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                <title>heart diseases - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>वर्ल्ड हार्ट डे : कोविड के बाद राजस्थान में दिल की बीमारियों से मौतों में 36 प्रतिशत से ज्यादा इजाफा, आइए जानते है क्यों बढ़ रहा हैे दिल की बीमारियों का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[खासतौर पर फैमिली हिस्ट्री वाले, धूम्रपान करने वाले, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल की समस्या वाले मरीजों में यह खतरा ज्यादा दिखाई दे रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/after-world-heart-day-kovid-let-us-know-more-than/article-128176"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(6)8.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। कोविड महामारी ने न केवल फेफड़ों, बल्कि दिल की सेहत पर भी गहरा असर छोड़ा है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल की मेडिकल सर्टिफाइड कॉज ऑफ  डेथ रिपोर्ट-2022 में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिसमें राजस्थान में कोविड के बाद दिल संबंधी मौतों में तेजी से उछाल आया है। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2022 में राजस्थान में दर्ज कुल मेडिकल सर्टिफाइड मौतों में से 24.4 प्रतिशत मौतें दिल की बीमारियों और हार्ट अटैक से हुईं। यह संख्या 2013 के मुकाबले चौंकाने वाली हैं, जब केवल 18.5 प्रतिशत मौतें दिल की बीमारियों से होती थीं। कोविड से पहले की तुलना में इन मौतों में 36 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई। साल 2022 में राज्य में 19 हजार 656 लोगों ने दिल की बीमारी से जान गंवाई, जिनमें 12 हजार 416 पुरुष और 7 हजार 240 महिलाएं थीं। इनमें से करीब 26 प्रतिशत मरीजों की अचानक हार्ट अटैक से मौत हुई, जबकि 50.1 प्रतिशत मौतें पल्मोनरी सर्कुलेशन और अन्य हृदय रोगों के कारण हुईं। कोरोना के बाद से एसएमएस अस्पताल की कार्डियोलॉजी यूनिट में भी हार्ट संबंधी मामले दुगुने हो गए हैं।</p>
<p><strong>क्यों बढ़ रहा दिल की बीमारियों का खतरा</strong><br />सीनियर कार्डियक इलेक्ट्रोफीजियोलॉजिस्ट डॉ. राहुल सिंघल ने बताया कि कोविड संक्रमण के बाद खून में थक्के यानी थ्रोम्बोसिस और हार्ट मसल्स में सूजन यानी मायोकार्डियम इन्फ्लेमेशन की समस्या बढ़ी है। इससे कोरोनरी आर्टरी में मल्टीपल ब्लॉकेज के मामले सामने आ रहे हैं। खासतौर पर फैमिली हिस्ट्री वाले, धूम्रपान करने वाले, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल की समस्या वाले मरीजों में यह खतरा ज्यादा दिखाई दे रहा है।</p>
<p><strong>कोरोना के डर से बढ़ी फिजिकल एक्टिविटी भी है बड़ा कारण</strong><br />सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि हृदय की नसों में ब्लॉकेज रूपी प्लाक जमना कम उम्र में ही शुरू हो जाता है। ये नसों में जगह-जगह जमता है और इससे नसों की दीवारों की अंदरूनी सतह में चिकनापन कम होता जाता है, इसमें से खून को प्रवाहित होने में घर्षण उत्पन्न होता है। कोरोना महामारी के समय जब फिजिकल एक्टिविटी बहुत कम हो गई तो प्लाक जमने की प्रक्रिया तेज हो गई और नसों के रास्ते जगह-जगह खुरदुरे हो गए। ऐसे में अब हमने बिना अभ्यास के अचानक अपनी फिजिकल एक्टिविटी बढ़ा दी है तो व्यायाम के दौरान तेज रक्त प्रवाह के घर्षण की वजह से प्लाक वाली खुरदुरी सतह फट जाती है। हमारी प्लेटलेट्स वहां तुरंत थक्का जमाती है और आर्टरी तुरंत ब्लॉक हो जाती है। इसे प्लाक रपचर कहते हैं। यहीं कारण है कि उससे अचानक हार्ट अटैक होता है और कम उम्र में हार्ट इसके लिए तैयार नहीं होता, इसलिए व्यक्ति की जान का खतरा बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>क्या हैं हार्ट अटैक के लक्षण और बचाव</strong><br />सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विकास पुरोहित ने बताया कि सीने के बीचों बीच दबाव या दर्द जो गले, जबड़े या हाथों तक फैल जाए, लगातार बढ़ता हुआ दर्द या भारीपन, अत्यधिक पसीना, घबराहट, सांस लेने में तकलीफ, उल्टी या चक्कर आना प्रमुख लक्षण हैं। संतुलित और कम वसा वाला भोजन, रोजाना योग-वॉक या हल्का व्यायाम, धूम्रपान व शराब से दूरी, ब्लड प्रेशर, शुगर-कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच और परिवार में हार्ट डिजीज का इतिहास हो तो 35-40 साल की उम्र के बाद सालाना हृदय जांच बचाव के लिए जरूरी हैं।</p>
<p><strong>आर्टरी 100 प्रतिशत ब्लॉक, फिर भी ईसीजी-इको आ रही नॉर्मल</strong><br />सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राम चितलांगिया ने बताया कि अब कई ऐसे मामले भी आ रहे हैं, जिसमें हार्ट अटैक से पहले होने वाली ईसीजी, इको जैसी जांचें सामान्य आती है। इसीलिए एंजियोग्राफी करने की आवश्यकता पड़ सकती है। कई बार हार्ट की नस के 100 प्रतिशत ब्लॉक होने से पहले तक भी इको जांच सामान्य आ सकती है। ऐसे में एंजियोग्राफी से सटीक स्थिति पता लगाई जा सकती है। हमेशा ऐसा नहीं मानना चाहिए कि ईसीजी या इको जांच सामान्य है तो उन्हें हार्ट से जुड़ी समस्या नहीं है। इसीलिए हार्ट से जुड़ी समस्याओं के लक्षण बने रहते हैं तो आगे भी जांच करानी चाहिए।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 09:54:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
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                <title>कम उम्र में बढ़ रहे हार्ट अटैक के मामलों के बीच उम्मीद की रोशनी, आयुर्वेद से भी होगा हृदय रोगों का उपचार</title>
                                    <description><![CDATA[आज की तेज रफ्तार जीवनशैली, मानसिक तनाव, असंतुलित खानपान और शारीरिक निष्क्रियता से कम उम्र के लोग भी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/ayurveda-will-also-treat-heart-diseases-amidst-increasing-heart-attack/article-122350"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(1)2.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। आज की तेज रफ्तार जीवनशैली, मानसिक तनाव, असंतुलित खानपान और शारीरिक निष्क्रियता से कम उम्र के लोग भी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। हार्ट अटैक के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है। यह बीमारी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही बल्कि 30 से 40 वर्ष की आयु के युवाओं में भी इसका खतरा तेजी से बढ़ा है। अब तक हृदय रोगों का इलाज एलोपैथी में ही संभव था लेकिन अब आयुर्वेद में भी इसके इलाज को संभव बनाने पर तेजी से काम किया जा रहा है।</p>
<p>जयपुर के जोरावर सिंह गेट स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान मानद विश्वविद्यालय के काय चिकित्सा विभाग (इंटरनल मेडिसिन डिपार्मेंट) में कफज ह्द्रोग जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना कहा जाता है, पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से शोध किया जा रहा है। संस्थान के काय चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर उदय राज सरोज के निर्देशन में एमडी छात्रा डॉ. लिट्टी मैथ्यू द्वारा कफज हृद्रोग पर विशेष अनुसंधान किया जा रहा है, जिसमें आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित औषधीय योगों के माध्यम से ह्दय की धमनियों में जमे वसा यानी कोलेस्ट्रॉल को घटाकर रक्त संचार को सुधारने का प्रयास किया जा रहा है।</p>
<p><strong>क्या है कफज हृद्रोग यानी क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना ?</strong></p>
<p>यह रोग उस स्थिति को दर्शाता है जब शारीरिक परिश्रम या भावनात्मक तनाव के समय रोगी को छाती में दर्द, सांस फूलना, अत्यधिक थकान, कमजोरी और घबराहट जैसी समस्याएं होती हैं। इसका मुख्य कारण ह्दय की रक्त वाहिनियों में वसा या प्लाक का जमा होना होता है, जिससे रक्त प्रवाह बाधित होता है। आयुर्वेद के अनुसार यह रोग मुख्यतया कफ दोष के असंतुलन के कारण उत्पन्न होता है।</p>
<p><strong>अब तक के शोध में सकारात्मक परिणाम मिले :</strong></p>
<p>कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने बताया कि इस शोध में रोगियों को विशिष्ट आयुर्वेदिक औषधियां देकर उनके कोलेस्ट्रॉल स्तर, रक्तचाप, धड़कन की गति, ईसीजी रिपोर्ट और संपूर्ण ह्दय कार्यप्रणाली की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। अब तक के परिणाम यह संकेत देते हैं कि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से ह्दय की धमनियों में वसा का स्तर घटा कर रोगी को राहत देना संभव है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Aug 2025 11:42:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तनाव से बिगड़ी दिल की सेहत, विशेषज्ञ बोले रखे अपने दिल के स्वास्थ्य का ख्याल</title>
                                    <description><![CDATA[भागदौड़ भरी जिंदगी और बढ़ते तनाव ने दिल की बीमारियों में इजाफा किया है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/the-health-experts-of-the-heart-deteriorated-due-to-stress/article-109993"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/44.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। भागदौड़ भरी जिंदगी और बढ़ते तनाव ने दिल की बीमारियों में इजाफा किया है। हृदय रोग दुनिया भर में मृत्यु का प्रमुख कारण बन गया हैं। हृदय रोगों से जुड़ी बीमारियाँ, जैसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप), हृदय दौरा और स्ट्रोक, यह बीमारियाँ अधिकतर जीवनशैली से संबंधित होती हैं, जैसे अनियमित आहार, व्यायाम की कमी, धूम्रपान, और अत्यधिक शराब का सेवन। इसके अलावा, मानसिक तनाव भी हृदय रोगों को बढ़ावा दे सकता है।</p>
<p>नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर के कार्डियोलॉजी विभाग के डायरेक्टर, डॉ. देवेन्द्र श्रीमाल ने बताया, की हृदय रोगों को समय रहते पहचानना और उनका सही इलाज प्रभावी हो सकता है। अगर मरीज अपनी जीवनशैली में छोटे बदलाव करें और नियमित जांच करवाएं, तो हृदय रोगों के जोखिम को कम किया जा सकता है।</p>
<p><strong>हृदय रोगों से बचाव के लिए जरूरी कदम :</strong></p>
<p><strong>स्वस्थ आहार :</strong> हार्ट की सेहत के लिए सही आहार बेहद महत्वपूर्ण है। फल, सब्जियाँ, पूर्ण अनाज और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर आहार का सेवन करें। तली-भुनी चीजों, अत्यधिक चीनी और नमक से बचें।</p>
<p><strong>नियमित व्यायाम : </strong>सप्ताह में कम से कम 150 मिनट का हल्का-फुल्का व्यायाम दिल को मजबूत बनाता है। स्विमिंग, दौड़ना, योग या तेज चलना जैसे व्यायाम फायदेमंद होते हैं।</p>
<p><strong>धूम्रपान और शराब से बचें : </strong>धूम्रपान और अत्यधिक शराब पीना दिल की सेहत के लिए बेहद हानिकारक है। यह रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर देता है और रक्तचाप को बढ़ाता है।</p>
<p><strong>तनाव कम करें :</strong> मानसिक तनाव हृदय पर अतिरिक्त दबाव डालता है। तनाव को कम करने के लिए ध्यान, योग, गहरी श्वास और अन्य मानसिक स्वास्थ्य गतिविधियों का अभ्यास करें।</p>
<p><strong>समय पर जांच करवाएं : </strong>उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल दिल की बीमारियों का मुख्य कारण होते हैं। नियमित रूप से इनकी जांच करवाएं और जरूरत पड़ने पर उचित इलाज लें। ईसीजी  और इको दोनों ही हृदय की जांच के लिए किए जाने वाले महत्वपूर्ण टेस्ट हैं जिन्हे समय समय पे कराते रहे|</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Apr 2025 18:19:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हर माह 5 बच्चे जन्म लेते हैं दिल की बीमारियों के साथ </title>
                                    <description><![CDATA[हार्ट रोग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि देश में नवजात और छोटे बच्चों में जन्मजात दिल से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/every-month-5-children-are-born-with-heart-diseases/article-48565"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-06/har-maah-5-bachhe-janm-lete-h-dil-ki-bimariyo-k-sath...kota-news-12-06-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। एक अनुमान के अनुसार हर साल भारत में लगभग 2 लाख से अधिक बच्चे दिल से जुड़ी बीमारियों को लेकर पैदा होते है। वहीं कोटा मेडिकल कॉलेज में हर वर्ष लगभग 60-70 बच्चे दिल से ज़ड़ी बीमारियों को लेकर जन्म लेते हंै। यानि यहां पर हर माह औसतन 5-6 बच्चे ऐसे पैदा होते है जो किसी ना किसी रूप में दिल की बीमारी से ग्रसित होते हैं। इनमें से कुछ बीमारियां तो ऐसी होती है जिससे लगभग 50 प्रतिशत बच्चे अपना पहला जन्दिन तक भी नहीं मना सकते हैं। हार्ट रोग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि देश में नवजात और छोटे बच्चों में जन्मजात दिल से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। इन्ही में से एक है कान्जेनिटल हार्ट डिजीज जब बच्चे को गर्भ से ही दिन से जुड़ी परेशानियां होने लगती है। तब उसे सीएचडी का मरीज माना जाता है। गौरतलब है कि कुछ समय पूर्व ही जारी एक रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल लगभग 2 लाख बच्चे सीएचडी के साथ पैदा होते हैं। इलाज की बात हो तो आईआईएमएस के अनुसार उत्तर भारत में 17 प्रतिशत, दक्षिण भारत में 72 प्रतिशत और पूर्वी भारत में 10 प्रतिशत बच्चों को ही उपचार मिल पाता है। कोटा मेडिकल कॉलेज के कार्डियोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. हंसराज मीणा का कहना है कि सीएचडी के लक्षण, रिस्क फैक्टर्स और बचाव के तरीके जानने के लिए नवज्योति ने जब कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. मीणा से बात की तो कुछ इस तरह की बातें सामने आई।</p>
<p><strong>सवाल: </strong>सीएचडी के रिस्क फैक्टर्स क्या हैं?<br /><strong>जवाब: </strong>डायबिटीज, प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाले संक्रमण, एक्स-रे रेडिएशन और प्रेग्नेंसी के वक्तगलत दवाओं का इस्तेमाल सीएचडी के कुछ रिस्क फैक्टर्स हैं। इनके अलावा यदि गर्भवती महिला को स्मोकिंग और शराब की लत लगी है तो वह बच्चे के दिल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। सीएचडी आनुवंशिक बीमारी भी हो सकती है।</p>
<p><strong>सवाल: </strong>समय पर सीएचडी का इलाज न होने से बच्चा कैसे प्रभावित हो सकता है?<br /><strong>जवाब:</strong> सीएचडी का सही वक्तपर इलाज न हो तो बच्चे को सांस संबंधित परेशानियां हो सकती हैं। इसके साथ ही वजन न बढ? भी सीएचडी का एक कॉम्प्लिकेशन है। इस बीमारी के कारण बच्चों के विकास पर भी असर पड़ता है। सीएचडी के मरीजों के दिल की धड़कन कभी तेज तो कभी धीमी चलती है। सीएचडी का असर बच्चों की फिजिकल हेल्थ के साथ-साथ मेंटल हेल्थ पर भी पड़ता है। उन्हें लगातार मूड स्विंग्स होते हैं। शारीरिक विकास न होने की वजह से वो इनसिक्योरिटी के शिकार हो जाते हैं। कई बच्चे तो अपना पहला जन्मदिन तक नहीं मना पाते।</p>
<p><strong>सवाल:</strong> सीएचडी से बचाव के क्या तरीके हैं?<br /><strong>जवाब:</strong> सीएचडी की कोई सटीक वजह न होने के कारण इससे बचना मुश्किल हो जाता है। फिर भी कुछ तरीकों से इससे बचा जा सकता है।</p>
<p>- प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले रूबेला की वैक्सीन लगवाएं।<br />- डायबिटीज और रक्तचाप जैसी बीमारियों को कंट्रोल करें।<br />- प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर की सलाह पर ही कोई दवा लें।<br />- स्मोकिंग और शराब से बचें।<br />- रेडिएशन की चपेट में न आएं।<br />- प्रेग्नेंसी प्लान करने के 2-3 महीने पहले से चिकित्सक की सलाह अनुसार फोलिक एसिड युक्त मल्टीविटामिन का सेवन करना शुरू कर दें। इससे बच्चे को न्यूट्रिएंट्स की कमी नहीं होगी।</p>
<p>अनुमानत: मेडिकल कॉलेज में हर माह 5 या 6 बच्चे दिल से जुड़ी बीमारियों के साथ जन्म लेते हैं। इसके तीन मुख्य कारण है, गर्भावस्था में महिला का संक्रमित होना, डायबिटिज के रोगी होना और आनुवंशिकता। दरअसल भ्रूण के विकसित होने के दौरान कुछ कमियां रह जाती है। इससे दिल पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता है। कुछ मामलों में नसें उल्टी-सीधी होती है तो कुछ में दिल में छेद रह जाता है।<br /><strong>- डॉ. हंसराज मीणा, असिस्टेंट प्रोफेसर, कार्डियोलॉजी विभाग। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Mon, 12 Jun 2023 15:15:52 +0530</pubDate>
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