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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास </title>
                                    <description><![CDATA[ सूबे में पिछले पांच दिनों से पीतल की लौंग की चर्चा जोरों पर है। लाल किले वाली नगरी तक में चिंतन-मंथन हो रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-90055"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में पीतल की लौंग</strong><br />सूबे में पिछले पांच दिनों से पीतल की लौंग की चर्चा जोरों पर है। लाल किले वाली नगरी तक में चिंतन-मंथन हो रहा है। हो भी क्यों ना, पीतल की लौंग बाजार में जब उछली है, तब भगवा वाले कुछ भाइयों की लीडरशिप के भावों में सोना-चांदी की तरह काफी उतार-चढ़ाव चल रहा है। इस चर्चा के बीच कई भाई लोग दुबले भी हो रहे हैं। उनका दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो गई। बेचारे हार्डकोर वर्कर्स के समझ में नहीं आ रहा है कि पीतल की लौंग और सर्राफ को लेकर मैडम की जुबान खुलने के मायने क्या हैं। अब बेचारे वर्कर्स को कौन समझाए कि अनुभव के आधार पर बोली गई बात दमदार होती है। अब मैडम की गणेश जी के वार बुध को खुली जुबान के राज को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>नजरें खाली कुर्सी की ओर</strong><br />सूबे में जब से बड़े ओहदों पर नौकरी देने वाले कमीशन में चेयरमैन की कुर्सी खाली हुई है, तब से इस पर कइयों की नजर टिकी है। कुछेक साहब लोग तो इसकी तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन तक गायब है। वे बंगला नंबर 51 के साथ भारती भवन का भी देवरा ढोक रहे हैं। और तो और अपने ईष्ट देव के सवामणी तक बोल चुके हैं। देवी-देवताओं को पूजने के साथ ही ख्वाजा की नगरी में कदम रखते ही दरगाह में चादर चढ़ाने और पुष्कर सरोवर में डुबकी लगाने की भी सोच रखी है। राज का काज करने वालों में इस कुर्सी के लिए कइयों का नाम चर्चा में भी है। आईएएस लॉबी में सबसे ज्यादा भारी नाम रेवाड़ी वाले साहब का है, जो फिलहाल खाकी वालों के साथ दिन गुजार रहे हैं। <br /><strong>बिगड़ा योग</strong><br />आजकल राज के दो नवरत्नों का गृहयोग बिगड़ा हुआ है। दोनों ही सरकार चला रहे हैं। वृष राशि वाले भाई साहब का स्वामी शुक्र रूठा हुआ है, जो अपनी करामात दिखा रहा है। नित नए आरोपों का सामना करा रहा हैं। धनु राशि वाले भाई साहब भी घरेलू संकट से जूझ रहे हैं। उनका गुरु बृहस्पति भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा। तमाम टोने टोटकों के बाद भी काबू में नहीं आया और पिछली एक तारीख को ऐसा झटका दिया, जिसकी कल्पना भी नहीं थी। अब दोनों रत्नों को ऐसे पंडित की तलाश है, जो पूजा पाठ कर गुरुओं को राजी कर सके।</p>
<p><strong>मायने भीड़ के </strong><br />इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर शनि को छोटे पायलट साहब के बर्थ डे पर कई सदरों में उमड़ी भीड़ को लेकर कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं। छोटे पायलट साहब भी भीड़ को देख मंद-मंद मुस्करा रहे हैं। हाथ वाले भाई लोगों के एक खेमे में चर्चा है कि जाड़ों की रातों में शहरों की सरकार के लिए होने वाली जंग में दावेदारों ने टिकट कटने के डर से नेताओं ने भी भीड़ जुटाने में अपना पूरा दम लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बेचारों के पास टारगेट को पूरा करने के लिए पसीने बहाने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं था।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />इन दिनों भगवा पार्टी में चल रहे अन्तरकलह को लेकर हाथ वाले भाई साहबों के भी चेहरे खिले हुए हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने ठिकाने में दिनभर हाथ वाले भाई लोग अपनी नहीं बल्कि भगवा वाली पार्टी के भीतर की इधर-उधर बातें में व्यस्त रहते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि जब अपने घर में बेटा ही नहीं है, तो पड़ोसी के बेटी होने पर पताशे बांटने से कोई फायदा होने वाला नहीं है।</p>
<p><strong>- एल एल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Sep 2024 15:14:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[ अस्पताल मार्ग पर बने हाथ वालों के वॉर रूम में चौकड़ी के आदमियों को लेकर काफी चर्चा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/governance/article-88659"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj41.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>अटकी नियुक्तियां</strong><br />भगवा वाले भाई लोगों के एक खेमे में फिर मायूसी छा गई। इधर-उधर भागादौड़ी कर बड़ी मुश्किल से पद के लिए हामी कराई थी। सवामणी तक बोली थी, पर अब चन्द्रमा बिगड़ने से सारे किए धरे पर पानी फिरता नजर आ रहा है। उनको साफ कह दिया गया है कि पहले मंत्रिमंडल रिशफलिंग, बाकी सारे काम धाम बाद में। अब उन बेचारों को कौन समझाए कि सब कुछ भाग्य से होता है, नहीं तो आठ महीने बाद भी अटकने का सवाल ही नहीं है। बेचारे अलवर जिले से ताल्लुक रखने वाले भाई साहब ने तो आठ महीने पहले ही कार्यभार संभालने के साथ ही मीडिया के सामने बढ़ चढ़ कर बोलने तक की तैयारी कर ली थी। </p>
<p><strong>डिमाण्ड चने की</strong><br />राज के एक रत्न ने दूसरे रत्नों को करामाती चने क्या खिला दिए, बैठे-ठाले आफत मोल ले ली। अगुणी दिशा में नाम में दुबई की बराबरी करने वाली नगरी वाले रत्न ने आयुर्वेद चने के पैकैट बांटते समय जब उनकी खासियत गिनाई तो सामने वाले बड़े रत्न ने एक साथ ही दस-बारह पैकेट्स की डिमाण्ड कर दी। उनकी डिमाण्ड को सुनकर नदबई वाले भाई साहब भी मंद-मंद मुस्कराए बिना नहीं रह सके। थोड़ी देर तो इधर-उधर देखा और फिर वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी। राज का काज करने वालों ने सूंघासांघी की तो पता चला कि इन चनों को खाने से घुटने चटकने तो बंद होते ही हैं, स्फूर्ती भी घोड़े की तरह हो जाती है।  </p>
<p><strong>राज चुप्पी का</strong><br />इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर इन दिनों कुछ भाई लोग गांधीजी के तीन बंदरों की तरह न तो बोलते हैं, न ही किसी की सुनते हैं और नाही इधर-उधर देखते हैं, वे केवल चुपचाप रहते हैं। ना तो वे किसी का नाम लेकर बात करते हैं और न ही सामने वालों को करने देते हैं। सामने वाला कुछ बोलने के लिए मुंह खोलता है, तो इशारों से चुप करा देते हैं। ठिकाने पर भाई लोग बतियाते हैं कि सूबे में नए सदर की सुगबुगाहट के बीच जोधपुर वाले भाई साहब के इस खेमे की चुप्पी ने कइयों का हाजमा बिगाड़ दिया। </p>
<p><strong>चौकड़ी के आदमी</strong><br />अस्पताल मार्ग पर बने हाथ वालों के वॉर रूम में चौकड़ी के आदमियों को लेकर काफी चर्चा है। वहां आने वाले कार्यकर्त्ता की राज के काज को लेकर थोड़ी भी जुबान फिसलती है, तो उसे चौकड़ी का आदमी माना जाता है। चौकड़ी भी आजकल की नहीं बल्कि तीन दशक पुरानी है, जब भाई साहब ने 26 साल पहले चेंज के लिए ट्यूर पर निकले थे तो चौकड़ी इर्द गिर्द ही रहती थी। इस बार चौकड़ी वाले भाई लोग ज्यादा खुश नजर नहीं आ रहे। उनके चेहरों पर वो लाली नहीं है, जो कभी रोज ही अपना असर दिखाती थी।  अब ठिकाने पर पर आने वाले भाई लोग चाय की थड़ियों पर भी चुस्कियों के साथ पुरानी चौकड़ी के आदमियों को लेकर चटकारे ले रहे हैं।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />हाथ पार्टी में चल रहे अन्तरकलह को लेकर भगवा वालों के भी चेहरे खिले हुए हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले के ठिकाने पर दिनभर भाई लोग अपनी नहीं बल्कि हाथ वाली पार्टी के भीतर की इधर-उधर बातें में व्यस्त रहते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि जब अपने घर में बेटा ही नहीं है, तो पड़ोसी के बेटी होने पर पताशे बांटने से कोई फायदा होने वाला नहीं है।<br /><strong><br />एल एल शर्मा</strong><br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Aug 2024 11:28:13 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में एक दीर्घा में आने वालों की संख्या में अचानक इजाफा होने से हलचल तो मचनी ही थी, लेकिन उसका खुलासा हुआ, तो कइयों के पैरों तलों की जमीन खिसक गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-86836"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>दीर्घा में बढ़ी संख्या ने नींद उड़ाई</strong><br />सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में एक दीर्घा में आने वालों की संख्या में अचानक इजाफा होने से हलचल तो मचनी ही थी, लेकिन उसका खुलासा हुआ, तो कइयों के पैरों तलों की जमीन खिसक गई। इन दिनों गवर्नर गैलेरी  में बैठने वालों की नफरी बढ़ी तो वहां तक पहुंचने वाले रास्तों की जानकारी हासिल की गई। चूंकि उन रास्तों से गुजरना इतना आसान नहीं है। पता चला कि पहले माले पर बैठने वाले नए साहब ने अपने स्तर पर ही राज्यपाल दीर्घा के पास छपवा कर बनाना चालू कर दिया। सचिवालय से विधानसभा पहुंचे नए साहब ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक फोन पर एंट्री कराने के साथ गेट वालों को हड़काना भी शुरू कर दिया। जब बात पंचायत के सरपंच साहब तक पहुंची, तो उनकी आंखें भी लाल हुए बिना नहीं रही। अब नए साहब को कौन समझाए कि यह एसेम्बली है, यहां सारे काम कायदे-कानूनों से होते हैंं, अपनी मनमर्जी से नहीं। अगर मनमर्जी चलती, तो मराठा की धरा वाले एक भाई साहब को गेट पर इतनी फजीहत का सामना नहीं कराना पड़ता।</p>
<p><strong>एक कमरा न्यारा</strong><br />सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में इन दिनों एक कमरा सबसे न्यारा है। पहले माले पर बने इस कमरे के बाहर से जो भी गुजरता है, उत्सुकता से उसकी तरफ देखे बिना नहीं रहता। इस कमरे का नंबर 125 है जो खेती बाड़ी महकमा वाले मीनेश वंशज और राज के रत्न के नाम से आवंटित है। राज का यह खास रत्न इन दिनों पिंकसिटी से लेकर लालकिले वाली नगरी तक काफी चर्चा में हैं। चर्चा और किसी कारण से नहीं बल्कि राज के रत्न की कुर्सी से उनका मोह भंग होना है। कुर्सी से मोह भंग होने के कारण तो खुद डॉक्टर साहब ही जाने, लेकिन कमरा नंबर 125 उनका बेसब्री से इंतजार कर रहा है, चूंकि इस सत्र में बार एक भी उस कमरे में रखी कुर्सी की लालों के लाल, किरोड़ी भाई साहब ने शोभा नहीं बढ़ाई।</p>
<p><strong>यह तो होना ही था</strong><br />पिछले दिनों राज की नंबर दो कुर्सी पर बैठने वाली मोहतरमा की मौजूदगी में जो कुछ हुआ, उसका अंदाजा खुद उनको भी नहीं था। पिंकसिटी की वर्किंग कमेटी की मीटिंग में मोहतरमा ने जो कुछ बोला, उससे वर्कर्स का हाजमा बिगड़ गया। मोहतरमा ने सिर्फ इतना ही मुंह खोला था कि वर्कर्स बदलियां कराने के लिए नहीं बल्कि केवल वोट मांगने के लिए होता है। खैर आहत होकर भाटिया भवन में मौजूद हार्ड कोर वर्कर्स ने भी सांगानेर और विद्याधरनगर की आड़ में अपने मन की भड़ास निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो तो भला हो, तुला राशि वाले पंडितजी का, जिन्होंने माहौल भांप कर बीच-बचाव कर दिया, वरना हार्ड कोर वर्कर्स तो तू थारी और म्है मारी करने में न आगा सोचते और न ही पीछा।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि दो पालों के बीच फुटबाल बने वर्कर्स को लेकर है। इस जुमले की चर्चा सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के दफ्तर में भी हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि पिंकसिटी के तीन विधानसभा क्षेत्रों के वर्कर्स की कहीं भी सुनवाई नहीं है। उम्मीदों के साथ भारती भवन की चौखट पर जाते हैं, तो वहां से भी टरका कर रवाना करने में थोड़ी भी देरी नहीं करते। और तो और नुमाइंदों ने पहले ही उनकी परवाह करना छोड़ दिया। संघ और भाजपा के फेर में फंसे बेचारे इन वर्कर्स के समझ में नहीं आ रहा कि आखिर जाएं तो कहां जाएं।<br /><strong>-एल एल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 05 Aug 2024 11:30:44 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले दिनों सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में मर्दानगी भी चर्चा में आई। राज में नंबर दो की कुर्सी संभाल रही मोहतरमा के बजट भाषण में सामने वालों में टोका-टोकी की होड़ मची हुई थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-84716"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में मर्दानगी</strong><br />पिछले दिनों सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में मर्दानगी भी चर्चा में आई। राज में नंबर दो की कुर्सी संभाल रही मोहतरमा के बजट भाषण में सामने वालों में टोका-टोकी की होड़ मची हुई थी। खेती बाड़ी वाले मंत्री की गैर हाजरी को लेकर प्रतिपक्ष के सदस्यों ने कुछ ज्यादा ही उछलकूद की और मीनेश वंशज भाई साहब को मर्द साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मर्द बताने वालों में सबसे आगे चंबल का पानी पीने वाले वो भाई साहब थे, जिन्होंने गुजरे जमाने में इसी पंचायत में खुद को मर्द और सूबे को मर्दों वाला प्रदेश बताया था। अब इनको कौन समझाए कि समय बड़ा बलवान है। समय-समय की बात है, कोई समय दिन बड़ा तो कोई समय रात।</p>
<p><strong>तीन पीढ़ी बनाम एक पीढ़ी</strong><br />सूबे में इन दिनों तीन पीढ़ी बनाम एक पीढ़ी का खेल खूब चल रहा है। खेल भी और कोई नहीं, बल्कि भगवा और हाथ वाले भाई लोग खेल रहे हैं। खेले भी क्यों नहीं, मामला प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। इसका असर भी सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में दिखाई दे रहा है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि राज वालों के पास सिर्फ एक पीढ़ी का अनुभव है तो सामने वालों के पास तीन पीढ़ियों का है, तभी तो तीन पीढ़ी के अनुभवी लोग फ्लोर मैनेजमेंट में भारी पड़ रहे हैं। राज के एक रत्न की राय ठीक ही है कि बड़Þबोले पन से हंगामा करा कर सामने वालों को बहिर्गमन के लिए उकसाओ और फिर शांति से काम करो।</p>
<p><strong>बदलती बॉडी लैंग्वेज</strong><br />अटारी वाले भजन भाई साहब की बदलती बॉडी लैंग्वेज को लेकर भगवा वाले कई वर्कर माथा लगा रहे हैं, मगर उनके समझ में नहीं आ रहा है कि इसके पीछे का राज क्या है। वे सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने से लेकर सचिवालय तक सूंघा-सांघी कर रहे हैं, मगर उनकी पार नहीं पड़ रही। अब उनको कौन समझाए कि भाई साहब अब जो काम दाएं हाथ से करेंगे तो बाएं हाथ तक को पता नहीं चलने देंगे। साहब की बदली बॉडी लैंग्वेज से लगता है कि  उनकी हर मंशा पूरी हो रही है, और तो और उनको जिनको मैसज देना था, वह एक महीने पहले ही दे दिया। राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वो दिखता नहीं है। अब समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।</p>
<p><strong>यह तो होना ही था</strong><br />बीजेपी की वर्किंग कमेटी की मीटिंग में शनि को मराठी मैडम के सामने जो कुछ हुआ, वह नया नहीं था। हार्ड कोर वर्कर्स इसके लिए कई महीनों से तैयार थे, मगर उनको उचित मंच नहीं मिल रहा था और न ही कोई सुनने वाला था। मिरजापुर वाले भाई साहब के साथ ही एमएलएज तो उनको कोसों दूर रखते हैं। उनकी दशा दो पाटों के बीच फंसे चने के बराबर थी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि वो तो भला हो इंचार्ज आॅफ को मराठी मैम का, जिन्होंने माथा लगाकर वर्कर्स की बात सुनने में अपनी भी भलाई समझी। वर्कर्स भी कहां चूकने वाले थे, सो मौका मिला तो एमएलएज की पोल खोल कर ब्याज समेत वसूल कर लिया।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />राज के सात महीनों के काम काज को लेकर भगवा वाले भाई लोग भी चिंतन मंथन में व्यस्त है। सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में यह मंथन जोरों पर है, लेकिन समस्या यह है कि सात महीनों में भगवा वालों ने क्या पाया, इस पर सबकी जुबान बंद है। शेखावाटी वालों का एक ही सवाल है कि हाथ वालों के हाथ के बजाय खुद की हथेलियों की तरफ भी देखो। सात <br />महीनों में जीरो के अलावा कुछ नहीं है। जब हमने ही एक दूसरे की टांग खींचने के सिवाय कुछ नहीं किया तो सामने वालों से उम्मीद करना बेमानी है।<br />   </p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jul 2024 11:15:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में पिछले दिनों राज के दो रत्नों के बीच जो कुछ हुआ, वह जगजाहिर है। एक रत्न खेतीबाड़ी देखते हैं, तो दूसरे वाले रत्न पंचायती करते हैं। दोनों ही खुद को पावर सेंटर से कम नहीं मानते।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-83284"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>यह तो होना ही था</strong><br />सूबे में पिछले दिनों राज के दो रत्नों के बीच जो कुछ हुआ, वह जगजाहिर है। एक रत्न खेतीबाड़ी देखते हैं, तो दूसरे वाले रत्न पंचायती करते हैं। दोनों ही खुद को पावर सेंटर से कम नहीं मानते। और तो और दोनों एक-दूसरे के मामलों में टांग फंसाई को कतई बर्दास्त भी नहीं करते। गुजरे जमाने में बाबोसा के राज में भी खुरापात किए बिना चैन से नहीं बैठे। दोनों की मूंछ की लड़ाई में इनका तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन राज का काज करने वालों की नींद जरूर उड़ गई। वो तो भला हो, अटारी वाले पंडितजी का, जिन्होंने मामले की गंभीरता को समझकर सुलटा दिया, वरना बलि का बकरा बेचारे साहब लोगों को ही बनाते। चूंकि राज के रत्न कभी भी गलती नहीं करते। अब बलि का बकरा कौन बनता, यह तो समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>सुनारी रार</strong><br />इन दिनों सचिवालय के गलियारों में सुनारी रार को लेकर काफी चर्चाएं हैं। हो भी क्यों ना, मामला राज का काज करने वाले कारिन्दों से ताल्लुक जो रखता है। राज का काज करने वाले दो साहबों को आए दिन डांट का सामना करना पड़ता है। इनमें से एक साहब एक बड़े जिले के कलेक्टर हैं, तो दूसरे साहब सचिवालय में दूसरी मंजिल पर बड़ी कुर्सी पर बैठते हैं। दोनों को पिछले दिनों राज के मुखिया ने कई बार लाल आंखें दिखाई तो दूसरे कई साहब लोगों तक के पसीने छूट गए। कहने वाले तो पता नहीं क्या-क्या कहते हैं, पर सौ टका सच यह है कि यह राज और काज करने वालों के बीच सुनारी रार है। जो सबसे ज्यादा प्यारा होता है, डांट भी सबसे ज्यादा उसी को पिलाई जाती है।</p>
<p><strong>नहीं खुली गांठ</strong><br />भारती भवन में पिछले कुछ दिनों से चर्चा और चिंतन जारी है। भाईसाहबों की आंखें गुस्से से लाल होने के साथ ही उनके चेहरों पर चिंता की लकीरें भी साफ दिखाई दे रही हैं। गुस्सा इस बात का है कि उन्हीं के संघनिष्ठ कुछ साथियों ने मंत्रोचार के बीच सौगंध खाने के बाद भी पाला पलट लिया। उनको चिंता इस बात की सता रही है कि एक साल बाद भी संगठन महामंत्री को लेकर सहमति नहीं बन पाई। भारती भवन वालों के गुस्से और चिंता का असर कमल वालों के ठिकाने पर भी दिखाई देने लगा है। राज का  काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि भाई साहबों के मन की गांठ नहीं खुली, भाईसाहबों के दिन में देखे सपनों को पूरा करना मुश्किल नजर आ रहा है।</p>
<p><strong>निष्ठा परिवर्तन</strong><br />निष्ठा तो निष्ठा ही होती है, वह कब और कहां तथा किसके प्रति बदल जाएं, कुछ नहीं कहा जा सकता। अब देखो ना राज में कुर्सी मिलने से पहले कई भाई लोगों ने मैडम के प्रति पूरी निष्ठा दिखाई थी। और तो और कई देवी- देवताओं को साक्षी मानकर मरते दम तक निष्ठा निभाने तक की सौगंध भी खाई। दिन-रात मैडम के गुण गान भी किए, मगर जीते तो निष्ठा बदलने में एक पल भी नहीं लगाया। गिरगिट की तरह रंग बदल कर मैडम से नमस्ते तक करने से परहेज करने लगे। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि  पिछले दिनों दिल्ली दरबार की जंग के लिए नामों के ऐलान के बाद से ही कइयों ने अलविदा कर लिया था। एक ने तो गुजरात वाले भाईसाहब से रिश्तेदारी की दुहाई दी, तो दूसरे ने कहीं और निशाना लगा दिया। तीसरे ने लाल बत्ती की चाहत में खुद का शाखाओं से पुराना रिश्ता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।</p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jul 2024 10:35:26 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[पिंकसिटी में दस दिनों से भोजन पॉलिटिक्स की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यूं ना, पहली बार हाथ के साथ कमल वालों ने भी भोजन कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-75618"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj41.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में भोजन पॉलिटिक्स</strong><br />पिंकसिटी में दस दिनों से भोजन पॉलिटिक्स की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यूं ना, पहली बार हाथ के साथ कमल वालों ने भी भोजन कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तर में पापड़ के हनुमान से लेकर दक्षिण में देहलास वाले बालाजी और पूर्व में खोले के हनुमान जी से लेकर पश्चिम में झारखंड महादेव मंदिर तक चली भोजन के बहाने पॉलिटिक्स का यह फार्मूला तकिए के नीचे चाबी रख कर सोने वाले धन्ना सेठों ने निकाला है। चर्चा है कि भोजन पॉलिटिक्स के बहाने देसी घी की रसोई खाकर डकारें लेने वाले भाई लोगों ने ईवीएम का बटन दबाते समय भी अपनी बिरादरी का खयाल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चूंकि मामला दाना-पानी के साथ ही नमक से ताल्लुक जो रखता है। </p>
<p><strong>असर निगेटिव ग्राउंड रिपोर्ट का</strong><br />दिल्ली दरबार के लिए सूबे में हुई पहली चुनावी जंग के बाद अलग-अलग ग्राउण्ड रिपोर्ट्स ने दोनों दलों के नेताओं की नींद उड़ा दी है। उड़े भी क्यों नहीं, वोटर्स ने भी अबकी बार लीडर्स की अग्नि परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दस साल तक मन की बात सुन सुनकर अपने कान पकवाने वाले पांच फीसदी साइलेंट वोटर्स ने भी अपने मन की बात नहीं बताई। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले के ठिकाने पर ग्राउण्ड रिपोर्ट को लेकर रोजाना कानाफूसी हो रही है। उनके समझ में नहीं आ रहा कि यह रिपोर्ट उनके पक्ष में निगेटिव है या पॉजीटिव। </p>
<p><strong>गणित वोटरों की, परेशान नेता</strong><br />सूबे के राज के लिए हुए चुनाव में हार के बाद हाथ वाली पार्टी के नेताओं की जुबान पर ताला सा लग गया है। चुनाव से पहले तक बड़े-बड़े दावे करने वाले नेताओं को अब यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर मतदाताओं ने उन्हें गणित का कौन सा पाठ सिखाया है। चुनाव से पहले तक सौ से ज्यादा सीटों पर अपने झण्डे लहराने का दावा करने वाले नेता अब दिल्ली दरबार के लिए हो रही जंग में  चुप्पी साधे हुए हैं। और तो और एक-दो सवालों का जबाव देने के बाद हकलाने लग जाते हैं। राज का काज करने वाले भी जोड़-बाकी करने में व्यस्त हैं। फर्क इतना सा है कि नेता दो और दो पांच बताते हैं।</p>
<p><strong>किलों की हुई तबीयत नासाज</strong><br />हाथ पार्टी की दशा देखकर कई किलों और खण्डहरों की तबीयत नासाज हैं। पुराने साथी जो अलग होते जा रहे हैं। कुछ को अलग कर दिया गया और कुछ खुद ही अलग हो गए। झोटवाड़ा वाले कटारियाजी के कथन के बाद तो बाकी बचे किलों और खण्डहरों के पास कोई जवाब नहीं है। वानप्रस्थ आश्रम में पहुंच चुके इन किलों के आदेशों की किसी को परवाह भी नहीं है। राजस्थान में तो उनकी दशा और भी बुरी है।  बार-बार आंख दिखा रहे किलों को समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या किया जाए। सो, सोच लिया कि बहुमत और जनमत को जानने के बाद कुछ नहीं कहना। बचे-खुचे दिनों को आराम से काटना है। दूसरी के बाद तीसरी पीढ़ी का मिजाज कुछ अलग ही है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे की राजनीति में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी नंबर एक की कुर्सी को लेकर है। चर्चा है कि आजकल राजनेता भी गुगली फेंकने में माहिर हैं। वैसे तो खुद की गलतियों को ढंकने के लिए सारा ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते, मगर जरूरत पड़ने पर यूज करने में भी पीछे नहीं रहते। राज का काज करने वालों की जुबान पर है कि इस बार तो राजनेताओं का प्रोग्रेस कार्ड भी मीडिया के जरिए लिया जा रहा है। जब भी असंतुष्ट खेमा दिल्ली दरबार में चक्कर लगाना शुरू करता है, तो राजधानी से खबरें आती हैं कि तीन-चार महकमे तो फेल हैं।<br /><strong>-एल एल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Apr 2024 11:43:15 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[पिंकसिटी के पड़ोसी जिले देवों की नगरी दौसा में चुनावी माहौल के बीच रिश्तेदारी भी काफी चर्चा में है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-75140"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में बुआ-फूफा और मामा</strong><br />पिंकसिटी के पड़ोसी जिले देवों की नगरी दौसा में चुनावी माहौल के बीच रिश्तेदारी भी काफी चर्चा में है। यहां पहले भी देवर-भाभी के रिश्तों की आड़ में खूब प्रचार हुआ था, लेकिन इस बार कन्हैया और मुरारी के साथ ही बुआ-फूफा और मामा के रिश्ते मंचों पर खूब चल रहे हैं। रिश्ते निकालने में माहिर मिनेश वंशज डॉक्टर साहब ने मुरारी को एक मंच पर अपना मामा बताया, तो उन्होंने भी जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और मंच से कहा कि मैं डॉक्टर साहब का मामा नहीं बल्कि फूफा हंू। गेंद जब डॉक्टर के पाले में आई, तो बुआ के दर्द की आड़ लेकर बोल रहे हैं कि रिश्ता सिर्फ पगड़ी का चलता है, घाघरी का नहीं। इसके बाद दौसा से लवाण तक हर ढाणी और गांव में बुआ-फूफा और मामा की चर्चा हुए बिना सभा का श्रीगणेश ही नहीं होता।</p>
<p><strong>कन्फ्यूजन में वर्कर</strong><br />सालों से पार्टियों के लिए काम करने वाले वर्कर इन दिनों काफी कन्फ्यूज हैं। बेचारे वो समझ नहीं पा रहे हैं कि रात-दिन एक ही नारा लगाने की आदत को एकदम कैसे बदलें। अब देखो ना, भगवा वाले वर्कर्स सालों से वोट फॉर बीजेपी का ही नारा लगाते आ रहे हैं। बीच-बीच में कंडीडेट्स का नाम लेकर भी ठुमके लगाए बिना नहीं रहते थे। लेकिन इस बार सबकुछ उल्टा है। बेचारों को पार्टी के बजाय वोट फॉर ओनली मोदी के नारे रटाए जा रहे हैं। बगल में खड़े कंडीडेट्स का नाम लेने से पहले दस बार सोचना पड़ता हैं। अब वर्कर्स को कौन समझाए कि अब लोकतंत्र का नहीं, बल्कि एकतंत्र का जमाना है और उसी के हिसाब से चलने में भलाई है, वरना हेकड़ी निकालने में ज्यादा नहीं सोचना पड़ता।</p>
<p><strong>सर्जरी का इंतजार</strong><br />राज अभी दिल्ली की सियासत के चुनावों में व्यस्त है, लेकिन उसके कारिन्दे दिनभर कुछ न कुछ नई गणित बिठाते रहते हैं। कुछ कारिन्दे आने वाले को समझाने लग जाते हैं कि अब एक बार फिर हाथ वाले भाई लोगों का खेल बिगड़ता नजर आ रहा है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर एक कमरा ऐसा है, जहां केवल चुनावों के बाद की जाने वाली सर्जरी पर चर्चा होती है। साहब चाय की चुस्कियों के साथ समझाते हैं कि दिल्ली दरबार के चुनावों के बाद मंत्रियों के साथ ही अफसरों की भी सर्जरी की जरूरत है। तीन महीने पहले किए गए ऑपरेशन के दौरान कुछ वायरस आ गए थे। अब उनकी सर्जरी नहीं की गई, तो मर्ज बढ़ता ही जाएगा।</p>
<p><strong>वेंटिलेटर पर हाथ</strong><br />दिल्ली दरबार के लगातार दो चुनाव हार चुकी हाथ वाली पार्टी के भाई लोग इस बार भी एक-दूसरे से कटे हुए हैं। कभी एक मंच पर एक-दूजे के लिए जान भी देने का ऐलान करने वाले अब एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखते। अब पार्टी भी पीसीसी से एक फलांग दूर बने वॉर रूम तक सिमट कर रह गई। चुनावी अभियान भी केवल चुनिन्दा लोगों तक रह गया है। वहां चर्चा है कि डायरी और अखबारी आंकड़ों में काफी अंतर है। कई सालों से ऐड़ियां रगड़ने वाले कारिन्दों ने पार्टी को वेंटिलेटर तक पहुंचाने वाले भाइयों की काफी लंबी सूची भी तैयार की है। अब उनको सिर्फ मौके की तलाश है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि दल-बदलुओं को लेकर है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने के साथ ही इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के दफ्तर में भी जुमले को लेकर हाडकोर वर्कर्स में काफी खुसरफुसर है। जुमला है कि दल बदलने वाले नेताओं की सूंघने की क्षमता का कोई जवाब नहीं है। इस मामले में उनके सामने जंगली हिरण भी शरमा रहे हैं। उनको जिस दल का जहाज डगमगाकर डूबने वाला दिखाई दिया, तो वे उगते सूरज वाले दल की तरफ दौड़ने लग गए। पीसीसी में सालों से आ रहे बुजुर्गवार की मानें तो कुछेक भाई लोगों को जो दल पहले कौरव सेना की तरह दिखता था, वह अचानक पांडवों की तरह दिखने लग गया। उसके सेनापति जिसमें रावण की छवि दिखती थी, उसमें सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर के दर्शन होने लगे हैं।<br /><br /></p>
<p><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Apr 2024 12:39:49 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में संडे के दिन से मन और मजबूरी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। चर्चा भी पिंकसिटी से लेकर दिल्ली तक है। चर्चा भी क्यों ना हो, मामला मन और मजबूरी से ताल्लुक रखता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-72377"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में मन और मजबूरी</strong><br />सूबे में संडे के दिन से मन और मजबूरी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। चर्चा भी पिंकसिटी से लेकर दिल्ली तक है। चर्चा भी क्यों ना हो, मामला मन और मजबूरी से ताल्लुक रखता है। गुलाबीनगरी में बने हाथ और भगवा वाले दलों के ठिकानों पर वर्कर्स भी चटकारे ले रहे हैं। चर्चा है कि जिन किसान पुत्रों ने हाथ से हाथ छुड़ाकर भगवा धारण किया है, उनका वाकई हाथ वाले दल से मन भर गया या फिर कोई मजबूरी है। अब किसी की जुबान तो पकड़ी नहीं जा सकती, सो कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि बेचारों की ई एंड डी के अदृश्य डर से तीन महीनों से दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। चार-पांच नेताओं ने तो शांति के लिए धार्मिक यात्राएं भी कर ली, लेकिन पार नहीं पड़ी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि चौरासी के फेर में फंसे बेचारों के पास नए ठिकाने के लिए फंडिंग करने के साथ ही मन मसोस कर घुसने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं था। </p>
<p><strong>ऑल आर वन</strong><br />दिल्ली में बैठे गुजराती बंधुओं ने सूबे में इस बार जो लक्ष्मण रेखा खींची है, उससे नंबर का सिस्टम तो खत्म हो गया, मगर कइयों के समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। राज का काज करने वालों बतियाते हैं कि इस बार आखिर सीएमओ में नंबर एक तो राजकुमारी और नंबर दो  प्रेम जी भाईसाहब है, परन्तु नंबर तीन कौन है। केबिनेट में भी नंबर तीन को लेकर काफी माथापच्ची हो रही है, वहां भी फिलहाल नंबर तीन कोई नहीं है। गुजरे जमाने में दौसा वाले मीनेश वंशज खुद को नंबर दो समझते थे, लेकिन इस बार छोटा भाई और मोटा भाई ने उनको वो ही घूघरा थमा दिया, जो वो बीस साल पहले बजा चुके थे। गुजरे जमाने में फूड वाले महकमे को संभाल चुके दौसा वाले भाईसाहब ने भी  डिप्टी सीएम तक सपना देखा था, लेकिन इस बार खेतों का विकास करने का जिम्मा मिला। अब हम बताय देते हैं कि अब नंबर का सिस्टम खत्म, दिल्ली में बैठे भाईसाहबों ने मैसेज दे दिया कि आॅल आर वन। इसको समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं। </p>
<p><strong>यह भी खूब रही</strong><br />पिछले दिनों राज के एक रत्न के साथ जो कुछ हुआ, उसकी कतई उम्मीद नहीं थी। रत्न भी झीलों की नगरी वाले संभाग से ताल्लुक रखते हैं और उन पर सूबे की जनता की जमीनों का बंदोबस्त का जिम्मा है। अपने ही महकमे की मोहतरमा से परेशान कर्क राशि वाले रत्न ओटीएस में अपनी मंशा पूरी करने के लिए फरियाद लगाई तो, वह पूरी होने के बजाय गले पड़ गई। पहले तो राज ने अफसरों की कमी की दुहाई देते हुए समझाया कि मिल बैठकर काम चलाओ, मगर रत्न पर सलाह बेअसर रही और लाल आंख दिखाई तो, खाली कागज थमा कर राज ने जो कहा, उसको सुनकर रत्न के पास उल्टे पैर दौड़ लगाने के सिवाय कोई चारा ही नहीं बचा था। </p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि देवनारायण और वीर तेजाजी के वंशजों के नेताओं से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि इन दिनों सादुलपुर, हिंडोली, बायतु और लाडनूं के नेताओं की आंखें कुछ ज्यादा ही लाल हैं। रात में आंखें लाल हो तो समझ में आता है, लेकिन दिन में होना समझ के बाहर है। इनकी लाल आंखें होने की सूचना दिल्ली तक भी पहुंच गई है। हमने भी लाल आंखों को लेकर सूंघासांघी की तो पता चला कि पिछले दिनों राज का काज करने वाले इन वंशजों के साहबों को टारगेट कर ऐसी कुर्सियां थमा दी, जिनके बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। <br /><br /></p>
<p><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Mar 2024 10:19:28 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[ सूबे में इन दिनों सीडी को लेकर काफी चर्चा है। चर्चा भी सीमावर्ती जिले से शुरू होकर हाड़ौती तक है। हो भी क्यों ना, मामला सियासत से ताल्लुक जो रखता है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-66990"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/rajkaj42.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चाओं में सीडी और सियासत</strong><br />सूबे में इन दिनों सीडी को लेकर काफी चर्चा है। चर्चा भी सीमावर्ती जिले से शुरू होकर हाड़ौती तक है। हो भी क्यों ना, मामला सियासत से ताल्लुक जो रखता है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि सीडी का वायरल होकर चर्चा में आना सूबे में नई बात नहीं है, लेकिन एक साजिश के तहत सीडी वायरल हो, वह मायने रखती है। बाड़मेर से राजधानी तक पहुंची सीडी के बाद उन भाई लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है, जिन्होंने अपने घर के अलावा दूसरा ठिकाना बना रखा है। फिलहाल सूबे में सियासत गरमाई हुई है और सचिवालय के गलियारों में आने वाली नई सीडी को बेसब्री से इंतजार है।</p>
<p><strong>कद्र बढ़ी विधायकों की</strong><br />गुजरे जमाने में सड़कों पर घूमने वाले विधायकों में अचानक सीना तान कर चलने की आदत बन गई। उनके हावभाव तक बदल गए। उनके व्यवहार में आए बदलाव को लेकर दोनों दलों के ठिकानों पर भी कानाफूसी होने लगी है। सचिवालय के गलियारों में भी उनसे राम-राम करने वालों की संख्या में इजाफा हो गया। राज का काज करने वाले भी उनको हाथ जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। उन भाई लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है, जो गुजरे जमाने में उनको घण्टों इंतजार करवाया है। सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वालों को भी सिखाया जा रहा है कि हर एमएलए से हाथ जोड़कर मिलो, क्या पता दिल्ली में बैठे गुजराती बंधु छोटा भाई और मोटा भाई कब किसे राज की बड़ी कुर्सी पर बिठा दे।</p>
<p><strong>अब नजरें पिंकसिटी पर टिकी</strong><br />भगवा वाले कुछ भाई लोगों की नजरें अब पिंकसिटी पर टिकी हुई है। दिल्ली दरबार के कुछ पंचों का भी गुलाबीशहर में पगफेरा कुछ ज्यादा ही हो रहा है। उनके पगफेरे को लेकर सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने ठिकाने पर भी खुसरफुसर ज्यादा है। ठिकाने पर आने वाला हर कोई चर्चा करता है कि दिल्ली दरबार के लिए होने वाली चुनावी जंग में सबसे सेफ जोन में माने जाने वाले गुलाबीनगर की सीटों पर उड़ीसा से राज्यसभा के पंच और लोहपथगामिनी के महकमे वाले पंडितजी के साथ ही कपड़े वाले गोयल की नजरें टिकी हुई हैं। </p>
<p><strong>फिर होंगे आयाराम-गयाराम</strong><br />सूबे में एक बार फिर से आयाराम-गयाराम का जमाना आता दिख रहा है। कोई दूसरी पीढ़ी के जुगाड़ के लिए इधर से उधर होंगे, तो कुछ अपना भविष्य सुधारने के लिए हाथ से हाथ छोड़कर पीताम्बर धारण करने में कोई संकोच नहीं करेंगे। चर्चा है कि गुजरे जमाने में जयपुर ग्रामीण की पंचायत कर चुके झोटवाड़ा वाले लाल जी का भी हाथ वालों से मोह भंग हो रहा है, तो वो भी कमल का फूल सूंघने को आतुर हैं। सूबे की पंचायत की जंग से पहले कमल वाले दल में शामिल हुए नेता भी ताजपोशी के सपने देख रहे हैं। हाथ वालों के राज में जयपुर की फर्स्ट लेडी का तमगा लेने वाली मैम और सांगानेर से नसीब अपना चुके ब्राह्मण लीडर भी दिन में सपने देखने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। अब इन लोगों को कौन समझाए कि भगवा वाले दल में अब पीछे की लाइन में बैठने वालों का जमाना है। राज का काज करने वालों के इस इशारों को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटी नहीं, बल्कि दिल्ली दरबार के लिए होने वाली चुनावी जंग से ताल्लुक रखता है। जुमले की चर्चा भी दोनों दलों के ठिकाने पर है। जुमला है कि राम मंदिर को लेकर बने मिजाज की आड़ में दिल्ली दरबार की जंग तय समय से पहले भी हो सकती हैं। दो माह में चलो अयोध्या अभियान के पूरा होने के बाद सिर्फ चुनावी जंग में हेट्रिक बनाने के सिवाय कोई काम भी तो नजर नहीं आ रहा।<br /><br /></p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jan 2024 11:54:23 +0530</pubDate>
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