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                <title>allahabad high court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>कैश विवाद:  जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा; राष्ट्रपति को भेजा पत्र, दिल्ली स्थित घर में मिले थे जलते हुए नोट</title>
                                    <description><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। उनके आवास पर जले हुए नोट मिलने के बाद से वे विवादों में थे और उनके खिलाफ आंतरिक जांच व महाभियोग की चर्चा चल रही थी। फिलहाल वे न्यायिक कार्यों से दूर थे और मामले की जांच अभी जारी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/justice-yashwant-verma-resigned-after-the-cash-dispute-sent-a/article-149835"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/yaswant-verma.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके लिए उन्होनें राष्ट्रपति को पत्र लिखा है। दरअसल, वर्मा जब सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस थे तब उनके सरकारी आवास के स्टोर में जलते हुए नोट मिले थे, जिसके बाद वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा गया था। मीडिया के अनुसार, इस मामले में उनके खिलाफ आंतरिक जांच अभी तक चल रही थी और साथ ही महाभियोग की भी चर्चा चल रही थी। फिलहाल, उनको न्यायिक कार्य से अलग किया गया है और इस मामले में उनके खिलाफ जांच अभी भी जारी है।</p>
<p>इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने नौ अप्रैल को अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को भेजा और इसकी एक प्रति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भी प्रेषित की है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने इस पत्र में लिखा, "मैं आपके गरिमामयी कार्यालय पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता, जिन्होंने मुझे यह कदम उठाने पर विवश किया और मुझे यह पत्र प्रस्तुत करना पड़ रहा है। फिर भी अत्यंत पीड़ा के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना त्यागपत्र दे रहा हूं। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।"</p>
<p>गौरतलब है कि वह पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में कार्यरत थे और दिल्ली वाले घर में मार्च 2025 में भारी मात्रा में जले नोट मिलने के मामले में जांच के घेरे में आ गये थे। न्यायमूर्ति वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से पिछले वर्ष इलाहाबाद भेजा गया था और उन्होंने वहां पांच अप्रैल को पद और गोपनीयता की शपथ ली थी। उनके खिलाफ आंतरिक जांच चल रही थी और इसी जांच के चलते उन्हें न्यायिक कार्य से अलग रखा गया था। उनके खिलाफ महाभियोग की भी तैयारी की जा रही थी।</p>
<p>उच्चतम न्यायालय ने उनके आवास पर जले हुए नोट मिलने के बाद इस मामले की आंतरिक जांच के लिए तीन जजों की एक कमेटी बनाई थी। इसके बाद चार मई को तीन वरिष्ठ जजों के इस पैनल ने अपनी रिपोर्ट उस समय के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को सौंप दी थी। अगस्त में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय पैनल गठित किया था। इस समिति के सदस्यों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता वासुदेव आचार्य शामिल हैं। श्री बिरला ने यह जांच समिति तब बनाई थी, जब लोकसभा के 146 सदस्यों ने न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया।</p>
<p>जांच समिति के सामने नौ अहम गवाह पेश किए जा चुके थे। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने नौ अप्रैल को राष्ट्रपति को इस्तीफा भेजा और 10 अप्रैल को यह सार्वजनिक हुआ। उन्हें 10 से 14 अप्रैल के बीच अपना पक्ष रखना था। विधिक मामलों के जानकार सूत्रों का कहना है कि यशवंत वर्मा के इस्तीफा देने के बाद उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया अब खत्म हो जाएगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 12:57:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>संभल हिंसा मामला: ASP अनुज चौधरी को राहत, FIR के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई रोक</title>
                                    <description><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल हिंसा केस में एएसपी अनुज चौधरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर रोक लगाई, याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत मिली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/allahabad-high-court-stays-order-for-relief-to-asp-anuj/article-142633"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(7)7.png" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल हिंसा मामले में एएसपी अनुज चौघरी को बड़ी राहत देते हुए एफआईआर के आदेशों पर रोक लगा दी है। बता दें कि इस हादसे में आलम को 3 गोलियां मारने पर स्थानिय कोर्ट ने 9 जनवरी को करीब 22 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे। जिसके बाद एएसपी अनुज चौधरी ने कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रूख किया था।</p>
<p>जिस पर आज सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर पर रोक लगा दी हैं। इसके साथ ही बता दें इस मामले में एफआईआर का आदेश जारी करने वाले न्यायधीश पहले ही हट चुके हैं। हाईकोर्ट ने अनुज तोमर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 14 दिन की अंतरिम राहत देते हुए शिकायत करने वाले यामीन को कोर्ट में जवाब दाखिल करने के लिए करीब 14 दिन का समय दिया है।</p>
<p>अदालत ने तत्कालीन कोतवाली इंस्पेक्टर अनुज तोमर को भी राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने 9 जनवरी को पारित संभल सीजेएम न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए शिकायतकर्ता यामीन से दोनों याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई पांच सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि संभल के सीजेएम विभांशु सुधीर ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत एएसपी अनुज चौधधरी सहित 20 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। इस आदेश के विरुद्ध अनुज चौधरी और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल याचिका पर सोमवार और मंगलवार को सुनवाई हुई, जिसके बाद हाईकोर्ट ने यह अंतरिम आदेश पारित किया।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 15:52:52 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी होने पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना, बताया-सनातन परंपरा का अपमान</title>
                                    <description><![CDATA[अजय राय ने अविमुक्तेश्वरानंद को मिले नोटिस को सनातन का अपमान बताया। उन्होंने कहा कि सरकार अब धर्माचार्यों की पहचान तय करने लगी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/on-issuing-notice-to-swami-avimukteshwaranand-congress-targeted-the-central/article-140239"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(7)7.png" alt=""></a><br /><p>लखनऊ। माघ मेला क्षेत्र में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिस पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि अब प्रदेश सरकार खुद यह तय करने पर उतारू हो गई है कि जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में शंकराचार्य हैं या नहीं। </p>
<p>उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ सनातन परंपरा का अपमान है, बल्कि धर्माचार्यों की गरिमा पर सीधा हमला भी है। एक ओर जगद्गुरु शंकराचार्य को नोटिस भेजे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार और उसके नेता सनातन धर्म के नाम पर बड़े-बड़े भाषण देते नहीं थकते। यह साफ तौर पर सरकार की दोहरी नीति को उजागर करता है।</p>
<p>अजय राय ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस देश और प्रदेश में सत्ता में बैठे लोग खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताते हैं, उसी शासन में एक प्रतिष्ठित धर्माचार्य की पहचान पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह रवैया न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है, बल्कि भारतीय परंपराओं के भी खिलाफ है।   </p>
<p>प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि सरकार को यह समझना चाहिए कि धर्म का सम्मान केवल मंचों से भाषण देकर नहीं होता, बल्कि अपने आचरण और व्यवहार से होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बार-बार धर्म को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है, लेकिन जब वास्तविक सम्मान की बात आती है तो उसका चेहरा बेनकाब हो जाता है।  </p>
<p>इसके आगे अजय राय ने मांग की कि राज्य सरकार इस पूरे मामले पर अपना रुख स्पष्ट करे और धर्माचार्यों के सम्मान से जुड़े किसी भी कदम से पहले सनातन परंपराओं और धार्मिक मर्यादाओं का ध्यान रखे। गौरतलब है कि, माघ मेला क्षेत्र में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिस में न्यायालयीन आदेशों का हवाला देते हुए शंकराचार्य पद से जुड़े विवाद का उल्लेख किया गया है और मेला क्षेत्र में किसी भी प्रकार के आयोजन, शिविर या गतिविधि को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।</p>
<p>प्राधिकरण की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित वाद और पूर्व में पारित आदेशों के तहत विवादित विषय से जुड़े किसी भी प्रकार के आयोजन या प्रचार-प्रसार की अनुमति नहीं दी जा सकती। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि आदेशों के उल्लंघन की स्थिति में विधिक कार्रवाई की जा सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Tue, 20 Jan 2026 18:43:16 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मदरसा शिक्षा : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर लगाई रोक, कहा- इससे 17 लाख छात्रों पर असर पड़ेगा</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के 22 मार्च 2024 को उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड शिक्षा अधिनियम 2004 के प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द करने वाले फैसले पर रोक लगा दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/madarsa-education-supreme-court-put-a-stay-on-the-decision/article-74546"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के 22 मार्च 2024 को उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड शिक्षा अधिनियम 2004 के प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द करने वाले फैसले पर रोक लगा दी।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले में '2004 अधिनियम की प्रथम दृष्ट्या गलत व्याख्या मानते हुए कहा कि उच्च न्यायालय का निर्देश 17 लाख छात्रों के अधिकारों पर आघात करेगा, क्योंकि विशेष शिक्षा का चयन करना हमेशा छात्रों और उनके माता-पिता की पसंद रही है।</p>
<p>पीठ ने कहा कि यह सुनिश्चित करने में राज्यों के वाजिब हित हैं कि छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रहें। क्या इस उद्देश्य के लिए पूरे क़ानून को रद्द करने की आवश्यकता नहीं होगी, इस पर विचार करने की आवश्यकता होगी।</p>
<p>पीठ ने अपने आदेश में कहा कि उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि 2004 का अधिनियम धर्मनिरपेक्षता और बुनियादी ढांचे और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। ये निष्कर्ष हालाँकि, मदरसा बोर्ड को सौंपी गई नियामक शक्ति से मेल खाते प्रतीत होते हैं।संविधान के अनुच्छेद 28(1) में प्रावधान है कि सरकार द्वारा पूर्ण सहायता प्राप्त संस्थानों में कोई धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।</p>
<p> उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले का समर्थन करते हुए दलील दी कि लगभग 17 लाख छात्रों को नियमित संस्थानों में समायोजित किया जा सकता है और अगर फैसले पर रोक लगाई गई तो राज्य को 1096 करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा।</p>
<p> अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि धर्म का उलझाव अपने आप में संदिग्ध मुद्दा है,  जिस पर विचार-विमर्श की जरूरत है।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए एम सिंघवी, मुकुल रोहतगी, पी एस पटवालिया, सलमान खुर्शीद और मेनका गुरुस्वामी और अन्य ने उच्च न्यायालय के फैसले की वैधता पर सवाल उठाया।</p>
<p>उन्होंने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने फरमान पारित कर 1908 से नियामक व्यवस्था के तहत चलाए जा रहे मदरसों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले से 17 लाख छात्रों के अलावा 10,000 शिक्षक भी प्रभावित हुए हैं।</p>
<p>पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं के कहा कि देशभर में गुरुकुल और संस्कृत पाठशालाएं भी हैं। रोहतगी के पास शिवमोग्गा जिले के एक गाँव का उदाहरण है, जहाँ लोग संस्कृत के अलावा कोई अन्य भाषा नहीं बोलते हैं।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने कहा,  कि क्या राज्य सहायता देकर धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन कर रहा है? क्योंकि हम इस्लाम पढ़ाते हैं, इसलिए यह संस्था धार्मिक निर्देश देने वाली नहीं बन जाती।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Fri, 05 Apr 2024 17:54:15 +0530</pubDate>
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                <title>Gyanvapi Case: ज्ञानवापी मामले में सुनवाई पूरी, उच्च न्यायालय ने सुरक्षित रखा फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[मस्जिद पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता एस एफ ए नकवी व पुनीत गुप्ता ने  तर्क दिया कि पूजा के अधिकार की मांग में दाखिल सिविल वाद में अधिकार तय किए बगैर अंतरिम आदेश से फाइनल रिलीफ देना कानूनी प्रक्रिया का उल्लघंन है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/gyanwapi-case-hearing-completed-in-gyanwapi-case-high-court-reserves/article-70213"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/gyanvapi.png" alt=""></a><br /><p>प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी स्थित ज्ञानवापी गृहतल में काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को पूजा की अनुमति देने की जिला जज के आदेश की वैधता की चुनौती देने वाली अपीलों की सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया। न्यायधीश रोहित रंजन अग्रवाल मसाजिद कमेटी की तरफ से दाखिल जिला जज के दो आदेशों की चुनौती अपीलों की सुनवाई कर रहे थे।</p>
<p>मस्जिद पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता एस एफ ए नकवी व पुनीत गुप्ता ने  तर्क दिया कि पूजा के अधिकार की मांग में दाखिल सिविल वाद में अधिकार तय किए बगैर अंतरिम आदेश से फाइनल रिलीफ देना कानूनी प्रक्रिया का उल्लघंन है। तहखाने में पूजा की अनुमति देकर वस्तुत: सिविल वाद स्वीकार कर लिया गया है। साथ ही जिला जज ने स्वयं ही दो विरोधाभाषी आदेश दिए हैं।</p>
<p>यह भी कहा गया कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अंतर्निहित अधिकार का प्रयोग करते हुए अदालत मूल आदेश  की प्रकृति में बदलाव का आदेश नहीं दे सकती।  मूल आदेश में केवल एक मांग मानी गई। जिलाधिकारी को रिसीवर नियुक्त कर दिया गया। बिना किसी अर्जी के केवल मौखिक अनुरोध पर पूजा का अधिकार दे दिया गया है। अदालत ने अपनी अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल करने का आदेश में उल्लेख नहीं किया है। जिला अदालत ने 17 जनवरी को अर्जी स्वीकार कर केवल एक रिलीफ ही दी। दूसरी मांग पर आदेश नहीं देना ही अनुतोष से इंकार माना जाएगा।</p>
<p>कहा गया कि 17 जनवरी 24 के मूल आदेश से जिला जज ने विवादित भवन की सुरक्षा व देखरेख  करने व किसी प्रकार का बदलाव न होने देने का भी निर्देश दिया है और 31 जनवरी 24 के  आदेश से बैरिकेङ्क्षडग काट कर तहखाने में पूजा के लिए दरवाजा बनाने तथा ट्रस्ट को पुजारी के जरिए तहखाने में स्थित देवी देवताओं की पूजा करने की अनुमति देकर अपने ही आदेश का विरोधाभासी आदेश दिया है।</p>
<p>यह भी कहा गया कि तहखाने पर किसका अधिकार है, यह साक्ष्यों के बाद सिविल वाद के निर्णय से तय होगा। जिला जज ने अंतरिम आदेश से फाइनल रिलीफ देकर गलती की है। इसलिए जिला जज के आदेश रद किए जाये। <br /><br />मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने पक्ष रखा। इनका कहना था कि अदालत को धारा 151व 152 के अंतर्गत न्याय हित में आदेश देने का अंतर्निहित अधिकार है।वादी अधिवक्ता के संज्ञान में लाने के बाद अदालत ने छूटी  हुई प्रार्थना स्वीकार की है।वादी के बजाय अदालत ने ट्रस्ट को पुजारी के जरिए पूजा का अधिकार बहाल किया है। </p>
<p>वादी व्यास जी के तहखाने में वर्षों से पूजा अर्चना करता आ रहा है। वर्ष 1993 मे श्रीराम जन्मभूमि विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद ज्ञानवापी की लोहे की बाड़ से बैरिकेङ्क्षडग करने के कारण तहखाने में पूजा करने से बिना किसी आदेश के रोक लगा दी गई थी। अदालत ने कोई नया अधिकार नहीं दिया है।  कहा कि जिला जज ने अर्जी की तीन बार सुनवाई की तिथि तय की ङ्क्षकतु मस्जिद पक्ष की तरफ से कोई आपत्ति नहीं की गई। दोनों पक्षों को सुनकर जिला जज ने 31 जनवरी का दूसरा आदेश जारी किया है जो 17 जनवरी के मूल आदेश का ही हिस्सा है। अदालत को गलती  दुरूस्त करने व छूटे आदेश को पारित करने का पूरा अधिकार है। आदेश कानूनी प्रक्रिया के तहत पारित किया गया है।</p>
<p>बहस की गई कि दीन मोहम्मद केस में कोर्ट ने व्यास जी के तहखाने का जिक्र किया है। जितेंद्र व्यास के पूजा करने को स्वीकार किया गया है। इसलिए अपीलें बलहीन होने के नाते खारिज की जाए।</p>
<p>प्रदेश सरकार की तरफ से महाधिवक्ता अजय कुमार मिश्र, मुख्य स्थाई अधिवक्ता कुणाल रवि व हरे राम त्रिपाठी ने पक्ष रखा। महाधिवक्ता का कहना था कि कानून व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। अदालत के आदेश पर अमल कराना सरकार का दायित्व है।</p>
<p>उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने लगभग 40 मिनट तक तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी के दाहिने हिस्से में तहखाना स्थित है, जहां ङ्क्षहदू वर्ष 1993 तक पूजा कर रहे थे। सीपीसी के आदेश 40 नियम एक के तहत वाराणसी कोर्ट ने डीएम को रिसीवर नियुक्त किया है। पूजा का आदेश किसी तरह से मुस्लिमों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है, क्योंकि मुसलमान कभी तहखाने में नमाज नहीं पढ़ता था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 15 Feb 2024 17:19:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>Gyanvapi Case: सुप्रीम कोर्ट पहुंची मस्जिद कमेटी, इलाहाबाद हाईकोर्ट के सर्वे कराने वाले फैसले को दी चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[कमेटी के वकील ने कहा है कि एएसआई को सर्वे करने की अनुमति न दी जाए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/gyanvapi-case-mosque-committee-reaches-supreme-court-challenges-allahabad-high-court-decision-to-conduct-survey/article-53598"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/gyanvapi-sc.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। ज्ञानवापी परिसर में ASI के सर्वे को रोकने की याचिका खारिज हो जाने के बाद अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। कमेटी के वकील ने कहा है कि एएसआई को सर्वे करने की अनुमति न दी जाए।<br /><br /><strong>हिंदू पक्ष की ओर से दायर की गई कैविएट</strong><br />मस्जिद कमेटी के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की गई थी। इसका पीछे उनका मकसद है कि यदि मुस्लिम पक्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाता है तो इस स्थिति में कोई भी फैसला सुनाने से पहले हिंदू पक्ष को भी सुना जाए। <br /><br />गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका लगा। अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के एएसआई सर्वे पर अपना फैसला सुनाया। अदालत ने मस्जिद कमेटी की याचिका को खारिज करते हुए ASI सर्वे की इजाजत दे दी। बता दें कि मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रीतिंकर दिवाकर की एकल पीठ ने की। शुक्रवार से ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे किया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Thu, 03 Aug 2023 17:28:26 +0530</pubDate>
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                <title>Gyanvapi Case: ASI सर्वे रोकने वाली याचिका को हाई कोर्ट ने किया खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्य न्यायाधीश दिवाकर ने गुरूवार को अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की याचिका को खारिज करते हुए अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि सर्वे पर लगी रोक समाप्त की जाती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/allahabad-high-court-dismisses-petition-to-stop-gyanvapi-asi-survey-and-allows-asi-to-condut-survey-in-gyanvapi-mosque/article-53512"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/gyanvapi.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रोकने संबंधी मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया है।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश प्रीङ्क्षतकर दिवाकर ने गुरूवार को अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की याचिका को खारिज करते हुए अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि सर्वे पर लगी रोक समाप्त की जाती है। कोर्ट ने एएसआई सर्वे को लेकर एएसआई की तरफ से दिए हलफनामे को लेकर कहा कि उस हलफनामा पर अविश्वास करने का कोई आधार नहीं है। </p>
<p>हलफनामा में एएसआई ने कहा था कि उनके सर्वे से ज्ञानवापी परिसर में किसी भी प्रकार का इंच भर भी नुकसान नहीं होगा। उच्च न्यायालय ने वाराणसी की निचली अदालत के सर्वे कराने के आदेश को भी सही माना है। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद एएसआई सर्वे का रास्ता साफ हो गया है। एएसआई ने अपने बयान में कहा था कि परिसर में खुदाई करने का उसका कोई इरादा नहीं है। </p>
<p>गौरतलब है कि पिछली 21 जुलाई को वाराणसी जिला जज ने ज्ञानवापी परिसर में एएसआई सर्वे को मंजूरी प्रदान की थी  जिसके बाद मुस्लिम पक्ष ने जिला जज के फैसले को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट से रोक लगाने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी। दोनो पक्षों की दलील सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने 27 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।</p>
<p>मुस्लिम पक्ष ने सर्वे से ढांचे को नुकसान होने की बात कही थी। जिसके बाद एएसआई की ओर से एक हलफनामा दाखिल कर कहा गया था कि सर्वे से कोई नुकसान नहीं होगा जिसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट के फैसले के बाद अब कभी भी ज्ञानवापी परिसर का एएसआई सर्वे शुरू किया जा सकता है। हिन्दू पक्ष के अधिवक्ता के मुताबिक कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया कि सर्वे को किसी भी स्टेज पर शुरू किया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Thu, 03 Aug 2023 12:02:51 +0530</pubDate>
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