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                <title>Women rights - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Women rights RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>नारी शक्ति वंदन अधिनियम से महिलाएं बनेंगी नीति निर्माता : दिया कुमारी</title>
                                    <description><![CDATA[उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने जयपुर में महिलाओं से संवाद कर नारी शक्ति वंदन अधिनियम को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के नेतृत्व में यह कानून महिलाओं को नीति निर्माण और नेतृत्व के बड़े अवसर देगा। दिया कुमारी ने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बताते हुए प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/nari-shakti-vandan-act-will-empower-women-to-become-policy/article-150280"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/diya-kumari.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने आज विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य कर रही महिलाओं से संवाद करते हुए “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह अधिनियम देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है और महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। संवाद के दौरान उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने मातृशक्ति के विचार, सुझाव और अनुभवों को जाना। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम के माध्यम से महिलाओं को एक बड़ा मंच मिलेगा, जिससे वे सीधे तौर पर लाभान्वित होंगी और नीति निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकेंगी।</p>
<p>उन्होंने कहा कि “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” महिलाओं को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में और अधिक सशक्त बनाएगा। यह बिल महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान करेगा और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार व अवसर दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पहले कई सरकारों ने वादे किए, लेकिन इस सपने को साकार करने का काम वर्तमान सरकार ने किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस कदम से देश में बड़ा बदलाव आएगा और महिलाएं हर क्षेत्र में नेतृत्व करती नजर आएंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 18:08:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रसोई गैस किल्लत पर कांग्रेस कल करेगी शहीद स्मारक पर धरना प्रदर्शन,  गोविन्द डोटासरा समेत ये नेता हाेंगे शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान में रसोई गैस की कमी और बढ़ती कीमतों के खिलाफ 27 मार्च को कांग्रेस शहीद स्मारक पर महाधरना देगी। पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा और टीकाराम जूली के नेतृत्व में पार्टी केंद्र व राज्य सरकार को घेरेगी। कांग्रेस ने महंगाई और आपूर्ति में लापरवाही को महिलाओं के लिए गंभीर संकट बताते हुए तत्काल राहत की मांग की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/congress-will-discuss-tomorrow-on-lpg-shortage/article-147923"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/congress.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। रसोई गैस किल्लत के मुद्दे पर राजस्थान कांग्रेस 27 मार्च को शहीद स्मारक पर धरना प्रदर्शन करेगी। प्रदर्शन में पीसीसी चीफ गोविन्द डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और अन्य प्रमुख नेता शामिल होंगे। पार्टी का कहना है कि केन्द्र और राज्य सरकार आम आदमी की समस्याओं को नजरअंदाज किया है।</p>
<p>खासकर महिलाओं के लिए यह समस्या गंभीर है, क्योंकि रसोई गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। सरकारी व्यवस्थाओं में लापरवाही से यह संकट राजस्थान की जनता पर महंगाई लाद रहा है। सरकार रसोई गैस की उचित आपूर्ति सुनिश्चित कर सिलेंडर की कीमतों में तत्काल राहत दे। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 10:49:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>राज्यसभा में उठा पैक्स सिलिका में शामिल होने से भारत के डेटा की निजता प्रभावित होने का मामला, दिग्विजय सिंह ने जताई नागरिकों की निजता के उल्लंघन की आशंका</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा में दिग्विजय सिंह ने 'पैक्स सिलिका' गठबंधन से डेटा निजता और 'डिजिटल उपनिवेशवाद' का खतरा उठाया। जया बच्चन ने वीआईपी कल्चर से जनता और सांसदों को होने वाली असुविधा पर नाराजगी जताई, जबकि राघव चड्ढा ने मोबाइल डेटा कैरी-फॉरवर्ड के उपभोक्ता अधिकार की मांग की। सदन में महिला सुरक्षा और नकली ऑर्गेनिक उत्पादों पर भी चर्चा हुई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/issue-of-indias-data-privacy-being-affected-due-to-pax/article-147527"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/digvijay-singh.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। अमेरिका के नेतृत्व में बनाये गये रणनीतिक गठबंधन पैक्स सिलिका में भारत के शामिल होने से भारत और उसके नागरिकों डेटा की निजता की सुरक्षा का मुद्दा सोमवार को राज्यसभा में उठाया गया। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने शून्यकाल में यह विषय उठाते हुए कहा कि भारत हाल ही में पैक्स सिलिका का सदस्य बना है। उन्होंने कहा कि इस गठबंधन का सदस्य बनने से भारत के डेटा के लीक होने तथा नागरिकों की निजता के उल्लंघन की आशंका है।</p>
<p>कांग्रेस सदस्य ने कहा कि इससे भारत की क़त्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसे क्षेत्रों में स्वायत्तता और संभावनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को उन सेवा शर्तों का सदन में खुलासा करना चाहिए जिनके आधार पर भारत इसका सदस्य बना है। उन्होंने आरोप लगाया कि पैक्स सिलिका डिजिटल उपनिवेशवाद है और इससे भारत के हर नागरिक की निजता की सुरक्षा का सवाल पैदा हो गया है।</p>
<p>उन्होंने इससे अलग एक विषय उठाते हुए देश में अब तक की महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक उपलब्धियों के पड़ावों पर सदन में अल्पकालिक चर्चा कराये जाने की मांग की। भाजपा के डॉ. अजीत माधवराव गोपचड़े ने ऑर्गेनिक के नाम पर देश में बेचे जा रहे नकली खाद्य पदार्थ की ब्रिक्री पर रोक लगाये जाने का मुद्दा उठाया। उन्होने पूरे देश में ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों के लिए एक ही नियम और मानक स्थापित किये जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि रसायन युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है और साथ ही भारतीय उत्पादों का नाम भी खराब हो रहा है। उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए सख्त कानून बनाये जाने की मांग की । उन्होंने कहा कि इससे देश की प्रतिष्ठा को भी नुकसान हो रहा है।</p>
<p>भाजपा के नबाम रेबिया ने पूर्वोत्तर के छात्रों के साथ राजधानी दिल्ली में नस्लीय भेदभाव और उत्पीड़न का मुद्दा उठाया। उन्होंने इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई किये जाने की मांग की। सभापति ने कहा कि इस विषय पर सारा सदन सहानुभूतिपूर्ण विचार रखता है। कांग्रेस के अखिलेश प्रसाद सिंह ने बिहार के औद्योगिकरण के मामले में पिछड़े होने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि बिहार देश के सकल घरेलू उत्पाद में केवल तीन प्रतिशत का योगदान देता है क्योंकि वहां पर उद्योग और फैक्ट्री नहीं है। इससे लोगों को पलायन करना पड़ता है। उन्होंने राज्य में औद्योगिक टाउनशिप विकसित किये जाने की मांग की।</p>
<p>समाजवादी पार्टी की जया बच्चन ने देश विशेष रूप से राजधानी दिल्ली में वीआईपी संस्कृति के कारण नागरिकों को होने वाली असुविधा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि यह अफसोस की बात है कि इस संस्कृति के कारण कर देने वाले आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ी है।<br />उन्होंने अपने साथ हुए मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब वह और अन्य सांसद पिछले सप्ताह शार्दुल गेट से बाहर निकल रहे थे तो वीआईपी मूवमेंट के चलते को बंद कर दिया गया। </p>
<p>उन्होंने कहा कि यह संसद के इतिहास में पहली बार हुआ कि सांसद के लिए गेट बंद कर दिया गया। इससे सांसदों का अपमान हुआ है। दूसरे मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वीआईपी मूवमेंट के कारण उन्हें राज्यसभा से सेवानिवृत सांसदों की विदायी पार्टी में पहुंचने में एक घंटे से अधिक समय लगा। उन्होंने इस संस्कृति पर रोक लगाये जाने की मांग की। </p>
<p>कांग्रेस की रजनी पाटिल ने निजी स्कूलों में बढ़ती फीस का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि शिक्षा नागरिकों का मौलिक अधिकार है लेकिन भारी भरकम फीस के कारण वह इससे वंचित हैं। आम आदमी पार्टी के राघव चड्डा ने मोबाइल उपभोक्ताओं के फोन रिचार्ज पैकेज में बिना इस्तेमाल के बचे डेटा के समाप्त हो जाने का का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कंपनियों ने डेटा की सीमा हर रोज के हिसाब से तय की है जबकि यह मासिक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह उपभोक्ता का अधिकार है और उसका बचा हुआ डेटा उपभोक्ता के खाते में जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने बचे हुए डेटा को किसी और को स्थानांतरित किये जाने की व्यवस्था शुरू किये जाने की भी मांग की।</p>
<p>आप पार्टी की स्वाति मालीवाल ने देश में महिला आयोगों को वास्तविक अधिकार दिये जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि अनेक राज्यों में अभी भी महिला आयोग में पदाधिकारियों की नियुक्ति नहीं की गयी है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में भी महिला आयोग में अध्यक्ष का पद खाली है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 16:27:51 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ''पीरियड्स लीव'' की याचिका: सुनवाई से किया इंकार, कहा-मासिक धर्म अवकाश नीति बनाने के लिए याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विचार करें सरकार </title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के लिए अनिवार्य सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने चिंता जताई कि ऐसे कानून से महिलाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियोक्ता उन्हें काम पर रखने से कतरा सकते हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-rejected-the-petition-for-periods-leave-refused-to/article-146386"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/supreme-court.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सभी संस्थानों में महिलाओं के लिए सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की मांग करने संबंधी रिट याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह सभी हितधारकों के साथ परामर्श करके मासिक धर्म अवकाश नीति बनाने के लिए याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विचार करे। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि कानून के माध्यम से मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने से महिलाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि यह नियोक्ताओं को महिलाओं को काम पर रखने से हतोत्साहित कर सकता है, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी पर बुरा असर पड़ेगा। याचिकाकर्ता चाहता था कि शीर्ष न्यायालय यह सुनिश्चित करे कि महिलाओं को, चाहे वे छात्राएं हों या कामकाजी पेशेवर, मासिक धर्म के दौरान छुट्टी दी जाए। पीठ ने याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की स्थिति पर भी सवाल उठाया और इस बात की ओर इशारा किया कि किसी भी महिला ने खुद अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 15:58:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मतदाता सूची बदलाव को लेकर कोलकाता में टीएमसी और चुनाव आयोग में तीखी नोकझोंक, अपनी बात नहीं रखने का लगाया आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[कोलकाता में चुनाव आयोग और तृणमूल कांग्रेस के बीच 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) पर टकराव बढ़ गया है। मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर अमर्यादित व्यवहार का आरोप लगाया, वहीं फिरहाद हकीम ने इस प्रक्रिया को नागरिकों का उत्पीड़न बताया। TMC ने आरोप लगाया कि केंद्र के प्रभाव में आकर असली मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/heated-dispute-between-tmc-and-election-commission-in-kolkata-regarding/article-145867"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/sir.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में सोमवार को चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच हुई बैठक के दौरान मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर आयोग और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच तीखी बहस हुई। बैठक के बाद तृणमूल प्रतिनिधिमंडल में शामिल सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बर्ताव पर गहरी नाराजगी जताई और आरोप लगाया कि उन्होंने उन्हें अपनी बात पूरी तरह से रखने की इजाजत नहीं दी। </p>
<p>तृणमूल की वरिष्ठ नेता एवं राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने दावा किया कि उनसे चर्चा के दौरान अपनी आवाज ऊंची न करने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा, मैं एक महिला हूँ और उन्होंने मुझसे कहा,'चिल्लाओ मत'। असल में उनके मन में महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं है। इसीलिए महिलाओं के नाम भी मतदाता सूची से काटे जा रहे हैं। अगर मेरा नाम नहीं है, तो इसे साबित करना आपकी जिम्मेदारी है। मुझे कतार में क्यों खड़ा होना चाहिए? महिलाओं पर चिल्लाना आपका काम नहीं है। </p>
<p>तृणमूल के प्रतिनिधिमंडल के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त उनकी बातें सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया, वह किसी की बात नहीं सुनना चाहते। वह खुद बोलते रहे और जब हमने बोलने की कोशिश की,तो उन्होंने अपनी आवाज ऊंची कर ली। ऐसा लगता है कि आयोग इसलिए नाराज है क्योंकि हमने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।</p>
<p>आयोग के साथ ही बैठक में तृणमूल की ओर से फिरहाद हकीम, श्रीमती भट्टाचार्य और राज्यसभा उम्मीदवार राजीव कुमार शामिल थे। हकीम ने एसआईआर प्रक्रिया की आलोचना की और आयोग पर घुसपैठ के मुद्दे पर केंद्र सरकार की कहानी से प्रभावित होकर गलत तरीका अपनाने का आरोप लगाया। </p>
<p>हकीम ने कहा, केंद्र सरकार ने यह प्रभाव बनाया है कि यह राज्य रोहिंग्या और घुसपैठियों से भरा है,और आयोग ने अपनी नीति उसी हिसाब से बनाई है। लेकिन इस प्रक्रिया के दो महीनों में आपको इसका कोई सबूत नहीं मिला है। इसके बजाय भारतीय नागरिकों को परेशान किया गया है। इस प्रक्रिया से आम लोगों को काफी मुश्किल हुई है। सैकड़ों मौतें हुई हैं और बहुत सारे लोग बीमारियों की चपेट में आए। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? लोग अपना काम छोड़कर सिर्फ अपनी नागरिकता साबित करने के लिए लंबी लाइनों में खड़े हो रहे हैं। केंद्र सरकार की बात मानकर बनाई गई यह नीति बनायी गयी। है। </p>
<p>हकीम ने कहा कि पार्टी की सबसे बड़ी चिंता यह पक्का करना है कि असली वोटर अपने अधिकारों से वंचित न रहें। उन्होंने कहा, हमारा बस यही आग्रह है कि किसी भी भारतीय नागरिक को वंचित न किया जाए। एसआईआर प्रक्रिया को लेकर पार्टी के उच्चतम न्यायालय जाने के सवाल पर भट्टाचार्य ने इस कदम का बचाव किया। उन्होंने कहा, जब भी हमने एसआईआर का मुद्दा उठाया, तो उन्होंने कहा कि मामला उच्चतम न्यायालय में है। फिर हमें बैठक के लिए क्यों बुलाया? अगर आप हमें बुलाते हैं, तो आपको हमारी बात सुननी चाहिए। क्या हमारा उच्चतम न्यायालय जाना गलत था? हमने सही किया। लोगों की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है।</p>
<p>इस दौरान जब उनसे पूछा गया कि तृणमूल चुनाव को कितने चरण में कराना चाहती है, तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा कि बैठक का मकसद मतदान के चरण की संख्या पर चर्चा करना नहीं था। हालांकि, हकीम ने इस मौके का इस्तेमाल केंद्र सरकार पर राजनीतिक हमला करने के लिए किया और कहा, केंद्र सरकार राज्य में अपनी जमीन खो चुकी है। वे मासूम लोगों को एसआईआर कतारों में खड़ा करके बंगाल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस वजह से कई मौतें हुई हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 17:54:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी अनुमति, कहा-नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती </title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की इच्छा मानते हुए 30 सप्ताह गर्भ समापन की अनुमति दी, कहा महिला को गर्भ जारी रखने को मजबूर नहीं किया जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-historic-decision-to-allow-termination-of-pregnancy-at/article-142174"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(7)4.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में एक नाबालिग लड़की के 30 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला को, और विशेष रूप से एक नाबालिग लड़की को, उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।</p>
<p>न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने जोर देकर कहा कि गर्भवती लड़की को  बच्चे को जन्म देने  या नहीं देने के उसके अधिकार को उचित महत्व दिया जाना चाहिए, खासकर तब जब उसका मन नहीं हो कि वह बच्चे को जन्म दे और ऐसी इच्छा उसने साफ साफ शब्दों में बार बार जाहिर भी की हो। </p>
<p>पीठ ने स्पष्ट किया कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या एक नाबालिग को ऐसी गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जा सकता है जो उसकी मर्जी के बिना है। अदालत ने कहा, अदालत किसी भी महिला को, नाबालिग बच्चे की तो बात ही छोड़एि, अपनी गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती, अगर उसका ऐसा करने का इरादा ही नहीं हो।</p>
<p>न्यायालय ने माना कि यह मामला इस पर निर्भर नहीं करता कि गर्भधारण सहमति से बने संबंधों के कारण हुआ था या दुष्कर्म से। वास्तव में फैसला इस बात से तय होगा कि नाबालिग की वह स्पष्ट इच्छा क्या है और उसका मन यही है कि वह बच्चे को जन्म न दे। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्वीकार किया कि हालांकि एक बच्चे का जन्म अंतत: एक जिंदगी को दुनिया में लाना है, लेकिन इस मामले में नाबालिग की स्पष्ट अनिच्छा सबसे महत्वपूर्ण कारक है।</p>
<p>उच्चतम न्यायालय ने मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया कि वे सभी आवश्यक चिकित्सा संबंधी उपायों का पालन करते हुए गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन की प्रक्रिया शुरू करें। यह फैसला भारत में गर्भपात कानून के तहत प्रजनन अधिकारों की व्याख्या में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। कारण यह है कि 24 सप्ताह की कानूनी सीमा के बाद भी विशेष परिस्थितियों में अदालत ने इस लड़की की पसंद को प्राथमिकता दी है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी संशोधन अधिनियम 2021 के अनुसार गर्भपात की समय सीमा को विभिन्न श्रेणियों में निर्धारित किया गया है। सामान्य परिस्थितियों में सभी महिलाओं के लिए 20 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति है, मगर इसके लिए डॉक्टर की सलाह आवश्यक है।</p>
<p>विशेष श्रेणियों की महिलाओं जैसे कि दुष्कर्म का शिकार बनी लड़कियां, नाबालिग, विधवाओं, दिव्यांगों या गंभीर बीमारी से पीड़ति महिलाओं के लिए यह सीमा 24 सप्ताह तक निर्धारित है और इसके लिए दो डॉक्टरों की इजाजत अनिवार्य है। यदि गर्भ में पल रहे भ्रूण को गंभीर बीमारी है, तो राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड की अनुमति के बाद 24 सप्ताह के बाद भी गर्भपात कराया जा सकता है। </p>
<p>इसके अलावा अगर गर्भवती महिला के जीवन को तत्काल कोई गंभीर खतरा हो, तो कानून की किसी भी समय सीमा के बिना आपातकालीन स्थिति में गर्भपात की अनुमति दी जाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 15:44:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरानी महिलाओं को मिली मोटरसाइकिल चलाने की आजादी, दशकों बाद आया नया कानून</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान सरकार ने महिलाओं को मोटरसाइकिल लाइसेंस देने की अनुमति दी। नए नियम से कानूनी अस्पष्टता खत्म होगी और सड़क हादसों में महिलाओं को दोषी ठहराने की समस्या घटेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/iranian-women-get-freedom-to-ride-motorcycles-new-law-comes/article-142116"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(1200-x-600-px)-(2)9.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। ईरान की सरकार ने महिलाओं के लिए एक बड़ा और अहम फैसला लिया गया है। स्थानीय मीडिया के अनुसार, ईरान की महिलाओं को कानूनी रूप से मोटरसाइकिल चलाने की अनुमति मिल गई है। दरअसल, ईरानी कानून के मुताबिक, वहां की महिलाओं को मोटरसाइकिल या स्कूटर चलाने पर साफ रोक नहीं थी, लेकिन फिर भी प्रशासन की ओर से उन्हें लाइसेंस नहीं दिया जाता था। नए नियम के तहत महिलाओं को लाइसेंस जारी करने की अनुमति मिल गई है।</p>
<p><strong>मंत्रिमंडल ने दी थी मंजूरी</strong></p>
<p>ईरान की समाचार एजेंसी इलना के अनुसार, उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने मंगलवार को यातायात संहिता को स्पष्ट करने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, जिसे ईरान के मंत्रिमंडल ने जनवरी के अंत में मंजूरी दी थी। इसके तहत दोपहिया वाहनों से संबंधित वर्षों से चली आ रही कानूनी अस्पष्टता समाप्त हो गई है।</p>
<p><strong>अगर कोई महिला घायल होती तो...</strong></p>
<p>बता दें कि अब तक ईरान में अगर सड़क हादसे में कोई महिला घायल होती थी, तब भी कई बार उसे ही दोषी मान लिया जाता था, क्योंकि उसके पास लाइसेंस नहीं होता था। अब सरकार के नए फैसले से इस समस्या का समाधान होने की उम्मीद है। इलना के अनुसार, इस प्रस्ताव के तहत यातायात पुलिस को महिला आवेदकों को व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना, पुलिस की सीधी देखरेख में परीक्षा आयोजित करना और महिलाओं को मोटरसाइकिल चालक लाइसेंस जारी करना अनिवार्य है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 11:26:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पंचायत, गहने और महिला स्वतंत्रता का सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[देहरादून के जौनसार-बावर इलाके में एक ऐसा फैसला हुआ है, जो पूरे देश में बहस का मुद्दा बन गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/panchayat-jewelry-and-the-question-of-womens-freedom/article-132256"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/_4500-px)5.png" alt=""></a><br /><p>देहरादून के जौनसार-बावर इलाके में एक ऐसा फैसला हुआ है, जो पूरे देश में बहस का मुद्दा बन गया है। चकराता तहसील के कंदाड़ और इंद्रोली गांवों की पंचायतों ने तय किया है कि शादी-ब्याह या किसी भी सामाजिक समारोह में महिलाएं अब सिर्फ तीन सोने के गहने ही पहन सकेंगी मंगलसूत्र, नाक की बाली और कान के झुमके। और अगर किसी महिला ने इस नियम का उल्लंघन किया तो उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह फैसला सुनकर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि क्या सचमुच किसी पंचायत को यह अधिकार है कि वह तय करे कि महिलाएं क्या पहनें और क्या नहीं। जौनसार-बावर का इलाका वैसे भी अपनी अनोखी पहचान के लिए जाना जाता है। यमुना और टोंस नदियों के बीच बसा यह जनजातीय क्षेत्र अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं और रीति-रिवाजों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं और इनकी जीवनशैली अन्य पहाड़ी समुदायों से भिन्न है। यहां कभी बहुपति प्रथा का चलन था, लेकिन आधुनिकता के साथ यहां की कई परंपराएं बदल रही हैं।</p>
<p><strong>बदलाव की एक कड़ी :</strong></p>
<p>गहनों पर यह नया फरमान शायद उसी बदलाव की एक और कड़ी है। पंचायत का तर्क साफ है समाज में बढ़ते दिखावे और सोने की आसमान छूती कीमतों ने आम आदमी के लिए शादी-ब्याह को एक बोझ बना दिया है। कंदाड़ गांव, जिसकी आबादी लगभग 700 है, वहां के ग्रामीणों का मानना है कि कुछ महिलाएं सामाजिक कार्यक्रमों में भारी सोने के गहने पहनकर आती हैं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं में हीन भावना पैदा होती है। स्थानीय निवासी अतर सिंह चौहान ने कहा कि इस फैसले से गांव में अब कोई तुलना नहीं होगी कि किसने कितने गहने पहने हैं। जब हर किसी के लिए समान नियम हैं, तो शादियां सादगी और समानता के साथ होंगी। यह तर्क सुनने में बेहद तर्कसंगत लगता है। सचमुच, भारतीय समाज में दिखावे की प्रवृत्ति ने शादी-ब्याह को एक प्रतियोगिता का रूप दे दिया है।</p>
<p><strong>मौलिक अधिकार है :</strong></p>
<p>एक परिवार दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में अपनी आर्थिक हैसियत से कहीं अधिक खर्च कर देता है। कर्ज लेना, अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखना, यहां तक कि परिवार में कलह और तनाव यह सब इसी दिखावे की देन है। सोने के गहने तो इस प्रतिस्पर्धा का सबसे दिखने वाला हिस्सा हैं। जिनके पास ज्यादा गहने हैं, वे समाज में ज्यादा सम्मानित माने जाते हैं। और जो गहने नहीं खरीद सकते, उन्हें हीन भावना से जूझना पड़ता है। लेकिन क्या पंचायत का यह फैसला सचमुच समस्या का हल है या यह एक नई समस्या को जन्म दे रहा है,आखिर किसी को यह अधिकार कैसे मिल सकता है कि वह किसी महिला के कपड़ों और गहनों पर पाबंदी लगाए,यह प्रश्न केवल कानूनी नहीं है, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है।</p>
<p><strong>एक गंभीर सवाल :</strong></p>
<p>यह फैसला एक और गंभीर सवाल उठाता है क्या पुरुषों के वस्त्रों और आभूषणों पर भी ऐसी ही पाबंदियां लगाई जाएंगी,अगर नहीं, तो यह एक तरफा नियम क्यों,यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे नियम अक्सर महिलाओं को ही निशाना बनाते हैं। उनकी आजादी पर अंकुश लगाने के लिए समाज की भलाई का तर्क दिया जाता है। लेकिन क्या समाज की भलाई व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कीमत पर हो सकती है। पचास हजार रुपये का जुर्माना भी एक विचारणीय पहलू है। यह राशि इतनी बड़ी है कि लोग डर के मारे नियम का पालन करेंगे। लेकिन क्या डर से लाया गया बदलाव टिकाऊ होता है, इतिहास गवाह है कि जबरदस्ती लागू किए गए नियम कभी सफल नहीं होते। सामाजिक बदलाव तभी आता है जब लोग खुद उसकी जरूरत समझें और उसे अपनाएं। अगर समाज में दिखावे की प्रवृत्ति खत्म करनी है तो लोगों की सोच बदलनी होगी, न कि उन पर जुर्माने का डर थोपना होगा।</p>
<p><strong>जागरूकता के माध्यम से :</strong></p>
<p>गांव के बुजुर्गों और पंचायत सदस्यों का कहना है कि यह निर्णय सामाजिक एकता बनाए रखने और अनावश्यक खर्चों को रोकने के लिए लिया गया है। यह इरादा निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। लेकिन क्या इसका यही तरीका था, क्या पंचायत शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से यह बदलाव नहीं ला सकती थी, क्या लोगों को समझाया नहीं जा सकता था कि सादगी की अहमियत क्या है,क्या यह संभव नहीं था कि समुदाय के सभी लोग मिलकर स्वेच्छा से यह फैसला करते कि वे दिखावे से बचेंगे। दरअसल, समस्या सिर्फ गहनों की नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है, जो गहनों को समृद्धि और सामाजिक स्थिति का प्रतीक मानती है। समस्या उस दबाव की है, जो समाज एक-दूसरे पर डालता है।</p>
<p><strong>संस्कृति और परंपराएं :</strong></p>
<p>जौनसार-बावर में महिलाओं को काफी सम्मान और आदर दिया जाता है। यह समुदाय अपनी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखने में गर्व महसूस करता है। ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है कि कोई भी बदलाव महिलाओं की सहमति से हो, न कि उन पर थोपा जाए। एक और पहलू है जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है। गहने सिर्फ दिखावा नहीं होते। कई परिवारों के लिए गहने एक निवेश भी हैं। महिलाओं के लिए गहने एक तरह की आर्थिक सुरक्षा का माध्यम हैं। यह सच है कि भारतीय समाज में दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह भी सच है कि शादी-ब्याह में होने वाला अनावश्यक खर्च कई परिवारों को बर्बाद कर देता है। लेकिन इसका समाधान प्रतिबंध नहीं, बल्कि जागरूकता है।</p>
<p><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Nov 2025 12:51:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महिलाएं अपने अधिकारों को भली-भांति समझें</title>
                                    <description><![CDATA[जब हम समाज के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हैं, तो महिलाओं का योगदान और महत्व स्पष्ट होता है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/women-should-understand-their-rights-well/article-74708"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/transfer-(4)6.png" alt=""></a><br /><p>जब हम समाज के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हैं, तो महिलाओं का योगदान और महत्व स्पष्ट होता है। महिलाएं समाज की आधारशिला होती हैं और उनकी समृद्धि समाज की समृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है। महिलाओं का योगदान समाज में विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक है। वे न केवल घरेलू कार्यों में ही सक्रिय हैं, बल्कि उन्हें नौकरियों, विज्ञान, कला, राजनीति और अन्य क्षेत्रों में भी उन्नति के लिए मिलता है।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का मुख्य उद्देश्य जेंडर इक्वलिटी को प्रोत्साहित करना है। महिलाओं को समाज में उनके अधिकारों की प्राप्ति और समानता का अधिकार है। सामाजिक परिपेक्ष्य में महिलाओं की दशा और दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। भारतीय महिला वर्तमान दौर में समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित हो रही है। महिला अब घर में कैद मात्र लक्ष्मी ही नहीं रह गई है, बल्कि घर से बाहर समाज के कर्तव्य निभाने के लिए आगे बढ़ आई है। वह घर की चार दीवारी से अपने कदम को बढ़ाती हुई समाज की विकलांग दशा को सुधारने के लिए कार्यरत हो रही है। इसके लिए वह पुरूष के समकक्ष पद व अधिकार को प्राप्त करती हुई पुरुष को चुनौती दे रही है। वह पुरुष को यह अनुभव कराने के साथ-साथ उसमें नई चेतना भर रही है कि महिला में किसी प्रकार की शक्ति और क्षमता में कम नहीं है। मात्र अवसर मिलने भर की देर है। महिला का स्थान हमारे समाज में आज सर्वाधिक मजबूती के साथ उभर कर सामने आया है।</p>
<p>वर्तमान दौर में भारतीय महिलाओें का उत्थान और विकास नजर आ रहा है। यह महिला सशक्तिकरण के एक पहलू के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय महिला सदैव पिता, पति, पुत्र पर आश्रित थी आज वो स्वयं सक्षम है। शिक्षा के विकास के साथ महिला विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनी है। महिलाओं ने परम्परावादी सामाजिक नियमों से हटकर कुछ कर दिखाया है। महिला को घर से बाहर काम करने और परिवार के मामलों में बोलने की स्वतंत्रता मिल गई है। वर्तमान में महिलाएं सोशियल मीडिया जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी बातें व गति-प्रगति को समाज के सामने प्रस्तुत कर रही है। घर-कार्यालय में समन्वय स्थापित कर रही शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, खेल, उद्योग, कला, संगीत, मीडिया, राजनीति, समाज सेवा आदि क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर रही है। वर्तमान भारत की महिला ने खुद को पहचान लिया है और काफी हद तक अपने हक के लिए आवाज बुलन्द करना भी सीख लिया है। महिलाओं का समाज में जिस गति से बदलाव हो रहा है उससे महिलाओं के प्रति लोगों के चिंतन में सकारात्मक बदलाव आया है। हम आज भी प्राचीन व दकियानुसी सोच का परिचय देते है और कहते है कि महिलाएं बदलाव को तैयार नहीं है, जबकि जब भी महिलाओं को अवसर मिला है उन्होंने प्रगति की राह को समझा है और आगे बढ़ी है। जहां एक ओर महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता होना है तो दूसरी और समाज में पुरुषों के बराबर स्थिति पर पहुंचना है।<br />भारत में महिलाएं दिन-ब-दिन अपनी लगन, मेहनत एवं उत्कृष्ट कार्यों द्वारा राष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई हैं। मौजूदा दौर में महिलाएं नए भारत के विश्वास की प्रमुख कड़ी दिख रही हैं। अथक परिश्रम के बाद भारतीय महिलाएं आज समूचे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। पुरुष प्रधान रूढ़िवादी समाज में महिलाएं निश्चित रूप से देश के विकास की नींव और मजबूत करने का हरसंभव प्रयास कर रहीं हैं, जो हमारे लिए गर्व की बात है। कुछ अंश में आज भी महिलाएं घर की चारदीवारी में कैद होकर रूढ़िवादी परंपराओं का बोझ तले दबती जा रही है, इसके पीछे कारण यही है कि अभी भी महिला पुरुषवादी मानसिकता में बंधी हुई है।</p>
<p>भारत मेंं महिला सशक्तिकरण पर चिंतन करते समय महिलाओं की वास्तविक स्थिति को देखना जरूरी है। महिला सशक्तिकरण के दौर में महिला समाज, राजनीति और प्रशासन में कितना आगे बढ़ सकी है। महिलाओं की यह सजगता महानगर केंद्रित हैं या अति संपन्न, सुसंपन्न और सुशिक्षित परिवारों में परिलक्षित होता है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की स्थिति कहीं नहीं बदली है। आदिवासी व पिछड़े क्षेत्र की महिलाओं की स्थिति सामान्य महिलाओं की तुलना में काफी बदहाल दिखती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एसोचैम द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 32 से 58 वर्ष की 72 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं अवसाद, पीठ में दर्द, मधुमेह, हायपरटेंशन, उच्च कोलोस्ट्रोल, हृदय एवं किडनी की बीमारियों से ग्रस्त पाई है। </p>
<p>महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्मान, समानता, समाज में स्थान की जब भी बात होती है, कुछ रिपोर्ट व आंकड़ों को आधार बनाकर निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश की जाती है कि उसमें इतना सुधार आया है कि महिलाओं के लिए समानता के बारे में बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन समानता की बात तो दूर, यह आधी आबादी आज तक अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित है। लिंग विषमता और महिला सशक्तिकरण के जो कानून बने उनसे सीमित महिलाओं को ही लाभ हो रहा है।      </p>
<p><strong>-डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 08 Apr 2024 12:55:06 +0530</pubDate>
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