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                <title>wildlife department - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>wildlife department RSS Feed</description>
                
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                <title>सांभर और हिरणों की जिंदगी निगल गई पॉलीथिन : 6 वन्यजीवों की दर्दनाक मौत, सांभर व हिरणों के पेट से निकली 10 से 15 किलो पॉलीथिन</title>
                                    <description><![CDATA[पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा : भूख व बीमारी से नहीं पॉलीथिन से हुई वन्यजीवों की मौत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/polythene-swallowed-the-lives-of-sambar-and-deer--6-animals-died-a-painful-death--10-to-15-kg-of-polythene-was-found-in-the-stomachs-of-sambar-and-deer/article-138859"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(2)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहरवासियों की लापरवाही और बढ़ता प्लास्टिक कचरा अब जंगल के प्राणियों पर मौत बनकर टूट रहा है। पिछले दिनों सैन्य क्षेत्र और रेलवे स्टेशन के आसपास से रेस्क्यू किए सांभर व हिरणों की दर्दनाक मौत हो गई। इनका चिड़ियाघर रेस्क्यू सेंटर में पोस्टमार्टम किया गया तो भयानक मंजर देखने को मिला। प्रत्येक वन्यजीव के पेट से 10 से 15 किलो पॉलीथिन निकला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि इन मासूस वन्यजीवों की मौत भूख या बीमारी से नहीं, बल्कि प्लास्टिक निगलने से हुई है।</p>
<p><strong>पॉलीथिन ने ब्लॉक किया पाचन तंत्र</strong><br />सैन्य व रेलवे स्टेशन क्षेत्र में कुछ दिनों पहले 6 सांभर व हिरण मृत अवस्था में मिले थे। जिन्हें वन विभाग की टीम रेस्क्यू कर कोटा चिड़ियाघर आई। जहां वन्यजीव चिकित्सक द्वारा पोस्टमार्टम किया। जिसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, सभी हिरणों के पाचन तंत्र में भारी मात्रा में प्लास्टिक आधारित कचरा जमा था। प्रत्येक मृत वन्यजीव के पेट से करीब 10 से 15 किलो प्लास्टिक कचरा निकला। जिससे पाचन तंत्र पूरी तरह ब्लॉक हो गया। जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई।</p>
<p><strong>आंतों में सूजन, अंदरुनी अंगों को गंभीर नुकसान </strong><br />वन्यजीव विभाग के एसीएफ पंकज सिंह मीणा ने बताया कि सैन्य व स्टेशन क्षेत्र में सांभर व हिरणों का हैबीटेट है। लोग खाद्यय साम्रगी को प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर फैंक देते हैं। जिसे भोजन की तलाश में विचरण कर रहे वन्यजीव निगल लेते हैं। जिससे भोजन के साथ पॉलीथिन भी शरीर में जाकर आंतों में फंस जाती है, जो पेट में प्लास्टिक की गांठ बनकर आंतों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। नतीजन, भूख न लगना, कमजोरी, सूजन और आंतरिक अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। यह परिस्थितियां धीरे-धीरे उन्हें मौत की तरफ धकेल देती है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि मृत वन्यजीवों की पॉलीथिन के कारण आंतों में सूजन थी और अंदरुनी अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा, जो उनकी मौत का कारण बनी।</p>
<p><strong>प्लास्टिक से वन्यजीवों पर गंभीर असर</strong><br />एसीएफ मीणा ने बताया कि प्लास्टिक निगलने से हिरणों में पोषक तत्वों की पूर्ति रुक जाती है। वजन तेजी से घटता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। माइक्रोप्लास्टिक रुमेन की प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित करता है, जिससे ऊर्जा उत्पादन कम होता है। साथ ही प्लास्टिक से निकलने वाले रसायन हार्मोन असंतुलन और प्रजनन संबंधी समस्याएं भी पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में पॉलीथिन मिलना क्षेत्र में गंभीर प्लास्टिक प्रदूषण की ओर इशारा करता है। यह खतरा केवल सांभर तक सीमित नहीं है, बल्कि चीतल सहित अन्य शाकाहारी वन्यजीव भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।</p>
<p><strong>सैन्य व स्टेशन क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त करने की जरूरत</strong><br />वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठनों ने सैन्य क्षेत्र और रेलवे स्टेशन के आसपास के इलाकों को प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र घोषित करने की मांग की है। साथ ही सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्त प्रतिबंध, नियमित सफाई अभियान और प्रभावी कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं, वन क्षेत्रों में देशी पौधों का रोपण कर हिरणों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक भोजन स्रोत विकसित किया जाए ताकि वन्यजीव की जान बच सके।</p>
<p><strong>जैव विविधता के लिए खतरा</strong><br />शाकाहारी जीवों की मृत्यु से पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होता है। उनकी संख्या घटने से शिकारी जीवों के लिए भोजन की कमी और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है। माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी और पौधों को भी नुकसान पहुंचाकर जैव विविधता को खतरे में डालता है। यह उसी क्षेत्र में भोजन तलाश करने वाले अन्य वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।</p>
<p><strong>हबीर्वोर का करेंगे पुनर्वास</strong><br />सैन्य व स्टेशन क्षेत्रों से कुछ सांभर व हिरणों का रेस्क्यू किया गया था। पोस्टमार्टम कराने पर सामने आया कि उनके पेट से करीब 15 किलो पॉलीथिन निकली, जो उनकी दर्दनाक मौत का कारण बनी। इस संबंध में सैन्य अधिकारियों को पत्र लिख वन्यजीवों को ट्रैंकुलाइज कर सुरक्षित वनक्षेत्र में शिफ्ट करने की परमिशन ली जाएगी। साथ ही उनके एरिया में भोजन सामग्री को पॉलीथिन में बांधकर न फैंकने के लिए जागरूक किया जाएगा। वहीं, घरों से निकलने वाली खाद्य सामग्री को फेंकने के लिए कचरा पात्र रखने व जगह-जगह साइन बोर्ड लगाने का आग्रह करेंगे।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 08 Jan 2026 15:10:27 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का : किसी भी पक्षी का नेचुरल फूड नहीं है ज्वार-बाजरा, 90% कीटभक्षी व 10% बीजभक्षी होते हैं पक्षी</title>
                                    <description><![CDATA[अपना प्राकृतिक भोजन भूले कबूतर, अब आर्टिफिशल फूड पर हो गए निर्भर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news--sorghum-and-millet-are-not-the-natural-food-of-any-bird--90--of-birds-are-insectivores-and-10--are-seed-eaters/article-127185"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)-(1)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अनाज, ज्वार-बाजरा किसी भी पक्षी का प्राकृतिक भोजन नहीं है। लेकिन, लोग ज्वार-बाजरा खिलाकर प्रकृति के फूड चैन तोड़ रहे हैं। जिसके दुष्परिणाम घातक बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। आज सार्वजनिक स्थानों से घरों की छतों तक कबूतरों का कब्जा हो गया। कबूतरों को दाना डालकर लोग न केवल ईको सिस्टम को बर्बाद कर रहे बल्कि मानव जीवन को घातक संक्रमण व बीमारियों की ओर भी धकेल रहे हैं। कबूतरों के फड़फड़ाहट के दौरान पंखों से निकलने वाले बारीक रेशें व बीट से हवा में फैलते बैक्टेरिया सांस के साथ शरीर में जाते हैं और गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। यह बात वन्यजीव विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों में आयोजित जागरूकता शिविर में उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बच्चों को जागरूक करते हुए कही। वाइल्ड लाइफ कोटा द्वारा बुधवार को राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पुलिस लाइन व श्रीपुरा स्थित पीएमश्री राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय में जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। जिसमें बच्चों को पक्षियों के जीवन चक्र से रुबरू कराया।</p>
<p><strong>आस्था के नाम पर पक्षियों को गुलाम बनाना नेचर के खिलाफ</strong><br />उन्होंने बताया कि कबूतर के सम्पर्क में आने से  फंग्ल इंफेक्शन हिस्टोप्लासमोसिस और क्रिप्टोकोकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। ऐसे में घर के आंगन, बालकनी या छत पर दाना डालने से बचें। प्रकृति ने उन्हें खुद भोजन जुटाने और जीवन जीने के लायक बनाया है। उन्हें दाना डालकर प्रकृति के ईको सिस्टम से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। आस्था के नाम पर पक्षियों को गुलाम बनाना नेचर के खिलाफ है।   यदि, दान पुण्य करना है तो मवेशियों को हरा चारा, गुड़ खिला सकते हैं।  </p>
<p><strong>वन्यजीवों की जान ले रहे गुब्बारे</strong><br />उप वन संरक्षक भटनागर बताते हैं, जन्मदिवस या अन्य खुशी के मौके पर गुब्बारों का उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि, यह वन्यजीव व जलीय जीवों की मौत के कारण बनते हैं। गुब्बारें दो तरह के होते हैं, पहला-बायोडिग्रेडेबल जो लेटेक्स होते हैं। वहीं,  नॉन बायोडिग्रेडेबल होते हैं, जो बेहद खतरनाक होते हैं। गैस निकलने पर इनके दो ही जगह जंगल और नदियां-समुद्र में गिरने से कछुआ, उद बिलाव,  व्हेल,  डॉल्फिन, पक्षी गुब्बारों में उलझने या इनक टुकड़े निगलने से उनकी मौत हो जाती है। </p>
<p><strong>इंसानी दखल से टूटी पक्षियों की खाद्य श्रृंखला </strong><br />डीएफओ भटनागर ने बच्चों को बताया कि दुनिया में 90% पक्षी कीटभक्षी और 10% बीजभक्षी होते हैं, जिसमें कबूतर भी शामिल है।  अनाज, ज्वार व बाजरा किसी भी पक्षी का नेचुरल फूड नहीं है। जाने-अनजाने में इंसानी दखल से पक्षियों की खाद्यय शृखंला टूट रही है। वर्तमान में स्थिति यह हो गई कि कबूतर अब अपना मुख्य भोजन बीज खाना भूल गया, अब वह आर्टिफिशल फूड पर निर्भर हो गया। इतना ही नहीं कबूतरों को ज्वार-बाजरा खिलाना इंसान की दिनचर्या में शामिल हो गया। नियमित भोजन मिलने से उनकी संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। जबकि, इनके पंखों व बीट से हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस, फंग्ल इंफेक्शन हिस्टोप्लासमोसिस और क्रिप्टोकोकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों  का खतरा बढ़ गया है। कबूतरों की सूखी बीट के वायरस हवा के साथ शरीर में पहुंचकर फेफड़े डेमेज कर रहे हैं।</p>
<p><strong>बंदरों को भोजन व चीटिंयों को न खिलाएं आटा</strong><br />सहायक वनपाल प्रेम कंवर ने बच्चों को जागरूक करते हुए कहा, बंदरों व लंगूर को भोजन, चीटिंयों को आटा नहीं खिलाना चाहिए। बंदर बड़े बीज वाले फल जैसे तेंदु, बेल पत्र, आम के फलों को खाकर बीज को एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलाते हैं, जिससे पड़ों की संख्या बढ़ती है। लेकिन, रेडिमेड फूड खिलाने से वे जंगल से आबादी के बीच बस गए। इनके काटे जाने से रेबीज तक का खतरा रहता है। इसी तरह चीटिंयों को आटा नहीं खिलाना चाहिए। इस दौरान  कोटा ग्रीन कम्यूनिटी के प्रणव सिंह खींची, ज्योत्सा खींची मौजूद रहें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Sep 2025 14:34:57 +0530</pubDate>
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                <title>87 लाख से बनेगा चिड़िया घर में पक्षी घर</title>
                                    <description><![CDATA[चिड़िया घर को व्यवस्थित कर सुधारेंगे इंफ्रास्ट्रक्चर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/bird-house-will-be-built-in-the-zoo-with-87-lakhs/article-101210"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/5554-(1)38.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नयापुरा स्थित रियातकालीन चिड़ियाघर में 87 लाख की लागत से पक्षी घर बनाया जाएगा। वहीं, चिड़ियाघर को व्यवस्थित कर एनक्लोजर्स को रिनोवेट किए जाने की कवायद शुरू हो गई है। विद्यार्थियों को पक्षियों के प्रति जागरूक करने के लिए यहां ओपन ऑडिटोरियम भी बनाया जाएगा। दरअसल, वन्यजीव विभाग के अधीन कोटा जू में विकास कार्यों के लिए विभाग को सरकार से 87 लाख का बजट मिला है। जिससे यहां पुराने पक्षी घर को रिनोवेट करने के साथ ट्रीटमेंट हाउस बनाया जाएगा। </p>
<p><strong>चिड़िया घर में बनेगा ओपन ऑडिटोरियम</strong><br /> डीएफओ भटनागर ने बताया कि हमारा उद्देश्य बच्चों को पक्षियों, वन्यजीवों व प्रकृति के प्रति जागरूक करना है। इसके लिए यहां ओपन ऑडिटोरियम बनाया जाना है। ताकि, विद्यार्थियों को यहां बिठाकर उन्हें पक्षियों व जानवरों के बारे में जानकारी दी जा सके। वहीं, जू में जगह-जगह साइन बोर्ड लगाए जाएंगे। </p>
<p><strong>वर्ष 2023 में मिला था बजट, हुआ लैप्स </strong><br />गत कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2023 में अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पक्षी घर बनाने के लिए 87 लाख रुपए का बजट जारी किया था। लेकिन, तत्कालीन अधिकारियों द्वारा समय पर टेंडर प्रक्रिया नहीं करवाई गई। इसी बीच 9 अक्टूबर 2023 को विधान सभा चुनाव की आचार संहिता लग गई। ऐसे में 5 दिसम्बर तक बजट का उपयोग नहीं हो सका। इसके बाद आचार संहिता हटी तब भी टैंडर प्रक्रिया नहीं की गई और समय निकलता गया लेकिन, जनवरी 2024 तक भी पक्षी घर का निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। आखिरकार मार्च 2024 को वित्तिय की समाप्ती के साथ बजट भी लैप्स हो गया। </p>
<p><strong>पुराने पक्षी घर को रिनोवेट कर बनाएंगे नया </strong><br />वाइल्ड लाइफ कोटा डीसीएफ अनुराग भटनागर ने बताया कि सरकार से पक्षीघर के लिए 87 लाख का बजट मिला है। जिससे यहां बना पुराना पक्षी घर जगह-जगह टूटे हुए हैं, जिनका रिनोवेशन कर नया पक्षी घर बनाया जाएगा। वहीं, टाइगर व लॉयन के एनक्लोजर को भी व्यवस्थित कर पक्षी घर में कनर्वड किया जाएगा। जिसकी तैयारियां भी शुरू करवा दी गई है। </p>
<p><strong>ट्रीटमेंट हाउस बनाने के साथ सुधारेंगे इंफ्रास्ट्रक्चर</strong><br />उन्होंने बताया कि वन्यजीवों का पोस्टमार्टम करने के  लिए टेबल सहित अन्य जरूरी सामानों की खरीद कर ट्रीटमेंट हाउस बनाना है। साथ ही चिड़ियाघर का इंफ्रास्ट्रक्चर भी सुधारना है। वहीं, रेस्क्यू कर लाए जाने वाले जानवरों को रखने के लिए पिंजरे भी बनाएंगे। इसके लिए टाइगर-लॉयन के खाली पड़े एनक्लोजर को पक्षी घर के रूप में विकसित करेंगे। </p>
<p><strong>चिड़ियाघर में यह हैं वन्यजीव</strong><br />कोटा चिड़ियाघर में वर्तमान में बंदरों की विशेष प्रजाति के 2 बोनट, 18 पहाड़ी कछुए, पानी के 5 कुछए, तीन फीट ऊंचे पेलिकन हवासिल, 8 से 10 फीट लंबे 4 अजगर  जोड़े में, 2 घड़ियाल, 2 मगरमच्छ तथा पक्षियों में इग्रेट, स्पॉट बिल्ड डक, विसलिंग टिल, कोम्ब डक, नाइट हेरोन, पोण्ड हेरोन, बारहेडेड गूज, राजहंस बतख, तोता, लवबर्ड्स सहित कुल 48 तरह के वन्यजीव हैं, जिन्हें शिफ्टिंग का इंतजार है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />सरकार से पक्षी घर के लिए 87 लाख का बजट मिला है। इस बजट से यहां बने पुराने पक्षी घर का रिनोवेट कर नया पक्षी घर बनाया जाएगा। साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा जाएगा। इसके अलावा टाइगर-लॉयन के एनक्लोजर को भी पक्षी घर के रूप में विकसित करेंगे। वहीं, विद्यार्थियों को जागरूक करने के लिए ओपन ओडिटोरियम भी बनाया जाएगा। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jan 2025 16:26:25 +0530</pubDate>
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                <title>चिड़ियाघर से 200 किलो इलेक्ट्रॉनिक तोल मशीन चोरी, वाहनों की बैट्रियां व तालों पर भी हाथ साफ </title>
                                    <description><![CDATA[जानवरों के ज्वार, बाजरा और चावल भी चुरा ले गए चोर
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/electronic-weighing-machine-weighing-200-kg-stolen-from-zoo/article-101209"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/257rtrer-(1)24.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नयापुरा स्थित रियासतकालीन चिड़िया घर में चोरी की वारदात थमने का नाम नहीं ले रही। गत रविवार को यहां से 200 किलो की इलेक्ट्रोनिक कांटा मशीन चोरी हो गई। इसके बावजूद वन्यजीव विभाग द्वारा अभी तक मामले की पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गई। चिड़िया घर में सामान चोरी होने का मामला नया नहीं है। इससे पहले भी कई सामान चोरी हो चुके हैं। फिर भी वन्यजीव विभाग द्वारा सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए। डेढ़-दो महीने पहले ही खरीदी थी मशीन: चिड़िया घर में दाना-पानी व वन्यजीवों का वजन तोलने के लिए करीब डेढ़-दो माह पहले ही यह इलेक्ट्रोनिक कांटा मशीन खरीदी गई थी। जिसे जू में राशन पानी रखने वाले कमरे में रखा गया था। आखिरी बार गत शनिवार को मछली, खीरा, ककड़ी सहित अन्य फूड का तोल किया गया था। इसके बाद रविवार को यह मशीन चोरी हो गई। वारदात का पता लगने के 6 बाद भी वन्यजीव प्रशासन द्वारा चोरी की संबंधित पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गई। </p>
<p><strong>बेजुबानों का दाना-पानी भी हो चुका चोरी</strong><br />चिड़िया घर में इलेक्ट्रोनिक कांटा मशीन चोरी होने का मामला नया नहीं है, इससे पहले भी यहां कई लोहे के सामान चोरी हो चुके हैं। इतना ही नहीं, बेजुबान जानवरों का दाना-पानी तक चोरी हो चुका है। वहीं, कुछ महीने पहले चिड़ियाघर से 50 से 60 किलो ज्वार, बाजरा व चावल चोरी हो चुके हैं। इसके अलावा तांबा युक्त  करीब 20 फीट लंबी कैबल भी चोर चुरा ले गए। इसके बावजूद वन्यजीव अधिकारियों द्वारा सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए।</p>
<p><strong>वाहनों की बैट्रियां व तालों पर भी हाथ साफ</strong><br />जानकारी के अनुसार, चिड़ियाघर में करीब 7-8 माह पहले जानवरों के पिंजरे की 50 किलो वजनी फाटक भी चोर चुरा ले गए। इसके अलावा वाहनों की पुरानी बैट्रियां भी चोरी हो चुकी है। सुरक्षा के इंतजाम नहीं होने से कोटा जू से अन्य सरकारी सम्पतियां भी चोरों के निशाने पर बनी हुई है। </p>
<p><strong>गत वर्ष आवक-जावक रजिस्टर भी हो चुका चोरी</strong><br />गत वर्ष यहां ऑफिस के कमरे से सरकारी दस्तावेज आवक-जावक रजिस्टर भी चोरी हो गया। जिसका आज तक पता नहीं लग सका। हालांकि, तत्कालीन वन्यजीव अधिकारी ने पुलिस थाने में मामले की रिपोर्ट दर्ज करवाने के कर्मचारियों को निर्देश दिए थे, जिस पर चोरी का मामला दर्ज करवाया गया था। </p>
<p><strong>न चौकीदार और न ही सीसीटीवी कैमरे</strong><br />चिड़ियाघर में सुरक्षा के इंतजाम नहीं है। जिससे सरकारी सम्पतियां चोरों के निशाने पर रहती है। यहां सुरक्षा के लिहाज से न तो रात्रि चौकीदार है और न ही सीसीटीवी कैमरें लगे हुए हैं। लगातार चोरी की वारदात होने के बावजूद सुरक्षा के इंतजामों की अनदेखी की जा रही है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />चिड़ियाघर से इलेक्ट्रोनिक कांटा मशीन चोरी हुई है। मामले की पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाएंगे।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p>चिड़िया घर के कर्मचारी गत बुधवार को आए थे। जिन्होंने चोरी होने की बात बताई थी। इस पर हमने उन्हें अपने गार्ड के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने  के लिए आवेदन करने को कहा था। इसके बाद वह वापस नहीं आए। ऐसे में अभी तक इस संबंध में कोई मुकदमा दर्ज नहीं करवाया गया है। <br /><strong>-लक्ष्मीचंद वर्मा, सीआई नयापुरा पुलिस थाना</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jan 2025 15:11:41 +0530</pubDate>
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                <title>सर्दी में पानी से बाहर आ रहा दानव, खतरे में पर्यटक</title>
                                    <description><![CDATA[तालाब किनारे जॉय ट्रेन होने से बच्चों की मौजूदगी अधिक रहती है। ऐसे में हादसे का खतरा बना रहता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/monster-coming-out-of-water-in-winter--tourists-in-danger/article-99596"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/465465.jpg" alt=""></a><br /><p> कोटा। नयापुरा स्थित सीवी गार्डन के तालाब में 8 महीने से भारी-भरकम मगरमच्छ ने डेरा डाल रखा है। शिकायतों के बावजूद वन्यजीव विभाग के अफसरों ने आंखें मूंदी रखी। जबकि, 15 दिन पहले ही मगरमच्छ तालाब किनारे बतखों पर हमला कर चुका है। एक बतख को तो खा भी गया और दूसरी को लहुलूहान कर दिया। घटना के बाद से ही पर्यटक व मॉर्निंग वॉकर्स दशहत में है। वहीं, खतरे की जद में केडीए द्वारा बोटिंग  करवाई जा रही है। तालाब किनारे जॉय ट्रेन होने से बच्चों की मौजूदगी अधिक रहती है। ऐसे में हादसे का खतरा बना रहता है। जागरूक मॉर्निंग वॉकर्स ने पहले भी इसकी शिकायत वन्यजीव विभाग से की थी। सम्पर्क पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज करवाई। इसके बावजूद वन्यजीव विभाग द्वारा अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि, कुछ माह पहले पिंजरा लगाकर खानापूर्ति जरूर की।  </p>
<p><strong>मॉर्निंग वॉकर्स में दहशत </strong><br />सीवी गार्डन में बोटिंग व जॉय ट्रेन संचालन में लगे कर्मचारियों ने बताया कि गत वर्ष 9 दिसम्बरको तालाब में छिपा मगरमच्छ ने बतखों पर हमला कर दिया था। बतखों के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुन स्टाफ व पर्यटक सकते में आ गए थे। मौके पर जाकर देखा तो मगरमच्छ बतखों पर हमला कर रहा था। एक बतख को तो खा गया और दूसरी को लहुलूहान कर दिया। लोगों की आवाजाही होने से मगरमच्छ वापस पानी में  चला गया। घटना के बाद से ही लोगों में दहशत है। </p>
<p><strong>वन अधिकारियों को लिख चुके पत्र, कोई सुनवाई नहीं</strong><br />सीवी गार्डन के बोटिंग व जॉय ट्रेन कॉन्ट्रेक्टर शिव शर्मा ने बताया कि गार्डन के तालाब में मगरमच्छ लंबे समय है। जबकि, इसी तालाब में पैदल बोटिंग करवाई जाती है। वहीं, जॉय ट्रेन भी यहीं हैं। ऐसे में लोगों व बच्चों की मौजूदगी अधिक रहती है। ऐसे में हादसे का खतरा बना रहता है। मगरमच्छ रेस्क्यू को लेकर हमने वन विभाग के अधिकारियों को कई बार पत्र लिखे लेकिन किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। विभाग की अनदेखी से बड़ा हादसा हो सकता है। केडीए के अधिकारियों ने भी पत्र भेज रेस्क्यू करवाने की मांग की थी, जिसे भी वन अधिकारियों ने अनदेखा कर दिया। जबकि, पार्क में सुबह-शाम बड़ी संख्या में लोग आते हैं। </p>
<p><strong>तालाब किनारे ही धूप सेंक रहा मगरमच्छ</strong><br />मॉर्निंग वॉकर्स डॉ. सुधीर उपाध्याय ने बताया कि तालाब में एक नहीं दो मगरमच्छ है। सर्दियों में वह अक्सर तालाब किनारे ही धूप सेंकता नजर आता है। जबकि, तालाब के किनारे पर ही मंदिर है, जहां सुबह व शाम को श्रद्धालु आते हैं, ऐसे में वह मगरमच्छ के हमले का खतरा बना रहता है। वन अधिकारियों से इसकी शिकायत की थी तो उन्होंने कुछ दिन पिंजरा लगाकर खानापूर्ति कर दी लेकिन  रेस्क्यू करने का प्रयास नहीं किया। </p>
<p><strong>सम्पर्क पोर्टल पर भी की शिकायत   </strong><br /><strong>डॉ. उपाध्याय</strong> ने बताया कि गत वर्ष अगस्त माह में मुख्यमंत्री सम्पर्क पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज करवाई थी। तालाब में 8 से 10 फीट लंबा मगरमच्छ डेरा जमाए हुआ है। मॉर्निंग व इवनिंग वॉक पर प्रतिदिन यहां बड़ी संख्या में शहरवासी व पर्यटक आते हैं। मगरमच्छ कभी पानी में तो कभी जमीन पर झाड़-झंकाड़ों के बीच छिपा रहता है। ऐसे में राहगीरों व बच्चों पर मगरमच्छ के हमले का खतरा ज्यादा रहता है। </p>
<p><strong>मंदिर के पास झाड़ियों में छिपा रहता है  </strong><br />राहगीरों ने बताया कि सीवी गार्डन में तालाब किनारे गणेश मंदिर बना हुआ है। जहां बोटिंग के लिए टिकट विंडो है। यहां बड़ी संख्या में बच्चे खेलते हैं। वहीं, श्रद्धालु दर्शन को जाते हैं। ऐसे में मगरमच्छ द्वारा हमला करने का डर लगा रहता है। सर्दियों में मगरमच्छ तालाब से बाहर आने  की संभावना अधिक रहती है। ऐसे में वह लोगों पर हमला कर सकता है। वन अधिकारियों की घोर लापरवाही से बड़ा हादसा हो सकता है। पूर्व में मगरमच्छ के फोटो-वीडियो वन्यजीव विभाग के डीएफओ को भेजकर रेस्क्यू का आग्रह किया था। इसके बावजूद वन अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं। </p>
<p><strong>बोटिंग में बच्चे, हादसे का डर </strong><br />सीवी गार्डन के तालाब में केडीए द्वारा पेडल बोटिंग करवाई जाती है। जबकि, इसी तालाब में मगरमच्छ छुपा हुआ है। बोट में छोटे बच्चे भी होते हैं, जो पानी में भी हाथ डाल देते हैं। ऐसे में मगरमच्छ के हमले का डर बना रहता है। इधर, पर्यटक कैलाश माहेश्वरी व अशोक मीणा का कहना है, केडीए को या तो बोटिंग बंद करवानी चाहिए या फिर मगरमच्छ को रेस्क्यू करवाना चाहिए। अफसरों की लेटलतीफी व अनदेखी के चलते बच्चों की जान संकट में रहती है। </p>
<p><strong>पिंजरा भी उठा ले गए वनकर्मी </strong><br />मॉर्निंग वॉकर सुरेंद्र कुमार, नीलेश जोशी, अरविंद जाट का कहना है कि दो महीने पहले वन्यजीव विभाग के कर्मचारियों ने तालाब किनारे पिंजरा लगाया था लेकिन मॉनिटरिंग नहीं करते थे। वह पिंजरा देखने तक भी नहीं आते थे। मगरमच्छ को रेस्क्यू करने का प्रयास ही नहीं किया। वन अधिकारियों की घोर लापरवाही से किसी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। जिला प्रशासन को हस्तक्षेप कर सीवी गार्डन के तालाब से मगरमच्छ को रेस्क्यू करने के लिए वन विभाग के अधिकारियों को पाबंद करना चाहिए। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />सर्दियों में मगरमच्छ के पानी से बाहर रहने की संभावना अधिक रहती है। ऐसे में रेस्क्यू करने के प्रयास करेंगे। हालांकि, पर्यटकों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। <br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वनसंरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक वन विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jan 2025 14:35:02 +0530</pubDate>
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                <title>जल्द दिखेगा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पक्षी </title>
                                    <description><![CDATA[ऐमू को फॉक्स के एनक्लोजर में रखा जाएगा। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/world-s-second-largest-bird-will-be-seen-soon/article-97791"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/jld-dikhega-duniya-ka-dusra-sbse-bda-pakshi...kota-news-16-12-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटावासियों को जल्द ही दुनिया के दूसरे सबसे बड़े नॉन फ्लाई बर्ड यानी(उड़ने में अक्षम) पक्षी एमू की झलक देखने को मिल सकेगी। वन्यजीव विभाग को जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से 4 ऐमू पक्षी लाने की परमिशन मिल चुकी है। ऐसे में अगले हफ्ते तक ऐमु को कोटा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा। इसके साथ ही नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क जयपुर से 5 चिंकारा लाने की भी स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। ऐसे में विशालकाय पक्षी के आने से पर्यटयन का थमा दौर फिर से पटरी पर आ सकेगा। दरअसल, नर टाइगर व लॉयन सहित बड़े एनीमल्स नहीं होने से पर्यटकों का अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के प्रति रुझान घटा है। ऐसे में ऐमु के आने से पर्यटकों की संख्या में इजाफा होगा, जिससे सरकार के राजस्व में वृद्धि हो सकेगी। </p>
<p><strong>फॉक्स के एनक्लोजर में रहेंगे ऐमू</strong><br />वन्यजीव विभाग कोटा के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायलॉजिकल पार्क में जयपुर के नाहरगढ़ से 4 एमू पक्षी व जोधपुर के माछिया से 5 चिंकारा लाए जाएंगे। ऐमू को फॉक्स के एनक्लोजर में रखा जाएगा। जिसकी तैयारियां भी कर ली गई है। अब सीजेडए से शिफ्टिंग की परमिशन लेनी है, जो आसानी से मिल जाएगी। शिफ्टिंग में सबसे बड़ी रुकावट एनीमल देने वाले नाहरगढ़ व माछिया बायोलॉजिकल से स्वीकृति मिलने की थी, जो दूर हो चुकी है। ऐसे में अब शिफ्टिंग का रास्ता साफ हो चुका है। अगले सप्ताह तक ऐमू व चिंकारा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में ले आएंगे। </p>
<p><strong>गत वर्ष हो गई थी 4 एमू की मृत्यु</strong><br />अगस्त 2019 में चार एमू जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से कोटा चिड़िया घर में लाए गए थे, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहे। जिन्हें गत वर्ष 6 जून 2022 को अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किया गया था। लेकिन, कुछ समय बाद एक-एक कर चारों पक्षियों की मौत हो गई थी। इसके बाद से कोटावासियों को एमू देखने को नहीं मिले।</p>
<p><strong>4 से 5 फीट ऊंचा होता है ऐमू</strong><br />वन्यजीव विशेषज्ञ एएच जैदी बताते हैं, एमू मूल रूप से आॅस्ट्रेलिया का पक्षी है। यह करीब चार से पांच फीट ऊंचा होता है। यह विश्व के नहीं उड़ने वाले पक्षियों में दूसरा सबसे बड़ा पक्षी है। यह शाकाहारी व कीटाहारी पक्षी है। इसे दाल, दलिया, बाजरा, चना चूरी, चावल व हरी सब्जी खासी पसंद है।  ऊंचाई में नर की अपेक्षा मादा बड़ी होती है। मादा को दोस्त बनाने के लिए इन्हें प्रतिद्वंद्वी नर से झगड़ा करना होता है। अपने मजबूत पैरों से गड्ढ़ा खोदकर आशियाना बनाता है। नर एमू भूरा तो मादा मटमैली होती है। इनकी चोंच मजबूत व लंबी होती है।</p>
<p><strong>नर एमू करता है बच्चे का पालन-पोषण  </strong><br />उन्होंने बताया कि नर ऐमू की सबसे बड़ी खासियत बच्चे के प्रति पिता की तरह जिम्मेदारी निभाना है। मादा पक्षी के एक बार अंडे देने के बाद अंडे को सहेजना से लेकर बच्चे निकलने तक देखभाल करने की सारी जिम्मेदारी नर एमू ही निभाता है। इसके अलावा बच्चों का पालन-पोषण भी पिता की तरह यही करता है।  </p>
<p>जयपुर के नाहरगढ़ व जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से 4 ऐमू व 5 चिंकारा लाने की परमिशन मिल चुकी है। ऐसे में अगले सप्ताह तक दोनों एनिमल्स व बर्ड्स कोटा ले आएंगे। इसके अलावा अन्य बड़े एनिमल्स भी लाने की कोशिश लगातार जारी है।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 17:35:46 +0530</pubDate>
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                <title>अब भोपाल पर टिकी कोटा की उम्मीदें</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा वन्यजीव विभाग ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक व सीजेडए को लिखा पत्र। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/now-kota-s-hopes-are-pinned-on-bhopal/article-97789"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer33.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में युवा बाघ-बाघिन का जोड़ा लाने की कवायद तेज हो गई है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य  वन्यजीव प्रतिपालक व भोपाल चिड़िया घर प्रशासन को पत्र भेजा जा चुका है। अब भोपाल जू प्रशासन की स्वीकृति का इंतजार है। भोपाल की रजामंदी मिलने के साथ ही शिफ्टिंग का रास्ता भी साफ हो जाएगा। हालांकि, कोटा वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट स्वीकृति मिलने की उम्मीद जता रहा है। गौरतलब है कि अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में बाघ नाहर की मौत व लॉयन नहीं होने से पार्क के राजस्व पर विपरीत असर पड़ा। ऐसे में वन्यजीव विभाग बड़े एनिमल लाने की तैयारी में जुटा है। </p>
<p><strong>4 से 8 वर्ष के बाघ-बाघिन लाना प्राथमिकता</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि भोपाल चिड़ियाघर में अच्छी संख्या में बाघ-बाघिन हैं। वहां से कम उम्र का ही जोड़ा लाना प्राथमिकता है। हमारी कोशिश है कि 4 से 8 वर्ष के बीच आयु के बाघ-बाघिन लाने की है। ताकि, ब्रिडिंग होने से बायोलॉजिकल पार्क में इनकी संख्या में इजाफा हो सके और भविष्य में यहां बाघों का कुनबा पनप सके। इस संबंध में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पत्र लिखा जा चुका है। भोपाल चिड़ियाघर के अधिकारियों से भी सम्पर्क किया गया है। </p>
<p><strong>सज्जनगढ़ ने लॉयन देने से किया इंकार  </strong><br />डीएफओ भटनागर ने कहा, उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क से लॉयन लाया जाना था लेकिन उनके यहां लॉयन सफारी शुरू किए जाने के कारण लॉयन देने से मना दिया। वहीं, सज्जनगढ़ में गुजरात से लॉयन का जोड़ा लाया जा चुका है। ऐसे में एक लॉयन अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मिले, इसके लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को फिर से पत्र लिखा गया है। पार्क के विकास के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। </p>
<p><strong>समय पर चेत जाते तो मिल जाता लॉयन</strong><br />जानकारी के अनुसार अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में लॉयनेस व लॉयन का जोड़ा लाने की तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जयपुर से स्वीकृति दिसम्बर 2022 में ही मिल गई थी। इसके लिए कोटा से वन्यजीव डीएफओ उदयपुर से पत्राचार भी किया गया था। उस समय वहां से हाईब्रिड लॉयन अली कोटा को दिए जाने की हरी झंडी भी मिल गई थी। लेकिन, कोटा वन्यजीव विभाग के तत्कालीन अधिकारी स्वीकृति मिलने के दो साल बाद भी केंद्रिय चिड़ियाघर प्राधिकरण से शिफ्टिंग की स्वीकृति नहीं ले सके। जिसकी वजह से शिफ्टिंग में अनावश्यक देरी होती रही। इसका नतीजा यह रहा कि वर्तमान में सज्जनगढ़ में अब लॉयन सफारी शुरू किए जाने की तैयारी चल रही है। ऐसे में अब उन्होंने कोटा को लॉयन देने में असमर्थता जाहिर कर दी। </p>
<p><strong>लॉयन-टाइगर नहीं होने से घटा राजस्व</strong><br />विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, लॉयन व टाइगर जैसे बड़े एनीमल न होने से अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क की सालाना इनकम पर विपरीत असर पड़ रहा है। जनवरी 2023 से 14 अक्टूबर 2024 तक बायोलॉजिकल पार्क को 63 लाख 25 हजार 82 रुपए का ही राजस्व एकत्रित हॉुआ है। राजस्व का यह आंकड़ा करीब दो साल का है। जबकि, गत वर्ष 12 महीनों में ही राजस्व करीब 48 लाख रुपए था। ऐसे में लॉयन, टाइगर व एमू, फॉक्स जैसे वन्यजीव के अभाव में पर्यटकों का अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के प्रति रुझान कम हो रहा है। जिससे सरकार को होने वाली आय में गिरावट हो रही है। </p>
<p><strong>मगरमच्छ, घड़ियाल आए तो दोगुनी हो आय </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद घड़ियाल, मगरमच्छ, अजगर, बंदर, कछुए, सारस व लव बर्ड्स सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे। यदि, यह जानवर व पक्षी यहां शिफ्ट किया जाए तो पार्क की कमाई में दोगुना इजाफा होगा। वहीं, पर्यटकों को देखने के लिए ज्यादा एनीमल मिल सकेंगे। </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-क्या देखें, बड़े एनिमल तो है ही नहीं</strong><br />विज्ञान नगर निवासी भावेश नागर, कविता नागर, गांधी गृह निवासी मेहमूद भाई ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में पहले दो टाइगर थे, लेकिन  कुछ महीनों पर वह भी मर गया। जिसके बाद वन अधिकारी कोई बड़ा एनिमल्स नहीं लाए। वहीं, ऐमू पक्षी लाने की सिर्फ बातें ही की जाती है लेकिन लाते नहीं है। इसके अलावा वर्ष 2022 से ही लॉयन लाने की बात कही जा रही है लेकिन अब तक वह भी नहीं आ सका। ऐसे में यहां बड़े एनिमल तो है ही नहीं तो देखने क्या जाएं। सुविधाएं भी आधी-अधूरी हैं। जबकि, टिकट महंगा है। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के विकास के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। भोपाल चिड़ियाघर से बाघ का एक जोड़ा लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक  व भोपाल चिड़ियाघर अधिकारियों को पत्र लिखा जा चुका है। साथ ही ऐमू व चिंकारा सहित अन्य एनीमल लाने की परमिशन मिल चुकी है, जो अगले हफ्ते तक कोटा ले आएंगे। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 15:58:53 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>शिकारियों के फंदे में फंसा जरख, सीने पर हुए घाव</title>
                                    <description><![CDATA[वन्यजीव विभाग की टीम ने किया रेस्क्यू, चिड़ियाघर लाकर किया इलाज। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-jackal-got-trapped-in-the-trap-of-hunters--there-were-wounds-on-the-chest/article-97511"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer27.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रानपुर स्थित जंगल में  शिकारियों के फंदे में नर जरख फंस गया।  क्षेत्रवासियों की सूचना पर वन्यजीव विभाग की टीम मौके पर पहुंची और रेस्क्यू कर चिड़ियाघर लेकर आए। जहां वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. विलास राव गुल्हाने ने उपचार कर पिंजरे में शिफ्ट किया। जानकारी के अनुसार, रानपुर क्षेत्र में स्थित जंगल में अज्ञात शिकारियों ने फंदा लगा रखा था। जिसमें 4 वर्षीय नर जरख फंस गया। इससे पैरों में खरोच आई और सीने पर घाव हो गया। संभवत: दो दिन से पिंजरे में फंसा हुआ था। क्षेत्रवासियों के वहां से गुजरने पर घटना का पता लगा। इस पर लोगों ने वन्यजीव कार्यालय में फोन कर मामले की जानकारी दी। इस पर अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से रेस्क्यू टीम पिंजरे के साथ चिड़ियाघर पहुंची। जहां से वन्यजीव चिकित्सक डॉ. विलास राव गुल्हाने के नेतृत्व में वनकर्मी रानपुर पहुंचे। </p>
<p><strong>दर्द से तड़प रहा था जरख</strong><br />वनकर्मियों ने बताया कि जरख फंदे में फंसा हुआ था और उसके सीने पर जख्म हो रहे थे। पैरों पर भी खरोंच के निशान थे। संभवत: वह दो-तीन दिनों से फंदे में फंसा हुआ था।  ऐसे में रेस्क्यू कर नयापुरा स्थित चिड़ियाघर लाए। जहां उसका इलाज किया गया। दर्द निवारक इंजेक्शन दिए गए और घाव पर स्प्रे किया। वह प्यासा था, यहां आते ही उसने पानी पिया। बाद में उसे चिड़ियाघर के पिंजरे में शिफ्ट किया गया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Dec 2024 15:14:15 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का - अब कोटा में शुरू हो सकेगी वाइल्ड लाइफ सफारी </title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा स्थित 1100 हैक्टेयर वनभूमि को कोटा वन्यजीव में शामिल करने की योजना ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/asar-khabar-ka---now-wildlife-safari-can-be-started-in-kota/article-97085"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(1)13.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा में वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू किए जाने की दिशा में वन्यजीव विभाग ने कदम बढ़ा दिया है। वाइल्ड लाइफ डीएफओ ने प्रस्ताव बनाकर सीसीएफ को प्रस्ताव भेजा है। जहां से मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक रामकरण खैरवा ने प्रस्ताव को प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को भेजा है। जहां से स्वीकृति मिलने पर कोटा वन मंडल के अधीन सकतपुरा वनखंड को वन्यजीव विभाग में शामिल कर वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू की जा सकेगी।  दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से सटे सकतपुरा वनखंड की 1100 हैक्टेयर वनभूमि को वन्यजीव विभाग में शामिल करने की कार्य योजना है। वर्तमान में यह क्षेत्र कोटा वन मंडल के अधीन है। जिसे कन्जरर्वेशन रिजर्व में तब्दील किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। वन्यजीव विभाग ने गत 20 जुलाई को विधानसभा सत्र-2 में विधायक संदीप शर्मा द्वारा लगाए सवालों के जवाब से इसकी जानकारी दी थी। </p>
<p><strong>लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 प्रभावी होने से बढ़ेगा प्रोटेक्शन </strong><br />सकतपुरा वनखंड, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से सटा वनक्षेत्र है, जो प्रस्तावित कोटा ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट शंभुपुरा तक 1100 हैक्टेयर में फैला हुआ है। इसमें बड़ी संख्या में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की मौजूदगी है। कंजरर्वेशन रिजर्व घोषित किए जाने से यह वनक्षेत्र न केवल संरक्षित हो होगा बल्कि वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 लागू होने जंगली-जानवरों व जंगल का प्रोटेक्शन बढ़ जाएगा। ऐसे में अभेड़ा से ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट शंभुपुरा तक वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू किए जाने से टयूरिज्म बढ़ेगा। </p>
<p><strong>पैंथर, भेड़िये और भालू का बसेरा</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि सकतपुरा वनक्षेत्र में बड़ी तादात में वन्यजीवों का बसेरा है। यहां इंडियन वुल्फ से लेकर पैंथर का मूवमेंट रहता है। इस क्षेत्र में चिंकारा की संख्या बहुत अच्छी है। साथ ही इंडियन वुल्फ, जैकाल, फॉक्स, नीलगाय, जंगली खरगोश, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर, सिवेट, भालू, पैंथर, मोनिटर लिजार्ड सहित कई वन्यजीव शामिल हैं।</p>
<p><strong>200 प्रजातियों के पक्षियों का बसेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि अभेड़ा तालाब में 200 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षियों का निवास है। जिनमें मुख्य रूप से सारस क्रेन, पेन्टेड स्टार्क, बार हैडेगूज, स्टेपी ईगल, हैरीयर सहित कई तरह के पक्षियों का बसेरा है। उपयुक्त वैटलैंड होने से यहां सर्दी-गर्मी में बड़ी संख्या में देसी-विदेशी पक्षियों का कलरव गूंजता है। इधर, वन्यजीव प्रेमियों ने इस क्षेत्र को संरक्षित करने के लिए कन्जरर्वेशन रिजर्व घोषित किए जाने के वन्यजीव विभाग के प्रयास को सराहा है। </p>
<p><strong>अवैध गतिविधियों पर लगेगी लगाम</strong><br />पर्यावरण एवं मुकुंदरा समिति के अध्यक्ष तपेश्वर सिंह भाटी ने बताया कि वर्तमान में सकतपुरा वनक्षेत्र में अवैध गतिविधियां हो रही है। यहां अवैध खनन  होने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। संदिग्ध घुसपैठ होने से जंगली जानवरों का पलायन बढ़ रहा है। अभी तक यह एरिया साधारण वनक्षेत्र है। ऐसे में इसे सेंचुरी एरिया घोषित किया जाना अति आवश्यक है। वनक्षेत्र का स्टेटस चेंज होते ही यहां वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 लागू हो जाएगा। साथ ही विभिन्न मदों में विभाग को बजट प्राप्त होगा। जिससे सुरक्षा दीवार का निर्माण, वाटर कनजरर्वेशन स्ट्रेक्चर, ट्रैकिंग ट्रेक, ग्रासलैंड विकसित करने सहित अन्य डवलपमेंट कार्य हो सकेंगे।</p>
<p><strong>नवज्योति ने उठाया था मुद्दा</strong><br />दैनिक नवज्योति ने गत 21 अक्टूबर को वन विभाग के कागजों में खो गई वाइल्ड लाइफ सफारी शीर्षक से खबर प्रकाशित कर वन अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया था। साथ ही सकतपुरा वनक्षेत्र के 1100 हैक्टेयर के जंगल को वन्यजीव विभाग में शामिल कर संरक्षित करने की आवश्यकता जताई थी। इस पर वन्यजीव डीएफओ अनुराग भटनागर ने इस संबंध में प्रस्ताव बनाकर सीसीएफ को भेजे थे। इसके बाद सीसीएफ ने मंजूरी के लिए सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू को प्रस्ताव भेजे हैं। </p>
<p>अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क स्थित कोटा वनमंडल के सकतपुरा वनखंड के 1100 हैक्टेयर वनक्षेत्र को वन्यजीव विभाग में शामिल कर वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू किए जाने का प्रयास है। इसके लिए प्रस्ताव बनाकर सीसीएफ को भेजे हैं। इस इलाके में बड़ी संख्या में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीव हैं। ऐसे में यहां सफारी शुरू होती है तो ट्यूरिज्म को गति मिल सकेगी। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग </strong></p>
<p>वनमंडल के 1100 हैक्टेयर को वाइल्ड लाइफ में शुरू कर सफारी शुरू किए जाने के प्रस्ताव मिले हैं, जिसे प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को भेज दिया गया है। वन्यजीव विभाग में शामिल करने से यह एरिया संरक्षित होगा। अभेड़ा से प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड एयरपोर्ट तक सफारी शुरू होने से ट्यूरिज्म बढ़ेगा। <br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Dec 2024 13:16:47 +0530</pubDate>
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                <title>33 हजार पर्यटक घटे, 12 लाख राजस्व का नुकसान</title>
                                    <description><![CDATA[टाइगर-लॉयन सहित बड़े एनिमल की कमी मुख्य कारण ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/33-thousand-tourists-reduced--loss-of-12-lakh-revenue/article-94118"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-sizee-(3)10.png" alt=""></a><br /><p>कोटा।  प्रदेश का सबसे बड़ा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क अपनी चमक खो रहा है। वन्यजीव विभाग की अनदेखी से पर्यटकों का मोहभंग होता जा रहा है। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष 27 अक्टूबर तक करीब 33 हजार से ज्यादा पर्यटकों की संख्या घटी है। वहीं, 12 लाख रुपए राजस्व का घाटा हुआ है। दरअसल, 1 जनवरी से अक्टूबर 2023 तक  करीब 1 लाख पर्यटक बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के दीदार को पहुंचे थे। जबकि, इस वर्ष 27 अक्टूबर तक 66 हजार 760 ही पहुंचे। वहीं, पर्यटकों से होने वाली आय की बात करें तो गत वर्ष अक्टूबर तक करीब 37 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, इस वर्ष 27 अक्टूबर तक 25 लाख 36 हजार 236 ही हुआ है। </p>
<p><strong>इस जनवरी में 34 हजार का नुकसान</strong><br />गत वर्ष जनवरी माह के मुकाबले इस वर्ष की जनवरी में करीब 34 हजार रुपए राजस्व का बायोलॉजिकल पार्क को नुकसान हुआ है। जनवरी-2023 में 5 लाख 30 हजार 626 रुपए की कमाई हुई थी। जबकि, वर्ष 2024 की जनवरी में 4 लाख 96 हजार 740 रुपए की आय हुई है। जबकि, जनवरी 2021 की बात करें तो सर्वाधिक 20 हजार 682 पर्यटकों के साथ 9 लाख 99 हजार 880 रुपए की कमाई हुई थी। हालांकि, इस माह में बायोलॉजिकल पार्क के द्वार पर्यटकों के लिए खुले थे। </p>
<p><strong>जुलाई में सर्वाधिक 4 लाख रुपए का नुकसान</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को सर्वाधिक राजस्व 4 लाख रुपए का नुकसान जुलाई माह में हुआ है।  वहीं, पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड 9 हजार से ज्यादा की गिरावट दर्ज हुई है। जुलाई 2023 में 14 हजार पर्यटक घूमने आए थे, जिनसे पार्क को 6 लाख रुपए की आय हुई थी। जबकि, जुलाई 2024 में कमाई का आंकड़ा औंधे मुंह गिरकर 1 लाख 84 हजार 990 ही रह गया। वहीं, पर्यटकों की संख्या भी घटकर 4 हजार 606 ही रह गई। </p>
<p><strong>टाइगर की मौत के बाद तेजी से गिरा रेवन्यू</strong><br />बाघ नाहर की मौत के बाद से ही पर्यटकों की संख्या व राजस्व के आंकड़ों में भारी गिरावट देखने को मिली। वन्यजीव पे्रमियों का कहना है, लॉयन व टाइगर के कदम पड़ते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में धन बरसना शुरू हो गया था। गत वर्ष अप्रेल माह में भीषण गर्मी होने के बावजूद 7 हजार 928 पर्यटकों लॉयन व टाइगर देखने पहुंच गए थे। जिनसे पार्क को एक ही माह में 3 लाख 51 हजार 434 रुपए की कमाई हुई थी। जबकि, वर्ष 2024 की अप्रेल में 3 हजार 484 पर्यटकों से 1 लाख 44 हजार 610 रुपए की ही इनकम हुई। यानी गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 4,444 पर्यटक व 2 लाख 6 हजार 824 राजस्व का नुकसान हुआ है। </p>
<p><strong>न पिंजरे बने और न ही वन्यजीव शिफ्ट हुए</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के तहत कई अधूरे निर्माण कार्य पूरे किए जाने हैं। लेकिन, वन्यजीव विभाग को 25 करोड़ का बजट दो साल बाद भी नहीं मिल सका। बजट के अभाव में 31 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य नहीं हो पाए। वहीं, चिड़ियाघर से मगरमच्छ, घड़िया, अजगर सहित विभिन्न प्रजाति के पक्षी यहां शिफ्ट नहीं हो पा रहे। </p>
<p><strong>पर्यटकों का रुझान घटने के मुख्य कारण</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के प्रति पर्यटकों के घटते रुझान की प्रमुख वजह वन्यजीव विभाग की लापरवाही है। पार्क में लंबे समय से बड़े एनीमल्स की कमी है। जिसके चलते पर्यटकों का मोहभंग हो गया। 1 मार्च 2023 को नर बाघ नाहर की मौत के बाद से अब तक दूसरा बाघ नहीं लाया गया। वहीं, वन्यजीव विभाग दो साल बाद भी लॉयन लाने में नाकाम रहा। इसके अलावा मगरमच्छ, घड़ियाल, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पक्षी ऐमू  भी नहीं लाए गए। इसके अलावा मूलभूत सुविधाएं  कैफेटेरिया नहीं है, पर्यटकों को चाय नाश्ते के लिए पार्क के बाहर इधर-उधर भटकना पड़ता है। टाइगर के एनक्लोजर से चिंकारा तक के पिंजरे के बीच बैठने के लिए पर्याप्त बैंचे नहीं है। वहीं, वाटर कूलर भी नहीं है। जिसकी वजह से पार्क के प्रति पर्यटकों का मोह भंग होता जा रहा है, जिससे सरकार को लगातार राजस्व का नुकसान हो रहा है। </p>
<p><strong>डीएफओ ने नहीं दिया जवाब </strong><br />नवज्योति ने मामले को लेकर वन्यजीव उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर को फोन किए लेकिन उन्होंने अटैंड नहीं किया। इसके बाद उन्हें मैसेज कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन डीएफओ ने जवाब नहीं दिया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 29 Oct 2024 14:07:47 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का -  6 माह से मगरमच्छ की दहशत, अब जागा वन्यजीव विभाग </title>
                                    <description><![CDATA[शिकार की तलाश में मगरमच्छ के पिंजरे में आने के दौरान ट्रैप होने की संभावना है।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-the-news---fear-of-crocodile-for-6-months--now-the-wildlife-department-has-woken-up/article-93412"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-size-(16)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नयापुरा सीवी गार्डन के तालाब में 6 महीने से भारी-भरकम मगरमच्छ ने डेरा डाल रखा है। शिकायतों के बावजूद वन्यजीव विभाग के अफसरों ने आंखें मूंदी रखी। जबकि, तालाब में शाम के वक्त बोटिंग करवाई जाती है। ऐसे में पर्यटकों व राहगीरों की जान खतरा रहता है।  समाजसेवी डॉ. सुधीर उपाध्याय के 6 माह के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार, जिम्मेदार वन अधिकारी कुंभकरर्णीय नींद से जागे और शुक्रवार को सीवी गार्डन में मगरमच्छ को पकड़ने के लिए पिंजरा लगवाया। </p>
<p><strong>मगरमच्छ पकड़ने को लगाया पिंजरा, बांधा शिकार</strong><br />वन्यजीव विभाग की टीम शुक्रवार दोपहर को सीवी गार्डन पहुंची और मगरमच्छ को पकड़ने के लिए 6 से 8 फीट लंबा पिंजरा लगाया। इस दौरान पिंजरे में शिकार भी बांधा गया। शिकार की तलाश में मगरमच्छ के पिंजरे में आने के दौरान ट्रैप होने की संभावना है।  </p>
<p><strong>सुनवाई नहीं हुई तो सम्पर्क पोर्टल पर की शिकायत </strong><br />मॉर्निंग वॉकर डॉ. उपाध्याय ने बताया कि गत 6 माह से करीब 8 फीट लंबा मगरमच्छ सीवी गार्डन के तालाब में डेरा जमाए हुआ है। जिसकी पूर्व में प्रशासनिक व वन अधिकारियों से शिकायत भी की। लेकिन, सुनवाई नहीं हुई। जबकि, मॉर्निंग व इवनिंग वॉक पर प्रतिदिन यहां बड़ी संख्या में शहरवासी व पर्यटक आते हैं। मगरमच्छ कभी पानी में तो कभी जमीन पर झाड़-झंकाड़ों के बीच छिपा रहता है। ऐसे में राहगीरों व बच्चों पर मगरमच्छ के हमले का खतरा बना रहता है। इसके बाद मुख्यमंत्री सम्पर्क पोर्टल पर भी शिकायत की। इसके बाद विभाग को मगरमच्छ पकड़ने की याद आई। </p>
<p><strong>गणेश मंदिर के पास रहता है मूवमेंट</strong><br />राहगीरों ने बताया कि सीवी गार्डन में तालाब किनारे गणेश मंदिर बना हुआ है। जहां बोटिंग के लिए टिकट विंडो है। यहां बड़ी संख्या में बच्चे खेलते हैं। वहीं, श्रद्धालु दर्शन को जाते हैं। ऐसे में मगरमच्छ द्वारा हमला करने का डर लगा रहता है। मगरमच्छ के फोटो-वीडियो पूर्व में वन्यजीव विभाग के डीएफओ को भेजकर रेस्क्यू का आग्रह किया था। </p>
<p><strong>तालाब किनारे चिल्लाती 40 बतखें </strong><br />डॉ. गुप्ता ने बताया कि गार्डन में करीब 40 बतखें हैं, जो मगरमच्छ के डर के मारे पिछले कई महीनों से पानी में नहीं उतरी। तालाब किनारे बतखों का समूत चिल्लाती हुई वॉर्निंग कॉल देती है।  ऐसे में उनके भोजन का संकट हो गया। तालाब किनारे छोटे बड़े पौधे व झाड़ियां उगी हुई हैं। जहां मगरमच्छ पानी से निकल घात लगाकर छिपा रहता है।</p>
<p><strong>तालाब में बोटिंग व किनारे पर जॉय ट्रेन</strong><br />राहगीरों का कहना है, तालाब में केडीए की ओर से बोटिंग करवाई जाती है। बोटिंग के दौरान पानी के बीच में बच्चे व बड़े अनजाने खतरे के साय में रहते हैं। वहीं, तालाब किनारे जॉय ट्रेन की टिकट विंडो है। जहां बच्चों की भीड़ लगी रहती है। वन विभाग की लापरवाही से बड़ा हादसा हो सकता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 19 Oct 2024 12:32:14 +0530</pubDate>
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                <title>भोपाल से कोटा आएगा टाइगर का जोड़ा!</title>
                                    <description><![CDATA[  वन्यजीव विभाग ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को लिखे पत्र। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tiger-pair-will-come-to-kota-from-bhopal/article-90681"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/630400-size-(15).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में भोपाल चिड़ियाघर से बाघ-बाघिन का जोड़ा लाया जाएगा। वहीं, लॉयन, ऐमु व चिंकारा सहित अन्य वन्यजीवों को भी लाने की कवायद शुरू कर दी गई है। इसके लिए वन्यजीव विभाग कोटा ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पत्र लिखे हैं। साथ ही केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को भी पत्र लिखे जा रहे हैं। जहां से अनुमति मिलने पर वन्यजीवों की शिफ्टिंग का रास्ता साफ हो जाएगा। गौरतलब है कि अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में बाघ नाहर की मौत व लॉयन नहीं होने से पार्क के राजस्व पर विपरीत असर पड़ा। ऐसे में वन्यजीव विभाग बड़े एनिमल लाने की तैयारी में जुटा है। </p>
<p><strong>4 से 8 वर्ष के बाघ-बाघिन लाना प्राथमिकता</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि भोपाल चिड़ियाघर में अच्छी संख्या में बाघ-बाघिन हैं। यहां से कम उम्र का ही जोड़ा लाना प्राथमिकता में है। हमारी कोशिश है कि 4 से 8 वर्ष के बीच आयु के बाघ-बाघिन लाने की है। ताकि, ब्रिडिंग होने से बायोलॉजिकल पार्क में इनकी संख्या में इजाफा हो सके और भविष्य में यहां बाघों का कुनबा पनप सके। इस संबंध में एक सप्ताह पूर्व ही मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पत्र लिखा जा चुका है। भोपाल चिड़ियाघर के अधिकारियों से भी सम्पर्क किया जा रहा है। </p>
<p><strong>जयपुर से लाए जाएंगे चार ऐमु</strong><br />दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नोन फ्लाई बर्ड यानी (उड़ने में अक्षम) पक्षी की झलक अब अभेड़ा बायलॉजिकल पार्क में देखने को मिलेगी। वन्यजीव विभाग ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क से 4 ऐमु लाने की तैयारी शुरू कर दी है। इनमें 1 नर व 3 मादा शामिल हैं। हालांकि, इससे पहले अगस्त 2019 में चार ऐमु माछिया बायोलॉजिकल पार्क से कोटा चिड़िया घर में लाए गए थे, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए थे।   गत वर्ष चारों ऐमु की मृत्यु हो गई थी। </p>
<p><strong>चिंकारा भी करेंगे एंट्री </strong><br />जोधपुर के माछिया बायोलॉजिकल पार्क से 4 चिंकारा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शिफ्ट किए जाएंगे। इसके लिए प्रस्ताव बनाकर भिजवा दिए गए हैं। इनमें 2 मेल और 2 फिमेल जोड़े शामिल हैं। वर्तमान में अभेड़ा में 4 फिमेल चिंकारा है। ऐसे में 4 नए आने से इनकी संख्या 8 हो जाएगी। इस संबंध में भी सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू को पत्र लिखा जा चुका है। </p>
<p><strong>लॉयन-टाइगर नहीं होने से घटा राजस्व</strong><br />विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, लॉयन व टाइगर जैसे बड़े एनीमल न होने से अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क की सालाना इनकम पर विपरीत असर पड़ रहा है। जनवरी 2023 से अगस्त 2024 तक बायोलॉजिकल पार्क को 61 लाख 72 हजार 550 रुपए का ही राजस्व एकत्रित हुआ है। राजस्व का यह आंकड़ा करीब दो साल का है। जबकि, गत वर्ष 12 महीनों में ही राजस्व करीब 48 लाख रुपए था। ऐसे में लॉयन, टाइगर व एमू, फॉक्स जैसे वन्यजीव के अभाव में पर्यटकों का अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के प्रति रुझान कम हो रहा है। जिससे सरकार को होने वाली आय में गिरावट हो रही है।</p>
<p><strong>न कैफेटेरिया और न पर्याप्त वाटरकूलर</strong><br />छावनी निवासी रेखा सोमानी, आशा सचदेवा, संजय नगर की गीता, पल्लवी व पुष्पेंद्र सिंह ने बताया कि यहां पिछले तीन साल से अब तक कैफेटेरिया नहीं बन पाया। चाय नाश्ते के लिए भटकना पड़ता है। वाटर कूलर भी मात्र दो ही लगे हैं, जो शुरुआत में दूसरा आखिरी छोर पर है। ऐसे में पानी के लिए तरसना पड़ता है। सुविधाएं अधूरी हैं, जिसकी वजह से कई बार आधे रास्ते से ही वापस लौटना पड़ता है। विभाग को जरूरत की सुविधाएं तो बढ़ानी चाहिए। </p>
<p><strong>सज्जनगढ़ से लॉयन लाने का प्रयास</strong><br />डीएफओ भटनागर ने कहा, उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क से लॉयन  लाने के प्रयास फिर से तेज कर दिए हैं। हालांकि पूर्व में उदयपुर वन्यजीव विभाग के अधिकारी ने लॉयन सफारी शुरू किए जाने का हवाला देते हुए हाईब्रिड लॉयन अली कोटा को देने में असमर्थता जताई थी लेकिन, सज्जनगढ़ में गुजरात से लॉयन का जोड़ा लाया जा चुका है। ऐसे में एक लॉयन अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मिले, इसके लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को फिर से पत्र लिखा गया है। पार्क के विकास के लिए लगातार हर संभव कोशिश की जा रही है।</p>
<p><strong>मगरमच्छ, घड़ियाल, लव बर्ड्स आएं तो दोगुनी हो आय </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद घड़ियाल, मगरमच्छ, अजगर, बंदर, कछुए, सारस व लव बर्ड्स सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाए। यदि, यह जानवर व पक्षी यहां शिफ्ट किया जाए तो पार्क की कमाई में दोगुना इजाफा होगा। वहीं, पर्यटकों को देखने के लिए ज्यादा एनीमल मिल सकेंगे। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के विकास के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। भोपाल चिड़ियाघर से बाघ का एक जोड़ा लाने का प्रयास हैं। इसके लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक  को पत्र लिखा गया है। साथ ही लॉयन, ऐमू व चिंकारा सहित अन्य एनीमल लाने के भी प्रयास जारी हैं। बजट के अभाव में कैफेटेरिया सहित अन्य वन्यजीवों के एनक्लोजर का काम अटका हुआ है। बजट के लिए भी प्रयास कर रहे हैं।  <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग </strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Mon, 16 Sep 2024 18:01:04 +0530</pubDate>
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