<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://dainiknavajyoti.com/space-technology/tag-39757" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Dainik Navajyoti Rising Rajasthan RSS Feed Generator</generator>
                <title>space technology - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
                <link>https://dainiknavajyoti.com/tag/39757/rss</link>
                <description>space technology RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>SSLV के पहले चरण के बेहतर संस्करण का सफल परीक्षण,  600 से अधिक अलग-अलग मानकों की जांच  : ISRO</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा में छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) के पहले चरण (एसएस1) के उन्नत संस्करण का सफल जमीनी परीक्षण पूरा कर लिया है। इस सुधार से रॉकेट की क्षमता में लगभग 100 किलोग्राम अतिरिक्त पेलोड ले जाने की बढ़ोतरी होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/isro-successfully-tests-improved-version-of-first-stage-of-sslv/article-162814"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/isro2.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने वाले रॉकेट एसएसएलवी के पहले चरण के बेहतर संस्करण का जमीनी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया है। इसरो के अनुसार, यह परीक्षण 11 अगस्त को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में किया गया। परीक्षण के दौरान रॉकेट के पहले चरण में इस्तेमाल होने वाली ठोस मोटर को जमीन पर चलाकर उसके प्रदर्शन की जांच की गयी।</p>
<p>एसएसएलवी के पहले चरण एसएस1 में कई सुधार किए गए हैं। इनमें मोटर के दो हिस्सों में ईंधन के जलने की गति बढ़ाना, गर्मी से बचाने वाली सुरक्षा प्रणाली में सुधार और नोजल की निर्माण प्रक्रिया को आसान बनाना शामिल है। इसके साथ ही मोटर का वजन भी कम किया गया है। इसरो ने बताया कि परीक्षण के दौरान 600 से अधिक अलग-अलग मानकों की जांच की गयी। इनमें मोटर के शुरू होने, ईंधन के जलने, उसकी मजबूती, तापमान, कंपन और आवाज से जुड़े पहलू शामिल थे।</p>
<p>परीक्षण से मिले आंकड़ों के अनुसार मोटर का प्रदर्शन इसरो के अनुमान के काफी करीब रहा। इस परीक्षण के सफल होने के साथ एसएसएलवी के पहले चरण में किए गए सुधारों को मंजूरी मिल गयी है। इसरो के मुताबिक, बेहतर एसएस1 को एसएसएलवी में शामिल किए जाने के बाद यह रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा में करीब 100 किलोग्राम अधिक वजन के उपग्रह ले जा सकेगा। एसएसएलवी को इसरो ने छोटे उपग्रहों को कम समय में और जरूरत के मुताबिक अंतरिक्ष में भेजने के लिए विकसित किया है। यह रॉकेट दो सफल विकासात्मक उड़ानें पूरी कर चुका है।</p>
<p>इसरो ने एसएसएलवी की तकनीक भारतीय कंपनियों को देने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इसके तहत भविष्य में एसएसएलवी का बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाएगा और छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की सेवाएं उपलब्ध करायी जाएंगी। इसरो इस वर्ष के अंत में तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम स्थित देश के दूसरे और नये अंतरिक्ष केंद्र से पहला एसएसएलवी मिशन प्रक्षेपित करने की योजना बना रहा है। यह अंतरिक्ष केंद्र मुख्य रूप से एसएसएलवी मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/bharat/isro-successfully-tests-improved-version-of-first-stage-of-sslv/article-162814</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/bharat/isro-successfully-tests-improved-version-of-first-stage-of-sslv/article-162814</guid>
                <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:20:14 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-08/isro2.png"                         length="29708"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>53 साल बाद चांद पर इंसान भेजने की तैयारी: नासा के चंद्रमा मिशन आर्टेमिस-II के लिए उल्टी गिनती शुरू, जानें क्या है इसके पीछे की वजह?</title>
                                    <description><![CDATA[नासा ने ऐतिहासिक आर्टेमिस-II मिशन के लिए उल्टी गिनती शुरू कर दी है। चार अंतरिक्ष यात्री 1 अप्रैल को चंद्रमा की 10 दिवसीय यात्रा पर रवाना होंगे। कैनेडी स्पेस सेंटर पर रॉकेट में ईंधन भरने और प्रणालियों की जांच का काम जारी है। यह मिशन भविष्य के मानव चंद्रमा अभियानों के लिए ओरियन अंतरिक्ष यान की जीवन रक्षक प्रणालियों का परीक्षण करेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/preparation-to-send-humans-to-the-moon-after-53-years/article-148610"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/nasa.png" alt=""></a><br /><p>वॉशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने बुधवार को भेजे जाने वाले अपने चंद्रमा मिशन आर्टेमिस-II के लिए मंगलवार से उल्टी गिनती शुरू कर दी है। नासा ने आज एक अपडेट में कहा कि परीक्षण उड़ान के लिए उल्टी गिनती फ्लोरिडा में एजेंसी के कैनेडी स्पेस सेंटर में चल रही है, जहाँ चार अंतरिक्ष यात्री अपने कंसोल पर पहुंच रहे हैं। आर्टेमिस II आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत नासा का पहला चालक दल वाला मिशन है, जिसे इसे फ्लोरिडा में एजेंसी के कैनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च किया जाएगा। इसे एक अप्रैल को शाम 6:24 बजे (भारतीय समयानुसार 2 अप्रैल सुबह 3.54 बजे) लॉन्च किया जाना है।</p>
<p>इसमें नासा के तीन और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी के एक अंतरिक्ष यात्री को चंद्रमा के चारों की यात्रा और वापसी की लगभग 10 दिनों की यात्रा के लिए भेजा जा रहा है। इस अभियान में एजेंसी पहली बार मानव यात्रियों को ले जाने के लिए ओरियन अंतरिक्ष यान की जीवन रक्षक प्रणालियों का भी परीक्षण करेगी, जिससे भविष्य के चालक दल वाले आर्टेमिस मिशनों के लिए आधार तैयार हो सकेगा। उल्टी गिनती आधिकारिक तौर पर शुरू होने के साथ, इंजीनियर 'फ्लाइट हार्डवेयर' को पावर दे रहे हैं, संचार लिंक की जाँच कर रहे हैं और रॉकेट के क्रायोजेनिक सिस्टम को ईंधन भरने के लिए तैयार कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में सैकड़ों हजारों गैलन सुपर-कूल्ड लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन भरा जाना है।</p>
<p>आर्टेमिस-II चालक दल में नासा के अंतरिक्ष यात्री रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर और क्रिस्टीना कोच, तथा सीएसए (कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी) के अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन शामिल हैं। यात्रा से पहले इन यात्रियों के स्वास्थ्य जांच की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गयी है। लॉन्च के दिन के मौसम का पूर्वानुमान 80 प्रतिशत तक अनुकूल बने रहने की संभावना दिखा रहा है, हालांकि बादल और क्षेत्र में तेज हवाओं के बने रहने की संभावना है। टीम मौसम पर भी निरंतर नजर बनाएं हुए है। प्रसारण कवरेज 1 अप्रैल को सुबह 7:45 बजे (भारतीय समय शाम 5.15 बजे) नासा के यूट्यूब चैनल पर टैंक भरने के संचालन के लाइव दृश्यों और ऑडियो कमेंट्री के साथ शुरू होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/world/preparation-to-send-humans-to-the-moon-after-53-years/article-148610</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/world/preparation-to-send-humans-to-the-moon-after-53-years/article-148610</guid>
                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:03:08 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2026-03/nasa.png"                         length="608311"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी की ओर अग्रसर भारत</title>
                                    <description><![CDATA[चन्द्रयान-1 ही था जिसने 2008 में चन्द्रमा की सतह पर पहली बार पानी की उपस्थिति के साक्ष्य पूरी दुनिया को प्रस्तुत किए थे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/india-moving-towards-space-technology/article-57511"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/space.png" alt=""></a><br /><p>आज हम बात करेंगे एक ऐसे विषय पर जिस पर दुनिया के विभिन्न देशों के बीच एक होड़ लगी है, और वो हैं चांद को छू लेने, उसको अपना बना लेने की, इसके लिए दुनिया के शीर्ष देश स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए तथा स्पेस टेक्नोलॉजी में बादशाहत हासिल करने के लिए अपने चन्द्र मिशन भेज रहे हैं जिनका उद्देश्य अनुसंधान का कम और स्वयं की प्रतिष्ठा का ज्यादा लग रहा है। इसी क्रम में रूस, जापान, इजराइल जैसे देशों के चन्द्र मिशन चांद को छूने की जल्दबाजी में सॉफ्ट लैंडिंग के बजाए हार्ड लैंडिंग ही कर रहे हैं। गौरतलब है कि हाल ही में रूस का चन्द्र मिशन चन्द्रमा की सतह पर क्रैश कर गया था, इसलिए कहा भी जाता है कि जल्दबाजी व राजनीतिक  दबाव  में लिए गए निर्णय सदैव घातक एवं नुकसानदायी होते हैं, वैसे रूस अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में कदम रखने वाला प्रथम राष्ट्र था, जिसने 1957 में स्पूतनिक नामक उपग्रह को सर्वप्रथम अंतरिक्ष में भेजा था। अब ऐसा लगता है कि दुनिया के देशों की हाल ही में चन्द्रमा को लेकर कुछ ज्यादा ही रूचि दिख रही है। इन सबको देखते हुए हमें कुछ-कुछ शीत युद्ध की याद आने लगी है,जब स्वयं को बेहतर सिद्ध करने के लिए सोवियत संघ एवं यूएस के मध्य स्पेस वार शुरू हुई थी, जो कि एक अंधी स्पेस रेस थी और उस समय नाशा का बजट यूएस के कुल बजट का 5 प्रतिशत तक था। लेकिन समय के साथ अमेरिका का चन्द्र मिशन ‘अपोलो’ तथा रूस के ‘लुना’ मिशन में लोगों की रूचि कम होने लगी, क्योंकि यूएस सन 1969 ई. में ही अपोलो-11 के द्वारा नील आर्म स्ट्रांग को चन्द्रमा की सतह पर उतारकर एक कीर्तिमान स्थापित कर चुका था। अत: यूएस इस स्पेस रेस का एक अकेला और एक मात्र खिलाड़ी होने एवं प्रतिस्पर्धा में किसी अन्य राष्ट्र के न होने के कारण यह स्पेसवार खत्म होने लगी। लेकिन अब पुन: एक लम्बे समय के अन्तराल पश्चात् चन्द्रमा को लेकर एक ऐसी ही जंग छिड़ी हुई है अब इस जंग में अमेरिका, चीन, रूस, जापान सहित कई देश सम्मिलित हो चुके हैं।<br /><br />इन सब के बीच एक ऐसा देश जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को अपना आदर्श मानता है, प्राणी मात्र के प्रति कल्याण की भावना रखता है, विश्व कल्याण जिनका मूल मंत्र है। दबे पांवों से धीरे-धीरे लेकिन, नियोजित तरीके से अन्तरिक्ष प्रौद्यौगिकी में अपने कदम आगे बढ़ा रहा है जिनकी किसी से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं हैं । जिनका मुकाबला सदैव स्वयं से रहा है और जो स्वयं की असफलताओं को सफलता की सीढ़ी बनाता है, जिनके मिशन का उद्देश्य केवल और केवल अन्तरिक्ष प्रौद्यौगिकी का उपयोग, मानव मात्र के प्रति उपयोगी ही रहता है। दोस्तों हम बात कर रहे हैं हमारे भारत वर्ष की और उनकी अन्तरिक्ष ऐजेन्सी ‘इसरो’ जो अन्तरिक्ष के क्षेत्र में लगातार नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है।<br />आज भले ही हमारे पास यूएस रूस जैसे शक्तिशाली रॉकेट नहीं है जो सीधे ही अन्तरग्रहीय मिशन के लिए स्पेस क्राफ्ट को उनकी कक्षा में पहुंचा सके या चन्द्रयान-3 जैसे मॉडल को सीधे ही ‘लूनर ट्रान्सफर ट्रेजेक्टरी’ में डाल सके, फिर भी इसरो लगातार 2008 से अन्तरग्रहीय मिशन (चन्द्रयान, मंगलयान) को संचालित कर रहा है और वो भी बेहतरीन परिणाम के साथ। <br /><br />चन्द्रयान-1 ही था जिसने 2008 में चन्द्रमा की सतह पर पहली बार पानी की उपस्थिति के साक्ष्य पूरी दुनिया को प्रस्तुत किए थे, वह इसरो का मंगलयान-1 ही था जो सितम्बर 2014 को अपने प्रथम प्रयास में ही मंगल की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था और प्रथम प्रयास में ही यह कारनामा करने वाला भारत प्रथम राष्टÑ बना था, लेकिन स्मरण रहे ये सभी ‘डीप स्पेस मिशन’ इसरो के द्वारा कम लागत और कम ऊर्जा के साथ अपेक्षाकृत कम शक्तिशाली रॉकेट के द्वारा ‘स्लींग सॉट टेक्नोलॉजी’ के द्वारा सम्पन्न करवाए जाते हैं, जिसमें उपग्रह या स्पेस क्राफ्ट को पृथ्वी की कक्षा में गुरूत्वाकर्षण शक्ति का प्रयोग करते हुए लगातार घुमाया जाता है, साथ ही, प्रत्येक चक्र में एक निश्चित बिन्दु पर, निश्चित समय के लिए स्पेस क्राफ्ट में लगे इंजन को थ्रस्ट करके उपग्रह या डी-बुस्टीग के द्वारा स्पेस क्राफ्ट की गति को बढ़ाया जाता है। ताकि स्पेस क्राफ्ट अपनी कक्षा को बढ़ता रहे।  <br /><br />यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि उपग्रह या स्पेस क्राफ्ट पृथ्वी के पलायन वेग (11.2 किमी/ प्रति सैकेंड ) की गति को पार नहीं कर लेता और जैसे ही उपग्रह की गति पलायन वेग ज्यादा हो जाती है तब उसे पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र के बाहर फेंक दिया जाता है तथा स्पेस क्राफ्ट जिस ग्रह, उपग्रह के लिए बनाया जाता है उसके ‘हाईवे’ पर डाल दिया जाता है जिससे वह स्पेस क्राफ्ट उस पथ पर गति करता हुआ उस ग्रह या उपग्रह के समीप चला जाता हैं। तत्पश्चात् विपरीत दिशा में इंजन को थ्रस्ट करके डी-बूस्टींग के द्वारा स्पेस क्राफ्ट की गति को कम करके संम्बन्धित ग्रह/उपग्रह के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र के अधीन उसकी कक्षा में स्थापित कर दिया जाता है और यदि वह मिशन सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का हो जैसा चन्द्रयान-3 में था तब उस परिस्थिति में धीरे-धीरे उस स्पेस क्राफ्ट (पैलॉड) की डी-बु्रस्टींग (गति कम करके ) तथा डी-ऑर्बिटींग (कक्षा को छोटा करके ) करते हुए निर्धारित सतह पर उतारा जाता है। <br /><br />-सोहनराम<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/india-moving-towards-space-technology/article-57511</link>
                <guid>https://dainiknavajyoti.com/opinion/india-moving-towards-space-technology/article-57511</guid>
                <pubDate>Tue, 19 Sep 2023 15:29:33 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://dainiknavajyoti.com/media/2023-09/space.png"                         length="316279"                         type="image/png"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        