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                <title>United Nations General Assembly - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>पीएम मोदी तीन दिवसीय यात्रा के लिए अमेरिका रवाना</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेन्द्रे मोदी क्वाड शिखर सम्मेलन में भाग लेने और संयुक्त राष्ट्र महासभा में भविष्य के शिखर सम्मेलन को संबोधित करने के लिए अमेरिका की तीन दिवसीय यात्रा पर रवाना हुए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/pm-modi-leaves-for-america-for-a-three-day-visit/article-91148"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/630400-size-(9)3.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्रे मोदी क्वाड शिखर सम्मेलन में भाग लेने और संयुक्त राष्ट्र महासभा में भविष्य के शिखर सम्मेलन को संबोधित करने के लिए अमेरिका की तीन दिवसीय यात्रा पर रवाना हुए।</p>
<p>प्रस्थान करने से पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि वह अपने क्वाड सहयोगियों अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज और जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के साथ आज शाम को राष्ट्रपति बाइडेन के गृहनगर विल्मिंगटन, डेलावेयर में आयोजित सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद कर रहे हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि यह मंच भारत-प्रशांत क्षेत्र में शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए समान विचारधारा वाले देशों का महत्वपूर्ण समूह के रूप में उभरा है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति बाइडेन के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक आज दोपहर में होगी, इससे दोनों पक्षों को Þहमारे लोगों और वैश्विक भलाई के लिए भारत-अमेरिका सम्पूर्ण वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और गहरा बनाने के नए मार्गों की समीक्षा और पहचान करने की अनुमति मिलेगी।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वह भारतीय प्रवासियों के साथ बातचीत करने के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं और महत्वपूर्ण अमेरिकी व्यापार नेताओं के साथ संलग्न होने की उम्मीद है, जो दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी लोकतंत्रों के बीच अद्वितीय साझेदारी को जीवंत करते हैं। भारतीय प्रवासियों के साथ बातचीत 22 सितंबर को लॉन्ग आइलैंड, न्यूयॉर्क में होने वाला है।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भविष्य का शिखर सम्मेलन, वैश्विक समुदाय को मानवता की भलाई के लिए आगे का रास्ता तय करने का एक अवसर प्रदान करता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि मैं मानवता के छठे भाग के विचारों को साझा करूंगा क्योंकि शांतिपूर्ण और सुरक्षित भविष्य में उनका दांव दुनिया में सबसे ज्यादा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Sep 2024 12:00:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>World Population Day: विकास के लिए जनसंख्या नियंत्रण जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[ परिवार नियोजन, गरीबी, लैंगिक समानता, नागरिक अधिकार, मां और बच्चे का स्वास्थ्य, गर्भनिरोधक दवाओं के इस्तेमाल जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा और विमर्श किया जाता है।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/population-control-is-necessary-for-development/article-84352"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/u1rer-(6)10.png" alt=""></a><br /><p>संयुक्त राष्ट्र संघ ने बढ़ती जनसंख्या पर चिंता प्रकट की, इसके बाद 11 जुलाई 1989 को संयुक्त राष्ट्र में बढ़ती जनसंख्या को काबू करने और परिवार नियोजन को लेकर लोगों में जागरूकता लाने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसके साथ ही पहली बार वर्ल्ड पॉपुलेशन- डे मनाया गया। इस मूल तिथि को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में निर्धारित करने का निर्णय लिया गया था। दिसंबर 1990 में इसे आधिकारिक बना दिया। हर साल इस दिन जनसंख्या को कंट्रोल करने के उपायों पर चर्चा की जाती है। बढ़ी हुई जनसंख्या की वजह से देश और दुनिया के सामने जो परेशानियां हैं उनसे इको सिस्टम और मानवता को जो नुकसान पहुंचता है,उसके प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए ये दिन मनाया जाता है। परिवार नियोजन, गरीबी, लैंगिक समानता, नागरिक अधिकार, मां और बच्चे का स्वास्थ्य, गर्भनिरोधक दवाओं के इस्तेमाल जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा और विमर्श किया जाता है। </p>
<p>हमारा देश चीन के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। कोरोना काल में बढ़ी हुई आबादी के दुष्प्रभाव साफ नजर आए, स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा, हर क्षेत्र में मुश्किलें बढ़ी हैं, ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण के महत्व को समझना और भी जरूरी हो गया है। हर साल विश्व जनसंख्या दिवस एक थीम के साथ मनाया जाता है। जैसे कि कुल विश्व जनसंख्या 8 मिलियन का आंकड़ा पार करने वाली है, अवसरों का दोहन और सभी के लिए अधिकार और विकल्प सुनिश्चित करना। अगर बात करें वर्तमान समय की तो इस समय विश्व की जनसंख्या 7.92 अरब के पार पहुंच गई है। इस आंकड़े में हर सेकंड  इजाफा हो रहा है। वहीं विश्व की इस बढ़ती जनसंख्या में चीन और भारत का सबसे ज्यादा योगदान है। जिसमें भारत की जनसंख्या वृद्धि दर तो कुछ सालों में चीन से भी ज्यादा हुई है। कुछ साल में भारत चीन को आसानी से पीछे छोड़कर जनसंख्या की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा देश बन जाएगा। अगर जनसंख्या वृद्धि की बढ़ती दर के पीछे केवल चीन और भारत ही नहीं है,बल्कि अन्य कई देश हैं जहां जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इनमें भारत और चीन के पड़ोसी पकिस्तान और बांग्लादेश का भी नाम शामिल है।</p>
<p>आजादी के पहले तक पाकिस्तान और बांग्लादेश भी भारत के ही हिस्से हुए करते थे। वर्तमान में भी अगर ये भारत के ही भाग होते तो भारत की बढ़ती जनसंख्या का केवल आप अनुमान ही लगा सकते हैं। जनसंख्या वृद्धि दर संबंधी आंकड़ों पर नजर रखने वाली वेबसाइट अनुसार 2021 में भारत की जनसंख्या लगभग 139 करोड़ हो चुकी है। वहीं, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या की रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी 1.21 अरब यानी 121 करोड़ है। वर्ष 2021 चला गया और वर्ष 2022 और 2023 भी चला गया। और वर्ष 2024 का लगभग आधे से ज्यादा साल बीतने को आ गया है। लेकिन अभी नई जनगणना अधर में है।</p>
<p>हम देश की वर्ष 2011 की जनगणना की बात करें तो इस जनगणना को दो चरणों में पूरा किया गया था। पहले चरण में अप्रैल 2010 से सितंबर 2010 के बीच देशभर में घरों की गिनती की गई थी। वहीं, दूसरे चरण में 9 फरवरी 2011 से 28 फरवरी 2011 तक चली। यह जनगणना किसी भी देश के विकास में मील का पत्थर होती है और नीति निर्धारण में अहम भूमिका निभाती है। देश में प्रत्येक 10 साल में एक बार जनगणना होती है। </p>
<p>पिछली जनगणना के 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं और 13वां वर्ष शुरू हो चुका है। वर्ष 2021 में नई जनगणना होनी थी,लेकिन वैश्विक संक्रामक महमारी कोविड-19 के प्रकोप के कारण यह नहीं हो पाई। और इसमें लगातार देरी हो रही है। जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि के कारण संसार पर भुखमरी का संकट तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है। जब हम महानगरों की बात करते हैं तो  साफ नजर आता है कि महानगरों कि जनसंख्या वृद्धि के कारण वाहनों की लंबी लंबी कतारें, घण्टों तक लम्बा जाम और बेतरतीब फंसे वाहन आमजन के जीवन मे बड़ी समस्या बनते दिखाई दे रहे है। </p>
<p>बढ़ती जनसंख्या के कारण स्थिति बदहाल हो रही है। चाहे  बात रेलवे स्टेशनों की हो या फिर बस स्टैंड, बाजार, मॉल, सड़कों की हर तरफ भीड़ तंत्र दिखाई दे रहा है। जिसके कारण आमजन फंसता दिखाई दे रहा है। सरकार की ओर से चलाए जा रहे तमाम अभियान बौने साबित हो रहे हैं।  लंदन के विश्व विख्यात  जनसंख्या विशेषज्ञ हरमन वेरी ने संसार को सावधान करते हुए लिखा है- सन् 2050 में संसार की हालत महाप्रलय से भी बुरी हो जायेगी। तब धरती पर न तो इतने लोगों के लिए पर्याप्त भोजन मिल सकेगा, न शुद्ध वायु,न पानी,न बिजली। देश की उत्पादकता ही राष्ट्रीय विकास का आधार है। </p>
<p><strong>- प्रकाश चंद्र शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jul 2024 11:44:34 +0530</pubDate>
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                <title>‘नशे का सेवन करता है अनमोल जीवन का शिकार’</title>
                                    <description><![CDATA[ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसम्बर, 1987 को प्रस्ताव पारित कर हर वर्ष 26 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस’ मनाने का निर्णय लिया था। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E2%80%98drug-abuse-becomes-a-victim-of-precious-life%E2%80%99/article-82767"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/u1rer-(4)1.png" alt=""></a><br /><p>जीवन अनमोल है। नशे के सेवन से यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है। इसे ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसम्बर, 1987 को प्रस्ताव पारित कर हर वर्ष 26 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस’ मनाने का निर्णय लिया था। इस दिन विश्वभर में नशीली वस्तुओं और पदार्थों के निवारण हेतु चेतना फैलाने के साथ ही नशे के आदी लोगों के उपचार को भी प्रोत्साहित किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस के अवसर पर मादक पदार्थों के उत्पादन, तस्करी एवं सेवन के दुष्परिणामों से लोगों को अवगत कराया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थ एवं गैर-कानूनी बढ़ती गतिविधियां चिंता का विषय हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भारत भी हेरोइन का बड़ा उपभोक्ता देश बनता जा रहा है। भारत के कुछ भागों में अफीम की खेती की जाती है और पारंपरिक तौर पर इसके बीज ‘पोस्तो’ से सब्जी भी बनाई जाती है। अफीम से ही हेरोइन बनती है। अपराध मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जिस अफीम को हेरोइन में तब्दील नहीं किया जाता, उसका दो तिहाई हिस्सा 5 देशों ईरान में 42 प्रतिशत, अफगानिस्तान में 7 प्रतिशत, पाकिस्तान में 7 प्रतिशत, भारत में 6 प्रतिशत और रूस में 5 प्रतिशत उपभोग किया जाता है। कुल वैश्विक उपभोग का 6 प्रतिशत भारत में होने का मतलब कि भारत में 1500 से 2000 हेक्टेयर में अफीम की अवैध खेती होती है। </p>
<p>युवाओं में मादक पदार्थों के नशे की लत तेजी से फैल रही है। मित्रों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा सिद्ध हो सकते हैं। स्कूल, कॉलेजों या पास-पड़ोस में गलत संगति के दोस्तों के साथ गुटखा, सिगरेट, शराब, गांजा, भांग, अफीम और धूम्रपान सहित चरस, स्मैक, कोकीन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं के सेवन की ओर बच्चों के कदम अपने आप बढ़ जाते हैं। बच्चों को फ्री में मादक पदार्थ उपलब्ध कराकर आदी बनाया जाता है और  इसके लिए चोरी से लेकर अपराध तक करने को उन्हें तैयार किया जाता है। नशे के लिए उपयोग में लाई जानी वाली सुइयाँ एड्स का कारण भी बन सकती हैं। कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं। उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है और फिर वे भी घर में ही चोरी आरंभ कर देते हैं।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार अफीम, हेरोइन, चरस, कोकीन, तथा स्मैक जैसे मादक पदार्थों से व्यक्ति वास्तव में अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है एवं पागल तथा अचेतन अवस्था में हो जाता है। ये ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ हैं, जिनकी लत के प्रभाव में व्यक्ति अपराध तक कर बैठता है। मामला सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं अपितु अपराध से भी जुड़ा हुआ है। </p>
<p>महिलाओं में मद्यपान की प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती जा रही है। वर्ष 2022 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 15 या उससे अधिक उम्र के करीब 19 प्रतिशत पुरुष नियमित शराब पीते हैं। देशभर में 15 या उससे अधिक उम्र की कुल 1.3 फीसदी महिलाएं नियमित रूप से शराब पीती हैं। ग्रामीण भारत में 19.9 फीसदी और शहरी भाग में 16.5 फीसदी पुरुष शराब  पीते हैं। मद्यपान करने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। महिलाओं में मद्यपान की बढ़ती प्रवृत्ति के संबंध में किए गए सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि करीब 40 प्रतिशत महिलाएं इसकी गिरफ्त में आ चुकी हैं। इनमें से कुछ महिलाएं खुलेआम तथा कुछ छिप छिप कर शराब का सेवन करती हैं। महानगरों और बड़े शहरों की कामकाजी महिलाओं के छात्रावासों में यह बहुत ही आम होता जा रहा है। मनोचिकित्सकों के अनुसार समय परिवर्तन के साथ साथ महिलाओं की सामाजिक स्थिति में भी बदलाव हुआ है। घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों को निभाती आज की नारी अधिक तनाव एवं मानसिक दबाव तले जी रही है। सफलता के मार्ग पर चलने के साथ ही उन पर कार्य का बोझ भी बढ़ता जा रहा है।</p>
<p>रोजमर्रा की अनेक समस्याओं से घिरी कई महिलाएँ इसका हल शराब के नशे के रूप में पाती हैं। महिलाओं में आधुनिक रहन-सहन, पश्चिम का अंधानुकरण, मद्यपन को सामाजिक मान्यता, आसानी से शराब की उपलब्धता, तनाव, अवसाद व पुरुषों से बराबरी की होड़ को बढ़ती मद्यपान की प्रवृत्ति के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों, जन संचार माध्यमों आदि से जुड़ी महिलाओं में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है।   कभी-कभी पुरुषों की बराबरी का दावा करती महिलाएँ इस नशे की लत में पड़ जाती हैं। अकेलेपन की शिकार उच्च वर्ग की गृहिणियाँ भी क्लबों और पार्टियों में जाकर शराब का सहारा लेती हैं। मद्यपान करने वाली महिलाओं में अविवाहित प्रौढ़ाओं, तलाकशुदा महिलाओं तथा पति से अलग रहने वाली युवतियों की संख्या अधिक है। कभी-कभी महिलाओं को शराब तक पहुँचाने में पति एक अहम भूमिका निभाते हैं। महानगरों में स्थित शराब मुक्ति केंद्रों के आँकड़ों से ज्ञात होता है कि नशे की गिरफ्त से छुटकारा पाने हेतु आने वाले 10 व्यक्तियों में से 4 महिलाएँ होती हैं। मनोचिकित्सकों, डॉक्टरों व समाजशास्त्रियों का एक ही मत है कि मद्यपान समाज के लिए व व्यक्ति के लिए जहर के समान है।  </p>
<p><strong>-गोविन्द पारीक</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार है)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Jun 2024 11:17:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>फिलिस्तीन को तीन यूरोपीय देशों के समर्थन के मायने</title>
                                    <description><![CDATA[ हाल ही संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद की बैठकों में 143 देशों ने फिलिस्तीन की मान्यता के प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/meaning-of-support-of-three-european-countries-to-palestine/article-79588"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/t21rer-(8)17.png" alt=""></a><br /><p>हाल ही यूरोपीय महाद्वीप के तीन देशों-नार्वे, आयरलैंड और स्पेन ने फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देने का फैसला किया, जो कि अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है। बताया जा रहा है कि इस पर 28 मई को औपचारिक मुहर लगा दी जाएगी। अब यह जाहिर होने लगा है कि फिलिस्तीन के मुद्दे पर अब दुनिया की सोच में बदलाव आ रहा है। ऐसे में इजरायल का नाराज होना स्वाभाविक है। लिहाजा उसने इसका कड़ा विरोध जताया है। इसके पीछे यह प्रमुख वजह रही है कि अब तक यह देश, इजरायल के करीबी मित्र रहे हैं। इजरायल ने इन देशों से अपने राजदूतों को बुला लिया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इन देशों के राजदूतों को बुलाकर अपना विरोध जताया है।</p>
<p>इजरायली  विदेश मंत्री इजरायल कैट्ज ने ट्विीट कर कहा कि-‘मैं आयरलैंड और नॉर्वे को स्पष्ट संदेश भेज रहा हूं। इजरायल उन लोगों के आगे नहीं झुकेगा जो उसकी संप्रभुता को कमजोर कर रहे हैं। हम चुप नहीं बैठेंगे। इस फैसले से दुनिया में यह संदेश गया है कि आतंकवाद को इनाम मिलता है। दूसरी ओर फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इसका स्वागत करते हुए अन्य देशों से भी ऐसे ही समर्थन देने की अपील की है। वहीं, हमास के एक वरिष्ठ नेता बारोम नईम ने इस फैसले को एक निर्णायक मोड़ बताते हुए कहा कि फिलिस्तीनी लोगों के कड़े प्रतिरोध की वजह से ही ऐसा हो पाया है। नार्वे के प्रधानमंत्री जानस गारस्तर के अनुसार-‘फिलिस्तीन देश को मान्यता देकर अरब क्षेत्र में शांति स्थापित हो सकती है। आयरलैंड के प्रधानमंत्री साइमन हैरिस ने कहा कि यह स्पेन और नॉर्वे के साथ उठाया गया कदम है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने कहा-‘उनका देश 28 मई को फिलिस्तीन को देश के तौर पर मान्यता देगा। वे यह भी मानते हैं कि इससे इजरायल के साथ राजनयिक तनाव पैदा होने की आशंका है। यहां बता दें कि सत्ताईस देशों वाले यूरोपीय संघ के सात सदस्य देश ऐसे हैं जो आधिकारिक तौर पर पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता देते हैं। इनमें पांच वे हैं जिन्होंने इस संघ में शामिल होने से पहले वर्ष 1988 में ही मान्यता देने की घोषणा कर दी थी, जैसे कि साइप्रस ने। वर्ष 2014 में स्वीडन ने मान्यता दी थी। वर्ष 1988 दौरान ही पूर्व चैकोस्लोवाकिया ने भी इसे मान्यता दी थी। लेकिन अब चेक गणराज्य के गठन के बाद उसका कहना है कि यह फैसला उस पर लागू नहीं होता। इसी तरह स्लोवाकिया ने भी अभी नहीं बताया है कि वह पूर्व मान्यता का हिस्सा है या नहीं। माल्टा और स्लोवेनिया का कहना है कि वे इसका अनुसरण कर सकते हैं। लेकिन किसी भी प्रमुख पश्चिमी शक्ति ने अभी ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं। दरअसल, यूरोप के अनेक देश आज भी इजरायल के इतने बड़े समर्थक हैं कि उन्होंने अभी तक फिलिस्तीन को मान्यता नहीं दी है। कहीं न कहीं इन देशों का यह विश्वास रहा है कि एक न एक दिन फिलिस्तीन या गाजा की जमीन पर इजरायल का पूरा कब्जा हो जाएगा।</p>
<p>हालांकि अभी इस बात का अधिक महत्व भी नहीं, लेकिन तीन यूरोपीय देशों से मिली फिलिस्तीन को मान्यता किसी अहम उपलब्धि से कम भी नहीं है। इस सोच को भी अब बल मिलने लगा है कि फिलिस्तीन के संघर्ष को अब अंतरराष्ट्रीय वैधता मिल जानी चाहिए। हाल ही संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद की बैठकों में 143 देशों ने फिलिस्तीन की मान्यता के प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया है। धारणा यह भी है कि इस बदलाव को जमीनी स्तर पर लाने का बहुत कम प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल शांति वार्ता भी रूकी हुई है। इजरायल की कट्टरपंथी सरकार भी फिलिस्तीनी राज्य के दर्जे के खिलाफ अपनी कमर कसे हुए है। इस बीच इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामर वेज-गिर ने अल-अक्सा मस्जिद परिसर का दौरा किया जिसे यहूदी अपना टेंपल कहते हैं। यह स्थल यहूदियों और मुस्लिमों के बीच सदैव विवाद की जड़ रहा है।</p>
<p>इन तीन देशों की ओर से लिए फैसलों से उम्मीद जगने लगी है कि आने वाले समय में यह जमीनी स्तर पर उतरकर हकीकत के रूप में दिखाई देगा। सिर्फ यही नहीं, इस फैसले से यह भी तो संभव है कि इजरायल, रफाह पर सैन्य कार्यवाही के फैसले पर अब पुनर्विचार करे। ताकि युद्धग्रस्त क्षेत्र में नागरिकों को होने वाली संभावित भारी क्षति को रोका जा सके। प्रभावित क्षेत्र में अधिक मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए इजरायल अनुमति देने को प्रेरित हो जाए। ऐसी स्थितियां बनती हैं, तो उनका स्वागत इसलिए होना चाहिए कि इससे युद्ध से उपजी अशांति और अनिश्चितता का दौर थमेगा। पश्चिमी एशिया में शांति की उम्मीद जगेगी। आवश्यकता इस बात की अधिक है कि पिछले आठ माह से जारी इजरायल -हमास के युद्ध को रोका जाए। पश्चिम एशिया में जारी इस युद्ध में अब तक 36 हजार के करीब लोग मारे जा चुके हैं। 80 हजार के करीब घायल हुए हैं। लाखों लोग विस्थापित हुए। भारी चिकित्सा सुविधाओं अभाव के बीच में लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। </p>
<p>ऐसे में युद्ध रोकने के हर प्रयास का स्वागत करना चाहिए। जहां तक इजरायल की आक्रामकता का सवाल है तो उसमें नरमी लाने के लिए अमेरिका और प्रमुख यूरोपीय देशों को ही अधिक प्रयास करने होंगे। जहां तक फिलिस्तीन को लेकर भारत का सवाल है तो वह निरंतर इसकी मान्यता का पक्षधर रहा है। वर्ष 1988 से लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले 143 देशों में वह भी तो शामिल है। भारत का सदैव यहूदियों और फिलिस्तीनियों के साथ समान व्यवहार रहा है।</p>
<p><strong>-महेश चन्द्र शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 May 2024 11:09:52 +0530</pubDate>
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