षदायी का सम्मान पुन: प्रदान कर पाएंगे। यह हमारे जमाने का यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर देने श्रीराम और युधिष्ठिर नहीं आएंगे, लेकिन हमें ही श्रीराम एवं युधिष्ठिर बनकर प्रकृति एवं पर्यावरण के आधार नदियों एवं पहाड़ों के साथी बनना होगा, उनका संरक्षण एवं सम्मान करना होगा। </p>
<p>आज संपूर्ण विश्व में नदियों, पहाड़ों, प्रकृति के प्रदूषण को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है, लेकिन हजारों साल पहले भगवान श्रीराम ने प्रकृति के बीच रहकर प्रकृति को बचाने के लिए प्रेरित किया। भगवान श्रीराम वनवास काल में जिस पर्ण कुटीर में निवास करते थे वहां पांच वृक्ष पीपल, काकर, जामुन, आम व वट वृक्ष था जिसके नीचे बैठकर श्रीराम-सीता भक्ति आराधना करते थे। जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसी की रक्षा करेगा। आदर्श समाज व्यवस्था का मूल आधार है प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ संतुलन बनाकर जीना। रामायण में आदर्श समाज व्यवस्था को रामराज्य के रूप में बताया गया है उसका बड़ा कारण है प्रकृति के कण-कण के प्रति संवेदनशीलता। अनेक स्थानों पर तुलसीदासजी एवं वाल्मीकि ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता को रेखांकित किया है। रामराज्य पर्यावरण की दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न एवं स्वर्णिम काल था। मजबूत जड़ों वाले फल तथा फूलों से लदे वृक्ष पूरे क्षेत्र में फैले हुए थे। श्रीराम के राज्य में वृक्षों की जड़ें सदा मजबूत रहती थीं। वे वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते थे। मेघ प्रजा की इच्छा और आवश्यकता के अनुसार ही वर्षा करते थे। वायु मन्द गति से चलती थी, जिससे उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था। इसलिए जो कुछ हम सब रामायण से समझ पाते हैं, वह ही मनुष्य के जीवन जीने की सनातन परंपरा है। वही परंपरा ही हम सबको यह बताती है कि प्रकृति रामराज्य का आधार है। हम श्रीराम तो बनना चाहते हैं पर श्रीराम के जीवन आदर्शों को अपनाना नहीं चाहते, प्रकृति-प्रेम को अपनाना नहीं चाहते, यह एक बड़ा विरोधाभास है। अजीब है कि जो हमारे जन-जन के नायक हैं, सर्वोत्तम चेतना के शिखर है, जिन प्रभु श्रीराम को अपनी सांसों में बसाया है, जिनमें इतनी आस्था है, जिनका पूजा करते हैं, हम उन व्यक्तित्व से मिली सीख को अपने जीवन में नहीं उतार पाते। प्रभु श्रीराम ने तो प्रकृति के संतुलन के लिए बड़े से बड़ा त्याग किया।    </p>
<p><strong> -ललित गर्ग</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/positive-energy-of-shri-rams-love-for-nature/article-75281</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/positive-energy-of-shri-rams-love-for-nature/article-75281</guid>
                <pubDate>Wed, 17 Apr 2024 14:16:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-04/transfer-%284%2916.png"                         length="451582"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेसाल्टिक चट्टानें होंगी जियो साइट के रूप में विकसित </title>
                                    <description><![CDATA[इंटेक ने देशभर की 150 भू विरासत सूची में किया शामिल ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/basaltic-rocks-will-be-developed-as-geo-site/article-73734"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/belastic-chattane-hongi-geo-site-k-roop-me-viksit...mishroli,-jhalawar-news-26-03-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>मिश्रौली। झालावाड़ के मिश्रोली गांव स्थित साढ़े छह करोड साल पुरानी राजस्थान की एक मात्र स्तंभाकार ज्वालामुखीय बेसाल्टिक चट्टानों को अब जियो साइट के रूप में विकसित किया जाएगा। बेसाल्टिक चट्टानों को जिओ साइट में बदलने के प्रारंभिक प्रयास शुरू हो गए हैं। यहां की बेहद खास बात यह है कि यह चट्टानें लगभग साढ़े छह करोड़ वर्ष पुरानी है तथा तीन चरणों में इनका निर्माण हुआ है। ऐसे में यहां पर शोध के लिए आने वाले शोधार्थी इस एक ही साइट पर साढ़े 6 करोड़ साल का भूगर्भीय इतिहास पढ़ पाएंगे। झालावाड़ जिले के मिश्रौली और उसके आसपास के क्षेत्र में कुदरत का एक अनमोल खजाना छुपा हुआ है। एक ऐसा खजाना जो पूरे राजस्थान में सिर्फ यहीं पर पाया जाता है। हम बात कर रहे हैं बैसाल्टिक रॉक्स यानी की बैसाल्ट की चट्टानों की, जो अपने आप में प्रकृति की एक अनूठी संरचना है। हाल ही में इसे इंटेक की 150 भू विरासत सूची में शामिल किया है। अब जियो साइट के रूप में विकसित होने के बाद यहां पर भू वैज्ञानिकों के साथ पर्यटक भी आएंगे। साथ ही यहां शोधार्थियों के लिए भी बड़े पैमाने पर सामग्री मिलेगी। इससे क्षेत्र में ग्राम पर्यटन के द्वार भी खुल सकेंगे। यह बड़ी उपलब्धि है कि इस क्षेत्र को इंटेक ने देशभर की 150 भू विरासत सूची में शामिल किया है। इससे क्षेत्र अब जल्द पर्यटन क्षेत्र के रूप में उभर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र में लोगों को भू विरासत तो देखने को मिलेगी। एग्रो टूरिज्म, ग्रामीण पर्यटन के दर्शन भी हो सकेंगे। यहां से कुछ ही दूरी पर कोल्वी, विनायका, हत्यागौड में बौद्धकालीन गुफाएं हैं , वहां तक भी पर्यटकों की पहुंच आसान हो सकती है। वैसे देश भर में मुंबई की गिलबर्ट हिल और कर्नाटक के सेंट मैरी आईलैंड बैसाल्ट की चट्टानों और उनसे जुड़े पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है किंतु मुंबई के गिलबर्ट हिल अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया, जिसके चलते वहां अब पर्यटक नहीं जाते, किंतु कर्नाटक के सेंट मेरी द्वीप में इस प्राकृतिक विरासत को सहेजा और संभाल गया है जहां वर्ष भर पर्यटकों की चहल पहल रहती है। पर्यटक दूर-दूर से इन चट्टानों को देखने पहुंचते हैं। बताया जाता है कि मध्यप्रदेश में भी कुछ स्थानों पर बेसाल्ट की चट्टानें पाई गई हैं जिन्हें भी लगातार पर्यटन से जोड़ने का प्रयास जारी है। झालावाड़ जिले के मिश्रौली गांव के चारों तरफ यही बेसाल्ट की चट्टानें बिखरी पड़ी है यहां पर बैसाल्ट का उत्खनन भी किया जाता है। वैज्ञानिक तथ्यों पर यदि बात करें तो बेसाल्ट की चट्टानें दरअसल ज्वालामुखीय चट्टानें हैं इनका निर्माण ज्वालामुखियों से निकलने वाले लावा के कारण हुआ है। बताया जाता है कि ज्वालामुखी के फटने के बाद जब उनका लावा तेजी से धरती की सतह पर फैला और धरती के संपर्क में आने के बाद वह जब तेजी से ठंडा हुआ तो इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप जमे हुए लावा में दरारें पड़ गई, जिनके के परिणाम स्वरुप यह चट्टानें इन अद्भुत आकृतियों में दिखाई देती हैं। कहीं यह स्तंभाकार संरचनाएं नजर आती है तो कहीं शतकोणीय संरचनाएं दिखती हैं। </p>
<p><strong>ऐसी है चट्टानें</strong><br />झालावाड़ का मिश्रोली प्रदेश में स्तंभाकार बेसाल्टिक चट्टानों वाली यह एकमात्र माइंस है और इसके आसपास क्षेत्र में लघु पहाड़ियों और पठार के क्षेत्र में स्तंभाकार बेसाल्टिक पत्थर की खदानें हैं। ये स्तम्भ सघन ज्वाइंट में महीन, दानेदार, गहरे काले रंग और ग्रे रंग के पत्थर से लावा के शीतलन और फ्रेक्चरिंग प्रक्रिया से बने हुए हैं। इन आग्नेय पत्थर की खदानों की ऊपरी परत गहरी और पिछली काली मिट्टी की बनी है।  मिश्रोली में मिलने वाले पत्थरों की खासियत यह है कि यहां पर खड़े और आड़े दोनों ही प्रकार के पत्थर मिलते हैं। इनका आकार 15 फीट लंबाई तक है जो देश में चुनिंदा स्थानों पर ही देखने को मिलता है। इतने बड़े आकर के पत्थर देश में चुनिंदा जगहों पर ही मिले हैं। </p>
<p><strong>पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाएगा</strong><br />इंटेक सह संयोजक मधुसूदन आचार्य ने बताया कि इतनी लंबाई की चट्टानें और पत्थर देश में अंधेरी मुंबई, आदिलाबाद, कोल्हापुर, पर्वतमाला क्षेत्र और मध्यप्रदेश के देवास के बंगार में ही मिलते हैं। विश्व में यह अमेरिका, इजराइल, हांगकांग, आस्ट्रेलिया, जापान में देखने को मिले हैं। पत्थरों को खनिज विभाग भवन निर्माण स्टोन की श्रेणी में मानता है। इनका निर्माण 6.5 करोड़ साल पहले माना जा रहा है।  विरासत को बचाने और पर्यटन के क्षेत्र में काम करने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था इंटक के कोआॅर्डिनेटर डॉक्टर मधुसूदन आचार्य कहते हैं कि अब बेसाल्ट माइंस साइट को पर्यटन से जोड़ने का बीड़ा इंटेक उठाया है। उन्होंने बताया कि यह बड़ी ही यूनिक साइट है तथा इसको पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिए प्रशासन और सरकार से लगातार समन्वय स्थापित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि बेसाल्ट माइंस और उसके आसपास के इलाके को जिओ साइट्स के रूप में डेवलप करने के प्रयास किया जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस इलाके को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाएगा तथा यहां पर्यटकों के आने की व्यवस्था हो पाएगी। साथ ही उन्होंने कहा कि कई विश्वविद्यालयों से बात चल रही है जो अपने शोधार्थी यहां पर भेजेंगे। उन्होंने बताया कि प्रशासन और सरकार के सहयोग से यहां एक इंटरप्रिटेशन सेंटर भी स्थापित किया जाएगा ताकि यहां आने वाले पर्यटकों और शोधाथीर्यों को संपूर्ण जानकारी है मौके पर ही मिल सके। झालावाड़ जिले के मिश्रौली में यह अदभुत तरह के बेसाल्टिक पत्थर निकलते हैं जो लंबाई में काफी अधिक हैं । प्रदेश में यह पहली माइंस है, जबकि देश और विदेशों में भी चुनिंदा स्थानों पर ऐसे पत्थर देखने को मिलते हैं। इस माइंस को यूनेस्को की साइट में शामिल करने की मांग की जा रही है। जियो साइट के रूप में भी इसे विकसित करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>झालावाड़</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/basaltic-rocks-will-be-developed-as-geo-site/article-73734</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/basaltic-rocks-will-be-developed-as-geo-site/article-73734</guid>
                <pubDate>Tue, 26 Mar 2024 18:24:47 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-03/belastic-chattane-hongi-geo-site-k-roop-me-viksit...mishroli%2C-jhalawar-news-26-03-2024.jpg"                         length="582023"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जामुनिया आईलैंड में दौड़ेगी बोट, बनेगा वॉच टावर </title>
                                    <description><![CDATA[जामुनिया आईलैंड को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/boat-will-run-in-jamunia-island-watch-tower-will-be-built/article-68859"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/untitled-design.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। पर्यटकों के लिए खुशखबरी है। कोटा-बूंदी की सीमा पर बसा हाड़ौती का इकलौता आईलैंड जामुनिया में जल्द ही बोटिंग करने का मौका मिलेगा। रामगढ़ टाइगर रिजर्व प्रशासन ने इसकी कवायद शुरू कर दी है। आईलैंड को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए आरवीटीआर ने कुछ प्रस्ताव बनाकर चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन को भेज दिए हैं तो कुछ पर काम चल रहा है। आईलैंड की सुरक्षा के लिए वॉच टावर व चौकी बनाने की तैयारियां की जा रही है। जल्द ही पर्यटकों को नदी किनारे घने जंगल और प्रकृति की खूबसूरत वादियों के बीच रोमांचित सफर का मौका मिल सकेगा।</p>
<p><strong>वॉच टावर व चौकी बनाने की तैयारी</strong><br />रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के डीएफओ संजीव शर्मा ने बताया कि जामुनिया आईलैंड हमारे अधिकार क्षेत्र में आता है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए कुछ प्रस्ताव बनाए भी है और कुछ तैयार कर फाइनल करने की तैयारी की जा रही है। सुरक्षा की दृष्टि से बूंदी के बीरज नौताड़ा गांव के पास चौकी बनाई जा रही है। वहीं, वॉच टावर बनाए जाने की योजना है। इस इलाके में संदिग्ध गतिविधियां रोकने के लिए नियमित पेट्रोलिंग भी की जा रही है। </p>
<p><strong>सबसे बड़ी कॉलोनी जामुनिया</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि जामुनिया आईलैंड ओपन बिल स्टॉर्क बर्ड्स की हाड़ौती में सबसे बड़ी कॉलोनी बन गई है। कोटा शहर से 36 किमी दूर बालापुरा गांव के पास चंबल के मध्य स्थित आईलैंड पर ओपन बिल स्टोर्क ने 400 से ज्यादा आशियाने बनाए हैं। गत वर्षों से इनकी वंशवृद्धि हुई अच्छी तादाद में हुई है। नीड़ बनाने के बाद से नन्हें मेहमानों से आबाद भी हो रहा है। </p>
<p><strong>रास आया जामुनिया</strong><br />जैदी के अनुसार जामुनिया आईलैंड में वर्ष 2015 में इन पक्षियों की संख्या करीब 600 थी, लेकिन चंबल में आई बाढ़ से इनके घौंसले उजड़ गए। वर्ष 2016 में इनकी संख्या 150 के करीब रह गई। अगले ही वर्ष 2017 में बढ़कर 200 हो गई थी इसके बाद 2018 में 250 के करीब नीड़ बने। वर्ष 2019 में इनकी संख्या में बढ़ोतरी हुई और 400 पहुंच गई थी। लेकिन इसी वर्ष में फिर से बाढ़ के कारण नीड़ नष्ट हो गए। इसके बाद फिर से ओपन बिल स्टॉर्क ने नीड़ बनाए। वर्तमान में इनकी संख्या करीब 450 से 500 के बीच हैं। </p>
<p><strong>मगरमच्छों से भरा है आईलैंड </strong><br />सर्दी में मगरमच्छ वन्यजीव प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। धूप सेकने के लिए व चंबल के मध्य इस दीप पर जमा हो जाते हैं। इन्हें देखने के लिए दूर दराज से लोग आते हैं। जिस तरह से यह द्वीप पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है, इसे पर्यटन स्थल घोषित किया जाना चाहिए। भरतपुर पक्षी विहार के बाद सबसे ज्यादा ओपन बिल स्टॉर्क हमारे जामुनिया द्वीप पर है। यहां सर्दियों में बड़ी संख्या देशी-विदेशी पक्षी आते  हैं। </p>
<p><strong>ओपन बिल स्टॉर्क की 1200 से ज्यादा पक्षियों का हैआशियाना </strong><br />स्थानीय निवासी पक्षी प्रेमी कन्यालाल कहते हैं, जामनिया आईलैंड में सिर्फ ओपन बिल स्टोर्क की आबादी नहीं है, बल्कि यहां 1200 से 1300 के करीब पक्षियों ने भी आशियाना बनाया हुआ है। इनमें नाइट हैरोन, लिटिल कॉरमोरेंट, लिटिल इग्रेट, केटल इग्रेट, ब्लेक हैडेड आईबीज समेत अन्य प्रजातियों के पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। जिन्हें देखने के लिए दूर-दराज से बड़ी संख्या में बर्ड्स वॉचर आते हैं। </p>
<p><strong>पानी में जमी काई,खनन पर लगे अंकुश</strong><br />वन्यजीव प्रेमियों ने बताया कि चंबल नदी में बसा जामुनिया में कई जगहों पर पानी में काई जम रही है, जो इसकी सुरंदता को बदरंग कर रही है। पर्यटन व रामगढ़ टाइगर रिजर्व प्रशासन को इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। वहीं,  रात को बजरी खनन भी होता है, जिस पर अंकुश लगाया जाए। संदिग्ध गतिविधियोें से पक्षी व मगरमच्छों का प्राकृतिक हैबीटॉट नष्ट हो रहा है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />जामुनिया आईलैंड चंबल घड़ियाल सेंचुरी में है, यह रामगढ़ टाइगर रिजर्व के दायरे में आता है। जामुनिया का कोटा में घघटाना से बालाजी इटावा तक का हिस्सा व बूंदी में केपाटन मंदिर से इंदरगढ़ तक का क्षेत्र रामगढ़ टाइगर रिजर्व में आता है। यहां ईको ट्यूरिज्म बढ़ाने के लिए प्रोजेक्ट तैयार किए हैं। बोटिंग शुरू करने के प्रयास  कर रहे हैं। प्रस्ताव बनाकर स्वीकृति के लिए भेजे हुए हैं। पर्यटन बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।</p>
<p><strong>- हरि सिंह हाड़ा, रेंजर एवं कार्यवाहक एसीएफ,रामगढ़ टाइगर रिजर्व</strong></p>
<p><br />जामुनिया द्वीप को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए पूर्व में भी विभाग को प्रस्ताव बनाकर भेजे थे। हाल ही में भारत सरकार की ग्रामीण पर्यटन प्रतियोगिता योजना में इसे शामिल किया है। ग्रामीण पर्यटन के लिहाज से जामुनिया का डेटा आॅनलाइन फिडिंग किया है। जल्द ही शहरवासियों को जामुनिया टूरिज्म स्थल के रूप में देखने को मिलेगा।<br /><strong>- संदीप श्रीवास्तव, जिला पर्यटन अधिकारी कोटा</strong></p>
<p>ईको ट्रिज्म बढ़ाने के लिए जामुनिया को डवलप करने का प्रोजेक्ट तैयार कर रहे हैं। हाल ही में आईलैंड का निरीक्षण भी किया था। यहां वॉच टावर, चौकी व बोटिंग की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसके लिए कुछ प्रस्ताव बनाए भी है और कुछ तैयार कर फाइनल करने की तैयारी में हैं। इसे बेहतरीन पर्यटन स्थल बनाएंगे।<br /><strong>- संजीव कुमार, उपवन संरक्षक, रामगढ़ टाइगर रिजर्व बूंदी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/boat-will-run-in-jamunia-island-watch-tower-will-be-built/article-68859</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/boat-will-run-in-jamunia-island-watch-tower-will-be-built/article-68859</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Feb 2024 14:47:45 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2024-02/untitled-design.jpg"                         length="35371"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नाटक ‘बगिया बांछाराम की’ में दिखा प्रकृति प्रेम</title>
                                    <description><![CDATA[राम सहाय पारीक निर्देशित नाटक एक गरीब वृद्ध किसान बांछाराम की धरती के प्रति प्रेम और संघर्ष की कहानी है। बांछाराम ने उम्र भर मेहनत करके अपनी बगिया को संजोए रखा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/natures-love-shown-in-the-play-bagiya-bancharam-ki/article-40224"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/site-photo-size-(9)3.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। नाटक ‘बगिया बांछाराम की’ का मंचन रवीन्द्र मंच के मिनी थिएटर में हुआ। राम सहाय पारीक निर्देशित नाटक एक गरीब वृद्ध किसान बांछाराम की धरती के प्रति प्रेम और संघर्ष की कहानी है। बांछाराम ने उम्र भर मेहनत करके अपनी बगिया को संजोए रखा है। वह महज आजीविका के लिए पेड़-पौधे नहीं उगाता। उसका धरती के प्रति श्रद्धा व प्रेम उसकी मेहनत के मूल में छिपी है। इस हरे-भरे बाग को कई लोग हड़पना चाहते हैं। गांव का पूर्व जमींदार छैकोड़ी इसी बाग की आस मन में लिए मर गया और अब भूत बनकर इसी बाग में रहता है। उसका बेटा नौकोड़ी अपने सहयोगी मुख्तार के साथ बगीचे को हथियाने की नई साजिश रचता है। इसी के ईद-गिर्द नाटक की कहानी घूमती है। इस नाटक में जहां एक ओर बांछा के प्रकृति प्रेम व जीने की इच्छा-शक्ति का चित्रण है, वहीं दूसरी ओर सामंतवादी दुष्चक्रों व धरती को व्यापार का साधन बनाने की मानसिकता व उपभोगवादी संस्कृति भी परिलक्षित होती है। इस पूरे कथानक को लेखक ने बहुत सुंदरता से हास्य के ताने-बाने से बुना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/natures-love-shown-in-the-play-bagiya-bancharam-ki/article-40224</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/natures-love-shown-in-the-play-bagiya-bancharam-ki/article-40224</guid>
                <pubDate>Sun, 19 Mar 2023 10:26:30 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-03/site-photo-size-%289%293.jpg"                         length="211557"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रकृति को संभालने की नीतियां बनाने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[ पचास वर्ष पूर्व तक भारत और भारत जैसे देशों में वैज्ञानिक औद्योगिक उन्नति अच्छी धारणा थी। भारत जैसे देशों के विपरीत पश्चिम के विकसित देशों में तो उन्नति की अच्छाई सौ-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व समाप्त हो गई थी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/need-to-make-policies-to-handle-nature/article-39310"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/a-63.png" alt=""></a><br /><p>दुनिया में प्रगति के दुष्परिणाम स्पष्ट दिखने लगे हैं। विभिन्न प्रगतिगत वस्तुएं एवं सुविधाएं सीमित व संतुलित रूप में तो वरदान होती हैं, परंतु असीम व असंतुलित रूप में इन्हें अभिशाप बनने में देर नहीं लगती। आज भी अनेक आधुनिक सुख-सुविधाएं अपनी विसंगतियों और आधिक्य के कारण जंजाल बन चुकी हैं। पचास वर्ष पूर्व तक भारत और भारत जैसे देशों में वैज्ञानिक औद्योगिक उन्नति अच्छी धारणा थी। भारत जैसे देशों के विपरीत पश्चिम के विकसित देशों में तो उन्नति की अच्छाई सौ-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व समाप्त हो गई थी। कहने का आशय यही है कि विज्ञान, उद्योग आधारित जो भी विकास दुनिया में हुआ वह प्रारंभ में ही ठीक लगता था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि वैज्ञानिक, आधुनिक, औद्योगिक उन्नति एक संतुलित सीमा में थी। तब ऐसी उन्नति के साथ पारंपरिक सादे जीवन का एक स्वाभाविक सामंजस्य भी कायम था। चूंकि तब आज वाली उन्नति, प्रगति और आधुनिक गतिविधि अधिक न थी तथा तत्कालीन लोगों ने उन्नतिकरण व प्रगतिशीलता को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना था इसीलिए जीवन में एक प्रकृति प्रदत्त रस, गंध, अनुभव व व्यवहार था। जीवन से मनुष्य को विशेष अनुराग था। जीवन का मानवीय लक्ष्य स्पष्ट था। परंतु आज हर मनुष्य, यहां तक कि सादा-जीवन जीने की उत्कट अभिलाषा रखने वाला मनुष्य भी चाहे-अनचाहे आधुनिक प्रगति का विकट विषदंश झेलने को विवश है।</p>
<p>घरों और कारखानों में चलने वाली छोटी-बड़ी विद्युत चालित मशीनें, दिन-रात सड़कों पर दौड़ते-भागते लाखों-करोड़ों वाहन, परस्पर संघषर्ण करते वाहनों के तरह-तरह के कल-पुर्जे, चौबीसों घंटे ध्वनि प्रदूषण फैलाते टेलीविजन और अन्य यंत्र, विवाह इत्यादि कार्यक्रमों में खुले में बजते डीजे की विकराल ध्वनियां, असभ्य लोगों की अनावश्यक बातों का हो-हल्ला, मोबाइल फोन की सम्पर्क-आवृत्तियां प्राप्त करने के लिए आवासीय नगरों-परिसरों पर स्थान-स्थान पर खड़े किए गए दूरसंचार कंपनियों के लंबे-लंबे टॉवरों, मोबाइल फोन से निकलने वाली स्वास्थ्यघाती विकिरणें, मोबाइल फोन पर इंटरनेट की सहायता से प्रसारित अनावश्यक चलचित्र (वीडियो), चित्र और सूचनाएं मनुष्य को जीता-जागता उपकरण बना चुकी हैं। मनुष्य की सामान्य प्राकृतिक दिनचर्या भी उसके वश में नहीं रही। वह मन ही मन में संकल्प कर, लाख चाह कर भी इन जंजालों व झंझावातों से नहीं छूट पा रहा।</p>
<p>भोग में अत्यधिक लिप्त मनुष्य एक प्रकार से ठीक है। कम से कम वह संवेदनशील, सज्जन और विवेकी मनुष्य की तरह इस चिंता में तो नहीं घुल रहा कि जीवन क्या से क्या हो चुका है। आगे मनुष्य का जीवन क्या दुर्गति झेलेगा और ऐसे में प्रकृति का असंतुलन कितना और कैसे बिगड़ेगा। यदि संवेदना के आधार पर विचारित प्रकृति की विपत्ति को देखें तो लगता नहीं कि आने वाला कोई भी दिन प्राकृतिक संतुलन और शांति का पर्याय होगा। आज वातावरण, पर्यावरण और जलवायु अप्रत्याशित ढंग से प्रदूषित हो रहे हैं। पर्यावरण की यह प्रवृत्ति हो चुकी है कि वह अधिक समय तक मलिन, अस्वच्छ और अनाकर्षक बना रहता है। पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, अग्नि जैसे पंचतत्व अपनी प्राकृतिक विशेषता एवं प्रभाव खो चुके हैं। ऋतुएं स्वाभाविक-नैसर्गिक सौंदर्य से विमुख हो चुकी हैं। वसंत जैसी ऋतु भी धुंधीली, काली-कसैली होकर धुंध व धुंए में लिपटी हुई है। फाल्गुन भी जलवायु संकट की भेंट चढ़ चुका है। होली जैसा असीम उमंग और हर्षोल्लास का त्योहार आज अवकाश व व्यवसाय की औपचारिकता मात्र रह गया है। ऋतुओं का जो ऋतुगामी उत्सव और उपयोगिता एक अद्वितीय सम्मोहन के साथ कभी मनुष्य के लिए विद्यमान होती थी, अब वह नहीं है। हालांकि इस मशीनी, आधुनिक, भोगोपभोगी युग में स्वयं मशीन बन चुके अधिसंख्य मनुष्यों के लिए प्रकृति, ऋतु, पर्यावरण और जलवायु विकार कोई चिंता की बात नहीं है, परंतु चेतनशील और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि रखने वाले मनुष्य लिए यह सब प्रतिकूल घटनाएं अत्यंत चिंतनीय हैं।</p>
<p>जीवन की यह आधुनिक दुर्गति मानव को दोहरी मार दे रही है। पहली, शहरीकरण और निर्माण-विनिर्माण से वन-सम्पदा कटती जा रही है। वृक्ष-वनस्पतियां नष्ट होती जा रही हैं। प्रकृति की अपने ही पंचतत्वों को संभालने की प्रक्रिया शक्तिहीन हो रही है। परिणामस्वरूप, ग्रीष्म ऋतु में अधिक ताप होना, शीत ऋतु में असहनीय शीताधिकता होना, पेयजल संकट उत्पन्न होना, जल संकट होना या सुनामी इत्यादि आपदाओं के रूप में चहुं ओर जलजला होना, शुÞद्ध व मिलावट रहित खाद्यान्न उत्पादन में कमी होना और उत्पादित खाद्यान्न में पोषक तत्वों का न होना जैसे जीवनघाती लक्षण उभर रहे हैं। दूसरी, प्रगति की वैश्विक गतिविधियों के सम्मिलित दबाव में पृथ्वी पर प्रकृति को साकार करने में साक्षात भूमिका निभाने वाले वन निरंतर कम हो रहे हैं। चारों ओर सीमेंट, पत्थर, लौह, स्टील, प्लास्टिक और अन्य धातुओं के संयोजन से अप्राकृतिक निर्माण का जोर है। ऐसे में जीवन का विशेषकर मनुष्य जीवन का प्राकृतिक अर्थ क्या रह जाता है! इस पर विश्व के पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और धनिक वर्ग को गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करना चाहिए। <br />           </p>
<p>-<strong>विकेश कुमार बडोला</strong><br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/need-to-make-policies-to-handle-nature/article-39310</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/need-to-make-policies-to-handle-nature/article-39310</guid>
                <pubDate>Thu, 09 Mar 2023 10:34:01 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-03/a-63.png"                         length="325225"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        