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                <title>DN Special - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>DN Special RSS Feed</description>
                
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                <title>75 साल बाद भी 80 करोड़ को मुफ्त राशन देने की जरूरत?</title>
                                    <description><![CDATA[देश की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। आजादी से लेकर अब तब देश से गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका है। यह जानकर हैरानी होती है कि 75 साल बाद भी 80 करोड़ जनसंख्या गरीब है। सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश के 80 करोड़ गरीबों को दीपावली तक मुफ्त अनाज देगी। 75 वर्षों में ऐसी स्थिति क्यों आई की देश के 80 करोड़ लोगों के लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था सरकार को करनी पड़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/75-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%AD%E0%A5%80-80-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A5%9C-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%A4/article-1291"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-07/ration.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>@नरेंद्र चौधरी</strong><br /> देश की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। आजादी से लेकर अब तब देश से गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका है। यह जानकर हैरानी होती है कि 75 साल बाद भी 80 करोड़ जनसंख्या गरीब है। सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश के 80 करोड़ गरीबों को दीपावली तक मुफ्त अनाज देगी। 75 वर्षों में ऐसी स्थिति क्यों आई की देश के 80 करोड़ लोगों के लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था सरकार को करनी पड़ रही है। इतने वर्षों में गरीबी उन्मूलन के लिए जितना धन खर्च हुआ उसका क्या हुआ? वह धन डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से आयकर दाताओं का ही था। एक ही समस्या के लिए क्या आयकरदाता जिंदगी भर पैसा देते रहेंगे उन्हें क्या हर साल पैसा देना पड़ेगा जबकि गरीबी उन्मूलन आज तक नहीं किया गया। 80 करोड़ गरीब अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और मकान से वर्तमान में भी ऊपर नहीं उठ पाए हैं, इनकी आय का स्तर इतना कम है कि भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ है। दो वक्त की रोटी जुटा पाने में इनकी जिंदगी निकल जाती है। उसी में इतने उलझे रहते हैं तो शिक्षित कैसे हो पाएंगे। <br /> <br /> जब इतनी आबादी शिक्षित नहीं हो पाएंगी तो देश का विकास कब व कैसे होगा? देश के फैसले में इनकी भागीदारी नहीं हो पाती है। बड़े मुद्दों पर निर्णय लेने में इनकी राय नहीं आ पाती है। ओपिनियन बिल्डिंग में इनका कोई सहयोग ही नहीं है। 80 करोड़ यानी 57 प्रतिशत आबादी की महत्वपूर्ण मुद्दों पर भागीदारी नहीं मिलती, कैसे तरक्की होगी देश में...? यदि 80 करोड़ शिक्षित होंगे तो देश का भविष्य और विकास की दिशा ही बदल जाएगी, क्योंकि यह अपने अधिकारों के बारे में जागरुक हो जाएंगे। अभी ये अपने अधिकारों के बारे में जानते नहीं है। सरकार एजुकेशन के नाम पर एजुकेशन सेस भी ले रही है। वह पैसा  भी कहां जा रहा है? गरीबी उन्मूलन समस्या के लिए बार-बार पैसा लिया जाता है लेकिन आज तक इतनी सरकारें आईं और गईं, किसी का भी यह एजेंडा नहीं रहा कि हम इतने समय अवधि में देश से गरीबी का उन्मूलन कर देंगे। इस बात की आज तक किसी ने गारंटी नहीं दी। यह समस्या सिर्फ अकेले ना तो केंद्र सरकार की है, और ना ही राज्य सरकारों की है। यह सबकी समस्या है। इस पर राज्य व केंद्र सरकार दोनों को मिलकर काम करना चाहिए? <br /> <br /> विश्व में बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी हैं। उनसे इस मसले पर चर्चा की जानी चाहिए। वह पूरा प्लान बताएं कि इतनी समय अवधि में संपूर्ण देश से गरीबी उन्मूलन कर दिया जाएगा और उसके लिए इतना धन लगेगा। गरीबी हटाओ का नारा तो 1971 में दिया गया था इसके बावजूद आज भी गरीबी नहीं हटाई जा सकी। गरीबी देश के लिए नुकसानदायक ही है। गरीबी दूर होगी तो अपराध भी घटेंगे। भूख से जब इन्हें निजात मिलेगी तो शिक्षित होने के बारे में सोच पाएंगे क्योंकि भूखे पेट पढ़ाई भी नहीं होती है। भूख ही है जो आपराधिक गतिविधियों के दलदल में धकेलती है। वहीं दूसरी ओर देश की राजनीति भी गरीबों को अशिक्षित और गरीब बनाए रखना चाहती है जिससे राजनीति चलती रहे। जब गरीबी हटेगी और शिक्षा का स्तर बढ़ेगा तो देश उन्नति कर पाएगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jul 2021 17:34:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में एक बार नाथी का बाड़ा चर्चा में है। हो भी क्यों ना हर कोई नेता नाथी का बाड़ा से ताल्लुकात रखे बिना नहीं रहते। इसके बिना उनकी पार भी नहीं पड़ती है। गुजरे जमाने में नाथी का बाड़ा केवल पाली जिले से ताल्लुकात रखता था लेकिन अब इसका थड़ा बदल कर सीकर के लक्ष्मणगढ़ इलाके में पहुंच गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-1263"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------</strong></p>
<p> </p>
<p><strong>चर्चा में नाथी का बाड़ा<br /> </strong>सूबे में एक बार नाथी का बाड़ा चर्चा में है। हो भी क्यों ना हर कोई नेता नाथी का बाड़ा से ताल्लुकात रखे बिना नहीं रहते। इसके बिना उनकी पार भी नहीं पड़ती है। गुजरे जमाने में नाथी का बाड़ा केवल पाली जिले से ताल्लुकात रखता था लेकिन अब इसका थड़ा बदल कर सीकर के लक्ष्मणगढ़ इलाके में पहुंच गया है। गोविन्द की मेहरबानी से ख्वाजा की नगरी तक इसका असर पड़ा। राज का काज करने वाले में चर्चा है कि जागीरदारों ने नाथी का बाड़ा वैसे ही नाम थोड़े ही दिया था, इसके लिए उनको दिन-रात पसीने बहाने पड़े थे। नाथी के बाड़े में कदम रखने से पहले आगा-पीछा सोचना पड़ता है, लेकिन इस बार लक्ष्मणगढ़ वाले भाई साहब ने सीना ठोक कर कदम रखा, तो बीकाजी की नगरी से गुलाबीनगर तक हलचल मच गई। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि नाथी का बाड़ा में तो पहले भी कई बड़े साहबों के कदम पड़े थे, तब भी बाल भी बांका नहीं हुआ था, तो अब उम्मीद रखने से कोई लाभ नहीं है।<strong><br /> <br /> वो आए और चले गए<br /> </strong>सूबे में एक साल से चल रहे सियासी संकट को लेकर कई भाई लोगों की नींद उड़ी हुई है। वे दिन-रात दुबले हो रहे हैं। उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। गुटबाजी में फंसे हाथ वाले भाई लोगों के समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर संडे को चर्चा थी कि आलाकमान के दोनों संदेशवाहक आए और चले गए। भाई लोगों ने सूंघासांघी भी खूब की, मगर बंद कमरों में क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला। शनिवार तक उछलकूद कर रहे एक खेमे के लोगों को सांप सूंघ गया। अब वे कानाफूसी कर रहे हैं कि जब गोपालजी और अजय को कुछ करना ही नहीं था, तो हवा गर्म करने के पीछे कोई न कोई राज जरूर है। अब उनके अच्छी तरह समझ में आ गया कि राजनीति में जो होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है। इसलिए दोनों वाहक आए और संदेश देकर चले गए।<strong><br /> <br /> नाइट वॉच मैन भी...<br /> </strong>आजकल सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। जबसे इस दफ्तर में आमेर वाले पूनिया का पदार्पण हुआ है, तब से कई जुमले भी पैदा हो रहे हैं। भगवा वाली पार्टी के नए सदर इन छोटे सतीश जी को लेकर कई लोगों की जुबान फिसल रही है। दिलजले उन्हें नाइटवॉचमैन की संज्ञा तक दे रहे हैं। लेकिन उनको यह बोध नहीं है कि नाइटवॉचमैन भी हीरो बन सकता है, बशर्ते वह अपने दिमाग से काम लें। पूनिया जी की नियुक्ति के बाद मैडम के लोग भी काफी सक्रिय हैं। वो मैडम को सलाह दे रहे हैं कि छह महीने की दूरियों से काफी नुकसान उठाना पड़ा है, उसकी भरपाई बहुत जरूरी है। सलाह का असर सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी दिखाई देने लगा है। भगवा वाले ठिकाने पर चर्चा है कि कुछ दिनों बाद सरदार पटेल मार्ग के बंगला नंबर 51 में तस्वीर बदली हुई नजर आएगी। अब गेंद पूनिया जी के पाले में है<strong>।<br /> <br /> चर्चाएं पावरफुल होने की<br /> </strong>इंदिरा गांधी भवन में हाथ वाली पार्टी के दफ्तर में बड़ी कुर्सियों को लेकर दिनभर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। चर्चाएं भी बोर्ड और निगमों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों में पावरफुल को लेकर है। लक्ष्मणगढ़ वाले गोविंद जी भाई साहब जब भी दफ्तर में आते हैं, तो चर्चाएं जोर पकड़ लेती हैं। पिछले दिनों ठिकाने पर एक लिफाफा हवा में लहराने के बाद तो चर्चाओं ने और भी जोर पकड़ लिया था। अब बिना सिर पैर की बातें बनाने वाले हाथ वाले भाइयों को कौन समझाए कि पावरफुल तो वो ही होता है, जो सरकार चलाता है। अब समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<strong><br /> (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 26 Jul 2021 17:19:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों एक बार फिर ललचाई नजरों को लेकर काफी खुसरफुसर है। दोनों दलों में नेताओं की नजरें भी दिल्ली की तरफ टिकी हैं। भगवा और हाथ वाले एक-एक गुट को दिल्ली वालों बड़ी आस है। दिल्ली वाले हैं कि सिर्फ चक्कर पर चक्कर कटवा रहे हैं और कोई फरमान जारी नहीं कर रहे। वे फिलहाल वजन टटोलने में लगे हुए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-997"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> ललचाई नजरें</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक बार फिर ललचाई नजरों को लेकर काफी खुसरफुसर है। दोनों दलों में नेताओं की नजरें भी दिल्ली की तरफ टिकी हैं। भगवा और हाथ वाले एक-एक गुट को दिल्ली वालों बड़ी आस है। दिल्ली वाले हैं कि सिर्फ चक्कर पर चक्कर कटवा रहे हैं और कोई फरमान जारी नहीं कर रहे। वे फिलहाल वजन टटोलने में लगे हुए हैं। आंकड़ों में मायाजाल में फंसे दिल्ली वालों की मजबूरी भी जगजाहिर है। सूबे के नेताओं के पास भी अपने पक्ष में झूठी बातें प्रचारित करने के सिवाय कोई चारा नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि सूबे में हाथ वाले भाई लोगों को पिछले साल इसी महीने में की गई गलतियों की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी, चाहे कोई कितने ही आंसू पौंछ दे। गांधी परिवार से ताल्लुकात रखने वाले नेताओं के सलाहकार भी तो एक कदम आगे हैं, उन्होंने बता दिया कि जल्दबाजी में अपने फ्यूचर के रास्ते में शूल बोने से नुकसान के सिवाय कुछ भी हाथ में आने वाला नहीं है। इस सलाह को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /> <br /> <strong>पैंतरा साहब का</strong><br /> सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के सरपंच प्रोफेसर साहब का कोई सानी नहीं है। सरपंच साहब भी छोटे मोटे नहीं बल्कि नाथद्वारा से ताल्लुकात रखते हैं और कॉलेज के अपने जमाने में कइयों की हेकड़ी निकाल चुके हैं। दाढ़ी वाले सरपंच साहब जो करते हैं, वह सामने वालों के बाद में समझ में आता है। अब देखो ना सरपंच साहब ने दो दिन पहले ऐसा पैंतरा फेंका कि गुढ़ामलानी वाले चौधरी जी को समझ में नहीं आया। प्रेशर पॉलिटिक्स के चक्कर में इंदिरा गांधी नहर का पानी पीने वाले हेमा जी ने तो सरपंच साहब को इस्तीफा भेजा था, लेकिन सरपंच साहब उनसे भी एक कदम आगे निकले और कमेटी में शामिल कर सात दिन के लिए श्रीनाथजी की शरण में चले गए। अब बेचारे हेमाजी के पास अपना सिर पीटने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है। अब उनको कौन समझाए कि प्रोफेसर साहब ने जो किया, वह उनकी क्लास अटेंड किए बिना कतई समझ में नहीं आता। <br /> <br /> <strong>याद बीते दिनों की </strong><br /> आजकल खाकी वालों पर शनि की दशा है। कभी चौराहे पर तो कभी गली में पिट रहे हैं। और तो और चूड़ियों वाली तक हाथ पैर चला जाती है। बेचारे खाकी वाले भी क्या करें, उनको अपने ऊपर वालों पर भरोसा नहीं है, कब इंक्वायरी बिठा दे। सो पिटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। करे भी तो क्या पुलिस का इकबाल जो खत्म हो गया। अब टाइगर और लॉयन तक दहाड़ मारना भूल गए। पीटर और गामाज के बारे में सोचना तो बेईमानी होगी। विक्टर की मजबूरी जगजाहिर है। उनके काम में खलल की किसी में दम नजर नहीं आ रहा। अब तो खाकी वाले भाई लोग ऊपर वालों से प्रार्थना कर रहे हैं कि कोई उनके बीते दिन लौटा दे ताकि खाकी का इकबाल कायम रहे।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि प्रसाद को लेकर है। प्रसाद भी किसी मंदिर का नहीं बल्कि बगावत से ताल्लुक रखता है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में आने वाले हर किसी वर्कर की जुबान पर पार्टी के डिसिप्लिन एण्ड फ्यूचर को लेकर चर्चा हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि 136 साल पुरानी पार्टी में इनडिसिप्लिन करने वालों को प्रसाद तो मिला है, लेकिन मीठा नहीं।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 05 Jul 2021 16:27:08 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोग 19 और 27 के फेर में फंसे हुए हैं। दोनों खेमों के नेताओं के 11 महीनों से समझ में नहीं आ रहा कि आखिर इस फेर के चक्रव्यूह का तोड़ क्या है। दिल्ली वाले नेता भी इसके चलते चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-812"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> 19 और 27 का फेर</strong><br /> सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोग 19 और 27 के फेर में फंसे हुए हैं। दोनों खेमों के नेताओं के 11 महीनों से समझ में नहीं आ रहा कि आखिर इस फेर के चक्रव्यूह का तोड़ क्या है। दिल्ली वाले नेता भी इसके चलते चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। अब देखो ना जोधपुर वाले अशोक जी के खिलाफ बगावत करने वाले 19 हैं, तो समर्थित पक्ष वालों की संख्या 27 है, बाकी 81 तो वैसे ही खुले में राज का गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। शेष 71 हैं, जो खुद ही 40 और 31 के फेर में ऐसे लिपटे हुए हैं कि दूसरों के बारे में सोचने की फुर्सत तक नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि जब 19 ही मूंछों पर ताव दे रहे हैं, तो 27 तो सामने वालों को कहीं का भी नहीं छोड़ेंगे। अब इतना ही इशारा काफी है, चूंकि समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /> <br /> <strong>खेल नरम-गरम का</strong><br /> भगवा वाले दल में नरम और गरम का खेल के चक्कर में सूबे के भाईसाहबों की नींद उड़ी हुई है। उड़े भी क्यों नहीं, बेचारों के समझ में नहीं आ रहा है कि नरम और गरम दल के इस खेल में वे किस पाले के खिलाड़ियों के लिए ताली बजाए। भाईसाहबों में खुसरफुसर है कि जब से नमोजी ने हाथ वाले कुछ भाइयों की तारीफ करना शुरू किया है, उनका सबका साथ, सबका विश्वास नारा एक धड़े को नापसंद है। भाईसाहबों का तर्क है कि जब अटल जी नरम पड़े, तो आडवाणी ही गरम हुए और आडवाणी जी नरम पड़े तो मोदी जी गरम हुए बिना नहीं रह सके। अब मोदी जी नरम पड़ते दिखाई दे रहे हैं, तो योगी जी को गरम होना लाजमी है। योगी धड़े वाले भाईसाहब सिर्फ एक धर्म की बात करने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं और दिल्ली में इस विचारधारा का श्रीगणेश भी कर दिया है।<br /> <br /> <strong>लाइलाज छपास रोग</strong><br /> सूबे में एक बार फिर छपास रोग को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। चर्चा करने वाले और कोई नहीं, बल्कि हाथ वाली पार्टी के वर्कर हैं। अपने नेताओं के लगे पब्लिसिटी नाम के इस रोग को लेकर वर्कर्स काफी परेशान हैं। बेचारे वे अपने नेताओं को समझाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे, लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं। वर्कर्स का सालों लंबा अनुभव है कि पब्लिक पर भरोसा नहीं कर फोटो छपवाने वाले कभी बड़ा नेता नहीं बन सकते। कोरोना में ठाले बैठे वर्कर्स ने छपास रोग वाले नेताओं की लिस्ट तो बना ली, लेकिन बेचारों के सामने नाम बोलने से पहले इधर-उधर देख कर पीछे हटने की मजबूरी है।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि ओवर लेपिंग एमएलएज की है। इनकी संख्या भी सात है। जुमला है कि ओवर लेपिंग करने वाले इन एमएलएज की हालत काकड़ पर खड़े जिनावर की तरह है, जो इधर भी मुड़ सकते हैं और उधर भी। अब राज से बगावत करने वाले नेताओं को भी समझ में आ गया है कि 15 को साथ लेकर नंबर वन की कुर्सी पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है। अब दिल्ली वालों की आड़ में बीच का रास्ता निकालने में अपनी भलाई समझ रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वाले भाई लोगों के ठिकाने पर चर्चा है कि सत्ता तो जोधपुर वाले भाईसाहब की संभालेंगे और संगठन वापस पुराने हाथों में सौंपे जाने का फार्मूला अपनाए जाने की तैयारी अंतिम चरण में है। लेकिन यह भी अशोक जी भाईसाहब की मर्जी पर है। <br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 21 Jun 2021 16:25:28 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे की राजनीति में केबिनेट रिशफलिंग को एक बार फिर शगूफा उठा है। शगूफा भी पिंकसिटी से लेकर लालकिले वाली नगरी तक दौड़ रहा है। रिशफलिंग को लेकर हर कोई अपने हिसाब से मायने निकाल रहा है। निकाले भी क्यों नहीं, राजधर्म आड़े जो आ रहा है। दिल्ली तक की भाग दौड़ में एक बात का खुलासा हुआ है कि आलाकमान को एक सूची को इंतजार है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-712"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> इंतजार लिस्ट का</strong><br /> सूबे की राजनीति में केबिनेट रिशफलिंग को एक बार फिर शगूफा उठा है। शगूफा भी पिंकसिटी से लेकर लालकिले वाली नगरी तक दौड़ रहा है। रिशफलिंग को लेकर हर कोई अपने हिसाब से मायने निकाल रहा है। निकाले भी क्यों नहीं, राजधर्म आड़े जो आ रहा है। दिल्ली तक की भाग दौड़ में एक बात का खुलासा हुआ है कि आलाकमान को एक सूची को इंतजार है। सूची के लिए सूबे के नेताओं से भी पूछताछ हुई, पर उनके पास भी नहीं पहुंची। राज का काज करने वालों में खुसर-फुसर है कि आलाकमान को दस महीने से उस सूची का इंतजार है, जिसमें अंसतुष्ट खेमे की ओर से मंत्री बनाया जाना है। कन्फ्यूजन के चलते सूची फाइनल नहीं हो पा रही, चूंकि रोजाना नाम जोड़ने और हटाने से ही फुर्सत जो नहीं है। हम बताय देते हैं कि दिल्ली वाले तो पहले रिशफलिंग में राज के रत्नों की संख्या 21 से 26 करने के मूड में है।<br /> <br /> <strong>जब सेनापति कमजोर हो तो....</strong><br /> आज हम बात करेंगे सेनापति की। सेनापति कमजोर होता है, तो सेना का जीतना नामुमकिन नहीं असंभव होता है। सूबे की सियासी राजनीति में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि सूबे में पिछले एक साल से जो चल रहा है, उसके लिए लोकल लीडरशिप नहीं, बल्कि लालकिले वाले महानगर में बिराजे पार्टी आलाकमान ज्यादा जिम्मेदार हैं। अब देखो ना जो कुछ हो रहा है, वह हाथ वाली पार्टी के लिए नहीं बल्कि पर्सनल एजेण्डे के लिए है, तभी तो सिर्फ थप्पी की वजह से दस महीनों में भी सुलटारा नहीं हो पाया, वरना दस दिन भी नहीं लगते। अब बेचारे आलाकमान भी क्या करे हम उम्र वालों की यारी दोस्ती आड़े जो आई हुई हैं।<br /> <br /> <strong>सौम्य-शील और भगवाधारी</strong><br /> सूबे में इन दिनों भगवाधारी भाई लोगों की हालत कुछ ज्यादा ठीक नहीं है। बेचारे अपने ही दल की सौम्या और शील के फेर में फंसे हुए हैं। फेर भी ऐसा है कि न उगला जा रहा है और नहीं निगला। बैठकों में चिंतन-मंथन करने वाले भाईसाहबों को तनिक भी अहसास नहीं था कि राज की बड़ी चतुराई से ग्रेटर वाली सौम्या और शील की आड़ में भारती भवन तक गर्मी हो जाएगी। अब छोटे भाइयों को कौन समझाए कि बड़े भाईसाहबों के इशारों पर देश हित में ऐसे ही काम करोगे, तो कई राजा आएंगे और राम बनकर चले जाएंगे। राज का काज करने वाले साहब लोग भी लंच केबिनों में गुनगुना रहे हैं कि रुपया नाम की लूट है, लूट सके तो लूट-अंत काल पछताएगा, प्राण जाएगा छूट।<br /> <br /> <strong>टोटका लाल चींटी का</strong><br /> टोटका तो टोटका ही होता है, कब और कहॉं करना पड़ पाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। अब देखो ना जयपुर ग्रेटर निगम में शील जी ने दूसरी बार मेयर की कुर्सी संभाली, तो जाने-अनजाने में टोटका हुए बिना नहीं रह सका। किसी शुभचिंतक की फूल माला में आई लाल चींटी ने मैडम को मैसेज दे दिया कि अब यह कुर्सी इतनी मखमली नहीं है, जितनी पहले वाले काल में थी। कभी भी किसी का गलत पगफेरा हो सकता है, जैसे पहले दिन ही फूल माला की आड़ में लाल चींटी ने अपना कमाल दिखा दिया। <br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि संतुष्ट और असंतुष्टों को लेकर है। दोनों खेमों के नेताओं की नींद उड़ी हुई है। इंदिरा गांधी भवन में आने वाले सालों पुराने हार्ड वर्कर्स बतियाते हैं, कि अब असंतुष्टों की हालत देखते लायक है, उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी है। कुछ वरिष्ठों ने राज के खिलाफ झण्डा तो उठा लिया, परन्तु अब सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होता दिख रहा है। चूंकि यह राजनीति है, इसमें जो होता है, वह दिखता नहीं है, और दिखता है, वह होता नहीं है। कसमें और वादे भूलकर सब अपनी-अपनी बचाने के लिए देवरे धोक रहे हैं। लेकिन जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब की मंद-मंद मुस्कराहट के आगे बेबसी के सिवाय उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 14 Jun 2021 17:42:54 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में हाथ वाली पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। दो खेमों में बंटे भाई लोग आपस में दो-दो हाथ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैसे तो खुद को पार्टी का वफादार वर्कर साबित करने के लिए रात दिन बढ़कर दावे कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनको अपने स्वार्थ के सिवाय 136 साल पुरानी पार्टी की इमेज से कोई लेना देना नहीं है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-540"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-06/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> यह तो होना ही था</strong><br /> सूबे में हाथ वाली पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। दो खेमों में बंटे भाई लोग आपस में दो-दो हाथ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैसे तो खुद को पार्टी का वफादार वर्कर साबित करने के लिए रात दिन बढ़कर दावे कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनको अपने स्वार्थ के सिवाय 136 साल पुरानी पार्टी की इमेज से कोई लेना देना नहीं है। कोरोना काल में ठाले बैठे राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि यह तो होना ही था, चूंकि गुजरे जमाने में जिसने जिसके साथ जो किया, वह उसको भूल नहीं पा रहे हैं। एक खेमे के मंसूबे पूरे होते दिखाई नहीं दे रहे हैं, तो दूसरा खेमा हर गलती की कीमत भुगताने पर अड़ा हुआ है। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि दिल्ली वालों के सामने एमएलएज की संख्या बल की मजबूरी है, इसलिए दस महीनों से चुप्पी साधे बैठे हैं, वरना जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब का विरोध करने वालों के पास 54 का आंकड़ा होता, अब तक सपने भी पूरे हो जाते।<br /> <br /> <strong>गोविन्द के दरबार में खाकी</strong><br /> इन दिनों सूबे की राजधानी पिंकसिटी में खाकी वाले साहब लोग गोविन्द के दरबार में कुछ ज्यादा हाजरी दे रहे हैं। दे भी क्यों नहीं, आखिरकार कोरोना में भी गाइडलाइन की पालना कराने की जिम्मेदारी भी सिर पर जो है। हिन्दू-मुस्लिमों के फेर में फंसे नेता लोग कब क्या करवा बैठे, इसका कोई पता नहीं। घर की खीज सड़कों पर उतारने वाले कुछ नेताओं के चक्कर में खाकी वाले साहब लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुई है। अब बेचारों के सामने गुलाबीनगर में अमन-चैन बनाए रखने के लिए गोविन्द दरबार के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। सो कई साहब लोग तो बड़ी चौपड़ से गोविन्द के दरबार में नंगे पैर जाकर धोक देने में ही अपनी भलाई समझते हैं।<br /> <br /> <strong>बिगड़ा चन्द्रमा</strong><br /> जयपुर ग्रेटर की सौम्य स्वभाव वाली फर्स्ट लेडी का चन्द्रमा अभी सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा। आठ महीने से आए दिन कुछ न कुछ पंगे से सामना करना पड़ता है। पहले हाथ वाले भाई लोगों ने पसीने छुडाए तो अब बड़े साहब से 36 के आंकड़े ने परेशान कर रखा है। पहले वाले साहब तो दस हजार तक की फाइल भी मेयर तक भेजते थे, लेकिन जब से चन्द्रमा बिगड़ा है, तब से यज्ञ और मित्र शब्द के साथ सिंह बने देव साहब बड़ी-बड़ी फाइलें भी खुद ही निपटा रहे हैं। और तो और विद्याधरनगर से कब्जे हटाने का भूत भी शहर की सड़कों से पंडित दीनदयाल उपाध्याय भवन तक जा पहुंचा। अब बेचारी देवनारायण वंशज फर्स्ट लेडी चन्द्रमा सुधारने के लिए कई मंदिरों धोक दे चुकी हैं।<br /> <br /> <strong>अब लगे पंख</strong><br /> पांच प्रदेशों के चुनाव खत्म होने के साथ ही सूबे के नेताओं के पंख लग गए हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ के दफ्तर में चर्चाएं बढ़ने के साथ ही लाइन में लगे भाइयों के दिल की धड़कनें बढ़ गई। गांधी टोपी वाले बुजुर्गवान का दावा है कि एक जून से 31 जुलाई के बीच बहुत कुछ होगा। कई महीनों से पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट का इंतजार खत्म होने के साथ ही मंत्रिमंडल का बैलेंस भी ठीक होगा। पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को हरा कर उन्हीं की छाती पर मूंग दलने वालों से भी निजात मिलेगी। बुजुर्ग की बातें सुन कई भाई लोग हवा में उड़ते दिख रहे हैं।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के दफ्तर में एक चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी अपनों को लेकर है। ढाई साल से वेटिंग सीएम के फेर में फंसे पार्टी के नेता अपनी भूमिका तक को भूल गए। राज का आधा काल गुजरने पर भी उनकी जुबान बंद है। गुलाबीनगरी के बाद नवाबों के शहर में भी नेताओं के नाम पर मोहर लगाने के लिए दोनों तरफ से जोर आजमाइश की गई, मगर जेपी का दिल अभी भी नहीं पसीजा। ठाले बैठे भाईसाहबों के पास राम नाम की माला जपने के अलावा कोई काम भी नहीं है।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Tue, 01 Jun 2021 16:51:41 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में हाथ वाले कुछ भाई लोग आठ महीनों से काफी उछलकूद कर रहे हैं। अब उनको नवें महीने का बेसब्री से इंतजार है। इंतजार इसलिए है कि अगले महीने उन्हें गुड़ या घूघरी मिलने का पूरा भरोसा है। सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी इसके लिए उन्होंने मैसेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-119"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> चर्चा में अगुणी की तीस सीटें </strong><br /> सूबे में हाथ वाले कुछ भाई लोग आठ महीनों से काफी उछलकूद कर रहे हैं। अब उनको नवें महीने का बेसब्री से इंतजार है। इंतजार इसलिए है कि अगले महीने उन्हें गुड़ या घूघरी मिलने का पूरा भरोसा है। सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में भी इसके लिए उन्होंने मैसेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर चर्चा है कि हाथ वाले कुछ भाई लोगों की नजरें अगुणी दिशा की उन तीस सीटों पर ज्यादा टिकी है, जिनको लेकर देवनारायण और मिनेश वंशजों के बीच एग्रीमेंट का ड्राफ्ट अंतिम चरण में हैं। अब दिन में सपने देखने वाले भाई लोगों को कौन समझाए कि यह जो पब्लिक है, सब जानती है, अंदर क्या है, बाहर क्या है, सब पहचानती है।<br /> <br /> <strong>चांदी के फेर में खाकी</strong><br /> सूबे में इन दिनों खाकी वाले कुछ साहब लोग चांदी के फेर में ऐसे फंसे हुए हैं कि उनके समझ में नहीं आ रहा कि चांदी की सिल्लियों के इस चक्रव्यूह से कैसे निकला जाए। चांदी भी किसी सुनार की होती तो अब तक मामला निपट जाता, लेकिन गंजों के सिर पर बाल उगाने वाले साहब की है, सो जोर तो लगाना ही पड़ेगा। बड़े-बड़ों की हेकड़ी उतार चुके खाकी वालों ने तेल पिलाए लठ्ठ को भी काम में ले लिया, मगर अभी तक पता नहीं लगा सके कि आखिर 18 सिल्लियां कहां से आई है। पीएचक्यू में चर्चा है कि पिंकसिटी के वैशालीनगर से कमिश्नरेट होता हुआ एसओजी तक घूम चुके इस मामले पर अब इन्कम टैक्स और ईडी की नजरें भी टिकने लगी है। खाकी वालों ने तो डंडे की जोर पर वो ही किया, जो उनको करना था, मगर अब डॉक्टर साहब के साथ चांदी के धंधे में जुड़े लोगों को चिन्ता सताने लगी है कि 18 सिल्लियों को लेकर अगर आमदनी पर नजर रखने वाले साहब लोगों ने इन्क्वायरी कर ली, लो खाकी वालों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन और कइयों की पोल खुलने में देर भी नहीं लगेगी।<br /> <br /> <strong>कमाल गुप्त रिपोर्ट का</strong><br /> मैडम की वापसी सक्रियता को लेकर कई लोगों में सेहरा बंधवाने की होड़ मची है। कइयों के तो जमीन पर पैर तक नहीं टिक रहे। लेकिन हम बताय देते हैं कि यह संख्या बल का नहीं, बल्कि शेखावाटी से ताल्लुकात रखने वाले साहब की गुप्त रिपोर्ट का कमाल है। गुजरे जमाने में अमित जी के खासमखास रहे भाईसाहब की टास्क वेल्यूएशन की निष्पक्ष रिपोर्ट ने ऊपर वालों के दिमाग के दरवाजे खोल दिए। रिपोर्ट से आमेर वाले भाईसाहब के तेवर बदलने के साथ ही गुलाबजी भाईसाहब भी ढीले पड़ गए। रिपोर्ट में लिखा था कि जनपथों में मैडम के अलावा दूसरा कोई नहीं है।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर इन दिनों एक चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी छोटी मोटी नहीं, बल्कि बदलाव के हवाई किलों को लेकर है। खास बात यह है कि चर्चा में रोजाना कुछ न कुछ नया शगूफा जुड़ जाता है, लेकिन हमें गांधी टोपी वाले बुजुर्ग भाईसाहब की बात में कुछ दम नजर आया। भाईसाहब बोले कि हाथ वाले किसी भी मुखिया को घर का रास्ता दिखाया जाता है, तो मैडम कई महीनों पहले से ही किनारा कर लेती हैं। यहां तक कि वेटिंग पीएम राजकुमार भी किसी न किसी बहाने कन्नी काटते हैं। लेकिन यहां तो पहले ही राजकुमार से और फिर मैडम से जोधपुर वाले भाई साहब की गुफ्तगू जो हुई है। अब इन हवाई किले बनाने वालों को कौन समझाए कि जब कुछ ठीक-ठाक है, तो दिन में सपने देखने से कोई फायदा नहीं है। समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:34:14 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों अपर क्लास वाले लोगों की नजरें पूर्व दिशा की तरफ टिकी हैं। टिके भी क्यों नहीं, दोनों दलों में जो भी कुछ हो रहा है, उसी दिशा के पानी का कमाल है। हाथ वाले दल में सपोटरा और दौसा वाले मिनेश वंशज भाईसाहबों ने जब से दुबारा जुबान खोली है, तभी से अगुणी दिशा के ठाले बैठे पंडितों को भी काम मिल गया, सो उन्होंने भी कुंडलियां देखना शुरू कर दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-118"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> नजरें पूर्व की तरफ</strong><br /> सूबे में इन दिनों अपर क्लास वाले लोगों की नजरें पूर्व दिशा की तरफ टिकी हैं। टिके भी क्यों नहीं, दोनों दलों में जो भी कुछ हो रहा है, उसी दिशा के पानी का कमाल है। हाथ वाले दल में सपोटरा और दौसा वाले मिनेश वंशज भाईसाहबों ने जब से दुबारा जुबान खोली है, तभी से अगुणी दिशा के ठाले बैठे पंडितों को भी काम मिल गया, सो उन्होंने भी कुंडलियां देखना शुरू कर दिया है। भगवा वाले भाई लोग पहले से पूर्व और पश्चिम दिशा के फेर में फंसे हुए हैं। पूर्व दिशा वालों के फेर में फंसे उत्तर-दक्षिण दिशा वाले भाई लोगों में चर्चा है कि चाहे कुछ भी हो, छह महीने पहले की तरफ परनाला तो वहीं गिरेगा, जहां शेखावाटी, मारवाड़ और मेवाड़ वाले चाहेंगे।<br /> <br /> <strong>यह तो होना ही था</strong><br /> सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोगों में फिर दो-दो हाथ हो रहे हैं। हाथ भी किसी के छोटे तो किसी के बड़े हैं। जिसका जितना बड़ा हाथ, वह उतना ही सामने वाले के गिरेबान के नजदीक है। दिल्ली वाले रेफरी भी समझ नहीं पा रहे हैं कि हाथ बड़ा है या सामने वाले खुद ही ऐड़ियों के बल खड़े हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर चर्चा है कि पॉलिटिक्स में ज्यादा उछलकूद करने वाले नेता लंबे नहीं चलते, चूंकि इसमें जो होता है वह दिखता नहीं और जो दिखता है वह होता नहीं है। समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /> <br /> <strong>बुरे फंसे मेहमान बन कर</strong><br /> सूबे में डेढ़ दर्जन नेता पिछले आठ महीनों से काफी परेशान हैं। वे न ठीक से सो पा रहे हैं, न ही ही खा-पी पा रहे हैं। और तो और शरीर से काफी दुबले भी हो गए हैं। नेता भी छोटे-मोटे नहीं, बल्कि राज करने वाली पार्टी से ताल्लुकात रखते हैं और असेम्बली के मेम्बर हैं। गुजरे जमाने में सेल्यूट मारने वाले साहब लोग भी इनको देख कर मुंह फेर कर निकलने में ही अपनी भलाई समझते हैं। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि आठ महीने पहले तक दोनों हाथों में लड्डू रखने में माहिर इन भाई लोगों के ग्रह उस दिन से बदल गए, जिस दिन से खास मेहमान बनकर पड़ोसी सूबे में एक महीने तक मौज-मस्ती की थी। छत्तीस के आंकड़े के फेर में फंसे इन भाई लोगों के सामने संकट यह है कि अब तो सामने वाले भी गले लगाने के लिए ना में गर्दन हिला चुके हैं।<br /> <br /> <strong>तोड़ त्रिया हठ की</strong><br /> भगवा वाली पार्टी में त्रिया हठ के सामने अच्छे-अच्छे की गर्दन झुकी हुई है। तोड़ की तलाश में सूबे से लेकर दिल्ली के नेता माथापच्ची में जुटे हैं। कोई न कोई रास्ता निकलता है कि सुनहरी कोठी से नया शगूफा आ जाता है। दिल्ली वाले भाईसाहब का मानस जब भी सूबे में आने का बनता है, सरदार पटेल मार्ग के बंगला नंबर 51 में हलचल शुरु हो जाती है। चर्चा है कि त्रिया हठ की तोड़ अब सिर्फ निगोसिएशन बचा है। पण्डितजी ने पंचांग देखकर घोषणा की है कि पार्टी की राशि पर अभी मंगल नीचा चल रहा है, जो दंगल करा रहा है। इसका असर भी 26 मई तक है। सो कैसे भी त्रिया को कोप भवन से बाहर निकालो। मंगल का असर कम करने के लिए जाप भी कराओ और तंत्र मंत्र से कहलाओ कि अगले नेता का नाम जो भी दिल्ली से तय हो, उसका चुपचाप समर्थन कर दो और पांच में से एक बन जाओ।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> आजकल राज का काज करने वालों में एक नई बहस छिड़ी हुई है। बहस का मुद्दा भी वफादारी से जुड़ा हुआ है। लंच क्लब में घण्टों चर्चा होती है कि मातहत कर्मचारी अपने आला अफसरों के बजाय नेताओं के प्रति ज्यादा वफादार हैं। कारण साफ है कि डिजायर सिस्टम में उनको मलाईदार कुर्सी भी तो वो ही संभलवाते हैं।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:33:22 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[आज हम बात करेंगे देवदर्शनों की। जब भी किसी पर आपदा आती है, तो अपने देवों के देवरे ढोकते हैं, वे न रात देखते और न ही दिन। कई देवों के घोड़ले तो रातीजगा कराने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। सूबे में चुनावी जंग तो पौने तीन साल बाद होगी, मगर नंबर वन की कुर्सी के लिए के भगवा वाले भाई लोगों में ऐसा कलह मचा है कि उनको भी देवदर्शनों की शरण लेनी पड़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-117"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> अब याद आए देव</strong><br /> आज हम बात करेंगे देवदर्शनों की। जब भी किसी पर आपदा आती है, तो अपने देवों के देवरे ढोकते हैं, वे न रात देखते और न ही दिन। कई देवों के घोड़ले तो रातीजगा कराने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। सूबे में चुनावी जंग तो पौने तीन साल बाद होगी, मगर नंबर वन की कुर्सी के लिए के भगवा वाले भाई लोगों में ऐसा कलह मचा है कि उनको भी देवदर्शनों की शरण लेनी पड़ रही है। विचारधारा वाले दल में भाजपा और आरएसएस वालों के बीच का कलह रवि को सड़कों पर आया, तो सूबे में चर्चा होना लाजमी है। इस बार मैडम ने अगूणी दिशा के देवताओं को ढोका है, तो आमेर वाले भाईसाहब ने आथूणी में माताजी कीे ढोक लगाई है। पावरगेम के इस चक्कर में बेचारे वर्कर्स के साथ देवताओं के पुजारियों की हालत पतली है, चूंकि उनके देवों की प्रतिष्ठा भी तो दांव लग गई।<br /> <br /> <strong>समझने वाले समझ गए</strong><br /> सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में शुक्रवार को जो कुछ हुआ, उसका दिल्ली तक मैसेज हो गया। होना भी जरूरी था, चूंकि दिल्ली वाले कुछ भाई साहबों ने जोधपुर वाले अशोकजी के आठ महीनों से नाक में दम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाईसाहब ने भी पानी पी पीकर भरी पंचायत में जो कुछ बोला, उससे सामने वालों की गर्दन नीची हुए बिना नहीं रह सकी। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने के साथ ही सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 बने भगवा के ठिकाने करने पर चर्चा है कि अशोक जी  ने आठ महीने का जवाब मात्र आठ मिनट में देकर जो कुछ किया, उसे समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।<br /> <br /> <strong>होड़ नंबर लेने की</strong><br /> नंबर लेने की होड़ हर क्षेत्र में मचती है। नेतागिरी में इसकी स्पीड कुछ ज्यादा ही होती है। पिछले दिनों जेपीएन भाईसाहब को भी इस होड़ से रूबरू होना पड़ा। सूबे में कमल वालों में चल रही भितरखाने की जंग को थामने आए नड्डा भाईसाहब की अगवानी के लिए अमचे-चमचों के साथ कई नेता एयरपोर्ट पहुंचे। नारे तो एकता का मंत्र देने आए भाई साहब के लगाने थे, लेकिन अमचे-चमचों को आंखों से इशारा मिला कि उनके नारे लगाने के लिए तो हम लोग ही काफी हैं, आप लोग तो हमारी सोचो। बस फिर क्या था, पोर्च भाई साहबों के जिन्दाबाद के नारों से गूंज उठा। यह देख नड्डाजी भी मुस्कराए बिना नहीं रह सके।<br /> <br /> <strong>चर्चा में साफ छवि</strong><br /> आजकल राज का काज करने वाले भाई लोग एक सूची बनाने में जुटे हैं। लेकिन सूची में तीन-चार से ज्यादा नाम नहीं जुड़ पा रहे। काज निपटाने वाले लंच क्लब में इस सूची पर रोज कवायद कर रहे हैं। सूची भी छोटे-मोटों की नहीं, बल्कि राज करने वाले बेदाग और साफ छवि वाले लोगों की है। केवल 21 लोगों की सूची में से दस को छांटना भी मुश्किल हो रहा है। अब तो वे दूसरे वर्गों की मदद भी ले रहे हैं। हर आने वालों से पूछ रहे हैं कि ऐसे दस मंत्रियों के नाम बताओ जिनकी बेदाग और साफ छवि है।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> इन दिनों दोनों तरफ वर्कर्स की कोई पूछ नहीं है। उनकी कोई सुनने वाला भी नहीं है, सो अपनी मन की बात चाय की दुकानों पर एक दूसरे को कह कर संतोष लेते हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर तो दु:खड़ा रोने का अंदाज ही कुछ अलग है। वर्कर बोलने लगे हैं कि राज में तो पूछ है नहीं, हमारे तो केवल पुण्यतिथि और जयंतियों के मौके पर फूल चढ़ाने तक सीमित कर दिया। गुजरे जमाने में सरकार के आने पर वर्कर्स का रैळा आता था, अब तो केवल फोटो खिंचवाने वाले चंद चेहरे ही नजर आते हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भगवा के ठिकाने में भी दास्तान कुछ इसी तरह की है।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:32:34 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों दोनों दलों में अशांति है लेकिन दोनों बड़े बंगलों में पूर्ण शांति है। सिविल लाइन्स स्थित इन दोनों बंगलों में रहने वाले बड़े लोग भी चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। हाथ वाले भाई लोगों में नौ महीनों से शांति की तलाश है, तो कमल वाले भाइयों में तीन महीने से अशांति है। दोनों तरफ काचे कलवों की कमी नहीं हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-116"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-04/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एल एल शर्मा<br /> --------------------------<br /> तूफान के पहले की शांति</strong><br /> सूबे में इन दिनों दोनों दलों में अशांति है लेकिन दोनों बड़े बंगलों में पूर्ण शांति है। सिविल लाइन्स स्थित इन दोनों बंगलों में रहने वाले बड़े लोग भी चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। हाथ वाले भाई लोगों में नौ महीनों से शांति की तलाश है, तो कमल वाले भाइयों में तीन महीने से अशांति है। दोनों तरफ काचे कलवों की कमी नहीं हैं। भगवा वाले भाई लोगों ने स्याणों और भोपों से सारे टोटके करा लिए मगर कलवों की ऊछल-कूद थमने का नाम ही नहीं ले रही। हाथ वाले कलवे भी अमावस्या की रात को कुछ ज्यादा राती जगा करवाते हैं। पीसीसी में सालों से आ रहे गांधी टोपी वाले बुजुर्गवार की मानें तो हाथ वाले दल में यह तूफान से पहले की शांति है। चैत्र के नवरात्रों में इतने काचे कलवे पैदा होंगे कि उनको घड़े में डालने के लिए दिल्ली तक के स्याणे बुलाने पड़ेंगे। फिलहाल तूफान से पहले की पूर्ण शांति है।<br /> <br /> <strong>चप्पलों का राज</strong><br /> चप्पल तो चप्पल ही होती है, लेकिन कुछ चप्पलें खास होती हैं, जिनकी चर्चा हुए बिना नहीं रहती। अब देखो ना हमारे सूबे के हाथ वाले कुछ भाई लोग चप्पल के राज को ढूंढने में लगे हैं, लेकिन अभी तक तह तक नहीं पहुंच पाए। चप्पलें भी और किसी की नहीं बल्कि जोधपुर वाले अशोकजी भाई साहब की है। उनकी चप्पलों के पीछे छिपे राज को भी उनका काज करने वाले ही सीना तान कर बता रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर चर्चा है कि जब भी भाई साहब के सामने संकट आता है, तो वे सिर्फ काले रंग की चप्पलें ही पहनकर निकलते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि सामने वाले की नजरें जब भी साहब की इन चप्पलों की तरफ पड़ती है, तो उनका रंग तक बदलता दिखता है, और उसकी ताकत आधी रह जाती है। जादूगरजी की इन जादुई चप्पलों की चर्चा रवि को तो कई भाई लोगों की जुबान पर थी। <br /> <br /> <strong>चर्चा जूते और नेताओं की</strong><br /> आजकल नेताओं के साथ जूते भी चर्चाओं में हैं। जनता का जूता कब किस नेता पर खुल जाए, यह पता नहीं चल पाता। जूते का असर इक्कीसवीं सदी के नेताओं पर कितना पड़ता है, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन जूता बनाने वाली कंपनियों की कमाई पर इसका जरूर असर पड़ता है। कंपनी वाले पेटेंट कराने के लिए दौड़धूप भी करते हैं। जूते-जूते में फर्क होता है। नेता जब आपस में शब्द बाणों से एक दूसरे पर जूते मार रहे हैं, तो जनता अब हकीकत में उठाने लगी है। जूते उठाने या फिर फेंकने की परम्परा नई नहीं है। यह सिलसिला प्रथम विश्व युद्ध से ही शुरू हो गया था। उस समय जनता ने राजा- महाराजाओं के खिलाफ जूता उठाया तो उनको राज छोड़ना ही पड़ा। अब नेताओं पर सरे आम जूते फेंके जा रहे हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि आने वाले समय में जो नेता ज्यादा जूते खाएगा, वो सबसे अच्छा राजनेता साबित होगा। चूंकि जनता इतनी सयानी है कि वह नेताओं के लखणों के आधार पर ही जूता मारेगी।<br /> <br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि भ्रष्टाचार को लेकर है। भ्रष्टचार भी हजारों से नहीं बल्कि लाखों से ताल्लुकात रखता है। जुमला भी ब्यूरोक्रेसी के साथ-साथ सफेद कपड़े वाले नेताओं में भी काफी चर्चित है। जुमला है कि गुजरे जमाने में जिन लोगों ने भ्रष्टाचार करने में सारी हदें पार कर दी थी, अब वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के दावे ठोक रहे हैं। दावा भी एसीबी वाले करें, तो समझ में आता है, लेकिन जमीनों से जुड़े लोग करें, तो यह किसी मजाक से कम नहीं है। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि हमारे बुजुर्गों ने सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चले वाली कहावत यूं ही थोड़े बनाई गई है, उन्होंने भी तो कुछ अनुभव लिया ही होगा।<br /> <strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं) </strong></p>]]></content:encoded>
                
                

                <link>https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-116</link>
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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:31:36 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए राजकाज में क्या है खास?</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे में इन दिनों दोनों दलों में अशांति है लेकिन दोनों बड़े बंगलों में पूर्ण शांति है। सिविल लाइन्स स्थित इन दोनों बंगलों में रहने वाले बड़े लोग भी चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। हाथ वाले भाई लोगों में नौ महीनों से शांति की तलाश है, तो कमल वाले भाइयों में तीन महीने से अशांति है। दोनों तरफ काचे कलवों की कमी नहीं हैं।]]></description>
                
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                <pubDate>Tue, 13 Apr 2021 16:25:51 +0530</pubDate>
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