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                <title>Editorial - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>नाटो के सामने अब नई चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर त्रिदिवसीय शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/nato-now-faces-new-challenges/article-84924"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/111u1rer-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर त्रिदिवसीय शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। इस सम्मेलन पर पूरे विश्व की नजरें टिकी हुई थीं। सम्मेलन में सभी सदस्यों ने एक स्वर से यूक्रेन के साथ एकजुटता दिखाते हुए उसे पर्याप्त सुरक्षा सहायता जारी रखने का फैसला लिया गया। तो दूसरी ओर चीन को आड़े हाथों लेकर उस पर तीखे प्रहार किए। सम्मेलन में यह भी तय हुआ कि अगला शिखर सम्मेलन अगले वर्ष जून माह में नीदरलैंड की राजधानी हेग में आयोजित किया जाएगा। 75 वां शिखर सम्मेलन ऐसे वक्त पर हुआ जब इसका नेतृत्व करने वाले देश अमेरिका में अगले नवंबर माह में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के कीर स्टॉर्मर नए प्रधानमंत्री बने हैं। अमेरिकी चुनाव के नतीजे आने के बाद ही सम्मेलन में लिए गए तमाम महत्वपूर्ण फैसलों का क्रियान्वयन और रणनीति की दशा और दिशा सुनिश्चित हो पाएगी। </p>
<p>शिखर सम्मेलन को मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन ने संबोधित किया है। उन्होंने अपने संबोधन में यह समझाने की पूरी कोशिश की कि नाटो को इस अवसर का उपयोग जश्न मनाने के लिए इसलिए करना चाहिए , क्योंकि अमेरिका को इस गठबंधन से काफी लाभ मिला है। इसकी सदस्यता में एक ओर जहां वृद्धि हुई तो दूसरी ओर रक्षा पर यूरोपीय राज्यों के बढ़े बजटीय व्यय की रूपरेखा भी तैयार हुई। </p>
<p>उन्होंने यूक्रेन युद्ध में रूस की सहायता करने पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कड़ी निंदा की। चेतावनी दी कि यदि बीजिंग ने मास्को को सहायता देना तुरंत बंद नहीं किया तो उसे इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। लेकिन सम्मेलन में बाइडन की जुबान की लड़खड़ाहट ने उनकी कमजोरी को भी जाहिर कर दिया। जब उन्होंने पास खड़े यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को पुतिन और कमला हैरिस को ट्रंप के नाम से संबोधित किया। इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव के लिए हुई पहली बहस में बाइडन को ट्रंप के मुकाबले मिली हार तथा उनकी जुबानी फिसलन ने उनकी बढ़ती उम्र की ओर डेमोक्रेटिक पार्टी को गंभीरता से सोचने को विवष कर दिया है। पार्टी के भीतर उनसे चुनावी मैदान से हटने का दबाव बन रहा है। लेकिन इसके बावजूद वे चुनाव लडने पर अड़े हुए हैं। यदि वे मैदान पर डटे रहे तो चुनावी नतीजे रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में जा सकते हैं। दूसरी ओर नाटो को लेकर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के नजरिए पर भी गौर करना होगा। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में टं्रप ने नाटो गठबंधन में शामिल देशों की व्यय साझा करने की अनिच्छा की खुलकर आलोचना की थी। ऐसे में उनका मत था कि वैश्विक सुरक्षा की जिम्मेदारी के वहन से अमेरिका को मिलता क्या है? हालांकि अब हालात में काफी बदलाव आ चुका है। अधिकांष यूरोपीय देश, अपनी जीडीपी के दो फीसदी हिस्से के बराबर धन देने के दायित्व को पूरा कर रहे हैं। ट्रंप को लेकर यह धारणा भी है कि वे पुतिन के करीबी हैं। </p>
<p>खैर, अमेरिकानीत इस सैन्य संधि संगठन के सामने मौजूदा वैष्विक परिदृश्य में दो प्रमुख चुनौतियां उभर कर सामने आ रही हैं। एक तो यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेड़े रूस को चीन की ओर से मदद मिलना। तो दूसरी ओर चीन का हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में वर्चस्व बढाने की नीति, इस के साथ उसकी परमाणु हथियारों और अंतरिक्ष क्षेत्र में आक्रामक क्षमता हासिल कर लेना। सम्मेलन के केंद्र में चीन का मुद्दा हालांकि पहले भी वर्ष 2019 के सम्मेलन में उठा था। लेकिन तब नाटो के वक्तव्य में चीन के जिक्र की भाषा इतनी कड़ी नहीं थी। लेकिन इस बार की तीखी घोषणा के तुरंत बाद चीन ने प्रतिक्रिया दी। उसने रूस की मदद के लगाए आरोपों को सरासर झूठ बताया है। उसकी ओर से जोर देकर कहा गया है कि रूस और चीन के बीच व्यापार और मैत्री का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाना नहीं है। लेकिन नाटो की ताजा घोषणा की भाषा ने रूस-यूक्रेन युद्ध को अब नाटो-चीन के बीच छद्म युद्ध में बदल दिया है। खैर, इतना जरूर हुआ कि नाटो की शिखर वार्ता शुरू होने से पहले यूक्रेन को अमेरिकी एफ-16 लड़ाकू विमानों की पहली खेप डेनमार्क और नीदरलैंड से भेज दी गई है। आने वाले दिनों में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। उसे रूसी हवाई हमलों से बचाव करने में भी मदद मिलेगी।</p>
<p>सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की ओर से यूक्रेन की नाटो संगठन की सदस्यता को लेकर स्पष्ट और मजबूत सेतू की बात तो जरूर कही गई है। लेकिन अंतिम फैसला युद्ध समाप्ति के बाद ही संभव हो पाएगा। तेजी से बदलते वैश्विक माहौल में आने वाली नई चुनौतियों से नाटो अब कैसे निपटता है, यह कठिन परीक्षा की घड़ी होगी।</p>
<p><strong>-महेश चंद्र शर्मा<br /></strong><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jul 2024 10:49:08 +0530</pubDate>
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                <title>निष्पक्षता और विश्वसनीयता से कोई समझौता नहीं - नरेन्द्र चौधरी</title>
                                    <description><![CDATA[मैं इस अवसर पर कहना चाहता हूं कि  नवज्योति ने कभी भी एक तरफा, सनसनीखेज और मसालेदार पत्रकारिता को नहीं अपनाया। जो सही था, जैसे था, उसे ही बिना लाग लपेट निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/there-is-no-compromise-with-fairness-and-credibility---narendra-chaudhary/article-57172"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/nishpakshata-aur-vishvasaniyata-se-koi-samjhauta-nahin---narendra-chaudhary-ji-..kota-news,-editorial-comment-sir...15.9.2023.jpg" alt=""></a><br /><p>आज दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण ने अपनी स्थापना के 42 वर्ष पूर्ण कर लिए। हम दैनिक नवज्योति के समग्र पाठकवृंद का ह्रदय के अंतरतल से हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। 42 वर्ष की इस यात्रा में  स्नेहिल पाठकों की अपार समर्थन शक्ति हमारे साथ खड़ी रही। इस यात्रा में दृढ संबल, सहयोग और समर्थन देकर लगातार  सहभागी बने रहे हमारे  सभी एजेन्ट, संवाददाता बंधु और विज्ञापन दाताओं को भी हम अनन्त शुभकामनाएं  प्रेषित करते हैं।  पाठकों  के साथ इन्हीं सशक्त सहयोगियों की बदौलत दैनिक नवज्योति निष्पक्ष, निर्भीक, निरलिप्त होकर विश्वास के साथ उन्नयन की डगर पर लगातार अग्रसर होता जा रहा है।  <br /><br />छोटे से पौधे के रूप में शुरू हुआ दैनिक नवज्योति समाचार पत्र आज बरगद सरीखा विशाल पेड़ बन चुका है। जिसकी छांव में हजारों लाखों लोगों के अरमान, आशा और अपेक्षा लगातार फल-फूल रहे हैं। इस समय  यह कहना जरूरी है कि डिजीटलाइजेशन के साथ सोशल मीडिया की उपस्थिति और गंभीर प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भी नवज्योति ने अपने सिद्धांत और  खबरों की निष्पक्षता तथा विश्वसनीयता से कभी कोई समझौता नहीं किया। हालांकि कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। लेकिन पाठकों के अपार स्नेह के आगे वह मुश्किलें समाचार पत्र पर हावी नहीं हो सकी। हमने लगातार पाठकों के हित को सर्वोपरि मान कर विश्वसनीयता के साथ प्रतिदिन नयापन देने की कोशिश की। <br />मैं इस अवसर पर कहना चाहता हूं कि  नवज्योति ने कभी भी एक तरफा, सनसनीखेज और मसालेदार पत्रकारिता को नहीं अपनाया। जो सही था, जैसे था, उसे ही बिना लाग लपेट निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाया। हमारी पचासों खबरों का प्रशासन पर इतना असर पड़ा कि उन्हें तुरन्त कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा। इस वर्ष न्यायालयों ने अकेले नवज्योति की 25 से ज्यादा खबरों पर प्रसंज्ञान लेकर मामलों की सुनवाई  की। नवज्योति ने हमेशा कंस्ट्रक्टिव वर्क को तवज्जो दी है। आज जब शिक्षा नगरी पर्यटन नगरी बनने को तैयार होकर खड़ी है।  हम भी हमारे कोटा शहर के इस सपने को साकार करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। हमने शिक्षा नगरी में हुए विकास कार्यों के सकारात्मक पक्ष और उसकी जरूरत के साथ विशेषता को लेकर  वर्ष भर स्टोरीज प्रकाशित की।  नवनिर्मित रिवर फ्रंट, आॅक्सीजोन, सीएडीे चौराहा,घोड़ा चौराहा,अदालत चौराहा, सालिम सिंह की हवेली, अंडरपास, एलिवेटेड रोड को लेकर हमने लगातार काम किया। उद्घाटन से पूर्व ही हमने कोटा को देश विदेश तक प्रचारित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। यहां कुछ कोचिंग संस्थान जब शिक्षा को बाजार बनाने लगे, कोचिंग स्टूडेंट को पैसा कमाने की फैक्ट्री मानकर आत्महत्या जैसे मामलों में असंवेदनशीलता दिखाने लगे,  तो केवल नवज्योति ही राज्य भर में पहला अखबार बना जिसने इस मुद्दे को गंभीरताा के साथ उठाया। नवज्योति की खबरों का ही प्रभाव था कि उच्च न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप कर राज्य स्तर पर निगरानी कमेटी बनानी पड़ी।  प्रशासन को गाइड लाइन जारी करनी पडी। सात माह में एक ही कोचिंग संस्थान के पन्द्रह बच्चों की मौत के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोचिंग संचालकों की बैठक बुलाई। इस मामले के निस्तारण के लिए एक राज्य स्तरीय टीम बनाकर कोटा भेजा। स्टूडेंट की मौत  के बावजूद संचालकों  की असंवेदनशीलता को हमने उजागर किया। कोटा में सेल्फ स्टडी करने वाले स्टूडेंट की जिम्मेदारी किसकी है। यह जिम्मेदारी लेने के लिए भी हमने  खबरों के माध्यम से  प्रशासन को बाध्य किया। आज कोटा में हर तरह के स्टूडेंट की जिम्मेदारी प्रशासन अपनी जिम्मेदारी मानता है। हमने एयरपोर्ट,वंदे भारत ट्रेन ,चंबल में क्रूज , मुकुंदरा में सफारी शुरू हो, जैसी मांग को लेकर भी लगातार अपना फोलोअप बनाए रखा। हमने इलेक्ट्रिक बसों की दरकार, ईव्हीकल का भविष्य, कार में आग क्यों लगती है। स्लीपर बसें दुर्घटना की कारक क्यों, जैसे जनहित के समाचार प्रकाशित किए जिससे लोग जागरुक हों और दुर्घटनाएं  रुक सकें। स्थिति यह है कि नवज्योति ने इलेक्ट्रिक बसों को लेकर चार से पांच समाचार प्रकाशित कर शहर विकास का अपना दृष्टिकोण सामने रखा। इसके बाद प्रधानमंत्री ने स्वयं 15 अगस्त को इसी दृष्टिकोण को देश के सामने रखा।  हमने बेधड़क तरीके से मुकुंदरा को आबाद करने के बहाने चल रहे बर्बादी के खेल को उजागर किया। क्वालिटी एजुकेशन को लेकर हमने अभियान चलाया और लगातार यह पड़ताल की कि क्वालिटी एजुकेशन नहीं मिलने के आखिर क्या कारण हैं। हमने सभी विश्वविद्यालयों के प्लेसमेन्ट करवाने के सिस्टम पर भी काम किया और उनकी खामियों को सामने लाकर उसमें सुधार करवाया जिससे आज की शिक्षा व्यवस्था रोजगार परक हो सके। आरटीयू में डर्टी प्रोफेसर की कारस्तानी सामने आने के बाद हमने यह भी बताया कि सिस्टम में क्या खामियां थी जिससे प्रोफेसर को डर्टी बनने का अवसर मिला और जिसका उसने फायदा उठाया। हमने रामपुरा में ट्यूशन टीचर द्वारा मासूम की हत्या के मामले को लगातार फोलो किया और आखिर उसे ताउम्र जेल में रहने की सजा मिलने तक सहयोग किया। खबरों के साथ ही दैनिक नवज्योति समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सामाजिक सरोकार के कार्यों में अग्रणी रहा। हमने कोटा शहर के सभी 150 वार्ड में नवज्योति प्रतिनिधि भेजे और सभी वार्ड की समस्याओं को ना केवल प्रकाशित किया अपितु उनका समाधान करवाने के लिए भी लगातार प्रयास किए। मैं इस अवसर पर बताना चाहता हूं कि यह सभी कार्य मेरे पिता, दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक आदरणीय दीन बंधु चौधरी जी की दूरदर्शिता और मार्गदर्शन के कारण ही फलीभूत हो सके। <br /><br />मेरे दादाजी कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी, ने इस समाचार पत्र की बुनियाद 2 अक्टूबर,1936 में अजमेर के केसरगंज में एक सप्ताहिक अखबार के रूप में रखी थी। वह आज वटवृक्ष के रूप में समाचार जगत की बगिया में अपनी खुशबू बिखेर रहा है। देश के आजाद होते ही अजमेर संस्करण को दैनिक समाचार पत्र के रूप में लाया गया। वर्ष 1960 में इसका राजधानी जयपुर से संस्करण शुरू हुआ। कोटा में 1981 में और 21वीं सदी के शुरुआत में वर्ष 2004 में जोधपुर और 2013 में उदयपुर संस्करण शुरू हुआ। मुद्रण की नवीनतम आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए समाचारों और विचारों की नई विषय वस्तु के चयन और तेवर में समयानुकूल बदलाव लाकर हर रोज नई भोर की ज्योति में दैनिक नवज्योति घर-घर सच को पहुंचा रहा है।<br /><br />मेरे दादाजी स्वर्गीय कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी द्वारा स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में 86 साल पहले जो जलाई ज्योति आप सभी के सहयोग से आज भी कायम है। एक मिशन के रूप में शुरू हुआ समाचार पत्र विभिन्न दौर देखता हुआ धीरे-धीरे प्रोफेशनल में बदला। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। सोशल मीडिया की अति सूचना वृष्टि, सबसे पहले समाचार देने की आपाधापी में अपुष्ट और आरोप प्रत्यारोप के समाचारों की बाढ़ आने से समाचार पत्रों की गरिमा पर प्रश्न उठने लगे। ऐसे कठिन दौर में भी प्रामाणिकता के साथ अपने गौरवमय अतीत तथा अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखना और बदलते समय के अनुसार पाठकों की रुचि के अनुरूप कलेवर को नई प्रिंटिंग तकनीक के साथ पेश करते हुए स्पर्धा में डटे रहना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती रही। लेकिन इस चुनौती का सामना करने के लिए दैनिक नवज्योति को पाठकों से बराबर ताकत और विश्वास मिलता रहा।<br /><br /><strong>अचल रही, अटल रही,अखंड ज्योति जलती रही, प्रकाश पथ पर, प्रति सहर. नवज्योति बिखरती रही। </strong></p>
<p><strong>पुन: सभी का आभार !</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 15 Sep 2023 12:13:07 +0530</pubDate>
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                <title>गेहूं निर्यात पर रोक</title>
                                    <description><![CDATA[भारत ने घरेलू स्तर पर बढ़ती कीमतों को नियंत्रण करने के उपाय के तहत गेहूं के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--ban-on-wheat-export/article-9994"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/gehu.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत ने घरेलू स्तर पर बढ़ती कीमतों को नियंत्रण करने के उपाय के तहत गेहूं के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। हालांकि विदेश व्यापार महानिदेशालय ने अधिसूचना जारी करके स्पष्ट किया है कि सरकार किसी दूसरे देश की खास जरूरत के मद्देनजर गेहूं निर्यात की अनुमति दे सकती है। वह गेहूं भी निर्यात किया जा सकेगा, जिसके लिए लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किए जा चुके हैं और जो शिपमेंट के लिए तैयार है। देश में पिछले कुछ दिनों से गेहूं की कीमतें ऊंची हो चली है और आटा भी काफी महंगा बिक रहा है। बढ़ती महंगाई के चलते गेहूं के बढ़ते मूल्यों को नियंत्रित करना जनहित में ही है। निर्यात रोकने का असर भी देखने को मिला है। कुछ अनाज मण्डियों में गेहूं के दाम गिरे भी हैं। गेहूं की कीमतें बढ़ने के पीछे के दो मुख्य कारण बताए जा रहे हैं। पहला इस बार मार्च-अप्रैल में ही बढ़ती गर्मी व लू के कारण देश में गेहूं की फसल का काफी नुकसान हुआ है। अनुमान था कि देश में 11.13 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन होगा, लेकिन फसलें नष्ट होने की वजह से यह अनुमान लगाया गया कि उत्पादन 10.50 करोड़ टन तक रह सकता है। गौरतलब है कि देश में गेहूं की सालाना मांग 10 करोड़ टन के आसपास रहती है। इसलिए गेहूं का पर्याप्त स्टाक रखने के लिए निर्यात पर रोक का कदम उठाया गया है। दूसरा कारण, रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते गेहूं की वैश्विक मांग बढ़ी है और भारत पिछले चार महीनों में 9.63 लाख टन का निर्यात कर चुका है। रूस और यूक्रेन विश्व में प्रमुख निर्यातक देश हैं, लेकिन युद्ध की वजह से गेहूं की मांग पूरी नहीं हो पा रही है। भारत विश्व का दूसरा गेहूं उत्पादक देश है, तो दुनिया को भारत से बहुत उम्मीदें थीं और भारत ने निर्यात पर रोक लगाकर कई देशों को निराश कर दिया है। इस बार सरकार की खरीद 50 फीसदी से भी कम है, बाजारों को पिछले साल की तुलना में कम आपूर्ति है। हालांकि सरकार ने गेहूं खरीद को बढ़ाने के लिए समय की अवधि को अब 31 मई तक बढ़ा दिया है, लेकिन लक्ष्य पूरा होने की संभावना कम ही है, क्योंकि व्यापारियों से पहले ही किसानों से सीधे गेहूं की खरीद करती है। निर्यात पर रोक के फैसले से भारत के घरेलू उपभोक्ता को कितना लाभ मिलता है, जो देखना होगा, लेकिन दुनिया के कई देशों ने भारत के अचानक फैसले की निंदा की है। इससे भारत की विश्वसनीयता की क्षति हो सकती है। भारत ने निर्यात पर रोक लगाने से पहले निर्यात को बढ़ाने की बात कही थी, जिससे दुनिया गेहूं आपूर्ति को लेकर आश्वस्त थी।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 18 May 2022 16:16:11 +0530</pubDate>
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                <title>जबरन टीका नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला दिया है कि टीकाकरण के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--not-forcibly-vaccinated/article-9124"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/covid.jpg" alt=""></a><br /><p>अब यही माना जाता रहा है कि भारत में सफल टीकाकरण अभियान की वजह से ही कोविड-19 पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकी है, वहीं यह भी आशंकाएं जुड़ी रही हैं कि टीकों का विपरीत प्रभाव पड़ता हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला दिया है कि टीकाकरण के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। इसके अलावा अदालत ने केन्द्र से इस तरह के टीकाकरण के प्रतिकूल प्रभाव के आंकड़ों को सार्वजनिक करने को कहा है। अदालत की राय टीकाकरण के मसले पर उठे सवालों और आशंकाओं के बीच संतुलन बैठाने की ही कोशिश है। इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शारीरिक स्वायत्तता और अखण्डता की रक्षा की जाती है। सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि कई राज्यों में जिन लोगों ने टीका नहीं लगवाया है, उन्हें ट्रेनों या सार्वजनिक वाहनों में बैठने से रोका जा रहा है और अन्य सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। इसके पीछे यह दलील दी जा रही है बिना टीका लगाकर लोग संक्रमण फैलाने की वजह बन सकते हैं। यह सही है कि कोरोना संक्रमण एक-दूसरे व्यक्ति के माध्यम से ही फैलता है और संकट के समय में सावधानी भरे कदम उठाना समय की मांग भी है। लेकिन इस मसले पर अदालत ने साफ तौर पर कहा कि टीका न लगवाने वाले लोगों पर किसी तरह की पाबंदी मान्य नहीं है, साथ ही अदालत ने कहा कि जहां तक सावधानी बरतने की बात है तो केन्द्र और राज्य सरकारों ने ऐसा कोई साक्ष्य अदालत के सामने नहीं रखा, जिससे यह पता चलता हो कि टीका न लगवाने वाले लोगों से खतरा ज्यादा है। साथ ही सरकारें टीकाकरण के दुष्प्रभावों को लेकर उठ रही आशंकाओं के निवारण के बारे में कुछ नहीं बता रही है। तथ्यों को छुपाने व सार्वजनिक न करने से आशंकाएं जोर पकड़ती जा रही हैं। तभी अदालत ने कोरोना रोधी टीका लगवाने के बाद सामने आने वाले दुष्प्रभावों के साथ-साथ चिकित्सीय परीक्षण का आंकड़ा सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। अदालत की मंशा स्पष्ट है कि टीकाकरण को बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता है। किसी की सहमति के बिना जबरन टीकाकरण न्याय और अधिकारों के विपरीत है। लेकिन यहां अदालत को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि टीकाकरण तो स्वैच्छिक हैं, लेकिन टीका न लगाने वालों को मास्क लगाने व सार्वजनिक दूरी बनाकर रखने जैसी सावधानियां अवश्य बरतनी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 May 2022 16:46:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>बच्चों का टीकाकरण</title>
                                    <description><![CDATA[इस बार कोरोना बच्चों को अपनी चपेट में ले रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--vaccination-of-children/article-8823"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/corona5.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने मंगलवार को पांच से बारह वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए कोविड-19 रोधी टीके कॉर्बेवैक्स और 6 से 12 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए कोवैक्सीन टीके के आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति दे दी है। पिछले कुछ दिनों से देश के कुछ राज्यों में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसमें चिंता की बात यह सामने आई कि संक्रमितों में बच्चों की संख्या ज्यादा है। इस बार कोरोना बच्चों को अपनी चपेट में ले रहा है। ऐसे में बच्चों के लिए टीकाकरण जरूरी हो गया था। भारत ने अपने सफल टीकाकरण अभियान से महामारी पर काफी हद तक काबू पाने में कामयाबी हासिल की है। बच्चों के टीकाकरण का काम पिछले महीने से ही चल रहा है, लेकिन छोटी आयु वर्ग के बच्चों को सुरक्षा कवच नहीं मिल रहा था। लेकिन अब बच्चों के लिए दो नाए टीकों की घोषणा कर दी गई है, जिनका आपात इस्तेमाल ही किया जाएगा। देश की कई टीका निर्माता कंपनियां हर आयु वर्ग के बच्चों के लिए नए-नए टीकों का निर्माण कर रही है। कोरोना महामारी पर नियंत्रण पाने के लिए भारत में पिछले साल जनवरी के मध्य में टीकाकरण की शुरूआत हुई थी। शुरूआत में टीकों की भारी कमी थी, लेकिन उत्पादन बढ़ने के बाद टीकों की उपलब्धता बढ़ने लगी। अब तक देश की बड़ी आबादी का टीकाकरण हो चुका है। लेकिन अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता सता रही थी, क्योंकि दूसरी और तीसरी लहर के दौरान विशेषज्ञ बता रहे थे कि कोरोना बच्चों को ज्यादा अपनी चपेट में ले सकता है। तब से बच्चों के टीकाकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। धीरे-धीरे बच्चों के टीकाकरण की तरफ कदम बढ़ने लगे और अब 5 से 12 साल की आयु वर्ग तक टीकों की पहुंच हो गई है। अब चौथी लहर की आशंकाओं के बीच बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ हुए संवाद में राज्यों को सचेत रहने की सलाह दी और कहा कि मास्क पहनने को अनिवार्य बनाया जाए। अब तक देश तीसरी लहर तक कोरोना से मुकाबला करता रहा है, लेकिन हमने काफी संकटों को भी झेला है। अब हम बड़े संकट से तो जैसे-तैसे बच गए हैं, लेकिन खतरा अभी भी बना हुआ है। टीकाकरण अपनी जगह है, लेकिन हमें निजी तौर पर भी सावधानियां बरतने की जरूरत है। मास्क और सामाजिक दूरी की अनदेखी संकट में डाल सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 13:26:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कोरोना की वापसी?</title>
                                    <description><![CDATA[फिर से कड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--corona-s-return/article-8018"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/corona10.png" alt=""></a><br /><p>देश में कोरोना के नए मामले सामने आने लगे हैं। अब यह मानकर चलने का वक्त नहीं रहा कि कोरोना महामारी चली गई है। फिर से कड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। देश में पिछले 24 घंटों के दौरान कोरोना के 1,088 नए मामले सामने आए हैं। अब तक कोरोना से संक्रमित हो चुके लोगों की संख्या बढ़कर चार करोड़, तीस लाख 38 हजार से ऊपर चली गई है। इसके अलावा 26 और मरीजों की मौत के बाद महामारी से मरने वालों की तादाद 5 लाख 21 हजार, 736 तक पहुंच गई है। राजधानी दिल्ली, मुंबई और हरियाणा में पिछले दो दिनों में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। दिल्ली में बुधवार को 299 लोग संक्रमित पाए गए जबकि इसके एक दिन पहले इनकी संख्या 202 थी। 10 मार्च के बाद पहली बार दिल्ली एनसीआर में मरीजों की संख्या दो सौ से ऊपर पहुंची है। मुंबई में बुधवार को कोरोना के 73 नए मरीज मिले। यह 17 मार्च के बाद इनकी सबसे अधिक संख्या है। हरियाणा में 5 मार्च के बाद बुधवार को सबसे अधिक 179 मरीज संक्रमित पाए गए। वैसे देखें तो यह संख्या कम ही प्रतीत होती है, लेकिन बुधवार के आंकड़ों के हिसाब से दिल्ली में संक्रमितों की संख्या 2.49 फीसद है जो पिछले तीन महीने का सर्वाधिक है। इसमें एक खास बात गौर करने की यह है कि अभी कोरोना के अधिक टेस्ट नहीं हो रहे हैं। जैसे दिल्ली में 12 हजार से अधिक मरीजों की जांच में 299 लोग संक्रमित मिले। ये टेस्ट इससे अधिक लोगों के लिए जाएं तो संक्रमितों की संख्या ज्यादा भी मिल सकती है। अभी के हालात को कोई चेतावनी माने या न माने लेकिन सरकारी स्वास्थ्य एजेंसियों व लोगों को सावधान हो जाना चाहिए। पिछले दिनों देश में चौथी लहर की आशंका जताई जा चुकी है। दुनिया में चीन सहित काफी देशों में वायरस का संक्रमण काफी तेज है। ऐसे में कोविड प्रोटोकॉल, सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क लगाने को लेकर सचेत हो जाना चाहिए। अभी राहत की बात यह है कि संक्रमितों में काफी कम लोगों को अस्पतालों में भर्ती होने की जरूरत पड़ रही है। ज्यादा घबराने की बात अभी तो नहीं है, लेकिन यह बात भी सच है कि कोविड-19 वायरस का नया वेरिएंट आने का खतरा बना हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Apr 2022 15:54:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>रिफाइनरी के काम में तेजी लाएंगे गहलोत</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ड्रीम प्रोजेक्ट बाडमेर में रिफाइनरी के काम में अब तेजी आने लगी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--gehlot-will-speed-up-refinery-work/article-7881"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/refinery-.jpg" alt=""></a><br /><p>मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ड्रीम प्रोजेक्ट बाडमेर में रिफाइनरी के काम में अब तेजी आने लगी है। गहलोत ने अपने पिछले शासन काल में ही प्रदेश के इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर ठोस कदम उठा लिये थे। प्रेदश के पश्चिमी इलाके की आर्थिक तकदीर बदलने वाले इस प्रोजेक्ट के काम ने अब रफतार पकड़नी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री गहलोत अपने स्तर पर रिफाइनरी के काम की लगातार निगरानी रख रहे हैं। उनकी कोशिश है कि तय समय पर ही इस प्रोजेक्ट को पूरा कर राजस्थान के लोगों को लाभ मिले। मुख्यमंत्री गहलोत रिफाइनरी के इस प्रोजेक्ट को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं और उनकी मंशा है कि यह तय समय पर स्थापित हो।</p>
<p><br />कोरोना के हालातों से उबरने के बाद बाडमेर जिले के पचपदरा इलाके में स्थापित होने वाली रिफाइनरी अब आकार लेने लगी है। मुख्यमंत्री गहलोत मौके पर ही जाकर इसका निरीक्षण करते हैं और काम में तेजी लाने पर जोर देते हैं। रिफाइनरी के लिए गहलोत ने लंबा संघर्ष किया है। उनका मानना है कि इस अहम प्रोजेक्ट से राजस्थान को आर्थिक प्रगति की राह पर दौड़ने में मदद मिलेगी। इसके जरिये बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया होंगे। इस अकेले प्रोजेक्ट से ही पश्चिमी राजस्थान में बड़ा बदलाव दिखेगा। गहलोत के निर्देश पर सरकार के विभिन्न विभागों में समन्वय बना कर रिफाइनरी के काम में तेजी लाई जा रही है। इसके अलावा रिफाइनरी के आसपास के क्षेत्रों में रीको अन्य उद्योगों की स्थापना आसानी से हो इसके लिए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की योजना पर लगातार काम कर रहा है। जिला प्रशासन भी हर महीने रिफाइनरी के कामकाज की समीक्षा करता है ताकि किसी भी तरह की स्थानीय मंजूरी देने में कोई देरी नहीं हो।</p>
<p><br />एचपीसीएल की देखरेख में 4500 एकड़ भूमि में इस रिफाइनरी की स्थापना होगी।  इसके साथ ही पेट्रोकेमिकल कांप्लेक्स के साथ ही कई प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना होगी और प्रदेश के लोगों को रोजगार के साधन उपलब्ध होंगे। इस इलाके में देश का सबसे बड़ा जमीनी तेल और गैस भंडार मौजूद है। रिफाइनरी का प्रोजेक्ट करीब 45 हजार करोड़ रुपए का आंका गया है। इसमें से करीब 38 हजार करोड़ रुपए के कार्यादेश जारी भी हो चुके हैं। इसके अलग-अलग तरीके के काम प्रगति पर है।</p>
<p><br />रिफाइनरी के साथ-साथ सरकार ने इसके चारों तरफ पेट्रो केमिकल रीजन इंडस्ट्रीज बनाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। इसके लिए सरकार ने बड़ी संख्या में निवेशकों को आमंत्रित कर उन्हें अपने उद्योग स्थापित करने का न्योता भी दिया है। इन उद्योगों की स्थापना के लिए रीको ने बड़े पैमाने पर जमीन भी चिंहित कर ली है। इस क्षेत्र में निवेशकों को रियायती दरों पर जमीन, उचित माहौल और जरूरी सुविधाएं देने की तैयारी भी सरकार ने कर ली है।</p>
<p><br />केंद्र सरकार की ढुलमुल नीतियों के चलते रिफाइनरी के काम में देरी होने से इसकी लागत में करीब 14000 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हो गई है। गहलोत के प्रयासों से ही वर्ष 2013 में रिफाइनरी का शिलान्यास हो गया था। उसके बाद आई सरकार ने इसे अटकाने का काम किया और राजनीतिक कारणों के चलते प्रधानमंत्री से 2018 में इसका शुभारंभ करवाया गया। इस तरह से रिफाइनरी के काम में देरी हुई और नुकसान प्रदेश की जनता को उठाना पड़ा। मुख्यमंत्री गहलोत ने इस बार शासन संभालते ही इस अहम प्रोजेक्ट पर पूरा ध्यान केंद्रित किया और नतीजे में अब रिफाइनरी के आकार लेने से आम जनता में सरकार के काम के प्रति भरोसा पनप गया। प्रदेश की जनता भी चाहती है कि रिफाइनरी जल्द से जल्द बने और राजस्थान एक नए युग में कदम रखें।<br /><strong>-  राजीव जैन</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /><strong>विश्लेषण</strong><br />कोरोना के हालातों से उबरने के बाद बाडमेर जिले के पचपदरा इलाके में स्थापित होने वाली रिफाइनरी अब आकार लेने लगी है। मुख्यमंत्री गहलोत मौके पर ही जाकर इसका निरीक्षण करते है और काम में तेजी लाने पर जोर देते हैं। रिफाइनरी के लिए गहलोत ने लंबा संघर्ष किया है। उनका मानना है कि इस अहम प्रोजेक्ट से राजस्थान को आर्थिक प्रगति की राह पर दौड़ने में मदद मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 Apr 2022 11:17:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>स्वास्थ्य क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[यहां डॉक्टरों तथा आबादी का अनुपात संतोषजनक नहीं है, ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/-editorial--the-growing-challenges-of-the-health-sector/article-7549"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/e1.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय समाज में सदियों से धारणा रही है ‘जान है तो जहान है’ तथा ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया’। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:’ अर्थात ‘सब सुखी हों और सभी रोगमुक्त हों’ मूलमंत्र में यही स्वास्थ्य भावना निहित है। लोगों के स्वास्थ्य स्तर को सुधारने तथा स्वास्थ्य को लेकर प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को वैश्विक स्तर ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस को मनाए जाने का प्रमुख उद्देश्य दुनिया के हर व्यक्ति को इलाज की अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, उनका स्वास्थ्य बेहतर बनाना, उनके स्वास्थ्य स्तर को ऊंचा उठाना तथा समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक कर स्वस्थ वातावरण बनाते हुए स्वस्थ रखना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बैनर तले मनाए जाने वाले इस दिवस की शुरुआत 7 अप्रैल 1950 को हुई थी और यह दिवस मनाने के लिए इसी तारीख का निर्धारण डब्ल्यूएचओ की संस्थापना वर्षगांठ को चिन्हित करने के उद्देश्य से किया गया था।</p>
<p><br />सम्पूर्ण विश्व को निरोगी बनाने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ नामक वैश्विक संस्था की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को हुई थी, जिसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में है। कुल 193 देशों ने मिलकर जेनेवा में इस वैश्विक संस्था की नींव रखी थी, जिसका मुख्य उद्देश्य यही है कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा हो, बीमार होने पर उसे बेहतर इलाज की पर्याप्त सुविधा मिल सके। संस्था की पहली बैठक 24 जुलाई 1948 को हुई थी और इसकी स्थापना के समय इसके संविधान पर 61 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। संगठन की स्थापना के दो वर्ष बाद ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाने की परम्परा शुरू की गई। इस वर्ष पूरी दुनिया 72वां विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है। संयुक्त राष्ट्र का अहम हिस्सा ‘डब्ल्यूएचओ’ दुनिया के तमाम देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग और मानक विकसित करने वाली संस्था है। इस संस्था का प्रमुख कार्य विश्वभर में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और उन्हें सुलझाने में सहयोग करना है। अपनी स्थापना के बाद इस वैश्विक संस्था ने ‘स्मॉल पॉक्स’ जैसी बीमारी को जड़ से खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और टीबी, एड्स, पोलियो, रक्ताल्पता, नेत्रहीनता, मलेरिया, सार्स, मर्स,  इबोला जैसी खतरनाक बीमारियों के बाद कोरोना की रोकथाम के लिए भी जी-जान से जुटी है। इस संस्था के माध्यम से प्रयास किया जाता है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहे।</p>
<p><br />विश्व स्वास्थ्य संगठन का पहला लक्ष्य वैश्विक स्वास्थ्य कवरेज रहा है लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि समुदाय में सभी लोगों को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं व देखभाल मिले। हालांकि दुनिया के तमाम देश स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के समक्ष जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन तो स्वयं मानता है कि दुनिया की कम से कम आधी आबादी को आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्वभर में अरबों लोगों को स्वास्थ्य देखभाल हासिल नहीं होती। करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वास्थ्य देखभाल में से किसी एक को चुनने पर विवश होना पड़ता है।</p>
<p><br />जन-स्वास्थ्य से जुड़े कुछ वैश्विक तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो हालांकि टीकाकरण, परिवार नियोजन, एचआईवी के लिए एंटीरिट्रोवायरल उपचार तथा मलेरिया की रोकथाम में सुधार हुआ है लेकिन चिंता की स्थिति यह है कि अभी भी दुनिया की आधी से अधिक आबादी तक आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच नहीं है। विश्वभर में 80 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपने घर के बजट का कम से कम दस फीसदी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर खर्च करते हैं। यही नहीं, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर बड़ा खर्च करने के कारण दस करोड़ से ज्यादा लोग अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। चिंता की स्थिति यह है कि पिछले कुछ दशकों में एक ओर जहां स्वास्थ्य क्षेत्र ने काफी प्रगति की है, वहीं कुछ वर्षों के भीतर एड्स, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप के साथ हृदय रोग, मधुमेह, क्षय रोग, मोटापा, तनाव जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां निरन्तर बढ़ रही हैं।अगर भारत की बात की जाए तो मौजूदा कोरोना काल को छोड़ दें तो आर्थिक दृष्टि से देश में पिछले दशकों में तीव्र गति से आर्थिक विकास हुआ लेकिन कड़वा सच यह भी है कि तेज गति से आर्थिक विकास के बावजूद इसी देश में करोड़ों लोग कुपोषण के शिकार हैं। <br />   <strong> - योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br />राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार तीन वर्ष की अवस्था वाले तीन फीसदी से भी अधिक बच्चों का विकास अपनी उम्र के हिसाब से नहीं हो सका है और चालीस फीसदी से अधिक बच्चे अपनी अवस्था की तुलना में कम वजन के हैं। इनमें करीब अस्सी फीसदी बच्चे रक्ताल्पता (अनीमिया) से पीड़ित हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक दस में से सात बच्चे अनीमिया से पीड़ित हैं जबकि महिलाओं की तीस फीसदी से ज्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक देश में अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह मुफ्त नहीं हैं और जो हैं, उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। विश्व बैंक की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका अपनी जीडीपी का 16.9 फीसदी, जर्मनी 11.2, जापान 10.9, कनाडा 10.7, यूके 9.8 तथा आस्ट्रेलिया 9.3 फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं जबकि भारत में यह जीडीपी का महज 3.54 फीसदी ही है और उसमें से भी सरकारी खर्च का योगदान केवल 1.54 फीसदी ही है।</p>
<p><br />भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को देखा जाए तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की बड़ी कमी है। यहां डॉक्टरों तथा आबादी का अनुपात संतोषजनक नहीं है, बिस्तरों की उपलब्धता बेहद कम है। देश में सवा अरब से अधिक आबादी के लिए 47 हजार लोगों पर सिर्फ एक सरकारी अस्पताल है। देशभर के सरकारी अस्पतालों में इतनी बड़ी आबादी के लिए करीब सात लाख बिस्तर हैं। सरकारी अस्पतालों में करीब 1.17 लाख डॉक्टर हैं अर्थात दस हजार से अधिक लोगों पर महज एक डॉक्टर ही उपलब्ध है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के नियमानुसार प्रति एक हजार मरीजों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। कुछ राज्यों में तो स्थिति यह है कि 40 से 70 हजार ग्रामीण आबादी पर केवल एक सरकारी डॉक्टर है। भारतीय चिकित्सा परिषद के अनुसार देश में 50 फीसदी से भी ज्यादा झोलाझाप डॉक्टर हैं। परिषद का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में जहां योग्य चिकित्सकों की संख्या 58 फीसदी है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह 19 प्रतिशत से भी कम है। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य दिवस के माध्यम से जहां समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है, वहीं इसका सबसे महत्वपूर्ण बिन्दू यही होता है कि लोगों को स्वस्थ वातावरण बनाकर स्वस्थ रहना सिखाया जा सके। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव-स्वास्थ्य की परिभाषा है।<br /><br /><strong>विश्व स्वास्थ्य दिवस</strong><br />दुनिया के तमाम देश स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के समक्ष जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Apr 2022 14:44:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>आखिर बढ़े ईंधन के दाम</title>
                                    <description><![CDATA[पेट्रोल के दाम 88 पैसे और डीजल के दाम 83 पैसे प्रति लीटर तक बढ़ाए गए हैं, तो वहीं रसोई गैस सिलेंडर 50 रुपए और महंगा हो गया है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--after-all--fuel-prices-increased/article-6583"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/petrol.jpg" alt=""></a><br /><p>आखिर तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों में फिर से बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू कर दिया है। पेट्रोल के दाम 88 पैसे और डीजल के दाम 83 पैसे प्रति लीटर तक बढ़ाए गए हैं, तो वहीं रसोई गैस सिलेंडर 50 रुपए और महंगा हो गया है। देश के अलग-अलग राज्यों में वृद्धि का असर अलग-अलग ही पड़ा है। कुछ राज्य ऐसे हैं जिनके पड़ोसी राज्यों में पेट्रोल-डीजल सस्ता बिक रहा है। जैसे कि राजस्थान का ही हाल जाने तो यहां पेट्रोल 88 पैसे से बढ़कर अब 107.94 रु. प्रति लीटर हो गया है, वहीं डीजल 83 पैसे बढ़ने से 91 रु. 53 पैसे प्रतिलीटर हो गया है। वहीं पड़ोसी राज्य हरियाणा, पंजाब आदि में पेट्रोलियम ईंधन के दाम सस्ते हैं। पेट्रोल और डीजल के दाम आखिरी बार 17 नवम्बर 21 को यानी 124 दिन पहले बढ़े थे। वहीं रसोई गैस के दाम 6 अक्टूबर 21 को यानी 166 दिन पहले बढ़े थे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड आॅयल का भाव इस समयावधि के दौरान लगातार बढ़ रहा है तो पहले से ही अनुमान था कि पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्यों में निश्चित रूप से बढ़ोतरी की जाएगी। बढ़Þोतरी की पहले भी लागू हो सकती थी, लेकिन पांच राज्यों में चुनावों की वजह से यह रूकी हुई थी। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से भी दामों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। इस बीच, डीजल की  थोक खरीददारी में एक साथ पच्चीस रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। यह सोचा भी नहीं गया कि इस बढ़ोतरी का महंगाई वृद्धि में कितना बड़ा असर पड़ेगा। तब सरकार ने कहा था कि बढ़ोतरी केवल थोक खरीददारी पर की गई है, इसका असर खुदरा बिक्री पर नहीं पड़ेगा, लेकिन अब खुदरा बिक्री के दाम भी बढ़ा दिए गए हैं। रसोई गैस सिलेंडर एक साथ 50 रुपए महंगा करने से हर परिवार के बजट पर इसका प्रभाव पड़ेगा। पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि या बाजार में बढ़ती महंगाई का सम्पन्न लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन भारत की बड़ी आबादी मुश्किलों में जुझती हुई दिन गुजारती है। पिछले कुछ समय से रोजमर्रा की जरूरतों के सामान की कीमतें आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। ऐसे में सरकार की कोशिश यह होनी चाहिए थी कि वह लोगों को महंगाई से राहत दिलाने के लिए ऐसे उपाय निकाले, ताकि आम आबादी के बीच आय और खर्च को लेकर संतुलन बना रहे। कोरोना व लॉकडाउन की वजह से बड़ी आबादी की आय तो  रुक गई है, काफी लोगों की तो खत्म हो गई है। करोड़ों लोगों के रोजगार पर आफत आई हुई है। सरकार को सारे हालात का पता है फिर भी सरकार पेट्रोल-डीजल व रसोई गैस के दामों में बढ़ोतरी करके लोगों के सामने और मुश्किलें पैदा कर रही हैं। कोई वैल्पिक उपाय नहीं कर रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Mar 2022 14:48:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>आत्म मंथन करें</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस को एकजुट होकर गंभीर आत्म मंथन करना चाहिए और इसके लिए यही सही समय भी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--introspection-congress/article-6176"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/congress-meeting.jpg" alt=""></a><br /><p>हाल के पांच राज्यों के चुनाव में देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की जो हालत बनी, उसके बाद संगठनात्मक सुधारों की मांग का जोर पकड़ना स्वाभाविक ही था, जिसके चलते रविवार 13 मार्च को बुलाई गई कार्य समिति की बैठक की यही बड़ी वजह थी। बैठक से पहले कुछ आंतरिक कलह और दोषारोपण का भी सिलसिला चला। पंजाब की हार के लिए पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन को जिम्मेदार ठहराया गया तो इसके जवाब में कैप्टन ने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व कभी नहीं सुधर सकता। यदि कांग्रेस पंजाब में मेरे कारण हारी है तो फिर अन्य चार राज्यों में बुरी स्थिति कैसे बनी? कुछ नेताओं ने राज्य के पार्टी अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को जिम्मेदार ठहराया तो कुछ ने उत्तराखंड के नेता हरीश रावत को हार की वजह माना। ऐसे ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी पार्टी के भीतर बदलाव लाने की मांग की। लेकिन कार्य समिति की बैठक के बाद वरिष्ठ कांग्रेसियों के जो बयान सामने आए, उनसे लगता है कि वे राहुल गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं। वहीं पंजाब में हार के लिए अंदरूनी कारणों को जिम्मेदार ठहरा दिया गया। लेकिन फिर भी पार्टी में सुधार व बदलाव की जरूरत को भी स्वीकार किया गया। हाल के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी पराभव के सबसे बुरे दौर में है, जो यह बताता है कि वर्ष 2024 के आम चुनाव में बिना बदलाव व विपक्षी एकजुटता के उसका भाजपा का विकल्प बनना संभव नहीं है। पंजाब में पराजय के बाद अब पार्टी दो राज्यों की सत्ता संभाल रही है। जबकि 2014 में पार्टी नौ राज्यों में शासन कर रही थी। इस साल के अंत में पार्टी हिमाचल में वापसी की उम्मीद कर रही है, लेकिन वीरभद्र के अभाव में वहां चुनौती बड़ी ही बनी रहेगी। वहीं 2024 से पहले राजस्थान व छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे। ऐसे में आम चुनाव से पहले वर्ष में पार्टी को भाजपा से बड़ी चुनौती मिलेगी। नि:संदेह कांग्र्रेस की ऐसी दुर्गती देश के लोकतंत्र व राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं है। किसी भी बहुमत वाली सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए किसी भी लोकतांत्रिक देश में मजबूत विपक्ष की जरूरत होती है। तभी तीन दशक में पराभव के बावजूद कांग्रेस भाजपा का व्यावहारिक विकल्प नजर आती है। लेकिन पार्टी की वर्तमान में दयनीय हालत देखकर दिग्गज कांग्रेसियों का धैर्य जवाब दे रहा है। हालांकि अभी भी कांग्र्रेस भारत में नेतृत्व की क्षमता रखती है। संगठनात्मक सुधारों व रीति-नीतियों में बदलाव लाकर वह भाजपा का विकल्प बन सकती है। इसके लिए कांग्रेस को एकजुट होकर गंभीर आत्म मंथन करना चाहिए और इसके लिए यही सही समय भी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Mar 2022 13:06:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>संकट में आर्थिकी</title>
                                    <description><![CDATA[वैश्विक संस्थान की प्रमुख क्रिस्टलीना जार्जीवा ने साफ कहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्य जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वह बड़ी चिंता की बात है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial-economy-in-crisis/article-6096"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/imf.jpg" alt=""></a><br /><p>अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने आने वाले दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने का जो संकेत दिया है, जो एक चिंता का विषय है और इसे एक चेतावनी के रूप में लेने की जरूरत है। इस वैश्विक संस्थान की प्रमुख क्रिस्टलीना जार्जीवा ने साफ कहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्य जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वह बड़ी चिंता की बात है और भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष चाहे ऐसा संकेत न भी देता तो भी भारत की सरकार और यहां जनता आने वाले संकट को लेकर काफी चिंतित है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी एक बार स्वयं चिंता व्यक्त कर चुकी है। उन्होंने माना भी कि महंगे होते कच्चे तेल से अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है। वित्त मंत्री की चिंता से अनुमान लगाया जा सकता कि आने वाले दिनों में हमारे सामने कैसे संकट खड़े हो सकते हैं और इसके लिए तैयार रहने की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 140 डालर प्रति बैरल के करीब तक पहुंच गई है और यह 150 डालर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं। भारत की अर्थव्यवस्था वैसे भी काफी समय से अनेक प्रकार की गंभीर चुनौतियों का सामना करती चली आ रही है। कोरोना महामारी के दो सालों में तो विकास दर शून्य से नीचे चली गई थी। अभी भी हालत सामान्य होने में काफी समय लग सकता है। 2020 में तो आर्थिक गतिविधियां एक तरह से ठप ही रही थी। उसके बाद हालात में सुधार लाने के कुछ कदम उठाए गए और पिछले दो साल में कुछ संभलने की स्थिति बनी तो रूस-यूक्रेन संकट खड़ा हो गया। वैसे जीडीपी वृद्धि के अनुमानों को लेकर कुछ वैश्विक वित्तीय संस्थान और रेटिंग एजेंसियां अभी भी उत्साहित नहीं रही हैं। दो महीने पहले के अनुमानों को लेकर भी अब संशय दिखने लगे हैं। कच्चे तेल के मामले में भारत दूसरे देशों पर निर्भर है। अपनी जरूरत का 50 फीसदी तेल हम बाहर से खरीदते हैं। आर्थिक प्रतिबंधों के चलते रूस ने भारत को सस्ता तेल उपलब्ध कराने की पेशकश की है, लेकिन इससे हमारी जरूरत की पूर्ति नहीं हो सकती, फिर इसे भारत तक लाने की कीमत ज्यादा पड़ती है। तेल उत्पादन अन्य देशों से जरूरत तेल महंगा ही मिलेगा। महंगे कच्चे तेल को लेकर भारत में जल्दी ही पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि निश्चित मानी जा रही है। दामों में वृद्धि के साथ ही महंगाई और बढ़ेगी, जो पहले से ही आम आदमी को पीड़ा दे रही है। अब देखना ही सरकार महंगे तेल व महंगाई के बीच किस तरह संतुलन कायम करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Mar 2022 11:33:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>फिर खुला आसमान</title>
                                    <description><![CDATA[ इस फैसले से न केवल विदेश जाने वाले यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि ट्रेवल एवं टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/editorial--again-open-skies--due-to-the-corona-epidemic--the-last-long-closed-international-flights-will-be-restored-from-march-27/article-6006"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/air-plane.png" alt=""></a><br /><p>कोरोना महामारी के चलते पिछले लंबे समय से बंद अंतरराष्ट्रीय उड़ानें 27 मार्च से फिर बहाल हो जाएंगी। इस फैसले से न केवल विदेश जाने वाले यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि ट्रेवल एवं टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। कोरोना की वजह से मार्च, 2020 से लेकर अब तक अंतरराष्ट्रीय उड़ाने बंद होने से इस उद्योग की कमर टूट गई थी। अब कोरोना का असर दिन प्रतिदिन कम हो रहा है। हालात बेहतर होते हुए भी यदि इस फैसले को आगे तक और टाला जाता तो इस इण्डस्ट्री में संकट और गहरा जाता और इसे फिर संभलने मेंं कई मुश्किलें खड़ी हो जातीं। इस इण्डस्ट्री में काम करने वाले करीब दस लाख लोगों की नौकरी संकट में पड़ने का खतरा बढ़ जाता। सरकार के राजस्व संग्र्रह में इस इण्डस्ट्री का योगदान करीब 10 प्रतिशत है। 2019 पर गौर करें तो ट्रेवल इण्डस्ट्री ने 30 बिलियन डॉलर की कमाई सिर्फ विदेशी यात्रियों से की थी। कोरोना शुरू होने से पहले 2019 में करीब 25 मिलियन भारतीय विदेश घूमने गए थे और 11 मिलियन विदेशी पर्यटक भारत आए थे। इस तरह पिछले दो साल में अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद होने से करीब 60 से 65 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है। दो साल तक उड़ाने बंद रहने और कोरोना लॉकडाउन के चलते इस इण्डस्ट्री में काम करने वाले या इससे जुड़े लाखों लोगों की नौकरियां खत्म हो चुकी हैं। कोरोना का असर कम होता देख दुनिया के कई देशों ने विदेशी यात्रियों के लिए रास्ते खोल दिए हैं। तब से भारत में भी विदेशी यात्रियों के लिए उड़ाने शुरू करने की मांग उठ रही थी। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार भारतीय एयरलाइंस और हवाई अड्डों को वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान 20 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। वहीं, हवाई अड्डों का संचालन करने वाली कंपनियों को भी 5 हजार करोड़ रुपए का नुकसान झेलना पड़ा। कई एयरलाइंस ने अपने किराए बढ़ा दिए हैं, जिससे यात्रियों को ज्यादा जेब खाली करनी पड़ रही है। किराये में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी गई है। उड़ानें शुरू होने से विमानन उद्योग व पर्यटन उद्योग की गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। मांग व आपूर्ति में संतुलन कायम होगा। अंतरराष्ट्रीय यात्रा सस्ती होने की उम्मीद जगेगी। लेकिन रूस-यूक्रेन का युद्ध और रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों की आंच भी इण्डस्ट्री पर पड़ेगी। युद्ध समाप्त होने के बाद ही विमानन उद्योग सामान्य हो सकेगा। फिर भी नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ाने शुरू होने से यात्रियों को राहत मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 12 Mar 2022 12:50:58 +0530</pubDate>
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