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                <title>Janghils - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>उदपुरिया को आबाद कर रहा तीन रंगों वाला पक्षी</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष तीन गुना बड़ी आबादी । 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-three-coloured-bird-is-inhabiting-udpuria/article-90870"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/630400-size-(11)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा से 30 किमी दूर उदपुरिया तालाब इन दिनों तीन रंगों के परिंदों से चहकने लगा है। हल्के सफेद पंखों पर गुलाबी व नारंगी रंग उसे और भी आकर्षक बना देता है, जिसे देख ऐसा लगता है कि मानो किसी पेंटर ने ब्रश से बड़े करीने से रंग भर दिए हों। यहां बात हो रही है, पेंटेर्ड स्टॉर्क बर्ड्स की। जन्म स्थली कहलाने वाली उदपुरिया में पेंटेर्ड स्टॉर्क बर्ड्स की संख्या में पिछले साल की तुलना में इस बार तीन गुना इजाफा हुआ है। यहां पेड़ों पर इस बार करीब 60 घोंसलें बने हैं। प्रत्येक घोंसले में यह पक्षी जोड़े में रहता है।</p>
<p><strong>बर्ड वॉचर्स के लिए बना व्यू प्वाइंट </strong><br />उदपुरिया तालाब इन दिनों बर्ड वॉचर के लिए व्यू प्वाइंट बना हुआ है। यहां इनकी पंसदीदा विलायती बबूल पर पेंटर्न स्टॉर्क ने 5 दर्जन से अधिक घोंसले बना लिए हैं। ये पक्षी जोड़े में होने से इनकी संख्या 120 हैं। जांघिलों की चेहचहाट पक्षी प्रेमियों को आकर्षित कर रहे हैं। </p>
<p><strong>तीन गुना बड़ी संख्या </strong><br />जूलॉजी के सहायक आचार्य डॉ. राजेन्द्र सिंह ने बताया कि पेंटर्न स्टॉर्क बर्ड्स को हाड़ौती में जांघिल के नाम से जाना जाता है। इस बार यहां 5 दर्जन घोंसले बने हैं। जबकि, गत वर्ष 2 दर्जन के लगभग थे। गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष संख्या में तीन गुना वृद्धि हुई है। प्रत्येक घोंसले में नर-मादा दोनों पक्षी एक साथ रहते हैं। ऐसे में इनकी संख्या 120 हो गई है। जांघिलों ने कई घोंसलों में अंडे दिए हुए है, जो कौओं से उनकी सुरक्षा करते नजर आ रहे हैं। </p>
<p><strong>दुर्लभ प्रजाति में आते हैं पेंटेड स्टॉर्क</strong><br />विशेषज्ञों ने बताया कि पेंटेड स्टॉर्क स्टॉर्क दुर्लभ प्रजाति है। इसे नियर थ्रेटेंड संरक्षण की स्थिति में लिया गया। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रजातियों को खतरा है, लेकिन थ्रेटेंड टैक्सा में आमतौर पर कमजोर प्रजातियां शामिल होती हैं,  यह प्रजाति कमजोर स्थिति में मानी जाती है।</p>
<p><strong>भोजन-पानी की दिक्कत</strong><br />पक्षी प्रेमी जुनैद शेख कहते हैं, वर्ष 1995 में कैलवा देव पक्षी विहार से जांघिल पक्षियों ने कोटा के उदपुरिया को अपना घर बनाया था। उस समय यहां का भौगोलिक वातावरण पक्षियों के अनुकूल था। तालाब का स्वच्छ पानी, बड़ी संख्या में घने पेड़ होने से यहां इन पक्षियों की बस्ती आबाद हुई। वर्ष 2015 तक उदपुरिया पक्षी विहार के रूप में आकार लेने लगा और पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन, वन व पर्यटन विभाग की अनदेखी से यहां मानवीय दखल बढ़ने लगा। अतिक्रमण, खुले में शौच, पेड़ों की अवैध कटाई के साथ संदिग्ध गतिविधियां बढ़ने लगी। जिससे पक्षियों की आजादी में खलल होने लगा और भोजन-पानी की कमी समेत अन्य कारणों से ये पक्षी अपना घर बदलने पर मजबूर हो गए।  </p>
<p><strong>अपने खर्चें पर कर रहे पक्षियों की निगरानी</strong><br />हाड़ौती नेचुरल सोसाइटी के सदस्य श्याम जांगिड़ स्वयं के खर्चें पर उदपुरिया में जांघिल पक्षियों व घोंसलों की देखभाल कर रहे हैं। साथ ही यहां आने वाले पर्यटकों को पाक्षियों की विशेषताएं, इतिहास से रूबरू करवाते हैं। उन्होंने कहा, 30 वर्ष पूर्व जांघिल पहली बार यहां जुलाई में ही आये थे। कई सालों तक इसी माह में आते रहे फिर अगस्त के दूसरे सप्ताह में आना शुरू किया। इनके आने से गांव में पर्यटन बढ़ता है और 5 माह तक चहल पहल बनी रहती है।</p>
<p><strong>पहले 200 पेड़ आज एक भी नहीं</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, उदपुरिया तालाब पेंटर्ड स्टॉर्क बर्ड्स की जन्मस्थली है। लेकिन, उनका प्राकृतिक आवास नष्ट होता जा रहा है। तालाब की पाल अतिक्रमण की भेंट चढ़ा हुआ है। जगह-जगह से पाल क्षतिग्रस्त हो रही है। पहले तालाब के चारो ओर करीब 200 पेड़ थे, जो धीरे-धीरे सुखते व गिरते चले गए। वर्तमान में तालाब के बीच एक भी पेड़ नही है। ऐसे में उन्हें सड़क किनारे पेड़ों पर घौंसला बनाना पड़ रहा है। यहां प्रतिवर्ष 20 पौधे लगाए जाना चाहिए,ताकि उन्हें घोंसला बनाने के लिए आशियाना मिल सके।</p>
<p><strong>जामुनिया आइलैंड भी</strong><br />जैदी कहते हैं, वन व पर्यटन विभाग ध्यान दें तो उदपुरिया तालाब कैवलादेव पक्षी विहार बन सकता है। तालाब से 6 किमी दूर चंबल के बीचोंबीच बने जामूनिया आईलैंड है वहीं, तीन किमी की दूरी पर निमोदा चंबल के धोरे हैं, जिसका प्राकृतिक सौंदर्य से उदपुरिया बर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित हो सकता है। लेकिन, विभागीय लापरवाही के कारण बरसों से इसका विकास नहीं हो पा रहा। </p>
<p><strong>अगले माह नन्हें मेहमानों से चहकेगा उदपुरिया</strong><br />उन्होंने बताया कि एक मादा जांघिल पक्षी 2 से 3 अंडे देती है। अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से बच्चों का अंडों से बाहर निकलना शुरू हो जाता है। ऐसे में करीब 200 नन्हें मेहमानों के जन्म लेने की संभावना है। इस तरह इनकी संख्या 300 से अधिक हो जाएगी।  </p>
<p><strong>घंटों एक ही मुद्रा में रहते हैं खड़े</strong><br />वन्यजीव प्रेमी कन्हैया मीणा बताते हैं, पेंटेड स्टॉर्क का वैज्ञानिक नाम माइकटेरिया ल्यूकोसिफाला है, जो भारत के अलावा श्रीलंका, चीन तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया के देशों में भी पाए जाते हैं। पेंटेड स्टॉर्क शांत स्वभाव और एक ही मुद्रा में घंटों तक खड़े रहने के लिए जाने जाते हैं।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Sep 2024 18:00:51 +0530</pubDate>
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                <title>उदपुरिया में उजड़ी जांघिल पक्षियों की बस्ती, दुर्दशा का शिकार हुआ तालाब</title>
                                    <description><![CDATA[लगातार घटती पेड़ों की संख्या से जांघिलों ने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो गए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/colony-of-wild-birds-destroyed-in-udpuriya--pond-becomes-victim-of-plight/article-58354"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/kota-news3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती में पेंटेर्ड स्टॉर्क बर्ड की जन्मस्थली कहलाने वाला उदपुरिया तालाब इन दिनों दुर्दशा का शिकार हो रहा है। पेड़ों की अवैध कटाई के कारण जांघिलों की बस्ती उजड़ गई। तालाब जलकुंभी से अटा पड़ा है तो पानी किनारे जगह जगह गंदगी के ढेर लगे हैं। कूड़े कचरे से उठती दुर्गंध से तालाब का मनोहारी वातारण दूषित हो गया। पूर्व में तालाब किनारे लगभग 50 पेड़ हुआ करते थे, लेकिन, स्थानीय पंचायत प्रशासन व पर्यटन विभाग की अनदेखी के चलते आज एक भी नहीं बचा। हालात यह हैं कि शाम ढलते ही तलाब किनारे नशेड़ियों की महफिल सजती है। यहां जगह-जगह शराब की खाली बोतलों का ढेर लगा हुआ है। यदि, पर्यटन विभाग ध्यान दे तो उदपुरिया तालाब हाड़ौती का कैलादेवी पक्षी विहार के रूप में उभर सकता है। </p>
<p><strong>2015 के बाद से नहीं बनाए घौंसले</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि पेंटर्न स्टोक बर्ड यानी जांघिल प्रवासी पक्षी हैं, इनका प्रवास अगस्त से फरवरी तक रहता है। पहली बार 1995 में जांघिलों ने उदपुरिया में दस्तक दी थी। वर्ष 2015 तक इन्होंने यहां लगातार बस्ती बसाई। इस दरमियानयहां 6 हजार के लगभग नन्हें मेहमान जन्मे थे। वहीं, कई सीजन में 250 से अधिक नीड़ बनाए और 600 बच्चों ने उदपुरिया में जन्म लिया था। लेकिन, 2015 के बाद से यहां मानवीय दखल व अतिक्रमण बढ़ने की वजह से इन्होंने यहां घौंसले नहीं बनाए और उदपुरिया छोड़ बारां जिले के सोरसन की तरफ रूख कर लिया। जबकि, वर्ष 2010 में इन्होंने उदपुरिया तालाब किनारे पेड़ों पर करीब 250 घौसलें बनाए थे। लेकिन, धीरे-धीरे पेड़ों की संख्या कम होती चली गई और घौंसलों की भी संख्या घटती चली गई। </p>
<p><strong>पर्यटन केंद्र बन सकता है उदपुरिया</strong><br />जैदी बताते हैं, प्रशासन व जिला पर्यटन विभाग ध्यान दे तो उदपुरिया तालाब कैलादेवी पक्षी विहार जैसा खूबसूरत पर्यटन केंद्र बन सकता है। उदपुरिया अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया। तालाब की पाल जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गई। लगातार घटती पेड़ों की संख्या से जांघिलों ने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो गए। </p>
<p>इसी का नतीजा है, कि वर्ष 2015 से जांघिलों ने उदपुरिया से मुंह मोड़ लिया और बारां जिले के अमलसरा व सोरसन क्षेत्र के तालाबों को बस्तियां बनाकर आबाद किया। वहीं, गोदल्याहेड़ी गांव के राजपुरा तालाब किनारे पेड़ों पर अपना आशियाना बनाया। इसके अलावा मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व क्षेत्र, रामगंजमंडी, उंडवा, चित्तौड़, जोधपुर समेत व अन्य जगहों पर भी इनकी मौजूदगी है।  </p>
<p><strong>पर्यटन विभाग को ध्यान देने की जरूरत</strong><br />स्थानीय निवासी पक्षी प्रेमी श्याम जांगिड़ कहते हैं, यहां पक्षियों का आना अच्छा संकेत है। लेकिन, पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन की ओर से तालाब के आसपास सुरक्षित जगहों पर पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए पौधरोपण करवाए जाना चाहिए। साथ ही इनकी पंसदीदा विलायती बबूल के पेड़ लगाए जाए ताकि, यहां पर्याप्त घोंसले बनाने के लिए इन्हें जगह मिल सके। वहीं, अतिक्रमण हटवाकर व जलकुंभी हटाकर तालाब की सफाई करवानी चाहिए।</p>
<p><strong>जांघिलों की विशेषताएं</strong><br />20 नीड़ बना लेते हैं एक पेड़ पर<br />20 से 25 बरस है औसत आयु<br />3 से 5 अंडे देते हैं एक बार में<br />2 वर्ष में बच्चे हो जाते हैं वयस्क<br />6 हजार बच्चे जन्मे 22 साल में<br />वर्तमान में  उदपुरिया में एक भी जाघिल नहीं है</p>
<p><strong>अपने खर्चे पर कर रहे पक्षियों की निगरानी</strong><br />हाड़ौती नेचुरल सोसाइटी के सदस्य श्याम जांगिड़ स्वयं के खर्चे पर उदपुरिया में जांघिल पक्षियों की देखभाल कर रहे हैं। साथ ही अवैध शिकार, संदिग्ध घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को पाक्षियों की विशेषताएं, इतिहास से रूबरू करवाते हैं।  इसी तरह राजपुरा तालाब में मौजूद पेटेंर्ड स्टॉर्क बर्ड की सुरक्षा में सुरेश नागर तैनात हैं। नागर अपने स्तर पर ही इन पक्षियों की निगरानी करते हैं।</p>
<p><strong>जलकुंभी से अटा और गंदगी से दबा सौंदर्य</strong><br />शहर से करीब 30 किमी दूर दीगोद तहसील के गांव उदपुरिया का तालाब वर्तमान में अतिभेंट चढ़ चुका है। तालाब की पाल पर जगह-जगह ग्रामीणों ने मवेशियों के बाड़े व कच्चे बना लिए हैं। वहीं, तालाब किनारे पेड़ों की भी अवैध कटाई की जा रही है। तालाब पूरी तरह से जलकुंभी से अटा पड़ा है। जिसे साफ करवाने में स्थानीय प्रशासन भी सुध नहीं ले रहा। हालात यह हैं, पहले तालाब के बीचोंबीच करीब 50 पेड़ हुआ करते थे, जो आज एक भी नहीं है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Sep 2023 15:38:12 +0530</pubDate>
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