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                <title>Indo-Pacific - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>नौसेना के बेड़े में शामिल हुआ तारागिरी युद्धपोत : राजनाथ सिंह ने कहा-मजबूत और सक्षम नौसेना समय की आवश्यकता, ऊर्जा सुरक्षा होगी मजबूत</title>
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                        <![CDATA[रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विशाखापत्तनम में स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट INS तारागिरी को नौसेना को समर्पित किया। ब्रह्मोस मिसाइल और उन्नत रडार से लैस यह युद्धपोत 75% स्वदेशी सामग्री से बना है। राजनाथ सिंह ने इसे आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बताते हुए समुद्री मार्गों और डिजिटल केबलों की सुरक्षा के लिए नौसेना को अनिवार्य बताया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/taragiri-warship-joins-naval-fleet-rajnath-singh-said-strong/article-149027"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/rajnatha.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मजबूत और सक्षम नौसेना को समय की जरूरत बताते हुए कहा है कि भारतीय नौसेना महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों, 'चोक पॉइंट्स' और राष्ट्रीय हितों से से जुड़े डिजिटल ढांचों की सुरक्षा कर रही है जिससे भारत जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में पहचान बना रहा है। प्रोजेक्ट 17 ए श्रेणी के चौथे अत्याधुनिक स्वदेशी युद्धपोत आईएनएस तारागिरी को शुक्रवार को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में श्री सिंह की उपस्थिति में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। आधुनिक नौसैनिक जहाज निर्माण का उत्कृष्ट उदाहरण यह नवीनतम स्टील्थ फ्रिगेट, लगभग 6,670 टन के वजन के साथ, युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया है और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के सहयोग से बहु-भूमिका अभियानों के लिए निर्मित किया गया है। यह उन्नत स्टील्थ तकनीक का उपयोग करता है, जिससे इसकी रडार पहचान क्षमता काफी कम हो जाती है और इसे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में घातक बढ़त मिलती है। पचहत्तर प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री और कम समय में निर्मित आईएनएस तारागिरी भारत की जहाज निर्माण क्षमता और मजबूत सार्वजनिक-निजी सहयोग का उदाहरण है।</p>
<p>रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में आईएनएस तारागिरी को केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता, आत्मनिर्भरता और सशक्त नौसैनिक शक्ति का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, " यह जहाज उच्च गति से संचालित हो सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है। इसमें ऐसे तंत्र लगे हैं जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं, अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर तुरंत जवाब दे सकते हैं। इसमें आधुनिक रडार, सोनार और ब्रह्मोस जैसी मिसाइल प्रणालियाँ तथा सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें लगी हैं, जो इसकी क्षमता को और बढ़ाती हैं। उच्च तीव्रता वाले युद्ध से लेकर समुद्री सुरक्षा, समुद्री डकैती रोधी अभियान, तटीय निगरानी और मानवीय मिशनों तक, यह हर भूमिका में पूरी तरह सक्षम है।"</p>
<p>रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत की समुद्री तटरेखा 11,000 किलोमीटर से अधिक है और जो तीन ओर से समुद्र से घिरा है, वह अपने विकास को समुद्र से अलग नहीं देख सकता। उन्होंने कहा कि देश का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है और ऊर्जा सुरक्षा भी समुद्र पर निर्भर है, इसलिए एक मजबूत और सक्षम नौसेना का निर्माण विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। समुद्री क्षेत्र के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्री सिंह ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में चौबीसों घंटे अपनी उपस्थिति बनाए रखती है। उन्होंने कहा, " "समुद्र के विशाल क्षेत्र में कई संवेदनशील बिंदु हैं, जहाँ हमारी नौसेना वस्तुओं के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए लगातार सक्रिय रहती है। जब भी तनाव बढ़ता है, भारतीय नौसेना व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। यह न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रही है, बल्कि दुनिया भर में अपने नागरिकों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार है। यही क्षमता भारत को एक जिम्मेदार और सशक्त समुद्री शक्ति बनाती है।"</p>
<p>रक्षा मंत्री ने कहा कि आधुनिक डिजिटल युग में विश्व का अधिकांश डेटा समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों से गुजरता है और इनमें किसी भी प्रकार की क्षति वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने समुद्री सुरक्षा को पारंपरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर व्यापक और भविष्य उन्मुख ढांचे में देखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, "हमें केवल अपनी तटरेखा की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों, संकरे मार्गों और डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी चाहिए, जो हमारे राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हैं। भारतीय नौसेना इन सभी प्रयासों में सक्रिय है। आईएनएस तारागिरी जैसे उन्नत जहाजों का निर्माण और तैनाती पूरे क्षेत्र में शांति और समृद्धि की गारंटी है।"</p>
<p>राजनाथ सिंह ने कहा कि जब भी कोई संकट आता है, चाहे वह निकासी अभियान हो या मानवीय सहायता, भारतीय नौसेना हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहती है और "आईएनएस तारागिरी हमारी नौसेना की शक्ति, मूल्यों और प्रतिबद्धता को और मजबूत करेगा।" सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कि भारतीय नौसेना को दुनिया की सबसे मजबूत नौसेनाओं में शामिल किया जाएगा, रक्षा मंत्री ने कहा , "आज हम केवल अपनी जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भी अपनी जगह बना रहे हैं। डिजाइन से लेकर अंतिम तैनाती तक हर चरण में भारत की भागीदारी है। आईएनएस तारागिरी इसी दृष्टि का प्रतीक है।"</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 18:42:02 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गणतंत्र दिवस पर भारत को बधाई दी, मिलकर काम करने की जताई इच्छा</title>
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                        <![CDATA[अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत को गणतंत्र दिवस की बधाई दी। उन्होंने रक्षा, ऊर्जा और क्वाड सहयोग सहित अमेरिका-भारत साझेदारी मजबूत करने की इच्छा जताई।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/us-secretary-of-state-marco-rubio-congratulated-india-on-republic/article-140884"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(28).png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गणतंत्र दिवस पर भारत को बधाई दी है और कहा है कि वह आने वाले वर्ष में दोनों देशों के साझा उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने के प्रति आशान्वित हैं।</p>
<p>मार्को रुबियो ने सोमवार को अपने एक संदेश में कहा कि अमेरिका और भारत एक ऐतिहासिक बंधन साझा करते हैं और विविध क्षेत्रों में यह संबंध दोनों देशों तथा ङ्क्षहद-प्रशांत क्षेत्र के लिए वास्तविक परिणाम प्रदान करता है।</p>
<p>उन्होंने कहा, रक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और उभरती प्रौद्योगिकियों में हमारे सहयोग से लेकर क्वाड के माध्यम से बहुस्तरीय जुड़ाव तक, अमेरिका-भारत संबंध हमारे दोनों देशों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए वास्तविक परिणाम देते हैं। उन्होंने कहा कि वह आने वाले वर्ष में साझा उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हैं।</p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Jan 2026 14:43:06 +0530</pubDate>
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                <title>ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विकास, सुरक्षा और विवाद, रणनीतिक ताकत बनाम पर्यावरण की चिंता</title>
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                        <![CDATA[ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट भारत की समुद्री रणनीति को मजबूती देगा। यह व्यापार, सुरक्षा और हिंद-प्रशांत दृष्टि के लिए अहम है, हालांकि पर्यावरण व आदिवासी प्रभावों पर संतुलन जरूरी है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/great-nicobar-project-development-security-and-controversy-strategic-strength-versus/article-140841"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(23).png" alt=""></a><br /><p>जयपुर । ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को नीति आयोग ने 2021 में एक मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर योजना के रूप में आगे बढ़ाया। इसके तहत इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, आधुनिक टाउनशिप और गैस-सोलर आधारित पावर प्लांट विकसित किए जाने हैं। इस प्रोजेक्ट को अंडमान एंड निकोबार आइलैंड्स इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लागू कर रहा है। ऊपरी तौर पर यह एक आर्थिक विकास परियोजना दिखती है, लेकिन रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह एक डुअल यूज प्रोजेक्ट है-यानी नागरिक सुविधाओं के साथ-साथ इसका सैन्य उपयोग भी संभव है। शांति के समय यह प्रोजेक्ट व्यापार बढ़ाएगा और संकट के समय सैन्य बढ़त देगा। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए बेहद अहम है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है। भारत का करीब 60% समुद्री व्यापार और चीन का लगभग 80% ऊर्जा व व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। </p>
<p><strong>संतुलन की तलाश</strong></p>
<p>ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री रणनीति और हिंद-प्रशांत विजन का अहम हिस्सा है। यह देश की सुरक्षा, व्यापार और वैश्विक कूटनीति को मजबूती दे सकता है। लेकिन साथ ही, इतने नाजुक पर्यावरण और आदिवासी समाज की कीमत पर विकास करना दीर्घकाल में नुकसानदेह साबित हो सकता है। जरूरत है पारदर्शी निर्णय, वैज्ञानिक पर्यावरण प्रबंधन और स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलने की। तभी ग्रेट निकोबार सच में भारत की रणनीतिक ताकत भी बनेगा और प्राकृतिक धरोहर भी बची रहेगी।</p>
<p><strong>पर्यावरण को लेकर क्या गलत या बढ़ा-चढ़ाकर कहा जा रहा है?</strong></p>
<p>कुछ बातें जरूरत से ज्यादा सरलीकृत या गलत तरीके से पेश की जा रही हैं:<br />पूरा द्वीप खत्म हो जाएगा-असल में विकास द्वीप के सीमित हिस्से तक केंद्रित है, पूरा ग्रेट निकोबार नहीं।<br />कोई पर्यावरणीय अध्ययन नहीं हुआ-पर्यावरण प्रभाव आकलन किया गया है, हालांकि इसकी गुणवत्ता और पारदर्शिता पर सवाल जरूर हैं।<br />सिर्फ सैन्य प्रोजेक्ट है-यह पूरी तरह सैन्य नहीं, बल्कि नागरिक-सैन्य मिश्रित (डुअल यूज) परियोजना है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असली मुद्दा विकास बनाम पर्यावरण नहीं, बल्कि कैसे विकास किया जाए है।</p>
<p><strong>ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?</strong></p>
<p>ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट से भारत की ना सिर्फ सिंगापुर और कोलंबो पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी, बल्कि मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य में हमारी सर्विलांस काफी ज्यादा मजबूत हो जाएगी। मलक्का, ये वो संकरा समुद्री रास्ता है, जिसे चीन सबसे ज्यादा डरता है। भारत अंडमान-निकोबार से युद्ध के समय चीन के सप्लाई चेन को ब्लॉक कर सकता है, जिससे चीन का करीब 80 प्रतिशत कारोबार ही ठप पड़ जाएगा और इसीलिए चीन इस प्रोजेक्ट से खौफजदा है। अंडमान और निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से मलक्का स्ट्रेट से मलक्का स्ट्रेट सिर्फ 500-600 किलोमीटर दूर है। जबकि अंडमान-निकोबार का सबसे दक्षिणी छोर इंदिरा पॉइंट, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है, मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार के बेहद करीब है। यहां से इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप की दूरी सिर्फ 140-160 किलोमीटर है। जबकि, ग्रेट निकोबार से मलक्का स्ट्रेट की मुख्य शिपिंग लेन सिर्फ 75-80 किलोमीटर दूर है। </p>
<p><strong>कितना एरिया प्रभावित होगा?</strong></p>
<p>ग्रेट निकोबार द्वीप का कुल क्षेत्रफल: लगभग 1,045 वर्ग किलोमीटर<br />प्रोजेक्ट से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्र: करीब 130-160 वर्ग किलोमीटर<br />(इसमें पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप, पावर प्लांट और उससे जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है)<br />यानी कुल द्वीप का लगभग 12-15% हिस्सा<br />भारत के दूसरे इलाकों से तुलना करें तो यह चंडीगढ़ शहर के कुल क्षेत्रफल: 114 वर्ग किलोमीेटर से थोड़ा सा बड़ा है। <br />वहीं वहां से कटने वाले जंगल की बात करें तो वह अरावली के कई छोटे संरक्षित वन क्षेत्रों को मिलाकर जितना एरिया कवर होता है उतना ही जंगल कटेगा। अगर 150 वर्ग किलोमीटर में जंगल कटता है। आसपास दूसरे जंगल, आबादी, सड़कें, विकल्प मौजूद होते हैं, जो इकोसिस्टम को बनाए रखने में मदद करते हैं। </p>
<p><strong>पर्यावरण पर संभावित प्रभाव</strong></p>
<p>ग्रेट निकोबार द्वीप जैव विविधता के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। यहां घने उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मैंग्रोव, कोरल रीफ और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। प्रस्तावित विकास से कुछ गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव सामने आ सकते हैं।</p>
<p>वनों की कटाई: हजारों हेक्टेयर जंगल साफ होने से जैव विविधता को नुकसान।<br />वन्यजीवों पर असर: निकोबार मेगापोड जैसे स्थानिक (एंडेमिक) पक्षियों और समुद्री कछुओं के आवास खतरे में।<br />आदिवासी जीवन: शॉम्पेन और निकोबारी आदिवासी समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक जीवन पर असर।<br />भूकंपीय जोखिम: यह इलाका भूकंप और सुनामी के लिहाज से संवेदनशील है, जिससे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल उठते हैं।</p>
<p><strong>प्रोजेक्ट को रोकने के लिए क्या दलील दी जा रही?</strong></p>
<p>इस प्रोजेक्ट को रोकने के लिए द्वीपसमूह की इकोलॉजिकल कमजोरी और जीएनआई प्रोजेक्ट का पर्यावरण और स्थानीय आदिवासी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभाव को उठाया जाता है। इन्हें मुद्दा बनाकर मुकदमेबाजी हो सकती है, पर्यावरण विद हंगामा मचा सकते हैं, ऐसे संगठन अंतर्राष्ट्रीय जांच की मांग कर सकते हैं, ताकि बाहरी शक्तियों को इस क्षेत्र में दखल देने का रास्ता खुले और इस प्रोजेक्ट में लगने वाले फंड को रोकने के लिए कई तरकीबें आजमा सकते हैं। ताकि इस प्रोजेक्ट की रफ्तार को धीमा किया जा सके। चीन के नजरिए से देखें तो निकोबार में भारत की मजबूत हवाई और नौसैनिक क्षमता, मलक्का में उसके लिए खतरा है। यद्ध के समय भारत चीन की इस कमजोरी पर सीधा हमला कर सकता है। इसीलिए इस प्रोजेक्ट को लेकर चीन डरा हुआ है। </p>
<p>अंडमान और निकोबार का भूगोल बंगाल की खाड़ी के पड़ोस में भारत की समुद्री सीमाओं को मजबूत बनाता है। ये हमें कई देशों की समुद्री सीमा से जोड़ता है, जिनमें बांग्लादेश भी शामिल है। भारत का ये प्रोजेक्ट 10 अरब डॉलर से ज्यादा है और अमेरिका भी इस प्रोजेक्ट को भारतीय नौसेना की बड़ी क्षमता मानता है, इसीलिए अमेरिका के एक्टिविस्ट अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ खूब लिख रहे हैं। लेकिन भारत के लोगों को देश की सुरक्षा के लिए इस सैन्य प्रोजेक्ट के साथ खड़ा रहना चाहिए और ऐसे तत्वों का विरोध करना चाहिए, जो गलतफहमी फैला रहे हैं। हो सकता है, पर्यावरण को लेकर कुछ खतरें हों, लेकिन एक बात हमेशा याद रखने की जरूरत है कि देश हित से बढ़कर कुछ नहीं है और दुनिया का कौन सा देश अपने हित के लिए पर्यावरण की परवाह कर रहा है?</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Jan 2026 09:48:03 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>QUARD ही सुनिश्चित कर सकता है कि हिंद-प्रशांत स्वतंत्र, सुरक्षित बना रहे: जयशंकर</title>
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                        <![CDATA[बैठक में अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, जापान के विदेश मंत्री योको कामिकावा और ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग मौजूद थे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/only-quad-can-ensure-that-the-indo-pacific-remains-independent-and/article-86202"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/4111u1rer-(10)1.png" alt=""></a><br /><p>टोक्यो। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के विदेश मंत्रियों की बैठक में कहा कि केवल क्वाड देशों के बीच सहयोग ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र स्वतंत्र, खुला, सुरक्षित और समृद्ध बना रहे। </p>
<p>जयशंकर ने जापान की राजधानी टोक्यो में आयोजित क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक में अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि विश्व की भलाई के लिए क्वाड की प्रतिबद्धता हिंद-प्रशांत क्षेत्र से कहीं आगे तक है। उन्होंने कहा कि  चारों देशों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) की बैठक 10 महीने पहले न्यूयॉर्क में हुई थी, लेकिन बीच की अवधि के दौरान इन देशों के मंत्री द्विपक्षीय रूप से या अन्य कार्यक्रमों से इतर एक-दूसरे से मिलते रहे हैं और उनके शेरपा भी लगातार बातचीत करते रहे हैं। ये आसान समय नहीं है। वैश्विक आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करना और साथ ही जोखिम को कम करना एक बड़ी चुनौती है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन पर विशेष ध्यान केंद्रित है। यह ठीक उसी तरह से हैं, जैसे हम विश्वसनीय और पारदर्शी डिजिटल साझेदारी के लिए जोर देते हैं। प्रौद्योगिकी के विकास ने भी असाधारण अनुपात हासिल कर लिया है, जिस तरह से हम रहते हैं, सोचते हैं और कार्य करते हैं, उसमें बहुत संभावनाएं हैं। एक तरह से हम पुन: वैश्वीकरण के बीच में हैं। केवल हमारे सामूहिक प्रयास ही अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को मानव निर्मित या प्राकृतिक व्यवधानों से बचा सकते हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि हमारे पास इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ भी हैं। राजनीतिक लोकतंत्र, बहुलवादी समाज और बाजार अर्थव्यवस्थाओं के रूप में नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने का महत्वपूर्ण प्रश्न है। केवल हमारा सहयोग ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र स्वतंत्र, खुला, स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध बना रहे। हम लोगों ने वैश्विक भलाई करने की जिस प्रतिबद्धता को अपनाया है , उसका इस क्षेत्र से कहीं आगे तक प्रभाव है। यह आवश्यक है कि चारों देशों के बीच राजनीतिक समझ मजबूत हो, आर्थिक साझेदारी बढ़े, प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़े तथा लोगों के बीच सहजता बढ़े।</p>
<p>जयशंकर ने कहा कि हमारी बैठक से यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि क्वाड यहां रहने, काम करने और आगे बढऩे के लिए है।</p>
<p>बैठक में अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, जापान के विदेश मंत्री योको कामिकावा और ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग मौजूद थे।</p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jul 2024 15:18:36 +0530</pubDate>
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                <title>सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिन्द प्रशांत क्षेत्र अमेरिका की प्राथमिकता : अमेरिकी सैन्य प्रमुख</title>
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                        <![CDATA[हिन्द प्रशांत देशों के सेना प्रमुखों के 13वें सम्मेलन का आयोजन भारत और अमेरिका यहां संयुक्त रूप से कर रहे हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/strategically-important-indo-pacific-region-is-americas-priority-us-military-chief/article-58125"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/randy-george.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। अमेरिका ने हिन्द प्रशांत को सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए कहा है कि यहां शांति , स्थिरता और नियम आधारित व्यवस्था उसकी प्राथमिकता है।</p>
<p>अमेरिकी सेना प्रमुख जनरल रेंडी जॉर्ज ने मंगलवार को यहां हिन्द प्रशांत क्षेत्र के देशों के सेना प्रमुखों के 13वें द्विवर्षिक सम्मेलन से इतर संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में सवालों के जवाब में यह बात कही।</p>
<p>भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने कहा कि इस सम्मेलन को सैन्य गठजोड़ बनाने की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि यह किसी एक देश या कुछ देशों के समूह के खिलाफ नहीं है। हिन्द प्रशांत देशों के सेना प्रमुखों के 13वें सम्मेलन का आयोजन भारत और अमेरिका यहां संयुक्त रूप से कर रहे हैं।</p>
<p>जनरल जॉर्ज ने कहा कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र अमेरिका की प्राथमिकता है, इसीलिए वह इस क्षेत्र के मित्र देशों के साथ साझेदारी बढ़कर सहयोग को पुख्ता करने के प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना इस क्षेत्र में विभिन्न सहयोगी देशों के साथ विभिन्न तरह के सैन्य अभ्यासों में हिस्सा ले रही है । अभ्यास का उद्देश्य सेना के कौशल तथा क्षमता को बढ़ाना और सर्वोत्तम अनुभव को साझा करना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस क्षेत्र में नए साझीदार बन रहा है।</p>
<p>जनरल पांडे ने एक सवाल के जवाब में स्पष्ट किया कि इस तरह के सम्मेलन का आयोजन किसी तरह का सैन्य गठजोड़ बनाने के लिए नहीं है और ना ही यह किसी एक देश या कुछ देशों के समूह के खिलाफ है। इस सम्मेलन का उद्देश्य परस्पर विश्वास के आधार पर साझेदारी को मजबूत करना तथा एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझते हुए साझेदारी तथा मित्रता को पुख्ता करना है ।</p>
<p>उन्होंने कहा कि बदलती परिस्थितियों में हिन्द प्रशांत क्षेत्र की भूमिका निरंतर महत्वपूर्ण हो रही है तथा हिन्द प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और शांति सभी की साझा जिम्मेदारी है।</p>
<p>बाद में उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा कि सम्मेलन में 30 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं जिनमें  20 देशों के सेना प्रमुख शामिल हैं जिससे सम्मेलन की प्रासंगिकता का पता चलता है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र से जुड़े देशों की सुरक्षा और समृद्धि भी परस्पर जुड़ी हुई है। </p>
<p>जनरल पांडे ने कहा कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में बड़ा देश होने के कारण भारत की भूमिका और बढ़ जाती है और वह किसी भी समस्या या चुनौती का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से किए जाने के पक्ष में रहा है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में चुनौतियां हैं लेकिन सभी को मिलकर यहां शांति तथा स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने होंगे ।</p>
<p> जनरल जॉर्ज ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य पहले से चले आ रही साझेदारी और मित्रता को मजबूत करने के साथ-साथ नए सहयोगी बनना है। इस क्षेत्र की सामरिक स्थिति को देखते हुए यहां नई-नई चुनौती पैदा हो रही है लेकिन हम मिलकर इनका सामना कर रहे हैं । इसके लिए कई स्तर पर कार्य किया जा रहा है जिसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास सबसे महत्वपूर्ण है। इस साझेदारी का उद्देश्य हिन्द प्रशांत क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता और कानून आधारित व्यवस्था कायम रखना है ।</p>
<p> भारत में अमेरिका के राजदूत एरिक गार्सेटी ने भी सम्मेलन से इतर संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि भारत और अमेरिका इस सम्मेलन की सह मेजबानी कर रहे हैं इससे दोनों देशों के बीच संबंधों की परिपक्वता का पता चलता है। उन्होंने कहा कि दोनों देश विभिन्न चुनौतियों का मिलकर सामना करने के लिए कदम उठा रहे हैं जिससे कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।</p>
<p> भारत और कनाडा के बीच उत्पन्न स्थिति के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अमेरिका शुरू में ही अपना रुख स्पष्ट कर चुका है कि ये दोनों देश उसके लिए महत्वपूर्ण है और वह दोनों ही देश को साथ लेकर चलता है। उन्होंने कहा कि अभी वह इस बारे में और ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं है । </p>]]>
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                <pubDate>Tue, 26 Sep 2023 21:02:30 +0530</pubDate>
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