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                <title>government system - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>कही घी घणां कही न मुट्ठीभर चणा: गोरधनपुरा में 4 बच्चों को पढ़ा रहे 6 शिक्षक, गौणदी में 2 बच्चों पर दो शिक्षक </title>
                                    <description><![CDATA[शिक्षकों की कमी से अध्यापन बाधित। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/somewhere-there-is-a-lot-of-ghee-and-somewhere-there-is-a-handful-of-chana/article-96227"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer-(2)18.png" alt=""></a><br /><p>इटावा। इटावा में सरकारी शिक्षा का सिस्टम भी अलग ही इटावा ब्लॉक में शिक्षा व्यवस्था के लिए हालात इस कदर है कि कही नामांकन है छात्रों का लेकिन शिक्षक नहीं है और कही नामांकन नहीं है, लेकिन फिर भी शिक्षक है। ऐसी स्थिति में इटावा क्षेत्र में सरकारी सिस्टम की खामी नजर आती है जो शिक्षा व्यवस्था की पोल को खोल रही है। कही जर्जर भवन में स्कूल चल रहे है, कही विद्यार्थी भी नहीं होने के बाद भी स्कूल बन रहे हैं। क्षेत्र में हाड़ौती की वह कहावत चरितार्थ हो रही है कि कही घी घणों कही न मुट्ठी भर चना वाली हो रही है। इटावा ब्लॉक में 199 प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और सीनियर सेकेंड्री स्कूल है। जिसमे 18773 बालक और बालिकाओं का नामांकन है और अध्ययन करती है। क्षेत्र के 199 स्कूलों में शिक्षकों के 1505 पद है जिसमे से 1223 कार्यरत है और 282 पद खाली चल रहे हैं। </p>
<p><strong>गोरधनपुरा में 4 बच्चों को पढ़ा रहे 6 शिक्षक</strong><br />इटावा ब्लॉक के खातौली ग्राम पंचायत के गोरधनपुरा गांव में करीब 50- 60 घरों की बस्ती है, लेकिन गांव के सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय में सिर्फ 4 बच्चों का दाखिला है उनको पढ़ाने के लिए भी 6 शिक्षक कार्यरत है। यह स्थिति गोरधनपुरा की नहीं है, इस तरह के 17 विद्यालय है जिनमें बच्चों से ज्यादा शिक्षक हैं, तो कही बच्चे ही नहीं है, लेकिन स्कूल को खोलने के लिए ही शिक्षक है। </p>
<p><strong>इटावा उच्च प्राथमिक द्वितीय में नामांकन</strong><br />इटावा नगर के गेता रोड पर स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय द्वितीय में 285 बच्चों का नामांकन है । शिक्षा विभाग ने 14 पद स्वीकृत कर रखे लेकिन आधे पद खाली है। प्रधानाध्यापक  सहित 7 पद रिक्त है। ऐसे में विद्यालय में पढ़ाई  नहीं हो पाती जिसके चलते नामांकन बढ़ नहीं रहा। इटावा तरह राजकीय सीनियर विद्यालय इटावा में 1052 बच्चों का नामांकन है 44 पद स्वीकृत है लेकिन 30 ही नियुक्त है 14 पद रिक्त है। राजकीय सीनियर विद्यालय निमोला में 373 नामांकन है 17 पद स्वीकृत हैं लेकिन 10 ही कार्यरत हे 7 रिक्त है। यही स्थिति सीनियर विद्यालय पीपल्दा में 11 पद रिक्त है। इसी तरह  ढ़ीपरी चंबल, महात्मा गांधी करवाड़, सीनियर विद्यालय रामपुरिया धाबाई , बम्बुलियाकला,  डूंगरली विद्यालयों की है। इसके साथ संस्कृत विद्यालयों की भी यही स्थिति है जिसके चलते क्षेत्र में जहा नामांकन है वहां शिक्षकों की कमी होने के चलते पढ़ाई नहीं हो पा रही ।</p>
<p><strong>गौणदी में 2 बच्चों पर दो शिक्षक , डेढ़ दर्जन स्कूलों की यही हालत</strong><br />गणेशगंज ग्राम पंचायत की गौणदी राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में सिर्फ 2 शिक्षक हैं। वही पढ़ाने के लिए भी सरकार ने दो अध्यापक लगा रखे है। इसके अलावा पुराना भवन जर्जर होने के चलते नया भवन का निर्माण भी चल रहा है। विद्यालय के शिक्षक रामगोपाल मीना बताते है कि विद्यालय का भवन जर्जर है, वही इटावा नजदीक होने के कारण ज्यादातर बच्चे इटावा पढ़ने जाते है। इसलिए विद्यालय में नामांकन नहीं बढ़ पा रहा है। इसी तरह फरेरा में 2 बच्चों पर 1 शिक्षक है। शेरगंज में 2 बच्चों पर 2 शिक्षक है। हनुमानपुरा में 4 बच्चे, शहनाहली में 4 नामांकन, माधोनगर 5, जयनगर में 7, खेड़ली नोनेरा में 7, सब्जीपुरा में 7, मीना रोहिली 8, आरामपुरा में 9, बम्बुलिया खुर्द 9, किशनपुरा में 10,कोल्हूखेड़ा में 10 बच्चों के स्कूलों में नामांकन है। </p>
<p><strong>स्कूल में किसी भी बच्चे का दाखिला नहीं</strong><br />ब्लॉक के शहनावदा ग्राम पंचायत के कंवरपुरा और निमोला ग्राम पंचायत के शेरगढ़ स्कूल में किसी भी बच्चे का दाखिला नहीं है। नामांकन शून्य है लेकिन फिर भी शिक्षक लगा रखे है।</p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />क्षेत्र में 1505 पद शिक्षकों के स्वीकृत हैं, जिनमें 282 रिक्त है। 18773 बच्चों का 199 स्कूलों में नामांकन है। जिन विद्यालयों में नामांकन कम है वहां नियुक्त शिक्षकों को नामांकन बढ़ाने के लिए निर्देशित किया हुआ है। अगर ऐसे विद्यालयों में नामांकन नहीं  बढ़े तो भविष्य में मर्ज होंगे। जहां शिक्षक कम है वहां नोडल प्रभारी को व्यवस्थार्थ लगाने को लेकर भी निर्देशित किया हुआ है । वही सभी विषयों से उच्च अधिकारियों को अवगत करा रखा है। <br /><strong>- इंदु हाडा, मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी इटावा ब्लॉक</strong></p>
<p><strong>क्या कहते हैं ग्रामीणं</strong><br />गौणदी गांव करीब 100 घरों की बस्ती है, लेकिन इस गांव के स्कूल भवन की बिल्डिंग जर्जर हो गई थी, जिसके चलते ग्रामीण बच्चे नहीं भेजते। नवीन भवन का कार्य चल रहा है, जल्द ही पूर्ण हो जाएगा। वही इटावा नजदीक होने के कारण ग्रामीण निजी विद्यालय में भेज देते हैं। अभी गत दिनों ग्रामीणों की बैठक लेकर नामांकन बढ़ाने को लेकर भी चर्चा की थी। <br /><strong>- हेमंत बैरवा, सरपंच गणेशगंज</strong></p>
<p>पीपल्दा विद्यालय में  400 के करीब बच्चे हैं, लेकिन 23 पद शिक्षकों के स्वीकृत होने के बाद भी 12 ही कार्यरत है, 11 रिक्त है जिसके चलते विद्यालय में अध्ययन नहीं हो पाता। रिक्त पदों को भरा जाए ताकि बच्चों की पढ़ाई हो सके और निजी विद्यालय में नहीं जाना पड़े।<br /><strong>- नरोत्तम विकट, पीपल्दा ग्रामीण</strong></p>
<p>गोर्वधनपुरा करीब 60-70 घरों की बस्ती है, लेकिन यहां से खातौली नजदीक है, सरकारी स्कूल में पढ़ाई कम होती है। अध्यापक भी समय पर नहीं आते ऐसे में लोग बच्चों को स्कूल में नहीं भेजते। साथ स्कूल के अंदर बाउंड्री में जंगली पेड़ पौधे लगे हुए हैं । <br /><strong>- महेंद्र नागर ग्रामीण  गोवर्धनपुरा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Nov 2024 15:39:22 +0530</pubDate>
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                <title>यह मेरा इंडिया, इसलिए टूटती है सड़के....</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा समेत देश के किसी भी राज्य के शहरी क्षेत्र में जाने पर वहां बहुत कम सड़कें ऐसी मिलेंगी जो ठीक हों। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/this-is-my-india--that-s-why-roads-break/article-71453"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/transfer-(5)15.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। देश का कोई भी बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा शहर हो। वहां सड़कों का जाल तो बिछा दिया लेकिन हालत यह है कि सरकारी व्यवस्था ऐसी बनी है कि सड़कें न तो लम्बे समय तक चल पा रही हैं और न ही मजबूत बन रही है। जिससे हर साल सड़कों पर करोड़ों-अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी देश की सड़कें सुरक्षित नहीं है। यह हालात तब है जब भारत में भी ऐसी तकनीक है जिसके आधार पर सड़क निर्माण हो तो  25 साल तक टूटे ही नहीं।  विश्व में सिंगापुर स्पेन,मलेशिया जर्मनी ऐसे देश है जहां सड़कें सबसे मजबूत व टिकाऊ हैं। कोटा समेत देश के किसी भी राज्य के शहरी क्षेत्र में जाने पर वहां बहुत कम सड़कें ऐसी मिलेंगी जो ठीक हों। एक दो साल में ही सड़कें बिखर जाती हैं। फिर चाहे वह शहरी सड़क हो या हाइवे की। इससे दुर्घटनाओं का खतरा बना हुआ है। सड़क टूटने और फिर बनने का आखिर क्या है। नवज्योति ने जब इस मामले को देखा तो पूरा खेल सामने आ गया। पढ़िये विशेष रिपोर्ट हर साल बन रही सड़कें फिर भी टूटी हुई: देश के अधिकतर शहरों में हर साल सड़कें बनाई जा रही हैं। कोटा में भी पहले जहां सार्वजनिक निर्माण विभाग शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक की सडकें बनाता था। वहीं अब शहरी क्षेत्र में यह काम नगर विकास न्यास कर रहा है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय व राज्य मार्ग की सड़कें स्टेट हाइवे व एनएचआई करवा रहा है। कोटा समेत अधिकतम शहरों में हर साल सड़कें बनाई जा रही हैं। लेकिन उसके बाद भी सड़कों की हालत उतनी बेहतर नहीं है । </p>
<p><strong>देश में 5 से 10 साल सड़कों की लाइफ</strong><br />सड़क बनाने वाले विभागों का कहना है कि भारत में सड़कों की लाइफ 5 से 10 साल ही आंकी जाती है। डामर की सड़क 5 साल और सीसी रोड 10 साल के हिसाब से बनाई जा रही है। उसके बाद  सड़कें सुरक्षित  रहना बहुत मुश्किल है। जबकि डामर ही सड़कें भारत में तो हर साल बरसात में खराब हो रही है। सीसी रोड भी एक बार खोदने पर खराब हो रही हैं। </p>
<p><strong>25 साल तक रह सकती हैं सड़कें</strong><br />केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने गत दिनों एक साक्षात्कार में कहा था कि देश में ऐसी तकनीक है जिससे कम से कम 25 साल के लिए सड़कें बनाई जा सकती हैं। लेकिन अधिकारी और संवेदक नहीं बनने देना चाहते। पेचवर्क व मरम्मत के नााम पर और ओएण्डएम के नाम पर करोड़ों-अरबों का खेल होने से सड़कें बार-बार खराब हो रही हैं। </p>
<p><strong>उच्चतम सड़क गुणवत्ता सूचकांक</strong><br /><strong>देश                सड़कों की गुणवत्ता रैंक     वैश्विक रैंक    </strong><br />सिंगापुर                    6.5                      1<br />नीदरलैंड                    6.4                     2<br />स्विजरलैंड                 6.3                      3<br />हागकॉंग                    6.1                      4<br />जापान                      6.1                      5<br />भारत                        4.5                     46</p>
<p><strong>विभागों में समन्वय का अभाव</strong><br />कोटा जैसे शहर में आए दिन सड़कें टूटने का कारण विभागों में समन्वय का अभाव है। बिजली के तार, केबल, गैस पाइप लाइन और सीवरेज व नाली निर्माण समेत कई ऐसे काम हैं जो सड़क बनने से पहले होने चाहिए। लेकिन इन कामों से संबंधित विभागों में समंवय का अभाव होने से सड़क बनने के बाद कभी केबल के नाम पर तो कभी गैस लाइन के नाम  पर सड़कों को बार-बार खोदा जा रहा है। सड़क पहले बनाई जाती है फिर तोड़ी जाती है। ऐसे में पब्लिक का पैसा जाया होता है जब कि बनाने वाले और स्वीकृति देने वाले अपना खेल करते रहते हैं। <br /><strong>- रिटायर्ड़ इंजीनियर श्री कांत वषिष्ट </strong></p>
<p><strong>सड़क निर्माण यानी भ्रष्टाचार का खेल</strong><br /><strong>कमीशन का खेल </strong><br />जिस तरह से शहरों में विकास हो रहा है और वाहनों की गति बढ़ रही है। उसमें मजबूत व सुरक्षित सड़कें होना आवश्यक है। लेकिन सड़कें बनाने में कमीशन का खेल अधिक है। सड़कें बनाने में 5 से 40 फीसदी राशि तो कमीशन में ही बंट जाती है। ऊपर से नीचे तक चलने वाले कमीशन से बची 60 फीसदी राशि से सड़कें बनती है। ऐसे में कम बजट में बनने वाली सड़कें न तो मजबूत होंगी और न ही टिकाऊ। सड़कें बनने के बाद विभागों में तालमेल का अभाव होने से बची हुई कसर बार-बार सड़कों को खोदकर पूृरी की जा रही है। जिससे 5 साल की सड़क 1 साल भी नहीं चल पाती। जबकि विदेशों में कमीशन का नहीं सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। <br /><strong>- प्रमोद शर्मा एडवोकेट्र</strong></p>
<p><strong>संवेदकों के भरोसे बन रही सड़कें</strong><br />कोटा शहर हो या देश का कोई भी प्रदेश अधिकतर जगहों पर सड़क निर्माण के ठेके होते हैं। ठेकेदार कम टेंडर में ठेके ले लेते हैं। सरकारी व्यवस्था में कम टेंडर वाले को ठेका देने का प्रावधान है। ऐसे में अधिकारी ठेका देने के बाद संवेदक के भरोसे ही सड़क निर्माण छोड़ देते हैं। सड़क बनने के बाद बिल पास करने से पहले एक बार देखकर औपचारिकता करते हैं। जबकि इंजीनियरों की मौजूदगी में सड़क निर्माण होना चाहिए। ऐसे में मैटेरियल की क्वालिटी व क्वांटिटी सही नहीं होने से भी सड़कें समय से पहले खराब हो रही हैं।<br /><strong> - मोहित नागर, खेड़ली फाटक </strong></p>
<p><strong>कम बजट की सड़कें और तकनीक की कमी</strong><br />देश में अधिकतर डामर व सीसी रोड बनाए जा रहे हैं। डामर सड़क की लाइफ 5 साल व सीसी रोड की 10 साल मानी जाती है। देश में कम बजट की सड़कें बनाई जा रही हैं और वह भी कम से कम समय में पूरी करने का दबाव रहता है। जबकि जितनी अधिक बजट की सड़क होगी उतनी क्वालिटी की होगी। एक समय के बाद सड़कें खराब होती ही हैं। जबकि विदेशों में अधिक बजट की और हाई तकनीक से सड़कें बनाई जा रही हैं। वैसी तकनीक अभी देश के हर शहर में नहीं है।  <br /><strong>- सुनील गर्ग, संवेदक, पीडब्ल्यूडी</strong></p>
<p><strong>नियमित मेंटेनेंस की कमी</strong><br />सड़कों की एक निर्धारित लाइफ होती है। उस  समय सीमा के बाद सड़क खराब होने लगती है। यदि समय-समय पर सड़कों की मेंटेंनेंस व कारपेट होती रहे तो 5 साल के लिए बनने वाली सड़क 10 साल तक और 10 साल के लिए बनने वाली सड़क 15 से 20 साल भी चल सकती है। सड़क निर्माण से पहले ड्रेनेज सिस्टम सही होना चाहिए। यदि उसमें कमी रह गई तो उससे डामर सड़क में पानी भरने पर वह जल्दी खत्म हो जाती है।   सरकार भी हर साल सड़क निर्माण व मरम्मत पर इसीलिए खर्चा करतीे है लेकिन वह मेंटेन नहीं होने से भी सड़कें समय से पहले खराब हो जाती हैं।  <br /><strong>- धीरेन्द्र माथुर, रिटायर्ड मुख्य अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभाग </strong></p>
<p>देश में जिस तकनीक से सड़कें बन रही हैं उसमें डामर की लाइफ 5 साल और सीसी रोड की दस साल आंकी जाती है। उसके बाद समय-समय पर उनकी मेंटनेंस जरूरी हो जाती है। मेंटेनेंस व कारपेट से सड़कों की लाइफ को अधिक किया जा सकता है। लेकिन कई बार सड़कें बनने के बाद किसी ने किसी विभाग द्वारा उन्हें खोदने से भी उनकी मजबूती समय से पहले ही खत्म हो जाती है।  जबकि विदेशों में इस तरह की समस्या नहीं होने से वहां हो सकता है अधिक समय तक सड़कें  मेंटेन रहती होंगी। गारंटी पीरियड में संवेदक की और उसके बाद विभाग की जिम्मेदारी हो जाती है। मौसम की मार भी सड़कों को समय से पहले खराब कर देती है। <br /><strong> - आर.के. सोनी, अधीक्षण अभियंतासार्वजनिक निर्माण विभाग</strong> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Thu, 29 Feb 2024 17:26:41 +0530</pubDate>
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