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                <title>habitat - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सरिस्का की ऐतिहासिक सफलता, अब देशभर के टाइगर रिजर्व अपनाएंगे राजस्थान मॉडल</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान का सरिस्का दुनिया में बाघ पुनर्स्थापन (Tiger Relocation) की सबसे सफल मिसाल बन गया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने शिरकत की। सरिस्का में बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर 56 हो चुकी है, जो अब अन्य अभयारण्यों के लिए रोल मॉडल है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/alwar/historic-success-of-sariska-now-tiger-reserves-across-the-country/article-158303"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/sariska.png" alt=""></a><br /><p>अलवर। राजस्थान में कभी बाघों से पूरी तरह खाली हो चुका सरिस्का अब दुनिया में बाघ पुनर्स्थापन की सबसे सफल मिसाल बनकर उभरा है। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के 18 वर्ष पूरे होने पर रविवार को सरिस्का बाघ अभयारण्य राष्ट्रीय स्तर के मंथन का केंद्र बना, जहां देशभर के बाघ संरक्षण विशेषज्ञ, वरिष्ठ वन अधिकारी और वैज्ञानिक जुटे। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला "बाघ पुनर्स्थापन : अवसर एवं चुनौतियां" का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने किया।</p>
<p>कार्यशाला में राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय बिग कैट गठबंधन (आईबीसीए) के महानिदेशक, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, क्षेत्रीय निदेशक और देश के प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिक शामिल हुए। इस दौरान सरिस्का मॉडल के आधार पर देश के अन्य बाघ-विहीन और कम बाघ घनत्व वाले बाघ अभयारण्य पुनर्स्थापन की रणनीति पर मंथन हुआ। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का का 18 वर्षों का सफर ऐतिहासिक रहा है। बेहतर निगरानी, मजबूत प्रबंधन और उत्कृष्ट आवास संरक्षण के कारण सरिस्का वर्तमान में देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि प्रत्येक बाघ अभयारण्य की अपनी अलग परिस्थितियां हैं और जहां बाघों की संख्या नहीं बढ़ रही है वहां विशेष रणनीति अपनाई जाएगी। यादव ने कहा कि बाघ संरक्षण के साथ-साथ जल संरक्षण, पक्षी संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और प्रकृति पर्यटन को भी समान महत्व देना होगा। बाघ अभयारण्य से जुड़े ग्रामीणों के कौशल विकास पर विशेष जोर देने की आवश्यकता है ताकि संरक्षण और आजीविका दोनों मजबूत हों। उन्होंने बताया कि सरिस्का परियोजना के 20 वर्ष पूरे होने पर बड़ा राष्ट्रीय आयोजन किया जाएगा।</p>
<p>राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने कहा कि सरिस्का में बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर 56 तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि है और जल्द ही यह आंकड़ा 60 तक पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने बाघ संरक्षण में ग्रामीणों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार से राजस्थान के लिए भी चीता परियोजना स्वीकृत करने की मांग रखी। एनटीसीए के सदस्य सचिव संजय कुमार ने कहा कि वर्ष 2004 में सरिस्का से बाघों के पूरी तरह समाप्त होने के बाद जो चूक हुई, उसे सुधारते हुए 2008 में दुनिया का पहला वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम शुरू किया गया। अब सरिस्का केवल बाघों का संरक्षण क्षेत्र नहीं बल्कि "स्रोत क्षेत्र" बन चुका है, जहां से भविष्य में बाघ अन्य अभयारण्यों तक पहुंच सकेंगे।</p>
<p>उन्होंने इस सफलता का श्रेय तत्कालीन एनटीसीए सचिव राजेश गोपाल, फील्ड डायरेक्टर पी. सोमशेखर और वैज्ञानिक प्रबंधन को दिया। इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने कहा कि बाघ पुनर्स्थापन का प्रयास रूस में सफल नहीं हो सका, लेकिन राजस्थान ने इसे दुनिया के सामने सफल मॉडल के रूप में स्थापित किया। उन्होंने कहा कि मजबूत आधारभूत ढांचा, प्रभावी निगरानी और शिकार पर नियंत्रण सफलता की सबसे बड़ी कुंजी हैं। उन्होंने जानकारी दी कि सितंबर में सरिस्का में 32 देशों के वन्यजीव विशेषज्ञों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित होगा।</p>
<p>कार्यशाला में बताया गया कि भारत वर्तमान में विश्व के करीब 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण कर रहा है। देश में 58 बाघ अभयारण्य में करीब 3,682 बाघ हैं। पिछले एक दशक में बाघ अभयारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो चुकी है और संरक्षित क्षेत्र 84 हजार 450 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों ने कहा कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं बल्कि पूरे जंगल और जैव विविधता का आधार है। इसलिए आवास पुनर्स्थापन, शिकार आधार मजबूत करने, वन्यजीव गलियारों, पुनर्प्रवेश, वन्यजीव स्थानांतरण और वैज्ञानिक प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यशाला में चीता परियोजना पर भी विशेष विचार-विमर्श हुआ।</p>
<p>दो दिवसीय कार्यशाला से प्राप्त सुझावों के आधार पर देश के बाघ-विहीन और कम बाघ घनत्व वाले क्षेत्रों के लिए नई वैज्ञानिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इससे एनटीसीए, राज्य वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय और मजबूत होगा और बाघ संरक्षण में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को नई मजबूती मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अलवर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 16:01:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>प्रकृति को बचाने के लिए प्रोजेक्ट हरा-भरा 8.0 के अंतर्गत किया बीजारोपण </title>
                                    <description><![CDATA[ईको रेस्क्यूर्स और शरण्या फाउंडेशन ने जयपुर के झालाना लेपर्ड रिजर्व में 'प्रोजेक्ट हरा-भरा 8.0' के तहत धामण घास के बीजों का रोपण किया। सेवानिवृत्त वन अधिकारी महेश विजयवर्गीय के मार्गदर्शन में 65 वॉलिंटियर्स और बच्चों ने भाग लिया। इसका मुख्य उद्देश्य जंगली जानवरों के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध कराना और हरियाली बढ़ाना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/to-save-nature-seeds-were-planted-under-project-hara-bhara-80/article-158301"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/jhalana.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। ईको रेस्क्यूर्स फाउंडेशन एवं शरण्या फाउंडेशन की ओर से झालाना लेपर्ड रिजर्व क्षेत्र, जयपुर में 'प्रोजेक्ट हरा-भरा 8.0' के अंतर्गत धामण घास के बीजों की टिकड़ी का बीजारोपण किया गया। जिससे जंगली जानवरों को पर्याप्त मात्रा में घास उपलब्ध हो सके। संस्था का उद्देश्य जंगलों में खत्म होती हुई हरियाली को वापस लाना है। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए संस्था के सचिव डॉ गौरव ने बताया कि बीजारोपण किस तरह किया जाता है, इसकी पूरी जानकारी सेवानिवृत्ति वन अधिकारी महेश विजयवर्गीय ने सभी वॉलिंटियर्स को दी। इस कार्यक्रम में 40 बच्चों सहित लगभग 65 वॉलिंटियर्स ने भाग लिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 15:33:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>रणथम्भौर पहुंचे PCCF अरिजीत बनर्जी : बाघ और घड़ियाल संरक्षण व्यवस्थाओं का लिया जायजा, अधिकारियों को दिए निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान के वन बल प्रमुख अरिजीत बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व और पालीघाट का विस्तृत निरीक्षण किया। उन्होंने बाघों की मॉनिटरिंग, चम्बल नदी में घड़ियाल नेस्टिंग स्थलों और सुरक्षा तंत्र की समीक्षा की। बनर्जी ने फील्ड स्टाफ की सराहना करते हुए वन्यजीव आवास सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन के निर्देश दिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/pccf-arijit-banerjee-reached-ranthambore-took-stock-of-tiger-and/article-156262"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/अरिजीत-बनर्जी.png" alt=""></a><br /><p>सवाई माधोपुर। राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं वन बल प्रमुख (HoFF) अरिजीत बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व एवं पालीघाट क्षेत्र का दो दिवसीय विस्तृत निरीक्षण एवं भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने बाघ संरक्षण, वन्यजीव आवास प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, गश्ती व्यवस्था तथा घड़ियाल संरक्षण से संबंधित विभिन्न गतिविधियों का स्थलीय निरीक्षण कर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान किए।</p>
<p>भ्रमण के प्रथम दिवस बनर्जी ने रणथम्भौर टाइगर रिजर्व के विभिन्न महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने वन्यजीव आवासों, प्राकृतिक जल स्रोतों, एनीकटों, वन्यजीवों के लिए विकसित जल प्रबंधन संरचनाओं, कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग व्यवस्था तथा क्षेत्र में संचालित संरक्षण गतिविधियों का निरीक्षण किया। उन्होंने क्षेत्रीय अधिकारियों से बाघों की वर्तमान स्थिति, उनके विचरण क्षेत्र, मॉनिटरिंग प्रणाली, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम तथा आवास सुधार कार्यों के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की।</p>
<p>निरीक्षण के दौरान उन्होंने फील्ड स्टाफ द्वारा किए जा रहे नियमित गश्त कार्य, आधुनिक तकनीकों के उपयोग, वन अपराध नियंत्रण एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए अपनाए जा रहे उपायों की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों एवं कार्मिकों को संरक्षण कार्यों में निरंतर सतर्कता एवं वैज्ञानिक प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए।</p>
<p>दो दिवस बनर्जी ने पालीघाट क्षेत्र का दौरा कर चम्बल नदी तंत्र में संचालित घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रमों का निरीक्षण किया। उन्होंने घड़ियाल नेस्टिंग स्थलों, हाल ही में हैच हुए घड़ियाल शिशुओं की सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र एवं संरक्षण गतिविधियों का अवलोकन किया। उन्होंने घड़ियालों के प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा एवं संरक्षण को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर बल दिया तथा अधिकारियों को नियमित मॉनिटरिंग जारी रखने के निर्देश दिए।</p>
<p>इस अवसर पर उन्हें रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में बाघ संरक्षण, जैव विविधता प्रबंधन, वन्यजीव बचाव एवं उपचार, आवास विकास, सामुदायिक सहभागिता तथा संरक्षण शिक्षा से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी भी प्रस्तुत की गई। उन्होंने संरक्षण कार्यों में लगे अधिकारियों एवं वन कार्मिकों की प्रतिबद्धता, समर्पण एवं कठिन परिस्थितियों में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 17:00:00 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मोदी ने भारत के जैव विविधता संरक्षण प्रयासों पर डाला प्रकाश, कहा- 'एक पेड़ मां के नाम' जैसी पहल जंगल जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर भारत की समृद्ध जैव विविधता पर गर्व जताया। उन्होंने कहा कि निरंतर प्रयासों से चीता, हिम तेंदुआ और स्लॉथ बीयर जैसी प्रजातियों का पुनरुद्धार हुआ है। 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान से प्रतिवर्ष 1.19 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र जुड़ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/world-environment-day-prime-minister-modi-threw-light-on-indias/article-156050"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/modi-1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को भारत की समृद्ध जैविक विविधता का उल्लेख करते हुए वन्यजीव संरक्षण एवं वन विस्तार में देश की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और कहा कि निरंतर प्रयासों ने देश भर में कमजोर प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने में मदद की है। पीएम मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि भारत अपनी विशाल जैव विविधता और विविध पारिस्थितिक तंत्रों पर गर्व करता है जो असंख्य प्रजातियों के साथ-साथ लाखों आजीविका का समर्थन करते हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत में हमें अपनी जैविक विविधता पर बहुत गर्व है। हमारे विविध पारिस्थितिकी तंत्र अनगिनत प्रजातियों और आजीविका का समर्थन करते हैं।" सरकार की संरक्षण पहलों का उल्लेख करते हुए, श्री मोदी ने लुप्तप्राय और कमजोर वन्यजीव प्रजातियों की रक्षा के उद्देश्य से विशेष पुनर्प्राप्ति कार्यक्रमों की सफलता की बात की । उन्होंने कहा कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, हिम तेंदुओं, स्लॉथ बीयर और चीतों के संरक्षण प्रयासों ने प्रदर्शित किया है कि दीर्घकालिक प्रतिबद्धता वन्यजीव आबादी और पारिस्थितिक आवासों के पुनरुद्धार में कैसे योगदान दे सकती है।</p>
<p>उन्होंने कहा, "विशेष पुनर्प्राप्ति में हमारे प्रयास भी उल्लेखनीय रहे हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, हिम तेंदुए, स्लॉथ बीयर और चीता के संरक्षण प्रयासों ने इस बात की झलक दी है कि निरंतर प्रतिबद्धता वन्यजीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने में कैसे मदद कर सकती है।"</p>
<p>प्रधानमंत्री ने पिछले साल शुरू किए गए 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के प्रभाव का भी हवाला दिया, जो नागरिकों को अपनी माताओं के सम्मान में पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस पहल ने देश के हरित क्षेत्र को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा, "'एक पेड़ मां के नाम' जैसी पहल ने हर साल लगभग 1.19 लाख हेक्टेयर जंगल जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।" यह टिप्पणी तब आई जब भारत ने पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया है। पिछले एक दशक में, सरकार ने वन क्षेत्र को बढ़ाने, लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा करने और ख़राब पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने के उद्देश्य से कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।</p>
<p>प्रमुख संरक्षण पहलों में से एक प्रोजेक्ट चीता है, जिसके तहत सात दशक से भी अधिक समय पहले देश में प्रजाति विलुप्त होने के बाद अफ्रीकी चीतों को भारत में फिर से लाया गया था। गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की सुरक्षा के प्रयासों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जबकि हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुओं और मध्य भारत में स्लॉथ बीयर के संरक्षण उपायों को आवास संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से तेज किया गया है। प्रधानमंत्री का संदेश विश्व पर्यावरण दिवस को चिह्नित करने वाले पोस्ट और पहल की एक श्रृंखला का हिस्सा है, जो जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्रवाई को प्रोत्साहित करने के लिए हर साल 5 जून को विश्व स्तर पर मनाया जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 17:28:03 +0530</pubDate>
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                <title>चंबल की कराइयों में बसी जलमानुष की दुनिया, सबसे ज्यादा हमारे यहां </title>
                                    <description><![CDATA[ राजस्थान में सबसे ज्यादा उदबिलाव की संख्या कोटा चंबल में देखने को मिल रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-of-waterman-settled-in-the-valleys-of-chambal--most-of-them-here/article-47291"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/chambal-ki-karaiyon-mein-base-jalamanush-ki-duniya,-sabse-zyada-hamare-yahan...kota-news-31-05-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा।  चंबल की वादियों में बाघ, घड़ियाल व मगरच्छों की तरह ऊदबिलाव की भी खूबसूरत दुनिया सजती है। दुलर्भ प्राणियों की श्रेणी में शामिल जलमानूष जितना शातिर है, उतना ही दिलेर भी है। बाढ़ से संघर्ष कर न केवल खुद को बल्कि अपना वजूद भी कायम रखा। अस्तित्व की जंग फतह कर चंबल को आशियाना बनाने वाला उदबिलाव अपनी तकदीर खुद लिख रहा है। मां चर्मण्यवती के महफूज आंचल में आज यह परिवार फल-फूल रहा है। दरअसल, राजस्थान में सबसे ज्यादा उदबिलाव की संख्या कोटा चंबल में देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक रावतभाटा से कोटा तक करीब चालीस ऊदबिलाव परिवार के साथ रह रहे हैं। यहां की आबोहवा इतनी पसंद आ रही है कि इन्होंने यहां स्थाई बसेरा बना लिया और लगातार प्रजनन कर वंश वृद्धि कर रहे हैं।  </p>
<p><strong>तीन साल में बढ़ी संख्या</strong><br />बायोलॉजिस्ट उर्वषी शर्मा का कहना है, 2019 में इनकी संख्या 32 के लगभग थी, जो वर्तमान में बढ़कर करीब 40 हो गई है। चंबल का साफ पानी और भोजन की उपलब्धता से इनकी संख्या में इजाफा हुआ। कोटा में गरड़िया महादेव से गैपरनाथ के बीच, जवाहर सागर की डाउन स्ट्रीम तथा बैराज की अप स्ट्रीम के आसपास अच्छी संख्या में ऊदबिलाव की मौजूदगी है। इन्हें देखने व कैमरे में कैद करने के लिए जयपुर, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू सहित देश के कई जिलों से पर्यटक आते हैं।  </p>
<p><strong>परिवार का नहीं छोड़ते साथ</strong><br />उवर्षी कहतीं हैं, ऊदबिलाव जितना बहादुर है, उतना ही परिवारवादी भी है। यह समूह में परिवार बनाकर रहते हैं। कोटा चंबल में करीब 4 परिवार रहते हैं। इनकी फैमिली में 6 से 8 सदस्यों की संख्या होती है। जब इनमें से कोई एक सदस्य खो जाता है तो उसे आवाज देकर ढूंढते हैं। यह विश्वास और एकता के सूत्र से बंधे होते हैं। जब परिवार के किसी सदस्य पर कोई आंच आती है तो उससे निपटने के लिए पूरा परिवार एकजुट हो जाता है और मदद के लिए सभी एक साथ दौड़ पड़ते हैं। </p>
<p><strong>चुलबुले- फुर्तीले होते हैं जलमानुष</strong><br />नैचर प्रमोटर एएच जैदी कहते हैं, वर्ष 1998 में जवाहर सागर, जावरा, एकलिंगपुरा समेत कोटा बैराज से राणाप्रताप सागर तक इनकी काफी संख्या थी। वहीं, 70 के दशक में कुन्हाड़ी क्षेत्र चम्बल में भी दिखाई देते थे। ऊदबिलाव जल व थल दोनों ही जगह पर आराम से रह लेते हैं। इसकी लम्बाई करीब एक मीटर होती है। मछलियों का शिकार करना इन्हें विशेष पसंद होता है। खासियत यह है कि वयस्क होते ही यह जोड़ा बनाकर पेड़ों की जड़ों, चट्टानों के बीच मांद बनाकर अस्थाई घर बना लेते हैं। बच्चे होने के बाद ये वापस परिवार के साथ आ जाते हैं।</p>
<p><strong>क्यों कहते हैं जल मानुष</strong><br />जैदी बताते हैं, यह मनुष्य की तरह खड़ा हो जाता है, तब इसका शरीर इंसान जैसा दिखता है। जल व थल दोनों में रहता है इसलिए इसे जल मानुष कहते हैं। यह चिकनी खाल तथा बालों वाला जानवर है। इसकी औसत लम्बाई करीब 15 से 17 इंच होती है। शिकार एवं इसके आवास की कमी के कारण अब यह जीव संकटग्रस्त जीवों की श्रेणी में आ गया है। उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में 13 तरह के ऊदबिलाव पाए जाते हैं। इसमें से तीन तरह के भारत में मिलते हैं। हमारे देश में कभी इनकी गिनती नहीं हुई है इसलिए इनका सही आंकड़े नहीं मिलते। </p>
<p><strong>कोटा का शुभंकर किया घोषित </strong><br />रिसर्चर अंशु शर्मा ने बताया कहतीं हैं, राजस्थान सरकार ने 2016 में ऊदबिलाव को कोटा जिले का शुभंकर घोषित किया है ताकि लोगों को इस प्रजाति को संरक्षित करने के लिए जागरूक किया जा सके। यह मीठे पानी के जलीय आवास में पाया जाता है, जो मछलियों के शिकार करने का शौकीन होता है। आईयूसीएन की सूची में इसे खतरों के प्रति संवदेनशील प्रजाति माना है।</p>
<p><strong>13 में से एक प्रजाति राजस्थान में मिलती </strong><br />रिसर्चर हर्षित शर्मा ने बताया कि विश्व ऊदबिलाव दिवस प्रतिवर्ष मई के अंतिम बुधवार को मनाया जाता है। इसकी 13 प्रजातियों में से एक प्रजाति राजस्थान में पाई जाती है। जिसे नर्म फर वाले ऊदबिलाव के नाम से जाना जाता है। 1965 तक यह राजस्थान के बड़े भू-भाग पर पाया जाता था लेकिन इसकी बहुमूल्य खाल प्राप्त करने के लिए इसका शिकार किया जाने लगा। अब यह प्रजाति सिर्फ चंबल नदी के प्रवाह क्षेत्र में ही पाई जाती है। </p>
<p><strong>अवैध फिशिंग पर लगे प्रतिबंध</strong><br />पगमार्क संस्था के संस्थापक देवव्रत हाड़ा का कहना है, ऊदबिलाव के संरक्षण के लिए अवैध मछली शिकार को रोकना जरूरी है। जहां-जहां यह पाए जाते हैं, वहां के क्षेत्र को संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि इनकी वंश वृद्धि हो सके। उन्होंने बताया कि गत दो वर्ष पहले किशोरपुरा स्थित चंबल नदी में मछुआरों की जाल में ऊदबिलाव का बच्चा फंस गया था, जिसे वन्यजीव प्रेमियों ने निकाल सुरक्षित नदी में छोड़कर बचाया। उन्होंने बताया कि उदबिलाव ही नहीं मगरमच्छ भी मछुआरों के जाल में फंसकर दम तोड़ देते हैं। वन विभाग को अवैध मछली शिकार रोक इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करना चाहिए। </p>
<p><strong>सुरक्षा लिए करता है हमला</strong><br />बायोलॉजिस्ट सोहिल ताबिश ने बताया कि लोगों में यह भ्रांति है कि यह इंसानों को देखकर हमला कर देता है जबकि, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। ऊदबिलाव सामाजिक प्राणी है। जब वह प्रजनन काल में होता है और अपने बच्चों की देखभाल कर रहा होता है, ऐसे समय में कोई व्यक्ति इनके नजदीक जाता है तो खतरा महसूस होने पर वह बच्चों की सुरक्षा के लिए हमला करता है। ऐसा अन्य वन्यजीव भी अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए करते हैं। </p>
<p><strong>ऐसे करते हैं अपनी ओर आकर्षित </strong><br />सोहिल बताते हैं, चम्बल की गहराई से निकलकर ऊदबिलाव किनारे पर स्थित चट्टानों तक आ जाते हैं। मछलियों का शिकार कर उन्हें उछालकर या फिर पानी में पीठ के बल लेटकर खाने का इनका अपना ही तरीका है। मछलियों का शिकार, खड़े होकर खतरे को देखना, पानी व चट्टानों पर आ जाना आकर्षित करता है।</p>
<p><strong>नहीं उठाया फोन</strong><br />खबर के सिलसिल में नवज्योति ने मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के डीएफओ बीजो रॉय व सीसीएफ एसपी सिंह को फोन किया था लेकिन दोनों ने ही फोन नहीं उठाया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 31 May 2023 14:45:48 +0530</pubDate>
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