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                <title>Indian Foreign Policy - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Indian Foreign Policy RSS Feed</description>
                
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                <title>कांग्रेस का केंद्र पर हमला, जयराम रमेश बोले- चीन के सामने ‘नियोजित समर्पण’, सरकार की चीन नीति पर उठाए गंभीर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस ने ब्रिक्स बैठक के दौरान केंद्र सरकार पर चीन के सामने 'नियोजित समर्पण' का आरोप लगाया है। पार्टी नेता जयराम रमेश ने कहा कि सीमा विवाद, रिकॉर्ड व्यापार घाटे और गलवान पर रुख को लेकर सरकार की चुप्पी देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/congresss-attack-on-the-center-jairam-ramesh-said-planned/article-165528"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/jairam-ramesh.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ब्रिक्स बैठक के दौरान केंद्र सरकार चीन के सामने समर्पण करती नजर आई है जिसे देखते हुए सरकार की चीन नीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने रविवार को यहां एक बयान में कहा कि केंद्र सरकार को अब उन सवालों पर पर चुप्पी तोड़ने होगी जिनका जवाब देश आज भी मांग रहा है। उनका कहना था कि भारत-चीन संबंधों के सामान्य करने के नाम पर सरकार की ओर से 'कैलिब्रेटेड कैपिटुलेशन' यानी नियोजित समर्पण दिख रहा है।</p>
<p>रमेश ने पूछा कि क्या 19 जून 2020 को चीन को दी गई उस 'क्लीन चिट' ने भारत को कमजोर नहीं किया जिसमें 15-16 जून 2020 की रात गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। इसके सिर्फ चार दिन बाद 19 जून को सर्वदलीय बैठक में कहा गया था कि "ना कोई हमारी सीमा में घुस आया है, ना ही कोई घुसा हुआ है।" यह बयान कभी वापस नहीं लिया गया। उन्होंने सवाल किया कि क्या इससे भारत की बातचीत की स्थिति कमजोर नहीं हुई।</p>
<p>उन्होंने आरोप लगाया कि लद्दाख और अब अरुणाचल प्रदेश में चीन की क्षेत्रीय बढ़त को अनुमति दी गई है। पूर्वी लद्दाख में पारंपरिक गश्त और चराई के अधिकार चुपचाप छोड़ दिए गए। अरुणाचल में चीनी घुसपैठ, गश्त बिंदुओं तक पहुंच खोना और नए स्टैंड ऑफ की खबरें आ रही हैं। चीन 'साउथ तिब्बत' का दावा दोहरा रहा है, शहरों के नाम बदल रहा है और ब्रह्मपुत्र पर 60,000 मेगावाट के मेडोग मेगा-डैम को आगे बढ़ा रहा है, जिससे पूरे पूर्वोत्तर की जल सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।</p>
<p>जयराम रमेश ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की मदद में चीन की भूमिका पर भारत का रुख क्यों नरम पड़ा। पिछले वर्ष 4 जुलाई को लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने चीन की गहरी और निर्णायक भूमिका का जिक्र किया था, लेकिन गत 25 अगस्त को पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने वीआईएफ में बिल्कुल अलग रुख अपनाया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या यह कल की बैठक से पहले माहौल बदलने की रणनीति थी।</p>
<p>उन्होंने व्यापार घाटे पर भी सवाल किया और कहा कि 2025-26 में भारत-चीन व्यापार घाटा 112.6 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। एमएसएमई समेत उद्योगों को भारी नुकसान हो रहा है और :मेक इन इंडिया' तथा 'इम्पोर्ट फ्रॉम चाइना' एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए हैं। उन्होंने सवाल किया कि इस स्थिति को बदलने का रोडमैप कहां है। कांग्रेस नेता ने कहा "संबंध सामान्य बनाना एक बात है, लेकिन सरकार की ओर से जो रवैया दिखा है, वह नियंत्रित समर्पण है।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 18:45:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>जी-7 सम्मेलन:भारतीय विदेश नीति की छाप</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की दृष्टि से इस शिखर सम्मेलन में महंगाई पर अंकुश लगाने, स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने, कॉर्बन उत्सर्जन को कम करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण, उभरती प्रौद्योगिकी, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, दो-दो युद्धों के प्रभावों पर पश्चिमी देशों की अवधारणा को जानने का मौका मिला है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/g-7-conference-imprint-of-indian-foreign-policy/article-82115"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/uu11rer-(14)6.png" alt=""></a><br /><p>इटली के अपुलिया में आयोजित जी-7 देशों का  शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। अगला सम्मेलन कनाडा में अगले साल आयोजित होगा। इस सम्मेलन का आयोजन ऐसे समय पर हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में भारत की वैश्विक पहल की शुरुआत करने जा रहे हैं। सम्मेलन के आउटरीच सेशन को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत को वर्ष 2047 तक विकसित बनाने के संकल्प को दोहराया। एआई फॉर ऑल मिशन की जानकारी दी। सुझाव दिया कि तकनीक का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों में होना चाहिए ना कि विनाश कार्यों में। </p>
<p>यहां सवाल उठता है कि भारत जब इस संगठन का सदस्य नहीं है, तो उसे इतनी अहमियत क्यों मिल रही है? बता दें कि वर्तमान में आर्थिक मोर्चे पर दुनिया में काफी उथल-पुथल मची हुई है। विकसित पश्चिमी देश तक आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसी विषम और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आज भारत एक बढ़ती आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। 3.94 ट्रिलियन डॉलर की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। जो कि इस संगठन के चार देशों- ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और इटली से अधिक है। अगले कुछ सालों में वह विश्व में तीसरी अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तक मान रहा है कि भारत तेजी  से उभरती अर्थव्यस्था है। इस सम्मेलन में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और हिंद प्रशांत क्षेत्र के बारह विकासशील देशों को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन इसमें भारत को खास तरजीह दी गई। उभरती आर्थिक शक्ति के साथ-साथ आज भारत विश्व में ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर भी उभर रहा है। जी-20 सम्मेलन में भारत ने अफ्रीकी समूह को सदस्यता दिलाने में अहम भूमिका का निर्वहन किया था। </p>
<p>सम्मेलन का आयोजन ऐसे दौर में हुआ जब दुनिया में एक ओर रूस-यूके्रन के बीच युद्ध चल रहा है। तो दूसरी ओर इस्राइल और हमास में लंबा संघर्ष जारी है। रूस की चीन से नजदीकियां बढ़ रही हैं। तो चीन अपने पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामक नीति अपनाए हुए है। चीन को संतुलित करने के लिए पश्चिमी देशों को आज भारत की जरूरत है। कई महत्वपूर्ण पश्चिमी देशों में नए राजनीतिक परिवर्तन के दौर भी आ रहे हैं। यूरोपीय संसद में दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों का उभार सामने आ रहा है। ब्रिटेन में 4 जुलाई को चुनाव होने जा रहे हैं। जहां लेबर पार्टी, सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रही है। उसके विजय की संभावनाएं भी बन रही हैं। जर्मनी में भी दक्षिणपंथी उभार पर हैं। </p>
<p>अमेरिका में इस साल के अंत में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट राष्ट्रपति जो बाइडन को रिपब्लिकन के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कड़ी टक्कर मिल रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मेक्रों ने संसद भंग कर दी है। वहां भी नए चुनाव होने जा रहे हैं। यहां भी दक्षिणपंथी दल आने वाले समय में उनके के लिए भी कोई नया संकट खड़ा कर सकते हैं। संभावित अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और भू-रणनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। ताइवान और चीन में तनाव बना हुआ है। तो दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलिपिंस आमने-सामने हैं। हिंद-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन अपनी कारगुजारियों से तनाव का माहौल पैदा कर रहा है। कई देशों को अपने ऋण जाल में फंसाकर भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है। शिखर सम्मेलन में छह सत्र आयोजित हुए। इनमें अफ्रीका, जलवायु परिवर्तन और विकास, मध्यपूर्व में जारी स्थिति, यूक्रेन के विरुद्ध रूस का आक्रमण युद्ध, प्रवास, हिंद- प्रशांत और आर्थिक सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमता, ऊर्जा, अफ्रीका-भूमध्य सागरीय क्षेत्रों से जुड़े विविध प्रसंगों पर गहनता से विचार किया गया।</p>
<p>भारत की दृष्टि से इस शिखर सम्मेलन में महंगाई पर अंकुश लगाने, स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने, कॉर्बन उत्सर्जन को कम करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण, उभरती प्रौद्योगिकी, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, दो-दो युद्धों के प्रभावों पर पश्चिमी देशों की अवधारणा को जानने का मौका मिला है। सबसे अहम प्रसंग भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर के प्रति संगठन सदस्यों ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है। इससे चीन के बीआरआई परियोजना को संतुलित करने में मदद मिलेगी। इसी तरह भारत को भी पश्चिमी देशों से निवेश और रोजगार सृजन के लिए पूंजी की आवश्यकता है। आर्थिक-वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्रों के साथ गहरी तकनीक साझेदारी और नवाचार केंद्र की जरूरत है।</p>
<p>बड़े पश्चिमी बाजारों के साथ मजबूत व्यापार व्यवस्था के जरिए निर्यात बढ़ाने, भारतीय छात्रों के विदेश में अध्ययन और रोजगार के अवसरों की जरूरत, प्रवासी सुरक्षा के उपाय, आसान आव्रजन मानदंडों की आवश्यकता हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत-चीन के तनाव के चलते संतुलन साधने के लिए अमेरिकी सहयोग की भी जरूरत है। इसका यह कदापि अर्थ नहीं है कि भारत पश्चिम खेमे में है। </p>
<p><strong>- महेश चंद्र शर्मा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Jun 2024 11:04:35 +0530</pubDate>
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