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                <title>energy efficiency - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>energy efficiency RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सीईईडब्ल्यू रिपोर्ट में खुलासा: स्वच्छ ऊर्जा की नई लहर, दिल्ली और तमिलनाडु में 17% घरों में ई-कुकिंग</title>
                                    <description><![CDATA[एक नए अध्ययन के अनुसार, भारत में इलेक्ट्रिक कुकिंग का चलन बढ़ रहा है। दिल्ली और तमिलनाडु के 17% परिवार इंडक्शन और माइक्रोवेव अपनाकर शीर्ष पर हैं। एलपीजी की बढ़ती कीमतों के बीच ई-कुकिंग एक सस्ता और आधुनिक विकल्प बनकर उभरा है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी इसका विस्तार होना बाकी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/ceew-report-reveals-new-wave-of-clean-energy-e-cooking-in/article-146316"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/inden.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। भारत में स्वच्छ ऊर्जा और रसोई के आधुनिकीकरण को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन के अनुसार, देश के कई राज्यों में इलेक्ट्रिक कुकिंग (ई-कुकिंग) के प्रति रुझान तेजी से बढ़ा है। इस सूची में दिल्ली और तमिलनाडु सबसे ऊपर हैं, जहां तकनीक और जागरूकता के कारण परिवारों ने पारंपरिक ईंधनों के विकल्प के रूप में बिजली से चलने वाले उपकरणों को अपनाया है।</p>
<p>प्रमुख राज्यों का प्रदर्शन: अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली और तमिलनाडु के लगभग 17 प्रतिशत परिवारों ने इंडक्शन कुकटाप, राइस कुकर और माइक्रोवेव ओवेन जैसे उपकरणों को अपनी रसोई का हिस्सा बनाया है। इसके बाद तेलंगाना का नंबर आता है, जहां 15 प्रतिशत परिवार ई-कुकिंग का उपयोग कर रहे हैं। वहीं, केरल और असम में यह दर 12 प्रतिशत दर्ज की गई है।</p>
<p><strong>शहरी बनाम ग्रामीण अंतर</strong></p>
<p>ई-कुकिंग को अपनाने के मामले में शहरी और ग्रामीण भारत के बीच एक बड़ा अंतर स्पष्ट नजर आता है-<br /><strong>शहरी क्षेत्र : </strong>यहां ई-कुकिंग का विस्तार 10.3 प्रतिशत है।<br /><strong>ग्रामीण क्षेत्र : </strong>ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा महज 2.7 प्रतिशत पर सिमटा हुआ है।<br /><strong>राष्ट्रीय औसत : </strong>यदि पूरे देश की बात करें, तो अब तक केवल पांच प्रतिशत परिवारों ने ही ई-कुकिंग को पूरी तरह या आंशिक रूप से अपनाया है।<br /><strong>किफायती विकल्प : </strong>बिजली बनाम एलपीजी<br /><strong>ई-कुकिंग एक सस्ता विकल्प:</strong> सीईईडब्ल्यू का अध्ययन एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू की ओर भी इशारा करता है। वर्तमान में एलपीजी सिलिंडरों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए, ई-कुकिंग एक सस्ता विकल्प साबित हो सकता है। विशेष रूप से उन परिवारों के लिए जिन्हें सब्सिडी आधारित बिजली मिलती है, बिजली पर खाना बनाना गैस की तुलना में अधिक किफायती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शहरी भारत में ई-कुकिंग अपनी जगह बना रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहुंच बढ़ाने के लिए ग्रामीण बुनियादी ढांचे और बिजली आपूर्ति में सुधार की आवश्यकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 11:15:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पेट्रोलियम उत्पादों के संरक्षण को जन जागरूकता अभियान, स्कूली बच्चों ने तेल और गैस संरक्षण के नारे लिखे गुब्बारे भी आसमान में छोड़े</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर में सक्षम-2026 जागरूकता अभियान के तहत संरक्षण क्षमता महोत्सव आयोजित हुआ। तेल-गैस बचाओ, हरित ऊर्जा अपनाओ विषय पर बच्चों व जनता को ऊर्जा संरक्षण का संदेश दिया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/public-awareness-campaign-on-conservation-of-petroleum-products/article-141756"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(1200-x-600-px)-(8).png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पेट्रोलियम उत्पादों के संरक्षण को बेहतर जागरूकता के लिए तंल कंपनियों के संयुक्त तत्वाधान में एक फरवरी से शुरू किए गए जग जागरूकता अभियान सक्षम-2026 के तहत सोमवार को नारायण सिंह सर्किल स्थित जैन नसियां के तोतुका सभागार में संरक्षण क्षमता महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें तेल और गैस बचाओं, हरित ऊर्जा अपनाओं की थीम पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। </p>
<p>इस मौके पर यहां इंडियन आयल कारपोरेशन लिमिटेड के राज्यस्तरीय समन्वयक एवं कार्यकारी निदेशक मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि जनता और विशेषकर बच्चें उपलब्ध ऊर्जा का कुशल और रूढिवादी तरीके से उपयोग करें। </p>
<p>बच्चों को पेट्रोलियम संरक्षण में प्रमुख भूमिका निभाने की अपील की। वर्तमान परिद्श्य में तेल और गैस संरक्षण की आवश्यकता और अपार संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि बेहतर उपयोग सेदेश में पेट्रोलियम उत्पादो की छीजत को रोका जा सकता है। खपत को कम किया जा सकता है। मनोज कुमार ने स्कूली बच्चों के संग तेल और गैस संरक्षण के नारे लिखे गुब्बारे भी आसमान में छोड़े।</p>
<p>उन्होंने जागरूकता को बच्चों की रैली भी हरी झंडी दिखाकर रवाना की। मुख्य महाप्रबन्धक गेल संजय चौहान ने ऊर्जा संरक्षण की अहमियत को बताया। कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों के वर्तमान परिदृश्य पर भी जानकारी साझा की। बीपीसीएल के उप महाप्रबंधक गौरव शर्मा ने सक्षम-2026 में तेल और गैस संरक्षण के लिए सभी को शपथ दिलाई। अंत में एचपीसीएल के मुख्य महाप्रबन्धक केपी सतीश कुमार ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 12:27:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऊर्जा दक्षता नई शक्ति का मंत्र</title>
                                    <description><![CDATA[भारत आज उस दहलीज पर खड़ा है, जहां ऊर्जा की आवश्यकता केवल विकास की गति को बनाए रखने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन की कुंजी बन चुकी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/energy-efficiency-mantra-of-new-power/article-115825"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtroer54.png" alt=""></a><br /><p>भारत आज उस दहलीज पर खड़ा है, जहां ऊर्जा की आवश्यकता केवल विकास की गति को बनाए रखने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन की कुंजी बन चुकी है। बीते दो दशकों में देश ने बिजली उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में, किंतु इसके बावजूद वह अपनी चरम बिजली मांग को पूरा नहीं कर पा रहा। गर्मियों में बढ़ती बिजली की खपत, शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव ने मांग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है, जबकि आपूर्ति प्रणाली अब भी पारंपरिक ढांचे में जकड़ी हुई है। ऐसे में केवल उत्पादन बढ़ाना ही समाधान नहीं, बल्कि ऊर्जा की दक्ष खपत को प्राथमिकता देना समय की मांग है। भारत में बीते दो दशकों में बिजली उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी में वृद्धि और उत्पादन क्षमताओं के विस्तार के बावजूद, देश अब भी अपनी पीक पावर डिमांड को पूरा करने में असमर्थ दिखाई देता है।</p>
<p> वर्ष 2020 में जहां बिजली की मांग और आपूर्ति में केवल 0.69प्रतिशत की कमी थी, वहीं वित्तीय वर्ष 2024 तक यह अंतर बढ़कर लगभग 5प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा नीति, अवसंरचनात्मक सीमाओं और बढ़ती उपभोक्ता आवश्यकताओं की जटिलता को दर्शाता है। ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया, विशेष रूप से जब वह जीवाश्म ईंधन पर आधारित हो, समयसाध्य और पूंजी-सघन होती है। भारत भले ही नवीकरणीय ऊर्जा को ऊर्जा मिश्रण में समाहित करने की दिशा में प्रयासरत हो, परंतु ऊर्जा ग्रिड में इन स्रोतों के एकीकरण में तकनीकी व संस्थागत बाधाएं स्पष्ट रूप से दिखती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, ऊर्जा दक्षता का महत्व और भी बढ़ जाता है।</p>
<p>ऊर्जा दक्षता वह उपाय है जो न केवल ऊर्जा की खपत को घटाता है, बल्कि कम लागत में अधिक ऊर्जा सेवा प्रदान करके देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों की रक्षा करता है। वर्तमान समय में भारत को ऊर्जा मांग और जलवायु संकट की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस दिशा में भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015 में शुरू की गई उजाला योजना को एक मील का पत्थर कहा जा सकता है। उजाला योजना के अंतर्गत अब तक 37 करोड़ एलईडी बल्ब वितरित किए जा चुके हैं और 407 करोड़ बल्बों की बिक्री की सुविधा प्रदान की गई है। इन बल्बों के माध्यम से न केवल खपत घटती है, बल्कि बिजली की मांग में भी 1500 मेगावॉट की कमी लाई गई है। यह योजना मात्र एक उपभोक्ता योजना नहीं थी, बल्कि इसमें सार्वजनिक ऊर्जा दक्षता के सिद्धांतों को भी समाहित किया गया। </p>
<p>स्ट्रीट लाइटिंग नेशनल प्रोग्राम के अंतर्गत देशभर के नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों में 1.34 करोड़ से अधिक एलईडी स्ट्रीट लाइटें लगाई गईं, जिससे नगरों की विद्युत मांग में उल्लेखनीय कमी आई। एलईडी बल्ब, परंपरागत बल्बों की तुलना में लगभग 90प्रतिशत कम बिजली का उपभोग करते हैं और कॉम्पैक्ट फ्लोरेसेंट लैंप्स की तुलना में भी लगभग आधी ऊर्जा में कार्य करते हैं। इससे उपभोक्ताओं के लिए दीर्घकालिक लागत बचत भी सुनिश्चित हुई है। ऊर्जा दक्षता की सफलता को केवल खपत घटाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता।</p>
<p>भारतीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, उजाला योजना से देश को 10 बिलियन से अधिक की बचत हुई है और इसके परिणामस्वरूप 9500 मेगावॉट नई उत्पादन क्षमता की आवश्यकता नहीं पड़ी, जो कि 19 नए कोयला आधारित 500 मेगावॉट संयंत्रों के बराबर है। इससे स्पष्ट होता है कि मांग पक्ष की प्रबंधन नीति, उत्पादन पक्ष की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और टिकाऊ हो सकती है, बशर्ते इसे समुचित नीति समर्थन प्राप्त हो। भारत में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 लागू होने के बाद से अनेक ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार 2000 से 2018 के बीच ऊर्जा दक्षता उपायों के कारण भारत ने अतिरिक्त ऊर्जा मांग से बचाव किया और 300 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका। यह उपलब्धि उस स्थिति में आई है, जब देश में शहरीकरण तेजी से बढ़ा है और गर्मियों में कूलिंग की मांग ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है। बीते वर्ष भारत की पीक डिमांड 250 गीगावॉट तक पहुंच गई, जो बताता है कि ऊर्जा की मांग अब केवल औद्योगिक इकाइयों तक सीमित नहीं रही, बल्कि घर-घर तक विस्तारित हो गई है।</p>
<p>आज भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा विद्युत उपभोक्ता है, चीन और अमेरिका के बाद। कोयले पर निर्भरता के कारण पर्यावरणीय दुष्परिणाम, जैसे प्रदूषण, तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और भी गंभीर हो जाती है। भारत ने 2032 तक 90 गीगावॉट नई कोयला आधारित उत्पादन क्षमता जोड़ने की योजना बनाई है, जो कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों से विपरीत दिशा में प्रतीत होती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि ऊर्जा दक्षता को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य नीति के रूप में देखा जाए। इसके लिए बहु-स्तरीय और बहु-क्षेत्रीय रणनीतियों की आवश्यकता होगी। सबसे पहले, भवन निर्माण क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता को अनिवार्य बनाना आवश्यक है।</p>
<p><strong>-नृपेन्द्र अभिषेक नृप</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 May 2025 11:49:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तापीय ऊर्जा संयंत्रों की ऊर्जा दक्षता बढ़ाना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[पूरी दुनिया में सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना जरूरी है। लेकिन वर्तमान में मनुष्यों की अधिकांश ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में जीवाश्म ईंधनों और खास तौर से कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/it-is-necessary-to-increase-the-energy-efficiency-of-thermal/article-70927"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/photo-(1)27.png" alt=""></a><br /><p>पूरी दुनिया में सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना जरूरी है। लेकिन वर्तमान में मनुष्यों की अधिकांश ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में जीवाश्म ईंधनों और खास तौर से कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका है। साल 2022 में, दुनिया भर में जितनी ऊर्जा की खपत हुई, उसका लगभग 82 प्रतिशत जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त हुआ। इसमें कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस शामिल हैं। जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत कोयला है, जिसका हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत है। इसके बाद तेल का हिस्सा लगभग 32 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल विद्युत, से प्राप्त ऊर्जा का हिस्सा लगभग 18 प्रतिशत था। जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योग में किया जाता है। जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त ऊर्जा के उपयोग से वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं होती हैं। इसलिएए दुनियाभर में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। 2022-23 में, भारत की कुल ऊर्जा खपत में जीवाश्म ईंधनों की भागीदारी लगभग 74.3 प्रतिशत थी। इसमें कोयले की हिस्सेदारी 51.1 प्रतिशत, तेल की हिस्सेदारी 20.2 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 3.0 प्रतिशत थी। जबकि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की भागीदारी लगभग 25ण्7 प्रतिशत थी। इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 8.4 प्रतिशत, पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी 5.7 प्रतिशत, जल विद्युत की हिस्सेदारी 10.6 प्रतिशत और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 0.8 प्रतिशत थी। जीवाश्म ईंधनों की भारत की ऊर्जा खपत में उच्च भागीदारी का कारण हैं कि भारत एक विकासशील देश है और इसकी ऊर्जा आवश्यकताएं लगातार बढ़ रही हैं। जीवाश्म ईंधन सस्ते और उपलब्ध हैं। इसके अलावा भारत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास अभी भी प्रारंभिक चरण में है। ऐसे में सतत विकास के लक्ष्यों और ऊर्जा उपभोग के बीच एक संतुलन बैठाना बहुत आवश्यक है। जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करके ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए हमें दो मुख्य चीजों पर ध्यान देना होगा। पहला, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास और दूसरा, ऊर्जा दक्षता में सुधार। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत और भूतापीय ऊर्जा आदि का उपयोग करके हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इन ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन जीवाश्म ईंधनों की तुलना में पर्यावरण के अधिक अनुकूल होता है और इनसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी नहीं होता। ऊर्जा दक्षता में सुधार करके हम ऊर्जा जरूरतों को कम कर सकते हैं। ऊर्जा दक्षता का मतलब है कि हम कम ऊर्जा का उपयोग करके अधिक कार्य कर सकें। इसके लिए हमें ऊर्जा कुशल उपकरणों का उपयोग करना चाहिए, ऊर्जा की बर्बादी को रोकना चाहिए और ऊर्जा संरक्षण के उपाय करने चाहिए।</p>
<p>भारत भी अपने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए प्रयास कर रहा है। भारत ने वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए नेट जीरो विकास लक्ष्य निर्धारित किया है। लेकिन भारत के लिए कोयले को सतत विकास से बाहर रखना आसान नहीं है, क्योंकि भारत एक विकासशील देश है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कोयले पर काफी हद तक निर्भर है। भारत की आबादी तेजी से बढ़ रही है और अर्थव्यवस्था भी बढ़ रही है। इससे भारत की ऊर्जा जरूरतों में भी वृद्धि हो रही है। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा आदि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में कुछ सीमाएं हैं। इन स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा अस्थिर होती है और इनका भंडारण करना भी मुश्किल होता है। इसके अलावा, इन स्रोतों को विकसित करने और संचालित करने की लागत भी अधिक होती है। भारत में कोयले की उपलब्धता पर्याप्त है। भारत के पास विश्व का चौथा सबसे बड़ा कोयला भंडार हैं। भारत में जो तापीय ऊर्जा संयंत्र (थर्मल पावर प्लांट) हैं, इनको भारत के घरेलू खदानों से ही 96 प्रतिशत कोयले की प्राप्ति हो जाती है और इसलिए भारत में कोयले की कीमत कम है। इसी कारण भारत में ऊर्जा की कीमतें भी काफी कम रहती हैं। भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन का लगभग 74.3 प्रतिशत थर्मल पावर प्लांट से पूरा होता है, जो मुख्य रूप से कोयला आधारित है। भारत की बिजली आपूर्ति करने के साथ-साथ, इसके अवसंरचनात्मक विकास में भी कोयला महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस्पात का क्षेत्र हो, सीमेंट का क्षेत्र हो या एल्युमिनियम का, इन सभी के विकास में कोयले का महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे में जब तक भारत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत इतने विकसित नहीं हो जाते कि वे भारत की बढ़ती हुई ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा कर सकें, तब तक भारत कोयले का उपयोग करना बंद नहीं कर सकता। इसलिए भारत को अपने नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास पर तो ध्यान देना ही चाहिए, लेकिन साथ ही उसे अपने थर्मल पावर प्लांट की दक्षता में भी सुधार करना होगा। भारत के थर्मल पावर प्लांट की दक्षता बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। भारत में कोयले का जो उत्पादन होता है, उसमें राख की मात्रा अधिक होती है। <br />               </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 Feb 2024 12:39:57 +0530</pubDate>
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