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                <title>foreign birds - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>यूरोप व सेंट्रल एशिया से 10 हजार किमी का सफर कर कोटा पहुंचे विदेशी परिंदे, पक्षियों की चहचहाट से गुलजार हो रहे वेटलैंड</title>
                                    <description><![CDATA[विदेशी परिंदों को रास आ रही कोटा की आबोहवा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/foreign-birds-have-traveled-10-000-kilometers-from-europe-and-central-asia-to-kota--filling-wetlands-with-their-chirping/article-135158"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)-(5)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों किमी का सफर कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। इन दिनों शहर के वेटलैंड विदेशी परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कजाकिस्तान से रूस सहित कई देशों से बड़ी संख्या में पक्षी माइग्रेट कर शिक्षा नगरी की आबो-हवा में परवाज भर रहे हैं। यूरोपियन व एशियाई देशों में बर्फबारी होने से अपने अनुकूल वातावरण व भोजन की तलाश में यह परिंदे सात समंदर पार कर देश के विभिन्न राज्यों में अपना आशियाना बना रहे हैं। वहीं, कोटा के दो दर्जन से अधिक वेटलैंड पर देसी-विदेशी पक्षियों का कलरव चहकने लगा है।</p>
<p><strong>यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से आए पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, विदेशी पक्षियों का कारवां यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से कोटा पहुंचे हैं। इनमें कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, साइबेरिया, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, स्वजरलैंड, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस सहित करीब एक दर्जन देशों से 10 हजार एयर किमी का सफर कर बड़ी संख्या में मेहमान प्रवास पर आए हैं। वर्तमान में कॉमन कूट, स्पोर्ट बिल परपल, मुरहेंन रुद्दी शेल डक, वाइट आई पोचर्ड, स्पून बिल, सारस क्रेन, बारहेडेड, ओपन बिल स्टोर्क, वाइट आईबीज, ग्लॉसी आईबीज, लेसर विस्लिंग, टील लिटिल ग्रीव, कोरमोरेंट, पौंड हेरॉन, पर्पल हेरॉन दिखायी दे रहे हैं।</p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />जैदी ने बताया कि शहर व ग्रामीण इलाकों के विभिन्न वेटलैंड देसी विदेशी पक्षियों के कलरव से गूंज रहे हैं। इनमें आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, जोहरा बाई, गोपाल विहार, किशोर सागर दरा, रानपुर व लाखावा तलाब, उदपुरिया, बरधा बांध, गिरधरपुरा, बोराबांस तालाब सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कोटा की आबोहवा में परवाज भरते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। हाड़ौती का मौसम इन परिंदों के अनुकूल होने से इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।</p>
<p><strong>मार्च तक प्रवास पर रहेंगे यह पक्षी</strong><br />कॉमन कूट, रूडी शेल डक, बार हैडेड गूज, ग्रेलेक गूज, पिनटेल, कॉमन टील, कॉमन पोचार्ड, गार्गेनि टील, गढ़वाल कॉटन टील, इरेशियन करल्यू, स्टेपी ईगल, ब्लू थ्रोट, ग्रेलेक गूंज, ब्लैक स्टॉर्क सहित कई विदेशी परिंदें शामिल हैं। इनके अलावा स्थानीय पक्षियों से भी तालाब गुलजार हो रहे हैं। इनमें लेसर विस्लिंग टील, स्पॉट बिल डक, पेंटेर्ड स्टॉर्क, पर्पल मुरहेंन, इंडियन मुरहेन, वाइट आईबीज, इग्रेट वाटर शामिल हैं। इनका प्रवास मार्च तक रहेगा।</p>
<p><strong>उत्तरी अमेरिका ब्लू थ्रोट, कजाकिस्तान से स्टेपी ईगल</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि मिस्त्र का राष्ट्रीय पक्षी स्टेपी ईगल और उत्तरी अमेरिका से ब्लू थ्रोट पक्षी भी अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। वहीं, अलास्का, साइबेरिया व रूस से आए दुर्लभ प्रजाति के ब्लूथ्रोट पक्षियों ने डेरा डाल रखा है। इनके अलावा यूरेशियन कर्लियु, व्हाइट आई पोचार्ड, व्हाइट टेल्ड लैपविग, स्पॉटेड ईगल, मार्श हैरियर, मार्श सैंड पेपर, बूटेड ईगल, रुडी शैल डक भी दस्तक दे चुके हैं।</p>
<p><strong>रेड मुनिया बनी आकर्षण का केंद्र</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, अभेड़ा तालाब में कलरफूल पक्षी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में बर्ड्स वॉचर पहुंच रहे हैं। यहां रेड मुनिया, ब्लैक काइट, रेड वेंटेड, बुलबुल साइबेरियन, मुनिया सन बर्ड सहित कई कलरफूल पक्षियों ने अभेड़ा व बायोलॉजिकल पार्क के जंगलों में डेरा जमाया हुए है, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है।</p>
<p><strong>बर्फबारी से बचने व भोजन की तलाश में आते पक्षी</strong><br />शेख बताते हैं, उत्तरी अमेरिका के अलास्का, हिमालयी क्षेत्र और ईस्ट साइबेरिया में अक्टूबर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। जिससे बढ़ने वाली तीखी सर्दी से बचने के लिए ये पक्षी ऐसे स्थानों पर आशियाना बनाते हैं, जहां इन क्षेत्रों के मुकाबले ठंड कम रहती है। विदेशी पक्षी तेज सर्दी से बचने को आशियाने की तलाश में यहां आए हैं। इनका प्रवास नवम्बर से शुरू हो जाता है, जो मार्च तक रहता है। इसके बाद यह वापस अपने मुल्क लौट जाते हैं।</p>
<p><strong>बर्ड्स के व्यवहार व हैबीटाट पर बढ़ रहा अनुसंधान</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशू शर्मा कहती हैं, बर्ड्स पर अनुसंधान लगातार बढ़ रहा है। प्रोजेक्ट वर्क व बर्ड्स वॉचिंग करने बड़ी संख्या में शोधार्थी वेटलैंड पर पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हैं। वन्यजीव विभाग द्वारा भी उम्मेदगंज में प्राकृतिक हैबीटाट डवलपमेंट पर कार्य कर रहा है। </p>
<p><strong>इसी एक ही पेड़ पर एक साथ दिखे 12 प्रजातियों के पक्षी</strong><br />सेवानिवृत प्राणीशास्त्र प्रोफेसर डॉ. सुरभि श्रीवास्तव ने बताया कि इन दिनों स्टेशन क्षेत्र में देसी विदेशी परिंदे बड़ी संख्या में नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक ही पेड़ पर 12 प्रजातियों के पक्षी एक साथ नजर आए हैं। इनमें 3 प्रजातियों की हैरॉन, 4 प्रजातियों के इग्रेट और 3 प्रजातियों के कोरमोरेंट सहित अन्य पक्षी शामिल हैं। वहीं, कजाकिस्तान व सेंट्रल एशिया से रोजी स्टारलिंग व साइबेरियन स्टोन चैट बर्ड्स भी दिखाई दे रही है। कोटा देसी विदेशी पक्षियों को कोटा की आबोहवा रास आ रही है। उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से सौगरिया क्षेत्र में सड़क का काम चल रहा है, शोर अधिक होने से इस एरिया में पक्षियों की संख्या कम हो गई है। सड़क मरम्मत कार्य जल्द करवाया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Dec 2025 14:30:30 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>गंदे नालों में देशी-विदेशी पक्षियों का बसेरा, शहर के अधिकतर नाले गंदे, नियमित नहीं हो रही सफाई</title>
                                    <description><![CDATA[पक्षियों को प्राकृतिक आवासों में पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण वे अवांछित स्थानों जैसे नालों में भोजन की तलाश में जा रहे हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dirty-drains-are-home-to-both-native-and-foreign-birds--and-most-of-the-city-s-drains-are-dirty-and-lack-regular-cleaning/article-127770"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(1)24.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहरी क्षेत्र में वैटलेंड लगातार घट रहे हैं। कहीं अतिक्रमण तो कहीं विकास की भेंट चढ़ गए। नतीजन,  देश-विदेश से आने वाले परिंदों के सामने भोजन व रहवास का संकट गहरा गया। ऐसे में गंदे नाले उनकी शरणस्थली <br />बन गई। जहां भोजन के साथ अनगिनत बैक्टीरिया, वायरस, संक्रमण, रसायन भी मिल रहे हंै, जो न केवल पक्षियों के जीवन चक्र को बीमारियों की जद में ला रहा बल्कि उनकी उम्र भी घटा रहा है। जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण माइग्रेट बर्ड्स की संख्या में भी कमी देखी जा रही है। शहर के कई इलाकों के नाले नियमित सफाई के अभाव में गंदगी से अटे पड़े हैं। जिनमें साजीदेहड़ा, एलबीएस मार्ग स्थित नाला, केशवपुरा, डीसीएम रोड, देवली अरब सहित कई नाले शामिल है। जहां गंदगी के बीच भोजन ढृूंढ रहे देसी-विदेशी पक्षियों को होने वाले नुकसान, कारण, सुझाव पर पक्षी विशेषज्ञों से जाना। पेश है रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>नालों में भोजन से परिंदों को संभावित नुकसान</strong><br /><strong>बीमारियां व संक्रमण : </strong>नालों का पानी अक्सर गंदा और प्रदूषित होता है। इसमें बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी होते हैं, जो पक्षियों को संक्रमण देकर बीमार कर सकते हैं। </p>
<p><strong>रसायन व अपशिष्ट पदार्थ :</strong> सीवेज या नालों में औद्योगिक व घरेलू कचरे से निकलने वाले रसायन और भारी धातुएं (लेड, पारा, आर्सेनिक आदि) पक्षियों के शरीर में जमा होकर उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर डालते हैं। जिससे अंडे देने की क्षमता भी प्रभावित होती है। </p>
<p><strong>प्लास्टिक और कचरे का खतरा :</strong> नालों में कई ऐसे अपशिष्ट पदार्थ, रासायनिक व अपचनीय सामग्री भी प्रवाहित होती हैं, जिन्हें पक्षी भोजन समझकर निगल लेते हैं, जो पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं और कई बार उनकी मृत्यु तक हो सकती है।</p>
<p><strong>धागे व तार में उलझने से घायल:</strong> नालों में हर तरह का कचरा आता है। जिनमें तार, बैलून से बंधे धागे भी होते हैं। कई बार फिडिंग के दौरान उनके शरीर में जाकर फंस जाते हैं और पंजों व पंखों में उलझने से घायल हो जाते हैं। वहीं,  गंदे पानी में पनपने वाले कीड़े व परजीवी पक्षियों की चोंच, आंखों व पैरों पर भी विपरीत असर डालते हैं।</p>
<p><strong>जीवन दर घटने की आशंका : </strong>यदि, प्रवासी पक्षी लगातार गंदे नालों या प्रदूषित जलाशयों पर निर्भर होने लगे तो उनकी जीवित रहने की दर घट सकती है और उनकी संख्या में गिरावट आ सकती है।</p>
<p><strong>आलनिया तालाब वैटलेंड, पेटा काशत बने मुसीबत</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ बताते हैं, आलनिया डेम का तालाब पक्षियों के लिए बेहतरीन वेटलैंड है,यहां हर साल हजारों देसी-विदेशी पक्षी आते हैं। लेकिन, यहां पेटा काश्त परिंदों के लिए मुसीबत बनी है। तालाब में जब पानी कम होता है तो यहां लोग अतिक्रमण कर तालाब की जमीन पर पेटा काश्त करते हैं।  जिसका सीधा असर प्रवासी पक्षियों पर पड़ता है। यहां आने वाली माइगे्रटरी बर्ड्स जमीन पर अंडे देते हैं क्योंकि डेम की भूमि में नमी होती है। वहीं, आसपास झाड़ियों में घौंसला बनाकर रहते हैं, जिसे पेटाकाश्त करने वाले लोग नष्ट कर देते हैं।</p>
<p><strong>शहर में वैटलेंड हो विकसित</strong><br />पक्षियों को प्राकृतिक आवासों में पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है, जिसके कारण वे अवांछित स्थानों जैसे नालों में भोजन की तलाश में जा रहे हैं। वन विभाग को शहरी क्षेत्र में वैटलेंड डवलप करवाए जाने चाहिए। साथ ही रहवास सुरक्षित हो, यह सुनिश्चित की जानी चाहिए। नगर निगम को भी नालों की नियमित सफाई करवानी चाहिए।  <br /><strong>- एएच जैदी, नेचर प्रमोटर </strong></p>
<p>अतिक्रमण पर कार्रवाई हो तो रुके पक्षियों का पलायन आलनिया तालाब बेहतर वैटलैंड है, यहां की परिस्थितियां पक्षियों के अनुकूल है। भोजन पानी की उपलब्धता भी पर्याप्त है लेकिन तालाब पर पेटा काश्तकारों के अतिक्रमण बड़ी समस्या है। प्रशासन को इस पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए ताकि, परिंदों को गंदे जलाश्यों पर आश्रित न रहना पड़े और उनका पलायन रुके।<br /><strong>- रवि नागर, बायोलॉजिस्ट </strong></p>
<p>पक्षी नालों में फिडिंग के आदी हो गए हैं। क्योंकि, यहां कीड़े-मकोड़े भोजन के रूप में मिल जाते हैं। ऐसी परिस्थितियां क्यों बनी, इसके कारण विभाग को तलाशने चाहिए। प्रदूषित जलस्रोतों  में कई तरह के बैक्टीरिया होते हैं, जो उनके जीवन चक्र को  प्रभावित करता है।  ऐसे में वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) का संरक्षण बेहद जरूरी है।<br /><strong>- डॉ. अंशु शर्मा, पक्षी विशेषज्ञ </strong></p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />गंदगी में रहने से पक्षियों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव जरूर पड़ता है। बर्ड्स वहां रहती है तो वह स्थान एक तरह से उनका रहवास है। कीट, पतंगे, कीड़े-मकोड़े खाकर वायरस, संक्रमण फैलने से रोकती है,जो इंसानों को बीमारियों से बचाव के लिए अहम रोल अदा रही है। लेकिन, मनुष्य पक्षियों के प्रति अपना फर्ज नहीं निभा रहा है। नालों की नियमित सफाई होनी चाहिए ताकि, अपशिष्ट व रसायनिक पद्धार्थ को बहने से रोका जा सके। रही बात वैटलेंड की तो हमारे क्षेत्र में डवलप कर रहे हैं। जिनमें अभेड़ा तालाब, जोहरा बाई का तालाब, उम्मेदगंज पक्षी विहार, बायोलॉजिकल पार्क सहित भैंसरोडगढ़ व शेरगढ़ सेंचुरी के कई क्षेत्र शामिल हैं।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा </strong></p>
<p>नगर निगम द्वारा नालों की समय-समय पर सफाई करवाई जाती है। यदि, कहीं गंदगी की शिकायत मिलती है तो तुरंत  सफाई करवा दी जाएगी।<br /><strong>- अशोक त्यागी, आयुक्त नगर निगम कोटा दक्षिण</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 15:44:48 +0530</pubDate>
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                <title> कोटा के 4 तालाबों पर दो दिन में मिले 150 प्रजातियों के 8 हजार परिंदे, अब ई-बर्ड ऐप से पक्षियों की गणना  </title>
                                    <description><![CDATA[वन्यजीव विभाग के डीसीएफ ने बताया कि बर्ड्स पर रिसर्च की दृष्टि से शहर के तलाब बर्ड्स डेस्टिनेशन प्वाइंट बन रहे हैं। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/8-thousand-birds-of-150-species-found-in-two-days-on-4-ponds-of-kota/article-105367"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer-(3)43.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के वैटलेंड अब बर्ड्स डेस्टिनेशन प्वाइंट्स बन रहे हैं। देश-विदेश से हर साल हजारों की तादाद में परिंदे प्रवास पर आ रहे हैं। जिनमें से कई पक्षी तो ऐसे हैं, जो पिछले पांच सालों में पहली बार नजर आ रहे हैं। इसका खुलासा हाल ही में वन्यजीव विभाग की ओर से करवाए गए मिड विंटर वाटर फोल पोपुलेशन ऐस्टीमेशन-2025 की रिपोर्ट से हुआ। ऐस्टीमेशन के तहत शहर के 4 तालाबों पर करवाई गई गणना में 150 प्रजातियों के 8 हजार से ज्यादा देसी-विदेशी परिदें काउंट हुए हैं। आंकड़ों के मुताबिक महज चार तालाबों पर ही हजारों की तादाद में परिंदे मिले हैं, जबकि यहां तीन दर्जन से अधिक तालाब हैं, जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का समूह देखने को मिल  रहे हैं।  </p>
<p><strong>इन तालाबों पर मिले 8 हजार परिंदे</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीसीएफ अनुराग भटनागर ने बताया कि बर्ड्स पर रिसर्च की दृष्टि से शहर के तलाब बर्ड्स डेस्टिनेशन प्वाइंट बन रहे हैं। गत 30 व 31 जनवरी को मिड विंटर वाटर फोल पापुलेशन ऐस्टीमेशन-2025 के तहत पक्षियों की गणना करवाई गई थी। जिसमें जोराबाई, अभेड़ा व सालकिया तालाब व उम्मेदगंज पक्षी विहार को मिलाकर करीब 150 प्रजातियों के 8000 से ज्यादा पक्षी नजर आए हैं। ऐसे में यह वैटलैंड न केवल रिसर्च की दृष्टि से बल्कि बर्ड्स वॉचिंग के लिए बेहतर डेस्टिनेशन के रूप में विकसित हो रहे हैं। </p>
<p><strong>अब ई-बर्ड ऐप से पक्षियों की गणना </strong><br />कोटा जिले के किस कोने में कौनसे प्रजातियों के पक्षियों की संख्या कम या अधिक है, इसकी जानकारी एकत्रित किए जाने के लिए वन्यजीव विभाग की ओर से ई-बर्ड ऐप लॉन्च किया है। जिसके जरिए शहरवासी पक्षियों से जुड़ सकेंगे। वह अपने घर आंगन में आने वाले पक्षियों को देख उनका डेटा इस ऐप में फीड कर सकते हैं। जिससे ऐप पर पक्षियों का डेटा एकत्रित हो सकेगा। साथ ही यह भी पता लग पाएगा कि हमारे इलाके में किस तरह के पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है।  </p>
<p><strong>शोधार्थियों के लिए तैयार होगा डेटा </strong><br />डीसीएफ भटनागर ने बताया कि इस ऐप के जरिए एकत्रित होने वाला डेटा बर्ड्स पर रिसर्च करने वाले विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। ऐप में हर साल जिले में आने वाले विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों की संख्या, हैबीटाट, दिनचर्या, व्यवहार सहित कई जानकारी मिल पाएगी। क्योंकि, इस ऐप को पक्षी विशेषज्ञ भी समय-समय पर अपडेट कर रहे होते हैं।  </p>
<p><strong>इन प्रजातियों के यह पक्षी आए नजर</strong><br />जोराबाई तालाब, अभेड़ा व सालकिया तालाब पर गत 30 जनवरी को करवाई गई पक्षी गणना में देश-विदेश से आए विभिन्न प्रजातियों के प्रवासी पक्षी नजर आए। यहां 65 प्रजातियों के विदेशी पक्षियों सहित 80 अन्य प्रजातियों के 5000 पक्षी नजर स्पोर्ट हुए। जिसमें कोमन पोचार्ड, क्रेस्टेड पोचर्ड, टफ्टेड पोचार्ड, लिटिल गीब, गल, स्टार्क,  लिटिल रिंग फ्लॉवर, रफ, कॉमन टील, ब्लू थ्रोट, विस्किर्ड टर्न, रिवर टर्न, कॉमन कूट, गेडवेल, गागीर्नी, इंडियन कर्सर,कॉटन पिग्मी गीज, बुटेड ईगल,ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, टावनी ईगल, मार्स हैरियर, इंडियन वाइट आई, ब्लू फ्लाई कैचर, हनी बजार्ड, ग्रे हेडेड कैनरीफ्लाई कैचर, यूरेशियन कर्लुव सहित कई पक्षी शामिल है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Feb 2025 16:56:33 +0530</pubDate>
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                <title>सात समंदर पार से कोटा पहुंचे विदेशी परिंदे</title>
                                    <description><![CDATA[विदेशों में बर्फबारी होने से माइग्रेट कर कोटा आ रहे पक्षी। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/foreign-birds-reached-kota-from-across-the-seven-seas/article-96894"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/9930400-sizee18.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों किमी का सफर कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। कजाकिस्थान, उजबेकिस्थान, साइबेरिया, मंगोलिया, रूस, चीन, उत्तरी अमेरिका सहित कई देशों से बड़ी संख्या में परिंदे शिक्षा नगरी की आबो-हवा में परवाज भर रहे हैं। यूरोपियन व एशियाई देशों में बर्फबारी होने से अपने अनुकूल वातावरण व भोजन की तलाश में यह परिंदे सात समंदर पार कर देश के विभिन्न राज्यों में अपना आशियाना बना रहे हैं। इन दिनों कोटा के दो दर्जन से अधिक वेटलैंड पर देसी-विदेशी पक्षियों पक्षियों का कलरव चहकने लगा है।  </p>
<p><strong>यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से आए पक्षी</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, विदेशी पक्षियों का कारवां यूरोपियन व सेंट्रल एशियाई देशों से कोटा पहुंचे हैं। इनमें कजाकिस्थान, उज्बेकिस्थान, साइबेरिया, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, स्वजरलैंड, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस सहित करीब एक दर्जन देशों से 10 हजार एयर किमी का सफर कर बड़ी संख्या में मेहमान प्रवास पर आए हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कॉमन कूट, स्पोर्ट बिल परपल, मुरहेंन रुद्दी शेल डक, वाइट आई पोचर्ड, स्पूनबिल, सारस क्रेन बारहेडेड, ओपन बिल स्टोर्क, वाइट आईबीज, ग्लॉसी आईबीज,  लेसर विस्लिंग, टील लिटिल ग्रीव, कोरमोरेंट पौंड हेरॉन, पर्पल हेरॉन दिखायी दे रहे हैं।</p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />जैदी ने बताया कि कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वेटलैंड देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, जोहरा बाई, गोपाल विहार, किशोर सागर दरा, रानपुर व लाखावा तलाब, उदपुरिया, बरधा बांध, गिरधरपुरा, बोराबांस तालाब सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कोटा की आबोहवा में बेखौफ परवाज भरते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। हाड़ौती का मौसम इन परिंदों के अनुकूल होने से इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।</p>
<p><strong>4 माह तक प्रवास पर रहेंगे यह पक्षी  </strong><br />पक्षी प्रेमी जुनैद शेख ने बताया कि यहां विदेशी पक्षियों में कॉमन कूट, रूडी शेल डक, बार हैडेड गूज, ग्रेलेक गूज, पिनटेल, कॉमन टील, कॉमन पोचार्ड, गार्गेनि टील, गढ़वाल कॉटन टील, इरेशियन करल्यू, स्टेपी ईगल, ब्लू थ्रोट, ग्रेलेक गूंज, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क शामिल हैं। इनके अलावा स्थानीय पक्षियों से भी तालाब गुलजार हो रहे हैं। इनमें लेसर विस्लिंग टील, स्पॉट बिल डक, आॅप्रबिल स्टॉर्क, इंडियन मुरहेन, वाइट आईबीज, इग्रेट वाटर शामिल हैं। मार्च तक इनका प्रवास रहेगा।</p>
<p><strong>उत्तरी अमेरिका ब्लू थ्रोट भी पहुंचा</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि मिस्त्र का राष्टÑीय पक्षी स्टेपी ईगल और उत्तरी अमेरिका से ब्लू थ्रोट पक्षी भी अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। वहीं, अलास्का, साइबेरिया व रूस से आए दुर्लभ प्रजाति के ब्लूथ्रोट पक्षियों ने डेरा डाल रखा है। इनके अलावा यूरेशियन करलेयु, रफ, व्हाइट आई पोचार्ड, व्हाइट टेल्ड लैपविग, स्पॉटेड ईगल, मार्श हैरियर, मार्श सैंड पेपर, बूटेड ईगल, रुडी शैल डक भी दस्तक दे चुके हैं।  </p>
<p><strong>यूरोपियन देशों में बर्फबारी से बढ़ा भोजन का संकट</strong><br />पक्षी प्रेमी हरफूल शर्मा बताते हैं, उत्तरी अमेरिका के अलास्का, हिमालयी क्षेत्र और ईस्ट साइबेरिया में अक्टूबर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। जिससे पक्षियों के लिए भोजन का संकट हो जाता है। ऐसे में तीखी सर्दी से बचने व भोजन की तलाश में ऐसे स्थानों पर आशियाना बनाते हैं, जहां इन क्षेत्रों के मुकाबले ठंड कम रहती है। विदेशी पक्षी तेज सर्दी से बचने को आशियाने की तलाश में यहां आए हैं। इनका प्रवास नवम्बर से शुरू हो जाता है, जो मार्च तक रहता है। </p>
<p><strong>रेड मुनिया बनी आकर्षण का केंद्र</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, अभेड़ा तालाब में कलरफूल पक्षी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में बर्ड्स वाचर पहुंच रहे हैं। यहां रेड मुनिया,  ब्लैक काइट, रेड वेंटेड, बुलबुल साइबेरियन, मुनिया सन बर्ड सहित कई कलरफूल बडर््स ने अभेड़ा में डेरा जमाया हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है।  </p>
<p><strong>रिसर्च का दायरा बढ़ा, शिकार पर अंकुश लगा  </strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशू शर्मा कहती हैं, बर्ड्स पर अनुसंधान लगातार बढ़ रहा है। प्रोजेक्ट वर्क व बर्ड्स वॉचिंग करने बड़ी संख्या में शोधार्थी वेटलैंड पर पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हैं। उनकी मौजूदगी होने से शिकार संबंधित समस्याओं पर अंकुश लगा है। वहीं, लोगों में अवेयरनेस भी बढ़ी है। इसी वजह से स्थानीय व प्रवासी पक्षियों की संख्या में अपेक्षाकृत इजाफा हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Dec 2024 15:21:42 +0530</pubDate>
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                <title>छोटे पक्षी ऊंची उड़ान, सात समुंदर पार से कोटा पहुंचे परिंदे</title>
                                    <description><![CDATA[इन दिनों कोटा सहित संभाग के चारों जिलों के तलाब किनारे रंग-बिरंगे परिंदों की परवाज फिंजा में इंद्रधनुष के रंग बिखेर रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/small-birds-fly-high--reach-kota-from-across-seven-seas/article-67808"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/chote-pkshi,-unchi-udan,-saat-smundar-paar-s-kota-pohnche-pkshi...kota-news-22-01-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मध्य एशिया व यूरोपियन देशों में बर्फबारी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों मील का सफर तय कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, चीन, उत्तरी अमेरिका और रूस सहित कई देशों की सरहदें पार कर बड़ी संख्या में परिंदे हाड़ौती की सरजमी पर डेरा डाल चुके हैं। एक दर्जन से अधिक वेटलैंड प्रवासी-अप्रवासी पक्षियों के कलरव चहकने लगा है। इन दिनों कोटा सहित संभाग के चारों जिलों के तलाब किनारे रंग-बिरंगे परिंदों की परवाज फिंजा में इंद्रधनुष के रंग बिखेर रही है। इनमें बार हैडेड गूज, नॉर्दन पिनटेल, नॉर्दन शावलर,कॉमन टील, रेड क्रेस्टेड, पेलिकंस व रुडी शेल डक शामिल हैं। </p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, हाड़ौती के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, रानपुर, गिरधरपुरा, किशोर सागर, दरा, बोरबांस, बरधा बांध, अभेड़ा, बारां के अमलसरा में डेरा डाले हैं।  </p>
<p><strong>29 हजार फीट ऊंचाई पर उड़ती है बार हेड गूज</strong><br />जैदी कहते हैं, बार हैडेड गूज जमीन से करीब 29 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता रखती है। यह पानी व खेतों के आसपास नजर आती है। यह पहला अवसर है, जब बार हैडेड गूज का इतना बड़ा झुंड एक साथ हाड़ौती की सरहद पर आराम करने व भोजन की तलाश में उतरा है।</p>
<p><strong>एक दिन में भरते हैं1600 किमी की उड़ान </strong><br />यह पक्षी एक दिन में 1600 किमी की उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं। सिर व गर्दन पर काले निशान के साथ इनका रंग पीला ग्रे होता है। सिर पर दो काली सलाखों के आधार पर सफेद पंख होते हैं। पैर मजबूत और नारंगी रंग के होते हैं। इनकी लंबाई 68 से 78 सेमी, पंखों का फैलाव 140 से 160 सेमी होता है।</p>
<p><strong>रुडी शेल्डक की इंद्रधनुषी छटा मनमोहक</strong><br />वन्यजीव प्रेमी जुनैद शेख कहते हैं, यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका से हाड़ौती का रुख करने वाली रुडी शेल्डक की सतरंगी छटा पर्यटकों का मन मोह लेती है। स्थानीय लोग इस चिड़िया को सुरखाब और चकवा-चकवी के नाम से पुकारते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम टैडोरना फेरूजीनिया है। </p>
<p><strong>व्हिसलिंग टील की भा रही सीटी सी आवाज</strong><br />सर्दी के मौसम में इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और म्यांमार से चंबल का रुख करने वाली व्हिसलिंग टील की सीटी जैसी आवाज लोगों को मंत्र मुग्ध कर देती है। इसका स्थानीय नाम सिली (सिल्ही) है। वैज्ञानिक नाम डेंड्रोसाइग्ना जावनिका है।  शिकार के दौरान इनकी जलक्रीड़ा  पर्यटकों को रोमांचित कर देती है। इनकी चोंच और पैर स्लेटी नीले-भूरे रंग के होते हैं। </p>
<p><strong>4 किलो मछली चोंच में रख लेता है पेलिकन</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ हर्षित शर्मा कहते हैं, पेलिकन बड़े पक्षी होते हैं। इनकी चोंच काफी लंबी होती है। इनका मुख्य भोजन मछलियां होती है। यह एक बार में अपनी चोंच में 3 से 4 किलो मछली रख लेता है। पानी में मछली का शिकार करने के दौरान इसका निशाना अचूक होता है। इन दिनों कोटा ही नहीं संभाग के कई वैटलैंड पर इनकी अठखेलियां देखी जा सकती है।</p>
<p><strong>एक बार में 10 अंडे देती है नार्दन पिनटेल </strong><br />शर्मा ने बताया कि प्रवासी पक्षियों का अक्टूबर से यहां आना शुरू हो जाता है,जो मार्च तक जारी रहता है। इनमें नार्दन पिनटेल डक 4 हजार से अधिक की ऊंचाई पर उड़ती है और एक बार में 10 से 12 अंडे देती है। यहां बार हैडेड गूज, नॉर्दन पिनटेल, नॉर्दन शावलर,कॉमन टील, कॉटन टील, तफ्टेड पोचर्ड, रेड क्रेस्टेड, वाइट आई पोचार्ड, स्पूनबिल रफ ब्लैक टेल सहित कई पक्षियों को हाड़ौती की आबोहवा रास आ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jan 2024 19:37:35 +0530</pubDate>
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                <title>चार माह बाद भी पक्षी शाला में नहीं आए पक्षी</title>
                                    <description><![CDATA[पक्षी शाला में पक्षियों के नाम पर फिलहाल लोहे का ढांचा ही दिखाई दे रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/birds-did-not-come-to-the-bird-house-even-after-four-months/article-65148"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/char-maah-bd-bhi-pakshi-shala-me-nhi-aye-pakshi...kota-news-26-12-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर विकास न्यास ने करीब 100 करोड़ रुपए की लागत से आॅक्सीजोन सिटी पार्क का निर्माण कराया। जिसमें विदेशी पक्षियों के लिए एक विशाल पक्षीशाला(एवियरी) भी बनाई गई है। लेकिन हालत यह है कि इसका उद्घाटन होने के चार माह बाद तक भी विदेशी पक्षियों के नहीं आने से यह खाली ही पड़ी है। आईएल की करीब 71 एकड़ जमीन पर न्यास ने 100 करोड़ रुपए की लागत से आॅक्सीजोन सिटी पार्क का निर्माण कराया गया। इसके 72 फीसदी भाग में हरियाली है। जिसके तहत पूरे पार्क में हर जगह पर विभिन्न प्रजातियों के करीब डेढ़ से दो लाख छोटे बड़े पौधे लगाए गए हैंÞ। इस पार्क में न केवल सैर करने आने वालों को यहां लगे पौधों से आॅक्सीजन मिल रही है। वरन् आस-पास की कॉलोनियों और कोचिंग विद्यार्थियों को भी आॅक्सीजन मिलने का दावा किया जा रहा है। आॅक्सीजोन पार्क में घूमने आने वालों को यहां सब कुछ देखने को मिल रहा है। लेकिन पक्षी शाला में पक्षी ही नजर नहीं आ रहे हैं। पक्षी शाला में पक्षियों के नाम पर फिलहाल लोहे का ढांचा ही दिखाई दे रहा है। </p>
<p><strong>2 करोड़ से 200 टन वजनी पक्षी शाला बनाई</strong><br />विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए गए आॅक्सीजोन पार्क का जिस तरह से निर्माण किया गया है उस तरह का भारत देश में कहीं नहीं है। रा’य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चार महीने पहले 13 सितम्बर को इस पार्क का उद्घाटन किया था।  इस पार्क में एक विशाल पक्षी शाला(एवियरी) बनाई गई है। करीब दो करोड़ रुपए की लागत से 200 टन वजनी यह पक्षी शाला अंडाकार आकार में बनाई गई है। यह इतनी बड़ी है कि बाहर से राह चलते लोगों को ही नजर आ रही है।   न्यास अधिकारियों के अनुसार इस पक्षी शाला की लम्बाई 46.20 मीटर है। करीब 30.5 मीटर ऊंचाई और 28 मीटर चौड़ाई है। </p>
<p><strong>दो दर्जन प्रजातियों के 200 विदेशी पक्षियों को रखा जाना है</strong><br />न्यास अधिकारियों के अनुसार इस पक्षीशाला में करीब दो दर्जन प्रजातियों के 200 से अधिक पक्षियों को रखा जाना है। ऐसे में उन पक्षियों के लिए पक्षीशाला में ही दो बड़े पौंड बनाए गए हैं।  पक्षियों के खाने के लिए यहां कई तरह के फलदार पौधे लगाए गए हैं। गर्मी से बचने के लिए वाटर मिस्ट स्प्रे और डेकोरेटिव लाइटें तक लगाई गई हैं।  यहां मकाऊ पैरेट, रैनबो लोरीकीट,हैचिंथ पैरेट, गोल्डन तीतर,पॉम कॉकटू व कैनरी समेत कई पक्षी रखे जाने की व्यवस्था की गई है। </p>
<p><strong>सेंट्रल जू अथोरिटी से अनुमति का इंतजार</strong><br />नगर विकास न्यास अधिकािरयों के अनुसार पक्षीशाला में स्थानीय पक्षी नहीं रखे जा सकते। इसका निर्माण ही इस तरह से किया गया है कि यहां एक्जोटिक विदेशी पक्षी ही रखे जा सकते हैं। इसके लिए उद्घाटन से पहले ही सेंट्रल जू अथोरिटी को पत्र लिखा जा चुका है। लेकिन अभी तक अनुमति नहीं मिली है। न्यास अधिकारियों के अनुसार इस पार्क का उद्घाटन होने के बाद ही आचार संहिता लग गई थी। अब नई सरकार बनी है। मंत्री मंडल गठन होने के बाद ही इस काम में गति मिलने की संभावना है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Dec 2023 14:19:04 +0530</pubDate>
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                <title>7 हजार किमी दूर से कोटा पहुंचे विदेशी मेहमान</title>
                                    <description><![CDATA[कोहरे की चादर से लिपटा आसमां में बेखौफ अपनी उड़ान को परवाज देते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/foreign-guests-reached-kota-from-a-distance-of-7-thousand-kilometers/article-63996"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/ert.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी बढ़ने के साथ ही विदेशी परिंदों का हजारों किमी का सफर तय कर कोटा पहुंचना शुरू हो गया है। यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, चीन, उत्तरी अमेरिका और रूस सहित कई देशों से बड़ी संख्या में परिंदे शिक्षा नगरी की सरजमी पर कदम रख चुके हैं। यूरोपिय व एशियाई देशों में बर्फबारी होने से अपने अनुकूल वातावरण व भोजन की तलाश में यह परिंदे सात समंदर पार कर देश के विभिन्न राज्यों में अपना आशियाना बना रहे हैं। इन दिनों कोटा के एक दर्जन से अधिक वेटलैंड पर देसी-विदेशी पक्षियों पक्षियों का कलरव चहकने लगा है। वहीं, आलनिया में पांच साल में पहली बार ब्लैक नेक्ड स्टोक पक्षी नजर आया है। </p>
<p><strong>इन इलाकों में जमाया डेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी का कहना है, कोटा के विभिन्न इलाकों में स्थित वैटलैंड पर इन दिनों देसी विदेशी पक्षियों का कलरव गूंज रहा है। आलनिया, उम्मेदगंज, अभेड़ा, उदपुरिया, बरधा डेम, गिरधरपुरा, बोराबांस का तालाब, सोखिया तालाब, किशोर सागर तालाब सहित कई इलाके परिंदों की चहचहाट से गुलजार हो रहे हैं। कोहरे की चादर से लिपटा आसमां में बेखौफ अपनी उड़ान को परवाज देते परिंदों की अळखेलियां लोगों को आनंदित कर रही है। हाड़ौती का मौसम इन परिंदों के अनुकूल होने से इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।</p>
<p><strong>7 समुंदर पार कर कोटा पहुंचे ये मेहमान</strong><br />जैदी ने बताया कि यूरोप, सेंट्रल एशिया, साइबेरिया, हिमालय, उत्तरी अमेरिका, चीन, रूस, कजाकिस्तान सहित यूरोपियन व एशियाई देशों से हजारों किमी का सफर तय कर बड़ी संख्या में मेहमान प्रवास पर आए हैं। इनमें कॉमन कूट, रूडी शेल डक, बार हैडेड गूज, ग्रेलेक गूज, पिनटेल, कॉमन टील, कॉमन पोचार्ड, गार्गेनि टील, गढ़वाल कॉटन टील, इरेशियन करल्यू, स्टेपी ईगल, ब्लू थ्रोट, ग्रेलेक गूंज, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क सहित कई विदेशी परिंदें शामिल हैं। इनके अलावा स्थानीय पक्षियों से भी तालाब गुलजार हो रहे हैं। इनमें लेसर विस्लिंग टील, स्पॉट बिल डक, आॅप्रबिल स्टॉर्क, पेंटेर्ड स्टॉर्क, पर्पल मुरहेंन, इंडियन मुरहेन, वाइट आईबीज, इग्रेट वाटर शामिल हैं। </p>
<p><strong>उत्तरी अमेरिका ब्लू थ्रोट, कजाकिस्तान से स्टेपी ईगल </strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि इन दिनों शहर के विभिन्न वेटलैंड पर मिस्त्र का राष्टÑीय पक्षी स्टेपी ईगल और उत्तरी अमेरिका से ब्लू थ्रोट पक्षी भी बड़ी संख्या में नजर आ रहे हैं। वहीं, अलास्का, साइबेरिया व रूस से आए दुर्लभ प्रजाति के ब्लूथ्रोट पक्षियों ने भी यहां डेरा डाल रखा है। वेटलैंड का विस्तार करने वाले खेतों व घास के मैदान में ब्लूथ्रोट किलोल करते दिखाई दे रहे हैं। इसे स्थानीय भाषा में नील कंठी के नाम से भी जाना जाता है।  </p>
<p><strong>पांच साल में पहली बार दिखा ब्लैक नेक्ड स्टॉर्ड</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अंशु शर्मा का कहना है, आलनिया डेम पर ब्लैक नेक्ड स्टॉर्ड दिखाई दिया है। कोटा में पिछले पांच साल में पहली बार नजर आया है। यह काली गर्दन वाला सारस प्रजाति का बड़ा पक्षी है। जिसकी लंबाई129 से 150 सेमी होती है। राजस्थान के भरतपुर में यह पक्षी पूरे साल देखने को मिलता है, लेकिन कोटा में इसे पांच सालों में नहीं देखा गया। इस साल यह स्टार्क अलनिया डैम पर दिखाई दिया है। वहीं,  ग्रेट व्हाइट पेलिकन पूर्वी यूरोप, अफ्रीका, उत्तर पश्चिम भारत, पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार से पहुंची है। ग्रेटर फ्लेमिंगो, राजहंस की सबसे बड़ी जीवित प्रजाति है। तीनों पक्षियों की प्रजातियां इन दिनों यहां प्रवास पर आई हैं।  </p>
<p><strong>रेड मुनिया व कूकू बनी आकर्षण का केंद</strong><br />पक्षी प्रेमी शेख जुनैद कहते हैं, अभेड़ा तालाब में कलरफूल पक्षी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में बर्ड्स वाचर पहुंच रहे हैं। यहां रेड मुनिया, जेकोबिन कूकू, एसिपरेनिया लोंग टेल, श्राइक डरोंगो, ब्लैक काईट, रेड वेंटेड, बुलबुल साइबेरियन, नेक्ड आईबीज, हनी बजर्ड, मुनिया सन बर्ड सहित कई कलरफूल बडर््स ने अभेड़ा में डेरा जमाया हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। यहां हिमालयी क्षेत्रों से पहुंचे पक्षियों को आबोहवा इतनी पसंद आई की वह यहीं की होकर रह गर्इं।</p>
<p><strong>5 माह तक रहेंगे प्रवास पर </strong><br />पक्षी प्रेमी हरफूल शर्मा बताते हैं, उत्तरी अमेरिका के अलास्का, हिमालयी क्षेत्र और ईस्ट साइबेरिया में अक्टूबर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। जिससे बढ़ने वाली तीखी सर्दी से बचने के लिए ये पक्षी ऐसे स्थानों पर आशियाना बनाते हैं, जहां इन क्षेत्रों के मुकाबले ठंड कम रहती है। विदेशी पक्षी तेज सर्दी से बचने को आशियाने की तलाश में यहां आए हैं। इनका प्रवास नवम्बर से शुरू हो जाता है, जो मार्च तक रहता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 Dec 2023 20:17:08 +0530</pubDate>
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                <title>गर्मी बढ़ने के साथ ही कोटा से लौटने लगे ’मेहमान’</title>
                                    <description><![CDATA[देश-प्रदेश से विभिन्न प्रजातियों के पक्षी हाड़ौती के जंगलों की ओर रुख करते हैं। मार्च-अप्रेल तक इनका वापस लौटना शुरू हो जाता है। वर्तमान में कई विदेशी परिंदे अपने मुल्क लौट चुके हैं तो कुछ जाने की तैयारी में है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/as-the-heat-increased--guests--started-returning-from-kota/article-42770"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-04/garmi-badhnei-k-saath-hi-kota-se-lautane-lage-mehmaan...kota-news.14.4.2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मौसम बदलने के साथ ही मेहमान पक्षियों की घर वापसी का सिलसिला शुरू भी हो गया है। कई पक्षी यहां कि यादों को अपने साथ लिए अपने वतन की ओर से उड़ान भर चुके हैं तो कुछ अब भरने की तैयारी में है।  अप्रेल तक मेहमान व मेजबान एक बार फिर से बिछुड़ जाएंगे। सर्द प्रदेशों में बर्फबारी होने के बाद देश के अन्य प्रांतों व सरहद पार से विभिन्न प्रजातियों के पक्षी कोटा जिले के जलाशयों की ओर आने लगते हैं। दिसम्बर व जनवरी में तो क्षेत्र के तालाब मेहमान परिन्दों से चहकने लग जाते हैं।</p>
<p><strong>कुछ लौटे तो कुछ लौटने की तैयारी में </strong><br />नेचर प्रोमोटर ए.एच. जैदी ने बताया कि 15 नवम्बर के बाद से विदेशी पक्षियों का देश के विभिन्न राज्यों में प्रवास शुरू हो जाता है। मार्च-अप्रेल तक इनका वापस लौटना शुरू हो जाता है। हालांकि, वर्तमान में कई विदेशी परिंदे अपने मुल्क लौट चुके हैं तो कुछ जाने की तैयारी में है। उन्होंने बताया कि शहर के कई स्थानों से पक्षियों के लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है। हाल ही में कई जलाशयों पर इनकी संख्या कम होती दिखाई दे रही है। यहां के तलाबों से मध्य यूरोप, फ्रांस, जर्मनी, इटली, इंग्लैंड, मंगोलिया, ईरान, साइबेरिया, रूस, चाइना, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, भारत के लद्दाख समेत अन्य ठंडे प्रदेशों से पक्षी आते हैं। </p>
<p><strong>ये तालाब रहते हैं आकर्षण का केंद्र </strong><br />जैदी के मुताबिक, देश-प्रदेश से विभिन्न प्रजातियों के पक्षी हाड़ौती के जंगलों की ओर रुख करते हैं। इनमें  ग्रे लेक गूज, नॉर्दन शावलर, नॉर्दन पिनटेल, इरोशियन विजन, गेडवेल, कॉमन टिल, कॉटन टिल, कॉमन पोचार्ड, रेड करस्टेड पोचार्ड, टफ टेड, पोचार्ड, वाइट आई पोचार्ड, बार हैडेड गूज, रूडी शेल्डक, कॉमन कूट, कॉम डक समेत कई प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं। शहर व आसपास के क्षेत्रों में स्थित अभेड़ा, आलनिया, उम्मेदगंज, बरधा डेम, किशोर सागर, दरा, गिरधरपुरा, सकतपुरा समेत अन्य जलाशय इनसे चहकते हैं। जिन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है। इनकी अठखेलियों से यह स्थान आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। </p>
<p><strong>स्टेपी ईगल भी पहुंचे अपने मुल्क </strong><br />बडर्स रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन से हजारों किमी का सफर तय शिक्षा नगरी में आए मिस्त्र के राष्ट्रीय पक्षी स्टेपी ईगल भी अपने मुल्क की ओर कूच कर गए। हालांकि, कई जगहों पर इनकी संख्या बहुत कम नजर आ रही है। यह भी अप्रेल के अंत तक लौट जाएंगे। स्टेपी ईगल बाज की प्रजाति का शिकारी पक्षी है, जो हवा में काफी उंचाई पर उड़ते हुए खरगोश, चूहे का शिकार करता है। स्टेपी ईगल मिस्त्र का राष्ट्रीय पक्षी है और कजाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज में इसका चित्र है। नवम्बर से इनका आना शुरू हो जाता है और मार्च-अप्रेल तक रहते हैं। यह मुख्य रूप से घास के मैदानों व खुले जंगलों में रहना पसंद करते हैं।</p>
<p><strong>यहां बसाते हैं अपनी बस्ती </strong><br />शहर में कई ऐसे इलाके हैं, जो इनकी पसंदीदा जगह रही है। इनमें अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, गरड़िया महादेव, गैपरानाथ, उम्मेदगंज व बारां रोड स्थित डम्पिंग यार्ड के आसपास झुंड में नजर आते हैं। यह गिदद की तरह प्राकृतिक सफाईकर्मी होते हैं। खरगोश व चूहें का शिकार करता है। वहीं, मृत मवेशियों को खाते हैं। यह अपना घोंसला पहाड़ां, चटटानों, खंडर इमारतों व उंचे पेड़ों पर बनाते हैं। वर्तमान में इनकी संख्या काफी कम हो गई है।   </p>
<p><strong>अमेरिका पहुंचा नीलकंठी</strong><br />अभेड़ा, आलनिया, उम्मेदगंज, बरधा बांध व उदपुरिया में ठिकाने बनाने वाले ब्लू थ्रोट पक्षी भी वापस उत्तरी अमेरिका लौटने लगे हैं। सितम्बर माह से ही इनका भारत आना शुरू हो गया था। पांच से छह माह तक देश के विभिन्न राज्यों में अपना ठिकाना बनाते हैं। गर्मी बढ़ने के साथ ही इनका उत्तरी अमेरिका के अलास्का, ईस्ट साइबेरिया, रूस व हिमालयी क्षेत्र की ओर लौटने लग जाते हैं। इस पक्षी की सबसे मुख्य विशेषता यह होती है कि यह अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए मधुर आवाज में गाना गाता है। </p>
<p><strong>अब फिर से सितम्बर में होगी मुलाकात</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर अंशू शर्मा ने बताया कि नील कंठी पक्षियों का सितम्बर से आना शुरू हो जाता है। मार्च-अप्रेल तक वापस लौटने लगते हैं। यह नदी, तालाब, खेतों व दलदली जगहों पर अपना ठिकाना बनाते हैं। वर्तमान में अभेड़ा, आलनिया डेम, उम्मेदगंज, उदपुरिया व बरधा बांध के आसपास इनकी आबादी रहती है। यह कीड़े-मकोड़ों को भोजन बनाते हैं। ये पक्षी एक दिन में 80 से 100 किमी की उड़ान भरते हैं। अब फिर से सितम्बर में इनसे मुलाकात होगी।</p>
<p><strong>पक्षी ब्लैक आईबीज व ईग्रेट कर रहे मोहित </strong><br />शहर के डीसीएम रोड रोड स्थित जेके फैक्टी का आवासीय एरिया, कंसुआ-प्रेमनगर स्थित नाले से शिव मंदिर के बीच लगभग डेढ़ किमी का क्षेत्र में ब्लैक हैडेड आईबीज के बड़ी संख्या में घौंसले हैं। जबकि, 1 हजार से ज्यादा घौंसले केटल ईग्रेट, मिडन ईग्रेट, लिटिल ईग्रेट व लार्ज इग्रेट सहित अन्य प्रजातियों के पक्षियों के हैं। ब्लैक हैडेड आईबीज पक्षी अपनी अळखेलियों से  वन्यजीव प्रेमियों व स्थानीय लोगों को मोहित कर रहे हैं। पक्षी की साइटिंग भी अच्छी हो रही है। इनकी आंख का रंग सफेद होने से इसे व्हाइट आईबीज भी कहते हैं। ये पक्षी आकार में बड़े होते हैं, कीट, पतंगे के साथ सांप, कैछुए सहित अन्य जीव को भोजन बनाते हैं। ये पक्षी किसान हितेषी होते हैं। ये फसलों को बिलकुल भी नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि कीट, पतंगें, चूहों, सांपों व अन्य कीड़ों से फसलों की रक्षा करते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Apr 2023 14:50:25 +0530</pubDate>
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