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                <title>Sedition Law - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>राजद्रोह कानून की वैधता को लेकर अब सुनवाई करेगी पांच जजों की पीठ</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता के तहत राजद्रोह कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को मंगलवार को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को विचार के लिए भेज दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/a-bench-of-five-judges-will-now-hear-the-validity/article-56946"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/supreme-court--2.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता के तहत राजद्रोह कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को मंगलवार को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को विचार के लिए भेज दिया।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने इसके साथ ही नए प्रस्तावित दंड संहिता में राजद्रोह प्रावधान को संशोधित करने वाला नया कानून लागू होने तक मामले की जांच स्थगित करने की केंद्र की याचिका भी खारिज कर दी।</p>
<p>केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत की इस पीठ के समक्ष कहा कि नए प्रस्तावित दंड संहिता में राजद्रोह प्रावधान को संशोधित किया गया है। प्रस्तावित कानून फिलहाल संसदीय स्थायी समिति के समक्ष विचाराधीन है।</p>
<p>इस बीच वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी समेत अन्य ने पीठ के समक्ष कहा कि नया कानून बनने से आईपीसी की धारा 124ए की संवैधानिकता को चुनौती खत्म नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि नये कानून को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने 124ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई टालने के केंद्र के अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया।</p>
<p>पीठ ने कहा कि कई कारण हैं-धारा 124ए क़ानून की किताब में बनी हुई है और दंडात्मक क़ानून में नए कानून का केवल संभावित प्रभाव होगा और अभियोजन की वैधता 124ए तक बनी रहेगी और चुनौती का मूल्यांकन इस प्रकार किया जाना चाहिए।</p>
<p>सिब्बल ने कहा कि केदारनाथ सिंह मामले (पांच सदस्यी संविधान पीठ का फैसला, जिसने प्रावधान की संवैधानिकता को बरकरार रखा था) पर पुनर्विचार करने के लिए मामले को पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है या तीन न्यायाधीशों की मौजूदा पीठ ही इस पर फैसला कर सकती है। उन्होंने कहा कि नया कानून बहुत खराब है। इसके रहते मुकदमा चलता रहेगा।</p>
<p>पीठ ने कहा कि उसे पांच न्यायाधीशों की पीठ का गठन करना होगा, क्योंकि पांच न्यायाधीशों की पीठ का फैसला उस पर बाध्यकारी है।</p>
<p>शीर्ष अदालत के 11 मई, 2022 के आदेश के कारण राजद्रोह कानून फिलहाल स्थगित है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 Sep 2023 16:48:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>राजद्रोह कानून पर लगी सुप्रीम रोक, अब नहीं होंगी आईपीसी की धारा 124-ए के तहत प्राथमिकी दर्ज</title>
                                    <description><![CDATA[कोर्ट ने  राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अपने अंतरिम आदेश में कहा कि आईपीसी की धारा 124-ए के तहत सभी कार्रवाई स्थगित की जाती हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-ban-on-sedition-law--now-there-will-be-no-fir-registered-under-section-124-a-of-ipc/article-9540"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/sc.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह कानून पर बुधवार को रोक लगाने के साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को भारतीय दंड संहिता(आईपीसी) की धारा 124-ए के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के आदेश दिये। <br /><br />मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अपने अंतरिम आदेश में कहा कि आईपीसी की धारा 124-ए के तहत सभी कार्रवाई स्थगित की जाती हैं। पीठ ने कहा है कि धारा 124-ए के तहत जेल में निरुद्ध लोग राहत और जमानत के लिए सक्षम अदालतों का रूख कर सकते हैं। पीठ ने केंद्र से राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने के लिए भी कहा है। पीठ ने स्पष्ट किया कि राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार होने तक इस प्रावधान के तहत कोई मामला दर्ज नहीं किया जायेगा और न ही किसी प्रकार की जांच की जायेगी। संबंधित मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह में होगी।<br /><br />एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पूर्व मेजर जनरल एस जी वोम्बतकेरे, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, पत्रकार अनिल चमड़यिा तथा अन्य ने राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को शीर्ष न्यायालय में चुनौती दी है। वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने भी अपनी याचिका में कहा है कि राजद्रोह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) का उल्लंघन करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Wed, 11 May 2022 14:28:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>बदलेगा अंग्रेजों के जमाने का देशद्रोह कानून</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसने देशद्रोह कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार करने और जांच का फैसला लिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इस मामले पर सुनवाई तब तक न की जाए जब तक सरकार जांच न कर ले।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/sedition-law-will-change--says-supreme-court/article-9451"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/654654644.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसने देशद्रोह कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार करने और जांच का फैसला लिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इस मामले पर सुनवाई तब तक न की जाए, जब तक सरकार जांच न कर ले। सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि देशद्रोह पर भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए की वैधता की जांच और पुनर्विचार किया जाएगा।</p>
<p><strong>हलफनामे में यह कहा</strong><br />सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में सरकार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण में जब कि देश की आजादी के 75 साल पूरे हो रहे हैं, गुलामी के समय में बने देशद्रोह के कानून पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। देशद्रोह कानून को लेकर जताई जाने वाली आपत्ति का भारत सरकार को ज्ञान है। कई बार मानवाधिकार को लेकर भी सवाल उठाए जाते हैं। हालांकि इसका उद्देश्य देश की संप्रभुता और अखंडता को अक्षुण्य रखना होना चाहिए।</p>
<p><strong>कानून की वैधता की जांच करने में समय जाया न करे</strong><br />हलफनामे में आगे कहा गया कि अब समय आ गया है कि आईपीसी की धारा 124 ए के प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए। केंद्र ने कहा कि जांच की प्रक्रिया के दौरान सुप्रीम कोर्ट से अपील है कि वह इस कानून की वैधता की जांच करने में समय जाया न करे।</p>
<p><strong>पहले किया था बचाव</strong><br />इससे पहले सरकार ने यह भी कहा था कि इस कानून की समीक्षा की जरूरत नहीं है। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत से अपील की थी कि देशद्रोह कानून के खिलाफ दी गई अर्जियों को रद्द कर दिया जाए। देशद्रोह कानून के खिलाफ याचिका देने वालों में एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं। <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Tue, 10 May 2022 09:58:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राजद्रोह कानून पर 'सुप्रीम' सवाल, आजादी के 75 साल बाद भी देश में अंग्रेजों के इस कानून की जरूरत?</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के प्रावधानों के इस्तेमाल को निरंतर जारी रखने पर गुरुवार को सवाल खड़े किए और कहा कि आजादी के 74 साल बाद भी इस तरह के प्रावधान को बनाए रखना दुर्भाग्यपूर्ण है। सीजेआई ने कहा कि राजद्रोह का इस्तेमाल बढ़ई को लकड़ी का टुकड़ा काटने के लिए आरी देने जैसा है, जिसका इस्तेमाल वो पूरे जंगल को काटने के लिए करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0--%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE--%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2--%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-75-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%87%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%A4/article-1135"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/supreme_court1.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के प्रावधानों के इस्तेमाल को निरंतर जारी रखने पर गुरुवार को सवाल खड़े किए और कहा कि आजादी के 74 साल बाद भी इस तरह के प्रावधान को बनाए रखना दुर्भाग्यपूर्ण है। मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की खंडपीठ ने मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस जी वोम्बटकेरे की याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के सबसे बड़े विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124(ए) को कायम रखने के औचित्य पर सवाल खड़े किए। <br /> <br /> न्यायमूर्ति रमन ने पूछा कि आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी उपनिवेशकाल के इस कानून की जरूरत है क्या, जिसका इस्तेमाल आजादी की लड़ाई को दबाने के लिए महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा राजद्रोह के मामलों में सजा भी बहुत कम होती है। सीजेआई ने कहा कि इन मामलों में अफसरों की कोई जवाबदेही भी नहीं है। जब सरकार पुराने कानूनों को कानून की किताबों से निकाल रही है, तो इस कानून को हटाने पर विचार क्यों नहीं किया गया। सीजेआई ने कहा कि राजद्रोह का इस्तेमाल बढ़ई को लकड़ी का टुकड़ा काटने के लिए आरी देने जैसा है, जिसका इस्तेमाल वो पूरे जंगल को काटने के लिए करता है।<br /> <br /> वेणुगोपाल ने कोर्ट को अवगत कराया कि राजद्रोह की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पहले से ही दूसरी पीठ के पास लंबित है। इसके बाद कोर्ट ने इस याचिका को भी उसके साथ संबद्ध कर दिया। हालांकि उसने केंद्र को नोटिस भी जारी किया। वेणुगोपाल ने कहा कि आईपीसी की धारा 124ए को खत्म यानी रद्द नहीं किया जाना चाहिए, उसकी अहमियत देश की एकता अखंडता के लिए बनी हुई है, इसके उपयोग के लिए गाइडलाइन बना दी जाए ताकि इसकी कानूनी उपयोगिता और उद्देश्य बना रहे। मुख्य न्यायाधीश ने इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी की निरस्त की गई धारा 66ए के तहत मुकदमे जारी रखने जैसी लापरवाही का भी उल्लेख किया।</p>]]></content:encoded>
                
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