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                <title>10 साल के दर्शिल नागर सीनियर तीरंदाजी में दिखाएंगे दम</title>
                                    <description><![CDATA[दर्शील नागर ने महज 7.5 साल की उम्र से ही तीर चलाना शुरू कर दिया था। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/10-year-old-darshil-nagar-will-show-his-prowess-in-senior-archery/article-91825"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/4427rtrer-(3)6.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कहते हैं कि काबिलियत और प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती और पूत के लक्षण पालने में ही दिख जाते हैं। इन्हीं कहावतों के उदाहरण के कोटा के दर्शील नागर जो हैं तो सिर्फ 10 साल के लेकिन खेलेंगे सीनियर प्रतियोगिता में। दर्शील इससे पहले भी राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर सीनियर वर्ग में खेल चुके हैं। जिस उम्र में बच्चे मां की गोद से नहीं उतरा करते हैं, उस उम्र में दर्शील तीरंदाजी में राज्य स्तर प्रतियोगिता में सिल्वर पदक जीत चुके हैं। जिसके बाद इस बार फिर से प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए जयपुर पहुंच चुके हैं।</p>
<p><strong>साढ़े सात साल की उम्र से चलाना शुरू किया तीर</strong><br />दर्शील नागर ने महज 7.5 साल की उम्र से ही तीर चलाना शुरू कर दिया था। जिसके बाद नियमित अभ्यास कर रहे हैं। दर्शील के पिता वीरेंद्र नागर ने बताया कि दर्शील घर पर अपनी बहन के साथ अकेला रहता था तो मोबाइल और टीवी देखने की आदत पड़ने लग गई थी। जिसके बाद हमने आदत को खत्म करने के लिए इसे अलग अगल खेलों में खेलने के लिए भेजा तो दर्शील ने सबसे ज्यादा रूची तीरंदाजी में दिखाई। जिसके बाद इसे छावनी स्थित श्री पंचमुखी तीरंदाजी अकेडमी में भर्ती करा दिया। जहां लगातार अभ्यास करने के बाद एक साल में ही दर्शील ने राज्य स्तरीय में पदक जीत लिया। दर्शील छोटी सी उम्र में ही आॅलंपिक जाने की इच्छा रखता है और उसके लिए मेहनत भी खूब करता है।</p>
<p><strong>सुबह तीरंदाजी फिर स्कूल  शाम को तीरंदाजी</strong><br />मात्र 10 के दर्शील नागर एक वयस्क खिलाड़ी की तरह अपना रूटीन फॉलो करते हैं। कोच बृजपाल सिंह ने बताया कि दर्शील सुबह 5 बजे ही उठ जाते हैं जिसके बाद वार्म अप और स्ट्रेचिंग कर 7.30 बजे स्कूल की ड्रेस में ही अकेडमी पहुंच जाते हैं। जहां लगभग दो घंटे का अभ्यास करने के बाद दर्शील स्कूल चला जाता है। वहीं स्कूल से दो बजे घर आने के बाद खाना खाकर थोड़ा आराम कर शाम को 4 बजे अकेडमी पहुंच जाता है। जहां 7 बजे तक फिर से अभ्यास करता है। दर्शील के पिता वीरेंद्र नागर ने बताया कि दर्शील तीरंदाजी के लिए इतना प्रतिबद्ध है कि वो ना टीवी देखता है और ना मोबाइल चलता है, साथ ही डाइट का भी खुद से ही ध्यान रखता है और एक समय केवल दलिया और रबड़ी लेता है।</p>
<p><strong>कोटा से ये खिलाड़ी भी लेंगे भाग</strong><br />तीरंदाजी कोच बृजपाल सिंह ने बताया कि राजस्थान आर्चरी एसोसिएशन की ओर से आयोजित तीरंदाजी टूनार्मेंट में कोटा से इंडियन राउंड में देवरत सिंह जादौन, स्वतंत्र सिंह, मनीष खटीक, सूर्यांशु राजावत, विनय वर्मा, खुशी राठौर तथा रिकवर राउंड में समर सिंह, कार्तिक सुवालका, शिवम गुर्जर, मयंक परिहार एवं कंपाउंड राउंड में दर्शील नागर, अरविंद सैनी के साथ बालिका वर्ग में लहर कछावा, हिमांशी राजावत भाग लेंगे। वहीं लहर कछावा हाड़ौती क्षेत्र की पहली ऐसी प्लेयर हैं जो एक महीने पहले एशियन गेम्स का ट्रायल भी दे चुकी हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Sep 2024 16:06:25 +0530</pubDate>
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                <title>Indian Cinema को मृणाल सेन ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिलायी विशिष्ट पहचान</title>
                                    <description><![CDATA[फिल्म के क्षेत्र में मृणाल सेन अपने करियर की शुरूआत कोलकाता फिल्म स्टूडियो में बतौर ऑडियो टेकनिशियेन से की। बतौर निर्देशक मृणाल सेन ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म ''रात भौर'' से की। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/mrinal-sen-gave-special-recognition-to-indian-cinema-at-the/article-77966"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/mrinal-sen.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। भारतीय सिनेमा जगत में मृणाल सेन का नाम एक ऐसे फिल्मकार के तौर पर शुमार किया जाता है, जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिये भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई। </p>
<p>14 मई 1923 को फरीदाबाद अब बंगलादेश में जन्में मृणाल सेन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा फरीदाबाद से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने कलकता के मशहूर स्काटिश चर्च कॉलेज से आगे की पढ़ाई पूरी की। इस दौरान वह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद मृणाल सेन की रूचि फिल्मों के प्रति हो गयी और वह फिल्म निर्माण से जुड़े पुस्तकों का अध्यन करने लगे। इस दौर में वह अपने मित्र ऋतविक घटक और सलिल चौधरी को अक्सर यह कहा करते कि भविष्य में वह अर्थपूर्ण फिल्म का निर्माण करेगे लेकिन परिवार की आर्थिक स्थित खराब रहने के कारण उन्हें अपना यह विचार त्यागना पड़ा और मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव के रूप में काम करना पड़ा। लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका मन इस काम में नही लगा और उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी।</p>
<p>फिल्म के क्षेत्र में मृणाल सेन अपने करियर की शुरूआत कोलकाता फिल्म स्टूडियो में बतौर ऑडियो टेकनिशियेन से की। बतौर निर्देशक मृणाल सेन ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म ''रात भौर'' से की। उत्तम कुमार अभिनीत यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह नाकाम साबित हुयी।</p>
<p>वर्ष 1958 में मृणाल सेन की ''नील आकाशे नीचे'' फिल्म प्रदर्शित हुयी। फिल्म की कहानी एक ऐसे चीनी व्यापारी वांगलु पर आधारित होती है, जिसे कलकता में रहने वाली बसंती अपने वामपंथी विचारधारा के जरिये प्रभावित करती है और वह अपने देश जाकर अपने साथियों के साथ मिलकर जापानी सेना विरूद्ध साथ छेड़े गये मुहिम में शामिल हो जाता है। फिल्म में वांगलु के किरदार की भूमिका में काली बनर्जी ने निभायी, जबकि बसंती का किरदार मन्जू डे ने निभायी। यूं तो फिल्म के सारे गीत लोकप्रिय हुये लेकिन खास तौर पर हेमंत मुखर्जी की आवाज में रचा बसा यह गीत वो नदी रे एकती कथा सुधाई रे तोमारे, श्रोताओं के बीच आज भी शिद्धत के साथ सुने जाते हैं। फिल्म जब प्रदर्शित हुयी तो फिल्म में वामपंथी विचारधारा को देखते हुये इसे दो महीने के लिये बैन कर दिया गया। फिल्म की सफलता के बाद वह कुछ हद तक बतौर निर्देशक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुये।</p>
<p>मृणाल सेन की अगली फिल्म ''बैसे श्रवण'' वर्ष 1960 में प्रदर्शित हुयी। फिल्म की कहानी वर्ष 1943 में बंगाल में हुये भयंकर अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित होती है, जिसमें लगभग पांच लाख लोग अकाल और भूखमरी से मारे गये थे। फिल्म की कहानी की मुख्य पात्र माधवी मुखर्जी ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जो अपनी उम्र से काफी बड़े युवक के साथ शादी कर अपना वैवाहिक जीवन बीता रही थी इसी बीच द्वितीय विश्वयुद्ध और अकाल ने उसका वैवाहिक जीवन बिखर जाता है। बाद में महिला खुद को फांसी लगा लेती है। फिल्म ''बैसे सावन'' की सफलता के बाद मृणाल सेन ने पांच अन्य फिल्मों का भी निर्माण किया, लेकिन ये सभी न तो व्यवसायिक तौर पर सफल हुयी और ना ही समीक्षकों को पसंद आई। इसके बाद मृणाल सेन ने वर्ष 1966 में उड़िया भाषा में ''माटिर मनीषा'' फिल्म का निर्माण किया लेकिन यह फिल्म भी टिकट खिड़की पर असफल साबित हुयी। इन फिल्मों की असफलता के बाद निर्माताओं ने उनसे मुंह मोड़ लिया और अपनी फिल्मों में बतौर निर्देशक काम देना बंद कर दिया।</p>
<p>वर्ष 1969 में एन.एफ.डी.सी की सहायता से मृणाल सेन ने फिल्म ''भुवन सोम'' का निर्माण किया। फिल्म की कहानी भुवन सोम नामक एक ऐसे कठोर और अनुशासनप्रिय अधिकारी पर आधारित होती है, जिसे गांव जाने का मौका मिलता है। वहां के वातावरण में उसकी छवि में परिवर्तन हो जाता है। वह सबसे समान भेदभाव बरतने लगता है। फिल्म में भुवन सोम के किरदार में उत्पल दत्त ने निभायी। इस फिल्म से जुड़ा रोचक तथ्य यह भी है कि इसी फिल्म में अमिताभ बच्चन ने पहली बार अपनी आवाज दी थी। भुवन सोम के बाद मृणाल सेन ने ''इंटरव्यू 1971'', ''कोलकाता 71''1972, और ''पदातिक'' 1973 जैसी सफल फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों के बाद उनकी छवि एक ऐसे फिल्मकार के रूप में बन गयी, जो अपनी फिल्म में वामपंथी विचारधारा से प्रभावित राजनीति को अपनी फिल्म के जरिये पेश करते थे । </p>
<p>वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म ''मृगया'' मृणाल सेन के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में एक है। फिल्म में मृगया की टाईटिल भूमिका मिथुन चक्रवर्ती ने निभायी थी। उन्हें अपने दमदार अभिनय के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह मिथुन चक्रवर्ती के करियर की पहली फिल्म थी। वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म ''अकालेर साधने'' मृणाल सेन के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में एक है। मृणाल सेन निर्देशित इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और निर्देशन के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था। इसके अलावा बर्लिन फिल्म फेस्टिबल में भी इसे सम्मानित किया गया।</p>
<p>वर्ष 1982 में प्रदर्शित फिल्म ''खारिज'' मृणाल सेन के सिने करियर की हिट फिल्म में शुमार की जाती है। फिल्म की कहानी एक ऐसे मध्यम वर्गीय परिवार के इर्द गिर्द घूमती है, जिसका युवा नौकर रसोईघर में दम घुटने से मर जाता है। इस कारण उनका परिवार तनावग्रस्त हो जाता है। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये अंजन दत्ता और ममता शंकर कांस फिल्म फेस्टिबल में ज्यूरी पुरस्कार से सम्मानित किये गये । मृणाल सेन को अपने चार दशक लंबे सिने करियर में मान-सम्मान खूब मिला। वर्ष 1981में मृणाल सेन को पदमभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2005 को फिल्म उद्योग के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन सबके साथ ही मृणाल सेन को उनकी फिल्मों के लिये कांस, बर्लिन, शिकागो, वेनिस जैसे कई फिल्म पेस्टिबल में विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के साथ ही वह समाज सेवा के लिये वर्ष 1998 से 2003 तक राज्य सभा सदस्य भी रह चुके हैं ।</p>
<p><strong>कान्स से था मृणाल सेन का गहरा कनेक्शन<br /></strong>मृणाल सेन वर्ष 1982 कान्स में मेंबर ऑफ जूरी के तौर पर गए थे। वहां पर नॉवेलिस्ट गेब्रियल, गेर्सिया माक्र्वेज भी जूरी का हिस्सा थे। इस दौरान दोनों की काफी अच्छी बॉडिंग हो गई थी। बाद में दोनों ने हवाना में एक फिल्म स्कूल में काफी समय साथ वक्त बिताया। वर्ष 2010 में कान्स ने डिसाइड किया कि मृ़णाल सेन की फिल्म खानदान की स्क्रीनिंग कान्स क्लासिक सेक्शन में की जाएगी। हालांकि वह कान्स का हिस्सा नहीं बन पाये।</p>
<p>बहुमुखी प्रतिभा के धनी मृणाल सेन फिल्म निर्माण की कोई भी विद्या अछूती नहीं रही। उन्होंने फिल्म निर्माण और निर्देशन के अलावा कई फिल्मों की कहानी और स्क्रीन प्ले भी लिखा। वर्ष 2004 में उनकी आत्मकथा ''आलवेज बिंग बार्न'' प्रकाशित हुयी। वर्ष 2009 में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिबल ऑफ केरल ने जब लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार की घोषणा की और मृणाल सेन वह पहले व्यक्ति बने जिन्हें लाइफ टाईम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मनित किया। </p>
<p>30 दिसंबर 2018 को म़ृणाल सेन का निधन हो गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 May 2024 15:40:28 +0530</pubDate>
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                <title>जमीन पर प्रैक्टिस के बाद भी बॉक्सिंग में रिंग के मास्टर्स को धूल चटाई है कोटा की बेटियों ने </title>
                                    <description><![CDATA[कोटा की कई बेटियों ने बॉक्सिंग की रिंग में अपनी ताकत दिखाई है लेकिन महक शर्मा, निशा गुर्जर, इशा गुर्जर, नीलम कुमावत, दिव्यांशी और अरूंधति चौधरी ये वो नाम हैं जिन्होंने बॉक्सिंग में वो मुकाम हांसिल किया है जिसके लिए लड़कों को भी काफी इंतजार करना पड़ता है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/even-after-practicing-on-the-ground--the-daughters-of-kota-beat-the-masters-of-the-ring-in-boxing/article-43553"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-04/manoj-(630-×-400-px)-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा । जिस बॉक्सिंग को लड़कों की बादशाहत वाला खेल माना जाता है, उसी बॉक्सिंग में कोटा की बेटियों ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कई खिलाड़ियों को धूल चटाई है। कोटा की एक बेटी तो इंटरनेशनल लेवल पर 8 गोल्ड, 1 सिल्वर और एक कांस्य पदक जीत चुकी हैं। इसके अलावा भी हमारे शहर की कई लड़कियों ने राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इस खेल मे धमाल मचाया है। कोटा के बॉक्सिंग परिणामों को देखने के बाद केन्द्र सरकार और राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद की ओर से कोटा में बॉक्सिंग सेंटर खोला जा रहा है। बॉक्सिंग  में नाम कमाने वाली इन बेटियों को इस खेल में निपुणता देने वाले बताते हैं कि ये बेटियां जमीन पर ही प्रैक्टिस करती हैं। इनके लिए सरकार की ओर से अभ्यास के लिए रिंग उपलब्ध करवाई गई है और ना बॉक्सिंग किट। इसके बाद भी कोटा की बेटियों के पंच से बॉक्सिंग में हाड़ौती को विश्वस्तर पर पहचान मिली है। वैसे तो कोटा की कई बेटियों ने बॉक्सिंग की रिंग में अपनी ताकत दिखाई है लेकिन महक शर्मा, निशा गुर्जर, इशा गुर्जर, नीलम कुमावत, दिव्यांशी और अरूंधति चौधरी ये वो नाम हैं जिन्होंने बॉक्सिंग में वो मुकाम हांसिल किया है जिसके लिए लड़कों को भी काफी इंतजार करना पड़ता है। </p>
<p>प्रशिक्षक बताते हैं कि शुरूआती दौर से लेकर अब क्षेत्र की करीब 250 लड़कियां बॉक्सिंग का अभ्यास कर चुकी हैं। इनमें से 45 ने स्टेट, 5 ने नेशनल और 4 ने इंटरनेशनल लेवल पर इस खेल में अपना वर्चस्व स्थापित किया है। फिलहाल करीब 40 लड़कियां नियमित रूप से अभ्यास कर रही हैं। इस खेल में कोटा को पहला गोल्ड अरूंधति चौधरी ने दिलवाया था। कोटा की इसी बेटी को साल 2018 में बेस्ट बॉक्सर ऑफ एशिया का खिताब भी मिल चुका है। इसके अलावा दो बहने ईशा व निशा गुर्जर किसान परिवास से होने के बावजूद भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बॉक्सर का खिताब अपने नाम कर चुकी हैं। </p>
<p>प्रशिक्षकों का कहना हैं कि कोटा की अधिकांश लड़कियां नयापुरा स्थित स्टेडियम में रोजाना करीब 3 से 4 घंटे जमकर पसीना बहाती हैं। बॉक्सिंग के अभ्यास के दौरान इन लड़कियों का जोश देखकर लगता है कि अगर इनको उचित कोचिंग और नवीन उपकरणों सहित कुछ अन्य सुुविधाएं मिल जाए तो ये लड़कियां इंटरनेशनल लेवल पर नियमित रूप से कोटा के नाम की धाक जमा सकती हैं। सबसे बढ़िया बात ये है कि इन लड़कियों को इनके माता-पिता पूरा सहयोग करते हैं और जहां तक संभव हो सकता है इनको अभ्यास के लिए संसाधन उपलब्ध करवाते हैं। </p>
<p>इन लड़कियों में इतनी ताकत है कि ये विश्व स्तर पर जब चाहे अपने नाम कई कीर्तिमान स्थापित कर सकती हैं लेकिन इनके लिए सरकार की ओर से कोई पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं करवाए गए हैं लेकिन अब बॉक्सिंग सेंटर खुलने के बाद शायद कोटा की इन बेटियों को संसाधनों की उपलब्धता हो जाए। <br /><strong>अशोक गौतम, कोच। </strong></p>
<p>इंटरनेशनल और नेशनल लेवल पर तो मेडल जीत चुकी हूं अब तो देश के लिए ओलम्पिक में पदक जीतना मेरा लक्ष्य और सपना है। राष्टÑीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रदर्शन कर चुकी है। हमेशा यही सोचकर रिंग में उतरी हूं कि मुझे जीतना ही है। <br /><strong>अरूंधति चौधरी, बॉक्सर </strong></p>
<p>मैं लगातार 5 साल से बॉक्सिंग का अभ्यास कर रही हूं। भाई भी बॉक्सिंग की करता है उससे प्रेरणा लेकर ही इस खेल को अपनाया है। एक बार सिल्वर और एक बार कांस्य पदक जीत चुकी हूं। माता-पिता पूरा सपोर्ट करते हैं। पहले पढ़ाई पर प्रैक्टिस का थोड़ा बहुत फर्क पड़ता था लेकिन बाद में सब मेनैज कर लिया। इंडिया को ओलम्पिक में पदक दिलवाना मेरा लक्ष्य और सपना है।         <br />   <strong> महक शर्मा, बॉक्सर </strong></p>
<p>वर्ष 2018 से ही बॉक्सिंग का अभ्यास कर रही हूं। पहले ताइक्वांडो खेलती थी। कोच सर और पापा ने बॉक्सिंग की ट्राई करने की कही उसके बाद इस खेल को अपना लिया। रोजना 5 घंटे प्रैक्टिस करती हूं। पढ़ाई और खेल के बीच समय को लेकर तालमेल बिठाना ही पड़ता हैं। पोलेन्ड में वर्ल्ड चैंपियनशिप में भागीदारी कर चुकी हूं। माता-पिता का हमेशा सपोर्ट रहता है। परिजनों की ओर से कोई पाबंदी नहीं है।          <br />  <strong>   निशा गुर्जर, बॉक्सर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Apr 2023 16:28:27 +0530</pubDate>
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                <title>सरकारी सुविधाओं के अभाव में भी कुश्ती और जूड़ो में दम दिखा रही हैं बेटियां</title>
                                    <description><![CDATA[शहर के जिन स्थानों पर ये बेटियां  देश का नाम रोशन करने के लिए अपना समय दे रही है,मेहनत कर रही है वहां इनको सरकार की ओर से कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। हाल ही में शिवरात्रि पर मंगलेश्वरी व्यायामशाला में रखी गई हाड़ौती केसरी दंगल प्रतियोगिता में इशिता राठौड़ ने हाड़ौती केसरी का खिताब अपने नाम किया था। इसी खिलाड़ी ने साल 2020 में दिल्ली में आयोजित राष्टÑीय स्तर की प्रतियोगिता में कांस्य पदक और इसी वर्ष खेलो इंडिया में  भी कांस्य पदक जीता है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/even-in-the-absence-of-government-facilities--daughters-are-showing-strength-in-wrestling-and-judo/article-39564"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/sarkari-suvidhao-k-abhav-mei-bhi-kushti-aur-judo-mei-dum-dikha-rahi-betiya...kota-news.11.3.2023.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। भले ही पढ़ाई के साथ कोई समझौता करने पड़े, सुविधाएं मिले या ना मिले लेकिन कोटा की बेटियां बीते कई सालों से अपने कोच और आत्मविश्वास के सहारे कुश्ती और जूड़ों में कुछ खिलाड़ियों मसलन बबीता फोगाट, गीता फोगाट तथा साक्षी मलिक के समान अन्तरराष्टÑीय स्तर पर कोटा की पहचान बनाने की प्रयास कर रही है और बीते सालों में कुछ ने पहचान बनाने में सफलता हांसिल भी की है। चूकि ये दोनों ही खेल लगभग समान है तो बेटियां दोनों की प्रैक्टिस करने में खूब पसीना बहा रही हैं। मगर अफसोस की कि शहर के जिन स्थानों पर ये बेटियां अपने देश का नाम रोशन करने के लिए अपना समय दे रही है,मेहनत कर रही है वहां पर इनको सरकार की ओर से कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। बताया जाता है कि इस समय कोटा में महावीर नगर व्यायामशाला, मंगलेश्वरी व्यायामशाला और बजरंग व्यायामशाला सहित अन्य एक दो स्थानों पर नियमित रूप से कुश्ती और जूड़ों की प्रैक्टिस कर रही है। अनुमानत: इन सभी स्थानों पर तकरीबन 45 से 50 लड़कियां रोजाना एक तय समय पर प्रैक्टिस के लिए जाती हैं और वहां जमकर पसीना बहाती है। वहां पर कोच की भूमिका निभाने वाले इनका प्रैक्टिस करने में पूरा सहयोग करते हैं, जो सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध होते हैं वो देते हैं और बताते हैं कि ये अन्तरराष्टÑीय स्तर पर किस तरह से अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो सकेंगी। ये कोच प्रैक्टिस के दौरान ही नहीं बल्कि मैदान के बाहर भी इन लड़कियों को मानसिक रूप से सुदृढ़ करने का प्रयास करते हैं। </p>
<p>कोटा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहला मेडल और वो गोल्ड साल 1997 में रजनी शर्मा ने जीता था जब देश में महिला कुश्ती की शुरुआत हुई ही थी। उसके बाद कई शहर की खिलाड़ियों ने जिला, राज्य, राष्टÑीय तथा अन्तरराष्टÑीय स्तर पर कोटा के लिए मेडल जीते और शहर के साथ अपने गुरु, कोच का भी नाम रोशन किया। बताया जाता है कि अगस्त 2005 में मात्र 16 वर्ष की उम्र में रेखा राठौड़ नाम की खिलाड़ी ने पहले राष्टÑीय स्तर पर मेडल जीता और उसके बाद इसी साल जापान में हुए सब जूनियर केडेट में सिल्वर मेडल हांसिल किया था। इस प्रतियोगिता की विशेष बात ये थी कि प्रतियोगिता से राठौड़ और पूर्व ओलम्पियन साक्षी मलिक के बीच ट्रायल करवाई गई थी जिसमें राठौड़ ने मलिक को पटखनी दी थी। इसी प्रतियोगिता में मलिक के साथ कोटा की ही मीनाक्षी गर्ग ने देश का प्रतिनिधित्व किया था लेकिन वो कोई मेडल नहीं जीत पाई थी। इसी प्रकार मोनिका मालव नाम की एक और कोटा की खिलाड़ी ने बेलारूस में देश का प्रतिनिधित्व किया था। हाल ही में गत शिवरात्रि पर मंगलेश्वरी व्यायामशाला में रखी गई हाड़ौती केसरी दंगल प्रतियोगिता में इशिता राठौड़ ने हाड़ौती केसरी का खिताब अपने नाम किया था।</p>
<p><strong>जीते पदक</strong><br />इसी खिलाड़ी ने साल 2020 में दिल्ली में आयोजित राष्टÑीय स्तर की प्रतियोगिता में कांस्य पदक और इसी वर्ष खेलो इंडिया में  भी कांस्य पदक जीता है। ये खिलाड़ी नियमित रूप से मंगलेश्वरी व्यायामशाला में पै्रक्टिस करती थी लेकिन अभी कुछ माह पूर्व राज्य सरकार की ओर से चयन होने बाद ये भोपाल की साई अकादमी में प्रक्टिस कर रही है। जहां का सारा खर्चा सरकार वहन कर रही है। इसी सूची में एक नाम ज्योति गोयल का भी आता है। जिसने वर्ष 2019 में चूरू और 2021 में श्रीगंगानगर में आयोजित राज्य स्तरीय जूड़ो प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल हांसिल किए थे। वहीं इन खेलों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इन खेलों को लेकर कोटा की बेटियों का भविष्य बहुत अच्छा है। बीते कुछ सालों से इन खेलों के प्रति लड़कियों की रूचि काफी बढ़ी है। ये बताते हैं कि जिस मेहनत और लगन के साथ बीते कुछ सालों से यहां की लड़कियां मेट पर अपना पसीना बहा रही है उसे देखते हुए आने वाले समय में निश्चित रूप से ये कोटा ही नहीं बल्कि देश का नाम रोशन करेंगी। इनको अगर सरकार की ओर से कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाए तो ये खिलाड़ी ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।</p>
<p>मैं बीते पांच सालों से कुश्ती और जूड़ों की प्रक्टिस कर रही हंू। पापा से प्रेरणा लेकर ही मेरा इन खेलों की ओर ध्यान गया है। परिवार वालों की पूरा सपोर्ट मिलता है। घर वाले तो चाहते ही यहीं है कि बस मैं खेलती रहूं। प्रतिदिन करीब 3 घंटे प्रेक्टिस करती हूं। लेकिन इन खेलों के कारण पढ़ाई को पूरा समय नहीं दे पाती हंू। यहां पर तो डाइट नहीं मिलती लेकिन अभी भोपाल में जहां में प्रेक्टिस कर रही हूं वहां सभी सुविधाएं मिल रही हैं। इशिता राठौड़। ं मैं बीते पांच सालों से कुश्ती और जूड़ों की प्रक्टिस कर रही हंू। पापा से प्रेरणा लेकर ही मेरा इन खेलों की ओर ध्यान गया है। परिवार वालों की पूरा सपोर्ट मिलता है। घर वाले तो चाहते ही यहीं है कि बस मैं खेलती रहूं। प्रतिदिन करीब 3 घंटे प्रेक्टिस करती हूं। लेकिन इन खेलों के कारण पढ़ाई को पूरा समय नहीं दे पाती हंू। यहां पर तो डाइट नहीं मिलती लेकिन अभी भोपाल में जहां में प्रेक्टिस कर रही हूं वहां सभी सुविधाएं मिल रही हैं। <br /><strong>-इशिता राठौड़। </strong></p>
<p>वर्तमान समय में पढ़ाई में बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्द्धा हो गई है लेकिन गेम्स में बहुत स्कोप हैं। लगभग 5-6 साल पहले मंगलेश्वर व्यायामशाला में यूंही गई थी तो वहां का माहौल, वहां लड़कियों को प्रक्टिस करते देख बहुत अच्छा लगा और उसके बाद से ही इन खेलों में रूचि बढ़ी और तक से ही लगभग 4 घंटे प्रेक्टिस कर रही हूं। प्रक्टिस और पढ़ाई के बीच सामंजस्य बनाना पड़ता हैं। कोच का बहुत अच्छा सपोर्ट मिलता है। <br /><strong>-ज्योति गोयल। </strong></p>
<p><strong>इनका कहना हैं</strong><br />कुश्ती और जूड़ो में कोटा की लड़कियां बहुत मेहनत कर रही है। लड़कियां लड़कों से बहुत आगे निकल चुकी है। उसका कारण ये है कि लड़कियां एकाग्रचित्त वाली होती है। ये लक्ष्य से कभी नहीं भटकती है और अपना बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करती हैं। <br /><strong>-आई.के.दत्ता,अध्यक्ष जिला कुश्ती संघ, कोटा </strong></p>
<p>बच्चों के परिजनों का पूरा सहयोग मिले तो ये और बढ़िया प्रदर्शन कर मेडल हांसिल कर सकती है। जो लड़किया अपने यहां की व्यायामशाला या अन्य जगहों से इन खेलों में बेहतर प्रदर्शन करके निकली है वो लगभग सभी आज पीटीआई बन चुकी हैं। व्यायामशालाओं में प्रक्टिस करने वाली लड़कियों को सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं मिलती है। सारी व्यवस्थाएं अपने स्तर पर ही करनी होती हैं। <br /><strong>-भानुप्रताप सिंह, कोच</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Mar 2023 15:41:20 +0530</pubDate>
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