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                <title>talk show - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title> शिक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर में बढ़े बजट, रिसर्च एन्ड डवलपमेंट का बजट काफी कम, इसे बढ़ाना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[प्राथमिक स्तर पर मेडिकल फैसिलिटी बढ़ाने पर हो जोर, ताकि जीवन बच सके, एजुकेशन पर जीडीपी का 4.4 फीसदी, इसे 6 प्रतिशत करने की जरूरत। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/increased-budget-is-needed-for-education--health--and-infrastructure--the-budget-for-research-and-development-is-quite-low-and-needs-to-be-increased/article-141391"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/(1200-x-600-px)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। केन्द्र सरकार की ओर से एक दिन बाद बजट पेश किया जाना है। इस बजट में जहां सरकार की नीतियों व विजन को प्रदर्शित किया जाता है। वहीं देश के हर वर्ग को सरकार से उम्मीद रहती है कि उनके लिए कुछ नया व सुधारात्मक होगा। केन्द्र सरकार के बजट से कोटा व हाड़ौती संभाग के लोगों को क्या उम्मीदें हैं। इस संबंध में दैनिक नवज्योति कार्यालय में शुक्रवार को  बजट से आशा और अपेक्षा  विषय पर टॉक शो का आयोजन किया गया। जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्म हुआ। उसमें सबसे महत्वपूर्ण तत्थ सामने आया ुकि शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ ही मूलभूत सुविधाओं के लिए सरकार को बजट बढ़ाने की आवश्यकता है।  नए स्टार्टअप में निवेश करने वालों को प्रोत्साहन देने और स्वदेशी उत्पादों व रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जाएगा तो देश के युवाओं का विदेशों में होने वाले पयालन को रोका जा सकेगा और यहां की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। </p>
<p><strong>रूरल हैल्थ सेक्टर में बजट बढ़ाने की आवश्कता</strong><br />देश के हैल्थ सेक्टर में जीडीपी का डेढ़ से दो फीसदी ही बजट दिया जाता है। जबकि विदेशों में यह 6 से 8 फीसदी तक है। ऐसे में इस क्षेत्र में कम से कम ढाई से तीन फीसदी बजट तो होना ही चाहिए। शहरी व ग्रामीण हैल्थ सेक्टर  के अंतर को समाप्त करना होगा। ग्रामीण में लोग अधिक व शहरों में डॉक्टर अधिक हैं। जैनेरिक व ब्रांडेड दवाओं में भेद समाप्त होना चाहिए। दवाओं की कीमत पर अंकुश लगना चाहिए। संभाग स्तर पर हैल्थ केयर सेंटर व काउंसर नियुक्त करने की जरूरत है। संविदा कर्मेी व न्यूनतम मजदूरी वालों को पे कमीशन में शामिल किया जाना चाहिए। स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए सीएसआर के तहत ही बजट का प्रावधान किया जाए। इसी तरह खेलों को बढ़ावा देने के लिए जनप्रतिनिधि अपने फंड से राशि दें।  <br /><strong>-डॉ. विजय सरदाना पूर्व प्राचार्य मेडिकल कॉलेज कोटा</strong><br /><strong> </strong><br /><strong>गुजरात मॉडल को अपनाते हुए जीएसटी स्लैब हो एक समान </strong><br />देश में जीएसटी के  स्लैब एक समाान होने चाहिए। हालांकि पहले की तुलना में इसमें सुधार हुआ है। लेकिन एक ही सेक्टर से जुड़े व्यवसायों में अभी भी कहीं 5 तो कहीं 18 फीसदी जीएसटी वसूल किया जा रहा है। कोटा  की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए यहां पर्यटन को बढ़ावा देने, पर्यटन स्थलों का प्रचार करने की जरूरत है। हाड़ौती के खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने की जरूरत है। ट्रम्प टैरिफ के बाद सरकार ने जिस तरह से स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दिया है उसे पहले ही कर देना चाहिए था। उद्योगों को प्रोत्साहन के लिए गुजरात मॉडल को अपनाते हुए एकल विंडों पर ही सुविधाएं उपलध्ब करवाए जाने की जरूरत है। <br /><strong>-अशोक माहेश्वरी, संभाग अध्यक्ष होटल फैडरेशन आॅफ राजस्थान</strong></p>
<p><strong>बजट बढ़े तो मजबूत हो शिक्षा का संस्थागत ढांचा</strong><br />सरकारी स्कूलों की स्थिति में पहले से सुधार तो हुआ है लेकिन अभी भी शिक्षा के संस्थागत ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है। यह तभी संभव है जब सरकार द्वारा स्कूल भवनों व शिक्षा में सुधार के लिए बजट को बढ़ाया जाए। झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद जर्जर भवनों का सर्वे हुआ और एसडीआरएफ के तहत बजट भी मिला। इसके बाद काफी सुधार आया है।  लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।  स्कूल भवनों के लिए सरकार के साथ ही भामाशाहों को भी आगे आने की जरूरत है। साथ ही सरकारी स्कूलों को भी हाईटेक बनाने की जरूरत है। शिक्षा से ही उन्नति संभव होती है। <br /><strong>-स्नेहलता शर्मा चीफ ब्लॉक एजुकेशन आॅफिसर कोटा</strong></p>
<p><strong>8 वें पे कमीशन में पेंशन अधिनियम हो निरस्त</strong><br />सरकार द्वारा 8 वें पे कमीशन में जो पेंशन अधिनियम लागू किया जा रहा है। जिसकी  बजट में घोषणा होने वाली है। सरकार को उसे निरस्त करना चाहिए। इससे 2025 से पहले सेवानिवृत्त हुए करीब 69 लाख पेंशनर्स प्रभावित होंगे। इस अधिनियम में पेंशन व पारिवारिक पेंशन को बनद करने या उसमें कमी व परिवर्तन का प्रावधान है।  सरकारी कर्मचारियों के  सेवानिवृत्त होने के बाद कर्मचारियों व उनके परिवार के लिए पेंशन काफी सहारा होता है। इसे बंद करना गलत है। वहीं कौशल विकास के क्षेत्र में काम करने वालों को जो सरकार की तरफद्द से बजट दिया जाता है वह निजी क्षेत्र की तुलना में दसवा हिस्सा ही है। इसे बढ़ाकर समान किए जाने की जरूरत है। <br /><strong>-आर.पी. गुप्ता पेंशनर,चैयरमेन जन शिक्षण संस्थान</strong></p>
<p><strong>रिसर्च आधारित शिक्षा पर हो फोकस</strong><br />रिर्सच शिक्षा और नई तकनीक पर आधारित शिक्षा पर फोकस करते हुए उसके लिए बजट में प्रावधान करने की जरूरत है। जिससे विदेश जाने वाले युवाओं को यहीं रोका जा सके।  साथ ही शिक्षा के लिए  बजट बढ़ाया जाए जिससे प्राइमरी सहित अन्य एज्यूकेशन सेक्टर मजबूत होंगे। वैसे भारत अभी हर स्थिति में मजबूत है। अब अन्य देश भी भारत की तरफ  देख रहे है। ऐसी स्थिति में सरकार को आने वाले बजट में ट्रंप टैरिफ का मुकाबला करने के लिए जीएसटी में राहत देने की उम्मीद है। अभी यूरोप के साथ जो डील हुई है। उससे काफी फर्क पड़ा है। अभी जीडीपी का बजट में शिक्षा पर 4.6 प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है इसे बढ़ाकर 6 फीसदी किए जाने की आवश्यकता है। <br /><strong>-मीरा गुप्ता,सह आचार्य अर्थशास्त्रराजकीय कला कन्या महाविद्यालय कोटा </strong></p>
<p><strong>टैक्स में छूट मिले तो पूरी हो आम आदमी की जरूरतें</strong><br />वर्तमान में हर चीज को लग्जरी बना दिया गया है। जिससे बहुत सारी चीजें आम आदमी की पहुंच से दूर हो गई है। ऐसे में बजट में आम आदमी को ध्यान में रखते हुए प्रावधान किए जाने चाहिए। इनकम टैक्स में छूट का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। जिससे आम आदमी की जरूरतों को पूरा किया जा सके। शिक्षा क्षेत्र में बजट बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके साथ शहर में प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा है। प्रदूषण की वजह से मेडिकल खर्च बढ़ रहा है। आम आदमी को मेडिकल क्षेत्र में रिलीफ मिले बजट में ऐसे प्रावधान करना चाहिए। इसे कम करने और आम आदमी की मूलभूत जरूरतों को पृूरा करने  पर बजट में प्रावधान किया जाना चाहिए। <br /><strong>-आरती जनार्दन सोशल वर्कर व  गृहिणी</strong></p>
<p><strong>अदालतों का मजबूत हो इंफ्रास्ट्रक्चर</strong><br />बजट में सरकार को न्याय क्षेत्र के लिए भी विशेष बजट देना चाहिए। कुछ देशों में न्यायप्रणाली की व्यवस्था बहुत ही अच्छी हैं। इस तरह से सरकार को भी देश में त्वरित न्याय की व्यवस्था करनी चाहिए। जिससे पीड़ित को जल्दी राहत मिल सके।  साथ ही संभागीय मुख्यालय होने के बाद भी कोटा मेंं अदालतों का इंफ्रा स्ट्रक् चर मजबृूत नहीं है। मिनी सचिवालय में एक ही जगह पर सभी अदालतें हों। हाईकोर्ट की बैंच स्थापित की जाए। साथ ही जितनी भी करदाता हैं उन्हें विदेशों की तर्ज पर  सुविधाओं के रूप में रिटर्न देने की जरूरत है। युवाओं को विदेश जाने से रोकने के लिए यहां सुविधाएं उपलब्ध करवाने की जरूरत है। <br /><strong>-सोनल विजय, एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>खिलाडियों के लिए हो बजट, सुविधाएं भी मिले</strong><br />राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर चयनति व मैडल प्राप्त खिलाडियोंं के लिए अलग से बजट होना चाहिए। हालत यह है कि खिलाडियों को मिलने वाली पुरुस्कार राशि तो कई सालों से नहीं मिल रही। वहीं सुविधाओं के नाम पर भी नाम मात्र का बजट है। यहां तक कि  खिलाडियों  को स्वयं के खर्च पर ही प्रतिभा दिखानाी पड़ रही है। जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को खेलों में आगे बढने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। खिलाडियों के  चोटिल होने पर सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं दी जाती है। खिलाडियों ं को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए बजट में सरकार को प्रावधान करने होंगे। <br /><strong>-प्रियांशी गौतम, इटरनेशनल वुशु खिलाड़ी</strong></p>
<p><strong>इनकम टैक्स की सरल हो प्रक्रिया</strong><br />बजट में नया इनकम टैक्स नियम लागू हो और प्रक्रिया को सरल किया जाए। जिससे  टैक्स चोरी को कम किया जाए और अधिक से अधिक लोग टैक्स जमा करवा सकें। रिसर्च व विकास के लिए बजट दिया जाए। साथ ही युवाओं के लिए रिसर्च के साथ आय का जरिया भी मुहैया कराया जाए। जिससे युवा टेलेंट को विदेश जाने से रोका जा सके। युवा शिक्षा लेकर देश में ही काम करना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें अपेक्षा अनुरूप सुविधाएं नहीं मिल पाती। कृषि प्रधान देश होने से कृषि क्षेत्र में टैक्स में छूट का प्रावधान बढ़ाया जाए। <br /><strong>-रितु बोहरा, चार्टर्ड एकाउंटेंट</strong></p>
<p><strong>स्टार्टअप में निवेशकों को मिले प्रोत्साहन</strong><br />एमएसएमई में लोन की गति तेज हुई है। लंबित भुगतान में हालांकि तेजी आई है। फिर भी हम  उद्यम  स्थापना के लिए लोगों को सलाह देते हैं कि पूरी तरह से लोन पर निर्भर नहीं रहें। सरकार की अपनी चाल होती है। सरकार काफी प्रयास कर रही है।   कोटा में भी अब पहले की तुलना में स्टार्टअप की संख्या बढ़ी है। आईआईटी के युवा आकर यहां स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं। जिससे रोजगार के अवसर भी सृजित हो रहे हैं। लेकिन किसी भी नए उद्यम को स्थापित होने में ढाई से तीन साल का समय लगता है। ऐसे में स्टार्टअप में निवेश करने वालों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। साथ ही नए -नए स्टार्टअप व उद्यमों को भी और सुविधाएं देने की जरूरत है। <br /><strong>-कौस्तुभ भट्टाचार्य, स्टार्टअप सलाहकार</strong></p>
<p><strong>अकादमिक इनक्यूबेटर्स और रिसर्च गतिविधियां हो सशक्त</strong><br />16 जनवरी 2016 को स्टार्टअप नीति की स्थापना के एक दशक में हुई प्रगति को देखते हुए इस योजना को अधिक संस्थागत और नियमित किये जाने की आवश्यकता है ।  राज्य में  वर्तमान में करीब 8 हजार स्टार्टअप है जिनमे से हाड़ोती में करीब 500 की संख्या को देखते हुए और ट्रिपलआई की कोटा में भूमिका को देखते हुए क्षेत्रीय आधार पर हाड़ोती को विशेष बजट का भी प्रावधान संभाग को अधिक प्रगति प्रदान करेगा।  स्टार्टअप की संख्या व उनके प्रदर्शन स्तर को देखते हुए यह राज्यहित और छात्रों के हित में होगा कि कौशल विकास से जुड़े मेंटर्स के लिए नियमितीकरण की दिशा में प्रयास किए जाएं। साथ ही अकादमिक इनक्यूबेटर्स और रिसर्च गतिविधियों को भी सशक्त किया जाए। <br /><strong> -आयुष त्यागी, स्टार्टअप सलाहकार</strong></p>
<p><strong>शिक्षा में कम या समाप्त हो जीएसटी</strong><br />सरकार की ओर से शिक्षा व कोचिंग फीस पर भी जीएसटी लागू है।  यहां तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की फीस पर भी 30 फीसदी जीएसटी है। इसे कम या समाप्त किए जाने की जरूरत है।  डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने व कोचिंग सेक्टर को फिर से बूस्टअप करने की जरूरत है। मैंटल हैल्थ क्षेत्र में बजट देने, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को मजबूत करने व एयरपोर्ट की मांग को भी पूरी करने की आवश्यकता है। कोटा का शिक्षा के क्षेत्र में नाम है। यही कोटा को मजबूती देगा। इस क्षेत्र को फिर से मजबूती के लिए बजट में प्रावधान होने चाहिए। <br /><strong>-के.आर. चौधरी असिसट्ेंट प्रोफेसर अर्थशास्त्र कोटा यूनिवर्सिटी </strong></p>
<p><strong>कृषि उपकरणों को सस्ता करना चाहिए</strong><br />बजट ऐसा होना चाहिए जो कि नागरिकों की बेसिक जरूरत को पूरा करे। वहीं शिक्षा लोन कम ब्याज दर पर और आसानी से उपलब्ध हो  जिससे अधिक से अधिक बच्चे इसका लाभ लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर सके।  अल्प संख्यक छात्रवृत्ति सरकार ने बंद कर दी है। जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे उच्च शिक्षा नहीं ले पा रहे हैं।  वहीं सरकार को कृषि उपकरणों को सस्ता करना चाहिए। जिससे किसानों को राहत मिल सकेगी और किसानों के उत्पादनों की लागत कम आएंगी।  कृषि में रियायतें मिलेंगी तो खाद्य पदार्थ सस्ते होने से घरेलू बजट भी कम होने से लोगों को राहत मिलेगी। <br /><strong>- एडवोकेट सानिया खानम लीगल एड डिफेंस काउंसलर</strong></p>
<p><strong> बजट  में हो रोजगार सृजन पर  जोर</strong><br />रोजगार सृजन पर बजट में विशेष प्रावधान होने चाहिए। युवा बेरोजगार होकर बैठे हैं। सरकारी कार्यालयों व अस्पतालों में बड़ी संक्या में संविदा कर्मी बहुत कम मानदेय पर काम कर रहे हैं। तकनीकी रूप से सक्षम होने के बाद भी उनका मानदेय काफी कम है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि  बजट मेंकार्मिकों का मानदेय बढ़ाने का प्रावधान किया जाए। साथ ही मेडिकल की पढ़ाई करने वाले बच्चों को छात्रवृत्रि दी जाए। <br /><strong>-अजय गोचर स्टूडेंट कामर्स कॉलेज कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 13:03:18 +0530</pubDate>
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                <title>बदलती जीवनशैली और तनाव से युवा व बच्चों के दिल दे रहे धोखा</title>
                                    <description><![CDATA[प्रत्येक स्कूल में कार्डियक किट हो, सीपीआर प्रशिक्षण भी देना चाहिए ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/due-to-changing-lifestyle-and-stress--hearts-of-youth-and-children-are-betraying/article-121457"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news55.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। भारत में हार्ट के मरीजों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है। युवाओं से लेकर बच्चों तक दिल की बीमारी से परेशान हैं। बदलते जीवनशैली के चलते, युवा और बच्चों में दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है। मांसपेशियों के सिकुड़ने के कारण ब्लड सर्कुलेट नहीं हो पाता है जिसके कारण असमय मृत्यु हो जाती है।  दैनिक दिनचर्या के बदलाव के कारण हार्ट अटैक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। यह विचार दैनिक नवज्योति कार्यालय में आयोजित मासिक परिचर्चा में  सामने आए। केस ऑफ साइलेंट अटैक आर इन्क्रीजिंग एमंग चिल्ड्रन एन्ड यूथ, व्हाट इज द रीजन विषय पर दैनिक नवज्योति कार्यालय में आयोजित टॉक शो में शहर के जाने-माने विशेषज्ञ कार्डियोलोजिस्ट, फिजीशियन, डायटीशियन, साइकेटिंस्ट, आयुर्वेद , योग टीचर, जिम ट्रेनर, पैरेंट्स व स्ट्रेस मैनेजमेंट से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया।  विशेषज्ञों ने कोरोनाकाल के बाद जीवनशैली में आए बदलाव के कारण लोगों में तनाव, अनियमित खान-पान तथा फिजिकल एक्टिविटी कम होने को मुख्य कारण माना है। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के मुख्य अंश:-</p>
<p><strong>स्कूलों में बच्चों की स्क्रीनिंग हो</strong><br />वर्तमान में लाइफ स्टाइल में काफी बदलाव आया है, जिसके चलते युवाओं में तनाव बढ़ने से डायबिटीज, बीपी सहित कई बीमारियों ने घेर लिया है। हार्टअटैक का प्रमुख कारण हार्ट सही तरीके से पंम्पिग नहीं कर पाने से मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है, जिसके कारण शरीर में ब्लड सर्कुलर सही तरीके से नहीं हो पाता है। साइलेंट अटैक का प्रमुख कारण भी बिगड़ी दिनचर्या तथा खानपान है। अगर अटैक आने वाले व्यक्ति को सही समय पर सीपीआर देकर जीवन बचाया जा सकता है। सीपीआर की जानकारी सभी को जानकारी होनी चाहिए। स्कूली बच्चों में आ रहे अटैक भी स्ट्रैस ही है। शहर की कई स्कूलों में जांच के नाम पर खानापूर्ति की जाती है तथा पैरेंट्स भी इस ओर ध्यान नहीं दे पाते है।<br /><strong>-डॉ. संजय शायर, सीनियर मेडिकल ऑफिसर </strong></p>
<p><strong>शरीर के प्रति जागरूकता व पौष्टिक आहार जरूरी</strong><br />सुबह जल्दी उठने व रात को जल्दी सोने की आदत को बनाए रखने के साथ ही स्वास्थ्य के प्रति सभी  में जागरूकता होना आवश्यक है। दिनचर्या व खान-पान सही नहीं होने से तनाव  व रोग बढ़ते हैं। विशेष रूप से हार्ट संबंधी बीमारी का खतरा अधिक रहता है। ऐसे में शरीर के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं इस बारे में जानकारी होनी चाहिए।  पौष्टिक आहार लेना और नियमित योग व प्राणायम ऐसे माध्यम हैं जिनसे इस बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है। <br /><strong>-डॉ. नितिन सोलंकी क्लीनिकल न्यूट्रियनिस्ट </strong></p>
<p><strong>डायबिटीज व स्मोकिंग बन रहे बड़े कारण</strong><br />आज के दौर में डायबिटीज व स्मोकिंग हार्ट अरेस्ट के बड़े कारक सामने आ रहे हैं। कार्डिक अरेस्ट और हार्ट अटैक दोनों अलग अलग स्थितियां हैं।  जीवन की भागदौड़ के चलते हमारी दिनचर्या में काफी बदलाव आया है। नियमित समय में डाइट नहीं लेना, फास्टफूड पर ज्यादा निर्भर रहना भी हार्ट की समस्या को बढावा देता है। ज्यादातर हार्ट अटैक के मामलों में कॉलेस्ट्रोल बढ़ने से खून की आपूर्ति रुक जाती है जिससे असमय मृत्य हो जाती है। समय पर खान-पान लेना नियमित  योग व फिजिकल एक्टिविटी बनाए रखे। जीवन में तनाव (स्ट्रेस) कम रखें। स्कूलों में बच्चों की नियमित ब्लड, शुगर की जांच होनी चाहिए। वहीं प्रत्येक व्यक्ति को सीपीआर की जानकारी होनी चाहिए। हार्टअटैक के दौरान सीपीआर देने से व्यक्ति को नया जीवन मिल सकता है।<br /><strong>-डॉ. पवन सिंघल, कॉर्डियोलोजिस्ट कोटा हार्ट </strong></p>
<p><strong>स्कूलों में कार्डियो किट व डिस्प्रिन होना जरूरी</strong><br />वर्तमान में बच्चों में साइलेंट हार्ट अटैक बढ़ रहे है। इसका प्रमुख कारण बच्चों का हर छोटी बात का स्ट्रेस लेना है। बच्चों द्वारा माता-पिता को अपनी समस्या बताने पर उनको अनदेखा कर देता है। वहीं स्कूल या घर से बाहर भी अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करने पाने की वजह से भी डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। नियमित खान-पान या फिजिकल एक्टिविटी नहीं होने से भी दैनिक कार्य प्रभावित हो जाते हैं। स्कूलों में बच्चों की नियमित जांच होनी चाहिए। वहीं प्रत्येक स्कूल में कार्डियेक किट होना चाहिए। उसमें डिस्प्रीन टेबलेट भी होनी चाहिए, आपातकाल स्थिति में संभल सकते हैं। सीपीआर देने के लिए ट्रेनर होना चाहिए ताकि आपातकाल में हार्ट अटैक के दौरान गोल्डन ऑवर में सीपी देकर जान बचाई जा सके। सीपीआर देने संबंधी प्रशिक्षण प्रत्येक स्कूलों के कर्मचारी व बच्चों को मिलना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. सुरभी गोयल, फिजियोलॉजिस्ट व स्ट्रेस मैनेजमेन्ट विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>डाइट प्लानिंग से  लाएं दिनचर्या में बदलाव</strong><br />जीवन में सभी लोगों की बॉडी लेंग्वेज अलग-अलग होती है। नियमित आहार-विहार नहीं लेने से भी दिनचर्या बिगड़ जाती है। बाजार में मिल रहे फास्टफूड भी कॉलेस्ट्रोल को बढ़ाती है। कई लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पाते है तथा अपने कामकाज को लेकर तनावग्रस्त रहते हैं। देर रात खाना खाने या खाना खाने के बाद तुरंत सो जाना भी बीमारियों को दावत देना है। शुरूआत में अगर शरीर में थकान, चक्कर आने जैसी समस्या आने तुरंत डॉ. को दिखाना चाहिए। लोगों को अपनी डाइट प्लानिंग को नियमित दिनचर्या में शामिल करके तथा नियमित व्यायाम और योग से भी अपने आपको स्वस्थ रख सकते हैं।<br /><strong>-सलोनी सेठी, डायटीशियन,एन्ड न्यूट्रियनिस्ट</strong></p>
<p><strong>स्वस्थ जीवन के लिए योग जरूरी</strong><br />वर्तमान में लोगों की फिजिकल एक्टिविटी न होने से कई बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। अनियमित दिनचर्या के चलते डायबिटीज, दिल की बीमारी व बीपी, शुगर सहित कई बिमारियां जकड़ लेती है। स्वस्थ शरीर के लिए योग करना भी जरूरी है। रोजाना अनुलोम-व्योलोम में श्वांस अंदर लेने तथा बाहर छोड़ने से भी शरीर स्वस्थ रहता है। योग गुरु रामदेव बाबा के सिखाए योग को भी घर पर ही करके स्वस्थ रह सकते है। समयभाव के कारण हमने अपनी जिंदगी को मशीन की तरह बना लिया है। जिसके कारण हम अपने परिवार के प्रति भी ध्यान नहीं दे पाते है। स्वस्थ शरीर के लिए पर्याप्त नींद जरूरी है।<br /><strong>-रचना शर्मा, व्याख्याता शारीरिक शिक्षा</strong></p>
<p><strong>स्कूलों में ही सीपीआर प्रशिक्षण</strong><br />बच्चों में जिस तरह से छोटी उम्र में ही पढ़ाई के साथ ही माता पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने का तनाव बढ़ता जा रहा है। उस कारण से हार्ट अटैक कम उम्र में भी होने लगा है। इससे बचने के लिए बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार काम करने दिया जाए। यदि स्कूल में कभी इस घटना का कोई मामला हो तो उसे कंट्रोल करने के लिए  स्कूलों में सीपीआर प्रशिक्षण दिया जाए। साथ ही बच्चों के खान-पान पर शिक्षकों द्वारा ध्यान दिया जाए। कम उम्र में ही सावधानी रखी गई तो आने वाले खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। <br /><strong>- मोइनुद्दीन पैरेन्ट्स </strong></p>
<p><strong>प्रकृूति से जुड़ना जरूरी</strong><br />पहले लोग सुबह जल्दी उठकर बाग बगीचों में घूमने जाते थे। पेड़ पौधों के बीच रहने से प्राकृति से जुड़े रहते थे। शुद्ध हवा व ऑक्सीजन मिलने के साथ  ही खान-पान में शुद्धता थी। लेकिन वर्तमान में अधिकतर लोग प्रकृति से दूर होने के साथ ही खान-पान भी शुद्ध नहीं होने से साइलेंट अटैक का खतरा अधिक बढ़ा है। जिम में शरीर को स्वस्थ बनाने के तरीके बताए जाते हैं। उसके लिए उसी तरह की डाइट का सेवन किया जाता है। साथ ही शरीर को स्वस्थ रखने व बीमारियों से दूर रहने का एक ही उपाय है प्रकृति से जुड़ना या उसके नजदीक रहना। <br /><strong>- अशोक औदिच्य सचिव बॉडी बिल्डिंग संघ </strong></p>
<p><strong>फिजिकल एक्टिविटी बढ़ानी होगी</strong><br />शरीर को स्वस्थ रखने के लिए फिजिकल एक्टिविटी जितनी अधिक होगी उतना बेहतर रहता है। साथ ही लोगों को अपनी लाइफ स्टाइल को भी बदलना होगा। लाइफ स्टाइल सही नहीं होने से ही अटैक ही नहीं सभी तरह की बीमारियां जन्म लेती है।  शरीर के प्रति जागरूक लोग जिम में जाते है। लेकिन वहां जिस तरह की गतिविधि करवाई जाती है उसका नियमित अभ्यास व उसी अनुसार डाइट लेना आवश्यक है। जिम का मतलब शरीर के साथ ज्यादती करना नहीं है। स्वस्थ रहने के लिए  जागरूकता भी जरूरी है। <br /><strong>- पूजा यादव, जिम ट्रेनर</strong></p>
<p><strong>बदलते लाइफ स्टाइल का प्रभाव</strong><br />हार्ट अटैक का एक प्रमुख कारण लाइफ स्टाइल का प्रभाव भी है। इसके चलते युवा में स्मॉकिंग, शराब का सेवन तथा फिजिकल एक्टिविटी का भी अभाव है। जिम में आने वाले सभी को पहले दिनचर्या को सही करने, डाइट संबंधी नियमों का पालन करना तथा शारीरिक व्यायाम तथा जीवन में स्ट्रेस नहीं लेने की सलाह देता हूं।  जो युवा अपने आहार-विहार का पालन नहीं करते तथा फास्टफुड पर निर्भर रहते है, आने वाले दिनों में कॉलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ने से  हार्ट पर जोर पड़ता है वहीं इम्युनिटी पॉवर कम होने से भी अचानक थकान, चक्कर आना भी हार्ट अटैक् को इंगित करता है।<br /><strong>- नरेन्द्र यादव, जिम ट्रेनर</strong></p>
<p><strong>स्कूलों में हो योगा क्लास</strong><br />जिस तरह से वर्तमान में छोटी उम्र के बच्चों में  साइलेंट हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। उन्हें देखते हुए आवश्यक है कि बच्चों से  उनकी क्षमता के अनुसार शारीरिक गतिविधि करवाई जाए। स्कूलों में नियमित योगा क्लास लगाई जाए। जिससे बच्चा स्कूल में शिक्षकों की बात को जितना जल्दी अमल में लाता है उतना माता पिता की बात को भी नहीं लाता। बच्चों के खान-पान व उनकी दिनचर्या को भी सही रखकर इस बीमारी से बचाया जा सकता है।<br /><strong>-अंजली जैन सीए, अर्हं सोशल वेलफेयर फाउंडेशन </strong></p>
<p><strong>स्ट्रेस से बचने को मेडिटेशन जरूरी</strong><br />नियमित आहार-विहार तथा फिजिकल एक्टिविटी से अपने आपको स्वस्थ रखें। बदलती लाइफ स्टाइल में मेडिटेशन से भी अपने आपको फिट रख सकते हैं। वहीं व्यस्तता के कारण हम अपने स्वास्थ्य के प्रति अवेयर भी नहीं हो पाते है। अपने परिवार में भी सदस्यों से संवाद नहीं करने से अकेलेपन का शिकार हो जाते है।  स्वस्थ जीवन के लिए डाइट प्लानिंग भी जरूरी है। कोई भी शारीरिक बदलाव महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाए तथा उनके द्वारा दिए गए निर्देशों की पालना करें। स्ट्रेस से बचने के लिए मेडिटेशन का सहारा लें तथा कुछ समय अपने परिवार के साथ बिताएं। <br /><strong>- डॉ.मिथिलश खींची, एसोसिएट प्रोफेसर, मनोचिकित्सक मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>बीमारी की जड़ पर पहले हो वार</strong><br />हार्ट अटैक की बात कर रहे हैं लेकिन आयुर्वेद तो बीमारी ही नहीं हो इस पर काम करता है। हेल्दी और संसकारी संतति हो ऐसे प्रयास करने चाहिए। हमें हमारी पुरानी जड़ों पर लौटना होगा। आज परिवार में दूरिया बढ़ जाती है।  छोटे बच्चे भी मोबाइल देखते रहते है।  माता-पिता के काम पर जाने के बाद बच्चे अकेले रह जाते है जिससे नियमित खान-पान नहीं ले पाते है। फिजिकल एक्टिविटी भी नहीं हो पाती है। शहर के अधिकांश स्कूलों में बच्चों के ब्लड व नियमित डाइट की जांच नहीं हो पाती है। उनकी जीवनशैली में भी बदलाव आ जाता है। बच्चों को दादा-दादी का प्यार नहीं मिलने से संस्कारों में भी कमी आ जाती है। बच्चे व युवा अंदर ही अंदर तनावग्रस्त हो जाते है या नशे या बुरी आदतों के शिकार हो जाते है।<br /><strong>-अंजना शर्मा, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्साधिकारी </strong></p>
<p><strong> स्कूल का रोल महत्वपूर्ण</strong><br />स्वथ शरीर के लिए फीजिकल एक्टिवीटी बहुत जरूरी है। चालीस वर्ष की उम्र के बाद नियमित जांच को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। वहीं बच्चों के जीवन में स्कूल का रोल काफी महत्वपूर्ण है। स्कूलों को भी अपने दैनिक कार्यक्रम में बच्चों के खानपान व बीपी, शुगर या फिर महिने में एक बार रूटिन चैकअप जरूर होना चाहिए। स्कूलों में पढ़ाने वाले क्लास टीचर के पास बच्चे की जानकारी होती है। अगर बच्चों की जीवनशैली में बदलाव आ रहा है तो माता-पिता को बता सकते है। या फिर प्यार से कारण जानकर बच्चों का स्ट्रेस दूर किया जा सकता है। माता-पिता में कामकाजी थकान के चलते बच्चों की तरफ ध्यान नहीं दे पाते है।<br /><strong>-महेन्द्र चौधरी, प्रिसींपल महात्मा गांधी रा.वि. श्रीनाथपुरम </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Jul 2025 14:54:26 +0530</pubDate>
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                <title>एआई लिट्रेसी को स्कूली कोर्स में शामिल करना जरूरी, लेकिन मानवीय मूल्य बने रहें </title>
                                    <description><![CDATA[रचनात्मकता बनी रहे, एआई का एथीकल यूज हो, नेशनल एआई लिट्रेसी स्ट्रेटेजी तैयार होनी चाहिए।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/it-is-necessary-to-include-ai-literacy-in-school-curriculum--but-human-values-should-remain/article-118062"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/news46.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति की ओर से प्रतिमाह आयोजित परिचर्चा की श्रंखला के तहत शुक्रवार को जब चीन छोटी क्लास से ही बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलीजेस(एआई) की शिक्षा दे रहा है वहां कोटा जिले में डिजीटल लिट्रेसी की क्या स्थिति है इस मुद्दे पर वक्ताओं ने विचार विमर्श किया। परिचर्चा का विषय था ( वाट इज द पॉ्जिशन आॅफ डिजिटल लिट्रेसी इन कोटा व्हेन चाइना हेज मूव टू एआई लिट्रेसी) परिचर्चा में  शिक्षा विभाग की संयुक्त निदेशक, कोटा यूनिवर्सिटी की डीन, रोबोटिक इंजीनियर, इनोवेटर,  एआई टीचर, शिक्षाविद, प्राइवेट व सरकारी स्कूल के संचालक ,  प्रिंसिपल, कम्प्यूटर एक्सपर्ट,   पैरेन्ट्स और बच्चोंं ने भाग लिया। परिचर्चा में सभी वक्ताओं ने स्कूलों में छोटी क्लासेज से ही एआई को सब्जेक्ट के रूप में पढ़ाने पर जोर दिया लेकिन इसके साथ उनहोंने ऐसा केरिकुलम तैयार करने की भी जरूरत बताई जो मानवीय मूल्यों को बनाए रखे। वक्ताओं ने कहा कि सीबीएसई ने बड़ी क्लास में इसे एैच्छिक रूप से शुरू कर दिया है।  इसे कम्पलसरी करना चाहिए। साथ ही पैरेन्ट्स को भी एजुकेट करने की आवश्यकता बताई। वक्ताओं का कहना था कि एआई की सबसे बड़ी थ्रेट यह है कि यह लोगों को कुन्द कर सकती है। उनकी मौलिकता और रचनात्मकता  को खत्म कर सकती है। ऐसी स्थिति में हमें स्पेशल कोर्स डिजाइन कर इसे लागू करना चाहिए। सरकारी स्कूलों में लैब हब्स और टिंकरिंग लैब्स की पर्याप्त सुविधा भी विद्यार्थियों को मिलनी चाहिए। </p>
<p><strong>शिक्षा में डिजिटल साक्षरता की उपयोगिता बढ़ रही</strong><br />वर्तमान शिक्षा नीति में डिजिटल साक्षरता पर पूरा फोकस किया जा रहा है। स्मार्ट क्लॉस में बच्चों को डिजिटल शिक्षा के साथ एआई के उपयोग के बारे में भी पढाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में टेलेंट की कमी नहीं है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा में लगातार नवाचार किए जा रहे है। बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा के साथ डिजिटल साक्षरता भी दी जा रही है। एआई का प्रयोग करना भी बताया जा रहा है। सरकारी स्कूल निजी स्कूलों के मुकाबले अब बेहतर प्रदर्शन कर रहे है। निजी स्कूलों में बच्चों रटाया जाता है। लेकिन सरकारी स्कूलों बच्चों स्मार्ट बनाया जाता है। उन्हें मौलिकता के साथ डिजिटल एजुकेशन के प्रयोग भी बताए जा रहे है। अभी समिति संसाधान है लेकिन सरकार की ओर से डिजिटिल शिक्षा को लेकर काफी बदलाव किए है। 80 प्रतिशत स्कूलों में डिजिटल साक्षरता का उपयोग हो रहा है। इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं मिलने वाले क्षेत्रों में कुछ परेशानी है बाकी स्कूलों में आधुनिक कम्प्यूटर लेब स्मार्ट क्लॉस में बच्चों सारी समस्याओं का समाधान हो रहा है।  हालांकि कुछ विषय के अध्यापकों की कमी है लेकिन सरकार उनके रिक्त पदों को भी भर रही है। सरकारी स्कूल के बूनियादी ढांचे में पहले की अपेक्षा काफी बदलाव आया है। <br /><strong>-तेजकंवर संयुक्त निदेशक शिक्षा विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>डिजिटल साक्षरता से युवा सोच का दायरा बढ रहा</strong><br />जहां एक ओर डिजिटल साक्षरता युवाओं की सोच के दायरे को बढ़ा रही है और हर काम आसान कर रहा है। वहीं दूसरी ओर बच्चे इस पर आश्रित भी हो रहे है। वो छोटी छोटी चीजों के लिए भी एआई का सहारा ले रहे जिससे उनके अंदर नवाचार करने की प्रवृति खत्म हो रही है। डिजिटल साक्षरता जरूरी है लेकिन इस पर निर्भर नहीं होना है। इसका उपयोग अपनी सोच के दायरे को व्यापक करने तक ही सीमित रखना चाहिए। एआई के प्रयोग के साथ हमें अपने नैतिक मूल्यों के संरक्षण की भी आवश्यकता है। हर स्कूल में एआई ट्रेंड टीचर होना चाहिए जो एआई के प्रयोग को ठीक से समझा सकें। बच्चों को डिजिटल साक्षरता के लिए जागरूक करने की आवश्यकता है। हमें यह देखना होगा बच्चों की किस विषय में रूचि है। कोटा के कई स्कूलों में 9 से 12 में एआई शिक्षा शुरू हो चुकी है। डिजिटल साक्षरता से पहले हमें अभिभावकों की सोच में बदलाव लाना होगा। अभिभावकों के साथ लगातार कार्यशालाएं आयोजित कर बच्चों की क्या जरूरत है उसी के अनुसार उसे तैयार करना चाहिए। इस क्षेत्र में अभी काफी काम करने की आवश्यकता है। <br /><strong>-जसपिंदर साहनी,  प्रिंसीपल एमबी इंटरनेशनल स्कूल</strong></p>
<p><strong> डीएमआई टेस्ट से जान सकेंगे हैं बच्चे की रूचि</strong><br />कोटा में डिजिटल साक्षरता बढ़ाने की आवश्यकता है। बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या केरियर चुनने की आती है। ऐसे में डीएमआईडमेर्टोग्राफिक मल्टीपल इंटेलिजेंस टेस्ट (डीएमआईटी) एक ऐसा टेस्ट है जो फिंगरप्रिंट पैटर्न का विश्लेषण करके किसी व्यक्ति की जन्मजात प्रतिभा, व्यक्तित्व और बुद्धि के बारे में जानकारी प्रदान करता है। यह एक वैज्ञानिक रूप से समर्थित मूल्यांकन है जो व्यक्ति की अद्वितीय क्षमताओं और संभावित सीखने की शैली को समझने में मदद करता है।  डीएमआईटी का मतलब है डमेर्टोग्लिफिक्स मल्टीपल इंटेलिजेंस टेस्ट। डमेर्टोग्लिफिक्स उंगलियों और हथेलियों पर पाए जाने वाले अनूठे पैटर्न का अध्ययन है। यह टेस्ट फिंगरप्रिंट के पैटर्न का विश्लेषण करके मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों से उनके संबंध को समझने का प्रयास करता है, जिससे व्यक्ति की जन्मजात क्षमताओं और सीखने की शैली के बारे में जानकारी मिलती है। टेस्ट रिपोर्ट व्यक्ति की ताकत, कमजोरियों, सीखने की शैली और संभावित करियर विकल्पों के बारे में जानकारी मिल जाती है।  यह टेस्ट छात्रों को उनकी ताकत और कमजोरियों के आधार पर सही शैक्षणिक मार्ग चुनने में मदद करता है।<br /><strong>-जितेंद्र वर्मा, एआई शिक्षक आई स्टार्ट नेस्ट</strong></p>
<p><strong>कोरोना काल में अपनाई एआई तकनीक</strong><br />किसान परिवार से होने के कारण किसानों की समस्याओं को नजदीकी से देखा। किसानों को  खेती के हर काम के लिए अलग मशीन का उपयोग करना पड़ता है। कक्षा 10 वीं तक  पेंटिग का शौक रहा। उसी समय कोरोना काल आया। जिसमें डिजिटल तकनीक का अधिक उपयोग हुआ। ऐसे में किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए स्टार्टअप किया और ऐसी तकनीक इजात की। जिससे एक ही मशीने  किसानों की हर जरूरत को पूरा कर रही है। उनके इस काम को प्रधानमंत्री ने भी सराहा तो आगे काम करने का अवसर मिला। <br /><strong>-आर्यन सिंह, फाउंडर मेरा साथी प्रा. लि.  </strong></p>
<p><strong>प्रतिस्पर्धा के लिए तकनीक का ज्ञान जरूरी</strong><br />दुनिया के साथ चलना है और विश्व के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा करनी है तो तकनीक का ज्ञान जरूरी है। लेकिन उसके साथ ही भारतीय संस्कृति को भी जीवित रखना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों मेंं बच्चों में छिपा टेलेंट अधिक है। उसे सही दिशा में ले जाने की जरूरत है। एआई का उपयोग जानकारी के लिए किया जाना अच्छा है लेकिन उसके दुरुपयोग को भी रोकने की जरूरत है। वहीं बच्चों को उनकी रूचि के हिसाब से आगे बढ़ाना होगा तभी वे अपने क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।  <br /><strong>-अशोक कुमार गुप्ता, फ्रोफेसर रिटा. प्रिंसिपल जेडीबी</strong></p>
<p><strong>एआई का सही दिशा में हो उपयोग</strong><br />एआई पर कोटा में हर स्तर पर काम हो रहा है। यूनिवर्सिटी में भी अच्छा काम हो रहा है। डिजिटल लिट्रेसी बढ़ रही है। वर्तमान समय में डिजिटल व एआई तकनीक का ज्ञान जरूरी है। लेकिन उसके साथ ही संस्कृति का ह्रास न हो इसका भी ध्यान रखना होगा। तकनीक का उपयोग करने के साथ ही बच्चों की सोच में वैज्ञानिक दृुष्टिकोण विकसित करने की जरूरत है। एआई का जितना लाभ है उससे अधिक नुकसान भी है। एआई को सोशल मीडिया अधिक प्रभावित कर रहा है। ऐसे में बच्चों के साथ ही परिजनों में भी जागरूकता की जरूरत है। इसकी शुरुआत खुद से करनी होगी। <br /><strong>- रीना दाधीच, प्रोफेसर कोटा यूनिवर्सिटी </strong></p>
<p><strong>बच्चों में टेलेंट, सही दिशा देने की जरूरत</strong><br />आज के बच्चों में टेलेंट काफी है। जरूरत उन्हें सही दिशा देने की है। शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे डिजिटल तकनीक का अधिक उपयोग कर रहे हैंं वह भी सकारात्मक रूप में। स्किल के साथ डिजिटल तकनीक का उपयोग पिछले 5 साल में अधिक बढ़ा है। इस दिशा में सहरिया बच्चे भी काफी आगे हैं। जरूरत है कि एआई के नकारात्मक पहलुओं को रोका जाए। जिससे उसके दुष्परिणाम नहीं हो। <br /><strong>-विभा शर्मा, डायरेक्टरसीएसटी कम्प्यूटर इंस्टीट्यूट </strong></p>
<p><strong>एआई से रीयल टेलेट हो रहा खत्म</strong><br />वर्तमान में हर क्षेत्र में एआई का अधिक उपयोग होने लगा है। संगीत में भी इसका उपयोग तेजी से होने  लगा है। एआई के आने से रीयल टेलेंट खत्म हो रहा है।  समय के साथ चलना है तो डिजिटल तकनीक का उपयोग भी जरूरी है। लेकिन उसके नकारात्मक पहलुओं को रोकने की भी जरूरत है। क्रियटिविटी बनी रहे। हालांकि आज की यह जरूरत है लेकिन इसके नकारात्मक पहलुओं पर भी हमें सोचना होगा।  <br /><strong>-शिल्पी सक्सेना, डायरेक्टर संगीत वाटिका</strong></p>
<p><strong> शिक्षा में अपग्रेट हमेशा होना चाहिए</strong><br /> डिजिटल साक्षरता और शिक्षा में अंतर समझना होगा। वर्तमान में शिक्षा के साथ डिजिटल साक्षरता वर्तमान की जरुरत है लेकिन इसका उपयोग किस प्रकार से किया जा रहा है विचारणीय प्रश्न है। स्कूलों में मौलिक शिक्षा के साथ डिजिटल शिक्षा जरूरी है। चायना में प्राइमेरी स्तर पर ही लोगों को व्यवसायी शिक्षा के लिए तैयार किया जाता है। वहां एआई कक्षा छह से शुरू कर रहे हमारे यहां डिजिटल और एआई को शिक्षा में समावेश किया है लेकिन अभी उसका व्यापक उपयोग नहीं हो रहा है।  शिक्षा में एआई  व डिजिटल शिक्षा को सोच समझकर लागू करने की आश्यकता है। शिक्षा में अपग्रेट हमेशा होना चाहिए लेकिन उसका उपयोग कैसा होगा इस पर भी ध्यान देने की आवश्कता है। हमें विदेशी संस्कृति के पीछे दौडना रोकना चाहिए लेकिन समय के साथ चलना भी आज की जरूरत है। <br /><strong>-देव शर्मा, चेयरमैन कम मैनेजिंग डायरेक्टर क्रेडीजी कोटा</strong></p>
<p><strong>आधी अधूरी लर्निंग से खत्म हो रही क्रियटिविटी</strong><br />वर्तमान समय में डिजिटल शिक्षा यूथ के लिए जरूरी हो गई है। कारण की भारत डिजिटल क्षेत्र में काफी आगे ग्रोथ कर रहा है। स्कूल कॉलेज में युवाओं को थ्यौरी तो पढाई जाती है। लेकिन प्रेक्टिकल ज्ञान नहीं दिया जाता है। टेक्नोलॉजी में कोडिग नहीं सिखाई जा रही है। युवा एआई से मदद लेकन अपने प्रोजेक्ट पूरा कर रहा है लेकिन वो प्रोजेक्ट कैसे तैयार हुआ उसको बेसिक नॉलेज नहीं मिल रहा है। डिजिटल साक्षरता से युवाओं की क्रिएटिविटी खत्म हो रही है। एआई युवाओं के सीधा मस्तिष्क पर अटैक कर रहा वो स्वयं कोई इनोवेशन नहीं करना चाहता सारा ज्ञान वो एआई से ही लेकर अपने प्रोजेक्ट तैयार कर रहा जो ठीक नहीं प्रेक्टिकल की जगह युवा आएई पर अधीन होता जा रहा है। <br /><strong>-साक्षी गुप्ता, स्टूडेंट</strong></p>
<p><strong> डिग्री की नहीं स्किल बेस शिक्षा की जरूरत</strong><br />एआई तकनीक का उपयोग तो बहुत अधिक होने लगा है। लेकिन उसके बारे में सही जानकारी का भी होना आवश्यक है। इसके लिए स्कूल से ही बच्चों को इस बारे में सही दिशा में जानकारी देनी की आवश्कता है। जिससे शिक्षा पूरी करने तक बच्चे में विशेषज्ञता आएगी। वर्तमान में डिग्री की नहीं स्किल बेस शिक्षा की जरूरत है। आगे बढ़ने के लिए डिजिटल व तकनीकी शिक्षा बहुत जरूरी है। वर्तमान में जिस तरह से एआई का उपयोग बढ़ रहा है। ऐसे में 2030 तक इससे संबंधित लाखों नौकरियां आने वाली है। <br /><strong>-अरविंद गुप्ता, शिक्षाविद </strong></p>
<p><strong>बच्चे तकनीक का उपयोग करें, पंगु नहीं बनाएं</strong><br />भारत विकासशील और चीन विकसित देश है। भारत में टेलेंट की कमी नहीं है। दुनिया में सबसे अधिक टेलेंट भारत का ही काम कर रहा है। एआई जो काम अब कर रहा है। वह काम भारत में शंकराचार्य बहुत पहले से कर रहे हैं। बच्चों को एआई और डिजिटल तकनीक का उपयोग करना आना चाहिए लेकिन उसके कारण बच्चों को पंगु नहीं बनाएं। हर माता पिता को चाहिए कि बच्चों को तकनीक का सही उपयोग करना बताएं। मानवीय मूल्यि बने रहने चाहिए। <br /><strong>-नीलम विजय, सोशल एक्टिविस्ट</strong></p>
<p><strong>एआई लोगों की सोच को अपग्रेड करने का एक टूल</strong><br />कोटा में अभी डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में काम तो हो रहा है लेकिन जिस प्रकार से विकसित देशों में खासतौर से चाइना में इसका उपयोग हो रहा है उस स्तर का अभी भारत में नहीं हो रहा है। लोगों को लगता है एआई आने से लोगों की नौकरियां खत्म होगी यह गलत धारणा है। एआई के प्रयोग से जॉब खत्म नहीं होगा उसका नैचर बदलेगा लोगों को उसके अनुरूप ही अपने को अपग्रेट करना होगा। एआई लोगों को सोच को अपग्रेट करने का एक टूल है। अपनी सोच को व्यापक बनाने के साधन के रूप में देखना चाहिए। वर्तमान शिक्षा नीति में डिजिटल साक्षरता और एआई अपना स्थान बनाने लगी है। लेकिन इसका उपयोग सोच समझकर करने की आवश्यकता है। हर बच्चे में योग्यता की कोई कमी नहीं है उसे सही दिशा देने की आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा थ्यौरी पर ज्यादा जोर दिया जाता है। प्रेक्टिकल पर कम । वर्तमान में डिजिटल साक्षरता लोगों के जीवन का हिस्सा बनती जा रही है। कोटा बेगलूरू से दस साल पीछे चल रहा है। लोगों को नवाचार को अपनाना होगा। कोटा के यूथ को ब्रेन अन्य देशों में काम आ रहा है। <br /><strong>-ओमप्रकाश सोनी, रोबोटिक इंजीनियर एटीएल इंचार्ज</strong></p>
<p><strong>एआई के प्रयोग से शिक्षा अब सार्वभौमिक हो गई है</strong><br />भारत में नई राष्टÑीय शिक्षा नीति 2020 में आर्टिफिशियल इंटीलीजेंस की महत्वपूर्ण भूमिका के चलते ही इसको एजुकेशन सिस्टम में शामिल करने की सिफारिश की गई है। शिक्षा में एआई की सार्वभौमिकता पहुंच एवं वैश्विक कक्षाएं सर्वसुलभ होने लिए स्कूली शिक्षा में एआई व टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के लिए सीबीएसई ने एआई तथ इंटरनेट आॅफ थिंग्स को कक्षा 6 से 10 तक के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।  चीन की बात करें तो वहां नेक्स्ट जनरेशन एआई डवलमेंट प्लान 2017 को अधिक गहनता से शिक्षा में सम्मलित किया गया है। हमारे देश राष्टÑीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य स्थानीय भाषाओं को बढावा देते हुए डिजिटल शिक्षा को बढावा देना है। तथा हॉलिस्टिक एजुकेशन की ओर लेकर जाना है। वहीं चीन का लक्ष्य 2023 तक एआई में वैश्विक नैतृत्व पाना है।  देश में सीबीएसई ने  कक्षा 9 से 11 तक में एआई को इलेक्टिव पेपर के रूप में रक्षा है वहीं चीन में इसे प्राथमिक कक्षाओं से ही पढ़ाया जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अब भविष्य का वादा नहीं रह गया है। बल्कि आज शिक्षा में सक्रिय रूप से आगे बढाया जा रहा है। इसके द्वारा ड्रीम बॉक्स, स्मार्ट स्पैरो जैसे प्लेटफार्म द्वारा उन्नत वैयक्तिक शिक्षण हो रहो रहा है। ग्रेड स्कोप जैसे उपकरणों में  एएआई द्वारा ग्रेडिंग शेड्यूलिंग, रिपोर्ट निर्माण जैसे कार्य किए जा रहे हंै।<br /><strong>-डॉ. मीनू माहेश्वरी, कोटा विश्व विद्यालय </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Jun 2025 11:28:23 +0530</pubDate>
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                <title>जंक फूड खतरनाक : दादी की किचन के पुराने नुस्खे सेहत का खजाना</title>
                                    <description><![CDATA[जंक फूड्स से बचाव के लिए माता-पिता व टीचर करें जागरूक क्योंकि जंक फूड बीमारियों का वाहक है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/junk-food-is-dangerous--old-remedies-from-grandma-s-kitchen-are-a-treasure-of-health/article-115083"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news48.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति कार्यालय में होने वाली मासिक परिचर्चा की श्रृंखला में गुरुवार को (हाउ टू रिड्यूज जंक फूड इंटेक इन यंग्स्टर एन्ड इनक्रीज हेल्दी डाइट) जंक फूड से बच्चों की हेल्थ को हो रहे नुकसान और हेल्दी डाइट में कैसे वृद्धि करें  इस विषय को लेकर चर्चा की गई। परिचर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने कहा कि इसके लिए हमारा पुराना खानपान, हमारा कल्चर, जीवन जीने की शैली,हमारी सब्जियां, फ्रूट जिन्हें हम भूल रहे हैं उन्हें फिर से अपनाने की जरूरत है। इसके साथ बच्चों को जागरुक करने की भी जरूरत है। संभागियों का कहना था कि हमारी पुरानी रसोई जो दादा दादी के समय चलती थी उसकी फिर से जरूरत है। आज हम जंक फूड से बच नहीं सकते लेकिन इसे कम कर सकते हैं। संभागीयों ने जंक फूड से नुकसान को छोटी क्लास के सेलेबस में शामिल करने तक की बात कही। इससे होने वाली बीमारियों व महामारी का रूप लेता जंक फूड पर भी चर्चा की। इस परिचर्चा में जहां गेस्ट्रोएन्ट्रोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिक,न्यूट्रिशियन काउंसलर, डायटीशियन, फूड प्रस्तुत करने वाले, फूड को लेकर दीवाने टीन, बच्चे, उनके माता पिता,के साथ वनस्पति विशेषज्ञ, जिम संचालक, योग गुरू आदि ने हिस्सा लिया।  प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश... <br /> <br /><strong>हेल्दी भोजन शरीर के लिए जरूरी</strong><br />आजकल रेडी टू ईट के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। जिससे बच्चे बीमार हो रहे है। बच्चों को जंक फूड की ओर आकर्षित करने के लिए टीवी पर दिनभर विज्ञापन चलते रहते हैं। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न है कि बच्चों को हेल्दी खाना क्या दें इस पर पूरा फोकस होना चाहिए। जीरो से 5 साल के बच्चों को कैफिन से दूर रखना चाहिए। बच्चे को दो समय समझाने के लिए बेहतर होते है। एक कुक टाइम दूसरा बेड टाइम खाने के समय और सोने के समय ही बच्चे को अच्छे और बुरे के बारे में विस्तार समझा सकते है। जंक फूड वो जिसमें नमक ज्यादा, फेट और चीनी ज्यादा कैलेरी ज्यादा हो जंक फूड होता है। जंक फूड में विटामिन और मिनरल कम होते है। अल्ट्रा प्रोसस फूड नुकसान पहुंचाते है। एनर्जी ड्रिंक का चलन भी ज्यादा है जो नुकसान दायक है। माता पिता को अपने खाना बनाने के तरीके में बदलाव करना होगा। खाने में पौष्टिक चीजों की वेराइटी देनी होगी। कैफिन वाले डिंÑक नहीं देने होंगे। इसके नुकसान बताने होंगे।<br /><strong>- डॉ. अविनाश बंसल, शिशुरोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>स्कूली सेलेबस में शामिल होना चाहिए</strong><br />लोग चाहकर भी जंक फूड से बच नहीं पा रहे हैं। बच्चों में आउटडोर एक्टीविटी कम हो गई है। मोबाइल देखते हुए चिप्स, नमकीन, पिज्जा बर्गर फास्ट फूड खाते हैं। जिससे शरीर में फेट बढता है। शारीरिक गतिविधियां कम होने से फेट लिवर में जमा होने लगता है बच्चे फेटी लिवर का शिकार हो जाते है। बच्चों में ओबीसीटी बढ़ रही है। 6 से 10 तक की कक्षा के बच्चों के पाठ्क्रम में हेल्दी फूड का पाठ होना चाहिए। क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए और जंक फूड फास्ट फूड की हानि के बारे में विस्तार से बताए। छोटे बच्चों को मोबाइल नहीं दे। रोकथाम बचपन से ही करनी होगी। बच्चों को नैतिकता सिखाने के  लिए वह अपने माता पिता की बात मानें इसके लिए बचपन में ही उन्हें राजा हरिचंद्र और दूसरा श्रवण कुमार की कहानी बतानी चाहिए। इससे बच्चों का सर्वागीण विकास हो सकता है। <br /><strong>- डॉ. अनिल शर्मा, आचार्य ग्रेस्ट्रो मेडिकल कॉलेज </strong></p>
<p><strong>योग से मन होता कंट्रोल</strong><br />जीवन शैली में बदलाव करने से हम जीवन में बहुत कुछ चेंज कर सकते है। हमारे आहार विहार को ठीक करने मन  स्थिर हो जाता है। योग से हम जंक फूड से जंग कर सकते हैं। योग हमारे मस्तिष्क को नियंत्रण करने में काफी सहायता करता है। योग का नियमित अभ्यास करने से मन पर काबू करना सीख सकते जिससे हम अनहेल्दी चीजे नहीं खाएंगे। योग करने से आत्म विश्वास बढ़ता है। योग करने मन पर पूरा कंट्रोल आ जाता फिर आपके सामने पिज्जा बर्गर जंक फूड रखा होगा वो भी आप नहीं खाएंगे। जैसा खाएंगे अन्न वैसा बनेगा मन । शुद्ध आहार के लिए बच्चों को बचपन से संस्कार देने होंगे। हेल्दी और जंक फूड में अंतर बताना होगा। डिब्बा बंद सामानों पर लिखे कोड को बच्चों को समझाना होगा। क्या खाना चाहिए और क्या नहीं यह जिम्मेदारी माता पिता की है। किचन में हेल्दी और टेस्टी चीजें बनेगी तो बच्चे बाहर की चीजें  अपने आप खाना छोड देंगे। <br /><strong>- वसुधा राजावत योगा इंस्ट्रेक्टर </strong></p>
<p><strong>जंक फूड से जंग करने का समय</strong><br />हमारे जीवन में पाश्चात्य संस्कृति और खान पान  हावी होता जा रहा है। जिसके चलते बच्चे से लेकर बडे तक बीमार हो रहे हैं। आज जंक फूड का चलन इतना बढ गया है कि लोग अपने घर का खाना और पुराने हेल्दी खाने की वस्तुओं को खाना भूलते जा रहे हैं। आज जंक फूड से जंग करने का समय है। पहले के समय सुबह के नाश्ते लेकर रात के खाने में पूरा सांइस छिपा था। हमारे घर के किचन में पूरे परिवार के स्वास्थ्य का राज होता था। उसको लोग भूल रहे हैं। लापसी, दलिया, सत्तू,चना, मुरमुरे लोग खाना भूल गए है। किचन से 36 प्रकार के औषधि मसाले गायब हो गए हैं। जिससे लोग अब जंक फूड की ओर आकर्षित हो रहे हंै। अब समय आ गया है कि हमें पुराने खानपान की ओर लौटना होगा।<br /><strong>- पृथ्वीपाल सिंह, वनस्पति विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>घर पर ही बनाएं स्वादिष्ट चीजें</strong><br />जंक फूड का चलन अब लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अब तो घर के बाहर ही यह फूड मिलने लगा है। बाजार में पैक्ड सामान भी शरीर के लिए जहर बनता जा रहा है। ऐसे में हमें बच्चों को जंक फूड से होने वाले नुकसान के बारे में बताना होगा। उनके जिद करने पर उन्हें धीरे-धीरे समझाएं। इसके अलावा घर पर स्वादिष्ट चीजें बनानी चाहिए, जो बच्चों को अच्छी लग सके। आटा सहित अन्य खाद्य सामग्री के आयटम पीजा-बर्गर के शेप में बनाकर बच्चों को खिलाएं। शुरुआत में तो बच्चे खाने में आनाकानी करेंगे, लेकिन बाद में अच्छा टेस्ट आने पर खाने लगेंगे। हर पैरेंटस को इस तरह का प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>- सुनीता माथुर, पैरेंटस</strong></p>
<p><strong>डाइट हेल्दी होगी तो बॉडी भी हेल्दी बनेगी</strong><br />पैरेंटस बच्चों को सेहत बनाने के लिए जिम में तो भेज देते हैं, लेकिन उनके खान-पान के बारे में ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। जबकि जिम के साथ-साथ डाइट का ध्यान रखना भी जरूरी है, तभी तो शरीर स्वस्थ रह सकता है। जंक फूड के पैकेट पर क्या लिखा है इसकी समझ किसी को नहीं है। लोगों को पता होना चाहिए कि पैकेट में क्या नुकसानदायक चीज है। सरकार को इसके लिए प्रयास करने चाहिए।  मेरा मानना है कि इस मामले में पैरेंटस को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों को जंक फूड खाने से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देनी चाहिए। उन्हें बताएं कि जिम जाने का फायदा तभी होगा जब साथ में हेल्दी डाइट लोगे। जिम में आने वाले बच्चों को भी हम जंक फूड से दूर रहने की सलाह देते रहते हैं। अगर डाइट हेल्दी होगी तो बॉडी भी हेल्दी बनेगी।     <br /><strong>- विवियन तिमोती, फिटनेस ट्रेनर</strong></p>
<p><strong>असंतुलित आहार और जंक फूड कर रहा बीमार</strong><br />आजकल स्कूल कॉलेज में बर्थ डे पार्टी चॉकलेट, चिप्स, कुरकुरे बांटने का चलन चल रहा है। माता पिता को  बच्चों को खाने में विकल्प देने होंगे। कोल्ड ड्रिंक की जगह छा लस्सी, नींबू पानी के विकल्प से रिप्लेस कराएं।  मखाने दे सकते हंै। बच्चों को जंक फूड की हानियां बताएं। घर के खाना बनाने में बदलाव करें बच्चों को पौष्टिक खाने में टेस्ट बदलाव करें। बच्चों को चपाती पिज्जा, आटा व सूजी के पिज्जा बेस तैयार उसमें सब्जियों की मात्रा बढा सकते हैं। मेयोनिज सबसे हानिकार है। जंक फूड को कम करने के लिए सप्ताह बच्चा चार बार खा रहा है तो पहले उसको तीन बार करें फिर दो बार फिर सप्ताह में एक बार उसके बाद महीने में एक बार पर लाए साथ ही उसको इसके विकल्प दे दूसरी चीजों टेस्ट डवलप कराएं।      <br /><strong>- अभिलाषा मंगल, डाइटिशियन </strong></p>
<p><strong>बच्चों को जंक व फास्ट फूड्स में अंतर बताएं</strong><br />बच्चों को जंक फूड की जंग में धकेलने वाले भी माता पिता ही है। बच्चों को पौष्टिक खाने के प्रति जागरूक करने के बाजार से कुछ भी खाने की छूट उन्हें बीमारियों की ओर धकेल रही है। बच्चों को जंक फूड व फास्ट फूड में अंतर करना बताना होगा। आज माता पिता के पास बच्चों को गाइड करने का समय नहीं बच्चे क्या खा रहे क्या उनकी चॉइस है इस पर होमवर्क ही नहीं करते है।  स्कूल में टीचर के वाक्य वेद वाक्य की तरह होते ऐसे में बच्चों को जंक फूड व फास्ट फूड में अंतर टीचर बेहतर बता सकते है। कंज्यूमर एजुकेशन की सख्त आवश्यकता है। जंक फूड पर लिखे कोड को बच्चों समझाना होगा।<br /><strong>- प्रोफेसर नीरजा श्रीवास्तव, पोषण विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>बच्चों को स्पोर्ट्स से जोड़ना जरूरी</strong><br />बच्चों को स्पोर्टस से जोड़ना जरूरी है। अच्छा खिलाड़ी बनना है तो उसे अपनी डाइट पर ध्यान देना पड़ेगा। इसलिए जब बच्चे मैदान पर खेल की प्रैक्टिस करने आते हैं तो उन्हें सबसे पहले डाइट के बारे में ही बताया जाता है। ऐसे में जितने ज्यादा बच्चे खेलो से जुड़ेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि कौनसा फूड हेल्दी है और कौनसा अनहेल्दी। बच्चे जब सुबह प्रैक्टिस करने आते हैं तो उन्हें पहले बता दिया जाता है उन्हें अभी क्या खाकर आना है ताकि प्रैक्टिस में कोई दिक्कत नहीं आए। सुबह के समय केला और सेब खाना काफी फायदेमंद है। इन्हें खाने के बाद बच्चों को प्रैक्टिस के दौरान एनर्जी मिलती रहती है।     <br /><strong>- सूरज गौतम, एनआईएस कोच</strong></p>
<p><strong>जंक फूड इंटेक रोकें, करें सख्ती</strong><br />अच्छी बॉडी बनाने के लिए आजकल बाजार काफी हेल्थ सप्लीमेंट बिक रहे हैं। जबकि यह सेहत बनाने की बजाय बिगाड़ते हैं। प्रोटीन के नाम पर कई लोग इनका लगातार सेवन करते हैं जबकि उन्हें यह नहीं पता कि इससे फायदे की जगह नुकसान हो रहा है। यदि बच्चों को जंक फूड खाने से रोकना है तो पैरेंटस को सख्ती करना जरूरी है। क्योंकि बच्चे तो जिद करते रहते हैं, लेकिन उनकी हर बात मानना जरूरी नहीं है। बच्चों को खेलने के भेजा जाए ताकि वहां पर उन्हें हेल्दी डाइट के बारे में काफी जानकारी मिल सकेगी।     <br /><strong>-डॉ. तूफेल अहमद, बीईएमएस,जिम संचालक</strong></p>
<p><strong>मम्मी ने समझाया तो कम किया जंक फूड इनटेक</strong><br />हमें पास्ता व बर्गर खाना अच्छा लगता है। इसका स्वाद बढ़िया होने से इसे खाने की इच्छा होती रहती है। वहीं मेगों शेक पीने में भी काफी आनंद आता है। बाजार में घूमने जाते हैं तो यह चीजें नजर आते ही खाने का मन करता है। अब मम्मी इन चीजों को खिलाने से मना करनी लगी है। उनका कहना है कि यह चीजें हमें नुकसान पहुंचाती है। इससे काफी बीमारियां हो सकती है। ऐसे में अब हमने इन चीजों को खाना काफी कम कर दिया है। <br /><strong>- धौविक बजाज, भाविशा बजाज</strong></p>
<p><strong>कारण भी हम, निवारण भी हम ही </strong><br />आज जो स्कूल से लेकर समाज में जंक फूड खाने का ट्रेंड चल रहा है। ऐसे में बच्चे जंक फूड नहीं खाए तो उनको पिछड़ा समझा जाता है। इसके चलते बच्चे ना चाहते हुए भी जंक फूड की तरफ आकर्षित हो ही जाते है। हमारे कल्चर में जो पाश्चात संस्कृति ने बदलाव किया है जिसके चलते माता पिता चाहकर भी बच्चों को जंक फूड खाने से नहीं रोक पा रहे है। जंक फूड खाना कल्चर बन गया है।  टीवी पर जंक फूड्स के विज्ञापनों की बाढ आई हुई है। बाजार में चिप्स, कुरकुरे, पिज्जा, बर्गर कोल्ड डिंÑक, एनर्जी ड्रिंक  से इतने विज्ञापन आते है बच्चे उस ओर आकर्षित हो जाते है। जंक फूड खाना स्टेट्स सिंबल बनता जा रहा है। शादी समारोह में सबसे ज्यादा भीड़ जंक फूड काउंटर पर ही होती है। <br /><strong>- रेणुका बजाज, पैरेंटस </strong></p>
<p><strong>तब और अब में बच्चों को फर्क करना सिखाएं</strong><br />मुझे जंक फूड ही पंसद है । इसका टेस्ट मेरे दिलो दिमाग पर हावी हो रखा है। मुझे मालूम है यह सब खाना हानिकारक है लेकर जुबां पर इसका स्वाद ऐसा चढा है कि और कुछ खाने का मन ही नहीं करता है।  मुझे कोल्ड कैफिन पीने की लत लग गई। रात के समय पढाई के दौरान भूख लगती है तो चिप्स, कैफिन  चाहिए जो दिमाग मांगता वहीं खाना पड़ता है। यह सब खाने से मेरा वजन बढ गया तो मम्मी पापा ने पिज्जा बर्गर, कोक, कैफिन खरीदने के लिए पैसा देना बंद कर दिया। मुझे योग क्लास जोड दिया अब मेरे खानपान में काफी बदलाव आया है। बच्चों को माता पिता के समय के खाने और अब के खाने में अंतर बताना होगा। बच्चा जंक फूड से तौबा कर लेगा।     <br /><strong>- आश्वि गर्ग, योग स्टूडेंट</strong></p>
<p><strong>मजबूरी में खाना पड़ता था, अब कम किया</strong><br />दिन के समय के कॉलेज और कोचिंग के लिए जाना पड़ता है। इसके लिए सुबह जल्दी घर से निकलना पड़ता है। जिससे कई बार घर से खाना लेकर नहीं जा पाती। कॉलेज के बाहर जंक फूड आसानी से मिल जाता है। इसलिए  भूख लगने पर उसे खा लेती हंू। ऐसा ही अन्य स्टूडेंट भी करते हैं। पहले यह सिलसिला आए दिन चल रहा था। जिससे हेल्थ प्राब्लम होने लगी। इसका कारण लगातार फास्ट फूड खाना था। फिर जब प्राब्लम बढ़ने लगी तो उसने अब जंक फूड खाना कम कर दिया। इससे शरीर को नुकसान पहुंचने लगता है। मेरा मानना है कि जंक फूड लम्बे समय तक खाने से दिक्कत आने लगती है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।     <br /><strong>- दीपिका कुमारी, स्टूडेंट</strong></p>
<p><strong>डाइट को किया डायवर्ट तो बच्चों ने अपनाया</strong><br />वह एक हॉस्टल में कैंटीन चलाते हैं। अधिकांश बच्चों की डिमांड फास्ट फूड की ही रहती है। यह फूड ऐसे केमिकल से बनते है, जो शरीर को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में उन्होंने इस केमिकल के बजाय आटे का पिजा बनाना शुरू कर दिया। इसका स्वाद अच्छा नहीं लगने के कारण शुरुआत में अधिकांश बच्चों ने इसे खाने से मना कर दिया। ऐसे में बच्चों को समझाया कि केमिकल से बना फास्ट फूड काफी नुकसानदेय है। इसके बाद बच्चों ने आटे से बने फास्ट फूड खाना शुरू कर दिया। इसके अलावा कैंटीन में इडली-सांभर भी बच्चों को देने लगे। इसका स्वाद बढ़िया होने से बच्चों को यह काफी पसंद आया है। यदि बच्चों को जंक फूड से दूर करना है तो उनकी डाइट को डायवर्ट करना जरूरी है।     <br /><strong>- विमल आजाद, कैंटीन संचालक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 May 2025 15:50:18 +0530</pubDate>
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                <title>चिकित्सा सुविधाओं की कमी नहीं, रेगुलेटरी सिस्टम में खामियां</title>
                                    <description><![CDATA[डॉक्टर व मरीज के मध्य संबंधों को ठीक करने की जरूरत, सरकारी ही नहीं निजी अस्पताल भी काउंसलर और हेल्प डेस्क को मजबूत करें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/there-is-no-lack-of-medical-facilities--there-are-flaws-in-the-regulatory-system/article-111836"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/news47.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । दैनिक नवज्योति कार्यालय में होने वाली मासिक परिचर्चा की श्रंखला में बुधवार को चिकित्सा व्यवस्था पर चर्चा की गई। आर क्वालिटी हेल्थकेयर फैसिलिटी इजीली असेसिबल टू एवरी वन इन कोटा विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य सेवा आसानी से लोगों को उपलब्ध हो रही हैं अथवा नहीं। पर चर्चा की गई। परिचर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने सुधार के सुझाव और खराब स्थितियों से होने वाली व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला। परिचर्चा में सामने आया कि शहर ही नहीं ग्रामीण इलाकों तक चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन सिस्टम की कमी है। पीएचसी,सीएचसी होने के बावजूद लोग बड़े अस्पताल की ओर मुंह करते हैं। इससे सारा भार बड़े अस्पतालों पर पड़ता है और सारी व्यवस्था तहस-नहस हो जाती है। इस व्यवस्था को बिगाडने में केवल आम लोग ही नहीं मरीज, चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े  सभी लोग शामिल हैं। इसके लिए जागरुकता आनी चाहिए। अस्पतालों में काउंसलर और हेल्प डेस्क के साथ पूछताछ और इमरजेंसी सेवा की खामियों को भी पुखता करने की आवश्यकता है। इस परिचर्चा में मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य,आईएमए के अध्यक्ष, पूर्व अध्यक्ष, सीएमएचओ के अधिकृत प्रतिनिधि,श्री राम मंदिर चिकित्सालय के सभापति, नर्सिंंग कॉलेज के डायरेक्टर,सहायक कर्मचारियों के अध्यक्ष, कोटा हार्ट अस्पताल,भाजपा चिकित्सा प्रकोेष्ठ के संयोजक,पैथालाजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट,नर्सिंग सहित मरीज और उनके तीमारदारों ने भी हिस्सा लिया। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश... </p>
<p><strong>मुख्य बिंदु</strong><br />- पीएचसी, सीएचसी जिला अस्पताल की सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता। <br />- अस्पतालों में बने हेल्पडेस्क।  ल्ल मरीज को सिंगल विंडो पर ही मिले सारी सुविधा<br />- इमजेंसी सेवाओं को बेहतर बनाने की आवश्यकता। <br />- डॉक्टर व मरीज के बीच का संवाद बेहतर हो। <br />- अस्पताल की वेबसाइट बने जिस अस्पताल का पूरा विवरण, डॉक्टरों ओपीडी डे, सुविधा हो जानकारी<br />- अस्पतालों में लगने वाली कतार व्यवस्था सुधार हो।<br />- डॉक्टर से मिलने के लिए आॅनलाइन रजिस्टेशन हो साथ ही बैक की तर्ज पर टोकन सुविधा हो।<br />- हेल्पडेस्क के साथ अस्पतालों में काउंसलर लगाए जो मरीजों बीमारी के लिए गाइड कर सकें। <br />- अस्पताल की सुविधाओं को ब्रोशर होना चाहिए।<br />- रेफर सिस्टम में सुधार की आश्यकता है। <br />- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का उपयोग कम हो रहा है, जिससे बड़े अस्पतालों भीड़ बढ़ रही है।<br />-  मरीज को डॉक्टर के पहुंचने के लिए एक चेनल की आवश्यकता है।<br />- आम आदमी को बीमार पड़ने नहीं है हक<br />- दवा जांच से चल रहे कमीशन के अंकुश लिए कानून बनना चाहिए। <br />- रजिस्टर्ड व एमडी पैथेलॉजिस्ट से ही जांच हो, बिना लाइसेंस के चल रही जांच केंद्र लगें अंकुश<br />- सरकारी योजनाओं को ठीक से क्रियान्वयन हो तभी आम आदमी तक सुलभ व सस्ता इलाज मिलेगा।</p>
<p><strong>प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता</strong><br />कोटा में सस्ती, सुलभ और गुणवत्ता युक्त चिकित्सा व्यवस्था मौजूद है। आम आदमी इन सुविधाओं को ठीक से उपयोग नहीं कर पा रहा है। इसके लिए उचित माध्यम को ठीक करने की आवश्यकता है। जब तक प्राथमिक स्तर की चिकित्सा व्यवस्था में सुधार नहीं होगा तब तक अस्पतालों में लंबी कतारें लगेंगी। प्राथमिक स्तर पर ही लोगों इलाज मिलेगा तो बड़े अस्पतालों में भीड़ कम होगी तो सुपर स्पेशियलेटी सुविधा लोगों को बेहतर तरीके से मिल सकेंगी। अभी लोग प्राथमिक स्तर की बीमारियों के लिए भी बड़े अस्पतालों में दौड़ लगा रहे हैं। अस्पताल में लोगों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में मरीज को हेल्प डेस्क और काउंसलर की आवश्यकता है। उसको यह ही पता नहीं उसको जाना किस डॉक्टर के पास है। <br /><strong>-डॉ. के श्रृंगी, एमआईए अध्यक्ष कोटा</strong></p>
<p><strong>इमरजेंसी सुविधाओं को बेहतर बनाने की आवश्यकता</strong><br />वर्तमान में कोटा में आमजन के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध है। यहां मरीज के पास अस्पताल से लेकर स्पेशलिस्ट डॉक्टर चुनने की सुविधा है।  आमजन को बीमारी का इलाज कराने के लिए कई विकल्प उपलब्ध है। सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं और खासतौर से मुख्यमंत्री आरोग्य योजना मां योजना में 85 प्रतिशत लोग कवर है। बाकी शेष लोग आरजीएचएस में कवर, मुख्यमंत्री नि:शुल्क निरोगी योजना में सभी लोग कवर है।  चिकित्सा सुविधा पूरी है लेकिन लोगों का अस्पताल में अनुभव कैसा रहा है इसी पर सारा सिस्टम चलता है। डॉक्टर ने मरीज को इलाज के दौरान कैसा फील कराया यह मायने रखता है। लोगों में कम्युनिकेशन और इमजेंसी में मरीज को ठीक से सुविधा युक्त इलाज मिल जाए तो यहां किसी चीज की कमी नहीं है। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए एमडी स्तर के काउंसर हों जो मरीज से ठीक से संप्रेषण कर सकें। <br /><strong>-डॉ. विजय सरदाना, पूर्व प्रधानाचार्य मेडिकल कॉलेज कोटा।</strong></p>
<p><strong>व्यवस्था में सुधार की जरूरत </strong><br />आमजन को कोटा में और शहरों की अपेक्षा बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल रही है। यहां संसाधन की कोई कमी नहीं है। मरीज के पास इलाज के लिए मल्टीपल चॉइस है। अलग अलग बीमारी के लिए सर्व सुविधाओं से लेस सरकारी व निजी अस्पताल मौजूद है। अन्य शहरों में कोटा में इलाज सस्ता है। उसके बावजूद मरीज संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। मरीज  अपने को  जांच, इलाज के नाम पर ठगा ठगा सा महसूस करता है पीएचसी व सीएचसी स्तर पर सुविधाएं बेहतर करने की आवश्यकता है। सरकार की ओर से कई योजनाए चलाई जा रही जिससे आमजन को सस्ता और सुलभ इलाज मिल रहा है। चिकित्सक व मरीज में संप्रेषण अच्छा करने की आवश्यकता है। निजी व सरकारी डॉक्टर को अपने पैसे को इमानदारी से करने की आवश्यकता है। डाक्टरों पर बेवजह तोहमत लगाई जाती है। व्यवस्था की खामियां चिकित्सकों को भुगतनी पड़ती हैं। <br /><strong>-डॉ. सुधीर उपाध्याय सभापति श्रीराम मंदिर चिकित्सालय</strong></p>
<p><strong>कोटा में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता आसान</strong><br />विदेशों की तुलना में देश और कोटा में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता काफी आसान है। यहां मरीज अपनी पसंद के डॉक्टर व अस्पताल में कम से कम खर्च में बेहतर उपचार ले सकता है। डॉक्टर भी आसानी से मरीज की एप्रोच में हैं। कई बार मरीज के एनवक्त पर आने से उसे सही उपचार मिलने में देरी हो सकती है। डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ के पास कार्यभार अधिक होने से परिस्थितिवश विवाद की स्थिति बन सकती है। जो लोग परेशान होते हैं वह अज्ञानता व जागरूकता की कमी के कारण होते है। अस्पतालों में हैल्प डेस्क बनाई जाएं और सरकारी योजनाओं को सही ढंग से लागू कर दिया जाए तो कोटा जैसी स्वास्थ्य सेवाएं कहीं नहीं हैं। कोरोना में कोटा जैसी मेडिकल सुविधाएं कहीं नहीं मिली। <br /><strong>-डॉ. अमित व्यास, संयोजक, भाजपा चिकित्सा प्रकोष्ठ</strong></p>
<p><strong>प्रशिक्षित स्टाफ की कमी, सुविधाओं का लाभ नहीं</strong><br />कोटा संभागीय मुख्यालय है। यहां मेडिकल कॉलेज व सुपर स्पेशलिटी जैसे अस्पताल है। डॉक्टर भी विशेषज्ञ हैं। लेकिन कई बार सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ के प्रशिक्षित नहीं होने से मरीजों को सही उपचार नहीं मिल पाता है। जिससे मरीजों को उपचार कम और दर्द अधिक  सहना पड़ता है। साथ ही सरकार की योजनाएं भी हैं लेकिन सरकारी अस्पतालों में अधिकतर समय जांच मशीनें खराब होने से मरीजों को सुविधाएं नहीं मिल पाता है। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने व आम आदमी की पहुंच तक बनाने के लिए व्यवस्थाओं में सुधार करने की जरूरत है। <br /><strong>-मधु ललित बाहेती, अध्यक्ष लॉयंस क्लब कोटा सेंट्रल</strong></p>
<p><strong> गांव से लेकर शहर तक चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हुई</strong><br />चिकित्सा एंव स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं को काफी बेहतर किया है। पीएचसी व सीएचसी पर अब सीजेरियन आॅपरेशन होने लगे हैं। साथ ही शहरी व ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टर से लेकर जांचों की सुविधाएं पूरी उपलब्ध है। उपस्वास्थ्य केंद्र,पीएचसी सीएचसी पर जांच इलाज और भर्ती करने सुविधाएं है। लोग बेहतर के चक्कर में शहर के बड़े अस्पतालों की ओर आते है।  प्राथमिक स्तर पर सोनोग्राफी, एक्सरे और सभी प्रकार की जांचे तक उपलब्ध हैं। सरकार ने विशेषज्ञ डॉक्टर भी सीएचसी पीएचसी पर लगा रखे हंै। सरकार की ओर से चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं को आमजन तक बेहतर तरीके से पहुंचाया जा रहा है। टीकाकरण से लेकर बच्चों के स्वास्थ्य गर्भवती महिलाओं सोनोग्राफी के लिए वाउचर जैसी सुविधा से काफी लाभ मिल रहा है। <br /><strong>-डॉ. अनिल मीणा, एसएमडी सीएमएचओ आॅफिस</strong></p>
<p><strong>नर्सिंग स्टाफ का समय-समय पर हो प्रशिक्षण</strong><br />सरकारी और निजी अस्पतालों में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ कोर्स करने के बाद ही लगते हैं। लेकिन समय-समय पर उनका रिफ्रेशर कोर्स व प्रशिक्षण किया जाना आवश्यक है। जबकि कोर्स में प्रावधान है। लेकिन कई बार किसी कारणवश स्टाफ की गलती के कारण मरीज को परेशानी का सामना करना पड़ता है तो उससे पूरे अस्पताल की छवि पर प्रभाव पड़ता है। यदि ट्रेनिंग में उन्हें उनके काम के साथ-साथ मरीज को हैंडल करना भी सिखाया जाएगा तो जो छोटी-छोटी समस्याएं आती हैं उनका समाधान हो जाएगा। <br /><strong>-डॉ. सुधीश शर्मा, डायरेक्टर नर्सिंग कॉलेज</strong></p>
<p><strong>लोगों में जागरूकता की कमी</strong><br />कोटा में स्वास्थ्य सेवाएं अन्य शहरों की तुलना में काफी बेहतर है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी है। जिसके कारण कई बार बीमारी में उन्हें परेशान होना पड़ता है। शहर के लोगों को तो डॉक्टर से लेकर मेडिकल स्टोर तक की जानकारी है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को सही जानकारी नहीं होने से वे मेडिकल स्टोर  पर जाकर अच्छे डॉक्टरों की जानकारी लेते है।  वहीं जहां तक दवाई का सवाल है दवाईयां अधिकतर जिस डॉक्टर को दिखाया उसके नजदीक मेडिकल स्टोर पर ही मिलती है।  लेकिन जब मरीज को उसकी सुविधा अनुसार जगह पर दवाई नहीं मिलती तो वह परेशान होता है। दवाईयां ऐसी लिखी जाएं जिनकी उपलब्धता आसान होगी तो मरीज की आधी परेशानी दूर हो जाती है। मरीज पैसा खर्च करने को तैयार है लेकिन वह सही उपचार व दवाई चाहता है जिससे वह समय रहते ठीक हो सके। इसके लिए व्यवस्था  में थोड़े सुधार की जरूरत है। <br /><strong>-भजन भगवानी, मेडिकल शॉप आनर,सह संयोजक चिकित्सा प्रकोष्ठ</strong></p>
<p><strong>ओपीडी क्रिएटिव होनी चाहिए</strong><br />अस्पताल में मरीज ओपीडी में आए तो उसको गुड फिल होना चाहिए। अस्पतालों की ओपीडी क्रिएटिव होनी चाहिए। हेल्दी वातावरण मरीज को मिलेगा तो आधी बीमारी वैसे ही ठीक हो जाएगी। डॉक्टर को मरीज की केस हिस्ट्री लेने के दौरान मरीज को सकारात्क करना जरूरी है। जिससे मरीज का डॉक्टर पर विश्वास बढ़ता है। मरीज बेहतर सुविधा और बेहतर इलाज में विश्वास करता है। वो अस्पताल में शत प्रतिशत अटेंशन की अपेक्षा के साथ आता उसकी अपेक्षा में खरा उतरने की जरुरत है। <br /><strong>-डॉ. अभिषेक राठौड़, न्यूरोलोजिस्ट कोटा हार्ट</strong></p>
<p><strong>शुरुआत में सुविधा मिलेगी तो नहीं होंगे मरीज परेशान</strong><br />सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों की संख्या तो काफी अधिक रहती है। उनमें अधिकतर गम्भीर व एक्सीडेंट वाले भी होते है। जिन्हें सबसे पहले स्ट्रेचर की जरूरत होती है। लेकिन वही पर्याप्त नहीं होने से मरीजो की परेशानी उसी से बढ़ने लगती है। जबकि स्ट्रेचर चलाने से लेकर संविदा पर कार्यरत अन्य कर्मचारी कम मानदेय मिलने पर भी सेवाएं देता है। लेकिन संवेदक द्वारा समय पर मानदेय तक नहीं देने से उनकी समस्याएं अधिक हो जाती है। जिस कारण से संविदा कर्मियों को मजबूरन हड़ताल करनी पड़ती है। मरीज को यदि शुरुआत में ही सुुविधाएं बेहतर मिलने लगेंगी तो किसी तरह की समस्या ही नहीं होगी। <br /><strong>-दिलीप सिंगोर, जिलाध्यक्ष ठेका संघ, मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>मरीज व डॉक्टर के रिश्ते मधुर होने चाहिए</strong><br />कोटा के सरकारी व निजी अस्पतालों में अन्य जिलों से चिकित्सा व्यवस्थाएं काफी बेहतर है। दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और जयपुर में होने वाले जटिल आॅपरेशन कोटा में कम खर्च में हो जाते है। जिससे मरीजों की बड़े शहरों की दौड़ कम हुई है। हार्ट, किडनी, कैंसर जैसी बीमारियों का कोटा में मरीजों को बेहतर इलाज मिल रहा है। कोटा में डॉक्टर और मरीज के रिश्ते मधुर होने चाहिए। साथ अस्पतालों काउंसर और नर्सिंग स्टॉफ समय समय पर ट्रेनिंग कराकर चिकित्सा सुविधाओं हुए नवाचार लिए प्रशिक्षत करना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. ओमप्रकाश धाकड़, कोटा हार्ट इंस्टीट्यूट</strong></p>
<p><strong>दस साल में स्वास्थ्य सेवाओं में हुआ सुधार</strong><br />देश और विशेष रूप से कोटा में दस साल पहले और वर्तमान की स्वास्थ्य सेवाओं में जमीन आसमान का अंतर है। पहले की तुलना में वर्तमान में स्वास्थ्य सेवाएं कोटा में बेहतर हुई है। केन्द्र व  व राज्य सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में खूब खर्चा कर रही है। यहां जांच के लिए एक से बढ़कर एक प्रयोगशालाएं हैं। जहां बिना पैथोलोजिस्ट के हस्ताक्षर के जांच रिपोर्ट नहीं दी जाती। यह जरूर है कि लैब अधिक हैं और उनमें प्रशिक्षत टैक् नीशियन की कमी हो सकती है। यह पेशा विश्वास का है। 2014 से पहले जहां देश में 6 करोड़ लोगों की मौत इलाज नहीं मिलने के कारण हो जाती  थी। वैसे स्थिति अभी नहीं है। कोटा में डॉक्टरों की उपलब्धता से लेकर जांच तक की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो रही हैं।  <br /><strong>-डॉ. गोपाल सिंह भाटी, पैथोलोजिस्ट इंडिपेंडेंट डायरेक्टर सेल इंडिया</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Apr 2025 13:02:56 +0530</pubDate>
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                <title>ज्यादा लाभ मतलब धोखा, सतर्क रहें पाँजी स्कीम्स से</title>
                                    <description><![CDATA[लालच, इमोशन और आपसी रिश्तों से फंसते है चिटफंड कंपनियों में निवेशक, निवेश से पहले यह ध्यान रखना होगा कि कम्पनी अधिकृत जगह पर पंजीकृत है या नहीं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/more-profit-means-fraud--be-cautious-about-ponzi-schemes/article-108252"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(9)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । समाज के विभिन्न मुद्दों पर आयोजित परिचर्चा की श्रंखला में शुक्रवार को धोखाधड़ी पूर्ण निवेश घोटालों में लोगों के फंसने के बाद उसके प्रभाव और दुष्प्रभाव को लेकर दैनिक नवज्योति कार्यालय में मासिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में पांजी स्कीम्स से बचने के तरीके, व्यक्ति आखिर किन परिस्थितियों में ऐसी स्कीम का शिकार होता है, उसे शिकार बनाने में कौनसा मनोविज्ञान काम करता है। रिश्तेदारों की भूमिका ऐसे मामलों में क्या रहती है। क्यों पूरे के पूरे परिवार ऐसी खोखली योजनाओं में फंस कर लुट जाते हैं। ऐेसे सभी मुद्दों पर चर्चा की गई। चर्चा में मुख्य रूप से लालच और महत्वाकांशा के साथ परिस्थितियों का मुद्दा उठा जो ऐसी घटनाओं का बायस बनता है। परिचर्चा का विषय था व्हाई पीपल गेट ट्रेप्ड इन पॉंजी स्कीम्स। इस परिचर्चा  में चाटर्ड एकाउन्टेन्ट एन्ड इन्वेस्टमेंट बैंकर,एडवोकेट, निवेशक, सहकारिता विभाग के रिटा. अधिकारी, बिजनस मेन, कंपनी सैकेट्री,  मनोचिकित्सक, सोशल वर्कर, गृहिणी, स्कीम्स के पीड़ित  सहित सभी विषय विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी । प्रस्तुत हैं उसके अंश:-</p>
<p><strong>छोटी सी चीज की करते जांच परख, निवेश की क्यों नहीं</strong><br />व्यक्ति छोटी सी भी चीज खरीदता है तो बहुत जांच परख कर उसमें पैसा लगाता है। लेकिन पॉंजी स्कीम्स में कम्पनियों के एजेंटो के झांसे में आकर बिना सोचे समझे ही लाखों रुपए निवेश कर देता है। जबकि व्यक्ति को खुद की राशि को खुद ही सोच-समझकर सही जगह पर निवेश करना चाहिए। व्यक्ति खुद लालच में आकर इन कम्पनियों के झांसे में फंसता है।  निवेश करने से पहले यह ध्यान रखना होगा कि कम्पनी अधिकृत जगह पर पंजीकृत है या नहीं। ऐसे में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। निवेश सुरक्षित जगह पर ही करना चाहिए। लाभ कम मिले लेकिन रकम डूबने का खतरा नहीं रहेगा। <br /><strong>-पंकज लड्ढ़ा, निवेशक  व समाज सेवी</strong></p>
<p><strong>निवेश से पहले दस्तावेजों की पुष्टि जरूरी</strong><br />किसी भी प्राइवेट कम्पनी या फर्म द्वारा रकम को कम समय में अधिक लाभ देकर रिटर्न करने का दावा किया जाता है तो लोग जल्दी पैसा कमाने के लालच में उसमें फंस जाते है। उसका फायदा उठाकर कम्पनियां मोटी रकम लेकर लोगों को चूना लगाती है। हालांकि ऐसी फर्जी कम्पनियों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार ने कम्पनी एक्ट लागू किया है।  आईबीबीआई कानून बनाया है। जिसके माध्यम से निवेशक उन कम्पनियों के खिलाफ रजिस्ट्रार कार्यालय में शिकायत कर सकता है। कम्पनियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। लेकिन निवेशकों को किसी भी जगह पर मोटी रकम निवेश करने से पहले उसकी पूरी जानकारी और दस्तावेजी पुष्टि कर लेनी चाहिए। उसके बाद ही निवेश करना चाहिए। लालच में न फंसते हुए सुरक्षित जगह पर ही निवेश करना चाहिए। <br /><strong>-अक्षय गुप्ता (सीएस)चैयरमेन कोटा चैप्टर आईसीएसआई </strong></p>
<p><strong>लोगों में जागरुकता की कमी</strong><br />पॉंजी कम्पनियों में अधिकतर कम शिक्षित लोग ही फंसते है। छोटे-छोटे काम कर अपना परिवार चलाने वालों को कम समय में अधिक लाभ का लालच देकर उनकी रकम को हड़पा जा रहा है। जिसकी लोगों को जानकारी या आभास तक नहीं होता। ऐसे में आवश्यक है कि लोगों को इस तरह के फ्रॉड से बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं। विशेष रूप से घरों में काम करने वाली महिलाओं व उनके परिवारों के लिए इस तरह के कार्यक्रम करना आवश्यक है। छोटी-छोटी कमाई से की गई बचत जब डूबती है तो उन परिवारों पर व्यथा व दर्द को कोई नहीं समझ सकता। <br /><strong>- डॉ. रेणु नैनावत एसोसिएट प्रोफेसर</strong></p>
<p><strong>फ्रॉडर हमेशा आगे, लालच पर कंट्रोल करें</strong><br />लोग लालच भय और कमीशन के चक्कर में आकर ऐसी कंपनियों में बिना जानकारी के निवेश करते हैं। फ्रॉड करने वाला हमेशा निवेशक से एक कदम आगे होता है। लोगों को किसी भी कंपनी, बैंक संस्था में निवेश करने से पहले सेबी से रजिस्टर्ड सलाहकार से सलाह लेकर ही निवेश करें। बड्स एक्ट राजस्थान में लागू हो। लालच पर कंट्रोल करें। साथ निवेश के लिए जागरुकता जरुरी है। शिक्षा में निवेश शिक्षा होनी चाहिए। अपने लालच पर अंकुश लगाना होगा। एक साथ किसी संस्था में निवेश नहीं करें। लोगों को निवेश करने से पहले जोखिम और कंपनी का शैड्यूल समझकर ही निवेश करना चाहिए।  किसी निवेश में जोखिम तो रहता ही है। <br /><strong>- अभिषेक गर्ग चार्टड एकाउन्टेन्ट एंड इनवेस्टमेंट बैंकर(चीयर बुल)</strong></p>
<p><strong>भरोसा बन रहा धोखाधड़ी का कारण</strong><br />निवेशक के सलाकार को भी कंपनी के बारे में पूरा पता नहीं होता है। वो मौखिक ही निवेशक को जानकारी देता है, पेपर वर्क नहीं दिखाता है। सारा खेल भरोसे पर चलता है। यही भरोसा धोखाधडी का कारण बनता है। निवेशक यदि सेबी से रजिस्टर्ड सलाहकार से सलाह लेकर निवेश करेंगा तो जो रजिस्टर्ड सलाहकार वो कंपनी के सकारात्मक व नकारात्मक सभी पहलुओं पर निवेशक को बताएगा उसका पैसा कितना सुरक्षित कंपनी डूबेगी तो कौन जिम्मेदार होगा। यह सभी जानकारी रजिस्टर्ड सलाकार ही दे सकता है। राजस्थान में अनियमित जमा योजना प्रतिबंधित अधिनियम 2019 बड्स एक्ट  लागू हो तो निवेशकों को शीघ्र न्याय मिलेगा। चिंड फंड कंपनियों पर अंकुश लगेंगा। <br /><strong>-नवीन शर्मा, एडवोकेट</strong></p>
<p><strong>जांच पड़ताल कर निवेश किया फिर भी डूबी रकम</strong><br />हर व्यक्ति वृद्धि करना चाहता है। उसके लिए मेहनत के साथ ही यदि उसके पास रकम है तो वह उसका सुरक्षित निवेश करना चाहता है। भाई के कहने पर लाखों रुपए कम्पनी में निवेश किए। लेकिन उससे पहले उसकी पूरी जांच पड़ताल की और दस्तावेजी सत्यापन तक किया। भाई को तो लाभ हुआ लेकिन मुझे नहीं। कम शिक्षित ही नहीं शिक्षित लोग भी लालच में आकर फंस जाते है। किसी के भरोसे में आकर खुद की रकम को गलत जगह पर नहीं लगाएं। कहीं भी निवेश करें तो सोच समझकर व जांच पड़ताल के बाद ही करें। लालच में नहीं आएं वरना नुकसान होना तय है। <br /><strong>-ललित कुमार मल्होत्रा: एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>परिचितों से पहले करते हैं सम्पर्क</strong><br />पॉंजी कम्पनियों में काम करने वाले एजेंट सबसे पहले अपने नजदीकी व परिचितों से सम्पर्क कर उन्हें निवेश का लालच देते है। उनके द्वारा इस तरह की स्कीम बताई जाती है जिसमें कोई भी जल्दी  झांसे में आ सकता है। हमारे परिवार में भी कुछ लोग झांसे में आकर निवेश कर चुके है। लेकिन जिस तरह से गम्भीर बीमारी में बचाव ही उपचार है। उसी तरह से अपनी रकम को कहीं भी निवेश करने से पहले   पूरी जांच पड़ताल करें। अधिक लालच के झांसे में नहीं आए। सरकारी एजेंसी में निवेश से लाभ कम होगा लेकिन रकम सुरक्षित रहेगी। <br /><strong>-कुन्ती मूंदड़ा, सोशल वर्कर</strong></p>
<p><strong>अधिक लाभ का लालच मतलब धोखा</strong><br />व्यक्ति कम समय में अधिक लाभ के लालच में आकर बिना सोचे समझे लाखों रुपए पॉंजी कम्पनियों में निवेश कर देता है। लेकिन अपनी रकम को सुरक्षित रखना है तो अधिक लाभ के लालच से बचना होगा। कम समय में अधिक लाभ का मतलब ही धोखा है। पूर्व में ऐसे एक झांसे में फंसने के बाद अब कोई फोन भी आता है और  ज्यादा देने का नाम भी लेता है तो पूर्व के अनुभव से सबक लेकर साफ इनकार कर देती हूं। सभी को ऐसा ही करना होगा तभी बचा जा सकता है। <br /><strong>-सोनल विजयवर्गीय, एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>रजिस्टर्ड संस्थाओं में करें निवेश</strong><br />संस्थाओं में निवेश से पहले यह तय करे कि संस्था की प्रत्येक वर्ष वार्षिक साधारण सभा हो रही है या नहीं।  हर साल संस्था आडिट करा रही है या नहीं संस्था लाभांश का वितरण कर रही है या नहीं यह जानकारी करने के बाद ही निवेश करना चाहिए। संस्था का विधान के अनुसार चुनाव हो रहा है या नहीं इसकी जानकारी रखनी चाहिए। साधारण सभा में जाना चाहिए। पंजीकृत कार्यालय में जाकर संस्था की जानकारी लेने के बाद ही निवेश करना चाहिए। निवेशक को सक्रिय व जागरूक होकर ही निवेश करना चाहिए।<br /><strong>-रामगोपाल शर्मा,सहकार विद रिटायर्ड आॅफिसर कॉपरेटिव डिपार्टमेंट </strong></p>
<p><strong>कम समय में रकम दोगुना करने वाली संस्थाओं से बचें</strong><br />लोग लालच में कम समय में रकम दोगुना होने के लालच में बिना संस्था की जानकारी के निवेश कर देते हैं। निवेशक हमेशा फायदा ही देखता है। कंपनी के पेपर वर्क पर ध्यान नहीं देता । कंपनी के नियम और शर्त को ठीक से अध्ययन करकर निवेश करें तो ऐसे फ्रॉड से बच सकता है। सीबी से रजिस्टर्ड संस्थाओं में ही निवेश करना चाहिए।  किसी भी कंपनी में निवेश कराने वाले अपने नजदीक वाले रिश्तेदार और परिवार के सदस्य ही होते  है। उन पर भरोसा करके लोग आंख मूंद कर निवेश कर देते है। कंपनी की वास्तविक स्थिति की कोई पड़ताल नहीं करता है। सारा खेल भरोसे का है। <br /><strong>-सुशील जांगिड़, नौकरीपैशा पीड़ित</strong></p>
<p><strong>शुरू में रिटर्न दिया, बाद में धोखा</strong><br />साथी के कहने पर अपेक्षा ग्रुप में लाखों रुपए निवेश किए। उसके द्वारा अच्छा रिटर्न मिलने का भरोसा दिलाया था। शुरुआत में अच्छा रिटर्न मिला भी। उसे देखते हुए स्वयं के अलावा अन्य रिश्तेदारों से भी इसमें निवेश कराया। मकान बनवाने की रकम अपेक्षा ग्रुप में निवेश कर दी। लेकिन बाद में जब राशि नहीं धोखा मिला तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसका केस भी चला लेकिन रकम नहीं मिली। हालत यह है कि अब मकान बनवाने के लिए लोन लेना पड़ा। इसलिए किसी भी जगह बड़ी रकम को निवेश करने से पहले उसके बारे में पूरी जांच पड़ताल करना बहुत जरूरी है। साथ ही अधिक लाभ के लालच से बचना होगा। <br /><strong>- संजीव साहनी व्यवसायी और पीड़ित</strong></p>
<p><strong>लोग फील गुड के नशे में चलते हैं</strong><br />लोग कम समय में ज्यादा आय के चक्कर में कंपनी की प्रारंभिक जानकारियों तक नजर अंदाज कर जाते हैं। कंपनी की सकारात्मक चीजों को ही एजेंट द्वारा उनको दिखाई जाती है। निवेशक नकारात्मकता छोड़ देता है। जिससे वो ऐसी धोखाधडी में फंसता है। निवेशक हमेशा फील गुड के नशे में चलता है। डोमामिन केमिकल उसको सभी अच्छा ही महसूस करता है। जिससे वो उसके नकारात्मक पहलुओं को गौण कर जाता है। निवेश का नशा अफीम के नशे जैसा होता है जिसमें स्वयं तो फंसता दूसरे को भी फंसाता है। व्यक्ति को अपनी भावनाओं और लालच पर रेड फ्लेग लगाना होगा। तभी वो अवसाद से बच सकेगा । <br /><strong>-डॉ. दीपक गुप्ता मनोचिकित्सक </strong></p>
<p><strong>कंपनी दोषी नहीं, सिस्टम में खामियों से लोगों का पैसा डूबा </strong><br />कंपनी हमेशा निवेश का पैसा देती है। लेकिन सरकारी सिस्टम कंपनियों पर ऐसे नियम लगाकर उनको बंद कर देते हंै। उनकी संपत्ति जब्त कर लेते हैं उसके बाद निवेशकों को उनका पैसा नहीं लौटाते है। पल्स ग्रीन में जमीन में इन्वेस्ट किया लेकिन सरकार ने कंपनी सीज कर दी। उसकी पूूंजी ले ली लेकिन निवेशकों को लौटाई नहीं । ऐसे में सबसे ज्यादा परेशानी एजेंट को होती है। वो ही निवेशक के सीधे संपर्क में होता है। आमजन कंपनी पर नहीं एजेंट पर भरोसा कर निवेश करता है। कंपनी बंद हो जाती तो मरण एजेंट का होता है। सरकार कंपनी को बंद करती तो निवेशकों को पैसे समय पर लौटाने चाहिए। सहारा, पल्स ग्रीन, आदर्श कॉपरेटिव संस्थाओं ने लोगों के अभी तक पैसे वापस नहीं किए हंै। <br /><strong>-रघुराज सिंह प्राइवेट सहायक व पीड़ित</strong></p>
<p><strong>लालच पर लगाएं लगाम, कम मिले पर बेहतर मिले</strong><br />लोगों को अपने लालच पर लगाम लगानी होगी। लेकिन लोगों की मजबूरी है उन्हें अपनी जरुरतों के लिए कहीं ना कहीं तो निवेश करना ही होता हैं। बेटी की शादी, बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए कुछ जमा करना अच्छी बात है लेकिन अपनी जमा पूंजी को अधिक फायदे के चक्कर में गलत हाथों में देने से बचना चाहिए। इसके लिए पूरी पड़ताल करने के बाद ही निवेश करना चाहिए। चिटफंड कंपनियां हमेशा आपके भावनाओं के साथ खेलती है और आपको ज्यादा का लालच देकर निवेश कराती है इससे बचना चाहिए। हमें छोटी छोटी बचत को अलग अलग कंपनियों में निवेश करना चाहिए। बैंक कम फायदा देता लेकिन पैसा डूबने का जोखिम अन्य कंपनियों की अपेक्षा कम होता है। <br /><strong>-सविता यादव</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sat, 22 Mar 2025 15:08:57 +0530</pubDate>
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                <title>परिचर्चा : नशा मुक्ति के लिए जरूरी है सामूहिक प्रयासों की चोट, नशे की हो रही होम डिलिवरी </title>
                                    <description><![CDATA[ समाज के विभिन्न मुद्दों पर आयोजित परिचर्चा की श्रंखला में शुक्रवार को ड्रग्स के समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर दैनिक नवज्योति कार्यालय में मासिक परिचर्चा का आयोजन किया गया
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/discussion--collective-efforts-are-necessary-for-de-addiction/article-105137"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer90.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। समाज के विभिन्न मुद्दों पर आयोजित परिचर्चा की श्रंखला में शुक्रवार को ड्रग्स के समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर दैनिक नवज्योति कार्यालय में मासिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में ड्रग्स के उत्पादन, सप्लाई, डिमांड, तस्करी, मादक पदार्थों की अवेलिबिलिटी, रोकने के इंतजाम के साथ समाज पर पड़ रहे प्रभाव पर चर्चा की गई। परिचर्चा का विषय था ड्रग्स आर लाइक टरमाइट्स विच ईट्स द बॉडी था। इस परिचर्चा में सेन्ट्र ब्यूरो आॅफ नारकोटिक्स के डिप्टी कमिश्नर, एडिश्नल एपपी, विभिन्न एनजीओ के सदस्य,साइकेटिस्ट, समाज शास्त्री, प्रोफेसर ,ब्रह्मा कुमारी की बहनें, किसान नेता सहित कुछ ऐसे लोगों को भी आमंत्रित किया गया था जो स्वयं ड्रग्स के दलदल में फंस चुके थे। परिचर्चा के दौरान सभी विषय विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी । प्रस्तुत हैं उसके अंश </p>
<p><strong>नशे की हो रही होम डिलिवरी </strong><br />कोटा शहर को यदि नशे से मुक्त कराना है तो रुट्स को पहचानना और उसे तोड़ना होगा, जो प्रतिबंधित नशा सामग्री है, वह ब्लैक से बिक रही है। ऐसे में सप्लाई चैन को खत्म करना जरूरी है। हालात यह है, नाबालिगों से न केवल नशा बिकवाया जा रहा है बल्कि होम डिलिवरी भी करवाई जा रही है। ऐसे में जनजागरण को साथ लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। <br /><strong>- कुलदीप अडसेला,सचिव परिवर्तन सेवा संस्थान नशा मुक्ति केंद्र कुन्हाड़ी</strong></p>
<p><strong>5 साल के अथक प्रयास से छूटा नशा</strong><br />सन 1984-85 में तिनका-तिनका जोड़कर मकान बनाया था।  वर्ष 1986  में बाढ़ आई तो मकान ढह गया। जिससे मैं तनाव में रहने लगा। काम-घंधे भी छूट गए। इसी दौरान साथियों के साथ पहली बार स्मैक पी तो कुछ समय के लिए अपने गम भूल गया। फिर स्मैक की लत लग गई। फिर इंजेक्शन लगाने लगा। लेकिन यह नशा महंगा होने के कारण इंजेक्शन वाला नशा करने लगा। बाद में कुछ लोगों की मदद से नशा मुक्ति केंद्र पहुंचा, जहां पांच साल इलाज चला और अथक प्रयासों से आज नशे की गिरफ्त से आजाद हो सका।<br /><strong>- सत्यनारायण, नशा पीड़ित</strong></p>
<p><strong>नशे का कारोबार जड़ से खत्म करने की जरूरत</strong><br />गांजा कॉमन हो चुका है, कोई कॉलेज ऐसा नहीं बचा, जहां गांजे का सेवन नहीं होता हो। अफीम के बाद स्मैक का नशा तेजी से बढ़ रहा है। हालात यह है कि कोई स्मैक के नशे में पड़ जाता है तो फिर उसे छोड़ नहीं पाता। इस समय सबसे ज्यादा नशे का रेशो स्मैक का आ रहा है। घर-परिवार बर्बाद हो जाता है। नशे की ग्रोथ तेजी से बढ़ रही है, जिसे खासकर किशोरावस्था से युवाअवस्था तक नशे की गिरफ्त में हैं, जिन्हें बचाने के लिए नशे के कारोबार को जड़ से खत्म करने की जरूरत है।  <br /><strong>- रजनीश मेहरा, ड्रग्स डिएडिक्शन साइक्लोजिस्ट</strong></p>
<p><strong>नशा मुक्त  कोटा अगला लक्ष्य</strong><br />चित्तौड़ व नीमच के अलावा अब कोटा में नॉर्थ ईस्ट से भी  बड़ी मात्रा में नशा कोटा में आ रहा है। इसमें सभी अधिक घातक एमडी अर्थात सिंथेटिक नशा है। नारकोटिक्स विभाग ने आॅपरेशन युवा रक्षा नशा मुक्त नाम से अभियान शुरु किया है। इस अभियान के तहत विभाग का लक्ष्य है कि कोटा को नशा मुक्त बनाया जाए। विभाग द्वारा नशा उत्पादन से सप्लायर व उपभोग करने वालों तक की चैन को तोड़ने की दिशा में कार्रवाई की जा रही है। कुछ संस्थाएं नशा छुड़ाने के नाम पर अवैध रूप से दवाओं का सेवन करवा रहे हैं। जबकि वह दवा भी बिना अधिकृत डॉक्टर की सलाह से ही दी जा सकती है। सप्लाई के साथ ही नशे की डिमांड को भी कम करने की जरूरत है। <br /><strong>- नरेश बुंदेल, उप नारकोटिक्स आयुक्त केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो </strong></p>
<p><strong>प्रोडक्शन व सप्लाई चैन तोड़ने की जरूरत </strong><br />नशे का कारोबार को जड़ से उखाड़ने फैंकने के लिए प्रोडक्शन, सप्लाई चैन और इनकम सोर्स को खत्म करने की जरूरत है। नशा प्रोडक्शन केंद्र  झालावाड़, चित्तौड़ व मध्यप्रदेश के कुछ जगहों पर है। गांजा हिमाचल व उड़िसा से आ रहा है। ऐसे में हमें नशे का प्रोडक्शन खत्म करना होगा। इसी तरह नशा जिन रुट्स से आता है, वहां बड़ा सिंडिकेट काम करता है। माल स्टोर करने वाला, सप्लाई करने वाला, बेचने वाला सब अलग-अलग होते हैं, यही सप्लाई चैन है, जिसे नष्ट करने की जरूरत है। साथ ही पैसे से संबंधित जो क्राइम है, यदि उसे अन इकोनोमिक बना दिया जाए तो नशे का कारोबार खत्म किया जा सकता है।  हमने पिछले साल वर्ष 2024 में 156 मुकदमें दर्ज किए हैं, जबकि वर्ष 2025 की जनवरी-फरवरी के डेढ़ माह में ही 66 केस दर्ज किए हैं। वहीं, पहले 223 लोगों को गिरफ्तार किया और अब 74 लोगों को पकड़ चुके हैं। इसके अलावा गाड़ियां भी जब्त की है।  <br /><strong>- दिलीप कुमार सैनी, एडिशन एसपी कोटा शहर</strong></p>
<p><strong>नशा करना स्टेटस सिम्बल बन गया</strong><br />नशा करने के कई कारण हो सकते है। सबसे बडणा कारण अकेलापन होता है। शुरुआत में नशा अच्छा लग सकता है लेकिन यह खतरनाक होता है। नशा कराने वाले पहले इसे फ्री में देते हैं बाद में इसकी लत पड़ जाने पर व्यक्ति खुद उसे तलाशता हुआ चला जाता है। कई लोगों के लिए नशा स्टेटस सिम्बल बन गया है। जबकि नशे के कारोबार को रोकने के लिए सभी को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है।  <br /><strong>- डॉ. अशोक कुमार गुप्ता, सेवानिवृत्त प्राचार्य राजकीय कला कन्या महाविद्यालय</strong></p>
<p><strong> कॉलेज-विवि में बच्चों के ऊपर नियुक्त हो मेंटर</strong></p>
<p>नशे की दुनिया में प्रवेश करने वाले को उचित मार्गदर्शन एवं उनके प्रति सहानुभूति पूर्ण व्यवहार का अभाव मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसके लिए परिवार का खुशनुमा माहौल के साथ विद्यालयों, महाविद्यालयों  एवं विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के समूह बनाकर उनके लिए शिक्षकों को मेंटर नियुक्त किया जाए ताकि निरंतर संवाद द्वारा उचित मार्गदर्शन से उन्हें सही रास्ता दिखाया जा सके। ड्रग्स की तस्करी और अवैध व्यापार पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। नशीली दवाओं की बिक्री और सेवन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाए ।<br /><strong>- डॉ.मीनू माहेश्वरी, विभागाध्यक्ष कोटा यूनिवर्सिटी </strong></p>
<p><strong>नशे की जरूरत क्यों, समाधान खोजने की जरूरत</strong><br />युवाओं को नशे की जरूरत क्यों पड़ रही है, वह नशे की हालत में क्यों आया है,इसके कारणों को खोज समाधान निकालने की जरूरत है। व्यक्ति जन्म से नशे में नहीं आता, उसे हालात व परिस्थितियां उसे नशे में लाते हैं। जब हमने नशे में गिरफ्त लोगों से बात की तो सामने आया कि अपने गम भुलाने को वह नशे में खुशी ढूंढ रहे हैं। ऐसे में अपने आसपास का माहौल खुशनुमा बनाए। कोई व्यक्ति नशा करे तो उसे अपने बच्चों की तरफ देखना चाहिए, उनका ख्याल आएगा तो वह नशे से दूर होगा। <br /><strong>- बीके आरती, बह्माकुमारी </strong></p>
<p><strong>घर के पुरूष सदस्यों से डरने लगी महिलाएं</strong><br />कोटा की 97 कच्ची बस्तियों में 1.68 लाख परिवार रहते हैं, जब इन बस्तियों में महिलाओं के बीच जाती हूं तो पहले तो वह अपनी बात नहीं बताती थी लेकिन अब नशे के बढ़ते प्रभाव के कारण इतना चैंजेज आया कि जिन घरों में दो या तीन बेटियां हैं, उन्हें महिलाएं अकेली छोड़कर नहीं जाती। काम पर जाती हैं तो बेटियों को साथ लेकर जाती है। हालात यह हो गए कि घर में रहने वाले पिता, भाई, पति सहित अन्य पुरूष सदस्यों से महिलाओं को डर लगने लगा है, जो बड़ा चिंता का विषय है। पहले पुरूष नशा करते थे, अब महिलाएं भी सीख गई, यह क्यों हुआ, इसकी तह में जाकर समाधान खोजने की जरूरत है।  <br /><strong>- हेमलता गांधी,सोशल डवलपमेंट मैनेजर  नगर निगम कोटा</strong></p>
<p><strong>देखादेखी से नशे की चंगुल में फंस रहे किशोर</strong><br />नशे की समस्या किशोरावस्था से शुरू होती है। किशोर जब अपने घर-परिवार में पिता या अन्य सदस्य को सिगरेट, शराब पीते देखते हैं तो उनमें जिज्ञासा जाग उठती है कि इसे पीने से क्या होता है। जब वह घर से बाहर दोस्तों के बीच पहुंचता है तो वह सिगरेट, शराब या अन्य नशा करता है और शोक पूरा करते करते कब नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं, उन्हें भी पता नहीं चल पाता। शिक्षण संस्थाओं में गांजा, सिगरेट पीना आम बात हो गई। क्योंकि, यह आसानी से मिल जाता है। <br /><strong>- दीपक सिंह, सचिव, सुशीला देवी चेरिटेबल सोसायटी</strong></p>
<p><strong>बचपन में ही नशे की नुकसान बताने की जरूरत</strong><br />जन्म लेने से दस साल तक के बच्चे के दिमाग में जो बात डाली जाएगी उसका उसके पूरे जीवन पर असर पड़ता है। यदि इसी उम्र में  उसकी मां यदि समझाएगी तो बच्चा जिंदगी में कभीउस तरफ नहीं जाएगा। जबकि नशा करने वालों को सुधारना बहुत मुश्किल है। बरसों से प्रयास करने के बाद भी उतनी सफलता नहीं मिली जितनी अपेक्षा की जा रही थी। जितनों का नशा छुड़ाया जाता है उससे अधिक नए लोग नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। <br /><strong>- डॉ. आर.सी. साहनी चेयरमेन संवेदना सेवा रिसर्च समिति</strong></p>
<p><strong>अफीम की अनाधिकृत सप्लाई को रोकना होगा</strong><br />अफीम की खेती सरकार द्वारा अधिकृत पट्टे जारी करने पर किसान ही करते हैं। लेकिन किसानों से ही अफीम सरकार के अलावा अनाधिकृत रूप से बाजार में बेची जा रही है। जिससे उत्पादन केन्द्रों पर उसका उपयोग नशा बनाकर बाजार में सप्लाई करने के रूप में किया जा रहा है। सबसे अधिक भवानीमंडी में अनाधिकृत उतपदन केन्द्र संचालित हो रहे है। नारकोटिक्स विभाग को किसानों से समंवय स्थापित करके किसानों को अचछे दाम दिलाने का प्रयास करना चाहिए जिससे इसे बाजार में अनाधिकृत रूप से जाने से रोका जा सके। <br /><strong>- दुलीचंद बोरदा, जिला अध्यक्ष भारतीय किसान सभा</strong></p>
<p><strong>गायत्री परिवार नशा मुक्ति  को प्रतिबद्ध</strong><br />ड्रग्स की तस्करी और अवैध व्यापार पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। नशीली दवाओं की बिक्री और सेवन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाए। नशे की समस्या किशोरावस्था से शुरू होती है।  किशोर जब अपने घर-परिवार में पिता या अन्य सदस्य को सिगरेट, शराब पीते देखते हैं तो उनमें जिज्ञासा जाग उठती है कि इसे पीने से क्या होता है। गायत्री परिवार नशा छुड़ाने को लगातार कायर्च करता रहता है। अधिकतर युवा इसमें ही खुशी तलाशने लगते है। डॉक्टर हमेशा नशे के खिलाफ जंग में सहयोग करने को तैयार है। कई लोगों को नशा मुक्त कराया है। -हेमराज पांचाल गायत्री परिवार<br /><strong>- तनाव कम करने के लिए नशे का सेवन</strong></p>
<p>नशा कुछ पल के लिए व्यक्ति को सुकून दे सकता है। लेकिन यह बाद में जीवन बर्बाद कर देता है। विशेष रूप से युवा पढ़ाई के तनाव को कम करने के  लिए घर वालों से छिपकर नशा करने लगते है। शुरुआत में नशा करने से खुशी मिलती है तो अधिकतर युवा इसमें ही खुशी तलाशने लगते है। डॉक्टर हमेशा नशे के खिलाफ जंग में सहयोग करने को तैयार है। कई लोगों को नशा मुक्त कराया है। नशा मुक्ति केन्द्रों में जो दवाईयां दी जाती है। वह बिना डॉक्टर की सलाह से और निर्धारित मात्रा में दी जाती है। जिसे बाद में कम कर दिया जाता है। <br /><strong>- डॉ. मिथलेश खींची, असि. प्रोफेसर मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>आमजन को निभानी होगी जिम्मेदारी</strong><br />नारकोटिक्स विभाग तो अपने स्तर पर नशे की सप्लाई करने वालों पर कार्रवाई कर रहा है। बड़ी मात्रा में दूसरे प्रदेशों से आने वाली नशे की खैप को कोटा में भी पकड़ा है। लेकिन यदि आमजन भी अपनी जिम्मेदारी निभाए और विभाग को नशे से संबंधित सूचना दे तो उनकी सूचना को गुप्त रखकर कार्रवाई की जा सकती है। सामूहिक प्रयासों से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। <br /><strong>- अरविंद सक्सेना, अधीक्षक केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो</strong></p>
<p><strong>दृड़Þ इच्छा शक्ति से छोड़ा नशा</strong><br />प्रकाश कुमार,मोहित दाधीच व मनोज गौतम ने बताया कि वे पहले नशे की गिरफ्त में जकड़ चुके थे। लेकिन अब उन्होंने इसे छोड़ दिया है। नशा छोड़ चुके इन लोगों ने बताया कि किसी को जेल में तो किसी को दोस्तों से नशे की लत लगी थी। नशा करने से उन्हें अच्छा महसूस होता था। पहले नशे के बिना नींद नहीं आती थी। शरीर के साथ-साथ पैसे का भी नुकसान हुआ। कई बार नशा मुक्ति केन्द्र में गए वहां दवाई भी ली लेकिन फिर भी फर्क नहीं पड़ा। बाद में नशा मुक्ति केन्द्र में जाकर वहां नशा छोड़ने की दृढ़ इच्छा शक्ति की।  पहले जहां दवाई अधिक लेते थे और नीनद कम आती थी। उसके बाद धीरे-धीरे दवाई भी कम कर दी। अब बिना दवाई के नींद भी अच्छी आती है और जीवन खुशहाल है। नशा छोड़ने वालों ने बताया कि अब वे नौकरी कर खुशहाल जीवन जी रहे है। साथ ही अन्य लोगों को भी इससे दूर रहने की सलाह दे रहे है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Feb 2025 16:30:38 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदूषण के कारकों पर चर्चा, प्रदूषण ले रहा प्रतिवर्ष 23 लाख की जान</title>
                                    <description><![CDATA[अधिकांश मौत के पीछे छिपा प्रदूषण, 70 फीसदी बीमारियों का संवाहक।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/pollution-is-taking-23-lakh-lives-every-year/article-101661"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/untitled-design-(1).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति के कोटा कार्यालय में प्रतिमाह आयोजित होने वाली परिचर्चा की श्रंखला के तहत मंगलवार को प्रदूषण के कारकों पर चर्चा की गई। पॉल्यूशन केन बी डेंजरस फॉर एक्जीसटेन्स ऑफ लिविंग बीइंग विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में 17 विषय विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इनमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निगम,श्वांस रोग विशेषज्ञ, पर्यावरण विद, इंटेक के कन्वीनर,पर्यावरण संरक्षण कार्य में जुटी संस्थाएं, नदी संरक्षण से जुड़े सदस्य,बायो वेस्ट मैनेजमेंट, परिवहन विभाग, राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर,इनवायरमेंट साइंस,वनस्पति,जमीन,अर्थात जल, थल और नभ के प्रदूषण से बन रहे हालातों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की और यह माना कि प्रदूषण को रोकना केवल सरकार के भरोसे नहीं हो सकता। इसकी भयावहता को लोग समझ नहीं रहे हैं। अब जागरुकता नहीं अपितु सख्ती से प्रदूषण नियंत्रण करवाने की जरूरत है अन्यता हालात खतरनाक स्थर पर पहुंच जाएंगे। आने वाली पीढ़ियां इस समस्या के कारण बन रही स्थिति का सामना तक नहीं कर पाएंगी।  प्रस्तुत है परिचर्चा के मुख्य अंश:-</p>
<p><strong>पूरे देश में सीओपीडी बीमारी में राजस्थान अव्वल</strong><br />एक-एक महीने तक खांसी ठीक नहीं होती,क्योंकि यह एलर्जी में तब्दील हो गई। जिसका मुख्य कारण पॉल्यूशन इम्पैक्ट है। कोहरे के कारण प्रदूषण के कण वायुमंडल में नहीं जा पाते और हवा में ही रहते हैं, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं जो बीमारियों का कारण बनता है। धुएं में अनगिनत कैमिकल्स होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में जाने से दमा, अस्थमा, एलर्जी, खांसी, आंखों में जलन, दिमाग, गुर्दे, फेफड़े के कैंसर, सांस का अटैक व दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा रहता है। हालांकि, दमा बीड़ी पीने से होता है लेकिन यह रोग उन लोगों को भी होता है जो बीड़ी नहीं पीते। यह बीमारी मुख्यत: पॉल्यूशन से होती है। पूरी दुनिया में सीओपीडी बीमारी में इंडिया टॉप पर है और भारत में राजस्थान अव्वल है। इस बीमारी के मरीज पूरी दुनिया के कई देशों के मुकाबले राजस्थान में सबसे ज्यादा हैं।  मुख्य कारण 70% पॉल्यूशन है। हर साल  23 लाख मौत वायु प्रदूषण से होती है। सीओपीडी बीमारी फेफड़ों को हमेशा के लिए डेमेज कर सकती है।  <strong>- डॉ. राजेंद्र ताखर, श्वांस रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>प्रदूषण नियंत्रण सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं</strong><br />पॉल्यूशन कंट्रोल नियमों की पालना के लिए जो संसाधनों की आवश्यकता होती है वो पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को सरकार उपलब्ध नहीं करवा रही। पर्यावरण विभाग को विकास में व्यवधान मानते हुए पर्यावरण कानून व नियमों को दिन-प्रतिदिन कमजोर करने पर तुली है। जिसके उदारहण शहरभर में देखने को मिल रहे हैं। चंबल नदी में गिरते सीवरेज, चंद्रलोही व नालों में इंडस्ट्री का कैमिकलयुक्त  वाटर गिर रहा है। सरकार पम्प स्टोरेज प्रोजेक्ट लगाकर प्रदेशभर में 4 हजार हैक्टेयर वनभूमि में फैला जंगल को तबाह करने पर तुली है। बरसों पुराना जंगल खत्म होने से इंसान ही नहीं जानवरों व पक्षियों का अस्तित्व भी संकट में आ जाएगा।<br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p><strong>पॉल्यूशन के खिलाफ सख्ती की जरूरत</strong><br />शहर का सीवरेज बिना ट्रीटमेंट के चंबल में गिर रहा है। जिससे चंबल नदी व घड़ियाल सेंचूरी प्रदूषित हो रही है। जल प्रदूषण रोकने की दिशा में प्रभावी पहल नहीं हो पा रही, क्योंकि आम आदमी इससे कनेक्ट नहीं हो रहा। जबकि, इसे जनजागरण आंदोलन बनाकर लोगों को जागरूक करना चाहिए कि पॉल्यूशन किस तरह से हमारा जीवन बर्बाद कर रहा है। जब लोग जागरूक होंगे तो सरकारी मशीनरी प्रदूषण कंट्रोल करने को प्रभावी कदम उठाने को मज् ाबूर होगी। यह प्रयास स्वस्थ समाज के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। <br /><strong>- डॉ. अमित व्यास, संयोजक चिकित्सा प्रकोष्ठ भाजपा, पूर्व अध्यक्ष आईएमए</strong></p>
<p><strong>जल-मिट्टी प्रदूषण ज्यादा घातक</strong><br />प्रदूषण का मुख्य कारण वाहनों व इंडस्ट्रीज से निकलने वाला धुआं है। अन्य कारक भी जीवन के लिए उतने ही घातक है, जितना वायु प्रदूषण। पानी और मिट्टी का पॉल्यूशन हमारी खाद्य शृंखला में शामिल हो जाते हैं, जो भोजन के रूप में शरीर में जाते हैं और कैंसर तक की बीमारियों का खतरा उत्पन्न हो जाता है। पानी के जरिए पॉल्यूशन पॉटिकल्स मिट्टी में आते हैं और फसलों के द्वारा हमारे खाद्य पदार्थ में आ जाते हैं। वायु प्रदूषण तो दिखाई देता है लेकिन जल व मिट्टी का पॉलयूशन दिखाई नहीं देता। जबकि, यह प्रदूषण शरीर के लिए ज्यादा घातक होता है। वहीं, रेडिएशन भी शरीर को कई तरह से बीमारियों के जाल में जकड़ता है। इनसे बचाव के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। <br /><strong>- पूनम जायसवाल, प्रोफेसर बोटनी, जेडीबी साइंस कॉलेज</strong></p>
<p><strong>वाहनों से सबसे अधिक प्रदूषण</strong><br />कोटा समेत प्रदेश के बड़े शहरों  में आईआईटी जोधपुर की टीम ने प्रदूषण को लेकर सर्वे किया था। जिसमें यह बात सामने आई कि कोटा में  सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाहनों से हो रहा है। वैसे यहां उद्योगों से भी प्रदूषण तो हो रहा है लेकिन वह इतना अधिक नहीं है। ऐसे में सड़कों पर दौड़ रहे पुराने वाहनों पर रोक लगाने की जरूरत है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर कार्रवाई करता रहता है। <br /><strong>- डॉ. रिंकु सिंघल, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p><strong>अस्पताल में रखे 4 रंग के वेस्ट डस्टबिन के प्रति जागरूक करना चाहिए</strong><br />अस्पताल में 4 रंग के अलग-अलग डस्टबिन रखे होते हैं, जिसमें काले रंग का डस्टबिन जनरल वेस्ट के लिए होता है और शेष नीला, पीला और सफेद रंग का डस्टबिन मेडिकल बायोवेस्ट के लिए होता है। यह बात लोगों को पता होनी चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। अक्सर जानकारी के अभाव में तीमारदार मरीज की मरहम पट्टी, दवा, इंजेक्शन, स्केल्टर को जनरल वेस्ट के डस्टबिन में पटक देते हैं। यह वेस्ट नगर निगम के डम्पिंग यार्ड में जाता है। जहां संक्रमण का खतरा  बना रहता है। मेडिकल बायोवेस्ट के निस्तारण के लिए निर्धारित तापमान में जलाया जाता है, इसका प्लांट झालावाड़ में है। वहीं, अस्पतालों से निकलने वाला वाटर वेस्ट को ईपीपी व एसटीपी द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने की आवश्यकता है। अब मेडिकल कॉलेज में एसटीपी का निर्माण हो चुका है। <br /><strong>- डॉ. प्रवीण कुमार, नोडल आॅफियर बायो मेडिकल वेस्ट </strong></p>
<p><strong>मौत का प्रतिशत बढ़ा रहा प्रदूषण </strong><br />चार बड़े विश्वविद्यालयों की टीम ने रिसर्च किया है। जिसमें सामने आया कि देश  में पीएम 2.5 सबसे अधिक खतरनाक स्थिति है।  देश में हर साल करीब 23 लाख लोगों की मौत हो रही है। जिसमें पीएम 2.5 के कारण मृत्यु दर 5 फीसदी बढ़ जाती है। वायु प्रदूषण का इतना अधिक खतरनाक असर होता है कि नॉन स्माकर भी रोजाना सामान्य तौर पर 3 से 4 सिगरेट का धुंआ रोजाना अपने शरीर में ले रहे है। प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर यह  मात्रा दोगुनी तक हो जाती है। शहर में सबसे अधिक प्रदूषण चौराहों पर है। प्रदूषण के कारण कई तरह की बीमारियां लोगों में हो रही है। जिसके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। <br /><strong>- डॉ. केवल कृष्ण डंग श्वांस व अस्थमा रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़े चलन</strong><br />15 साल से अधिक पुराने वाहनों से अधिक वायु प्रदूषण होता है। इस कारण से उन वाहनों को हटाया जा रहा है। आने वाले समय में अधिकतर इलेक्ट्रिक वाहनों का ही उपयोग अधिक होगा। परिवहन विभाग के पास प्रदूषण फेलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई के लिए 18 स् कवायर्ड वैन है। लेकिन उनमें स्टॉफ की कमी है। इसकी टीम को अन्य स्थानों पर काम में लेने से पूरी तरह से कार्रवाई नहीं  हो पाती।  <br /><strong>- राजीव त्यागी, अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी कोटा </strong></p>
<p><strong>हार्ट अटैक व स्ट्रॉक का कारण प्रदूषण</strong><br />वायु प्रदूषण मनुष्य के  लिए सबसे अधिक खतरनाक है। चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक का सिपाही इससे सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। प्रदूषण के कारण केवल  अस्थमा  रोग ही नहीं होता। यह जन्म लेने वाले बच्चे से लेकर युवा तक को प्रभावित कर रहा है। इन दिनों जो हष्ट पुष्ट  व सैर करने वाले लोगों की अचानक मौत हो रही है। इसमें हार्ट अटैक व स्ट्रॉक का सबसे बड़ा कारण प्रदूषण है। इसे रोकने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक उपयोग हो। साथ ही पार्किंग स्थानों पर उनके चार्जिंग पॉइंट दिए जाएं। <br /><strong>- डॉ. सुधीर गुप्ता, नेत्र विशेषज्ञ, संयोजक हम लोग</strong></p>
<p><strong>एंटी स्मॉग गन का नियमित संचालन</strong><br />वायु प्रदूषण के कारण धूल के करण हवा में रहकर लोगों को प्रभावित करते है। इसके लिए नगर निगम के माध्यम से सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों व चौराहों पर एंटी स्मॉग गन से पानी का छिड़काव किया जा रहा है।जिससे धूल के कण नीचे बैठने से धीरे तौर पर लोगों  पर असर नहींडाल रहे। वहीं आने वाले समय मे‘कोटा में निगम के माध्यम से 100 इलेक्ट्रिक बसें आने वाली है। जिससे शहर के प्रदूषण स्तर को कम करने में मदद मिलेगी।  <br /><strong>- दीपक मेहरा, पर्यावरण विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>थर्मल को बंद करना होगा</strong><br />शहर में सबसे अधिक प्रदूषण थर्मल के कारण हो रहा है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए इसे बंद किया जाना चाहिए। जब कई बड़े शहरों में थर्मल बंद किए जा सकते है तो यहां क्योंनहीं हो सकता। इसकी इकाइयों को बार-बार बंद भी तो किया जाता है। इसके स्थान पर सौर ऊर्जा का अधिक उपयोग हो। शहरों  में ग्रीन एनर्जी का अधिक उपयोग होगा तो प्रदूषण पर कंट्रोल किया जा सकता है। वाहन इलेक्ट्रिक हों और हर पार्किंग में इसके चार्जिंग स्टेशन व पाइंट बनाए जाएं। चार्जिंग के हिसाब से उनका यूपीआई से चार्ज लिया जाएगा तो प्रदूषण पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। <br /><strong>- राजू गुप्ता, सेवानिवृत्त सीईओ</strong></p>
<p><strong>जागरूकता की जरुरत</strong><br />शहर में बढ़ता प्रदूषण सभी के लिए खतरनाक है। प्रदूषण से होने वाले नुकसान के बारे में जानते तो सभी है लेकिन लोगों में उससे बचने के प्रति जागरूकता की कमी है। लोग प्रदूषण की भयावयता को समझ नहीं पा रहे है। जागरूक होंगे तो प्रदूषण को रोकने व कम करने में सहयोग करेंगे।  <br /><strong>- डॉ. अभि गर्ग, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p><strong>पुरानी इमारतें व मॉन्यूमेंट भी प्रभावित</strong><br />शहर में प्रदूषण का कारण थर्मल है। इसे बंद किया जाना चाहिए। साथ ही इससे निकलने वाले फ्लाईएश और भी अधिक खतरनाक है। फ्लाई एश को जोराबाई तालाब में भर दिया। जिससे वहां पक्षियों का आना बंद हो गया है। मछलियों के मरने से उनकी संख्या भी कम हो गई है।  वायु प्रदूषण न केवल प्राणियों को प्रभावित कर रहा है वरन् इससे पुरानी इमारतें व मॉन्यूमेंट तक प्रदूषित हो रहे है। जिससे 500 साल तक टिकने वाली इमारतें 100 साल भी नहीं टिक रही है। उनका रंग फीका हो रहा है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। <br /><strong>- नखिलेश सेठी, संयोजक, इनटेक </strong></p>
<p><strong>कोयले की जगह गैस पर बने बिजली </strong><br />थर्मल पावर प्लांट कितना प्रदूषण कर रहा है, इसके आंकड़े सार्वजनिक कर पब्लिक को बताना चाहिए। दिखने में तो पॉल्यूशन ज्यादा नजर आता है लेकिन उसके मैजरमेंट क्या आ रहे हैं, इससे लोगों को पता लगेगा कि थर्मल से कितना पॉल्यूशन हो रहा है। इसके अलावा थर्मल की जो यूनिट पुरानी हो गई है, उसे गैस से कनेक्ट किया जाए। गैस की पाइप लाइन को बॉयलर से जोड़ा जाए तो बिजली बनाने के लिए कोयले की निर्भरता खत्म होगी और प्रदूषण भी नहीं होगा। इसके लिए सरकार बजट का प्रावधान करे। वहीं, सौलर को प्रमोट करने की आवश्यकता है। लेकिन समस्या यह है कि सौलर दिन में उपलब्ध होता है, रात को नहीं। ऐसे में सरकार बिजली की रेट  दिन में कम और रात को थोड़ी ज्यादा रख दे। इससे लोग सौलर की बिजली का उपयोग करने को प्रेरित हो सकेंगे। <br /><strong>- डॉ. आनंद चतुर्वेदी, प्रोफेसर मेकैनिकल हैड इंजीनियरिंग, आरटीयू</strong></p>
<p><strong>जीवन के लिए खतरा बन रही पॉलिथीन</strong><br />सिंगल यूज्ड पॉलिथीन के उपयोग पर सरकार ने बैन लगा रखा है, लेकिन बाजार में इसका असर नहीं दिखता। जबकि, पॉलिथीन जीवन के लिए  खतरा है। मिट्टी में फेंकी गई पॉलिथीन से मृदा में रहने वाले सुक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचाती है। क्योंकि, इसमें ऐसे रसायन होते हैं जो मिट्टी के कणों के भीतर पौधों व जीवों के लिए जहरीले हैं और  फसलों के द्वारा यह जहर हमारे फूड चैन में शामिल हो रहा है। वहीं, पानी को भी प्रदूषित कर रही है। जिससे जीवन चक्र गंभीर बीमारियों की जद में आ गया। इसे रोकने की शुरुआत हमें घर से ही करनी होगी। <br /><strong>- प्रियंका गुप्ता, फाउंडर एंड प्रेसीडेंट अभिलाषा क्लब </strong></p>
<p><strong>सुंदरता के नाम पर शहर में लग रहे एलर्जिक पौधे </strong><br />शहर में सुदंरता के नाम पर बाहर से लाई गई विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगा दिए गए। जिनमें कोनोकार्पस, लेंटाना, पार्थेनियम हिस्टेरोपफोरस, बबूल सहित कई प्लांट शामिल हैं, जो दिखने में जितने सुंदर हैं उतने ही दुष्परिणाम भी हैं। असल में यह प्लांट एलर्जिक है। वहीं, एयर पॉल्यूशन कंट्रोल करने में इनकी भूमिका नगण्य है। इनकी जगह पीपल, आंवला, बरगद, नीम, धौंक सहित नेचुरल उगने वाले पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाए जाना चाहिए, जो एयर पॉल्यूशन को कंट्रोल करने में कारगर होते हैं।  <br /><strong>- डॉ. मृदुला खंडेलवाल, एसोसिएट प्रोफेसर बोटनी, कोटा यूनिवर्सिटी</strong></p>
<p><strong>पौधे लगाने से पहले विशेषज्ञों की राय लेना आवश्यक</strong><br />हाड़ौती में पौधरोपण किया जाए तो नेगेटिव स्पीसीज की जगह इंडिजेन्स प्लांट ही लगाना चाहिए। एक्जोटिक प्लांट जैसे कोनोकार्पस, लेंटाना, बबूल सहित अन्य प्रजातियों के पौधे न लगाए जाए। इसके अलावा प्लांटेशन में ऐसे पौधे भी लगाए जाए, जिससे पक्षियों को भोजन  मिल सके। क्योंकि, ईको सिस्टम में पक्षियों का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वहीं, जब भी सामाजिक वानिकी की जाए तो विशेषज्ञों की सलाह जरूर लेनी चाहिए ताकि, पौधे लगाने के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। <br /><strong>- डॉ. पृथ्वीपाल सिंह सिरोहिया, वनौषधि विशेषज्ञ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jan 2025 15:33:49 +0530</pubDate>
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                <title>सोशल मीडिया बैन नहीं, कंट्रोल होना चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[मोबाइल यूज के लिए अभिभावक ही दोषी नहीं, समाज और व्यवस्था भी जिम्मेदार है। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/social-media-should-be-controlled--not-banned/article-98153"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/5554.mp4" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति की ओर से जारी मासिक परिचर्चा की श्रृंखला के तहत गुरुवार को शुड सोशल मीडिया बी बैन फॉर चिल्ड्रन्स (किशोरवय के बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो रहे सोशल मीडिया को क्या प्रतिबंधित किया जाना चाहिए) विषय पर आयोजित की गई। इस परिचर्चा में समाज शास्त्री, मनोचिकित्सक, बाल विज्ञानी, पीडियाट्रिशन एंड डवलपमेंट स्पेशलिस्ट, स्कूल प्रिंसीपल, सीनियर स्पीच फिजीयोलॉजिस्ट,पुलिस अधिकारी, स्कूल आॅनर,सहित किशोरवय के बच्चों ने हिस्सा लिया। दो घंटे चले परिचर्चा के  सत्र में  लोगों ने मुख्य रूप से कहा कि सोशल मीडिया को बैन किया जाना आज के हालात में संभव नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से इसका दुरूपयोग हो रहा है उससे हमारी आने वाली पीढ़ी पर दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं। ऐसे में पैरेन्टस के साथ स्कूल की यह जिम्मेदारी है कि वह सोशल मीडिया के दुषप्रभाव से बच्चे को बचाएं। इसके लिए पैरेन्ट्स को घर से शुरूआत करनी होगी। टीनेजर्स पैरेन्टस की बात नहीं मानते ऐसी स्थिति में स्कूल की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसके दूरुपयोग को रोकने का काम करें। इसे बैन तो नहीं किया जा सकता लेकिन इसका कंट्रोल किया जाना अति आवश्यक है। </p>
<p>- सोशल मीडिया विकासमुखी भी है और विनाशक  भी,संभल कर उपयोग करें।<br />- बच्चे को स्पोर्ट्स एक्टिविटी में बिजी करें। स्कूल कॉलेज में गैम्स कंपलसरी हो।<br />- सोशल मीडिया पर  एकाउंट बनाते समय उम्र वेरिफाई के लिए  आधार कार्ड जरूरी हो<br />- माता-पिता के साथ स्कूल टीचर भी बच्चे द्वारा उपयोग किए जा रहे गेजेट पर ध्यान दें।</p>
<p><strong>आॅनलाइन गेमिंग में अधिकतर बच्चे शामिल</strong><br />मोबाइल व सोशल मीडिया का उपयोग बच्चे पढ़ाई व ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही  अधिकतर आॅनलाइन गेमिंग में कर रहे है। आॅनलाइन गेमिंग  सबसे अधिक बच्चे खेल रहे है। उसमें बच्चों के परिजनों के बैंक खाते से रकम जा रही है। जिसके बाते में परिजनों को पता ही नहीं है। बाद में जब धोखाधड़ी होती है तब परिजनों की आंखें खुलती है। ऐसे में परिजनों को अपनी नजर में बच्चों को रखते हुए मोबाइल का सीमित उपयोग करने देना चाहिए। तब तो  बच्चे उसका सही उपयोग करेंगे। <br /><strong>- सतीश चंद चौधरी, सर्किल इंस्पैक्टर साइबर थाना कोटा</strong></p>
<p><strong>बच्चा गर्भ में ही मोबाइल सीख रहा</strong><br />बच्चे संसार में आने के बाद तो मोबाइल का उपयोग कर ही रहे है। हालत यह है कि अब तो बच्चे मांग के पेट में गर्भावस्था के दौरान ही मोबाइल सीख रहे है। मोबाइल व सोशल मीडिया का प्रभाव इतना अधिक हो गया है कि बच्चे सब कुछ इसी से सीख रहे है। परिजनों को चाहिए कि बच्चों के लिए मोबाइल का जितना उपयोग  हो उतना ही उन्हें करने दे। मोबाइल का अधिक उपयोग बच्चों के लिए नुकसान दायक है। बच्चे मोबाइल पर क्या कर रहे हैं इस बारे में अधिकतर परिजनों को तो पता ही नहीं रहता।  बच्चों को मोबाइल का उपयोग परिजनों की निगरानी में ही करने देना चाहिए। <br /><strong>- प्रियदर्शनी जैन, प्रिंसीपल जैन दिवाकर कमला कॉलेज</strong></p>
<p><strong> हमे रील से रियलिटी की ओर जाना होगा</strong><br />मोबाइल यूज के लिए अभिभावक ही दोषी नहीं है। समाज और व्यवस्था भी जिम्मेदार है। आज सिंगल मदर जो जॉब में तो वो अपने बच्चे की देखभाल कैसे करेंगी बच्चे को मोबाइल देगी जिससे बच्चा व्यस्त रहे।  कोटा में बच्चों की देखभाल करने लिए पालनाघर ही नहीं जहां बच्चे को छोडा जा सके । पति पत्नी दोनों सर्विस में है ऐसे बच्चा अपने एकाकीपन को दूर करने के लिए मोबाइल और सोशल साइट पर जाएगा ही।  रोकने के लिए पहले माता पिता को वर्कप्लेस पर सुविधा दें। वर्तमान में सामाजिक ताना बाना पूरा बिगड़ गया है। आज पड़ोसी पड़ोसी से बात नहीं करता है। बच्चे आउटडोर गेम नहीं खेलते हैं। मोबाइल को अपना दोस्त मानते है।  हमें रील से निकलकर रियलिटी की ओर जाना होगा।<br /><strong>- डॉ. मेघा माहेश्वरी, शिशु रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>बच्चों को किताबों पर फोकस करवाना होगा</strong><br />मोबाइल के उपयोग कैसे करना है। इसके लिए स्कूलों में क्लॉस वाइज बच्चों और अभिभावकों की काउंसलिंग की जा रही है। बच्चों को होम वर्क डायरी में दिया जा रहा है। जिससे बच्चे मोबाइल कम से कम उपयोग करें। बच्चों को किताबों की ओर फोकस कराया जा रहा है। स्कूलों में साइबर क्राइम की सेमिनार होना चाहिए। सोशल मीडिया छोटे बच्चों के लिए ठीक नहीं इसके लिए अभिभावकों ही जागरूक होना होगा। इस पर बैन तो नहीं लगा सकते हैं। लेकिन इसके लिए सावचेत करते रहना अत्यंत जरूरी है।<br /><strong>- संजय शर्मा, सचिव प्राइवेट स्कूल वेलफेयर सोसाइटी</strong></p>
<p><strong>बच्चों के लिए मोबाइल का हो सीमित उपयोग</strong><br />जिस तरह से देश तकनीकी युग की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। उसमें मोबाइल व इंटरनेट का उपयोग किए बिना रहना संभव नहीं है। बच्चों को भी इससे दूर नहीं किया जा सकता। लेकिन यह परिजनों को समझना होगा कि बच्चों के लिए मोबाइल व सोशल मीडिया का उपयोग सीमित किया जाए। बच्चों को मोबाइल की लत डालने वाले भी परिजन ही होते है। ऐसे में परिजनों को चाहिए कि वह छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल नहीं दे। एक निर्धारित उम्र के बाद ही बच्चों को आवश्यकतानुसार  मोबाइल का उपयोग करने देंगे तो उससे अधिक नुकसान नहीं होगा। <br /><strong>- डॉ. अजय धर, सीनियर स्पीच थैरेपिस्ट एंड आॅटिज्म</strong></p>
<p><strong>प्रतिबंध समाधान नहीं, लेकिन लत खराब</strong><br />बच्चों के लिए मोबाइल  व सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करना कोई समाधान नहीं है। लेकिन मोबाइल की लत बच्चों के लिए खराब है। कोरोना के बाद स्कूल से लेकर घर तक बच्चों को मोबाइल पर ही आॅनलाइन पढ़ाया जा रहा है। स्कूलों में तो बच्चों के  लिए मोबाइल बंद होना चाहिए। परिजनों को चाहिए कि वह छोटे बच्चों को मोबाइल की लत नहीं डालकर उन्हें परिवार के साथ बैठना व किस्से कहानियां सुनाने की आदत डालनी होगी। <br /><strong>- सावित्री गुप्ता, निदेशक शिव ज्योति सी.सै. स्कूल वल्लभ नगर गुमानपुरा</strong></p>
<p><strong>पहली गुरु मां है उसको जागरूक होना होगा</strong><br />बच्चों की पहली गुरु मां ही है उसको जागरूक होना होगा। बच्चा डिप्रेशन में आ रहा है। यह सिखाने वाली भी मां ही होती है। पहले इसकी शुरुआत घर से ही करनी होगी। आज 12 साल के बच्चे का फेसबुक पर एकाउंट, स्ट्राग्राम में एकाउंट है।  जबकि 18 साल से कम उम्र के बच्चों का एकाउंट नहीं बन सकता है। लेकिन बच्चे अपनी उम्र ज्यादा डालकर एकाउंट बना लेते हैं और फेसबुक, स्ट्राग्राम का उपयोग कर रहे हैं।  सोशल एकाउंट बनाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करना चाहिए। दूसरा बच्चों को मोबाइल में क्या देखना क्या नहीं यह अभिभावकों को तय करना होगा। बच्चा कहां से गलत सीख रहा इस पर निगाह होनी चाहिए।  <br /><strong>- हरलीन चड्ढा, शिक्षाविद व अभिभावक</strong></p>
<p><strong>पैरेंट्स, स्कूल व स्टेट तीनों को मिलकर करना होगा काम</strong><br />सोशल मीडिया बैन करना समाधान नहीं है।नई शिक्षा नीति में तो सारा कार्य ही डिजिटलाइज  है। ऐसे में एजुकेशन, पेरेंट्स और स्टेट तीनों को मिलकर इसका समाधान निकालना होगा। सरकारी स्कूल व कॉलेज में आउटडोर खेलकूद की सुविधाओं बढ़ानी होगी। बच्चों को सोशल मीडिया के उपयोग व उसके दुष्परिणाम से अवगत कराना होगा। अभिभावक, शिक्षक और एजुकेशन पॉलिस बनाने वालों मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा। लोगों को जागरूक करना होगा। स्कूल कॉलेज में इसके उपयोग को लेकर सेमिनार आयोजित कराने होंगे। बच्चों के साथ अभिभावकों संवाद करना होगा।  अभी मोबाइल स्मार्ट हो रहा है। स्मार्ट मैन की जरुरत है, र्स्माट मशीन की नहीं । <br /><strong>- ज्योति सिडाना,  एसोसिएट प्रोफेसर गवर्नमेंट आर्टस गर्ल्स कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>गर्भ संस्कार जरूरी</strong><br />आज बच्चा अभिमन्यु की तरह मां की कोख से ही मोबाइल चलाना सीखकर आता है। कारण की हमारे समाज में गर्भसंस्कार देना खत्म हो गया है। गर्भवती महिलाएं घंटो टीवी और मोबाइल पर समय बिताती है। जो वो देखती और करती वो गर्भ में पल रहा भी सीख जाता है। इसलिए एक माह के बच्चे को मोबाइल देते वो स्क्रीन स्क्रॉल कर देता है। गर्भ में पल रहा बच्चा गर्भवस्था में ही आवाज, रोशनी और भावनाओं को महसूस करने में सक्षम होता है। गर्भ संस्कार के दौरान बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास के लिए आध्यात्मिकता जोड़ने के लिए  गर्भ संस्कार जरूरी है। <br /><strong>- मोनिका सोनी, जैन दिवाकर कमला कॉलेज</strong></p>
<p><strong>परिजन बच्चे के लिए समय निकालें</strong><br />छोटी उम्र  में बच्चों द्वारा मोबाइल का अधिक उपयोग करना उनके लिए हानिकारक है। शुरुआत में मां या परिजन बच्चों के साथ अधिक समय नहीं बिता पाने के कारण उन्हें मोबाइल पकड़ा देते है। बच्चे बिना मोबाइल देखे खाना तक नहीं खाते।  एक उम्र के बाद यदि मोबाइल का उपयोग किया जाए तो उससे इतना अधिक नुकसान नहीं होगा। लेकिन मोबाइल व सोशल मीडिया को बच्चों केलिए पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए मोबाइल के उपयोग के साथ ही परिजनों का उनके साथ  अधिक समय बिताना आवश्यक है। <br /><strong>-इशान जौहरी,  शिक्षक सेंट्रल एकेडमी  सी.सै. (शिक्षांतर) स्कूल</strong></p>
<p><strong>मोबाइल यूज की समय सीमा तय होनी चाहिए</strong><br />वर्तमान में सारी पढ़ाई आॅनलाइन हो रही है। ऐसे में बच्चे मोबाइल से दूर नहीं रह सकते है। लेकिन उनको मोबाइल में क्या देखना है। कितना समय देखना यह सब माता पिता को तय करना चाहिए। अभी सारा होमवर्क से लेकर सारी सूचना व्हाट्सअप पर दी जाती है। बच्चे को मोबाइल यूज करना ही पड़ेगा लेकिन माता पिता को बच्चे मोबाइल देते समय उस पर निगरानी भी रखनी होगी वो पढ़ाई के अलावा गेम तो नहीं खेल, रहा बैन साइट पर नहीं जा रहा। आॅन लाइन गेम तो नहीं खेल रहा इसकी निगरानी माता पिता को ही रखनी होगी।<br /><strong>- प्रियांशी, स्टूडेंट (किशोरी)</strong></p>
<p><strong>अभिभावक को कठोर होना होगा</strong><br />मोबाइल के उपयोग को लेकर पैरेंट्स को ही कठोर होना होगा। मेरे दोनों बच्चों को मैने मोबाइल नहीं दे रखा है। उनकी पढ़ाई के लिए मैं अपना मोबाइल देता हूं और पूरी निगरानी रखता हूं ।बच्चा पढ़ाई के अलावा अन्य साइट पर नहीं जाए।  सोशल मीडिया पर बैन लगाना समस्या का समाधान नहीं अभिभावकों ही जागरूक होना होगा।  बच्चे को  आवश्यकता होने पर कीपैड मोबाइल दें। इंटरनेट का सोशल मीडिया का उपयोग कैसे करें ।  अभिभावकों को ही बच्चों के लिए नियम तय करने होंगे। <br /><strong>- सुनील सूंडा, अभिभावक</strong></p>
<p><strong>बच्चों के लिए खेल व अन्य गतिविधि हो </strong><br />पहले जब मोबाइल व सोशल मीडिया नहीं थे उस समय बच्चोंको परिवार में किस्से कहानियां सुनाई जाती थी। खेल व अन्य गतिविधियों  में बच्चों को व्यस्त रखा जाता था। परिवार में सभी लोग आपस में बातचीत करते थे। लेकिन वर्तमान में छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल होने से उनका समाज से जुड़ाव कम हो गया है। परिजनों को चाहिए कि बच्चों को खेल  व अन्य गतिविधियां इतनी अधिक करवाई जाएं। <br /><strong> -आदित्य भारती, स्टूडेंट (किशोर)</strong></p>
<p><strong>मुख्य बिंदु</strong><br />- सोशल मीडिया यूजर्स  की गाइड लाइन बने और उम्र तय हो।<br />- फेसबुक, इस्ट्रग्राम एकाउंट बनाने के लिए उम्र के लिए आधार कार्ड अनिवार्य हो।<br />- सोशल मीडिया का मिस यूज रोकने के लिए माता- पिता दोनों को सावचेत होना होगा।<br />- बच्चों का लर्निंग के लिए अलग एप होना चाहिए।<br />- सोशल मीडिया यूज की उम्र तय होनी चाहिए।<br />- मोबाइल स्मार्ट होने पर फोकस ज्यादा, मनुष्य के स्मार्ट होने पर नहीं देते ध्यान।<br />- बच्चों, पेरेंट्स और शिक्षक के बीच संवाद का गेप ज्यादा आ रहा।<br />- स्कूल्स में सोशल मीडिया के उपयोग और इसके दुष्परिणाम पर लगातार सेमिनार हों।<br />- बच्चों को संवाद के लिए की पैड मोबाइल दें।<br />- होम वर्क, मोबाइल की जगह नोटबुक देना जरूरी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Fri, 20 Dec 2024 11:58:15 +0530</pubDate>
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                <title>खेल की सम्पूर्ण व्यवस्था को किक आउट की जरूरत, नींव को सींचें, स्पोर्ट्स शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बने</title>
                                    <description><![CDATA[तीन साल के बच्चे पर ही काम शुरू हो, खेल में राजनीति नहीं हो, कर्ताधर्ता खेल से जुड़े हों, प्रशिक्षण के साथ वैज्ञानिक तकनीक का समावेश हो। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-entire-system-of-sports-needs-a-kick-out--the-foundation-should-be-watered--sports-should-become-an-important-part-of-education/article-96002"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/257rtrer17.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति कार्यालय में प्रतिमाह होने वाली परिचर्चा की श्रंखला के तहत मंगलवार को व्हाई चाइना इज फॉर बेटर देन इंडिया इन स्पोर्ट्स विषय पर चर्चा का आयोजन किया गया। इस दौरान डायरेक्टर स्पोर्ट्स  यूनिवर्सिटी ऑफ कोटा, फुटबॉल कोच, वलर्ड यूथ बॉक्सिंग चैम्पियन, इंटरनेशनल मेडलिस्ट खिलाड़ी, स्वीमिंग, फुटबॉल, एथलीट, वुशू, कुश्ती, तीरंदाजी से जुड़े खेल विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। परिचर्चा में मुख्य रूप से खेलों में राजनीति बंद करने, स्कूली शिक्षा में प्राथमिक स्तर से खेल अनिवार्य करने, खेल का बजट बढ़ाने, राजनीतिक हस्तक्षेप बंद करने, खेल संघों में केवल खिलाड़ियों को पदाधिकारी बनाने, निकाय स्तर पर मिलने वाली सुविधा खिलाड़ियों तक पहुंचने, भ्रष्टाचार रोकने जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा की गई। लोगों ने माना कि खिलाड़ियों के जज्बे और हुनर में कमी नहीं है। कमी व्यवस्थागत है। यदि केन्द्रीयकृत व्यवस्था के तहत लाइबिलिटी तय हो, वैज्ञानिक तरीके से ग्रास रूट पर काम हो तो इंडिया में ओलंपिक मेडल की झड़ी लग सकती है।   </p>
<p><strong>परिवारों में खिलाड़ी तैयार करने का बने कल्चर</strong><br />केवल सरकार के भरोसे अच्छे खिलाड़ी तैयार किया जाना संभव नहीं है। सरकार के भरोसे तो खिलाड़ियों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। खेल मैदान तक की व्यवस्था नहीं हो पाती। हैमर थ्रो के लिए कोटा में मैदान तक नहीं है। जिससे खिलाड़ियों को परेशान होना पड़ रहा है।  परिवारों में बचपन से ही बच्चों को खेल के प्रति समर्पण का कल्चर बनाने की आवश्यकता है। चीन में खेल का कल्चर है। वहां पढ़ाई के साथ खेल को भी प्राथमिकता देने से वह भारत से काफी आगे है। साथ ही भामाशाहों को अन्य आयोजनों के स्थान पर खेल में आर्थिक सहयोग करना चाहिए।  <br /><strong>- श्याम बिहारी नाहर, वरिष्ठ गोला फेंक खिलाड़ी</strong></p>
<p><strong>नींव मजबूत करनी होगी</strong><br />भारत में खिलाड़ी द्वारा बेहतर प्रदर्शन करने और मैडल जीतने के बाद उस पर सरकार ध्यान देती है। जबकि अच्छा खिलाड़ी तैयार करने के लिए उसकी नींव मजबूत होना जरूरी है। सरकार को चाहिए कि वह खिलाड़ियों को तैयार करते समय उन्हेंं सुविधाएं दें। चीन में बचपन से ही बच्चों को खेल से संबंधित सुविधाएं देने से वे बेहतर प्रदर्शन कर पाते है। एक तरफ तो खिलाड़ियों को खेल सामग्री के लिए संघर्ष करना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ नगर निगम द्वारा पार्षदों को हर साल एक लाख रुपए की खेल सामग्री दी जा रही है। यह सामग्री पार्षदों को नहीं देकर वास्तविक खिलाड़ियों को दी जानी चाहिए। जिससे उनका सही उपयोग हो सके।<br /><strong>- महिपाल सिंह,अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी वुशू, जूनियर कमिशन आफिसर(आर्मी)</strong></p>
<p><strong>बिना सुविधाएं अच्छा खिलाड़ी मुश्किल</strong><br />खेलों में भारत की तुलना चीन से की तो जाती है। लेकिन वह इस क्षेत्र में भारत से काफी आगे है। भारत में  बिना सुविधा के ही अच्छा  खिलाड़ी तैयार करना चाहते है। यह संभव नहीं है। यहां तो कोच व खिलाड़ियों को कई-कई साल तक यात्रा भत्ता व भोजन भत्ता तक नहीं मिलता।  चीन में खिलाड़ी तैयार करते समय ही उन्हें सभी सुविधाएं दी जाती है। जबकि  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन के लिए बचपन से ही खेल व खिलाड़ी के स्तर को सुधारना होगा। इसके लिए सुविधाएं विकसित करने की जरूरत है। <br /><strong>- कुशलपाल प्रजापति, वेटलिफ्टििंग उपाध्यक्ष राजस्थान स्टेट वेट लिफ्टििंग संघ</strong></p>
<p><strong>पढ़ाई और खेल में सामंजस्य बनाना होगा</strong><br />भारत में पढ़ाई पर अधिक जोर दिया  जाता है खेलों पर नहीं। बचपन में यदि बच्चे खेल पर ध्यान देते हैं तो उन्हें स्कूल में अनुपस्थित होने व पढ़ाई  में पिछड़ने का डर रहता है। शिक्षक और परिवार को बच्चों में खेल भावना जागृत करने के लिए शिक्षा के साथ खेलों में सामंजस्य बैठाना होगा। खेलों में अनुशासन व तपस्या तो जरूरी है। साथ ही खेलों को राजनीति से मुक्त रखना होगा। जितने अधिक टूर्नामेंट होंगे खिलाड़ियों को उतना अधिक अभ्यास का मौका मिलेगा। तभी वह अन्य देशों में जाने पर वहां के वातावरण में ढल पाएंगे।  <br /><strong>- हरीश शर्मा, सचिव जिला कुश्ती संघ</strong></p>
<p><strong>सब बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर बनाना चाहते हैं </strong><br />बचपन से ही खिलाड़ी बनने का शौक रहा है। परिवार व कोच का सहयोग मिला तो राष्ट्रीय व अंतर राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने का मौका मिला। भारत में हर माता पिता बच्चोंको डॉक्टर इंजीनियर बनाना चाहते हैं। जबकि  खिलाड़ी बनकर भी बच्चे देश व परिवार का नाम रोशन कर सकते है। कजाकिस्तान की खिलाड़ी से कमजोर रही थी। अब उसी से मुकाबला जीतना लक्ष्य है। जो कमियां रही हैं उन्हें सुधारा जा रहा है। गोल्ड मैडल लाना ही लक्ष्य है।  <br /><strong>- महक, वर्ल्ड  यूथ बॉक्सििंग चैम्पियनशिप प्लेयर</strong></p>
<p><strong>खिलाड़ियों को तकनीकी दक्षता की जरूरत</strong><br />चीन में खिलाड़ियों को छात्रवृत्ति व प्रोत्साहन अधिक मिलता है। जबकि भारत में ऐसा नहीं होने से खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन में पिछड़ते हैं। परिवार के सहयोग व कोच के मार्ग दर्शन में नियमित अभ्यास कर रही है। इसके लिए टीवी व मोबाइल से दूर रहते है। ईरान से मुकाबले में तकनीकी रूप से कमी के चलते हार गई थी। लेकिन अब उसी से मुकाबला करना है। साथ ही नेशनल  खेलों में गोल्ड मैडल जीतना लक्ष्य है। <br /><strong>- दिव्यांशी, वर्ल्ड चैम्पियनशिप  ब्रांज मैडलिस्ट वुशु प्लेयर </strong></p>
<p><strong>बीस साल से कोच की भर्ती नहीं निकली</strong><br />गुरु के बिना ज्ञान नहीं है। बिना कोच के किसी भी खेल का विकास नहीं हो सकता है। पार्ट टाइम कोच से आप बेहतर खेल प्रदर्शन की उम्मीद कैसे रख सकते हंै। कोटा में विभिन्न खेलों के कोई स्थाई कोच नहीं है। वर्तमान में पार्ट टाइम कोच रखने का चलन चल रहा है। जिससे खेल का ठीक से विकास नहीं हो पा रहा है।  जेकेलोन मैदान पर किक्रेट अधिकारी ने अपना आॅफिस चला रखा है। हर खेल के लिए अलग अलग मैदान की आवश्कता है। सरकार पीटीआई, कोच की भर्ती निकाले। जितने ज्यादा कोच होंगे खेल में निखार उतना अच्छा आएगा। खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि समय पर मिले। खिलाड़ियों के लिए ट्रेन में समय पर रिजर्वेशन तक नहीं मिलता। किसी भी प्रतियोगिता से पहले प्रशिक्षण लगें जिससे  खिलाड़ी एक दूसरे को समझ सकें। सालभर के लिए 200 फुटबॉल की मांग करने पर 20  फुटबॉल  मिलते हैं। ऐसे में कैसे वर्ल्ड क्लॉस खिलाड़ी तैयार होंगे। <br /><strong>- मधु चौहान, फुटबॉल कोच, पूर्व जिला खेल अधिकारी</strong></p>
<p><strong>लाइबिलिटी और एकाउन्टेबिलिटी तय होना जरूरी</strong><br />खेल में खिलाड़ी से लेकर कोच तक की जवाबदेही तय की जाए। खेल में वैज्ञानिक तकनीक के साथ बुनियादी ढ़ाचे को ठीक करने की आवश्यकता है। केंद्रीकृत खेल प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है। पूरे सिस्टम में खिलाड़ी से लेकर कोच और प्रशासनिक पद पर पूर्व खिलाड़ी कोच होंगे तभी खेल बेहतर स्थिति में आ सकता है।  हम चाइना की बराबरी तभी कर पाएंगे जब हमारे खेलों पर जमीनी स्तर काम होगा। बच्चों को स्कूली शिक्षा के साथ स्पोर्ट्स को अनिवार्य किया जाना चाहिए। अभी 11 वीं 12 वीं स्पोर्ट विषय को अनिवार्य कर रखा है लेकिन यह किताबी ज्ञान तक ही सीमित है। मैदान तक नहीं उतरा है। हमारे यहां अच्छा इंन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। कल्चर तैयार करना होगा। बोर्न खिलाड़ियों को बचपन से खोजना होगा। यह कोच की जिम्मेदारी होना चाहिए। जरूरत हो तो विदेशी कोच नियुक्त किए जाने चाहिए। तभी हम चाइना से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।<br /><strong>- विजय सिंह,  स्पोर्ट्स डायरेक्टर कोटा यूनिवर्सिटी</strong></p>
<p><strong>तकनिकी कमजोरी दूर करने के लिए कोच ही नहीं</strong><br />चाइना में बच्चों को बचपन से ही खेल के लिए तैयार किया जाता है। उनकी क्षमता के अनुसार उस खेल में डाला जाता है। इसमें सरकार से लेकर अभिभावक में खेल को लेकर पूरा कल्चर है। हमारें यहां खेल को सेकंड्री  रखा गया है।  बच्चों को बचपन से तैयार करना होगा। स्कूल रूट पर ही बच्चों को तैयार करना होगा। सरकारी योजनाएं खिलाड़ियों तक नहीं पहुंच पाती है।  मेडल लाने पर प्रोतसाहन राशि दी जाती है लेकिन यहां 2017 से लेकर 2024 तक अभी खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि नहीं मिली है।  2019 से 2024 तक नेशनल खिलाड़ियों की पैसा बाकी चल रहा है। यह पैसा मिले तो बच्चों अच्छी खुराक और अभ्यास के संसांधन उपलब्ध हो सकेंगे। बच्चों को माता पिता डॉक्टर इंजीनियर बनाने की सोच रखते है। खेल के प्रति अभी लोगों में काफी उदासीनता है। हमारे यहां अच्छे कोच, मैदान और खेल सामग्री का अभाव है। यहां वुशू के लिए ना ही कोई मैदान ना ही सुविधाएं उसके बावजूद कोटा के खिलाड़ी नेशनल व वर्ल्ड चैपियन बन रहे हैं यह उनके माता पिता और उनका व्यक्तिगत मेहनत है। हमारे देश में मेडल लाने के बाद ही सुविधाएं शुरू होती ऐसे में बच्चों अच्छी खुराक और संसाधन के लिए स्वयं ही संघर्ष करना होता है।<br /><strong>- अशोक गौतम, वुशू कोच,नेशनल खिलाड़ी</strong><br /><strong> </strong><br /><strong>सभी खेलों के कोच एक प्लेटफार्म आकर समन्वय करें</strong><br />खिलाड़ी से लेकर कोच तक जमीनी स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन संसाधनों के अभाव में खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रहे है। बच्चे के पहले कोच माता पिता होते हैं , वो ही बच्चों को मैदान तक ला सकते हंै। हमें संसाधनों के लिए सरकार पर ही निर्भर नहीं रहना है। लोगों को भी खेल के प्रति जागरूक कर बच्चों को मैदान तक लाना है। अपने प्रदर्शन से सरकार को संसाधन देने के लिए मजबूर करना  होगा। तीरंदाजी में तीन साल से लेकर 15 साल के बच्चे तैयार किए जा रहे हैं। 2032 के ओलपिंक में कोटा का बच्चा तीरंदाजी में गोल्ड लेकर आएगा ऐसी तैयारी अभी से कर रहे हैं। कोटा में तीरंदाजी के लिए कोई सुविधा नहीं ,निजी स्तर पर ही व्यवस्थाएं करनी पड़ रही है। बच्चों को प्रोत्साहन राशि समय पर मिले। खेलों में सरकारी व्यवस्था ठीक नहीं।  शूटिंग के लिए हाल ही में हमने शिक्षा मंत्री से उद्घाटन कराकर शुरुआत की तो आदेश ऐसा हुआ कि तीरंदाजी का मैदान ही छिन गया।<br /><strong>- बृजपाल सिंह, तीरंदाजी कोच पंचमुखी स्पोर्ट्स फेडरेशन</strong></p>
<p><strong>स्वीमिंग के लिए कोटा में कोच ही नहीं </strong><br />कोटा में बेहतर खिलाड़ी तैयार करने के लिए यहां ना तो पूरे संसाधन ना ही अच्छे कोच है। स्वींमिग के प्रशिक्षण के लिए बैगलूर जाना पड़ता है या जयपुर, कोटा में पूरे संसाधन नहीं है। खेल में राजनैतिक दखल अंदाजी के साथ भ्रष्टाचार इतना व्याप्त है कि योग्य खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पाते हैं। खिलाड़ी उम्र को लेकर भी काफी गडबडियां की जाती है। खेलों में पारदर्शिता बिल्कुल खत्म हो गई है। भाई भतीजावाद और पैसा हावी है। कई खिलाड़ी उम्र का डबल प्रमाण पत्र बनाकर रखते हैं ऐसे में योग्य खिलाड़ी ओवर एज होकर बाहर हो जाता है।  खेलों का अधिक से अधिक आयोजन हो जिससे खिलाड़ियों अधिक अभ्यास का मौका मिले।  खेल में राजनीति नहीं होनी चाहिए। जनप्रतिनिधियों की खेलों में दखल अंदाजी बंद होगी तभी बेहतर खिलाड़ी तैयार होंगे । स्टेडियम का उपयोग स्टेडियम के लिए हो यहां सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं हो। स्टेडियम में प्रवेश के लिए पास जारी हो ,साथ ही एक न्यूनतम प्रवेश राशि रखी जाए जिससे मैदान खराब नहीं होंगे । खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए पूरा समय मिलेगा।<br /><strong>- प्रमोद यादव, सचिव स्वीमिंग </strong></p>
<p><strong>मुख्य बिंदू</strong><br />- स्कूलों में खेल शिक्षा अनिवार्य की जाए।<br />- खेलों बेहतर प्रदर्शन के लिए जवाबदेही तय हो।<br />- हर खेल के स्थाई कोच नियुक्त किए जाए। <br />- खेलकूद का मूलभूत ढ़ाचा बेहतर किया जाए।<br />- खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि का समय पर भुगतान किया जाए।<br />- पर्याप्त मात्रा पर समय पर खेल सामग्री  उपलब्ध कराई जाए।<br />- खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता के साथ भर्ती करें।<br />- पार्ट टाइम कोच की जगह स्थाई कोच की नियुक्ति की जाए।<br />- विदेशी कोच की नियुक्ति हो।<br />- पूर्व खिलाड़ियों को खेल निकाय का नेतृत्व करने का अवसर मिले। <br />- खेलों में राजनैतिक दखल बंद होना चाहिए। <br />- स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिए ही प्रवेश हो इसके लिए पास बनाए।<br />- पार्षद को मिलने वाली खेल सामग्री कोच मिले तो खिलाड़ियों खेल सामग्री परेशानी खत्म होगी।<br />- खेलगांव का निर्माण हो जिसमें सभी खेलो एक ही स्थान पर खेला जा सकें। <br />- खेल में अनुशासन जरूरी है।<br />- खेलों में बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे इसके लिए राजैनिक हस्तेक्षप बंद हो। <br />- स्टेडियम में स्थानीय खिलाड़ियों के प्रवेश पास बने जिसका शुल्क निर्धारित हो, जबकि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों का प्रवेश निशुल्क हो। प्रवेश पास की राशि से स्टेडियम का रख रखाव भी हो सकेगा।<br />- स्टेडियम का उपयोग खेल के लिए हो सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए नहीं हो<br />- प्रशिक्षण के साथ वैज्ञानिक तकनीक का समावेश हो।<br />- केंद्रीकृत खेल प्रणाली होनी चाहिए। <br />- खेल प्रशासक की जवाबदेही तय होनी चाहिए। ल्ल  एथलिट व संघ के बीच एकता बननी चाहिए। <br />- छोटी उम्र से ही बच्चों में खेल से जोड़ा जाए। <br />- खिलाड़ियों की कमजोरी पर काम होना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 Nov 2024 14:27:18 +0530</pubDate>
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                <title>सम्मान और समर्पण पर भारी स्वार्थ</title>
                                    <description><![CDATA[गाय को राष्ट्रीय माता का दर्जा मिलेगा तभी इसका ठीक से संरक्षण हो सकेगा। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/self-interest-outweighs-respect-and-dedication/article-93687"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/27rtrer-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हमारे देश में गाय को माता का दर्जा प्राप्त है। धर्म ग्रन्थों में हमें कामधेनु गाय की महिमा से परिचित कराया जाता है। गाय में 33 करोड़ देवी देवताओं का वास बताया जाता है। धन-धान्य,दीर्ध जीवन, सम्पन्नता, स्वास्थ्य बल, बुद्धि,विद्या सबकुछ देने वाली गाय की हमारे देश में आज क्या स्थिति हो गई है। आज शहर की छोटी मोटी सड़क, गली,नुक्कड़ सब तरफ गायें नजर आती है।  इनको आवारा छोड़ देने के कारण प्रति वर्ष सैकड़ों लोग सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवा देते हैं। स्वयं गाय भी हाइवे पर बैठे रहने से एक्सीडेन्ट का शिकार होती है। दूध देने तक गाय को रखा जाता है इसके बाद उसे रोड़ पर आवारा छोड़ दिया जाता है।  इनका कोई धणी-धोरी नजर ही नहीं आता। जहां जहां कचरा और गंदगी होती है भूखी गाय वहां मुंह मारती नजर आती है। यह सब तब हो रहा है जब गाय ना केवल लोगों के पौषण की कमी को दूर कर सकती है बल्कि वह लाखों का व्यापार खड़ा कर हजारों लोगों को रोजगार दे सकती है।</p>
<p>एक गाय से हमें दूध ही नहीं गौ मूत्र, गौबर के रूप में इतनी अद्भुत चीजें मिलती हैं कि हम उससे लाखों रुपए कि कमाई कर सकते हैं। गायों के माध्यम से उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। यदि उद्योग स्थापित होंगे तो गाय को वही पुराना दर्जा मिल सकेगा। इसी विषय को लेकर  परिचर्चा की श्रंखला के तहत हाऊ टू गिव काउ्स अरेस्पेक्टिव लाइफ अर्थात गाय को एक सम्मानजनक जीवन कैसे दें  विषय पर मंगलवार को दैनिक नवज्योति कार्यालय में  परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस आयोजन में विषय वस्तु से जुडेÞ विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। परिचर्चा में पशुपालन विभाग, नगर निगम,देसी डेयरी, गौशाला संचालक,ह्यूमन हेल्प लाइन, ट्रैफिक पुलिस,एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, एडवोकेट, गृहिणी, गौ सेवक, पशु पालक आदि ने हिस्सा लिया। प्रस्तुत है परिचर्चा के मुख्य अंश... </p>
<p><strong>कृष्ण को मानते हैं, लेकिन कृष्ण की नहीं</strong><br />गाय को गौमाता का दर्जा प्राप्त है। भगवान कृष्ण ने गाय को पाला था और गोवर्धन की पूजा की थी। उनके ऐसा करने का मतलब गायों को संरक्षण देना था। हिन्दू संस्कृति में लोग भगवान कृष्ण को तो मानते है लेकिन कृष्ण की नहीं मानते। यही कारण है कि लोग गायों का संरक्षण करने की जगह उनकी  दुर्दशा होते देख रहे है। जबकि गाय इतनी उपयोगी है कि उसके दूध के अलावा गोबर तक काम में आता है। कम दृूध देने वाली गायों को सड़क पर छोड़ देते है। गायों के महत्व को समझते हुए उन्हें सुरक्षित जीवन देने के लिए सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करने होंगे।  <br /><strong>- मधुसूदन शर्मा, अध्यक्ष गायत्री परिवार गौशाला</strong></p>
<p><strong>हादसों का कारण बनते हैं सड़कों पर पशु</strong><br />ट्रैफिक पुलिस का  काम शहर की यातायात व्यवस्था को सुगम बनाना है। वाहन चालकों को दुर्घटना से बचाना है। लेकिन कई लोग पशुओं विशेष रूप से गाय को दूध निकालने के बाद सड़कों पर खुला छोड़ देते है। जिससे तेज गति से आने वाले वाहन चालक इन पशुओं से बचने के प्रयास में कई बार हादसों का कारण बनते है। सड़कों पर घूमने वाली गायों व सांड को पकड़ने के लिए निगम अधिकारियों को पत्र लिखकर आग्रह ही कर सकते है। कई बार बिना हैलमेट दो पहिया वाहन चालक हादसों का शिकार होते है तो उनमें से 80 फीसदी मौत बिना हैलमेट के कारण सिर में चोट लगने से होती है।           <br /><strong>- पृूरण सिंह, यातायात निरीक्षक कोटा शहर पुलिस</strong></p>
<p><strong>अब गाय पालना आसान नहीं रहा</strong><br />हिन्दू संस्कृति में गाय को पूजनीय माना तो जाता है। उसके संरक्षण की बात भी सभी करते है। लेकिन गाय को पालना इतना आसान नहीं रहा।  पशु आहार से लेकर सभी चीज महंगी हो गई है। ऐसे में कम दृूध देने वाली गायों को लोग सड़कों पर छोड़ देते है। जिससे उनके द्वारा पॉलिथीन युक्त खाद्य पदार्थ खाने से उनमें कैल्शियम की कमी हो जाती है। इससे उनकीदूध की मात्रा कम हो जाती है। गाय भले ही दृूध कम दे लेकिन उसका संरक्षण होना ही चाहिए। उसे लावारिस नहीं छोड़ा जा सकता। वहीं पहले बैल का उपयोग खेती में किया जाता था। अब खेतों में बैल का उपयोग नहीं होने से वे सांड बनकर सड़कों पर घूम रहे है।                <br /><strong>- मीतू गुर्जर, पशु पालक </strong></p>
<p><strong>गाय माता है, इसे आवारा कहना गलत</strong><br />गाय को एक तरफ तो माता का दर्जा दिया जाता है। दूसरी तरफ उसे आवारा या लावारिस कहकर उसका अपमान किया जाता है। जबकि गाय को आवारा कहना गलत है। हर व्यक्ति को संभव हो तो एक गाय को पालना व उसका संरक्षण करना चाहिए। गाय को गौशाला व मंदिरों में पालकर संरक्षित व सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है। हर परिवार में गाय के लिए एक रोटी जरूर निकलती है। लेकिन वह रोटी या खाद्य पदार्थ पॉलिथीन में फेकने से गायों के उसे खाने पर वह उनकी मौत का बड़ा कारण बन रहा है। गायों को सड़कों पर खुला छोड़ने की जगह उन्हें पालने के लिए सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करने होंगे।                 <br /><strong>- आशा चतुर्वेदी, गृहिणी</strong></p>
<p><strong>गौ उत्पाद के लिए बने इंडस्ट्री</strong><br />वर्तमान समय में गौ माता के प्रति लोग लापरवाह हो गए है। सनातन धर्म में गाय ईश्वर के समान पूज्यनीय बताया है। जिसके घर, आंगन, चुल्हा चौका गोबर से लीपा जाता था उसके घर में लक्ष्मी निवासी करती थी। लेकिन वर्तमान में लोग गाय दूध नहीं देती तो उसको सड़कों पर छोड़ देते हैं। घर में जगह होने पर एक गाय तो हर व्यक्ति को पालना ही चाहिए। गाय को राष्ट्रीय माता का दर्जा मिलेगा तभी इसका ठीक से संरक्षण हो सके गा। गाय के दूध के अलावा उसके गोबर, गौमूत्र और अन्य फायदों के बारें प्रशिक्षण दिया जाए तो इंडस्ट्री तैयार हो सकती है। <br /><strong>- महामंडलेश्वर साध्वी हेमा सरस्वती </strong></p>
<p><strong>केवल दूध के दम पर नहीं चल सकती गौशाला</strong><br />गाय के दृूध देना बंद करने पर पशु पालक भी उन्हें सड़कों पर छोड़ देते है। कई पशु पालक तो दोबारा उन गायों को घर तक भी नहीं लाते। लेकिन जो लोग निजी गौशाला संचालित कर रहे है वे भी केवल गाय के दूध के दम पर गौशाला नहीं चला सकती। सरकार स्टाम्प पर गौ टैक्स वसूल कर रही है।  जिस तरह से सामाजिक क्षेत्र में वृद्धाश्रम संचालित हो रहे है। उसी तरह से जिन गायों की देखभाल करने वाला कोई नहीं हो उन्हें गौ अभ्यारण्य में रखा जा सकता है। जहां उन्हें प्राकृतिक रूप से चरने कीजगह व हरा चारा मिलेगा तो कम से कम उनकी जान तो बची रहेगी। साथ ही उनसे किसी को नुकसान भी नहीं होगा।  <br /><strong> - वीरेन्द्र जैन, संयोजक, ह्यूमन हैल्प लाइन</strong></p>
<p><strong>गाय के उत्पादों का हो अधिक उपयोग</strong><br />निजी गौशालाओं में सभी गाय दूध देने वाली नहीं होती।  बिना दूध देने वाली गायों के गोबर व गौमूत्र समेत गाय के अन्य उत्पादों का उपयोग  किया जा सकता है। गौमूत्र व गोबर की खाद से आय बढ़ाई जा सकती है। गाय के उत्पादों का जितना अधिक उपयोग होगा उससे आय के साथ ही गायों का संरक्षण भी किया जा सकेगा। गायों को चारा डालने वाले धर्म करने के लिए सड़कों पर ही चारा डाल देते है। जिससे ट्रैफिक में बाधा होती है। निगम के स्तर पर जमादारों से गायों का सर्वे कराया जाए। साथ ही पालतू पशुओं के टैग लगाए जाएं जिससे उनकी पहचान की जा सके।                <br /><strong>- सतीश गोपलानी, अध्यक्ष कृष्ण मुरारी गौशाला </strong></p>
<p><strong>हर घर से निकले गौ ग्रास तो नहीं रहेगी भूखी गाय</strong><br />हर घर से गौग्रास निकाला जाए तो गायों को रोड पर प्लास्टिक थैलियां नहीं खानी पड़ेगी। गायों के पर्याप्त भोजन, पानी और आवास की व्यवस्था करने की हम सबको सामूहिक जिम्मेदारी उठानी होगी। हर समय सरकार की तरफ देखने बताए सभी को गाय को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने होगे। उनको रोड पर घूमने से रोकने के लिए चरागाह भूमि तैयार करनी होगी। शहरों में गौशालाओं का संख्याा बढ़ानी होगी। सभी गायों को बचाया जा सकता है। <br /><strong>- बृजेश कुमार  बैरागी, सांवरिया गौशाला सदस्य जाखमुंड</strong></p>
<p><strong>गाय को उचित दर्जा मिले तभी होगा संरक्षणन</strong><br />इ पीढ़ी गाय को अब घरों में नहीं बांध सकती है। उनके अंदर गौवंश के संरक्षण के संस्कार देने होंगे। गौमाता को उचित दर्जा देना होगा। गोबर से बने उत्पादन का व्यापक प्रचार प्रसार करना होगा। गौकाष्ठ, गौमूत्र, गौ अर्क जैसे उत्पाद के लिए बाजार तैयार करना होगा।कोटा मेें जितने मंदिर है उनको तीन से चार गाय पालने के लिए दी जाए।  लोगों को गाय की उपयोगिता के बारे में जागरूक किया जाए।  गौ पालने वाले को सरकार छूट दे जिससे गौ संरक्षण में वृद्धि होगी। गाये सड़को पर नहीं घूमेंगी।<br /><strong>- विवेक गौतम, गौ क्रांति गौ सेवा समिति कोटा</strong></p>
<p><strong>स्टाल फीडिंग विधि अपनाने की आवश्यकता</strong><br />पशुपालकों को स्टाल फीडिंग विधि को अपना होगा तभी बेहतर दूध का उत्पादन होगा और गाये रोड पर आने से रूकेंगी। गायों को घर पर ही खाने को हर समय उपलब्धता करानी होगी।  तभी स्टाल फीडिंग हो पाएगी । स्टाल फीडिंग नहीं होने से  उनसे ज्यादा दूध नहीं ले पाते है। खुला छोड़ने पर गाय दिन में क्या खा रही उसका आंकलन नहीं किया जा सकता है। घर समय पर पौष्टक आहार देने से दूध उत्पादन बढेगा। इसके अलावा नस्ल सुधार की आवश्यकता है। <br /><strong>- डॉ. महेंद्र सिंह वरिष्ठ वैज्ञानिक एव अध्यक्ष केवीके कोटा</strong></p>
<p><strong>पशु बीमा फिर से शुरू हो </strong><br />गायों को बचाने के लिए पशुपालन विभाग की ओर से हर संभव प्रयास किया जााता है। पहले पशुओं का 10 हजार रुपए का बीमा हुआ करता था उसको फिर से चालू किया  जाए। जिससे उसके लालच में लोग पशुओं ठीक से पालन पौषण करेंगे। पशुपालन चिकित्सालय में गायों को बेहतर इलाज हो इसके लिए सभी चिकित्सक पूरा प्रयास करते है। समिति संसाधनों के बावजूद गायों को बचाने का हर संभव प्रयास किया जाता है।  गायों की स्टाल फीडिंग विधि अपनाने की आवश्यकता है। तभी दूध का उत्पादन बढ़ेगा।<br /><strong>- डॉ. गिरीश सालफळे उपनिदेशक पशुपालन विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>इंडस्ट्री चल रही है, गौ पालन में रोजगार के अपार अवसर</strong><br />गौपालन में रोजगार की अपार संभावनाएं है।  हमने  गोपालन कर इसको एक इंडस्ट्री के रूप में तैयार किया है। दूध  के प्रोडक्ट के बिना  गोबर की खाद, जैविक खाद, केचुआ खाद, गौबर गैस से बिजली उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। गायों के नस्ल सुधारने की आवश्यकता है। गाय के वेष्ट से बेस्ट प्रोडेक्ट कैसे तैयार करें इसके लिए लोगों को प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। लोगों को बायो प्रोडेक्ट का प्रशिक्षण देकर इंडस्ट्री स्थापित की जा सकती है। नस्ल सुधारने और अच्छा दूध उत्पादन देने के लिए गायों को पौष्टिक आहार खिलाना होगा।                                    <br /><strong>-अमनप्रीत सिंह गौ डेयरी संचालक</strong></p>
<p><strong>कानून की सख्ती से हो पालना</strong><br />गौ संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कई कानून बना रखे हैं लेकिन उनकी ठीक से पालना नहीं होती।  चारागाह भूमि पर अतिक्रमण हो रहे है। गौचर भूमि बचेगी और वह सड़कों पर नहीं घूमेगी। उनकी असमय मृत्यु नहीं होगी।  गाय को राष्ट्रीय पशु की श्रेणी रखना होगा।  निगम की ओर से प्लास्टिक और कचरे का समय पर निस्तारण करें तो गाय प्लास्टिक और अन्य चीजें खाएगी नहींं तो उनकी मृत्यु रुक सकेगी। इसके लिए घर से शुरुआत करनी होगी। गाय की रोटी का नियम बनाएंगे तो गाये प्लास्टिक और अन्य चीजे नहीं खाएगी। <br /><strong>- शालिनी शर्मा, अधिवक्ता कोटा</strong></p>
<p><strong>नस्ल सुधार पर ध्यान देना जरूरी</strong><br />समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए चार बैसिक चीजों की आवश्यकता होती  है। गाय को जीवन पर्यंत सेवा की आवश्यकता है चाहे वो उत्पादन दे या नहीं दे। भोजन, पानी, छाया, घूमने की स्थान की आवश्यकता है। इन चारों चीजों में एक भी चेन को तोड़ा जाता है तो उसका जीवन खतरे में आ जाता है। नई पीढ़ी को गाय का महत्व ही नहीं पता है। बढ़ती जनसंख्या  के कारण गायों की चारागाह भूमि खत्म हो रही है।  गायों की नस्ल में सुधार नहीं होने से पशुपालकों लाभ नहीं मिलता है तो वो इनको सड़को पर छोड़ देते हैं। सबसे ज्यादा देसी नस्ल की गायें ही सड़को पर घूमते हुए मिलेगी।     <br /><strong>- डॉ. अखिलेश पाण्डेय उपनिदेशक पशुपालन विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>गायों के लिए बने गौ अभयारण्य</strong><br />गाय केवल दूध देने के काम आने वाला पशु नहीं है। यह पूजनीय भी है। इसका संरक्षण व गायों को सुरक्षित जीवन देने के लिए उन्हें खुली जगह पर घूमने व चरने की पर्याप्त जगह की आवश्यकता होती है। निगम की गौशाला में अधिकतर सड़कों पर घूमने वाली व पॉलिथीन गाय आती है। जिससे उनके बैठक लेने के बाद उन्हें उठा पाना मुश्किल होता है।गौशाला में क्षमता से अधिक गौवंश होने पर पुरानी गाय नएआने वाली व कमजोर पर हमला कर देतीहै। जिससे उनकी मौत हो जातीहै। यह गौ अभ्यारण्य बनाकर ही संभव है। गौशाला में गायों को रखने के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए।   हालांकि पहले की तुलना में गायों की मृत्यु दर कम हुई है। गायों का संरक्षण सिर्फ बात करने से नहीं होगा।इसके लिए सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करने होंगे।    <br /><strong>- जितेन्द्र सिंह, अध्यक्ष गौशाला समिति कोटा दक्षिण निगम</strong></p>
<p><strong>टॉप  पॉइंट</strong><br />- गौवंश संरक्षण के लिए तैयार हो अभयारण्य।<br />- चरागाह भूमि से अतिक्रमण हटाकर गायों के लिए चरने की व्यवस्था हो। <br />- गांवों से शहर आने वाले पशुओं को रोकने चेक पोस्ट बने<br />- ग्रामीण क्षेत्र में पशुपालकों को गाय के गोबर, गोमूत्र, गोकाष्ठ उत्पादन के लिए प्रशिक्षित करें। <br />- गायों की नस्ल सुधार पर ध्यान दें, दुधारू गायें होगी तो रोड पर नहीं छोड़ी जाएंगी। <br />- शहर  के हर मंदिर में 4 से 5 गाय को पालने के लिए दिया जाए।<br />- महाराष्टÑ की तर्ज पर  गाय को राष्ट्रीय पशु व गौमाता का दर्जा दिया जाए।<br />- गोबर से बने उत्पादन कर उनकी उपयोगिता लोगों बताएं जिससे इंडस्ट्री स्थापित हो। <br />- नगर निगम की ओर से टिपर का पहला फेरा, गाय के चारा, रोटी के लिए लगाए। <br />- अस्पतालों में गौवंश के इलाज के लिए संसाधन उपलब्ध कराएं।<br />- गौ उत्पादक के लिए इंड्रस्टीज तैयार हो। <br />- शहर में प्लास्टिक उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जिससे गाये प्लास्टिक नहीं खा सकें।<br />- पशुपालकों को बायो प्रोडेक्ट का प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगारमुखी बनाए।<br />- गाय को माता का दर्जा तभी मिलेगा परिवार में इसके संस्कार डाले जाएं। <br />- स्कूलों में गाय के उपयोग उसके उत्पाद के बारे में पढ़ाया जाए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Oct 2024 13:27:38 +0530</pubDate>
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                <title>परिवार समाज शिक्षक सरकार सब दोषी</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/family--society--teachers--government--all-are-guilty/article-82876"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/u1rer-(13).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। वर्तमान शिक्षा नीति में विद्यार्थियों को गुणवत्ता युक्त व रोजगारमुखी शिक्षा क्यों नहीं मिल पा रही है। इसको लेकर दैनिक नवज्योति की ओर से शिक्षाविदों की एक परिचर्चा आयोजित की गई।  मंथन से निकल कर आया कि शिक्षा का वर्तमान ढ़ांचा जो तैयार किया गया है वो रोजगारमुखी नहीं है। यह ढ़ांचा बोरोजगारों की भीड़ बढ़ाने वाला है। अंको की होड बढ़ रही है, योग्यता की होड कम हो गई है। योग्यता के कोई मापदन्ड नहीं हैं। कोई आटोनॉमस बॉडी नहीं है। एक ऐसी संस्था हो जिसमें देश के नामी शिक्षाविद शामिल हों वह ऐसी नीति तैयार करें जो स्टूडेंट का सर्वांगीण विकास करने के साथ उसे आत्मनिर्र्भर भी बना सके।  बिना रिसर्च के पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे है। बच्चों का हित सवोपरि नहीं रखा जा रहा है। शिक्षा व्यवसायीकरण हो गया है। शिक्षा कू बुनियाद में ही बदलाव की आश्यकता है। समाज की मानसिकता में बी बदलाव की जरूरत है। शिक्षा में प्रेक्टिकल पार्ट कम हुआ है। भवन, स्टाफ, संसाधन की कमी। पढ़ाई में समयबद्धता की कमी आई है। स्टूडेंट्स डिग्री ले तो लेते हैं लेकिन प्रेक्टिल नहीं मिलने से डिग्री बेकार साबित हो रही है। पाठ्यक्रम में बच्चों की रूचि का ध्यान नहीं रखा गया है। रिटायर्ड शिक्षाविद की कमेटी बनाए जो शिक्षा को क्वॉलिटी और रोजगारमुखी बना सकें। </p>
<p><strong>अंकों की नहीं, ज्ञान की होड़ बढ़े </strong><br />वर्तमान में जिस तरह की शिक्षा दी जा रही है वह संख्या बल अधिक होने से सभी को शिक्षा का अधिकार के तहत दी जा रही है। जिसमें अधिक से अधिक अंक लाने की होड़ मची हुई है। जबकि अधिक अंक लाना न तो शिक्षा का मापदंड है और न ही पैमाना। अंकों की जगह वास्तविक ज्ञान की हौड़ होनी चाहिए। जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके और वह उसे आत्म निर्भर बना सके। सरकार ने नई शिक्षा नीिित लागू की है जिसमें बच्चों को कई तरह की सुविधाएं दी गई है। लेकिन उस नीति का सही ढंग से क्रियावयन हो और उसी अनुरूप सुविधाएं भी की जाएं। बच्चों को आत्म निर्भर बनाने वाली शिक्षा के लिए उन्हें तकनीकी व व्यवहारिक ज्ञान दिया जाना अति आवश्यक है। नई शिक्षा नीति सरकार ने जल्दबाजी में लागू की है। कोविड का समय होने से इस पर चर्चा तक नहीं की गई। इसमें कई खामियां हैं। बदलाव की आवश्यकता है। मल्टीपल चवॉइस बच्च्े को देना ठीक है लेकिन कैसे इस पर भी विचार होना चाहिए। <br /><strong>- संजय भार्गव, शिक्षा विद् व पूर्व प्राचार्य जेडीबी कॉलेज</strong></p>
<p><strong>प्रायोगिक शिक्षा जरूरी</strong><br />बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए जिस तरह से मेडिकल में प्रेक्टीकल अधिक कराया जाता है। उसी तरह से शिक्षा प्राप्त कर व्यक्ति को यदि आत्म निर्भर बनाना है तो उसके लिए प्रायोगिक शिक्षा जरूरी है। जबकि वर्तमान में जो शिक्षा दी जा रही है वह काफी पुराने ढर्रे पर है। मेडिकल फील्ड में भी पुराना ढर्रा ही जारी है। मेडिकल में भी नये कोर्स शुरू किए जाने चाहिए। मसलन पैशेंट डॉक्टर रिलेशन सिखाया जाए।  शिक्षा में डमी स्कूल की पद्धति को समाप्त किया जाना चाहिए। कक्षा में जाकर जो कुछ सीखने को मिलता है वह बिना कक्षा में जाए या आॅनलाइन नहीं मिल सकता। हर विभाग में पद व नौकरियां तो हैं पद रिक्त हैं लेकिन उनके लिए योग्य व्यक्तियों की कमी है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व आत्म निर्भर बनाने वाली शिक्षा तभी मिलेगी जब बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान दिया जाएगा। <br /><strong>- दीपिका मित्तल, चीफ एकेडमिक आॅफिसर मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>मल्टीपल च्वॉइस तो दे दी उसके संसाधन उपलब्ध नहीं </strong><br />शिक्षा को रोजगारमुखी बनाने के लिए नई शिक्षा नीति लागू की है लेकिन इसमें अभी काफी सुधार और बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा की बात करें तो कृषि में रोजगार की काफी संभावनाए है। सरकार ने अभी 40 कृषि महाविद्यालय तो खोल दिए लेकिन उसमें मात्र 15 लेक्चर लगाए ऐसे में गुणवत्ता युक्त शिक्षा कहां से मिलेगी। बिना इंट्रास्टक्चर के क्वॉलेटी एजुकेशन संभव नहीं है। तीन दशक पहले तक 12 वीं कृषि में इतने प्रेक्टिकल होते थे। लैब में कितना काम कराया जाता है। आज लैब में रखे उपकरण जंग खा रहे है। ना तो प्रयोगशाला सहायक है ना ही पढ़ाने वाले प्रोफेसर। अभी बीएससी एग्रीक्चर करने के बाद भी उसके पास रोजगार नहीं होता है। ऐसे में युवाओं को रोजगारमुखी शिक्षा कैसे मिलेगी। देश की इकोनोमी कृषि पर है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।  इनक्यूबेशन सेंटर नहीं है। बच्चे कहां सीखेंगे। नई शिक्षा नीति में बदलाव की आवश्कता है कृषि के चार क्रेडिट पढ़ने बाद यहां का बच्चा कॉमर्स कॉलेज कैसे जा सकता है। दो क्रेडिट कम्प्यूटर के  लिए कहां जाएगा। नई शिक्षा नीति पर कोई ज्यादा रिसर्च नहीं हुई है। इसको बिना व्यवहारिकता में लाने में परेशानी आ रही है। बच्चों को मल्टीपल चॉइस तो दे दी उसके संसाधन उपलब्ध नहीं कराए।                      <br /><strong> - मूलचंद जैन, डीन कृषि महाविद्यालय कोटा</strong></p>
<p><strong>बुनियादी शिक्षा बच्चे की मजबूत होगी तभी मिलेगी गुणवत्ता युक्त शिक्षा</strong><br />गुणवत्ता युक्त शिक्षा की बुनियाद ही प्रारंभिक शिक्षा है। यहां से ही क्वॉलेटी एजुकेशन मिलेगी तभी बच्चा अपना गोल सेट कर रोजगारमुखी शिक्षा की ओर अग्रसर होगा। आज सबसे बड़ी समस्या डमी स्कूल है। जिससे बच्चों की बुनियादी शिक्षा कमजोर हो रही है। बच्चा 5 वीं में आने के साथ ही उसका संघर्ष शुरू हो जाता है। हम सिस्टम की खामियां निकालकर अपने दायित्व से नहीं बच सकते है। गुरुकुल पद्धति पर काम होना चाहिए।जब तक बेसिक यूनिट मजबूत नहीं होगी। शिक्षा में गुणवत्ता नहीं आएगी। शिक्षा में बदलाव के लिए सेवानिवृत शिक्षाविदो की एक कमेटी बननी चाहिए जो शिक्षा में आ रही परेशानी के साथ शिक्षा को कैसे रोजगारमुखी बनाए ऐसी एक कमेटी बननी चाहिए पूरे देश में जो शिक्षा को रोजगारमुखी बनाने में सहायक हो। आज स्कूल में शिक्षा का वातावरण नहीं मिल रहा है। एक होड चल रही डॉक्टर, इंजीनियर बनाने की। कोचिंग व्यवस्था से बच्चों को पूरी शिक्षा नहीं मिल पा रही है।                    <br /><strong>- संदीप अग्रवाल, स्पिंग डेल्स स्कूल संचालक</strong></p>
<p><strong>समग्र शिक्षा से ही निकलेंगी बहुमुखी प्रतिभाएं</strong><br />नई शिक्षा नीति से खाफी बदलाव आएगा। इसमें समय लगेगा लेकिन चीजें सुधरेंगी। कुछ खामियां अवश्य हैं लेकिन शिक्षा नीति के बारे में एटलीस्ट सोचा तो गया। बच्चा क्लास में नियमित रहे इसकी व्यवस्था भी नई नीति में की गई है। मल्टीपल च्वाइस भी दी गई है। पहले जहां स्कूलों में शुरुआत से ही बच्चों को समग्र शिक्षा दी जाती थी। जिससे उसका सर्वांगीण विकास होता था। नैतिक शिक्षा से लेकर सामाजिक विज्ञान तक पढ़ाया जाता था। उस समग्र शिक्षा की आज आवश्यकता है। उसे से बहुमुखी प्रतिभाएं निकलकर आएंगी। यह तभी संभव होगा जब बच्चे नियमित कक्षाओं में जाएंगे।  इंटरनेट पर ज्ञान का भंडार है लेकिन वहां से व्यवहारिक ज्ञान नहीं मिल सकता वह कक्षा में शिक्षक से ही मिलता है। घर परिवार से लेकर शिक्षण संस्थान तक में बच्चों का समग्र विकास करने की जरूरत है। जिससे वे गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के साथ आत्म निर्भर बन सकें।  <br /><strong>- रीना दाधीच, कुल सचिव एवं एनईपी समन्वयक, कोटा विश्वविद्यालय</strong></p>
<p><strong>आत्म निर्भरता के लिए तकनीकी शिक्षा जरूरी</strong><br />बच्चे की प्रतिभा को उसके माता पिता व परिवार जन ही पहचान सकते हैं। माता पिता को बच्चों की रूचि के हिसाब से ही उसे शिक्षा दिलानी चाहिए। वह जिस भी फील्ड में जाना चाहता है उसे जाने देना चाहिए। जिससे वह अपना बेस्ट दे सकेगा। थौपी गई शिक्षा से बच्चा मानसिक तनाव में आकर गलत कदम भी उठा सकता है। बच्चों को यदि तकनीकी शिक्षा दी जाए तो वह उसे आत्म निर्भर बनाने में अधिक सहायक होगी। सिर्फ डिग्री लेना ही पर्याप्त नहीं है। हाथ का हुनर होगा तो बच्चा कभी बेरोजगार नहीं रह सकता। हमारी शिक्षा नीति में इन सब जरूरतों की ओर देखना चाहिए।  सैद्धांतिक शिक्षा के साथ प्रायोगिक शिक्षा भी दी जाएगी तो वह व्यक्ति को आत्म निर्भर बनाने में अधिक सहायक होगी। जिससे वह अपना बेस्ट दे सकेगा। आज प्रैक्टिल की ज्यादा जरूरत है। हम इस क्षेत्र में काम भी कर रहे हैं।  अभिभावकों को भी बच्चें की रुचि देखना चाहिए। उन पर प्रेशर नहीं डालना चाहिए। <br /><strong>- सीमा चौहान, प्राचार्य जेडीबी आर्ट्स कॉलेज </strong></p>
<p><strong>शिक्षा नीति आधी अधूरी व्यवस्थाओं के चलते मजाक बनकर रह गई</strong><br />वर्तमान में गुणवत्ता युक्त शिक्षा नहीं मिलने के कई कारण है। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि हमारी सरकार की ओर से जो पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है। वो व्यवहारिक नहीं होता है। इसको रोजगारमुखी के साथ समाज के अनुकूल बनाने की आवश्यकता है। इसके बारे में आयुक्तालय को अवगत भी कराया गया है। विश्व विद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम के फेल  होने का कारण मुख्य कारण एक ही दिन में पाठ्यक्रम को तैयार कर लागू कर दिया जाता है। जबकि होना यह चाहिए की इसपर पूरी रिसर्च होने के बाद समाजोपयोगी पाठ्यक्रम तैयार हो जिससे युवाओं को रोजगार मिल सकें। महाविद्यालय तो सरकार लगातार खोल रही है लेकिन इसमें स्टाफ भवन और अन्य संसाधन की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। ऐसे में क्वॉलेटी एजुकेशन कहां से मिल पाएगी। शिक्षकों पढ़ाई के समय कम हो रहा है। वर्तमान में शिक्षा पर 6 प्रतिशत खर्च होना चाहिए हो रहा 2 प्रतिशत हो रहा है। वर्तमान में शिक्षा नीति आधी अधूरी व्यवस्थाओं के चलते मजाक बनकर रह गई है। <br /><strong>- गीताराम शर्मा, एबीआरएसएम के अध्यक्ष व निदेशक आयुक्तालय कोटा</strong></p>
<p><strong>क्वालिटी एजुकेशन</strong><br /><strong>शिक्षा को रोजागारमुखी बनाएं</strong><br />क्वॉलेटी एजुकेसन के साथ रोजगारमुखी शिक्षा की बात करनी जरुरी है। क्लास में व्यवसायिक शिक्षा भी शिक्षा देनी चाहिए है। शिक्षा मुल्यांकन परक्ष होनी चाहिए। बच्चों को पहले दिन से क्वॉलेटी एजुकेशन मिलनी चाहिए। साथ कॉलेज में उपस्थित बढ़नी चाहिए। कॉलेज में शिक्षा के पर्याप्त उपकरण के संसाधन होने चाहिए। शिक्षा में कौशल विकास की व्यवस्था की आवश्यकता है। कोर्स में 30 प्रतिशत इंड्रस्टी  विषय को समायोजित करना चाहिए।  बच्चों को रोजगारमुखी शिक्षा के लिए केस स्टेडी सफल उद्योगवाले लोगों का अध्ययन करना चाहिए। युवाओं को ऐसी शिक्षा दी जाए जो अपने पांव पर खड़ा होने की शिक्षा की सबसे ज्यादा जरुरी है। अभी युवा अपने पांव पर खड़ा नहीं हो पाए। हमने विदेशों से क्रेडिट सिस्टम तो ले लिया है और नई शिक्षा नीति बना दी लेकिन इस शिक्षा को रोजगारमुखी नहीं बना पाए। इसका कारण है जो तीन साल का पाठ्यक्रम बनाया जा रहा है जिसमें हम केरियर आबजेक्टिव नहीं डाल रहे है। बच्चा किस दिशा में जाएगा। उसका उददेश्य ही उसको बच्चे पता नहीं है। रोजागार के लिए उद्देश्य परख विषय डाला जाए।          <br /><strong>- अनुज विलियम, शिक्षाविद्</strong></p>
<p><strong>नई शिक्षा प्रणाली के अनुरूप शिक्षक नहीं ढले है</strong><br />वर्तमान में सरकार ने नई शिक्षा प्रणाली लागू तो कर दी है। लेकिन इस नई शिक्षा नीति के अनुरूप शिक्षक तैयार नहीं कर पाए है। अभी कई शिक्षक अपडेट नहीं है। सिस्टम में तो बदलाव हो गया है लेकिन पढ़ाई और इसके संस्थागत ढांचे में अभी काफी बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा में प्रायोगिक शिक्षा ज्यादा होनी चाहिए। हिस्ट्री में टूरिज्म को जोड़ा जाए। साथ ही हेरिटेज टूरिज्म कोर्स चलना चाहिए जिससे युवाओं रोजगार मिल सकें। शिक्षा ऐसी हो जिससे युवा आॅलराउडर बन सकें। जिससे देश समाज में एक अच्छा इंसान के साथ रोजगार मुखी व्यक्ति मिलेगा। शिष्य और गुरु के बीच संवाद कायम होना जरुरी है। डमी स्कूल और कोचिंग शिक्षा जगह बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना ज्यादा जरुरी है।  अभी बच्चों को मशीन बना दिया है। उन्हें व्यवहारिक ज्ञान से दूर रखा जा रहा है। 2010 तक शिष्य गुरु का सम्मान करता था। लेकिन अब गुरु शिष्य के रिश्ते कमजोर हो रहे है। <br /><strong>- डॉ. सुषमा आहुजा, समाजसेविका, सोशल क्लब</strong></p>
<p><strong>मंथन के बिंदु</strong><br />- नई शिक्षा नीति जल्द लागू हो<br />- नई शिक्षा नीति की खामियों पर काम किया जाए<br />- वर्तमान व्यवस्था के लिए समाज, सरकार, शिक्षक,परिवार सब जिम्मेदार<br />- शिक्षा के बुनियादी ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत<br />- कोर्स में रोजगार से जुडने संबंधी पाठ्य.क्रम शामिल हो<br />- इनफ्रास्ट्क्चर मजबूत किया जाए।<br />- इन्क्यूबैशन सेन्टर बनाए जाएं<br />- मल्टीपल च्वाइस कोर्स करवाएं लेकिन ऐसी व्यवस्था भी करें<br />- डमी स्कूल व्यवस्था बंद हो<br />- डाक्टर इंजीनियर ही नहीं अन्य रोजगार के रास्ते शिक्षा के माध्यम से बताए जाएं।</p>
<p><strong>नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन हो </strong><br />सरकार ने जो नई शिक्षा नीति लागू की है वह काफी अच्छी है। उस शिक्षा नीति का क्रियांवयन भी सही ढंग से किया जाए तो उसका लाभ होगा। बच्चे को स्कूल से ही ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वह अपना सर्वांगीण विकास कर सके। वह तभी होगा जब बच्चा नियमित कक्षा में जाएगा। फिर चाहे वह स्कूल हो या कॉलेज। बिना कक्षा में जाए उसे व्यवहायिक ज्ञान नहीं मिल सकता।  विशेष रूप से उच्च शिक्षा में बच्चे की कक्षा में उपस्थिति को अनिवार्य कर दिया जाए तो उससे काफी हद तक बच्चे की शिक्षा का स्तर सुधर सकता है। डमी स्कूलों में प्रवेश न हो इसके लिए अभिभावकों को ही विचार करना होगा। बचपन से ही कोचिंग भेजने की परम्परा गलत होती जा रही है। बच्चे की प्रतिभा को शिक्षक से अधिक उसके माता पिता समझते हैं। <br /><strong>- दिनेश विजय, निदेशक मां भारती ग्रुप </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Thu, 27 Jun 2024 12:00:04 +0530</pubDate>
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