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                <title>special in governance - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[ सूबे में इन दिनों एक गाना हर कोई गुनगुना रहा है। और तो और सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले हर वर्कर की जुबान पर है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-84028"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>राज को राज रहने दो</strong><br />सूबे में इन दिनों एक गाना हर कोई गुनगुना रहा है। और तो और सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले हर वर्कर की जुबान पर है। गाना करीब 50 साल पुरानी धर्मा फिल्म का है। गाने के बोल हैं इशारों को अगर समझो तो राज को राज रहने दो। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि अटारी वाले भाई साहब समझे या नहीं समझे, मगर मिनेश वंशज डॉक्टर साहब के इस्तीफे के पीछे भी कोई राज जरूर है। अब कहने वालों का तो मुंह नहीं पकड़ा जा सकता, सो उन्हें गाने को गुनगुनाने से कोई रोक नहीं सकता। मगर सावन की घटाओं के बीच इसे पचवारा इलाके में जोर-जोर से जरूर गाया जाएगा। चूंकि सब कुछ ओपन हुए बिना नहीं रहेगा।</p>
<p><strong>तरीका-ए-मैसेज</strong><br />मैसेज तो मैसेज ही होता है, केवल उसे देने वालों के तरीके पर निर्भर होता है कि वह उसे कैसे दे। अब देखो ना अटारी वाले भाई साहब ने अपने तरीके से जहां मैसेज देना था दे दिया और सफल भी हो गए। केवल एक दर्जन नवरत्नों के साथ मेवाड़, मारवाड़ और शेखावाटी में जनता के बीच जाकर कइयों की बोलती बंद कर दी। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 के साथ ही इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर भी चर्चा है कि ठाले बैठे भाई लोगों ने दिल्ली दरबार के लिए हुई जंग में 11 सीटों पर हार को लेकर एक मुद्दा खड़ा करने की योजना बनाई थी, लेकिन उस पर अमल होने से पहले भाई साहब ने दिल्ली में पग फेरा कर लाल किले तक मैसेज दे दिया कि काम करने के लिए 30 रत्नों का होना जरूरी नहीं है। </p>
<p><strong>गूंगे, बहरे और अंधे</strong><br />सूबे में इन दिनों गांधीजी के तीन बंदरों का जुमला खाकी वालों के बीच जोरों पर है। गुजरे जमाने में यह जुमला खादी पर सटीक बैठता था, पर अब खाकी पर फिट है। जुमला पीएचक्यू से शुरू होकर सचिवालय के गलियारों तक पहुंचा। लंच केबिनों में भी चटकारे लगा कर इसे सुनाया जा रहा है। हमें भी स्टेच्यू सर्किल पर खाकी वाले साहब ने सुनाया। खाकी में इन दिनों न कोई सुनता है, न कोई देखता है और न ही कोई बोलता है। आईओ वो करते हैं, जो ऊपर वालों का आदेश होता है। यानि कि वे गूंगे, बहरे और अंधे के समान है।</p>
<p><strong>चर्चा में सुन्दरकांड</strong><br />इन दिनों सुन्दरकांड को लेकर सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में चर्चा जोरों पर है। सुन्दरकांड भी कोई छोटा-मोटा पंडित नहीं बांच रहा, बल्कि राज की नंबर वन कुर्सी पर बैठते हैं, और गोवर्धनजी की नगरी से ताल्लुकात रखते हैं। जब से भगवा वाली पार्टी में दो-दो हाथ की नौबत आई है, तभी से भाई साहब ने सुन्दरकांड को पढ़ना शुरू किया है। भाई साहब न जगह देखते हैं और न ही वक्त। जब भी मन में आया, छोटी सी किताब जेब से निकाली और पढ़ना शुरू कर देते हैं। उनके अगल-बगल वाले कई मायने भी निकालते हैं, मगर भाई साहब अपनी धुन में मस्त रहते हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि पंडितजी को भी किसी दूसरे पंडितजी ने बिन मांगे सलाह दे दी कि जो चल रहा है, वह ठीक नहीं है, सो सुन्दरकांड का पाठ करने में ही भलाई है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />इन दिनों सांगा बाबा की नगरी को लेकर एक जुमला जोरों पर है। जुमले की चर्चा ब्यूरोक्रेट्स से लेकर दोनों दलों के ठिकानों पर ही नहीं, बल्कि चौपालों तक भी होने लगी है। जुमला है कि सांगानेर के सांगा बाबा की इस बार राज से ट्यूनिंग ठीक नहीं बैठ रही। सो बाबा किसी न किसी बहाने राज को अपना असर दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। पहले तो सांगानेर वाले पंडितजी की आड़ में बाबा ने अपना चमत्कार दिखाया, तो साल के आखरी दिन शनि के बहाने से पूरा दोष ही कर दिया। अब राज करने वालों को कौन समझाए कि जब तक सांगा बाबा के खीर-पुए का भोग नहीं लगाओगे, तब तक उनकी नजरें टेड़ी ही रहेगी।</p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jul 2024 12:58:51 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में पिछले दिनों राज के दो रत्नों के बीच जो कुछ हुआ, वह जगजाहिर है। एक रत्न खेतीबाड़ी देखते हैं, तो दूसरे वाले रत्न पंचायती करते हैं। दोनों ही खुद को पावर सेंटर से कम नहीं मानते।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-83284"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>यह तो होना ही था</strong><br />सूबे में पिछले दिनों राज के दो रत्नों के बीच जो कुछ हुआ, वह जगजाहिर है। एक रत्न खेतीबाड़ी देखते हैं, तो दूसरे वाले रत्न पंचायती करते हैं। दोनों ही खुद को पावर सेंटर से कम नहीं मानते। और तो और दोनों एक-दूसरे के मामलों में टांग फंसाई को कतई बर्दास्त भी नहीं करते। गुजरे जमाने में बाबोसा के राज में भी खुरापात किए बिना चैन से नहीं बैठे। दोनों की मूंछ की लड़ाई में इनका तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन राज का काज करने वालों की नींद जरूर उड़ गई। वो तो भला हो, अटारी वाले पंडितजी का, जिन्होंने मामले की गंभीरता को समझकर सुलटा दिया, वरना बलि का बकरा बेचारे साहब लोगों को ही बनाते। चूंकि राज के रत्न कभी भी गलती नहीं करते। अब बलि का बकरा कौन बनता, यह तो समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>सुनारी रार</strong><br />इन दिनों सचिवालय के गलियारों में सुनारी रार को लेकर काफी चर्चाएं हैं। हो भी क्यों ना, मामला राज का काज करने वाले कारिन्दों से ताल्लुक जो रखता है। राज का काज करने वाले दो साहबों को आए दिन डांट का सामना करना पड़ता है। इनमें से एक साहब एक बड़े जिले के कलेक्टर हैं, तो दूसरे साहब सचिवालय में दूसरी मंजिल पर बड़ी कुर्सी पर बैठते हैं। दोनों को पिछले दिनों राज के मुखिया ने कई बार लाल आंखें दिखाई तो दूसरे कई साहब लोगों तक के पसीने छूट गए। कहने वाले तो पता नहीं क्या-क्या कहते हैं, पर सौ टका सच यह है कि यह राज और काज करने वालों के बीच सुनारी रार है। जो सबसे ज्यादा प्यारा होता है, डांट भी सबसे ज्यादा उसी को पिलाई जाती है।</p>
<p><strong>नहीं खुली गांठ</strong><br />भारती भवन में पिछले कुछ दिनों से चर्चा और चिंतन जारी है। भाईसाहबों की आंखें गुस्से से लाल होने के साथ ही उनके चेहरों पर चिंता की लकीरें भी साफ दिखाई दे रही हैं। गुस्सा इस बात का है कि उन्हीं के संघनिष्ठ कुछ साथियों ने मंत्रोचार के बीच सौगंध खाने के बाद भी पाला पलट लिया। उनको चिंता इस बात की सता रही है कि एक साल बाद भी संगठन महामंत्री को लेकर सहमति नहीं बन पाई। भारती भवन वालों के गुस्से और चिंता का असर कमल वालों के ठिकाने पर भी दिखाई देने लगा है। राज का  काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि भाई साहबों के मन की गांठ नहीं खुली, भाईसाहबों के दिन में देखे सपनों को पूरा करना मुश्किल नजर आ रहा है।</p>
<p><strong>निष्ठा परिवर्तन</strong><br />निष्ठा तो निष्ठा ही होती है, वह कब और कहां तथा किसके प्रति बदल जाएं, कुछ नहीं कहा जा सकता। अब देखो ना राज में कुर्सी मिलने से पहले कई भाई लोगों ने मैडम के प्रति पूरी निष्ठा दिखाई थी। और तो और कई देवी- देवताओं को साक्षी मानकर मरते दम तक निष्ठा निभाने तक की सौगंध भी खाई। दिन-रात मैडम के गुण गान भी किए, मगर जीते तो निष्ठा बदलने में एक पल भी नहीं लगाया। गिरगिट की तरह रंग बदल कर मैडम से नमस्ते तक करने से परहेज करने लगे। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि  पिछले दिनों दिल्ली दरबार की जंग के लिए नामों के ऐलान के बाद से ही कइयों ने अलविदा कर लिया था। एक ने तो गुजरात वाले भाईसाहब से रिश्तेदारी की दुहाई दी, तो दूसरे ने कहीं और निशाना लगा दिया। तीसरे ने लाल बत्ती की चाहत में खुद का शाखाओं से पुराना रिश्ता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।</p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jul 2024 10:35:26 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों फटकार चंद की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों ना, फटकार चंद जी सामने वालों को फटकार लगाने में कोई कसर जो नहीं छोड़ रहे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-77805"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में फटकार चंद </strong><br />सूबे में इन दिनों फटकार चंद की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों ना, फटकार चंद जी सामने वालों को फटकार लगाने में कोई कसर जो नहीं छोड़ रहे। हाथ वाली पार्टी से ताल्लुक रखने वाले फटकार चंद की चर्चा सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर भी हुए बिना नहीं रहती। राज का काज करने वालों में भी चर्चा है कि शेखावाटी के लक्ष्मणगढ़ की धरती पर जन्मे फटकार चंद जी न तो जगह देखते हैं और न ही समय। जब भी मूड होता है, मंच पर भी तोलिया लहरा कर फटकार लगाना चालू कर देते हैं। पहले तो सामने वाले भाई लोग उनको हल्के में ही लेते थे, लेकिन पांच महीने पहले सूबे के राज के लिए हुई जंग के बाद गंभीरता से लेने लगे हैं। चर्चा है कि जिस तरह फटकार चंद की चाल-ढाल बदली है, तब से कइयों की नींद उड़ी हुई हैं। भाईसाहब भी कम नहीं हैं, लीलण की आड़ में ठुमका लगा कर कम से कम दस सीटों का दावा कर अपना काम करके रवाना हो जाते हैं।</p>
<p><strong>नजर अपनों की तरफ</strong><br />भगवा वाले एक खेमे के लोग इन दिनों दुविधा में फंसे हुए हैं। उनको समझ में नहीं आ रहा कि उनकी तीखी नजरें किस तरफ रखी जाए। भगवा वालों के ठिकाने पर आने वालों में खुसरफुसर है कि इस खेमे को लोगों को हाथ वालों से नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के लोगों से खतरा ज्यादा दिखता है। लोगों को दिखाने के नाम पर वैसे तो वे राज के खास नजदीक हैं, लेकिन हकीकत उसकी उलटी है। आज के जमाने के हरकारे जब भी अपनी पर आते हैं, तो भाई लोगों का शक अपने ही लोगों की तरफ जाता है। अनजान डर से डरे हुए इन भाई लोगों को कौन समझाए कि राजनीति में जो होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है। </p>
<p><strong>परेशान लेजी ब्यूरोक्रेट्स</strong><br />सूबे में बड़े साहब की वर्किंग स्टाइल से कई लेजी ब्यूरोक्रेट्स परेशान हैं। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। वे न तो ठीक से खा पा रहे हैं और न ही पी पा रहे हैं। साहब भी कम नहीं है, जब से बड़ी कुर्सी संभाली है, तब से कोई ना कोई फरमान जारी करने में न तो आगा सोचते है और नहीं पीछा। औचक इंस्पेक्शन तक तो बात ठीक थी, लेकिन अब रिपोर्ट कार्ड बनाना दूसरे साहब लोगों के गले नहीं उतर रहा। जिनका रिपोर्ट कार्ड ग्रीन है, वो तो साहब के गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, लेकिन रेड कार्ड वाले एट पीएम बाद पानी पी पीकर कोस रहे हैं। अब साहब लोगों को कौन समझाए कि 57 साल पहले वैलेंटाइन डे को लखनऊ की धरा पर जन्मे भाईसाहब ने ऐसे ही धौले थोड़े ही लिए हैं, उनको राज का काज करने वालों का नस-नस का पता है, सो काम कर रिजल्ट देने में भलाई है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि चापलूस और वफादारों को लेकर है। जुमला है कि जब भी कोई बड़ा आदमी बन कर राज में बड़ी कुर्सी पर बैठता है, तो उनको चापलूस पूरी तरह अपने घेरे में लेने की कोशिश करते हैं और वे सफल भी हो जाते हैं। सालों से वफादारी निभाने वाले लोग चापलूसों की भीड़ में बड़े आदमी को भी दिखाई नहीं देते। इन दिनों दोनों बड़े दलों में पार्टी के हार्ड कोर वर्कर्स भी इस दौर से गुजर रहे हैं। अब इन बड़े लोगों को कौन समझाए कि राजघराने हो, या चाहे लोक शाही हो, चापलूसों ने वफादारों को निपटाया है। अब इसे समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong><br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 May 2024 13:06:44 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली दरबार के लिए हो रही जंग के नतीजों को लेकर दोनों बड़े दलों के ठिकानों पर चर्चा जोरों पर हैं। नेता अपनी-अपनी गणित के हिसाब से दावें करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-76928"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>गणित अपना-अपना</strong><br />दिल्ली दरबार के लिए हो रही जंग के नतीजों को लेकर दोनों बड़े दलों के ठिकानों पर चर्चा जोरों पर हैं। नेता अपनी-अपनी गणित के हिसाब से दावें करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। ठिकानों पर हार्ड कोर वर्कर्स का एक गुट ऐसा भी है जो यह सब चुपचाप देख और सुन रहा है। वे नेताओं के बीच में बोलना भी मुनासिब नहीं समझते हैं। चूंकि उनको डांट-फटकार जो मिलती है। बेचारे चाय-पान की थड़ियों पर ही खुसर-फुसर करते हैं, लेकिन उससे पहले अगल-बगल में देखे बिना नहीं रहते। उनकी गणित नेताओं से अलग ही है। उनमें खुसर-फुसर है कि इस बार केवल दो ही गुट है। एक गुट वह है, जिसने सिर्फ नमोजी के नाम पर वोट डाला है, चाहे कंडीडेट कोई भी हो। दूसरा गुट वह जो नमोजी के खिलाफ है और उनसे नफरत करते हैं, जिसने उनके नाम से वोट नहीं डाला, चाहे कंडीडेट अपनी ही बिरादरी का क्यों ना हो।</p>
<p><strong>असर बृहस्पति का</strong><br />इन दिनों पंडितों के भी पौ-बारह हैं। जहां मन हो, वहीं पंचांग खोलकर बिना पूछे ही बताना शुरू कर देते हैं। न जगह देखते हैं और न ही समय। अब देखो ना, शुक्र को अपने परिचित की शोकसभा में पहुंचे पिंकसिटी वाले पंडित जी ने बिना आगा-पीछा सोचे ही आदत के अनुसार अपना मुंह खोलना शुरू दिया। आसपास बैठे कुछ लोगों ने भी उन्हें जोजरू के पेड़ पर चढ़ा दिया। पंडितजी कहना था कि दो मई से गुरु बृहस्पति बदला है तो अपना असर दिखाए बिना कोई कसर नहीं छोड़ेगा। जब-जब बृहस्पति केन्द्र में आता है तो पब्लिक नारों से नहीं विवेक से वोट देती है। बृहस्पति 1977 और 2004 के बाद ही 2024 में केन्द्र में आया है। बृहस्पति के असर से सब कुछ उल्टा पुलटा होता है, यानी कि जहां जीत दिखती है, वहां हार हो जाती है और जहां हार दिखती है, वहां जीत हो जाती है।</p>
<p><strong>लहर चली या थमी</strong><br />सूबे में दिल्ली दरबार के लिए वोटिंग के बाद ठाले बैठे भाई लोग कुछ न कुछ शगुफा छोड़े बिना नहीं रहते। शगुफा छोड़ने वाले भी दोनों तरफ के हार्डकोर वर्कर है। हर संडे से नया शगुफा शुरू होता है, जो शनि की रात तक चलता है। इस संडे को मोदी लहर को लेकर नया शगुफा आया। पीसीसी के ठिकानेदारों ने जोर-जोर से चिल्ला कर कहना शुरू कर दिया कि इस बार दूर-दूर तक मोदी लहर नहीं थी, पब्लिक केवल पार्टी औैर कंडीडेट को ढूंढ रही थी। इस बार भगवा वाली मैडम को यूज नहीं करना भी पब्लिक को अखर रहा था। शेखावाटी के साथ हाड़ोती और मेवाड़ में दस सीटों पर लहर बेअसर रही। भगवा वाले भाई लोगों को अभी भी मोदी लहर पर भरोसा है।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि तपन को लेकर है। जुमले की चर्चा सचिवालय के गलियारों में भी हुए बिना नहीं रहती। चर्चा करने वाले भी भगवा वाले भाई लोगों के एक खास गुट के लोग ज्यादा है और एक खास बंगले में उनका पग फेरा है, जिनका पांच महीनों से हाजमा खराब है। जुमला है कि सूबे में 30 जून के बाद भारी बदलाव होने की पोसिबिलिटी है। किसी न किसी पर गाज गिर सकती है, अगर सीटें कम हुई तो एनडीए में सूबे की भगवा वाली मैडम ट्रंप कार्ड हो सकती है। और तो और ब्यूरोक्रेसी भी रिचार्ज होगी। यानी की तपती रेत और तपते रेगिस्तान में सत्ता की तपन भी महसूस हुए बिना नहीं रहेगी। इस जुमले को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है। </p>
<p><strong>-एल एल शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं।)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 May 2024 11:08:11 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में संडे के दिन से मन और मजबूरी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। चर्चा भी पिंकसिटी से लेकर दिल्ली तक है। चर्चा भी क्यों ना हो, मामला मन और मजबूरी से ताल्लुक रखता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-72377"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में मन और मजबूरी</strong><br />सूबे में संडे के दिन से मन और मजबूरी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। चर्चा भी पिंकसिटी से लेकर दिल्ली तक है। चर्चा भी क्यों ना हो, मामला मन और मजबूरी से ताल्लुक रखता है। गुलाबीनगरी में बने हाथ और भगवा वाले दलों के ठिकानों पर वर्कर्स भी चटकारे ले रहे हैं। चर्चा है कि जिन किसान पुत्रों ने हाथ से हाथ छुड़ाकर भगवा धारण किया है, उनका वाकई हाथ वाले दल से मन भर गया या फिर कोई मजबूरी है। अब किसी की जुबान तो पकड़ी नहीं जा सकती, सो कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि बेचारों की ई एंड डी के अदृश्य डर से तीन महीनों से दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। चार-पांच नेताओं ने तो शांति के लिए धार्मिक यात्राएं भी कर ली, लेकिन पार नहीं पड़ी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि चौरासी के फेर में फंसे बेचारों के पास नए ठिकाने के लिए फंडिंग करने के साथ ही मन मसोस कर घुसने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं था। </p>
<p><strong>ऑल आर वन</strong><br />दिल्ली में बैठे गुजराती बंधुओं ने सूबे में इस बार जो लक्ष्मण रेखा खींची है, उससे नंबर का सिस्टम तो खत्म हो गया, मगर कइयों के समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। राज का काज करने वालों बतियाते हैं कि इस बार आखिर सीएमओ में नंबर एक तो राजकुमारी और नंबर दो  प्रेम जी भाईसाहब है, परन्तु नंबर तीन कौन है। केबिनेट में भी नंबर तीन को लेकर काफी माथापच्ची हो रही है, वहां भी फिलहाल नंबर तीन कोई नहीं है। गुजरे जमाने में दौसा वाले मीनेश वंशज खुद को नंबर दो समझते थे, लेकिन इस बार छोटा भाई और मोटा भाई ने उनको वो ही घूघरा थमा दिया, जो वो बीस साल पहले बजा चुके थे। गुजरे जमाने में फूड वाले महकमे को संभाल चुके दौसा वाले भाईसाहब ने भी  डिप्टी सीएम तक सपना देखा था, लेकिन इस बार खेतों का विकास करने का जिम्मा मिला। अब हम बताय देते हैं कि अब नंबर का सिस्टम खत्म, दिल्ली में बैठे भाईसाहबों ने मैसेज दे दिया कि आॅल आर वन। इसको समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं। </p>
<p><strong>यह भी खूब रही</strong><br />पिछले दिनों राज के एक रत्न के साथ जो कुछ हुआ, उसकी कतई उम्मीद नहीं थी। रत्न भी झीलों की नगरी वाले संभाग से ताल्लुक रखते हैं और उन पर सूबे की जनता की जमीनों का बंदोबस्त का जिम्मा है। अपने ही महकमे की मोहतरमा से परेशान कर्क राशि वाले रत्न ओटीएस में अपनी मंशा पूरी करने के लिए फरियाद लगाई तो, वह पूरी होने के बजाय गले पड़ गई। पहले तो राज ने अफसरों की कमी की दुहाई देते हुए समझाया कि मिल बैठकर काम चलाओ, मगर रत्न पर सलाह बेअसर रही और लाल आंख दिखाई तो, खाली कागज थमा कर राज ने जो कहा, उसको सुनकर रत्न के पास उल्टे पैर दौड़ लगाने के सिवाय कोई चारा ही नहीं बचा था। </p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि देवनारायण और वीर तेजाजी के वंशजों के नेताओं से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि इन दिनों सादुलपुर, हिंडोली, बायतु और लाडनूं के नेताओं की आंखें कुछ ज्यादा ही लाल हैं। रात में आंखें लाल हो तो समझ में आता है, लेकिन दिन में होना समझ के बाहर है। इनकी लाल आंखें होने की सूचना दिल्ली तक भी पहुंच गई है। हमने भी लाल आंखों को लेकर सूंघासांघी की तो पता चला कि पिछले दिनों राज का काज करने वाले इन वंशजों के साहबों को टारगेट कर ऐसी कुर्सियां थमा दी, जिनके बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। <br /><br /></p>
<p><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Mar 2024 10:19:28 +0530</pubDate>
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                <title>जाने राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[रंगीलो राजस्थान के नाम से पहचान बनाने वाले मरु प्रदेश की राजनीति भी काफी रंगीली है। सूबे के नवरत्न तक रंग और रैलियों के लिए सुर्खियों में हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-governance/article-67782"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>रंगीली पॉलिटिक्स</strong><br />रंगीलो राजस्थान के नाम से पहचान बनाने वाले मरु प्रदेश की राजनीति भी काफी रंगीली है। सूबे के नवरत्न तक रंग और रैलियों के लिए सुर्खियों में हैं। नवरत्नों के लिए तो माहौल रंगीन है, पर घर बैठे हाथ वाले कई नेताओं के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। पीसीसी के ठिकाने पर चर्चा है कि चौका बनाने वाले बाबू भाई पंजा लगाने की तैयारी में थे, लेकिन रंगीला मिजाज आड़े आ गया। अब देखो ना, रंगीली पॉलिटिक्स के चलते हाथ वाले भाई लोगों की श्योर सीट के लिए नए नेता की तलाश के लिए पसीने बहाने पड़ेंगे। सीमावर्ती जिले  के विकल्प के रूप में बाड़मेर वाले मेवा को देखा जाता था, मगर वह भी रंगीली पॉलिटिक्स के लपेटे में है। भीलवाड़ा वाले राम के लाल पहले ही चर्चा में रह चुके हैं। चर्चा तो यहां तक है कि कई भाई लोग गुजरे जमाने की यादें ताजा कर दुबले होते जा रहे हैं। </p>
<p><strong>किलों की हुई तबीयत नासाज</strong><br />हाथ पार्टी की दशा देखकर कई किलों और खण्डहरों की तबीयत नासाज है। पुराने साथी जो अलग होते जा रहे हैं। कुछ को अलग कर दिया गया और कुछ खुद ही अलग हो गए। लक्ष्मणगढ़ वाले वकील साहब के कथन के बाद तो बाकी बचे किलों और खण्डहरों के पास कोई जवाब नहीं है। वानप्रस्थ आश्रम में पहुंच चुके इन किलों के आदेशों की किसी को परवाह भी नहीं है। राजस्थान में तो उनकी दशा और भी बुरी है। एक महीने से बार-बार आंख दिखा रहे किलों को समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या किया जाए। सो, सोच लिया कि बहुमत और जनमत को जानने के बाद कुछ नहीं कहना। बचे-खुचे दिनों को आराम से काटना है। दूसरी के बाद तीसरी पीढ़ी का मिजाज कुछ अलग ही है।</p>
<p><strong>कृपा देवी मां की</strong><br />देवी मां की जिस पर कृपा हो जाए, उसकी बल्ले-बल्ले है। भगवा पार्टी वाले भाईसाहब पर देवी की कृपा है। उसकी वजह से अच्छे-अच्छों की बोलती बंद है। एक महीने से हालात ज्यों के त्यों हैं। न तिल घटे, न राई बढ़े। लाख कोशिशों के बाद भी नवरत्नों में जगह नहीं मिलने वाले भी समझ नहीं पा रहे कि क्या रास्ता निकालें? निर्णय पर अमल कराना कोई बच्चों का खेल नहीं। दिल्ली दरबार के चुनावों की आड़ ने कइयों को नई मुसीबत में डाल दिया। निर्णय पर अमल नहीं होने से उन पर भी संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं। अब भाई लोग उन्हें भी किसी देवी की शरण में जाने की सलाह देने लगे हैं।</p>
<p><strong>अब आया खयाल </strong><br />कहावत है कि सांप निकलने के बाद लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन हमारे पूर्व विधायकों को इस पर कतई विश्वास नहीं है। पांच साल तक सत्ता का सुख भोगते समय तो सूबे की प्रगति के बारे में सोचने का वक्त नहीं मिला। अब प्रगति के बारे में गहन चिन्तन मंथन हो रहा है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। एक मंच पर आकर जोरदार चिन्ता जता रहे हैं। चिन्तन के लिए अधिवेशन तक बुलाने की तैयारी कर रहे हैं। उसका भी बढ़-चढ़कर ढिंढोरा पीटा जा रहा है। राज का काज करने वाले भी कम नहीं हैं, वो भी चटकारे लेने से नहीं चूक रहे। बोल रहे हैं कि रही-सही कसर और पूरी करने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है।<br /><br /></p>
<p><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jan 2024 09:59:22 +0530</pubDate>
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