<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://dainiknavajyoti.com/hindi-diwas-2023/tag-39593" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Dainik Navajyoti Rising Rajasthan RSS Feed Generator</generator>
                <title>hindi diwas 2023 - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
                <link>https://dainiknavajyoti.com/tag/39593/rss</link>
                <description>hindi diwas 2023 RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>हिन्दी तो विविधता में एकता की भाषा है!</title>
                                    <description><![CDATA[ भारत का भाषा परिवार हम से ये उम्मीद करता है कि कोई एक भाषा किसी दूसरी भाषा पर थोपी नहीं जानी चाहिए। क्योंकि हिन्दी भाषा की संरचनाएं प्रांतीय भाषाओं और बोलियों से ही सृजित और समृद्ध हुई है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/hindi-is-the-language-of-unity-in-diversity/article-57080"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/hindi-diwas1.png" alt=""></a><br /><p>इस बार भी 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाएगा और हिन्दी भाषी राज्यों में परम्परा के अनुसार सरकारी खर्च पर सरकारी संस्थानों में खूब तालियां और थालियां बजेगी और बधाइयां भी बंटेगी। मुझे इस बात की खुशी भी है कि साल में एक दिन हिन्दी भाषा के प्रकाश स्तंभ रचनाकारों के चित्र प्रकाशित होते हैं। लेकिन हिन्दी भाषी क्षेत्रों का ये पुराना दर्द भी छलकता है कि हिन्दी भाषा को आजादी के 76 साल बाद भी हम हिन्दी को एक राष्ट्रभाषा का सम्मान क्यों नहीं दे पा रहे हैं। आप जानते ही हैं कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने केवल राजभाषा का दर्जा दे रखा है और तब से हिन्दी भाषा, भारत की राष्ट्रभाषा नहीं मानी जा रही है।<br /><br />इस दर्द को समझने के लिए मैं खुद हिन्दी भाषा का लेखक होने के नाते ये कहना चाहता हूं कि पहले हिन्दी प्रदेशों में, अहिन्दी प्रदेशों की भारतीय भाषाओं के प्रति आदर और अनुराग की भावना भी दिखाई-सुनाई पड़नी चाहिए। भारत का भाषा परिवार हम से ये उम्मीद करता है कि कोई एक भाषा किसी दूसरी भाषा पर थोपी नहीं जानी चाहिए। क्योंकि हिन्दी भाषा की संरचनाएं प्रांतीय भाषाओं और बोलियों से ही सृजित और समृद्ध हुई है। राजभाषा और राष्ट्रभाषा का ये वाद-विवाद और संवाद ही आज भाषाई वर्चस्व की राजनीति का रूप ले चुका है।<br /><br />दूसरे रूप में हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की राजनीति ने भी इस हिन्दी भाषा को राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ दिया है और ये माना जाने लगा है कि जब हिन्दी प्रदेशों (उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल, हरियाणा) से ही केंद्र सरकार का भविष्य तय होता है तो फिर भाषाओं का भविष्य भी बहुमत के शासन द्वारा ही तय किया जाएगा। भारत के अधिकतर प्रधानमंत्री इन हिन्दी प्रदेशों की देन हैं और हिन्दी भाषा की सृजन परम्परा इन्हीं हिन्दी प्रदेशों से आती है। यानी कि हिन्दी भाषा को शुरू से ही एक वर्चस्व की भाषा बनाया गया है, जबकि संस्कृत, तमिल तेलगू जैसी अनेक भाषाएं शास्त्रीय भाषा की तरह बहुत समृद्ध हैं। <br /><br />इस भाषाई सत्ता व्यवस्था की राजनीति ने बंगला, असमिया, मलयालम, कन्नड़ और गुजराती, राजस्थानी, बुंदेलखण्डी, भोजपुरी जैसे अनेक समृद्ध भाषाओं को वर्चस्व की हिन्दी मानसिकता ने हाशिए से बाहर धकेल दिया है। मेरा इस पृष्ठभूमि में विनम्र सुझाव है कि हिन्दी भाषा-भाषी हिन्दी को अधिक विवाद रहित बनाने के लिए पहले अहिंदी भाषा-भाषियों के साथ सृजन संवाद और सांस्कृतिक सौहार्द बढ़ाएं और अनुवाद के पुल अधिक बढ़ाएं। उर्दू, अंग्रेजी के साथ हिन्दी का तालमेल लगातार अनुवाद से ही बढ़ रहा है। मेरा ये भी अनुरोध है कि हिन्दी जगत को इस बात का गर्व होना चाहिए कि आज हिन्दी यत्र-तत्र-सर्वत्र है और बाजार और सरकार के साथ टेक्नोलॉजी और शिक्षा के माध्यम के रूप में भी प्राय: सर्वमान्य है। प्रचार के सभी माध्यम, फिल्म उद्योग, प्रसारण तंत्र-हिन्दी को घर-घर ले जा रहे हैं। ऐसा है कि हिन्दी तो खुद एक बहता हुआ पानी है जो खुद अपना रास्ता बना रहा है। आज लाल किला भी हिंदी भाषणों से ही जनता के दिल और दिमाग पर राज कर रहा है और अंग्रेजी से अधिक विश्व मंचों पर कामयाब है।<br /><br />ऐसे में हिन्दी आज बाजार, व्यवहार और बहुमत की राजनीति का सफलतम उदाहरण है। शिक्षा की नई नीति में हिन्दी, अंग्रेजी और तीसरी कोई प्रांतीय भाषा का त्रिभाषा फार्मूला भी यही संवाद और समन्वय बनाता है। अत: हिन्दी भाषा-भाषियों को उदारता और भाषाई-पारिवारिकता की समझ के साथ, सबका साथ-सबका विश्वास और सबका विकास की गैर बराबरी से मुक्त बात करनी चाहिए। क्योंकि हिन्दी प्रथम है किंतु सभी की पंक्ति में समान है। केवल हिन्दी का आग्रह और दुराग्रह एक तरह की संकीर्णता है। अत: हिन्दी को विविधता में एकता का आधार बनाए हैं। हिन्दी के लिए एक दिन का सरकारी कर्मकांड अब बंद होना चाहिए। क्योंकि ये अब जनता के धन का दुरुपयोग है। उचित ये है कि राजभाषा के नाम पर चल रहे सभी अखाड़े अब अहिन्दी भाषी राज्यों में सक्रिय बनाने चाहिए। ताकि प्रांतीय भाषाओं से हमारा भाईचारा बढ़े और सांस्कृतिक आदान.प्रदान विकसित हो। दूसरों को सम्मान देकर ही आप उनसे सम्मान ले सकते हैं। क्योंकि उत्तर की संकीर्ण राजनीति भी बढ़ती है। हिन्दी भाषी लोगों को अन्य भारतीय भाषाओं को पढ़ना-लिखना और बोलना भी चाहिए ताकि हिन्दी भारत में भाषाई एकता का चंदन पानी बन सकें। इसलिए अपना दर्द बताएं तो दूसरों का दर्द भी समझें।<br /><br />-वेदव्यास<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/hindi-is-the-language-of-unity-in-diversity/article-57080</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/hindi-is-the-language-of-unity-in-diversity/article-57080</guid>
                <pubDate>Thu, 14 Sep 2023 12:45:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-09/hindi-diwas1.png"                         length="161581"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजस्थान की मिट्टी में उगे अक्षरों से लहलहा रही हिन्दी की बगिया</title>
                                    <description><![CDATA[ आधुनिक गद्य में भी कई ऐसे नाम रहे जिनका संबंध राजस्थान से रहा। इनमें रांगेय राघव, चतुरसेन शास्त्री एवं मन्नू भंडारी प्रमुख हैं। इतिहास में गौरीशंकर हीराचंद ओझा बड़ी शख्सियत रही हैं। 
 ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/hindi-garden-blooming-with-letters-growing-in-the-soil-of/article-57074"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/hindi-diwas.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजभाषा हिन्दी को गढ़ने और समृद्ध करने में राजस्थान की भूमिका अहम है। हिंदी साहित्य के महाकाव्यों में अधिकतर राजस्थान में लिखे गए। इनमें चंदरबरदाई का पृथ्वीराज रासो, जायसी का पद्मावत, वृंद सतसई, बीसलदेव रासो, बिहारी सतसई और श्यामनारायण पांडेय का हल्दीघाटी प्रमुख हैं। आधुनिक गद्य में भी कई ऐसे नाम रहे जिनका संबंध राजस्थान से रहा। इनमें रांगेय राघव, चतुरसेन शास्त्री एवं मन्नू भंडारी प्रमुख हैं। इतिहास में गौरीशंकर हीराचंद ओझा बड़ी शख्सियत रही हैं। <br /><br /></p>
<p><strong>बिहारी सतसई</strong><br />700 दोहे । जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में लेखन। आमेर जाते हुए आज का बिहारी मंदिर ही वह स्थान है, जहां हर दिन एक दोहा रचा जाता और बदले में कवि राजा से एक अशरफी पाता। </p>
<p><strong>पद्मावत</strong><br />शेरशाह सूरी के दरबारी मलिक मोहम्मद जायसी की रचना। चौपाइयों, दोहों में। मेवाड़ की महारानी पद्मावती से बताया जाता है जो कि विवाद का विषय भी रहा है। यह दिलचस्प तथ्य है कि जायसी ने तुलसीदास की रामचरित मानस से 36 साल पहले (1540) अवधी भाषा में पद्मावत की रचना की थी और वह भी चौपाई और दोहों में। तुलसी ने बाद में यही शैली पकड़ी। </p>
<p><strong>पृथ्वीराज रासो</strong><br />सबसे बड़ा काव्य ग्रंथ। चंदरबरदाई की रचना। दस हजार से अधिक छंद। कवित्त, छप्पय, दोहा, तोमर, त्रोटक, गाहा एवं आया का प्रयोग।</p>
<p><strong>सत्यार्थ प्रकाश</strong><br />आधुनिक हिंदी के मानक गद्य की सबसे पहली पुस्तक उदयपुर में 136 साल पहले 1882 में लिखी गई थी। दयानंद सरस्वती की रचना। उदयपुर में आज सत्यार्थ प्रकाश भवन भी है। </p>
<p><strong>दादूवाणी</strong><br />हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि दादूदयाल की रचना। इनके 52 पट्टशिष्य थे, जिनमें गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना हैं। दादूवाणी प्रसिद्ध ग्रंथ है। </p>
<p><strong>सुंदरदास</strong><br />जन्म 1596 ई. में दौसा में। छोटी बड़ी कुल 42 रचनाएं। ज्ञानसमुद्र, सुंदर विलास, सांगयोग प्रदीपिका, पंचेन्द्रिय-चरित्र, सुख समाधि, अद्भुत उपदेश, श्स्वप्नप्रबोध, वेद विचार, उक्त-अनूप, पंच प्रभाव एवं ज्ञानझूलना  प्रमुख हैं। सुंदरवाणी हिन्दी की निधि है। </p>
<p><strong>रज्जब वाणी</strong><br />रज्जब वाणी प्रसिद्ध ग्रंथ है। इनकी भाषा में फारसी और अरबी का प्रभाव तो है ही, राजस्थानी भाषा का अनोखा अंदाज भी है। इन्होंने निर्गुण दर्शन को इस्लामी दर्शन के साथ नए रूप में प्रस्तुत किया और एक नया दर्शन सृजित हुआ। </p>
<p><strong>हल्दीघाटी</strong><br />हिंदी का प्रसिद्ध खंड काव्य हल्दीघाटी महाराणा प्रताप और अकबर की सेवा के सेनापति मानसिंह के युद्ध को लेकर रचा गया है। इसकी रचना श्याम नारायण पांडे ने की और लंबे समय तक यह हिंदी साहित्य में पढ़ाया जाता रहा है।</p>
<p><strong>मीरा की वाणी</strong><br />1498 में पाली के कुड़की में जन्म। मीरा की कुछ रचनाएं जो आगे चलकर मध्यकालीन भक्ति साहित्य शामिल हुई उनमें राग सोरठा, नरसीजी रो मायारो, मीरा की मल्हार, मीरा पदावली, राग गोविंद, गीत गोविंद, गोविंद टीका प्रमुख हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/hindi-garden-blooming-with-letters-growing-in-the-soil-of/article-57074</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/hindi-garden-blooming-with-letters-growing-in-the-soil-of/article-57074</guid>
                <pubDate>Thu, 14 Sep 2023 12:29:04 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-09/hindi-diwas.png"                         length="444138"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        