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                <title>chairs - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जनता क्लिनिक का जनता को पता नहीं : नाम नया हालात वही, कोटा के आरोग्य मंदिर बने खाली कुर्सियों के केंद्र</title>
                                    <description><![CDATA[डॉक्टर महीनों से नदारद, दो-तिहाई केंद्रों पर स्टाफ अधूरा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/public-unaware-of--janata-clinics---new-name--same-old-story%E2%80%94kota-s--arogya-mandirs--become-centers-of-empty-chairs/article-146814"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(1)26.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत ह्यशहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिरह्ण के नाम पर चल रहे पूर्व के जनता क्लिनिकों में साफ दिखाई दे रही है। नाम बदलने और बड़े दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात बेहद खराब हैं। 20 दिनों तक किए गए भौतिक सत्यापन में सामने आया कि अधिकांश केंद्रों पर डॉक्टर ही नहीं हैं, कई जगह स्टाफ अधूरा है और कुछ केंद्रों पर तो ताले लटके मिले।</p>
<p><strong>2 माह से अधिक गुजरा समय</strong><br />विभाग ने 2 माह पूर्व ही इन शहरी आयुष्मान केन्द्रों का संचालन नयी एजेन्सी को दिया है। क्षेत्र से लगातार मिल रही जानकारीयों के सत्यापन के लिये नवज्योति रिपोर्टर टीम ने 24 फरवरी से बड़गांव, सुखाडिया, नान्ता, घोड़ा बस्ती, एक मीनार मस्जिद, गोवर्धनपुरा और बंजारा कॉलोनी समेत कई आरोग्य मंदिरों का दौरा किया। केंद्रों में कहीं भी पूरा स्टाफ ड्यूटी पर मौजूद नहीं मिला। दो केंद्रों पर तो निरीक्षण के दौरान ताले लगें मिलें, जबकि जिन केंद्रों पर ड्यूटी ओपीडी का बोर्ड लगा था वहां भी डॉक्टर नदारद थे। कही पर सात कार्मिकों के नाम की जानकारी तो दी गयी, लेकिन मौके पर उनकी उपस्थिति नहीं मिली, ज्यादातर जगह पर कार्मिक के बारे में कहा गया कि वह अन्य जगह पीएचसी पर गये हुये है। हालांकि नये नियमार्न्तगत शहरी आयुष्मान केन्द्रों के स्टाफ की ड्यूटी का जिम्मा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय का है ।</p>
<p><strong>1.45 रू. प्रति माह के 7 स्टाफ की अनुशंसा</strong><br />सरकारी निदेर्शों के अनुसार प्रत्येक आरोग्य मंदिर के लिये 1.45 रू. मेनपॉवर के दिये जाते है जिससे एक डॉक्टर, दो नर्सिंग स्टाफ, एक फार्मासिस्ट, एक एएनएम, एक सहायक कर्मचारी और एक सफाई कर्मचारी सहित कुल सात कर्मचारियों की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन नए वित्तीय सत्र के दो महीने गुजर जाने के बाद भी अधिकांश केंद्रों पर चतुर्थ श्रेणी और सहायक कर्मचारी तक नियुक्त नहीं किए गए। परिणामस्वरूप कई जगह गंदगी, बिखरी दवाइयां और अव्यवस्था का आलम देखने को मिला।</p>
<p><strong>महिला स्टाफ की सुरक्षा</strong><br />सबसे खराब स्थिति गोवर्धनपुरा आरोग्य मंदिर में सामने आई। यहां कायर्करत डॉक्टर रूद्रप्रताप छावनी आरोग्य मंदिर पर ड्यूटी कर रहे थे, हांलाकि यहां पर स्टाफ के नाम पर मौजूद एक फार्मासिस्ट ने बताया कि सामुदायिक भवन में चल रहे इस केंद्र पर स्टाफ रुकना नहीं चाहता, क्योंकि अधिकतर कर्मचारी महिलाएं हैं, और सुरक्षा की समस्या बनी रहती है । इसी तरह एक मीनार मस्जिद, छावनी क्षेत्र में शनिवार को दोपहर 2:50 बजे ही केंद्र का ताला लगा मिला। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां डॉक्टर और एजेंसी के बीच विवाद चल रहा है, जिसके कारण डॉक्टर नहीं आते। मरीज अक्सर इलाज की उम्मीद में आते हैं लेकिन बिना चिकित्सक के खाली कुर्सी देखकर वापस लौट जाते हैं।</p>
<p><strong>ओपीडी समय चस्पा कर दिया पर ताले नहीं खुले</strong><br />घोड़ा बस्ती आरोग्य मंदिर में कागजों पर दो टाइम ओपीडी का समय लिखा है, लेकिन वास्तविकता में स्टाफ एक बजे से पहले ही निकल जाता है। मौके पर बिजली विभाग का कर्मचारी भी बिल सम्बन्धी काम से बाहर खड़ा मिला। ओपीड़ी समय के अनुसार हमारी टीम शाम को फिर से यहां पहुंची तो भी यहां मुख्य दरवाजे पर ताला ही लगा मिला।सबसे अजीब स्थिति बंजारा कॉलोनी में सामने आई, जहां आरोग्य मंदिर का कोई बोर्ड तक नहीं लगा है। यह केंद्र स्थानीय पार्षद के घर के भीतर चलाया जा रहा है और यहां पिछले तीन महीनों से डॉक्टर ही नहीं है। स्थानीय पीएचसी शॉपिंग सेंटर के चिकित्सक डॉ. संजय शायर के अनुसार डॉक्टर नहीं होने से मरीजों को काफी परेशानी हो रही है।</p>
<p><strong>आॅनलाईन फोटो में भी आधा ही स्टाफ</strong><br />केंद्रों के संचालन में पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के अनुसार अटेंडेंस के नाम पर सभी कर्मचारी एक साथ फोटो खींचकर आॅनलाइन अपलोड कर देते हैं, जबकि मौके पर आधे कर्मचारी भी मौजूद नहीं होते। ऐसे में भी विभाग द्वारा इन पर संज्ञान न लेना लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण है।</p>
<p><strong>जनता तो क्या जनप्रतिनिधियों तक को नहीं पता</strong><br />जनता क्लिनिक के प्रचार प्रसार का हाल यह है कि इनके प्रति किसी भी प्रकार के रूट मेंपिंग तक विभाग के पास मौजूद नहीं है। सम्बन्धित मदर पीएचसी के प्रभारी चिकित्सकों ने तो यहां के रजिस्टरों में विजिट तक दर्ज नहीं हे, यहीं हाल आम नागरिको ने भी बयान किया कि हमें तो अभी तक पता ही नहीं कि हमारे यहां भी कोई क्लिनिक है। जनप्रतिनिधियों को भी इन केंद्रों की स्थिति की जानकारी नहीं है। गोवर्धनपुरा वार्ड-20 की पार्षद इति शर्मा (पूर्व ) ने कहा कि सरकार बनने के बाद इस विषय में उनसे कोई संवाद तक नहीं किया गया, और उन्हें यह तक नहीं पता कि उनके क्षेत्र में जनता क्लिनिक किस जगह और किस स्थिति में चल रहा है।</p>
<p><strong>नोडल अधिकारी ने कहा सभी 40 जगह डॉक्टर</strong><br />उधर विभाग नोड़ल अधिकारी डिप्टी सीएमएचओ घनश्याम मीणा का दावा है कि सभी 40 केंद्रों पर डॉक्टर लगाए जा चुके हैं। उनहोनें कहा कि एजेन्सी की ओर से हमे लेटर में बताया गया कि सभी जगह डॉक्टर लगे हुये है कहीं भी जगह खाली नहीं केवल बाकि दो स्टाफ की लिस्ट अभी नहीं आयी है। लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट इस दावे से बिल्कुल उलट तस्वीर दिखाती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होने के बावजूद अब तक किसी प्रकार की सख्त कार्रवाई नहीं हुई है। सवाल यह है कि जब प्रत्येक केंद्र पर करीब 1.45 लाख रुपए प्रतिमाह स्टाफ पर खर्च किए जा रहे हैं, तो फिर जमीन पर स्टाफ ओर सुविधाएं क्यों नहीं दिखाई दे रही हैं। स्पष्ट है कि सिर्फ नाम बदलकर जनता क्लिनिक को ह्यआरोग्य मंदिरह्ण बना देने से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं होगा। जब तक नियमित निरीक्षण, जवाबदेही और सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ये केंद्र आम लोगों के लिए राहत नहीं बल्कि निराशा का कारण बने रहेंगे ।</p>
<p><strong>जमीनी जांच में सामने आए तथ्य</strong><br />- 20 दिन में कई आरोग्य मंदिरों का भौतिक सत्यापन<br />-अधिकांश केंद्रों पर पूरा स्टाफ नहीं मिला<br />-दो केंद्रों पर निरीक्षण के दौरान ताले<br />-कई जगह डॉक्टर महीनों से नदारद<br />-गंदगी और अव्यवस्था, सफाई कर्मचारी तक नहीं<br />-अटेंडेंस के लिए फोटो अपलोड, मौके पर स्टाफ गायब</p>
<p><strong>प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का मजबूत होना बेहद जरूरी</strong><br />सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि इन केंद्रों पर नियमित डॉक्टर और स्टाफ उपलब्ध नहीं होगा तो छोटे-छोटे रोग भी गंभीर बन सकते हैं और मरीजों का बोझ सीधे बड़े अस्पतालों पर बढ़ेगा। इसलिए प्रशासन को इन केंद्रों की नियमित मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय करनी चाहिए।</p>
<p><strong>यूँ बोले जिम्मेदार अधिकारी</strong><br />हमने एजेंसी से रिपोर्ट मांगी है। उनके अनुसार सभी 40 केंद्रों पर डॉक्टर लगा दिए गए हैं। इससे ज्यादा जानकारी अभी नहीं दी जा सकती।<br /><strong>- डॉ. घनश्याम मीणा, नोडल अधिकारी, आयुष्मान आरोग्य मंदिर, डिप्टी सीएमएचओ कोटा।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 15:04:05 +0530</pubDate>
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                <title>480 छात्राएं, 97 कुर्सियां, कहां बैठे बेटियां</title>
                                    <description><![CDATA[एक कुर्सी पर एक ही छात्रा बैठ सकती है लेकिन फर्नीचर की कमी से एक कुर्सी पर दो छात्राएं बैठने को विवश हैं। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/480-girls--97-chairs--where-are-the-girls-sitting/article-88168"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-08/480-chatraen,-97-kursiyan,-kaha-baithe-betiyan...kota-news-20.08.2024.jpg" alt=""></a><br /><p>क ोटा। राजकीय कला कन्या महाविद्यालय रामपुरा की छात्राएं लापरवाही, अनदेखी व उपेक्षा का दंश झेल रही है। कक्षाओं में जहां खड़े रहकर पढ़ना पड़ रहा। वहीं, मिड-टर्म व प्रेक्टिकल फर्श पर बैठकर करना मजबूरी बन गई। दरअसल, कॉलेज में 480 छात्राएं अध्ययनरत हैं, जिनके मुकाबले 97 ही टेबल-कुर्सियां हैं। यह कुर्सियां असल में स्टूलनुमा है। एक कुर्सी पर एक ही छात्रा बैठ सकती है लेकिन फर्नीचर की कमी से एक कुर्सी पर दो छात्राएं बैठने को विवश हैं। हालांकि, फर्नीचर सहित अन्य सुविधाओं के लिए बजट भी मिला था लेकिन समय पर उपयोग नहीं हो सका और अनंत: लैप्स हो गया। </p>
<p><strong>कॉलेज में उपस्थित थी 127 छात्राएं</strong><br />नवज्योति 16 अगस्त को रामपुरा कॉलेज पहुंची तो वहां प्रथम वर्ष से तृतीय वर्ष तक कुल 127 छात्राएं उपस्थित मिली थी। कक्षाएं लग रही थीं, ज्योग्राफी की क्लास में कई लड़कियां खड़ी मिली। जिनसे बात करने पर पता चला कि कॉलेज में कुल टेबल-कुर्सियां मात्र 97 में ही हैं। बैठने के लिए पर्याप्त फर्नीचर नहीं होने से लड़कियों ने कॉलेज आना ही बंद कर दिया। इस पर प्राचार्य डॉ. राजेश चौहान से इस दिन उपस्थित छात्राओं का रिकॉर्ड मांगा तो 127 छात्राओं की उपस्थिति मिली। ऐसे में जहां बैठने के लिए टेबल-कुर्सियां ही न हो तो वहां बेटियों को कैसे क्वालिटी एजुकेशन मिलेगी।</p>
<p><strong>साल में 3 बार फीस, फिर असुविधाएं </strong><br />छात्राएं एक साल में तीन बार फीस देती है। पहली-एडमिशन व 6-6 माह की सेमेस्टर एग्जाम फीस जमा करवातीं हैं। इसके बावजूद उन्हें मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है। छात्राओं को सांस्कृतिक कार्यक्रम हो या मिड-टर्म फर्श पर ही बैठना पड़ता है।  </p>
<p><strong>लाइब्रेरी, खेल मैदान व एनसीसी भी नहीं</strong><br />छात्राओं ने बताया कि कॉलेज में लाइब्रेरी नहीं है। जबकि, महाविद्यालयों में यह सुविधा होना अनिवार्य है। इसके अलावा खेल मैदान नहीं है। इस वजह से स्पोट्स एक्टिविटी नहीं हो पाती। कक्षाओं के पीछे झाड़-झाड़ियों का जंगल खड़ा है। बारिश के दिनों में जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा बना रहता है। इसके अलावा कैंटिन तक की सुविधाएं नहीं है। वहीं, तीन साल से एनसीसी भी नहीं है। </p>
<p><strong>बजट मिला और हो गया लैप्स</strong><br />गत वर्ष अक्टूबर में रामपुरा महाविद्यालय के लिए 4.50 लाख रुपए का बजट नोडल महाविद्यालय जेडीबी आर्ट्स को मिला था। उस समय बजट खर्च करने में किसी भी तरह की राजनेतिक प्रतिबंधिता नहीं थी। नोडल प्राचार्य को नोटशीट लिख छात्राओं के लिए टेबल-कुर्सियां खरीदने का आग्रह किया। लेकिन, इस बीच विधानसभा की आचार संहिता लग गई। हटने के बाद फिर से नोटशीट लिखी। सकारात्मक प्रयास नहीं हुए और लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लग गई। जब आचार संहिता हटी तो फिर नोटशीट लिख समस्याओं से अवगत कराया। कार्य में देरी होती गई और अनंत: बजट भी लैप्स हो गया। बजट होते हुए भी छात्राओं को सुविधाएं मुहैया नहीं हो सकी।<br /><strong>-डॉ. राजेश चौहान, प्राचार्य रामपुरा कॉलेज  </strong></p>
<p>टेबल-कुर्सियां खरीदने के लिए आयुक्तालय से दिशा-निर्देश प्राप्त करने को पत्र लिखा है। बजट मांगा है, यदि नहीं मिला तो आयुक्तालय से निर्देश प्राप्त कर विकास समिति से क्रय किया जाएगा। वहीं, जिन परिस्थितियों में गत वर्ष बजट मिला था, उस समय क्रय समिति द्वारा प्रक्रियारत थी लेकिन, विधानसभा व लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। <br /><strong>-प्रो. सीमा चौहान, प्राचार्य जेडीबी आर्ट्स कॉलेज </strong></p>
<p>रामपुरा कॉलेज में फर्नीचर की मांग जायज है। गत वर्ष जो बजट लैप्स हुआ है, उसे फिर से दिलवाने का प्रयास करेंगे। लेकिन, इसके लिए रामपुरा और नोडल जेडीबी आर्ट्स दोनों महाविद्यालय के प्राचार्यों द्वारा पत्र देना होगा। जिसके माध्यम से प्रयास किए जाएंगे।  <br /><strong>-डॉ. गीताराम शर्मा, क्षेत्रीय सहायक निदेशक, आयुक्तालय</strong></p>
<p><strong>छात्राएं बोलीं-जमीन पर बैठकर दिया मिड-टर्म </strong><br />कॉलेज में सबसे बड़ी समस्या फर्नीचर की है। वर्तमान में 480 छात्राएं अध्ययनरत हैं, जिनके मुकाबले मात्र 97 ही टेबल-कुर्सी है। तृतीय वर्ष में 30 से 35 छात्राओं की उपस्थिति रहती है, जिसके अनुपात में 20 से 25 ही टेबल कुर्सियां हैं। ऐसे में अधिकतर छात्राओं को कक्षा में खड़ा ही रहना पड़ता है। गत वर्ष मिड-टर्म एग्जाम व प्रेक्टिल जमीन पर बैठकर दिया है। <br /><strong>-अनसूइया मीणा, तृतीय वर्ष </strong></p>
<p><strong>कोर्स से पहले ही फैकल्टी का कार्यकाला खत्म</strong><br /> महाविद्यालय में सात विषय संचालित हैं, जिनकी फैकल्टी विद्या संबल पर लगी है। इनका कार्यकाल सेमेस्टर एग्जाम से पहले ही खत्म हो जाता है। ऐसे में प्रेक्टिकल, एग्जाम पैटर्न समझाने व सिलेबस पूरा करवाने वाला कोई नहीं होता। फीस देकर भी परेशान होना पड़े तो कॉलेज में पढ़ने का फायदा ही क्या है। <br /><strong>-दिव्यांशी कुराड़िया, द्वितीय वर्ष</strong></p>
<p><strong>दो साल से नहीं मिली छात्रवृति</strong><br />समाज कल्याण की ओर से मिलने वाली छात्रवृति दो साल से छात्राओं को नहीं मिली। यह तीसरा साल चल रहा है, इस बार भी स्कोलरशिप मिलने में संशय है। हर साल फॉर्म भरते और छात्रवृति का इंतजार करते।  इसके लिए नोडल कॉलेज जेडीबी आर्ट्स व समाज कल्याण विभाग भी गए लेकिन कहीं भी छात्रवृति कब मिलेगी, नहीं मिलने का कारण सहित कुछ भी संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा। <br /><strong>-हर्षिता सुमन, द्वितीय वर्ष</strong><br /><strong> </strong><br /><strong>कॉलेज आने में प्रतिमाह खर्च होते 3 हजार रुपए</strong><br />छात्राओं को महाविद्यालय आने-जाने के लिए साधन नहीं मिलते। लड़कियां दूर-दराज से आतीं हैं। मुझे कैशवपुरा से कॉलेज आने के लिए तीन जगहों पर आॅटो बदलना पड़ता है। प्रतिदिन आने-जाने में 100 रुपए खर्च होता है। ऐसे में   एक माह में 3 हजार रुपए का खर्चा होता है। छात्राओं के लिए सरकार को सीएडी व नयापुरा चौराहे पर सिटी बसें लगानी चाहिए। साधन मिलेगा तो लड़कियों की महाविद्यालय में उपस्थिति बढ़ सकेगी। <br /><strong>-प्रियंका चौधरी, तृतीय वर्ष</strong></p>
<p><strong>ऐसे कॉलेज में क्यों पढ़े जब फर्श पर ही बैठना पड़े </strong><br />मैं दो साल से रेगुलर कॉलेज आ रही हूं, लेकिन व्यवस्थाओं में सुधार नहीं देखा। पहले भी छात्राओं को फर्श पर बैठना पड़ता था, अब भी जमीन पर बैठना पड़ता है। कॉलेज में जब कोई सांस्कृतिक प्रोग्राम या सेमिनार होता है तब लड़कियों को फर्श पर ही बिठाया जाता है। इतना ही नहीं, कॉलेज में फ्रेशर पार्टी सहित अन्य कार्यक्रम भी छात्राओं को पैसे इक्कठे करके करने पड़ते हैं। एनसीसी के लिए आश्वासन ही मिले जो अब तक अधूरे हैं। ऐसे कॉलेज में पढ़ने का क्या फायदा जहां बैठने का टेबल-कुर्सियां ही नहीं है।<br /><strong>-देवेंतिका कहार, तृतीय वर्ष</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Aug 2024 15:18:39 +0530</pubDate>
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                <title>एमबीएस अस्पताल की नई ओपीडी में कुर्सिया खा रही धूल, मरीज हो रहे परेशान</title>
                                    <description><![CDATA[एमबीएस ओपीडी ब्लॉक को लोकार्पण के चक्कर में आधी अधुरी तैयारियों के बीच शुरू कर दिया जिससे मरीजों को परेशानी हो रही।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/chairs-eating-dust-in-new-opd-of-mbs-hospital--patients-are-getting-upset/article-52445"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/mbs-aspatal-ki-nyi-opd-me-kursiya-kha-rhi-dhool,-mariz-ho-rhe-preshaan...kota-news-22-07-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। संभाग के सबसे बड़े अस्पताल एमबीएस की नई ओपीडी ब्लॉक विभिन्न विभागों की ओपीडी को शिफ्ट तो कर दिया लेकिन अभी मरीजों को पूरी सुविधाएं नहीं मिल रही है। बिल्डिंग शिफ्टिंग के दौरान मरीजों के बैठने के लिए थ्री सिटर स्टील की चेयर्स मंगवाई थी। नये ब्लॉक की कुछ ओपीडी कक्ष के बाहर तो मरीजों के बैठने के लिए चेयर्स लगा दी लेकिन अभी तीन मंजिला बिल्डिंग की कई ओपीडी कक्ष के बाहर अभी स्टील की चेयर्स नहीं लगाई गई। ये बची हुई कुर्सियां कक्ष में पड़ी धूल खा रही है। इनको ओपीडी और अन्य स्थानों पर लगा दिया जाता तो मरीजों को राहत मिलती है। उधर अस्पताल प्रशासन का कहना है कि ओपीडी में जहां जहां आवश्यकता थी वहां मरीजों के बैठने के लिए कुर्सियां लगा दी है। कुछ विभागों के बाहर अभी कुर्सियां लगाना बाकी है। जैसे जैसे विभाग की ओर से मांग आ रही है वहां कुर्सियां लगाई जा रही है। </p>
<p><strong>कुर्सियां धूल में, इमरजेंसी मरीज बैठे जमीन पर</strong><br />अस्पताल में इलाज कराने आए मरीज राम किशन गुर्जर ने बताया कि एमबीएस ओपीडी ब्लॉक को लोकार्पण के चक्कर में आधी अधुरी तैयारियों के बीच शुरू कर दिया जिससे मरीजों को परेशानी हो रही। कुछ ओपीडी कक्षों के बाहर तो स्टील की चेर्यस लगा रखी है। लेकिन इमरजेंसी के बाहर कुर्सियां नहीं होने मरीजों को परेशानी हो रही है। अस्पताल प्रशासन के पास कुर्सियां पड़ी है तो इसको लगाना चाहिए जिससे मरीजों को राहत मिले। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />नई ओपीडी मरीजों को बैठने के लिए सभी जगह कुर्सियां लगा रखी है। जैसे जैसे ओपीडी के विभाग की मांग आ रही उस अनुसार कुर्सियां लगाई जा रही है। कुछ कुर्सियां इमरजेंसी ब्लॉक के लिए रखी है उसको लगाया जाएगा। <br /><strong>- डॉ. धर्मराज मीणा, अधीक्षक एमबीएस अस्पताल कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sat, 22 Jul 2023 16:33:35 +0530</pubDate>
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