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                <title>बॉटनीकल गार्डन में फायर लाइन के नाम पर 38 लाख का घोटाला, जानें पूरा मामला </title>
                                    <description><![CDATA[कोटा वनमंडल के अधिकारियों ने मिलीभगत से सरकारी धन का किया गबन।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/38-lakh-scam-in-botanical-garden-under-the-guise-of--fire-lines/article-155836"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/8888.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा वन मंडल द्वारा 40 हैक्टेयर में बनाए गए बॉटनिकल गार्डन में फायर लाइन के नाम पर 38 लाख रुपए खर्च का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जमीन पर फायर लाइन बनी ही नहीं लेकिन कागजों में बनाकर बजट उठा लिया गया। इतना ही नहीं ठेकेदारों को भुगतान करना भी बता दिया गया।दरअसल, बॉटनिकल गार्डन लाडपुरा रेंज की सकतपुरा वनखंड में आता है, जो पूर्णत: पठारी पथरीला क्षेत्र है। यहां कुछेक ही ऊंचे वृक्ष मौजूद हैं, शेष संपूर्ण क्षेत्र नंगी चट्टानें और घास फूस और कंटीली झाड़ियां ही है। हालांकि, यहां बिजली पावर ग्रिड भी हैं, जिनके नीचे व आसपास पाथ-वे बने हुए, जिन पर गिट्टियां व ग्रेवल बिछा हुआ है। यदि, पावर ग्रिड से चिंगारी भी गिरे तो आग लगने की संभावना नहीं रहती है। वहीं, पूर्व में बड़ी आगजनी घटना की कोई हिस्ट्री भी नहीं रही है। वन विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे पठारी नंगी चट्टानी क्षेत्र में फायर लाइन का निर्माण करने का निर्णय ही तकनीकी मापदंडों का उल्लंघन है। जबकि, पूरे गार्डन में लंबे चौड़े निरीक्षण पथ बने हुए हैं, जो स्वत: ही फायर लाइन का काम करते हैं।</p>
<p><strong>कागजों में फायर लाइन, धरातल से गायब</strong><br />नवज्योति के हाथ लगे दस्तावेजों के अनुसार, वन मंडल की लाडपुरा रेंज के सकतपुरा वनखंड में 134.50 लाख की लागत से बोटनीकल गार्डन का निर्माण किया गया। जिसमें 28 प्रकार के कार्य करवाए जाना बताया गया है। गार्डन में मौजूद पेड़-पौधों को आग से बचाने के लिए झाड़-झाड़ियां साफ कर फायर लाइन (अग्नि रोक मार्ग) बनाया जाना बताया गया है। जबकि, बॉटनीकल गार्डन में पीछे व चौकीदार रूम की तरफ बड़ी मात्रा में सूखी झाड़ियां है, जिन्हें न तो साफ करवाया गया और न ही उनके बीच फायर लाइन बनाई गई। जबकि, यहां 6 निरीक्षण पथ यानी पाथ-वे (रास्ते) 3 मीटर चौड़े बने हुए हैं। जिस पर कई जगहों पर ग्रेवल तो कहीं जगहों पर गिट्टियां बिछी है। असल, में फायर लाइन सिर्फ कागजों में है और धरातल से गायब है।</p>
<p><strong>इस तरह से हुआ 38 लाख का गबन</strong><br />वित्तिय वर्ष 2025-26 की समाप्ति तक कोटा डीएफओ द्वारा सीसीएफ को लिखे पत्र में कागजों में बॉटनीकल गार्डन में कुल 38 लाख की लागत से तीन स्तर पर फायर लाइन बनवाना बताया है। इनमें झाड़-झाड़ियों की सफाई कर फायर लाइन बनाने के लिए कुल 28 लाख रुपए चार्ज किए हैं। जिसमें से मार्च माह तक 20 लाख 24 हजार 264 रुपए का भुगतान संवेदक को किया जाना बताया है। जबकि, शेष 7 लाख 75 हजार 736 रुपए का भुगतान करने के लिए विभाग से बजट मांगा है। वहीं, कंट्रेक्शन आॅफ फायर लाइन-1 वर्क-करवाने के नाम पर 5 लाख रुपए का भुगतान करना भी दर्शाया है। जबकि, कंट्रेक्शन आॅफ फायर लाइन-2 वर्क करवाने के 5 लाख का भुगतान करना शेष बताया है। इस तरह से फायर लाइन के नाम पर दो माह पहले तक कुल 25,24264 रुपए का भुगतान कर दिया और शेष 12 लाख 75 हजार 736 रुपए का भुगतान के लिए बजट मांगा।</p>
<p><strong>40 हैक्टेयर को ही फायर लाइन बना दें तो भी खर्च नहीं होते 38 लाख</strong><br />नाम न छापने की शर्त पर आईएफएस ऑफिसर्स ने बताया कि हर काम के लिए सरकार ने बीएसआर दर तय की हुई है। जिसमें फायर लाइन की दर 4.55 रुपए प्रति स्क्वायर मीटर है। यदि, पूरे 40 हैक्टेयर के बॉटनीकल गार्डन को सपाट मैदान बना दिया जाए तो भी 38 लाख रुपए की लागत से फायर लाइन नहीं बन सकती। क्योंकि, 40 हैक्टेयर में 4 लाख स्क्वायर मीटर होता हैं, जिसे बीसीआर रेट 4.55 रुपए प्रति स्क्वायर मीटर से गुणा करें तो 18 लाख 20 हजार रुपए का ही खर्चा होगा, तब भी 38 लाख रुपए खर्च नहीं होंगे।</p>
<p><strong>क्या होती है फायर लाइन</strong><br />जंगल में फायर लाइन एक चौड़ा कच्चा रास्ता या बड़ी पगडंडी को कहते हैं, जो आग रोकने के लिए बनाई जाती है। वन भूमि पर मौजूद सभी वनस्पतियों, झाड़ियों को साफ करके जमीन को खुला छोड़ दिया जाता है। इस लाइन के दो फायदे होते हैं, पहला ये कि जंगल में भीषण आग लगने के दौरान ये एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आग फैलने नहीं देती और दूसरा ये कि इसी चौड़े रास्ते (फायर लाइन) के सहारे दमकल विभाग और वनकर्मी आग बुझाने वाले उपकरणों के साथ अंदर प्रवेश कर सकते हैं।</p>
<p><strong>क्या कहते हैं विशेषज्ञ</strong><br />फायर लाइन घने जंगल में पेड़ों को आग से बचाव के लिए बनाया जाता है। यदि बॉटनीकल गार्डन में पहले से ही निरीक्षण पथ बने हुए हैं तो यहां फायर लाइन बनाने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि, निरीक्षण पथ (रास्ते) ही फायर लाइन का ही काम कर रहे होते हैं।<br /><strong>-सतीश कुमार, रिटायर्ड एसीएफ वन विभाग</strong></p>
<p>अभेड़ा बॉटनिकल गार्डन में वैसे तो फायर लाइन बनाई ही नहीं गई, केवल कागजों में बताकर 38 लाख का भुगतान उठाया गया है। जबकि, वन अफसर 1200 रनिंग मीटर लंबी और 3 मीटर चौड़ी फायर लाइन बनाने की बात कह रहे हैं, जिसे भी मान लिया जाए तो भी यह अधिकतम 3600 स्क्वायर मीटर की होगी, जिसकी लागत लागू बीएसआर दर 4.55 रुपए प्रति स्क्वायर मीटर के हिसाब से 20 हजार रुपए से अधिक की नहीं हैं। इसके बावजूद सरकार की आंखों में धूल झौंक लाखों का गबन कर दिया गया। आश्चर्य तो यह है, यहां पहले से ही पाथ-वे बने हुए हैं, जो सम्पूर्ण 40 हैक्टेयर के क्षेत्र को कई भागों में विभाजित करने के साथ फायर लाइन का काम भी करते हैं। असल में खेल पाथ-वे को ही फायर लाइन बताकर 38 लाख रुपए का राजकोष से भुगतान कर गबन किया गया, यह राशि संबधित अधिकारियो से वसूलनीय हैं।<br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p>मेरे समय वित्तिय वर्ष 23-24 में ही बॉटनिकल गार्डन में निरीक्षण पथ, पौधे लगाने के लिए ब्लॉक व इको टेल बना लिए गए थे।<br /><strong>- कुंदन सिंह, तत्कालीन रेंजर लाडपुरा रेंज</strong></p>
<p>बोटनीकल गार्डन 40 हैक्टेयर में बनाया गया है। जहां 1200 रनिंग मीटर लंबी फायर लाइन बनाई गई है। इसकी लागत के बारे में तो डीएफओ की परमिशन के बिना नहीं बता सकते। यहां पाथ-वे भी बने हुए हैं, जिसका उपयोग पौधों को पानी पिलाने के लिए वाहनों के आने-जाने के लिए होता है।<br /><strong>-अनिरुद्ध कुमार, सहायक वन संरक्षक, कोटा वनमंडल</strong></p>
<p>गार्डन में 1200 रनिंग मीटर लंबी और 3 मीटर चौड़ी फायर लाइन बनाई गई है, जो करीब 5 लाख रुपए की लागत से बीएसआर रेट के अनुसार बनाई गई है। पाथे-वे यानी निरीक्षण पथ भी फायर लाइन का ही काम करते हैं। हालांकि, पहले 2100 से 2200 रनिंग मीटर बनानी थी लेकिन बजट नहीं मिलने के कारण जितना बजट उपलब्ध था, उतने में ही यह फायर लाइन बनाई।<br /><strong>-इंदे्रश सिंह यादव, क्षेत्रिय वन अधिकारी रेंज लाडपुरा</strong></p>
<p>मैं अभी छुट्टी पर हूं, बिना देखे कुछ कह नहीं सकता। इस संबंध में आप सहायक वन संरक्षक (एसीएफ) से बात करते हैं, अभी उनके पास चार्ज है।<br /><strong>-अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव, डीएफओ कोटा वन मंडल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 14:27:37 +0530</pubDate>
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                <title>उड़ी हॉफ के आदेशों की धज्जियां </title>
                                    <description><![CDATA[बारां की शाहबाद रेंज में प्लांटेशन के धड़ाधड़ करवाए जा रहे काम।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/uri-hoff-s-orders-being-flouted/article-112315"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/rtrer-(1)42.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। बारां वनमंडल के अधिकारियों द्वारा वन विभाग के मुखिया हॉफ के आदेशों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही है। कागजों में बताए गए प्लांटेशनों के कार्यों को धरातल पर पूरा दिखाने के लिए धड़ाधड़ काम करवाया जा रहा है। कहीं जेसीबी से ट्रैंचे खुदवाई जा रही तो कहीं कच्ची सुरक्षा दीवार बनवाई जा रही है। इससे यह जगजाहिर हो रहा कि उच्चाधिकारियों की कार्रवाई का डर अधिनस्त अधिकारियों में समाप्त हो चुका है। इसी का नतीजा है कि हॉफ के आदेश बेअसर साबित हो रहे हैं। इधर, पर्यावरण प्रेमी एवं एडवोकेट शेलेष महता का कहना है कि बारां वनमंडल के प्लांटेशनों में भ्रष्टाचार की लगातार शिकायत मिलने पर वन विभाग के सर्वोच्च अधिकारी प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) ने 8 अप्रेल को बारां वनमंडल की विभिन्न रेंजों में करवाए जा रहे विकास कार्यों को तुरंत प्रभाव से बंद करवाने के आदेश जारी किए थे। यह आदेश मुख्य वनसंरक्षक कोटा  को दिए गए थे। लेकिन, बारां डीएफओ द्वारा काम बंद करना तो दूर आदेशों की अवहेलना में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।   </p>
<p><strong>हॉफ ने यह दिए थे आदेश </strong><br />प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) अरिजीत बनर्जी ने गत 8 अप्रेल को मुख्य वन संरक्षक कोटा को आदेश जारी किए थे। जिसमें बताया कहा गया था कि बारां वनमंडल में राज्य योजना, नाबार्ड, कैम्पा, आरएफबीडीपी एवं सीएसएस योजना के तहत उप वन संरक्षक बारां द्वारा अब तक सम्पादित वन विकास कार्यों पेटे भुगतान तुरंत बंद करवाकर वर्तमान में चल रहे या सम्पादित किए जाने वाले समस्त वन विकास कार्यों को आगामी आदेशों तक तुरंत बंद करवाने की कार्रवाई करें।</p>
<p><strong>आदेश के बाद से इन वनखंडों में हुए कार्य</strong><br />पर्यावरणविद् रामचरण माली व हरिशंकर शर्मा ने बताया कि वन बल प्रमुख हॉफ के गत 8 अप्रेल को प्लांटेशनों के कार्य बंद किए जाने के आदेश जारी होने के बाद से शाहबाद रेंज के विभिन्न वनखंडों में लगातार काम किए गए। जिसमें सुमेरा बांयाल, कुंडा कोटडा, संडोकरा-बी, कुंडा कोटड़ा-ए, कुंडा कोटड़ा-बी, राजपुर-बी तथा किशनगढ़ रेंज के कुंजी सवास वनखंड में लगातार वन विकास कार्य करवाए गए हैं। इन वनखंडों में  प्लांटेशन वॉल, लूज स्टोन, ट्रैंचों की खुदाई सहित पौधरोपण के लिए गड्ढ़े करवाए जा रहे हैं। </p>
<p><strong>शाहबाद रेंज के इन वनखंडों में चल रहे कार्य</strong><br />एडवोकेट शेलेष मेहता व भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व जिलाध्यक्ष बाबूलाल नागर ने बताया कि बारां वनमंडल की शाहबाद रेंज के विभिन्न वनखंडों में प्लांटेशन से संबंधित कार्य धड़ाधड़ पूरे करवाए जा रहे हैं। शाहबाद रेंज के वनखंड राजपुर-बी में कच्ची सुरक्षा दीवार बनवाई जा रही है। वहीं, वनखंड मुंडियार-ए में जेसीबी की सहायता से ट्रेंचे व गड्ढ़े खुदवाए जा रहे हैं। इसके अलावा इसी वनखंड में प्लांटेशन की कच्ची दीवार (लूज स्टोन) श्रमिकों द्वारा बनाई जा रही है। इसके लिए चूने की लाइनें की गई है। इधर, शाहबाद रेंज के ही वनखंड राजपुर-बी में श्रमिकों द्वारा सुबह से शाम तक कच्ची दीवार बनवाने का कार्य किया गया। जबकि, यह काम कागजों में वित्तीय वर्ष 2024-25 की समाप्ती से पहले ही पूरा होना दर्शा दिया गया है।</p>
<p><strong>छबड़ा विधायक ने सीएम को पत्र भेज की शिकायत </strong><br />बारां वनमंडल में सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत करवाए जा रहे विकास कार्यों में भ्रष्टाचार की शिकायत छबड़ा विधायक प्रताप सिंह सिंधवी ने 6 अप्रेल को सीएम भजनलाल शर्मा को पत्र भेज की थी। उन्होंने पत्र में कहा था कि लगातार शिकायतों से सरकार की छवि खराब हो रही है। उन्होंने पत्र में कहा कि बारां डीएफओ अनिल यादव द्वारा अपने पूर्व के पदस्थान उप वन संरक्षक (वन्यजीव) राष्ट्रीय चम्बल घडियाल अभ्यारण, धौलपुर के दौरान भी इसी तरह भ्रष्टाचार किया गया है, जिसका जनप्रतिनिधियों के विरोध के बाद एस.आई.टी. द्वारा जांच की जा रही है। ऐसे में विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत बारां डीएफओ द्वारा करवाए गए वन विकास के सभी कार्यों की अविलम्ब तृतीय पक्ष से जांच करवाएं तथा रिपोर्ट आने तक सभी कार्यों के भुगतान पर रोक लगवाई जाए। </p>
<p><strong>बारां डीएफओ ने मोबाइल किया स्वीच ऑफ</strong><br />दैनिक नवज्योति ने इस संबंध में बारां डीएफओ अनिल यादव को पांच से छह बार फोन कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कॉले अटैंड नहंी किए। इसके बाद उन्हें मैसेज किए, जिनका भी जवाब नहीं दिया गया। देर शाम को फिर से कॉल दिया तो उन्होंने मोबाइल  स्वीच आॅफ कर लिया। </p>
<p>इस संबंध में सीसीएफ जयपुर राजीव चतुर्वेदी द्वारा जांच की जा रही है। प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (हॉफ) के आदेश मिलते ही मैंने बारां डीएफओ को चिट्टी भेज दी थी। इस पर डीएफओ ने लिखित में दिया था कि उन्होंने काम बंद करवा दिए हैं। यदि फिर भी काम चल रहे हैं तो इसके साक्ष्य जांच अधिकारी को भेजेंगे।</p>
<p>सोनल जोरिहार, सीसीएफ वनमंडल कोटा <br />इस संबंध में यदि कोई ऐसे तथ्य है तो हमें भेजें, उनका परीक्षण करवाकर जो भी उचित कार्रवाई होगी वो की जाएगी। <br /><strong>- राजीव चतुर्वेदी, सीसीएफ एवं जांच अधिकारी जयपुर</strong></p>
<p>कोटा सीसीएफ भी हॉफ के आदेशों की पालना नहीं करवा पा रहीं। वन बल प्रमुख (हॉफ) के आदेशों की अवमानना करना उप वन संरक्षक की मजबूरी हो गई हैं, क्योंकि उनके द्वारा सभी विकास कार्य गत वित्तीय वर्ष 31 मार्च को ही कागजों में करवाए जा चुके हैं। अब जांच के डर से उनको मौके पर कार्य करवाने पड़ रहे हैं और उच्चाधिकारी उनके विरुद्ध कार्रवाई को विलंब करके कार्य करवाने का पूरा समय दे रहे हैं।  <br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p>बारां डीएफओ का भ्रष्टाचार जगजाहिर हो गया फिर भी वन विभाग के आला अधिकारियों द्वारा उन्हें फर्जी बिलों वाले कामों को पूरा करने का मौका दिया जा रहा है। पाबंदी के बावजूद वन सुरक्षा समितियों के कार्यों को प्रतिबंधित मशीनों द्वारा करवाए जा रहे हैं। इसके बावजूद उच्चाधिकारियों की खामोशी समझ से परे है। <br /><strong>- नितिन नागर, वन्यजीव प्रेमी बारां</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 28 Apr 2025 17:48:31 +0530</pubDate>
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                <title>बूंदी वन मंडल में सड़क बनने का मामला जयपुर पहुंचा, सवालों से बचते रहे डीएफओ</title>
                                    <description><![CDATA[वन सुरक्षा प्रमुख बोले-वनभूमि पर लगातार सड़कें बनना अत्यंत गंभीर।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-matter-of-road-construction-in-bundi-forest-division-reached-jaipur/article-111757"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/rtrer21.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। बूंदी वनमंडल की नैनवां रैंज के जजावर-बी वनखंड में पीडब्ल्यूडी द्वारा डामर सड़क बनाए जाने का मामला जयपुर अरण्य भवन पहुंच गया है। वन विभाग के आला अधिकारियों ने भारत सरकार के वन संरक्षण अधिनियम 1980 व वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 का लगातार उल्लंघन कर वनभूमि पर सड़क बनने को अत्यंत गंभीर माना। उन्होंने बूंदी डीएफओ से मामले को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। </p>
<p><strong>मार्च में सड़क बनी, अब तक कार्रवाई नहीं</strong><br />जजावर वनखंड-बी में गत मार्च के प्रथम सप्ताह में वन अधिकारियों की मौन स्वीकृति पर पीडब्ल्यूडी ने 100 मीटर लंबी और 3.80 मीटर चौड़ी डामर सड़क बना दी। बूंदी डीएफओ को घटना का पता करीब 26 मार्च को लग गया था। इसके बावजूद उनके द्वारा पीडब्ल्यूडी अधिकारियों व संवेदक के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।  जबकि, भारत सरकार के वर्ष 2021-22 के सर्कुलर के तहत डीएफओ को जिला न्यायालय में इस्तगासा पेश कर संबंधित कार्यकारी एजेंसी के खिलाफ प्रकरण दर्ज कराने के निर्देश हैं। लेकिन उप वन संरक्षक द्वारा कार्यकारी एजेंसी को पत्र लिखे जाने के अलावा कोई कार्रवाई नहीं की गई। </p>
<p><strong>उड़ा रहे कानून का मखौल</strong><br />बूंदी वनमंडल में गत वर्ष से अब तक 14 माह में तीन अलग-अलग रेंजों में तीन बार सड़कें बन चुकी है। इसके बावजूद एक भी मामले में कार्रवाई नहीं की गई। हालात यह है, वन अफसर ही भारत सरकार के कानून वन संरक्षण अधिनियम 1980 का जमकर मखौल उड़ाने में कसर नहीं  छोड़ रहे। जबकि, इस कानून का उल्लंघन वन विभाग में जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। </p>
<p><strong>सवालों से बचते रहे डीएफओ</strong><br />मामला उजागर होने के बाद नवज्योति ने बूंदी वनमंडल के डीएफओ देवेंद्र सिंह भाटी से सम्पर्क किया लेकिन उन्होंने कॉल अटैंड नहीं किया। इसके बाद मैसेज कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने इसका भी जवाब नहीं दिया।</p>
<p><strong>वन्यजीवों का हैबीटाट हो रहा नष्ट</strong><br />बूंदी वनमंडल के जंगलों में लगातार पक्की सड़कों के निर्माण से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। कहीं सीसी तो कहीं डामर सड़कों के निर्माण से छोटे जीवों व सरीसृपों का घरौंदा झाड़-झाड़ियां व पेड़-पौधे नष्ट कर दिए गए। वहीं, जेसीबी व अन्य मशीनरी के शोर-शराबे से वन्यजीव अपना रहवास छोड़ पलायन को मजबूर हो गए। जबकि, उनके सुरक्षित जीवन की जिम्मेदारी वन अफसरों की है और वो ही स्वार्थ के चलते उनकी दुनिया उजाड़ने में लगे हैं। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />बूंदी वनमंडल में लगातार एफसीए कानून का उल्लंघन कर वन भूमि पर सड़कें बनना अत्यंत गंभीर है। यह वन सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। मामले को लेकर डीएफओ से रिपोर्ट मांगी जा रही है। जिसके आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।<br /><strong>- केसी मीणा, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन सुरक्षा जयपुर</strong></p>
<p>आपके द्वारा मामला संज्ञान में आया है। संबंधित अधिकारी से रिपोर्ट मांगी है। <br /><strong>- अरुण प्रसाद, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, एफसीए जयपुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Apr 2025 14:58:46 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का - जलने वाली सूखी घास सफेद और उगने वाली हरी, कैसे?</title>
                                    <description><![CDATA[जिस घास में आग लगी वो प्लांटेशन की या बाहर से लाई गई]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news---the-dry-grass-that-burns-is-white-and-the-one-that-grows-is-green--how/article-94578"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/6630400-sizee-(1)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा वन मंडल के लाडपुरा रेंज में मेटिगेटिव मैजर्स के तीन प्लांटेशनों में मंगलवार को एक साथ लगी आग के मामले में बुधवार को संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। जलने वाली घास प्लांटेशन की थी या बाहर से लाकर षड़यंत्रपूर्वक जलाई गई?, आग लगने के कारण, स्टाफ की तैनाती के बावजूद आग कैसे लगी? मंशा?  सहित अन्य कारणों की जांच सीसीएफ कार्यालय में कार्यरत डीएफओ से करवाई जाएगी।  हालांकि, पर्यावरणविदें का कहना है, तीनों प्लांटेशन में जिन घास में आग लगी, वह प्लांटेशन में उगी घास से बिलकुल भिन्न है। क्योंकि, जलने वाली सूखी घास डंठलनुमा सफेद रंग की है, जबकि इसी के पास प्लांटेशन में उगी घास कई जगहों पर हरी तथा कुछ जगहों पर पीले रंग की है, जो पानी की नमी के कारण होती है। ऐसे में सूखी घास को बाहर से लाकर साजिशन जलाए जाने की संभवना प्रतित होती है। </p>
<p><strong>मौके पर कटी पड़ी थी घास</strong><br />बायोलॉजिस्ट रवि कुमार ने बताया कि दोपहर को  मुकुंदरा स्पेशल विहार कॉलोनी से सटे बरड़ा बस्ती प्लांटेशन में मौका देखने गए थे। जहां आग लगी वहां सफेद रंग की मोटे तने की सूखी घास का ढेर लगा हुआ था। यह घास कटी हुई थी। जबकि, इस प्लांटेशन में घटनास्थल के पास उगी घास हरे रंग की थी। वहीं, कुछ जगहों पर पीले रंग की घास उगी हुई थी। ऐसे में देखने से स्पष्ट होता है कि जलने वाली घास इस प्लांटेशन की नही होना प्रतित होती है। </p>
<p><strong>यहां उगती हैस्पीयर हैड घास </strong><br />बायोलॉजिस्ट रवि का कहना है कि मेटिगेटिव मैजर्स के प्लांटेशन पथरीले व चट्टानी वनक्षेत्र है। ऐसे में यहां स्पीयर हैड, डायकेन्थियम अनुलटम घास, डिजिटेरिया डेकम्बेंस घास प्रजाति की घास उगती है, जो पतली नुकीली सूई जैसी होती है। इसके तने का व्यास काफी कम होता है। जबकि, मौके पर जलने वाली घास का ढेर मिला, उसका डंठल काफी मोटा और चौड़ा है। ऐसे में यह घास यहां की नहीं हो सकती। </p>
<p><strong>गार्ड नहीं दे सका संतोषजनक जवाब</strong><br />पर्यावरणप्रेमी सतीश कुमार, बजरंग सिंह जादौन ने बताया कि बरडा बस्ती प्लांटेशन में चौकी बनी हुई है, जिस पर रैत्या चौकी नाका लिखा हुआ था। यहां तैनात सुरक्षा गार्ड से आगजनी की घटना के बारे में पूछा तो उसने अज्ञात दो लोगों द्वारा आग लगाना बताया। लेकिन, इस प्लांटेशन के मुख्य दरवाजे से घटनास्थल की दूरी करीब एक किमी है और वहां तक  पहुंचने से पहले 15 से 18 फीट गहरा विशाल खनन के गड्ढ़ों से होकर गुजरना पड़ता है। आसपास गड्ढ़ों में पानी भरा हुआ है। चौकी बनी हुई है, जहां स्टाफ तैनात रहता है, इसके बावजूद कथाकथित अज्ञात दो व्यक्तियों द्वारा प्लांटेशन में घुसकर आग लगाकर चले जाने की बात समझ से परे है। मौके के हालात देखकर जानबूझ कर आग लगाने या लगवाना प्रतित होता है। जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।</p>
<p>लाडपुरा रेंज के मेटिगेटिव मैजर्स के प्लांटेशनों में आग लगने के मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। डीएफओ स्तर के अधिकारी से जांच करवाई जाएगी। जिसमें सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच की जाएगी। जिसमें किसी वन कर्मचारी या अधिकारी की लापरवाही मिलती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। <br /><strong>- रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वनसंरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Nov 2024 14:29:48 +0530</pubDate>
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                <title> प्लांट स्टेशनों में अचानक लगी आग</title>
                                    <description><![CDATA[नयागांव व क्रेशर बस्ती के मेटीगेटिव मेजर्स प्लांटेशनों में सूखी घासों में आग से संशय। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/did-the-fire-occur-or-was-it-set/article-94536"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/630400-sizee4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा वन मंडल की लाडपुरा रैंज में एक ही दिन में मेटिगेटिव मैजर्स के दो से तीन प्लांटेशनों में अचानक आग लगने से कई सवाल खड़े हो गए। जबकि, एक प्लांटेशन  की सतह पर हरी घास नजर आ रही है, जिसके ऊपर सूखी घास पड़े होने तथा उनमें लगती आग संशय करती है कि आग लगी या लगवाई गई।  पर्यावरणविदें का तर्क है, क्रेशर बस्ती, नयागांव नाका स्थित प्लांटेशन पथरीली वन भूमि पर हैं, ऐसे में यहां इतनी मात्रा में सूखी घास होना और उनमें आग लग जाना षड़यंत्र की ओर इशारा कर रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बुधवार को अरण्य भवन जयपुर से लाडपुरा रेंज में मेटिगेटिव प्लांटेशनों की जांच के लिए एक टीम कोटा आ रही है। यह टीम पूर्व में लखावा प्लांटेशन-8 की जांच करने आए अतिरिक्त मुख्य प्रधान वनसंरक्षक ने जांच के दौरान प्लांटेशन में 150 से ज्यादा पौधे नहीं होने की बात कहते हुए सभी प्लांटेशनों में उगे पौधों की वास्तविक संख्या जांचने के लिए अलग से जांच करवाने की बात कही थी।</p>
<p><strong>वास्तविक पौधो की संख्या जांचने आ रही टीम</strong><br />वन विभाग मुख्यालय से गठित यह टीम मेटिगेटिवमेजर्स के तहत लगे प्लांटेशनों में रिकॉर्ड में बताए पौधों की वास्तविक संख्या जांचने आ रही है। ऐसे में कहीं लापरवाह कर्मचारियों की चोरी न पकड़ी जाए, इसलिए प्लांटेशनों में आग लगाने का षड़यंत्र होने की आशंका है।  ऐसे में सवाल और गहरा जाता है कि टीम के आने से एक दिन पहले ही सिर्फ मेटिगेटिव प्लांटेशनों में ही आग लग जाती है?, जबकि अन्य नाबार्ड व कैम्पा के तहत लगे प्लांटेशनों में आग नहीं लगती? इस तरह के कई सवाल उठ रहे हैं। </p>
<p><strong>वीडियो में दिख रहा सूखी घास का ढेर</strong><br />रावतभाटा रोड स्थित मेटिगेटिव मैजर्स का नयागांव नाके के प्लांटेशन में बड़े हिस्से में आग लग रही  है। जिसके वीडियो में सूखी घास के ढेर पड़े साफ दिखाई दे रहे हैं। जिसे देखने से ऐसा प्रतित होता है कि यह घास किसी के द्वारा फैलाने से बच गए। वहीं, प्लांटेशन की जमीन पर सूखी घास के तिनके फैले हुए हैं। ऐसे में कहीं जानबूझकर आग लगवाने का षड़यंत्र से इंकार किया जाना संभव प्रतित नहीं होता। पर्यावरणविदें  का कहना  है कि इन प्लांटेशनों में आग लगने की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। </p>
<p><strong>पर्यावरणविद् बोले-इतनी सूखी घास कैसे आई?</strong><br />पर्यावरणविदें ने मेटिगेटिव मैजर्स के अनंतपुरा स्थित क्रेशर बस्ती स्थित प्लांटेशन में बड़ी मात्रा में सूखी घास के ढेर अचानक कैसे आ गए। यह बड़ा सवाल है। क्योंकि, इसमें एफएमडीसीसी पोर्टल पर इस षड़यंत्रपूर्वक लगाई गई आग को प्राकृतिक आपदा का रूप देकर अपनी लापरवाही व भ्रष्टाचार को छिपाने की कोशिश कर सकते हैं। </p>
<p><strong>जहां पानी वहां घास कैसे सूखी</strong><br />क्रेशर बस्ती स्थित प्लांटेशन में जिस जगह सूखी घास में आग लगी है, वहां ताजा पानी सूखा हुआ नजर आ रहा है। ऐसी जगह पर इस तरह की घास का ढेर जल रहा है वो पैदा ही नहीं हो सकती। क्योंकि, यहां जमीन में पानी की नमी है, ऐसे में घास कैसे सूख सकती है, वो भी इतनी बड़ी मात्रा में। इसके पीछे षड़यंत्र की बू आ रही है। </p>
<p><strong>सीसीएफ ने नहीं उठाया फोन</strong><br />इस मामले में नवज्योति ने संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक रामकरण खैरवा से सम्पर्क किया लेकिन उन्होंने फोन अटैंड नहीं किया। उनका पक्ष जानने के लिए दो बार कॉल लगाए गए लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Nov 2024 16:00:50 +0530</pubDate>
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                <title>जघन्य अपराधों को फाइलों में किया बंद</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा यूनिवर्सिटी में अवैध रूप से रखे मृत सांपों की जांच खा रही धूल। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/heinous-crimes-buried-in-files/article-75497"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/jaghanya-apradho-ko-filo-me-kiya-dafan...kota-news-20-04-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। गंभीर वन अपराध रोकने व अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में वन विभाग कितना लापरवाह है, इसकी बानगी कोटा वनमंडल की कार्यशैली से झलकती है। जिले में भ्रष्टाचार और लापरवाही के दो संगीन अपराधों की जांच करना तो दूर सरकार को हुए राजस्व के नुकसान की भी भरपाई नहीं कर सका।  हालात यह हैं, वन विभाग की दुनिया के जघन्य अपराधों की जांच फाइलों में बंद करने में जुटा है। भले ही वो मामले, आंवली रोजड़ी प्लांटेशन की 5 किमी की दीवार के पत्थर चोरी का हो या फिर कोटा यूनिवर्सिटी की लैब में अवैध रूप से रखे शेड्यूल-1 व 2 के कोबरा, करैत व चैकर्ड किलबैक के मृत का मामला हो। यह वन विभाग की नजर में अपराध नहीं है। हैरानी की बात यह है, मामले उजागर होने के एक साल बाद भी सांपों को मारने वालों को पकड़ नहीं पाया और जांच भी फाइलों के ढेर में दबाकर बंद कर दी। ऐसे में वन अधिकारियों की मंशा व वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी सवालों के घेरे में आती है।</p>
<p><strong> दीवार चोरों पर नहीं हुई कार्रवाई</strong></p>
<p>रावतभाटा रोड पर नगर वन से सटे आंवली-रोजड़ी प्लांटेशन की 5 किमी लंबी सुरक्षा दीवार चोरी हो गई। 4 फीट ऊंची यह दीवार गायब होते ही करोड़ों का प्लांटेशन भी फेल हो गया। माफियाओं के ट्रैक्टर-ट्रॉलियों ने पौधों को रौंद दिया और अवैध खनन कर वन सम्पदा लूट ले गए। 150 हैक्टेयर में लगे 30 हजार पौधों में से 66 प्रतिशत से अधिक पौधे बर्बाद हो गए। इस प्लांटेशन में पौधों की सरवाइल रेट मात्र 36 प्रतिशत ही रह गई। दैनिक नवज्योति ने 8 अप्रेल को पेज-7 पर वन विभाग की सुरक्षा दीवार चोरी, 150 हैक्टेयर का प्लांटेशन फेल... शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। इसके बाद भी कोटा वन मंडल अब तक गुनाहगारों को सजा नहीं दिलवा पाया। </p>
<p><strong>किसने मारा कोबरा और करेत...</strong><br />कोटा विश्वविद्यालय में वाइल्ड डिपार्टमेंट की लैब में अवैध रूप से शेडयूल 1 व 2 के वन्यजीवों का मृत शरीर व हड्डियां रखे जाने का खनसनीखेज मामला  दैनिक नवज्योति ने गत वर्ष 20 अक्टूबर को उजागर किया था। इसके बाद वन विभाग ने फौरी जांच कर फाइल बंद कर दी। जबकि, चोरी छिपे लैबोरेट्री में इन वन्यजीवों के अवशेषों को रखना वाइल्ड एक्ट 1972 का खुला उल्लंघन था। प्रारंभिक जांच में कोटा वनमंडल ने गंभीर तथ्यों की अनदेखी की। यूनिवर्सिटी में सांपों के मृत शरीर कौन लेकर आया, कौबरा, करेत व चैकर्ड किलबैक को किसने मारा, एक स्थान से दूसरे स्थान पर किसकी परमिशन से शेड्यूल-1 व 2 के वन्यजीवों के मृत शरीर व हड्डियों का परिवहन हुआ। तस्करी समेत गंभीर मामलों की जांच करने के बजाए फाइलों में बंद कर दिया।</p>
<p>आवंली रोजड़ी प्लांटेशन की दीवार चोरी होने के मामले की जांच करवा रहे हैं। वन मंडल डीएफओ को जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। वहीं, सांप वाले मामले की भी जांच करवाएंगे। <br /><strong>- रामकरण खैरवा, मुख्य वन संरक्षक एवं फिल्ड निदेशक कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Apr 2024 16:35:46 +0530</pubDate>
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