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                <title>talk show - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>स्टार्टअप स्केलिंग के लिए सिस्टम की पैचिदगियां बड़ी चुनौती, एकल विंडो की जरूरत, आइडिया, टैलेंट, फंड और मजबूत तकनीक जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[ यूनिकार्न के लिए प्रबंधन, बाजार की समझ और वित्तीय अनुशासन प्रभावी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/systemic-complexities-pose-a-major-challenge-for-scaling-startups--a-single-window-system-is-needed--alongside-ideas--talent--funding--and-robust-technology/article-160693"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-07/1200-x-600-px)-(1)86.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। स्टार्टअप को स्केल करने के लिए केवल फंडिंग ही पर्याप्त नहीं है। आइडिया, सही टीम, मजबूत तकनीक, प्रभावी प्रबंधन, बाजार की समझ और वित्तीय अनुशासन अपनाने पर ही स्टार्ट अप हाडौती में सफल हो सकते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बना सकते हैं। यह बात उभर कर आई दैनिक नवज्योति की बुधवार को हुई मासिक परिचर्चा में। दैनिक नवज्योति कार्यालय में आयोजित इस टॉक शो का विषय था हाडौती में स्टार्टअप स्केलअप होने के लिए किस तरह की चुनौतियां हैं( चैलेंजज इन स्केलिंगअप स्टार्ट अप इन हाडौती) । इस टॉक शो में इंडस्ट्री,व्यापार,नये और पुराने स्टार्टअप के फाउंडर,कोटा व्यापार संघ से जुडे सदस्य,एसएसआई के मैंबर, आई स्टार्ट के मेंटोर,चार्टर एकाउंटेंट, कंपनी सैकेट्री, सरकारी और प्राइवेट एजेसियों से जुड़े लोगों  ने हिस्सा लिया। प्रस्तुत हैं टॉक शो के उसके अंश-</p>
<p><strong>यह हैं स्टार्टअप स्केलअप के चैलेंज</strong><br />- स्टार्टअप के विस्तार के लिए पूंजी की कमी<br />- टैलेंट और कर्मचारियों की कमी<br />-राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना आसान नहीं होता<br />- तकनीकी प्रणाली मजबूत नहीं होने पर सेवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती <br />-मजबूत प्रबंधन टीम बनाने की आवश्यकता <br /> -नकदी प्रवाह का प्रबंधन<br /> -स्ट्रेटीजी तैयार हो, बाजार में बड़ी कंपनियां भी प्रवेश कर सकती हैं<br />- उत्पाद या सेवा की गुणवत्ता मेंग्राहक संतुष्टि बनाए रखना बड़ी चुनौती<br />- टैक्स, डेटा सुरक्षा, श्रम कानून, लाइसेंस और अन्य सरकारी नियमों का पालन बड़ी चुनौती<br />-सही समय पर, नियंत्रित और टिकाऊ विस्तार</p>
<p><strong>न्यूक्लियर पावर अपॉर्च्युनिटी</strong><br />हाड़ौती में न्यूक्लियर पावर की प्रचुरता है। इससे संबंधित स्टार्टअप पर फोकस कर उसे शुरू किया जाए तो उसका अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इस क्षेत्र में कोटा व हाड़ौती के स्टार्टअप पूरे देश में अपनी पहचान बना सकते हैं और यहां से विकसित राजस्थान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। लेकिन अधिकतर लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है। साथ ही स्टार्टअप शुरू करने व इन्हें प्रोत्साहित करने के सरकारी नियम तो बने हुए हैं उसमें कई तरह की छूट का प्रावधान भी किया गया है लेकिन उनका वास्तविक रूप में लाभ नहीं मिल पा रहा है। यदि शत प्रतिशत लाभ मिलने लगे तो कोई कारण नहीं हैं कि स्टार्टअप स्केलअप नहीं कर सकें। साथ ही युवाओं को रोजगार व उनकी आय के साधन भी मिलने लगेंगे।<br /><strong>-गोविंद राम मित्तल, फाउंडर प्रेसिडेंट द एसएसआई एसोसिएशन</strong></p>
<p><strong>पूरी रिसर्च से शुरू करें स्टार्टअप</strong><br />स्टार्टअप शुरू करना किसी बिजनेस से कम नहीं है। इसके लिए पहले पूरी तैयारी करने की जरूरत होती है। किसी भी काम के बारे में पूरी जानकारी करने के बाद ही शुरू करने पर उसमें सफलता मिलने की संभावना अधिक रहती है। हालांकि सरकार की ओर से स्टार्टअप को प्रमोट करने के लिए नियम व नीतियां तो अच्छी बनाई गई हैं। लेकिन सरकारी सिस्टम में कई कमियां हैं जिनके कारण युवा चाहकर भी अपना स्टार्टअप शुरू करने के बाद उसे आगे नहीं बढ़ा पाते हैं। चीन में उद्योग बढने का कारण वहां सुुविधाएं अधिक है। जबकि तुलनात्मक रूप से भारत में उद्योग, व्यापार या स्टार्टअप को शुरू करने व आगे बढ़ाने में सुविधाएं बाधक बन जाती हैं।<br /><strong>-अशोक माहेश्वरी ,प्रेसिडंट होटल फेडरेशन आॅफ राजस्थान कोटा डिवीजन</strong></p>
<p><strong>स्टार्टअप की स्केल प्रोडक्ट पर निर्भर</strong><br />स्टार्टअप को शुरू हुए दस साल हो गए हैं। देशभर में अब तक दो लाख स्टार्टअप हो चुके हैं। हाड़ौती में 560 व कोटा में 490 स्टार्टअप हैं। नवम्बर 2025 के एक ही महीने में एक साथ 150 स्टार्टअप शुरू हुए थे। लेकिन बहुत कम स्टार्टअप ऐसे है जो व्यापक स्तर पर अपनी पहचान बना सके हैं। राजस्थान के दो ही स्टार्टअप देशभर में अपनी पहचान बना पाए हैं। स्टार्टअप स्केल की समस्या स्थानीय स्तर पर ही नहीं है पूरे देश की समस्या है। स्टार्टअप स्केल प्रोडक्ट पर निर्भर करता है। प्रोडक्ट की डिमांड अधिक होगी तो उसका मार्केट भी उतना ही बड़ा होगा। स्टार्टअप शुरू करने से पहले उससे संबंधित सभी पहलुओं की तैयारी करनी पड़ती है तभी सफलता संभव है।<br /><strong>-कोस्तुभ भट्टाचार्य, मेंटोर स्टार्टअप कंसलटेंट आई स्टार्ट राजस्थान</strong></p>
<p><strong>स्टार्टअप स्केलअपन में फंड मैनेजमेंट बड़ी समस्या</strong><br />स्टार्टअप का मतलब ही नए सिरे से किसी व्यवसाय को शुरू करना है। एक बार हिम्मत कर युवा स्टार्टअप शुरू कर भी देते हैं लेकिन उसे आगे बढ़ाने के लिए फंड की आवश्यकता होती है। जबकि फंडिंग ही नहीं होने से युवा अपने स्टार्टअप को आगे नहीं बढ़ा पाते। हालांकि स्टार्टअप को आगे बढ़ाने के लिए कनेक् शन भी होने चाहिए। उन्हें भी फंडिंग व कनेक् शन की समस्या का सामना करना पड़ा था लेकिन देर से ही सही समाधान भी मिला। अब वे गुजरात, मध्य प्रदेश व दिल्ली समेत कई जगह पर अपना काम कर रहे हैं।<br /><strong>-शुभम शर्मा फाउंडर सीबीएस प्लीवर स्टार्टअप</strong></p>
<p><strong>मार्केट की स्वीकार्यता बड़ी चुनौती</strong><br />कोई भी स्टार्टअप शुरू करना तो आसान है। लेकिन उसकी मार्केट में एक्सेबिलिटी भी होनी चाहिए। युवाओं द्वारा जो प्रोडक्ट तैयार किया जा रहा है उसकी मार्केट में डिमांड होगी तो वह ग्रो करेगा वरना परेशानी होती है। हालत यह है कि कई स्टार्टअप इसलिए भी आगे नहीं बढ़ पाते कि उनके द्वारा जो प्रोडक्ट तैयार किया जाता है उसका प्रमोशन नहीं होने से मार्केट नहीं मिल पाता। आरएनडी भी बड़ी समस्या रहती है। मार्केट के साथ उसका प्रमोशन उतना ही जरूरी है।<br /><strong>-सिद्धार्थ गुप्ता ,ट्रेजरार डिवी. चैम्बर आॅफ कामर्स</strong></p>
<p><strong>बेस्ट टैलेंट की कमी</strong><br />कोटा में स्टार्टअप तो कई शुरू हो रहे हैं। लेकिन ऐसे स्टार्टअप जो देश में अपनी पहचान बनाएं ऐसा स्टार्टअप शुरू करने के लिए यहां तकनीकी विशेषज्ञ या इंजीनियर ही नहीं है। टेलेंट व काम करने वालों की कमी है। लोग स्टार्टअप शुरू तो कर देते हैं लेकिन उसे आगे बढ़ाने के लिए काम की गम्भीरता व जुनून भी होना चाहिए। बाहर से तकनीकी विशेषज्ञ मंगवाने पर उनकी कीमत अधिक चुकानी पड़ती है। साथ ही महिलाओं को स्टार्टअप शुरू करने या उनके प्रोडक्ट को मार्केट में पहचान दिलाने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पडता है।<br /><strong>-नेहा गुप्ता फाउंडर गेन बुक स्टार्टअप</strong></p>
<p><strong>माकेर्टिंग और प्रमोशन के साथ रिसर्च की जरूरत</strong><br />स्टार्टअप शुरू करने से पहले जो भी प्रोडक्ट तैयार किया जाए उसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए। प्रोडक्ट तैयार करने व उसकी माकेर्टिंग और प्रमोशन के लिए फंड की आवश्यकता होती है। लेकिन स्टार्टअप के सामने सबसे बड़ी समस्या ही फंड की रहती है। साथ ही जिस स्तर का स्टार्टअप होना चाहिए उसमें काम करने के लिए उस स्तर का टेलेंट नहीं मिल पाता है। जिससे स्टार्टअप एक सीमित दायरे तक ही रह जाते हैं। कोटा व हाड़ौती के स्टार्टअप को आगे बढ़ाने की जरूरत है। जिससे युवाओं को रोजगार के साथ ही उनके प्रोडक्ट की डिमांड भी बढ़े।<br /><strong>-सीए सुधांशु उपाध्याय सैकेट्री आईसीएआई</strong></p>
<p><strong>कई सरकारी औपचारिकताएं बाधक बन रही</strong><br />जिस तरह से कई विभागों में सीएसआर का फंड दिया जाता है। उसी तरह का फंड यदि स्टार्टअप को दिया जाए तो उन्हें आर्थिक सम्बल मिलेगा। स्टार्टअप को फंडिंग के लिए एक सिस्टम बनाने की आवश्यकता है। वहीं दूसरी तरफ स्टार्टअप शुरू करना तो आसान है लेकिन उसके ग्रो करने में कई सरकारी औपचारिकताएं बाधक बनती हैं। उन सिस्टम को सुधारने की जरूरत है। स्टार्टअप में प्रोडक्ट उत्पादन पर फोकस किया जाएगा तो अधिक लोगों को रोजगार भी दिया जा सकेगा।<br /><strong>-अमित सिंघल, डायरेक्टर इंडेक्सल इंजीनियरिंग</strong></p>
<p><strong>नई तकनीक पर आधारित स्टार्टअप ग्रो तेजी से करेंगे</strong><br />समय के साथ बदलाव बहुत जरूरी है। फिर चाहे व कोई प्रोडक्ट हो या शिक्षा का क्षेत्र। शिक्षा के क्षेत्र में भी नए-नए स्टार्टअप शुरू किए जा सकते हैं। लेकिन उनमें मेन पावर के साथ ही एआई का अधिक उपयोग किया जाएगा तो उनकी डिमांड व उपयोगिता अधिक होगी। एआई आधारित प्रोडक्ट की डिमांड अधिक होने से उस काम को करने वाले अधिक युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। नई तकनीक पर आधारित स्टार्टअप की कोटा व हाड़ौती में ही नहीं पूरे देश में डिमांड रहेगी तो स्टार्टअप ग्रो भी तेजी से करेंगे।<br /><strong>-सुदर्शन माथुर ,डायरेक्टर एलबीएस एजुकेशन ग्रुप</strong></p>
<p><strong>सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया जाए </strong><br />स्टार्टअप को प्रमोट करने के लिए नियम व नीतियां तो बनी हुई हैं लेकिन सिस्टम में कई कमियां हैं। माइंड सेट ही नहीं है। जिनके कारण स्टार्टअप शुरू करने वालों को कई परेशाननियों का सामना करना पड़ता है। सरकारी सिस्टम में सुधार करने की जरूरत है। साथ ही सिंगल विंडो सिस्टम को लागू किया जाए तो युवाओं को सुविधा होगी और स्टार्टअप अधिक सुगमता से काम कर पाएंगे।<br /><strong>-समीर सूद, सैकेट्री एसएसआई एसोसिएशन</strong></p>
<p><strong>स्टार्टअप पर वर्तमान हालात की मार</strong><br />देश दुनिया में जो हालात हैं उससे स्टार्टअप भी अछूते नहीं हैं। इन पर असर पड़ रहा है। मार्केट ग्रोथ में 40 फीसदी कमी आई है। मैने नोएड़ा में वर्क किया पर वहां पर काफी कर्मचारी कोटा सहित अन्य जगहों के कर्मचारी मेरे पास काम करते थे। जिसमे कुछ तो इंटर करने के लिए आते थे तो कुछ अपना टैलेंट एक्सप्लोर करने के लिए आते थे।मेरी मैंटलिटी हमेशा से रही है कि मैं कोटा में ही रहकर काम करूं, इसके लिए मेरे प्रयास हमेशा ही रहत ेथे कि अधिक से अधिक पैसा बाहर से लाने की कोशिश करता हूं। अभी युद्ध से सहित अन्य विभिन्न कारणों से स्टार्टअप फील्ड और अन्य फील्ड में करीब 40 प्रतिशत गिरावट र्दज की गई हैं। इसके चलते हमने बड़ी-बड़ी कंसल्टेंसी कंपनियों को अभी रूक रखा हैं।<br /><strong>-सिद्धार्थ वशिष्ठ ,फाउंडर रिपोर्टस एन्ड इनसाइज बिजनस रिसर्चर </strong></p>
<p><strong>पानी बिजली कोचिंग बड़ी संभावनाएं </strong><br />कोटा में भारी संभावना है। हाड़ौती में पानी, बिजली सहित अन्य व्यवस्था यहां पर हैं। यहां तीन लाख बच्चे आते हैं। इसे टैलेंट में बदलना होगा। यह एक  अपॉर्चुनिटी है। कुछ समय पहले हमारी एसोसिएशन ने हाड़ौती में रोजगार और बिजनेस को लेकर क्या संभावना हैं। साथ ही हाड़ौती के लिए क्या कुछ कर सकते हैंं पर गंभीर चर्चा की। रोजगार बढ़े और अधिक से अधिक से लोग लाभांवित हो इसके लिए क्या करना चाहिए। पैरेंटस यहां पर केवल मेडिकल की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेज रहे हैं। पर हमे कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे बच्चा यहां पर मेडिकल के साथ ही डिजिटल शिक्षा, स्किल डवलपमेंट सहित अन्य फील्ड में भी वहां शिक्षा प्राप्त कर सके। क्यो कि अभी पैरेंटस शहर में बच्चे को डर-डर के यहां पर भेज रहा हैं।<br /><strong>-राजेश गुप्ता , प्रेसिडंट डिवीजनल चैम्बर आॅफ कामर्स</strong></p>
<p><strong>मार्केट और सेल में खुद उतरना पड़ता है </strong><br />मैंने बिजनेस की शुरूआत पापड़ व मंगोड़ी बनाने सहित अन्य कार्य से की जिसमें घर-घर जाकर पापड़ बेचे। फिर शुरूआत में मेरे साथ एक महिला जुड़ी इस तरीके से मेरे साथ महिलाएं जुड़ती गई। अब करीब मेरे पास 80 महिलाएं काम करती हैं। शुरूआत में बिजनेस में लोन लेने के लिए भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ग्राहक भी प्रोडक्ट नहीं खरीदते थे उनको समझना पड़ता था। तब जाकर प्रोडक्ट कि सेल बढ़ी, उसके बाद मैंने लड्डू गोपाल कि पोशाक बनाना शुरू तो उसके बारे में इधर-उधर से जानकारी जुटाई और इस कार्य को आगे बढ़ाया। बहुत सी बार वर्कस को सुविधाएं देने के बाद भी वहां हमारे साथ कार्य नहीं करना चाहता है। तो इस दौरान हमको विभिन्न परेशानी का सामना करना पड़ता हैं।<br /><strong>- भावना करमचंदानी .बिजनस वुमन</strong></p>
<p><strong>सीएसआर फंडिंग का एक हिस्सा स्टार्टअप्स के लिए भी निर्धारित हो</strong><br />स्टार्टअप के लिए इकोसिस्टम भी तेजी से उभर रहा है। सरकार और विभिन्न संस्थाओं के प्रयासों से नवाचार को बढ़ावा मिला है। स्टार्टअप्स को बनाए रखने के लिए बेहतर प्रशिक्षण और उद्योग का एक्सपोजर देना होगा। सीएसआर फंडिंग का एक हिस्सा स्टार्टअप्स के लिए भी निर्धारित होना चाहिए, जिससे उन्हें शुरूआती स्तर पर अवसर मिल सके। सरकार को, उद्योग, निवेशकों, शिक्षण संस्थानों और स्टार्टअप्स से जोड़ने वाला एकीकृत डिजिटल पोर्टल विकसित किया जाना चाहिए, जहाँ अपनी समस्या साझा करें और स्टार्टअप्स के लिए समाधान प्रस्तुत कर सकें।<br /><strong>- आयुष त्यागी, मेंटोर आई स्टार्टअप राजस्थान</strong></p>
<p><strong>फंड राइजर्स के लिए प्रयास ज़रूरी<br /></strong>मैंने पिछले सालों में करीब तीस हजार लोगों को रोजगार दिया साथ ही कई कंपनियों के साथ हम कार्य करते हैं। इसके तहत एमएसएमई संस्था प्राय सरकारी योजनाओं की विभिन्न सूचनाएं सहित अन्य सूचनाएं उद्योगों को उपलब्ध करती हैं। साथ ही विभिन्न सरकारी कार्यालय और उद्योगों केबीच संस्था सेतु का काम करती हैं। साथ ही हमारा प्रयास है कि 18-25 वर्ष तक का बच्चा कोटा शहर में रहकर की कार्य करें। साथ ही एमएसएमई के माध्यम से शॉर्ट टैंक से बातचीत करके शहर के उद्योगों को शॉर्ट टैंक से रिवॉर्ड लेकर आ रहे हैं।<strong><br />-दीपक मेहता , एसएसई एसोसिएशन अध्यक्ष</strong></p>
<p><strong>फंड के लिए विश्वास हासिल करना चुनौती<br /></strong> देखा जाएं तो स्टार्टअप में बेसिकली सबसे ज्यादा समस्या फंडिग की आती है क्योकि एंट्ररप्रेन्योर अभी बिजनेस बिल्ड करना चाहते हैं जिसको लेकर उनको परेशानी का सामना करना पड़ता हैं।साथ ही जो पुरानी कंपनियां है फंडिग के लिए उनको प्राथमिकता मिलती हैं। जो पुराने बिजनेस करने वाले है वहां अपना कार्य का तरीका नहीं बदल पा रहे हैं। स्टार्टअप को फंड्स के लिए जल्द कोई तैयार नहीं होता। इस क्षेत्र में आप उतर रहे हैं तो मार्केट रिसर्च बहुत जरूरी है। टैलेंट और लिक्विट केपिटल पर भी ध्यान देना पड़ेगा।<strong><br />-दीक्षा दुग्गड़,कंपनी सचिव आईसीएसआई कोटा</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 15:29:50 +0530</pubDate>
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                <title>एआई और इंटरनेट दो धारी तलवार </title>
                                    <description><![CDATA[भारत में डॉक्टर्स की कमी बड़ा कारण, गूगल से पूछ कर हजारों खुद की कर रहे उपचार।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/ai-and-the-internet--a-double-edged-sword/article-158105"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/1200-x-600-px)-(3)12.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति द्वारा आयोजित मासिक परिचर्चा की श्रंखला में गुरूवार को एआई व इन्टरनेट स्वास्थ्य संबंधी जानकारी समझने के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं लेकिन इलाज तय करने के लिए उस पर कितना निर्भर हो सकते हैं ( हाउ मच टू रिलाई ओन इंटरनेट एन्ड एआई फॉर ट्रीटमेंट आफ एनी एइलमेंट) विषय पर आयोजित किया गया। इसमें गवर्नमेंट कॉलेज के् डाक्टर्स,आयुर्वेद, होम्योपैथ,वकील टेक्नोलॉजी से जुडे विशेषज्ञों ने भाग लिया। परिचर्चा में कहा गया कि  इलाज तय करने के लिए केवल इंटरनेट या एआई पर पूरी तरह निर्भर होना उचित नहीं है। आॅनलाइन उपलब्ध जानकारी सामान्य होती है, जबकि हर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति, चिकित्सा इतिहास और लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। कई बार इंटरनेट पर अधूरी, पुरानी या भ्रामक जानकारी भी मिल सकती है, जिससे अनावश्यक चिंता बढ़ सकती है। डॉक्टर की शारीरिक जांच, परीक्षणों और चिकित्सकीय अनुभव का विकल्प नहीं है। इसलिए इंटरनेट और एआई को स्वास्थ्य जागरूकता तथा प्रारंभिक जानकारी के साधन के रूप में उपयोग करना चाहिए, जबकि सही निदान और उपचार के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है।<br />प्रस्तुत है टॉक शो के अंश...  </p>
<p><strong>AI</strong><br />- केवल दी गई जानकारी के आधार पर जवाब देता है।<br />-  इनकी प्रत्यक्ष जांच नहीं कर सकता।<br />- केवल लिखे या बताए गए लक्षणों को समझता है।    <br />- उपलब्ध डेटा और पैटर्न के आधार पर सुझाव देता है।  <br />- रिपोर्टों का सामान्य विश्लेषण कर सकता है।    <br />- उपचार लागू नहीं कर सकता।                        </p>
<p><strong>Doctor</strong><br />- मरीज की शारीरिक जांच कर सकता है।    <br />- नाड़ी, रक्तचाप, तापमान आदि स्वयं माप सकता है।    <br />- चेहरे के भाव, चलने-फिरने और व्यवहार का अवलोकन कर सकता है।    <br />- मेडिकल इतिहास और वर्तमान स्थिति को जोड़कर निर्णय लेता है।<br />- जांच रिपोर्टों की व्यावहारिक व्याख्या कर सकता है।<br />- आवश्यकता पड़ने पर तुरंत उपचार शुरू कर सकता है। </p>
<p><strong>एआई सहयोगी, पर टच  थैरेपी जरूरी</strong><br />समाज में जिस तरह का परिवर्तन हो रहा है। डॉक्टर भी उसी के अनुरूप स्वयं को ढाल रहे हैं। एआई के इस युग में जिस तरह की गम्भीर बीमारियां हो रही हैं उनका सही इलाज करने के लिए मशीनों का उपयोग जांच में किया जा रहा है। लेकिन एआई का मतलब कृत्रिम बुद्धिमता है उसे इंसान ने ही बनाया है। ऐसे में यह बीमारियों की जानकारी के लिए सहयोगी तो हो सकता है लेकिन डॉक्टर नहीं बन सकता। बीमारी का सही इलाज तो डॉक्टर मरीज व उनके लक्षण को देखकर ही कर सकते हैं। बीमारी के इलाज में यदि  हर कोई व्यक्ति एआई का उपयोग करने लगेगा तो उसे लाभ होने की जगह नुकसान होने की संभावना अधिक है। अमेरिका में बिना डॉक्टर के इलाज के दवाई नहीं मिलती। जबकि भारत में हर कोई एआई व गूगल से पूछकर ही  स्वयं बीमारियों का उपचार मेडिकल से दवाईयां लाकर कर रहे हैं। यह मरीज के लिए हानिकारक हो सकता है।  <br /><strong>- डॉ. एस.एन. गौतम, वरिष्ठ न्यूरो सर्जन गर्वनमेंट मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>एआई जिसके लिए बना है वही करे उपयोग</strong><br />बदलते समय के साथ ही जिस तरह से तकनीकी युग आया है। उसमें इससे दूर नहीं रहा जा सकता। तकनीक व एआई का उपयोग जानकारी के लिए किया जाना तो अच्छा है। लेकिन इसका उपयोग चिकित्सा के क्षेत्र में हर किसी के द्वारा किया जाना सही नहीं है। एआई जिसके लिए बना है यदि वही इसका उपयोग करेंगे तो उसका लाभ होगा। लेकिन गलत व्यक्ति द्वारा उसका उपयोग करने पर उससे नुकसान ही होगा। मसलन परमाणु सही हाथ में होता है तो उर्जा उत्पन्न करता है। गलत हाथों में वही विस्फोट भी करता है। अर्थात एआई का भी सही जगह पर उपयोग होना ठीक है। कई मरीज डॉक्टर के पास आने से पहले ही एआई से पूरी जानकारी लेकर आते हैं। ऐसे में उन्हें बीमारी के बारे में समझाना मुुश्किल होता है। कई बार वह  समझने को तैयार नहीं होत।  एआई जानकारी के लिए तो सही है लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में बीमारी के इलाज में डॉक्टर ही सही सलाह दे सकते हैं। <br /><strong>-डॉ. नीलेश जैन, प्राचार्य  गर्वनमेंट मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong> एआई पर नेगेटिव कंटेंट ज्यादा आते है</strong><br />मैं कोरोल पार्क में मेडिकल स्टोर का संचालन करती हूं। मेरे पास बहुत सी बार नीट के विद्यार्थी आते और बताते हैं कि हमे नींद नहीं आ रही है, गोली दे दो, स्टूडेंट उसके बारे में एआई पर सर्च करके खुद ही बोलते है कि यह गोली ही दो,  हम बहुुत सी बार उनको समझाते है।  लेकिन नहीं मानते है और एआई के हिसाब से वहां पढ़ाई के दौरान खुद ही इलाज के बारे में एआई से सलाह ले लेते है। एआई पर नेगेटिव कंटेंट ज्यादा आते हैं। मेरा मानना है कि एआई  डॉक्टर और मरीज के बीच रिश्ता खत्म करने का काम कर रहा हैं। <br /><strong>-सीमा प्रजापति, मेडिकल स्टोर संचालिका जिला अध्यक्ष मानवाधिकार सहयोग संगठन </strong></p>
<p><strong> स्वास्थ्य के लिए एआई ठीक नहीं है</strong><br /> स्वास्थ्य के लिए एआई ठीक नहीं हैं। कई बार मरीज बिना डॉक्टर से परामर्श लिए गोलियां खा लेता है जिससे उनकी किडनी खराब होने की संभावना बनी रहती है। आमतौर पर देखा जाएं तो 60 साल के बाद इंसान में विभिन्न प्रकार के शारीरिक बदलाव आते है जिसमें कम सुनना, बार-बार किसी बात को बोलना, कम दिखाई देना सहित  अन्य बदलाव उसमें आते हैं। इस बारे में यदि आप एआई पर देखेंगे तो आपको विभिन्न प्रकार की बीमारी एआई दिखा देगा। पर ये लक्षण हर व्यक्ति में होते हैं, आयुर्वेद में भी साइट इफैक्ट होते हैं। आयुर्वेद में हर बीमारी  व इंसान के हिसाब से दवाई निर्धारित की जाती हैं। जो कि एआई नहीं कर सकता हैं।  हमारे पास सर्जरी,मेडिसन सहित अन्य के विद्यार्थी आते है जो कि एआई से जानकारी लेकर आते हैं पर उनको ये भी पता नहीं होता है कि इनका उपयोग कैसे करना हैं। रोगी को डॉक्टर से ही इलाज लेना चाहिए।  <br /><strong>- वैध नित्यानंद शर्मा, प्राचार्य राजकीय आयुर्वेद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय  </strong></p>
<p><strong>डाक्टर्स की कमी भी बड़ा कारण</strong><br />मेरा मानना है कि जब डॉक्टर के पास मरीज देखने का लोड़ अधिक होगा।  तब मरीज एआई का उपयोग करता हैं। और जब डॉक्टर पेशेंट के सवाल का जवाब नहीं दे पाता है तो मरीज एआई से बीमारी का समाधान सर्च करता है। एआई से यदि आप बीमारी के बारे में पूछते है तो वहां गलत जानकारी भी हो सकती है।  एआई एल्गोरिदम से चलता है। मरीज बार-बार एआई से पूछता है तो वहां कुछ भी बता सकता हैं। एआई पर  नेगेटिव कंटेंट ज्यादा वायरल होते हैं। एआई पर ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए। <br /><strong>- तरनदीप कौर, कॉ फाउंडर एन्ड सीईओ आइक्रा, आई स्टार्टअप</strong></p>
<p><strong>जानकारी ले सकते हैं उपचार नहीं</strong><br />एआई व गूगल के जमाने में आज हर व्यक्ति डॉक्टर बन रहा है। छोटी हो या बड़ी बीमारी होने पर खुद ही इन तकनीक का उपयोग कर इलाज व दवाई तलाश कर रहे हैं। बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवाईयां भी ले रहे हैं। जबकि एक दवाई का असर हर बीमारी में ऐसा जैसा नहीं हो सकता। हर व्यक्ति एआई का उपयोग कर स्यवं ही विशेषज्ञ बन रहा है।  एआई पर एलोपैथी से  होम्योपैथी व आयुर्वेदिक की जानकारी अधिक मिल रही है। इसमें कोई भी कुछ भी तथ्य डाल रहा है। इसमें साइड  इफेक्ट की संभावना कम है। जबकि डॉक्टर टच थैरेपी से मरीज का सही इलाज कर सकते हैं। एआई जानकारी दे सकता है सही इलाज नहीं कर सकता। <br /><strong>-महेश शारदा, इंजीनियर शारदा मेडिकल स्टोर</strong></p>
<p><strong>सोशल मीडिया के नुकसान भी और फायदे भी , सब बाजार का खेल</strong><br />एआई से स्वास्थ्य संबंधित प्रश्न पूछ सकते है पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। देखा जाए तो 2008 में एक साथ तीन चीजे बाजार में लॉंच हुई थी जिसमें बिटकॉइन सहित अन्य थी। एआई अभी मार्केट में आया है और इसको डवलप किया जा रहा हैं। जैसे की एक बार आप सोशल मीडिया पर किसी चीज के बारे में सर्च करेंगे तो आपको एफबी, इंस्ट्राग्राम सहित अन्य सोशल मीडिया  पर वे विज्ञापन दिनभर आते रहेंगे। बहुत सी बार हम एआई पर हम स्वास्थ्य संबंधित रिपोर्ट डालकर पूछते है तो वहां हमें जानकारी देता हैं। इसी तरह से हम अपनी जानकारी धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर शेयर करते जाते हैं। जिससे हमारी जानकारी हम सोशल मीडिया पर परोस रहे हैं।  पहले तो एफबी सहित अन्य सोशल मीडिया व रील से पता चलता था। पर अब एआई से पता चल रहा है कि अब किस के घर में क्या हो रहा हैं। मेरा मानना है कि टीनऐजर के लिए सोशल मीडिया ब्लॉक करना चाहिए। <br /><strong>- संजय कुमार विजय,एडवोकेट व स्कूल डायरेक्टर </strong></p>
<p><strong>बिना जानकारी स्वास्थ्य पर एआई का उपयोग हानिकारक</strong><br />परिवर्तन समाज का नियम है। पिछले कुछ समय में तकनीक के क्षेत्र में काफी तेजी से परिवर्तन हुआ है।  इस परिवर्तन में तकनीक जिसके लिए बनी है वही इसका उपयोग करे तो लाभ होगा। एआई का उपयोग करके ही कृषि के क्षेत्र में कई नवाचार किए हैं। एआई का उपयोग अलग-अलग कई क्षेत्रों में तो किया जा सकता है। लेकिन स्वास्थ्य पर इसका उपयोग बिना डॉक्टर की सलाह से करना गलत है। एआई बीमारी के उपचार में उतनी सही जानकारी नहीं दे सकता जितनी एक डॉक्टर मरीज को देखकर दे सकते हैं। इसलिए इलाज में तो एआई का उपयोग करना गलत होगा।  <br /><strong>- आर्यन सिंह, एआई एन्ड स्मार्ट टेक्नॉलॉजी विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>इंटरनेट बुरा नहीं बस उपयोग कितना और कैसे  करें </strong><br />मेरे नजरिया से एआई बुरा नहीं है। यह हमनें कई तरह की जानकारी देता है। हमें प्रारंभिक सूचना और जानकारी मुहैया कराता है। लेकिन मामला निर्भरता का है। विश्वास करने का है। कई बार तकनीक पर निर्भरता रोग के लेवल तक पहुंच जाती है। एआई कीवर्ड के हिसाब से सूचना देता है। सूचना लेने या जानकारी के बाद डॉक्टर के पास जरूर जाना चाहिए। घर पर आॅक्सीमीटर से यदि आप प्लस नाप लें और ब्लड़ की आॅक्सीजन का पता लगा ले पर अंत में डॉ. से जरूर सलाह लेनी चाहिए। डॉक्टर की तरह  एआई इलाज नहीं कर सकता हैं। मात्र आपके कीवर्ड से आपको सलाह दे सकता है। <br /><strong>-जनार्दन राय, रिटायर्ड कमांडेंट बीएसएफ </strong></p>
<p><strong> गूगल व एआई का खिलाड़ी अधिक कर रहे उपयोग</strong><br />एआई व गूगल का उपयोग आज हर क्षेत्र में जानकारी के लिए तो किया ही जा रहा है। अब तो लोग इससे अपनी बीमारियों का भी इलाज करने लगे हैं। खिलाड़ी चाहे वह किसी भी खेल का है उसे चोट लगने या बीमार होने पर वह एआई व गूगल से ही उसका उपचार व दवाई तलाशकर उसका उपयोग कर रहा है। जिससे सबसे अधिक स्ट्रॉराइड का उपयोग किया जा रहा है। यह खिलाड़ी व उनके शरीर के लिए नुकसान दायक है। ऐसे में कई खिलाड़ी तत्काल तो राहत पा रहे हैं लेकिन भविष्य में यह उनके लिए हानिकारक हो रहा है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। बीमारी या चोट में इलाज और दवाई तो डॉक्टर की सलाह से ही लेना बेहतर है। <br /><strong>-अशोक औदिच्य,सचिव बॉडी बिल्डिंग</strong></p>
<p><strong>इंटरनेट पर  गलत या अधूरी जानकारी हो सकती है</strong><br />मान लीजिए किसी व्यक्ति को साधारण सिरदर्द हुआ। वह इंटरनेट पर खोज करता है। वह माइग्रेन, ब्रेन ट्यूमर या अन्य गंभीर बीमारियों की जानकारी देखकर  डर जाता है और बार-बार खोज करने लगता है। इससे उसकी चिंता और बढ़ जाती है। एआई  बीमारी के बारे में सामान्य जानकारी देने, संभावित कारणों को समझाने के लिए,दवाओं, जांचों और रिपोर्टों को समझाने के लिए तो ठीक है लेकिन एआई आपकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री नहीं जानता, बॉडी की  जांच नहीं कर सकता, कई बीमारियों के लक्षण एक जैसे होते हैं। इंटरनेट पर गलत या अधूरी जानकारी हो सकती है। कभी-कभी गलत निष्कर्ष भी दे सकता है। ऐसे में डाक्टर की सलाह पर ही पूरा भरोसा करना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. केवल कृष्ण डंग, वरिष्ठ श्वांस रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता एआई</strong><br />एआई का उपयोग आज की आवश्यकता है। इससे बिना नहीं रहा जा सकता। लेकिन हर जगह इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से स्वास्थ्य के क्षेत्र में बिना डॉक्टर की सलाह के एआई का उपयोग करना नुकसान दायक हो सकता है। हर बीमारी के कई इलाज हो सकते हैं लेकिन हर इलाज हर व्यक्ति के लिए सही हो यह जरूरी नही हैं। ऐसे में जो काम डॉक्टर का है वह डॉक्टर को ही करने देना चाहिए। एआई सलाह व जानकारी दे सकता है लेकिन डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता। <br /><strong>- चेतन सैनी, निदेशकसुमंगलम ग्रुप</strong></p>
<p><strong>इलाज में विश्वसनीय तो डॉक्टर ही है</strong><br />एआई सूचनाओं का भंडार है।  एआई का उपयोग करके जानकारी प्राप्त की जा सकती है। वहां एक बीमारी के कई इलाज हो सकते हैं। लेकिन वह इलाज हर बीमारी व व्यक्ति पर अलग-अलग काम कर सकता है। ऐसे में एआई का उपयोग बीमारी के इलाज में व्यक्ति को स्वयं नहीं करना चाहिए। साइब्रर कांड्रीरिया की स्थिति बहुत खतरनाक है। इससे एंजाइटी बढ़ती है। जो रोग का रूप ले लेती है। एआई वही बताता है जो उसमें फीड किया हुआ है उसका अपना कोई निर्णय नहीं होता है। बीमारी में डॉक्टर का इलाज ही सही रहता है। इलाज में डॉक्टर ही विश्वसनीय है। <br /><strong>-आशुतोष माथुरिया, प्रिंसीपल, महात्मा गांधी मल्टीपरपज स्कूल गुमानपुरा</strong></p>
<p><strong>विकसित देश के लिए तकनीकी  जरूरी</strong><br />अभी की युवा पीढ़ी एआई का उपयोग कर रही हैं और हेल्थ सहित अन्य विभिन्न मामलों में एआई से सलाह ले रही है जो कि गलत हैं। वर्मा के अनुसार इंसान कितनी भी तरक्की कर ले पर उसको अपनी जड़े नहीं छोड़नी चाहिए। यदि आजकल के युवा तकनीकी पर निर्भर रहेंगे तो दिक्कत आएंगी। अब रोबोटिक सर्जरी हो रही हैं। यदि किसी की तबीयत खराब है तो वहां एआई से सलाह लेने के बजाय डॉक्टर के पास जावे और इलाज लेंवे। वहीं हम अभी   इसी फील्ड़ में कार्य कर रहे है संभवतया 2027 तक हम जो डॉक्टर ओपीडी मे मरीज देखते है उनके लिए भी कुछ तकनीकी लेकर आ रहे हैं। उदाहरण देकर समझाया कि हमारे साथी को पीलिया के लक्षण दिखा रहे थे हमने जब डॉक्टर को दिखाया तो वहां अलग ही बीमारी निकाली। फिर हमने डॉक्टर की सलाह से इलाज करवाया। वहीं इसमें पारिवारिक संस्कार भी  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तकनीक का सहारा लेमना चाहिए। तभी हम विकास कर सकेंगे। लेकिन स्वास्थ्य  संबंधित मामलों में केवल चेट जीपीटी या इंटरनेट पर ही भरोसा करना नुसान पहुंचा सकता है। <br /><strong>-जितेंद्र वर्मा, स्टार्टअप आर्किटेक्ट एन्ड प्रोजेक्ट राइटर(एआई)  </strong></p>
<p><strong>आधी-अधूरी जानकारी में खुद ही उलझ जाते हैं</strong><br />बच्चे आज कल घरवालों से बात नहीं करते और घर वाले भी बच्चों से सीधे संपर्क में नहीं रहते है। जिससे अभिभावक  बच्चों के बारे में समझ नहीं पाते और उनकी समस्याओं को भी नहीं समझ पाते।  बाद में डॉक्टरों से समाधान पूछते हैं। उसके बाद एआई पर समाधान पूछने के बाद डॉक्टर के पास पहुंचते है और अपना अनुभव बताते हैं। जिसके बाद एआई से परामर्श लेते है जो मरीज को उल्टा उलझा देता हैं। अंत में डॉक्टर के पास जाते हैं और एआई से आधी-अधूरी जानकारी लेकर लोग खुद ही उलझ जाते है। <br /><strong>-वंदना योगी, वाईस प्रिंसिपल गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल वल्लभनगर</strong></p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 11:02:29 +0530</pubDate>
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                <title>जब-जब कागज पर लिखा मैंने मां का नाम, कलम अदब से बोल उठी हो गए चारों धाम </title>
                                    <description><![CDATA[दैनिक नवज्योति ने मदर्स डे को खास बनाने के लिए विशेष टॉक शो आयोजित किया।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/whenever-i-penned-my-mother-s-name-upon-paper--my-pen-spoke-with-reverence--%22all-four-holy-pilgrimages-have-been-fulfilled/article-153373"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/1111200-x-600-px)-(3)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। लफ़्ज कम पड़ जाते हैं माँ की शान में,<br />वो खामोशी से पूरी किताब लिख देती है।<br />रविवार 10 मई को दुनिया भर में मदर्स डे मनाया जाएगा। यह दिन उस अनमोल रिश्ते को समर्पित है, जिसके बिना जीवन की कल्पना अधूरी है—मां। मां केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन की पहली गुरु, संस्कारों की आधारशिला और संघर्षों में सबसे मजबूत सहारा होती है।  दैनिक नवज्योति की ओर से इस दिन को स्पेशल बनाने के लिए मदर्स डे स्पेशल  टॉक शो का आयोजन किया गया। । नई पीढ़ी की माताएं और बदलती पालन पौषण शैली, आधुनिक मां बच्चों की परवरिश पहले से अलग तरीके से कैसे कर रही है विषयक   इस टॉक शो में  गृहिणी से लेकर डाक्टर, इंजीनियर,एन्ट्रप्रैन्योर, बुक राइटर, शिक्षक,वकील, बिजनसवुमन, एस्ट्रोलोजर, अधिकारी, कर्मचारी अर्थात  हर फील्ड से जुडी  मदर्स को आमंत्रित किया गया। इस टॉक शो में महिलाओं ने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया जिसे वह स्वयं महसूस कर रही हैं। तकनीक के इस युग में घर गृहस्थी  व नौकरी और व्यवसाय के साथ ही अपने बच्चों को शिक्षा व संस्कार देने का काम एक मां किस तरह से कर रही है। सबके साथ संतुलन बनाते हुए हाईटेक पेरेंटिंग के बारे में मदर्स ने बताया कि वे किस तरह से अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। जिसमें वे बच्चों के साथ भी समय बिता पा रही हैं और अपना काम भी कर रही हैं। प्रस्तुत हैं टॉक शो के कुछ अंश ।</p>
<p><strong>कंट्रोलिंग नहीं कनेक्टिव पेरेंटिंग हो</strong><br />बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी वैसे तो माता पिता दोनों की होती है। लेकिन बच्चे का सबसे अधिक जुड़ाव मां से होता है। बच्चों पर निगाह रखना व उनसे सम्पर्क बनाए रखना जरूरी है।  कंट्रोलिंग से अधिक उनसे कनेक्टिव पेरेंटिंग की जाए तो बच्चा सही ढंग से ग्रोथ कर पाता है।  जितना अधिक समय दिया जाएगा बच्चों को उतना ही अधिक समझा जा सकेगा और बच्चे भी अपनी मां को उतने ही बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। पिता से अधिक समय मां बच्चों के साथ रहती है। इस कारण से मां की जिम्मेदारी बच्चों के प्रति बढ़ जाती है। पिता भी किसी न किसी रूप में बच्चों के साथ अपना उतना ही जुड़ाव रखेंगे तो बच्चा पारिवारिक रूप से भी स्ट्रांग होगा। <br /><strong>-कीर्ति भाटी,गृिहणी (इंजी)</strong></p>
<p><strong>मां को देखकर ही सीखते हैं बच्चे</strong><br />बच्चों का वैसे तो अधिकतर समय अपनी मां के साथ ही बीतता है। इस काण वे उन्हें देखकर ही सीखते हैं। मां जिस तरह का व्यवहार घर परिवार व बच्चों के साथ करती है। बच्चे भी वैसा ही व्यवहार  करते हैं। कामकाजी महिलाएं घर के साथ काम में व्यस्त रहती हैं तो बच्चे उनके काम को भी समझने लगते हैं। बच्चे पहले से अधिक एडवांस हैं। ऐसे में छोटे बच्चों को अंडर एस्टीमेट नहीं किया जा सकता। उन्हें भावनात्मक सहयोग बनाए रखना जरूरी है। <br /><strong>-ऋचा गौतम, सहायक अभियंता व स्वास्थ्य अधिकारी, नगर निगम कोटा </strong></p>
<p><strong>काम के साथ बच्चे भी महत्वपूर्ण </strong><br />घर पर रहकर तो महिलाएं बच्चों की देखभाल करती ही हैं। लेकिन कामकाजी महिलाओं को अपना काम करने के साथ ही बच्चों की भी देखभाल करनी होती है। एक मां के लिए काम के साथ उनके बच्चे भी महत्वपूर्ण हैं। बच्चों को यदि मां समय नहीं देगी तो वे उनसे दूर हो सकते हैं। ऐसे में मां के लिए बच्चों से जुड़ाव विशेष रूप से इमोशनल जुड़ाव अधिक होगा तो बच्चे का विकास सही ढंग से हो सकेगा। <br /><strong>-मीनाक्षी गुप्ता,ब्यूटीशियन </strong></p>
<p><strong>बच्चों को शुरूआत से ही समझना होगा</strong><br />बच्चों को शुरूआत से ही समझना और समझाना होगा। कॉलेज व विवि में आने के बाद उन्हें समझाना उतना आसान नहीं है। मां का बच्चे से जुड़ाव होगा तो वह उनकी हर बात मां से शेयर कर सकेंगे। वरना हालत यह है कि बच्चे मांता पिता से अधिक शिक्षकों से अपनी बात शेयर करते हैं। बच्चा मां के बाद अपनी टीचर से अधिक सीखता है। ऐसे में आवश्यकता है कि बच्चों को माता पिता अधिक समय दें। उनकी बात को सुने और समझे। उनसे भावनात्मक जुड़ाव रखें। मां जिस तरह का व्यवहार बच्चों से करती हैं बच्चा वही सीखता है।  <br /><strong>-प्रो. अनुकृति शर्मा,कोटा यूनिवर्सिटी</strong></p>
<p><strong>बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करें</strong><br />बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करें, में घर पर तो बच्चों को संभालती हूं। साथ ही मे शहर स्थित नारी निकेतन की अधीक्षक होने के नाते वहां पर  आने वाले बच्चों को भी संभालती हूं। साथ ही घर के काम भी करती हूं। कई बार घर पर आने के बाद बच्चे बोलते है कि मम्मी आप तो हमारे तरफ ध्यान नहीं देती हूं। वहां पर आॅफिस के बच्चों से ज्यादा प्यार करती हूं।  कई बार मेरा बड़ा बेटा किताबे पढ़ता है तो मेरा मानना है कि छोटा भी उसको देखकर पढ़ाने लगाता हैं। वहीं बच्चों के साथ इमोशनल टच होना चाहिए।  बच्चों के साथ क्वालिटी समय बिताये और उनको समझे। <br /><strong>-अंशुल मेहंदी रत्ता, अधीक्षक नारी निकेतन कोटा</strong></p>
<p><strong>मां ही बच्चे की पहली गुरु</strong><br />एक बच्चे के लिए उसकी मां ही पहली गुरु होती है। बच्चा सबसे पहले मां के सम्पर्क में आता है।  बच्चे को भावनात्मक रूप से बचपन से ही समझना होगा। माता पिता जितना अधिक समय बच्चों के साथ बिताएंगे बच्चों का उनसे उतना ही अधिक गहरा जुड़ाव होगा। बच्चों को अंडर एस्टीमेट नहीं करना चाहिए कि वे कुछ नहीं समझते हैं।ौ आज के बच्चे सब कुछ समझते हैं। बस जरूरत बच्चों को समझने की है। उनसे किसी ने किसी रूप में जुड़ाव बना रहना चाहिए।  <br /><strong>-डॉ. स्मृति भटनागर,साफ्ट स्किल ट्रेनर </strong></p>
<p><strong>बच्चों की मित्रवत बनकर रहे मां</strong><br />मां वो शक्स है जिसमें बच्चे का पूरा संसार बसता है। ऐसे में आवश्यक है कि माता पिता विशेष रूप से मां को अपने बच्चों की मित्रवत बनकर रहना होगा। साथ ही एक सीमित दायरा भी रखना होगा। बच्चों की बात को सुनना और समझना तो है ही उनसे जुड़ाव भी रखना है। पहले की तुलना में वर्तमान में एकल परिवारों में मां अपने बच्चों को अधिक समय दे पाती है। बच्चों का अपने माता पिता से जितना अधिक सम्पर्क रहेगा बच्चे उतना ही तनाव मुक्त रहेंगे। इसका कारण वे अपनी हर बात उनसे शेयर कर सकेंगे। <br /><strong>-डॉ. सारिका अंकित सारस्वत, सेबी स्मार्ट ट्रेनर एन्ड ट्रेडर</strong></p>
<p><strong>मां ने ही सिखाया मां का महत्व</strong><br />जीवन में आज जो कुछ भी पाया है वह सब मां की वजह से है। मां ने ही जिस तरह के संस्कार व शिक्षा दी उसी का परिणाम है कि शादी के बाद जब मां बनी तो उसका महत्व समझ आया।  बच्चे भगवान को तो साक्षात रूप में नहीं देख पाते लेकिन उनके लिए मां ही भगवान के रूप में सामने रहती है। बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए मां का उसके पास होना बहुत जरूरी है।   <br /><strong>-बरखा जोशी, अंतरराष्ट्रीय कथक नत्यांगना </strong></p>
<p><strong>बच्चों को हैल्दी वातावरण की जरूरत</strong><br />हर बच्चा एक जैसा नहीं हो सकता। बच्चों की एक दूसरे से तुलना भी नहीं करनी चाहिए। बच्चों की भावनाओं को समझते हुए वे जो करना चाहते हैं उन्हें करने देना चाहिए। बच्चों को हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करना होगा। बच्चों को हैल्दी वातावरण देने की जरूरत है।  बच्चा घर में बात करेगा तो उसे अपनी बात कहने के लिए बाहर नहीं जाना होगा। बच्चा अपने माता पिता को देखकर  सीखता है। विशेष रूप से मां का अपने बच्चे व परिवार में व्यवहार अच्छा होगा।        <br /><strong>  - डॉ. सोमा शर्मा ,एमडी रेडियोलॉजिस्ट</strong></p>
<p><strong>बच्चे को मां से बेहतर कोई नहीं समझता</strong><br /> बच्चे को मां से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। बच्चा मां की इच्छा से ही संसार में आता है। इसलिए बच्चा मां की जिम्मेदारी अधिक होता है।  मां जैसी केयर करती है बच्चा वैसा ही बनता है।  मां का उससे अटेचमेंट होना काफी महत्व रखता है। बच्चे को वही सब सिखाना है जो उसके भविष्य में काम आएगा। बच्चे को कभी भथी निराश नहीं होने देना है। पिता से ज्यादा समय मां बच्चे के साथ रहती है। ऐसे में मां ही बच्चे को बेहतर पेरेंटिंग दे सकती है। <br /><strong>- संजना खंडेलवाल ,आईटी प्रेफेशनल  व आॅथर</strong></p>
<p><strong>पढ़ाई  के साथ-साथ सोशल एक्टिविटि में भी शामिल करें</strong><br />मैं पिछले कई सालों से कम्प्यूटर इंस्टीट्यूट का संचालन करती हूं।  आप जो कर रहे हैं वैसा ही बच्चा करेगा। यदि आप रील देख रहे हैं तो वह रील देखना शुरू कर देगा। आज यह कहना कि एआई के वक्त में बच्चे का स्क्रीन टाइम कैसे कम करें तो मैं कहूंगी कि आप उसके सामने अच्छे गजटस देखिए उसका फायदा बच्चे को भी मिलेगा।  हम बच्चें को पढ़ाई  के साथ-साथ सोशल एक्टिविटि में भी शामिल करें। बच्चों को ज्यादा से ज्यादा फैमिली से अटैच करें।  <br /><strong>- विभा शर्मा ,डायरेक्टर सीएसटी इंस्टीट्यूट कोटा</strong></p>
<p><strong>हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग नहीं,मन से जुड़ें </strong><br />में पेशे से सीए हूं। सौभाग्यशाली मानती हूं कि बेटे की वजह से में दुबारा मदर बनी यानी की दादी बनी हूं।  आजकल की तकनीक को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।  वहीं माता पिता को भी स्मार्ट बना चाहिए। शुरूआत से ही बच्चे को  सोशल लाइफ में शामिल करे। मेरा मानना है कि अपनी जॉब मत छोड़ो अपना कंट्रोल  बच्चे पर रखों। चाहे मेरा कितना ही बड़ा क्लाइंट कॉल करे यदि उस समय पर बच्चों का कॉल आ जाता है तो मैं तो बच्चों को कॉल पहले  अटैेंट करती हूं। <br /><strong>- निमीषा मेघवानी ,चार्टड एकाउन्टेन्ट</strong></p>
<p><strong>जॉब को छोड़ा, बच्चों की परवरिश पर ध्यान</strong><br />मेरे दो बेटियां है जिनकी परवरिश में कर रही हूं।  हमारे दिन की शुरूआत सुबह पूजा से होती हैं। मेरा मानना है कि भगवान की स्तुति करने से हर समस्या का समाधान मिल जाता हैं।  मैंने एमबीए किया उसके बाद प्राइवेट नौकरी की। उसके बाद शादी हो गई जिसके चलते जॉब को छोड़ा  और बच्चों की परवरिश पर ध्यान दिया। उसके बाद फिर दुबारा मैंने सरकारी नौकरी की तैयारी जिसके बाद मेरा सलेक्शन हुआ आज भी मैं अपनी बेटियों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताती हूं।   <br /><strong>- प्रगति शर्मा ,असिस्टेंट एकाउंट आॅफिसर</strong></p>
<p><strong>नकारात्मक गपशप से बचें</strong><br />मेडिकल फील्ड़ से हूं।   गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल बदलावों के कारण चिंता और डर होना सामान्य है। गर्भधारण के दौरान जब बेबी आये तो मेंटल फिजिकल को विस्तार से समझाये, गर्भधारण के दौरान मन में डर, चिंता और चिड़चिड़ापन आना सामान्य है, लेकिन इसे स्थायी न होने दें। जैसे हम शरीर के लिए 'डाइट' चुनते हैं, वैसे ही दिमाग के लिए भी 'डाइट' चुनें। डरावनी फिल्में, हिंसक खबरें या नकारात्मक गपशप से बचें। इसकी जगह ऐसी चीजें पढ़ें या देखें जो प्रेरणादायक और शांत हों। <br /><strong>- डॉ. लेखा सोनी </strong></p>
<p><strong>जॉब के साथ बच्चों को समय देना जरूरी</strong><br />मैंने  बेटों की परवरिश करने के लिए जॉब छोड़ी, मैं तो यहीं कहना चाहूंगी कि हर पेरेंटस अपने बच्चों को सपोर्ट करते हैं और जॉब के साथ-साथ बच्चों को भी टाइम देना चाहिए। उनसे घर में बातचीत करनी चाहिए उनकी जरूरत को समझाना चाहिए।  पेरेंटस को बच्चों से खुलकर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों के साथ फे्रंडली व्यवहार करना चाहिए। बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुडे  रहने की जरूरत है।  <br /><strong>-श्वेता , ज्योतिषाचार्य</strong></p>
<p><strong>मां का बच्चे से कनेक्ट होना आवश्यक</strong><br />एक मां को अपने बच्चे को समझने के लिए  उससे कनेक्ट होना आवश्यक है।  बच्चों की भावना को समझना और उनकी बात को सुनने से बच्चे का अपनी मां से जुड़ाव स्वत: ही हो जाएगा।  इसलिए जरूरी है कि बच्चों को घर परिवार में हैल्दी माहौल दिया जाए। बच्चों को माता पिता समय नहीं दे पाते हैं इस कारण से वे अपनी बात नहीं कह पाते और तनाव में रहने लगते हैं। मां बच्चों  को अच्छी तरह से समझ सकती है। इसलिए वह उसकी पहली गुरु होती है।  <br /><strong>-डॉ. गगनदीप कौर ,कॉ फाउंडर यूएस अकेडमी</strong></p>
<p><strong>केमिकल फ्री डाइट और अन्य चीजें जरूरी</strong><br />बच्चों के इमोशनल सपोर्ट के साथ केमिकल फ्री डाइट और अन्य चीजें जरूरी हैं।  मैं खुद ही बेटी के लिए केमिकल फ्री खाना बनाती हूं। क्योकि आज के समय में बाजार में विभिन्न प्रकार की केमिकल युक्त क्रीम सहित अन्य चीजें आ रही हैं। जिसके चलते वहां शरीर के लिए नुकसानदायक हैं।  इसी के चलते मैंने खुद का ही कई ब्रांड बना लिए।  हम सभी परिवार के लोग    समय निकालकर एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं। बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। <br /><strong>-डॉ. मयंका शर्मा, एन्ट्रप्रेन्योर बच्चों के प्रोडक्ट बनाती हैं </strong></p>
<p><strong>वर्किंग और प्रोफेशनल लाइफ में बैलेंस जरूरी</strong><br />पेशे से वकील  हूं। पर वर्किंग और प्रोफेशनल लाइफ को बैलेंस करके अपने बच्चे को पूरा समय देती हूं।  में सुबह से स्कूल में बच्चे को ड्रॉप करने जाती हूं। उसके बाद उसको लेने जाती हूं। इसी के साथ बच्चा कहीं भी ट्यूशन नहीं जाता हैं। में खुद ही पढ़ाती हूं। इसके बाद बच्चे के साथ क्रिकेट खेलती हूं।  किसी भी वक्त बच्चा हमसे कुछ भी प्रश्न करता है तो उसे हम प्यार से समझते हैं। बच्चा जानता है कि मम्मी और पापा हमेशा मेरे से प्यार से ही बात करते हैं चाहे कैसे भी स्थिति हो। चाहे मेरे में लाख कमियां पर में प्रतिदिन उनमें सुधार करती हूं, और परफ्ेक्ट मदर बनाने की कोशिश करती हूं।  <br /><strong>-ऐश्वर्या सुवालका ,वकील </strong></p>
<p><strong>बच्चे जैसे देखते हैं वैसा ही सीखते हैं</strong><br />बच्चे जैसे देखते है वैसा ही सीखते हैं। घर में बाई आती है रूटीन के काम करके चली जाती हैं। जिस दिन बाई नहीं आती है उस दिन पूरे काम में खुद ही करती हूं। जिसको बच्चे देखते हैं। इसी के जरिया में बच्चों को ये दिखाना चाहती हूं कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता हैं। वहीं में सीएस यानी की कंपनी सेके्रटरी से संबंधित वर्क करती हंू। मेरा मानना है कि बच्चों को हर प्रकार के काम सिखाएें। <br /><strong>-देविका लखोटिया ,सीएस</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 11:43:45 +0530</pubDate>
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                <title> शिक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर में बढ़े बजट, रिसर्च एन्ड डवलपमेंट का बजट काफी कम, इसे बढ़ाना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[प्राथमिक स्तर पर मेडिकल फैसिलिटी बढ़ाने पर हो जोर, ताकि जीवन बच सके, एजुकेशन पर जीडीपी का 4.4 फीसदी, इसे 6 प्रतिशत करने की जरूरत। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/increased-budget-is-needed-for-education--health--and-infrastructure--the-budget-for-research-and-development-is-quite-low-and-needs-to-be-increased/article-141391"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/(1200-x-600-px)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। केन्द्र सरकार की ओर से एक दिन बाद बजट पेश किया जाना है। इस बजट में जहां सरकार की नीतियों व विजन को प्रदर्शित किया जाता है। वहीं देश के हर वर्ग को सरकार से उम्मीद रहती है कि उनके लिए कुछ नया व सुधारात्मक होगा। केन्द्र सरकार के बजट से कोटा व हाड़ौती संभाग के लोगों को क्या उम्मीदें हैं। इस संबंध में दैनिक नवज्योति कार्यालय में शुक्रवार को  बजट से आशा और अपेक्षा  विषय पर टॉक शो का आयोजन किया गया। जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्म हुआ। उसमें सबसे महत्वपूर्ण तत्थ सामने आया ुकि शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ ही मूलभूत सुविधाओं के लिए सरकार को बजट बढ़ाने की आवश्यकता है।  नए स्टार्टअप में निवेश करने वालों को प्रोत्साहन देने और स्वदेशी उत्पादों व रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जाएगा तो देश के युवाओं का विदेशों में होने वाले पयालन को रोका जा सकेगा और यहां की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। </p>
<p><strong>रूरल हैल्थ सेक्टर में बजट बढ़ाने की आवश्कता</strong><br />देश के हैल्थ सेक्टर में जीडीपी का डेढ़ से दो फीसदी ही बजट दिया जाता है। जबकि विदेशों में यह 6 से 8 फीसदी तक है। ऐसे में इस क्षेत्र में कम से कम ढाई से तीन फीसदी बजट तो होना ही चाहिए। शहरी व ग्रामीण हैल्थ सेक्टर  के अंतर को समाप्त करना होगा। ग्रामीण में लोग अधिक व शहरों में डॉक्टर अधिक हैं। जैनेरिक व ब्रांडेड दवाओं में भेद समाप्त होना चाहिए। दवाओं की कीमत पर अंकुश लगना चाहिए। संभाग स्तर पर हैल्थ केयर सेंटर व काउंसर नियुक्त करने की जरूरत है। संविदा कर्मेी व न्यूनतम मजदूरी वालों को पे कमीशन में शामिल किया जाना चाहिए। स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए सीएसआर के तहत ही बजट का प्रावधान किया जाए। इसी तरह खेलों को बढ़ावा देने के लिए जनप्रतिनिधि अपने फंड से राशि दें।  <br /><strong>-डॉ. विजय सरदाना पूर्व प्राचार्य मेडिकल कॉलेज कोटा</strong><br /><strong> </strong><br /><strong>गुजरात मॉडल को अपनाते हुए जीएसटी स्लैब हो एक समान </strong><br />देश में जीएसटी के  स्लैब एक समाान होने चाहिए। हालांकि पहले की तुलना में इसमें सुधार हुआ है। लेकिन एक ही सेक्टर से जुड़े व्यवसायों में अभी भी कहीं 5 तो कहीं 18 फीसदी जीएसटी वसूल किया जा रहा है। कोटा  की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए यहां पर्यटन को बढ़ावा देने, पर्यटन स्थलों का प्रचार करने की जरूरत है। हाड़ौती के खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने की जरूरत है। ट्रम्प टैरिफ के बाद सरकार ने जिस तरह से स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दिया है उसे पहले ही कर देना चाहिए था। उद्योगों को प्रोत्साहन के लिए गुजरात मॉडल को अपनाते हुए एकल विंडों पर ही सुविधाएं उपलध्ब करवाए जाने की जरूरत है। <br /><strong>-अशोक माहेश्वरी, संभाग अध्यक्ष होटल फैडरेशन आॅफ राजस्थान</strong></p>
<p><strong>बजट बढ़े तो मजबूत हो शिक्षा का संस्थागत ढांचा</strong><br />सरकारी स्कूलों की स्थिति में पहले से सुधार तो हुआ है लेकिन अभी भी शिक्षा के संस्थागत ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है। यह तभी संभव है जब सरकार द्वारा स्कूल भवनों व शिक्षा में सुधार के लिए बजट को बढ़ाया जाए। झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद जर्जर भवनों का सर्वे हुआ और एसडीआरएफ के तहत बजट भी मिला। इसके बाद काफी सुधार आया है।  लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।  स्कूल भवनों के लिए सरकार के साथ ही भामाशाहों को भी आगे आने की जरूरत है। साथ ही सरकारी स्कूलों को भी हाईटेक बनाने की जरूरत है। शिक्षा से ही उन्नति संभव होती है। <br /><strong>-स्नेहलता शर्मा चीफ ब्लॉक एजुकेशन आॅफिसर कोटा</strong></p>
<p><strong>8 वें पे कमीशन में पेंशन अधिनियम हो निरस्त</strong><br />सरकार द्वारा 8 वें पे कमीशन में जो पेंशन अधिनियम लागू किया जा रहा है। जिसकी  बजट में घोषणा होने वाली है। सरकार को उसे निरस्त करना चाहिए। इससे 2025 से पहले सेवानिवृत्त हुए करीब 69 लाख पेंशनर्स प्रभावित होंगे। इस अधिनियम में पेंशन व पारिवारिक पेंशन को बनद करने या उसमें कमी व परिवर्तन का प्रावधान है।  सरकारी कर्मचारियों के  सेवानिवृत्त होने के बाद कर्मचारियों व उनके परिवार के लिए पेंशन काफी सहारा होता है। इसे बंद करना गलत है। वहीं कौशल विकास के क्षेत्र में काम करने वालों को जो सरकार की तरफद्द से बजट दिया जाता है वह निजी क्षेत्र की तुलना में दसवा हिस्सा ही है। इसे बढ़ाकर समान किए जाने की जरूरत है। <br /><strong>-आर.पी. गुप्ता पेंशनर,चैयरमेन जन शिक्षण संस्थान</strong></p>
<p><strong>रिसर्च आधारित शिक्षा पर हो फोकस</strong><br />रिर्सच शिक्षा और नई तकनीक पर आधारित शिक्षा पर फोकस करते हुए उसके लिए बजट में प्रावधान करने की जरूरत है। जिससे विदेश जाने वाले युवाओं को यहीं रोका जा सके।  साथ ही शिक्षा के लिए  बजट बढ़ाया जाए जिससे प्राइमरी सहित अन्य एज्यूकेशन सेक्टर मजबूत होंगे। वैसे भारत अभी हर स्थिति में मजबूत है। अब अन्य देश भी भारत की तरफ  देख रहे है। ऐसी स्थिति में सरकार को आने वाले बजट में ट्रंप टैरिफ का मुकाबला करने के लिए जीएसटी में राहत देने की उम्मीद है। अभी यूरोप के साथ जो डील हुई है। उससे काफी फर्क पड़ा है। अभी जीडीपी का बजट में शिक्षा पर 4.6 प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है इसे बढ़ाकर 6 फीसदी किए जाने की आवश्यकता है। <br /><strong>-मीरा गुप्ता,सह आचार्य अर्थशास्त्रराजकीय कला कन्या महाविद्यालय कोटा </strong></p>
<p><strong>टैक्स में छूट मिले तो पूरी हो आम आदमी की जरूरतें</strong><br />वर्तमान में हर चीज को लग्जरी बना दिया गया है। जिससे बहुत सारी चीजें आम आदमी की पहुंच से दूर हो गई है। ऐसे में बजट में आम आदमी को ध्यान में रखते हुए प्रावधान किए जाने चाहिए। इनकम टैक्स में छूट का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। जिससे आम आदमी की जरूरतों को पूरा किया जा सके। शिक्षा क्षेत्र में बजट बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके साथ शहर में प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा है। प्रदूषण की वजह से मेडिकल खर्च बढ़ रहा है। आम आदमी को मेडिकल क्षेत्र में रिलीफ मिले बजट में ऐसे प्रावधान करना चाहिए। इसे कम करने और आम आदमी की मूलभूत जरूरतों को पृूरा करने  पर बजट में प्रावधान किया जाना चाहिए। <br /><strong>-आरती जनार्दन सोशल वर्कर व  गृहिणी</strong></p>
<p><strong>अदालतों का मजबूत हो इंफ्रास्ट्रक्चर</strong><br />बजट में सरकार को न्याय क्षेत्र के लिए भी विशेष बजट देना चाहिए। कुछ देशों में न्यायप्रणाली की व्यवस्था बहुत ही अच्छी हैं। इस तरह से सरकार को भी देश में त्वरित न्याय की व्यवस्था करनी चाहिए। जिससे पीड़ित को जल्दी राहत मिल सके।  साथ ही संभागीय मुख्यालय होने के बाद भी कोटा मेंं अदालतों का इंफ्रा स्ट्रक् चर मजबृूत नहीं है। मिनी सचिवालय में एक ही जगह पर सभी अदालतें हों। हाईकोर्ट की बैंच स्थापित की जाए। साथ ही जितनी भी करदाता हैं उन्हें विदेशों की तर्ज पर  सुविधाओं के रूप में रिटर्न देने की जरूरत है। युवाओं को विदेश जाने से रोकने के लिए यहां सुविधाएं उपलब्ध करवाने की जरूरत है। <br /><strong>-सोनल विजय, एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>खिलाडियों के लिए हो बजट, सुविधाएं भी मिले</strong><br />राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर चयनति व मैडल प्राप्त खिलाडियोंं के लिए अलग से बजट होना चाहिए। हालत यह है कि खिलाडियों को मिलने वाली पुरुस्कार राशि तो कई सालों से नहीं मिल रही। वहीं सुविधाओं के नाम पर भी नाम मात्र का बजट है। यहां तक कि  खिलाडियों  को स्वयं के खर्च पर ही प्रतिभा दिखानाी पड़ रही है। जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को खेलों में आगे बढने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। खिलाडियों के  चोटिल होने पर सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं दी जाती है। खिलाडियों ं को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए बजट में सरकार को प्रावधान करने होंगे। <br /><strong>-प्रियांशी गौतम, इटरनेशनल वुशु खिलाड़ी</strong></p>
<p><strong>इनकम टैक्स की सरल हो प्रक्रिया</strong><br />बजट में नया इनकम टैक्स नियम लागू हो और प्रक्रिया को सरल किया जाए। जिससे  टैक्स चोरी को कम किया जाए और अधिक से अधिक लोग टैक्स जमा करवा सकें। रिसर्च व विकास के लिए बजट दिया जाए। साथ ही युवाओं के लिए रिसर्च के साथ आय का जरिया भी मुहैया कराया जाए। जिससे युवा टेलेंट को विदेश जाने से रोका जा सके। युवा शिक्षा लेकर देश में ही काम करना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें अपेक्षा अनुरूप सुविधाएं नहीं मिल पाती। कृषि प्रधान देश होने से कृषि क्षेत्र में टैक्स में छूट का प्रावधान बढ़ाया जाए। <br /><strong>-रितु बोहरा, चार्टर्ड एकाउंटेंट</strong></p>
<p><strong>स्टार्टअप में निवेशकों को मिले प्रोत्साहन</strong><br />एमएसएमई में लोन की गति तेज हुई है। लंबित भुगतान में हालांकि तेजी आई है। फिर भी हम  उद्यम  स्थापना के लिए लोगों को सलाह देते हैं कि पूरी तरह से लोन पर निर्भर नहीं रहें। सरकार की अपनी चाल होती है। सरकार काफी प्रयास कर रही है।   कोटा में भी अब पहले की तुलना में स्टार्टअप की संख्या बढ़ी है। आईआईटी के युवा आकर यहां स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं। जिससे रोजगार के अवसर भी सृजित हो रहे हैं। लेकिन किसी भी नए उद्यम को स्थापित होने में ढाई से तीन साल का समय लगता है। ऐसे में स्टार्टअप में निवेश करने वालों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। साथ ही नए -नए स्टार्टअप व उद्यमों को भी और सुविधाएं देने की जरूरत है। <br /><strong>-कौस्तुभ भट्टाचार्य, स्टार्टअप सलाहकार</strong></p>
<p><strong>अकादमिक इनक्यूबेटर्स और रिसर्च गतिविधियां हो सशक्त</strong><br />16 जनवरी 2016 को स्टार्टअप नीति की स्थापना के एक दशक में हुई प्रगति को देखते हुए इस योजना को अधिक संस्थागत और नियमित किये जाने की आवश्यकता है ।  राज्य में  वर्तमान में करीब 8 हजार स्टार्टअप है जिनमे से हाड़ोती में करीब 500 की संख्या को देखते हुए और ट्रिपलआई की कोटा में भूमिका को देखते हुए क्षेत्रीय आधार पर हाड़ोती को विशेष बजट का भी प्रावधान संभाग को अधिक प्रगति प्रदान करेगा।  स्टार्टअप की संख्या व उनके प्रदर्शन स्तर को देखते हुए यह राज्यहित और छात्रों के हित में होगा कि कौशल विकास से जुड़े मेंटर्स के लिए नियमितीकरण की दिशा में प्रयास किए जाएं। साथ ही अकादमिक इनक्यूबेटर्स और रिसर्च गतिविधियों को भी सशक्त किया जाए। <br /><strong> -आयुष त्यागी, स्टार्टअप सलाहकार</strong></p>
<p><strong>शिक्षा में कम या समाप्त हो जीएसटी</strong><br />सरकार की ओर से शिक्षा व कोचिंग फीस पर भी जीएसटी लागू है।  यहां तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की फीस पर भी 30 फीसदी जीएसटी है। इसे कम या समाप्त किए जाने की जरूरत है।  डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने व कोचिंग सेक्टर को फिर से बूस्टअप करने की जरूरत है। मैंटल हैल्थ क्षेत्र में बजट देने, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को मजबूत करने व एयरपोर्ट की मांग को भी पूरी करने की आवश्यकता है। कोटा का शिक्षा के क्षेत्र में नाम है। यही कोटा को मजबूती देगा। इस क्षेत्र को फिर से मजबूती के लिए बजट में प्रावधान होने चाहिए। <br /><strong>-के.आर. चौधरी असिसट्ेंट प्रोफेसर अर्थशास्त्र कोटा यूनिवर्सिटी </strong></p>
<p><strong>कृषि उपकरणों को सस्ता करना चाहिए</strong><br />बजट ऐसा होना चाहिए जो कि नागरिकों की बेसिक जरूरत को पूरा करे। वहीं शिक्षा लोन कम ब्याज दर पर और आसानी से उपलब्ध हो  जिससे अधिक से अधिक बच्चे इसका लाभ लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर सके।  अल्प संख्यक छात्रवृत्ति सरकार ने बंद कर दी है। जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे उच्च शिक्षा नहीं ले पा रहे हैं।  वहीं सरकार को कृषि उपकरणों को सस्ता करना चाहिए। जिससे किसानों को राहत मिल सकेगी और किसानों के उत्पादनों की लागत कम आएंगी।  कृषि में रियायतें मिलेंगी तो खाद्य पदार्थ सस्ते होने से घरेलू बजट भी कम होने से लोगों को राहत मिलेगी। <br /><strong>- एडवोकेट सानिया खानम लीगल एड डिफेंस काउंसलर</strong></p>
<p><strong> बजट  में हो रोजगार सृजन पर  जोर</strong><br />रोजगार सृजन पर बजट में विशेष प्रावधान होने चाहिए। युवा बेरोजगार होकर बैठे हैं। सरकारी कार्यालयों व अस्पतालों में बड़ी संक्या में संविदा कर्मी बहुत कम मानदेय पर काम कर रहे हैं। तकनीकी रूप से सक्षम होने के बाद भी उनका मानदेय काफी कम है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि  बजट मेंकार्मिकों का मानदेय बढ़ाने का प्रावधान किया जाए। साथ ही मेडिकल की पढ़ाई करने वाले बच्चों को छात्रवृत्रि दी जाए। <br /><strong>-अजय गोचर स्टूडेंट कामर्स कॉलेज कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 13:03:18 +0530</pubDate>
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                <title>बदलती जीवनशैली और तनाव से युवा व बच्चों के दिल दे रहे धोखा</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/due-to-changing-lifestyle-and-stress--hearts-of-youth-and-children-are-betraying/article-121457"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news55.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। भारत में हार्ट के मरीजों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है। युवाओं से लेकर बच्चों तक दिल की बीमारी से परेशान हैं। बदलते जीवनशैली के चलते, युवा और बच्चों में दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है। मांसपेशियों के सिकुड़ने के कारण ब्लड सर्कुलेट नहीं हो पाता है जिसके कारण असमय मृत्यु हो जाती है।  दैनिक दिनचर्या के बदलाव के कारण हार्ट अटैक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। यह विचार दैनिक नवज्योति कार्यालय में आयोजित मासिक परिचर्चा में  सामने आए। केस ऑफ साइलेंट अटैक आर इन्क्रीजिंग एमंग चिल्ड्रन एन्ड यूथ, व्हाट इज द रीजन विषय पर दैनिक नवज्योति कार्यालय में आयोजित टॉक शो में शहर के जाने-माने विशेषज्ञ कार्डियोलोजिस्ट, फिजीशियन, डायटीशियन, साइकेटिंस्ट, आयुर्वेद , योग टीचर, जिम ट्रेनर, पैरेंट्स व स्ट्रेस मैनेजमेंट से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया।  विशेषज्ञों ने कोरोनाकाल के बाद जीवनशैली में आए बदलाव के कारण लोगों में तनाव, अनियमित खान-पान तथा फिजिकल एक्टिविटी कम होने को मुख्य कारण माना है। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के मुख्य अंश:-</p>
<p><strong>स्कूलों में बच्चों की स्क्रीनिंग हो</strong><br />वर्तमान में लाइफ स्टाइल में काफी बदलाव आया है, जिसके चलते युवाओं में तनाव बढ़ने से डायबिटीज, बीपी सहित कई बीमारियों ने घेर लिया है। हार्टअटैक का प्रमुख कारण हार्ट सही तरीके से पंम्पिग नहीं कर पाने से मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है, जिसके कारण शरीर में ब्लड सर्कुलर सही तरीके से नहीं हो पाता है। साइलेंट अटैक का प्रमुख कारण भी बिगड़ी दिनचर्या तथा खानपान है। अगर अटैक आने वाले व्यक्ति को सही समय पर सीपीआर देकर जीवन बचाया जा सकता है। सीपीआर की जानकारी सभी को जानकारी होनी चाहिए। स्कूली बच्चों में आ रहे अटैक भी स्ट्रैस ही है। शहर की कई स्कूलों में जांच के नाम पर खानापूर्ति की जाती है तथा पैरेंट्स भी इस ओर ध्यान नहीं दे पाते है।<br /><strong>-डॉ. संजय शायर, सीनियर मेडिकल ऑफिसर </strong></p>
<p><strong>शरीर के प्रति जागरूकता व पौष्टिक आहार जरूरी</strong><br />सुबह जल्दी उठने व रात को जल्दी सोने की आदत को बनाए रखने के साथ ही स्वास्थ्य के प्रति सभी  में जागरूकता होना आवश्यक है। दिनचर्या व खान-पान सही नहीं होने से तनाव  व रोग बढ़ते हैं। विशेष रूप से हार्ट संबंधी बीमारी का खतरा अधिक रहता है। ऐसे में शरीर के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं इस बारे में जानकारी होनी चाहिए।  पौष्टिक आहार लेना और नियमित योग व प्राणायम ऐसे माध्यम हैं जिनसे इस बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है। <br /><strong>-डॉ. नितिन सोलंकी क्लीनिकल न्यूट्रियनिस्ट </strong></p>
<p><strong>डायबिटीज व स्मोकिंग बन रहे बड़े कारण</strong><br />आज के दौर में डायबिटीज व स्मोकिंग हार्ट अरेस्ट के बड़े कारक सामने आ रहे हैं। कार्डिक अरेस्ट और हार्ट अटैक दोनों अलग अलग स्थितियां हैं।  जीवन की भागदौड़ के चलते हमारी दिनचर्या में काफी बदलाव आया है। नियमित समय में डाइट नहीं लेना, फास्टफूड पर ज्यादा निर्भर रहना भी हार्ट की समस्या को बढावा देता है। ज्यादातर हार्ट अटैक के मामलों में कॉलेस्ट्रोल बढ़ने से खून की आपूर्ति रुक जाती है जिससे असमय मृत्य हो जाती है। समय पर खान-पान लेना नियमित  योग व फिजिकल एक्टिविटी बनाए रखे। जीवन में तनाव (स्ट्रेस) कम रखें। स्कूलों में बच्चों की नियमित ब्लड, शुगर की जांच होनी चाहिए। वहीं प्रत्येक व्यक्ति को सीपीआर की जानकारी होनी चाहिए। हार्टअटैक के दौरान सीपीआर देने से व्यक्ति को नया जीवन मिल सकता है।<br /><strong>-डॉ. पवन सिंघल, कॉर्डियोलोजिस्ट कोटा हार्ट </strong></p>
<p><strong>स्कूलों में कार्डियो किट व डिस्प्रिन होना जरूरी</strong><br />वर्तमान में बच्चों में साइलेंट हार्ट अटैक बढ़ रहे है। इसका प्रमुख कारण बच्चों का हर छोटी बात का स्ट्रेस लेना है। बच्चों द्वारा माता-पिता को अपनी समस्या बताने पर उनको अनदेखा कर देता है। वहीं स्कूल या घर से बाहर भी अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करने पाने की वजह से भी डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। नियमित खान-पान या फिजिकल एक्टिविटी नहीं होने से भी दैनिक कार्य प्रभावित हो जाते हैं। स्कूलों में बच्चों की नियमित जांच होनी चाहिए। वहीं प्रत्येक स्कूल में कार्डियेक किट होना चाहिए। उसमें डिस्प्रीन टेबलेट भी होनी चाहिए, आपातकाल स्थिति में संभल सकते हैं। सीपीआर देने के लिए ट्रेनर होना चाहिए ताकि आपातकाल में हार्ट अटैक के दौरान गोल्डन ऑवर में सीपी देकर जान बचाई जा सके। सीपीआर देने संबंधी प्रशिक्षण प्रत्येक स्कूलों के कर्मचारी व बच्चों को मिलना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. सुरभी गोयल, फिजियोलॉजिस्ट व स्ट्रेस मैनेजमेन्ट विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>डाइट प्लानिंग से  लाएं दिनचर्या में बदलाव</strong><br />जीवन में सभी लोगों की बॉडी लेंग्वेज अलग-अलग होती है। नियमित आहार-विहार नहीं लेने से भी दिनचर्या बिगड़ जाती है। बाजार में मिल रहे फास्टफूड भी कॉलेस्ट्रोल को बढ़ाती है। कई लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पाते है तथा अपने कामकाज को लेकर तनावग्रस्त रहते हैं। देर रात खाना खाने या खाना खाने के बाद तुरंत सो जाना भी बीमारियों को दावत देना है। शुरूआत में अगर शरीर में थकान, चक्कर आने जैसी समस्या आने तुरंत डॉ. को दिखाना चाहिए। लोगों को अपनी डाइट प्लानिंग को नियमित दिनचर्या में शामिल करके तथा नियमित व्यायाम और योग से भी अपने आपको स्वस्थ रख सकते हैं।<br /><strong>-सलोनी सेठी, डायटीशियन,एन्ड न्यूट्रियनिस्ट</strong></p>
<p><strong>स्वस्थ जीवन के लिए योग जरूरी</strong><br />वर्तमान में लोगों की फिजिकल एक्टिविटी न होने से कई बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। अनियमित दिनचर्या के चलते डायबिटीज, दिल की बीमारी व बीपी, शुगर सहित कई बिमारियां जकड़ लेती है। स्वस्थ शरीर के लिए योग करना भी जरूरी है। रोजाना अनुलोम-व्योलोम में श्वांस अंदर लेने तथा बाहर छोड़ने से भी शरीर स्वस्थ रहता है। योग गुरु रामदेव बाबा के सिखाए योग को भी घर पर ही करके स्वस्थ रह सकते है। समयभाव के कारण हमने अपनी जिंदगी को मशीन की तरह बना लिया है। जिसके कारण हम अपने परिवार के प्रति भी ध्यान नहीं दे पाते है। स्वस्थ शरीर के लिए पर्याप्त नींद जरूरी है।<br /><strong>-रचना शर्मा, व्याख्याता शारीरिक शिक्षा</strong></p>
<p><strong>स्कूलों में ही सीपीआर प्रशिक्षण</strong><br />बच्चों में जिस तरह से छोटी उम्र में ही पढ़ाई के साथ ही माता पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने का तनाव बढ़ता जा रहा है। उस कारण से हार्ट अटैक कम उम्र में भी होने लगा है। इससे बचने के लिए बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार काम करने दिया जाए। यदि स्कूल में कभी इस घटना का कोई मामला हो तो उसे कंट्रोल करने के लिए  स्कूलों में सीपीआर प्रशिक्षण दिया जाए। साथ ही बच्चों के खान-पान पर शिक्षकों द्वारा ध्यान दिया जाए। कम उम्र में ही सावधानी रखी गई तो आने वाले खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। <br /><strong>- मोइनुद्दीन पैरेन्ट्स </strong></p>
<p><strong>प्रकृूति से जुड़ना जरूरी</strong><br />पहले लोग सुबह जल्दी उठकर बाग बगीचों में घूमने जाते थे। पेड़ पौधों के बीच रहने से प्राकृति से जुड़े रहते थे। शुद्ध हवा व ऑक्सीजन मिलने के साथ  ही खान-पान में शुद्धता थी। लेकिन वर्तमान में अधिकतर लोग प्रकृति से दूर होने के साथ ही खान-पान भी शुद्ध नहीं होने से साइलेंट अटैक का खतरा अधिक बढ़ा है। जिम में शरीर को स्वस्थ बनाने के तरीके बताए जाते हैं। उसके लिए उसी तरह की डाइट का सेवन किया जाता है। साथ ही शरीर को स्वस्थ रखने व बीमारियों से दूर रहने का एक ही उपाय है प्रकृति से जुड़ना या उसके नजदीक रहना। <br /><strong>- अशोक औदिच्य सचिव बॉडी बिल्डिंग संघ </strong></p>
<p><strong>फिजिकल एक्टिविटी बढ़ानी होगी</strong><br />शरीर को स्वस्थ रखने के लिए फिजिकल एक्टिविटी जितनी अधिक होगी उतना बेहतर रहता है। साथ ही लोगों को अपनी लाइफ स्टाइल को भी बदलना होगा। लाइफ स्टाइल सही नहीं होने से ही अटैक ही नहीं सभी तरह की बीमारियां जन्म लेती है।  शरीर के प्रति जागरूक लोग जिम में जाते है। लेकिन वहां जिस तरह की गतिविधि करवाई जाती है उसका नियमित अभ्यास व उसी अनुसार डाइट लेना आवश्यक है। जिम का मतलब शरीर के साथ ज्यादती करना नहीं है। स्वस्थ रहने के लिए  जागरूकता भी जरूरी है। <br /><strong>- पूजा यादव, जिम ट्रेनर</strong></p>
<p><strong>बदलते लाइफ स्टाइल का प्रभाव</strong><br />हार्ट अटैक का एक प्रमुख कारण लाइफ स्टाइल का प्रभाव भी है। इसके चलते युवा में स्मॉकिंग, शराब का सेवन तथा फिजिकल एक्टिविटी का भी अभाव है। जिम में आने वाले सभी को पहले दिनचर्या को सही करने, डाइट संबंधी नियमों का पालन करना तथा शारीरिक व्यायाम तथा जीवन में स्ट्रेस नहीं लेने की सलाह देता हूं।  जो युवा अपने आहार-विहार का पालन नहीं करते तथा फास्टफुड पर निर्भर रहते है, आने वाले दिनों में कॉलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ने से  हार्ट पर जोर पड़ता है वहीं इम्युनिटी पॉवर कम होने से भी अचानक थकान, चक्कर आना भी हार्ट अटैक् को इंगित करता है।<br /><strong>- नरेन्द्र यादव, जिम ट्रेनर</strong></p>
<p><strong>स्कूलों में हो योगा क्लास</strong><br />जिस तरह से वर्तमान में छोटी उम्र के बच्चों में  साइलेंट हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। उन्हें देखते हुए आवश्यक है कि बच्चों से  उनकी क्षमता के अनुसार शारीरिक गतिविधि करवाई जाए। स्कूलों में नियमित योगा क्लास लगाई जाए। जिससे बच्चा स्कूल में शिक्षकों की बात को जितना जल्दी अमल में लाता है उतना माता पिता की बात को भी नहीं लाता। बच्चों के खान-पान व उनकी दिनचर्या को भी सही रखकर इस बीमारी से बचाया जा सकता है।<br /><strong>-अंजली जैन सीए, अर्हं सोशल वेलफेयर फाउंडेशन </strong></p>
<p><strong>स्ट्रेस से बचने को मेडिटेशन जरूरी</strong><br />नियमित आहार-विहार तथा फिजिकल एक्टिविटी से अपने आपको स्वस्थ रखें। बदलती लाइफ स्टाइल में मेडिटेशन से भी अपने आपको फिट रख सकते हैं। वहीं व्यस्तता के कारण हम अपने स्वास्थ्य के प्रति अवेयर भी नहीं हो पाते है। अपने परिवार में भी सदस्यों से संवाद नहीं करने से अकेलेपन का शिकार हो जाते है।  स्वस्थ जीवन के लिए डाइट प्लानिंग भी जरूरी है। कोई भी शारीरिक बदलाव महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाए तथा उनके द्वारा दिए गए निर्देशों की पालना करें। स्ट्रेस से बचने के लिए मेडिटेशन का सहारा लें तथा कुछ समय अपने परिवार के साथ बिताएं। <br /><strong>- डॉ.मिथिलश खींची, एसोसिएट प्रोफेसर, मनोचिकित्सक मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>बीमारी की जड़ पर पहले हो वार</strong><br />हार्ट अटैक की बात कर रहे हैं लेकिन आयुर्वेद तो बीमारी ही नहीं हो इस पर काम करता है। हेल्दी और संसकारी संतति हो ऐसे प्रयास करने चाहिए। हमें हमारी पुरानी जड़ों पर लौटना होगा। आज परिवार में दूरिया बढ़ जाती है।  छोटे बच्चे भी मोबाइल देखते रहते है।  माता-पिता के काम पर जाने के बाद बच्चे अकेले रह जाते है जिससे नियमित खान-पान नहीं ले पाते है। फिजिकल एक्टिविटी भी नहीं हो पाती है। शहर के अधिकांश स्कूलों में बच्चों के ब्लड व नियमित डाइट की जांच नहीं हो पाती है। उनकी जीवनशैली में भी बदलाव आ जाता है। बच्चों को दादा-दादी का प्यार नहीं मिलने से संस्कारों में भी कमी आ जाती है। बच्चे व युवा अंदर ही अंदर तनावग्रस्त हो जाते है या नशे या बुरी आदतों के शिकार हो जाते है।<br /><strong>-अंजना शर्मा, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्साधिकारी </strong></p>
<p><strong> स्कूल का रोल महत्वपूर्ण</strong><br />स्वथ शरीर के लिए फीजिकल एक्टिवीटी बहुत जरूरी है। चालीस वर्ष की उम्र के बाद नियमित जांच को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। वहीं बच्चों के जीवन में स्कूल का रोल काफी महत्वपूर्ण है। स्कूलों को भी अपने दैनिक कार्यक्रम में बच्चों के खानपान व बीपी, शुगर या फिर महिने में एक बार रूटिन चैकअप जरूर होना चाहिए। स्कूलों में पढ़ाने वाले क्लास टीचर के पास बच्चे की जानकारी होती है। अगर बच्चों की जीवनशैली में बदलाव आ रहा है तो माता-पिता को बता सकते है। या फिर प्यार से कारण जानकर बच्चों का स्ट्रेस दूर किया जा सकता है। माता-पिता में कामकाजी थकान के चलते बच्चों की तरफ ध्यान नहीं दे पाते है।<br /><strong>-महेन्द्र चौधरी, प्रिसींपल महात्मा गांधी रा.वि. श्रीनाथपुरम </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Jul 2025 14:54:26 +0530</pubDate>
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                <title>एआई लिट्रेसी को स्कूली कोर्स में शामिल करना जरूरी, लेकिन मानवीय मूल्य बने रहें </title>
                                    <description><![CDATA[रचनात्मकता बनी रहे, एआई का एथीकल यूज हो, नेशनल एआई लिट्रेसी स्ट्रेटेजी तैयार होनी चाहिए।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/it-is-necessary-to-include-ai-literacy-in-school-curriculum--but-human-values-should-remain/article-118062"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/news46.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति की ओर से प्रतिमाह आयोजित परिचर्चा की श्रंखला के तहत शुक्रवार को जब चीन छोटी क्लास से ही बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलीजेस(एआई) की शिक्षा दे रहा है वहां कोटा जिले में डिजीटल लिट्रेसी की क्या स्थिति है इस मुद्दे पर वक्ताओं ने विचार विमर्श किया। परिचर्चा का विषय था ( वाट इज द पॉ्जिशन आॅफ डिजिटल लिट्रेसी इन कोटा व्हेन चाइना हेज मूव टू एआई लिट्रेसी) परिचर्चा में  शिक्षा विभाग की संयुक्त निदेशक, कोटा यूनिवर्सिटी की डीन, रोबोटिक इंजीनियर, इनोवेटर,  एआई टीचर, शिक्षाविद, प्राइवेट व सरकारी स्कूल के संचालक ,  प्रिंसिपल, कम्प्यूटर एक्सपर्ट,   पैरेन्ट्स और बच्चोंं ने भाग लिया। परिचर्चा में सभी वक्ताओं ने स्कूलों में छोटी क्लासेज से ही एआई को सब्जेक्ट के रूप में पढ़ाने पर जोर दिया लेकिन इसके साथ उनहोंने ऐसा केरिकुलम तैयार करने की भी जरूरत बताई जो मानवीय मूल्यों को बनाए रखे। वक्ताओं ने कहा कि सीबीएसई ने बड़ी क्लास में इसे एैच्छिक रूप से शुरू कर दिया है।  इसे कम्पलसरी करना चाहिए। साथ ही पैरेन्ट्स को भी एजुकेट करने की आवश्यकता बताई। वक्ताओं का कहना था कि एआई की सबसे बड़ी थ्रेट यह है कि यह लोगों को कुन्द कर सकती है। उनकी मौलिकता और रचनात्मकता  को खत्म कर सकती है। ऐसी स्थिति में हमें स्पेशल कोर्स डिजाइन कर इसे लागू करना चाहिए। सरकारी स्कूलों में लैब हब्स और टिंकरिंग लैब्स की पर्याप्त सुविधा भी विद्यार्थियों को मिलनी चाहिए। </p>
<p><strong>शिक्षा में डिजिटल साक्षरता की उपयोगिता बढ़ रही</strong><br />वर्तमान शिक्षा नीति में डिजिटल साक्षरता पर पूरा फोकस किया जा रहा है। स्मार्ट क्लॉस में बच्चों को डिजिटल शिक्षा के साथ एआई के उपयोग के बारे में भी पढाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में टेलेंट की कमी नहीं है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा में लगातार नवाचार किए जा रहे है। बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा के साथ डिजिटल साक्षरता भी दी जा रही है। एआई का प्रयोग करना भी बताया जा रहा है। सरकारी स्कूल निजी स्कूलों के मुकाबले अब बेहतर प्रदर्शन कर रहे है। निजी स्कूलों में बच्चों रटाया जाता है। लेकिन सरकारी स्कूलों बच्चों स्मार्ट बनाया जाता है। उन्हें मौलिकता के साथ डिजिटल एजुकेशन के प्रयोग भी बताए जा रहे है। अभी समिति संसाधान है लेकिन सरकार की ओर से डिजिटिल शिक्षा को लेकर काफी बदलाव किए है। 80 प्रतिशत स्कूलों में डिजिटल साक्षरता का उपयोग हो रहा है। इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं मिलने वाले क्षेत्रों में कुछ परेशानी है बाकी स्कूलों में आधुनिक कम्प्यूटर लेब स्मार्ट क्लॉस में बच्चों सारी समस्याओं का समाधान हो रहा है।  हालांकि कुछ विषय के अध्यापकों की कमी है लेकिन सरकार उनके रिक्त पदों को भी भर रही है। सरकारी स्कूल के बूनियादी ढांचे में पहले की अपेक्षा काफी बदलाव आया है। <br /><strong>-तेजकंवर संयुक्त निदेशक शिक्षा विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>डिजिटल साक्षरता से युवा सोच का दायरा बढ रहा</strong><br />जहां एक ओर डिजिटल साक्षरता युवाओं की सोच के दायरे को बढ़ा रही है और हर काम आसान कर रहा है। वहीं दूसरी ओर बच्चे इस पर आश्रित भी हो रहे है। वो छोटी छोटी चीजों के लिए भी एआई का सहारा ले रहे जिससे उनके अंदर नवाचार करने की प्रवृति खत्म हो रही है। डिजिटल साक्षरता जरूरी है लेकिन इस पर निर्भर नहीं होना है। इसका उपयोग अपनी सोच के दायरे को व्यापक करने तक ही सीमित रखना चाहिए। एआई के प्रयोग के साथ हमें अपने नैतिक मूल्यों के संरक्षण की भी आवश्यकता है। हर स्कूल में एआई ट्रेंड टीचर होना चाहिए जो एआई के प्रयोग को ठीक से समझा सकें। बच्चों को डिजिटल साक्षरता के लिए जागरूक करने की आवश्यकता है। हमें यह देखना होगा बच्चों की किस विषय में रूचि है। कोटा के कई स्कूलों में 9 से 12 में एआई शिक्षा शुरू हो चुकी है। डिजिटल साक्षरता से पहले हमें अभिभावकों की सोच में बदलाव लाना होगा। अभिभावकों के साथ लगातार कार्यशालाएं आयोजित कर बच्चों की क्या जरूरत है उसी के अनुसार उसे तैयार करना चाहिए। इस क्षेत्र में अभी काफी काम करने की आवश्यकता है। <br /><strong>-जसपिंदर साहनी,  प्रिंसीपल एमबी इंटरनेशनल स्कूल</strong></p>
<p><strong> डीएमआई टेस्ट से जान सकेंगे हैं बच्चे की रूचि</strong><br />कोटा में डिजिटल साक्षरता बढ़ाने की आवश्यकता है। बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या केरियर चुनने की आती है। ऐसे में डीएमआईडमेर्टोग्राफिक मल्टीपल इंटेलिजेंस टेस्ट (डीएमआईटी) एक ऐसा टेस्ट है जो फिंगरप्रिंट पैटर्न का विश्लेषण करके किसी व्यक्ति की जन्मजात प्रतिभा, व्यक्तित्व और बुद्धि के बारे में जानकारी प्रदान करता है। यह एक वैज्ञानिक रूप से समर्थित मूल्यांकन है जो व्यक्ति की अद्वितीय क्षमताओं और संभावित सीखने की शैली को समझने में मदद करता है।  डीएमआईटी का मतलब है डमेर्टोग्लिफिक्स मल्टीपल इंटेलिजेंस टेस्ट। डमेर्टोग्लिफिक्स उंगलियों और हथेलियों पर पाए जाने वाले अनूठे पैटर्न का अध्ययन है। यह टेस्ट फिंगरप्रिंट के पैटर्न का विश्लेषण करके मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों से उनके संबंध को समझने का प्रयास करता है, जिससे व्यक्ति की जन्मजात क्षमताओं और सीखने की शैली के बारे में जानकारी मिलती है। टेस्ट रिपोर्ट व्यक्ति की ताकत, कमजोरियों, सीखने की शैली और संभावित करियर विकल्पों के बारे में जानकारी मिल जाती है।  यह टेस्ट छात्रों को उनकी ताकत और कमजोरियों के आधार पर सही शैक्षणिक मार्ग चुनने में मदद करता है।<br /><strong>-जितेंद्र वर्मा, एआई शिक्षक आई स्टार्ट नेस्ट</strong></p>
<p><strong>कोरोना काल में अपनाई एआई तकनीक</strong><br />किसान परिवार से होने के कारण किसानों की समस्याओं को नजदीकी से देखा। किसानों को  खेती के हर काम के लिए अलग मशीन का उपयोग करना पड़ता है। कक्षा 10 वीं तक  पेंटिग का शौक रहा। उसी समय कोरोना काल आया। जिसमें डिजिटल तकनीक का अधिक उपयोग हुआ। ऐसे में किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए स्टार्टअप किया और ऐसी तकनीक इजात की। जिससे एक ही मशीने  किसानों की हर जरूरत को पूरा कर रही है। उनके इस काम को प्रधानमंत्री ने भी सराहा तो आगे काम करने का अवसर मिला। <br /><strong>-आर्यन सिंह, फाउंडर मेरा साथी प्रा. लि.  </strong></p>
<p><strong>प्रतिस्पर्धा के लिए तकनीक का ज्ञान जरूरी</strong><br />दुनिया के साथ चलना है और विश्व के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा करनी है तो तकनीक का ज्ञान जरूरी है। लेकिन उसके साथ ही भारतीय संस्कृति को भी जीवित रखना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों मेंं बच्चों में छिपा टेलेंट अधिक है। उसे सही दिशा में ले जाने की जरूरत है। एआई का उपयोग जानकारी के लिए किया जाना अच्छा है लेकिन उसके दुरुपयोग को भी रोकने की जरूरत है। वहीं बच्चों को उनकी रूचि के हिसाब से आगे बढ़ाना होगा तभी वे अपने क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।  <br /><strong>-अशोक कुमार गुप्ता, फ्रोफेसर रिटा. प्रिंसिपल जेडीबी</strong></p>
<p><strong>एआई का सही दिशा में हो उपयोग</strong><br />एआई पर कोटा में हर स्तर पर काम हो रहा है। यूनिवर्सिटी में भी अच्छा काम हो रहा है। डिजिटल लिट्रेसी बढ़ रही है। वर्तमान समय में डिजिटल व एआई तकनीक का ज्ञान जरूरी है। लेकिन उसके साथ ही संस्कृति का ह्रास न हो इसका भी ध्यान रखना होगा। तकनीक का उपयोग करने के साथ ही बच्चों की सोच में वैज्ञानिक दृुष्टिकोण विकसित करने की जरूरत है। एआई का जितना लाभ है उससे अधिक नुकसान भी है। एआई को सोशल मीडिया अधिक प्रभावित कर रहा है। ऐसे में बच्चों के साथ ही परिजनों में भी जागरूकता की जरूरत है। इसकी शुरुआत खुद से करनी होगी। <br /><strong>- रीना दाधीच, प्रोफेसर कोटा यूनिवर्सिटी </strong></p>
<p><strong>बच्चों में टेलेंट, सही दिशा देने की जरूरत</strong><br />आज के बच्चों में टेलेंट काफी है। जरूरत उन्हें सही दिशा देने की है। शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे डिजिटल तकनीक का अधिक उपयोग कर रहे हैंं वह भी सकारात्मक रूप में। स्किल के साथ डिजिटल तकनीक का उपयोग पिछले 5 साल में अधिक बढ़ा है। इस दिशा में सहरिया बच्चे भी काफी आगे हैं। जरूरत है कि एआई के नकारात्मक पहलुओं को रोका जाए। जिससे उसके दुष्परिणाम नहीं हो। <br /><strong>-विभा शर्मा, डायरेक्टरसीएसटी कम्प्यूटर इंस्टीट्यूट </strong></p>
<p><strong>एआई से रीयल टेलेट हो रहा खत्म</strong><br />वर्तमान में हर क्षेत्र में एआई का अधिक उपयोग होने लगा है। संगीत में भी इसका उपयोग तेजी से होने  लगा है। एआई के आने से रीयल टेलेंट खत्म हो रहा है।  समय के साथ चलना है तो डिजिटल तकनीक का उपयोग भी जरूरी है। लेकिन उसके नकारात्मक पहलुओं को रोकने की भी जरूरत है। क्रियटिविटी बनी रहे। हालांकि आज की यह जरूरत है लेकिन इसके नकारात्मक पहलुओं पर भी हमें सोचना होगा।  <br /><strong>-शिल्पी सक्सेना, डायरेक्टर संगीत वाटिका</strong></p>
<p><strong> शिक्षा में अपग्रेट हमेशा होना चाहिए</strong><br /> डिजिटल साक्षरता और शिक्षा में अंतर समझना होगा। वर्तमान में शिक्षा के साथ डिजिटल साक्षरता वर्तमान की जरुरत है लेकिन इसका उपयोग किस प्रकार से किया जा रहा है विचारणीय प्रश्न है। स्कूलों में मौलिक शिक्षा के साथ डिजिटल शिक्षा जरूरी है। चायना में प्राइमेरी स्तर पर ही लोगों को व्यवसायी शिक्षा के लिए तैयार किया जाता है। वहां एआई कक्षा छह से शुरू कर रहे हमारे यहां डिजिटल और एआई को शिक्षा में समावेश किया है लेकिन अभी उसका व्यापक उपयोग नहीं हो रहा है।  शिक्षा में एआई  व डिजिटल शिक्षा को सोच समझकर लागू करने की आश्यकता है। शिक्षा में अपग्रेट हमेशा होना चाहिए लेकिन उसका उपयोग कैसा होगा इस पर भी ध्यान देने की आवश्कता है। हमें विदेशी संस्कृति के पीछे दौडना रोकना चाहिए लेकिन समय के साथ चलना भी आज की जरूरत है। <br /><strong>-देव शर्मा, चेयरमैन कम मैनेजिंग डायरेक्टर क्रेडीजी कोटा</strong></p>
<p><strong>आधी अधूरी लर्निंग से खत्म हो रही क्रियटिविटी</strong><br />वर्तमान समय में डिजिटल शिक्षा यूथ के लिए जरूरी हो गई है। कारण की भारत डिजिटल क्षेत्र में काफी आगे ग्रोथ कर रहा है। स्कूल कॉलेज में युवाओं को थ्यौरी तो पढाई जाती है। लेकिन प्रेक्टिकल ज्ञान नहीं दिया जाता है। टेक्नोलॉजी में कोडिग नहीं सिखाई जा रही है। युवा एआई से मदद लेकन अपने प्रोजेक्ट पूरा कर रहा है लेकिन वो प्रोजेक्ट कैसे तैयार हुआ उसको बेसिक नॉलेज नहीं मिल रहा है। डिजिटल साक्षरता से युवाओं की क्रिएटिविटी खत्म हो रही है। एआई युवाओं के सीधा मस्तिष्क पर अटैक कर रहा वो स्वयं कोई इनोवेशन नहीं करना चाहता सारा ज्ञान वो एआई से ही लेकर अपने प्रोजेक्ट तैयार कर रहा जो ठीक नहीं प्रेक्टिकल की जगह युवा आएई पर अधीन होता जा रहा है। <br /><strong>-साक्षी गुप्ता, स्टूडेंट</strong></p>
<p><strong> डिग्री की नहीं स्किल बेस शिक्षा की जरूरत</strong><br />एआई तकनीक का उपयोग तो बहुत अधिक होने लगा है। लेकिन उसके बारे में सही जानकारी का भी होना आवश्यक है। इसके लिए स्कूल से ही बच्चों को इस बारे में सही दिशा में जानकारी देनी की आवश्कता है। जिससे शिक्षा पूरी करने तक बच्चे में विशेषज्ञता आएगी। वर्तमान में डिग्री की नहीं स्किल बेस शिक्षा की जरूरत है। आगे बढ़ने के लिए डिजिटल व तकनीकी शिक्षा बहुत जरूरी है। वर्तमान में जिस तरह से एआई का उपयोग बढ़ रहा है। ऐसे में 2030 तक इससे संबंधित लाखों नौकरियां आने वाली है। <br /><strong>-अरविंद गुप्ता, शिक्षाविद </strong></p>
<p><strong>बच्चे तकनीक का उपयोग करें, पंगु नहीं बनाएं</strong><br />भारत विकासशील और चीन विकसित देश है। भारत में टेलेंट की कमी नहीं है। दुनिया में सबसे अधिक टेलेंट भारत का ही काम कर रहा है। एआई जो काम अब कर रहा है। वह काम भारत में शंकराचार्य बहुत पहले से कर रहे हैं। बच्चों को एआई और डिजिटल तकनीक का उपयोग करना आना चाहिए लेकिन उसके कारण बच्चों को पंगु नहीं बनाएं। हर माता पिता को चाहिए कि बच्चों को तकनीक का सही उपयोग करना बताएं। मानवीय मूल्यि बने रहने चाहिए। <br /><strong>-नीलम विजय, सोशल एक्टिविस्ट</strong></p>
<p><strong>एआई लोगों की सोच को अपग्रेड करने का एक टूल</strong><br />कोटा में अभी डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में काम तो हो रहा है लेकिन जिस प्रकार से विकसित देशों में खासतौर से चाइना में इसका उपयोग हो रहा है उस स्तर का अभी भारत में नहीं हो रहा है। लोगों को लगता है एआई आने से लोगों की नौकरियां खत्म होगी यह गलत धारणा है। एआई के प्रयोग से जॉब खत्म नहीं होगा उसका नैचर बदलेगा लोगों को उसके अनुरूप ही अपने को अपग्रेट करना होगा। एआई लोगों को सोच को अपग्रेट करने का एक टूल है। अपनी सोच को व्यापक बनाने के साधन के रूप में देखना चाहिए। वर्तमान शिक्षा नीति में डिजिटल साक्षरता और एआई अपना स्थान बनाने लगी है। लेकिन इसका उपयोग सोच समझकर करने की आवश्यकता है। हर बच्चे में योग्यता की कोई कमी नहीं है उसे सही दिशा देने की आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा थ्यौरी पर ज्यादा जोर दिया जाता है। प्रेक्टिकल पर कम । वर्तमान में डिजिटल साक्षरता लोगों के जीवन का हिस्सा बनती जा रही है। कोटा बेगलूरू से दस साल पीछे चल रहा है। लोगों को नवाचार को अपनाना होगा। कोटा के यूथ को ब्रेन अन्य देशों में काम आ रहा है। <br /><strong>-ओमप्रकाश सोनी, रोबोटिक इंजीनियर एटीएल इंचार्ज</strong></p>
<p><strong>एआई के प्रयोग से शिक्षा अब सार्वभौमिक हो गई है</strong><br />भारत में नई राष्टÑीय शिक्षा नीति 2020 में आर्टिफिशियल इंटीलीजेंस की महत्वपूर्ण भूमिका के चलते ही इसको एजुकेशन सिस्टम में शामिल करने की सिफारिश की गई है। शिक्षा में एआई की सार्वभौमिकता पहुंच एवं वैश्विक कक्षाएं सर्वसुलभ होने लिए स्कूली शिक्षा में एआई व टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के लिए सीबीएसई ने एआई तथ इंटरनेट आॅफ थिंग्स को कक्षा 6 से 10 तक के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।  चीन की बात करें तो वहां नेक्स्ट जनरेशन एआई डवलमेंट प्लान 2017 को अधिक गहनता से शिक्षा में सम्मलित किया गया है। हमारे देश राष्टÑीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य स्थानीय भाषाओं को बढावा देते हुए डिजिटल शिक्षा को बढावा देना है। तथा हॉलिस्टिक एजुकेशन की ओर लेकर जाना है। वहीं चीन का लक्ष्य 2023 तक एआई में वैश्विक नैतृत्व पाना है।  देश में सीबीएसई ने  कक्षा 9 से 11 तक में एआई को इलेक्टिव पेपर के रूप में रक्षा है वहीं चीन में इसे प्राथमिक कक्षाओं से ही पढ़ाया जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अब भविष्य का वादा नहीं रह गया है। बल्कि आज शिक्षा में सक्रिय रूप से आगे बढाया जा रहा है। इसके द्वारा ड्रीम बॉक्स, स्मार्ट स्पैरो जैसे प्लेटफार्म द्वारा उन्नत वैयक्तिक शिक्षण हो रहो रहा है। ग्रेड स्कोप जैसे उपकरणों में  एएआई द्वारा ग्रेडिंग शेड्यूलिंग, रिपोर्ट निर्माण जैसे कार्य किए जा रहे हंै।<br /><strong>-डॉ. मीनू माहेश्वरी, कोटा विश्व विद्यालय </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Jun 2025 11:28:23 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जंक फूड खतरनाक : दादी की किचन के पुराने नुस्खे सेहत का खजाना</title>
                                    <description><![CDATA[जंक फूड्स से बचाव के लिए माता-पिता व टीचर करें जागरूक क्योंकि जंक फूड बीमारियों का वाहक है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/junk-food-is-dangerous--old-remedies-from-grandma-s-kitchen-are-a-treasure-of-health/article-115083"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news48.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति कार्यालय में होने वाली मासिक परिचर्चा की श्रृंखला में गुरुवार को (हाउ टू रिड्यूज जंक फूड इंटेक इन यंग्स्टर एन्ड इनक्रीज हेल्दी डाइट) जंक फूड से बच्चों की हेल्थ को हो रहे नुकसान और हेल्दी डाइट में कैसे वृद्धि करें  इस विषय को लेकर चर्चा की गई। परिचर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने कहा कि इसके लिए हमारा पुराना खानपान, हमारा कल्चर, जीवन जीने की शैली,हमारी सब्जियां, फ्रूट जिन्हें हम भूल रहे हैं उन्हें फिर से अपनाने की जरूरत है। इसके साथ बच्चों को जागरुक करने की भी जरूरत है। संभागियों का कहना था कि हमारी पुरानी रसोई जो दादा दादी के समय चलती थी उसकी फिर से जरूरत है। आज हम जंक फूड से बच नहीं सकते लेकिन इसे कम कर सकते हैं। संभागीयों ने जंक फूड से नुकसान को छोटी क्लास के सेलेबस में शामिल करने तक की बात कही। इससे होने वाली बीमारियों व महामारी का रूप लेता जंक फूड पर भी चर्चा की। इस परिचर्चा में जहां गेस्ट्रोएन्ट्रोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिक,न्यूट्रिशियन काउंसलर, डायटीशियन, फूड प्रस्तुत करने वाले, फूड को लेकर दीवाने टीन, बच्चे, उनके माता पिता,के साथ वनस्पति विशेषज्ञ, जिम संचालक, योग गुरू आदि ने हिस्सा लिया।  प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश... <br /> <br /><strong>हेल्दी भोजन शरीर के लिए जरूरी</strong><br />आजकल रेडी टू ईट के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। जिससे बच्चे बीमार हो रहे है। बच्चों को जंक फूड की ओर आकर्षित करने के लिए टीवी पर दिनभर विज्ञापन चलते रहते हैं। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न है कि बच्चों को हेल्दी खाना क्या दें इस पर पूरा फोकस होना चाहिए। जीरो से 5 साल के बच्चों को कैफिन से दूर रखना चाहिए। बच्चे को दो समय समझाने के लिए बेहतर होते है। एक कुक टाइम दूसरा बेड टाइम खाने के समय और सोने के समय ही बच्चे को अच्छे और बुरे के बारे में विस्तार समझा सकते है। जंक फूड वो जिसमें नमक ज्यादा, फेट और चीनी ज्यादा कैलेरी ज्यादा हो जंक फूड होता है। जंक फूड में विटामिन और मिनरल कम होते है। अल्ट्रा प्रोसस फूड नुकसान पहुंचाते है। एनर्जी ड्रिंक का चलन भी ज्यादा है जो नुकसान दायक है। माता पिता को अपने खाना बनाने के तरीके में बदलाव करना होगा। खाने में पौष्टिक चीजों की वेराइटी देनी होगी। कैफिन वाले डिंÑक नहीं देने होंगे। इसके नुकसान बताने होंगे।<br /><strong>- डॉ. अविनाश बंसल, शिशुरोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>स्कूली सेलेबस में शामिल होना चाहिए</strong><br />लोग चाहकर भी जंक फूड से बच नहीं पा रहे हैं। बच्चों में आउटडोर एक्टीविटी कम हो गई है। मोबाइल देखते हुए चिप्स, नमकीन, पिज्जा बर्गर फास्ट फूड खाते हैं। जिससे शरीर में फेट बढता है। शारीरिक गतिविधियां कम होने से फेट लिवर में जमा होने लगता है बच्चे फेटी लिवर का शिकार हो जाते है। बच्चों में ओबीसीटी बढ़ रही है। 6 से 10 तक की कक्षा के बच्चों के पाठ्क्रम में हेल्दी फूड का पाठ होना चाहिए। क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए और जंक फूड फास्ट फूड की हानि के बारे में विस्तार से बताए। छोटे बच्चों को मोबाइल नहीं दे। रोकथाम बचपन से ही करनी होगी। बच्चों को नैतिकता सिखाने के  लिए वह अपने माता पिता की बात मानें इसके लिए बचपन में ही उन्हें राजा हरिचंद्र और दूसरा श्रवण कुमार की कहानी बतानी चाहिए। इससे बच्चों का सर्वागीण विकास हो सकता है। <br /><strong>- डॉ. अनिल शर्मा, आचार्य ग्रेस्ट्रो मेडिकल कॉलेज </strong></p>
<p><strong>योग से मन होता कंट्रोल</strong><br />जीवन शैली में बदलाव करने से हम जीवन में बहुत कुछ चेंज कर सकते है। हमारे आहार विहार को ठीक करने मन  स्थिर हो जाता है। योग से हम जंक फूड से जंग कर सकते हैं। योग हमारे मस्तिष्क को नियंत्रण करने में काफी सहायता करता है। योग का नियमित अभ्यास करने से मन पर काबू करना सीख सकते जिससे हम अनहेल्दी चीजे नहीं खाएंगे। योग करने से आत्म विश्वास बढ़ता है। योग करने मन पर पूरा कंट्रोल आ जाता फिर आपके सामने पिज्जा बर्गर जंक फूड रखा होगा वो भी आप नहीं खाएंगे। जैसा खाएंगे अन्न वैसा बनेगा मन । शुद्ध आहार के लिए बच्चों को बचपन से संस्कार देने होंगे। हेल्दी और जंक फूड में अंतर बताना होगा। डिब्बा बंद सामानों पर लिखे कोड को बच्चों को समझाना होगा। क्या खाना चाहिए और क्या नहीं यह जिम्मेदारी माता पिता की है। किचन में हेल्दी और टेस्टी चीजें बनेगी तो बच्चे बाहर की चीजें  अपने आप खाना छोड देंगे। <br /><strong>- वसुधा राजावत योगा इंस्ट्रेक्टर </strong></p>
<p><strong>जंक फूड से जंग करने का समय</strong><br />हमारे जीवन में पाश्चात्य संस्कृति और खान पान  हावी होता जा रहा है। जिसके चलते बच्चे से लेकर बडे तक बीमार हो रहे हैं। आज जंक फूड का चलन इतना बढ गया है कि लोग अपने घर का खाना और पुराने हेल्दी खाने की वस्तुओं को खाना भूलते जा रहे हैं। आज जंक फूड से जंग करने का समय है। पहले के समय सुबह के नाश्ते लेकर रात के खाने में पूरा सांइस छिपा था। हमारे घर के किचन में पूरे परिवार के स्वास्थ्य का राज होता था। उसको लोग भूल रहे हैं। लापसी, दलिया, सत्तू,चना, मुरमुरे लोग खाना भूल गए है। किचन से 36 प्रकार के औषधि मसाले गायब हो गए हैं। जिससे लोग अब जंक फूड की ओर आकर्षित हो रहे हंै। अब समय आ गया है कि हमें पुराने खानपान की ओर लौटना होगा।<br /><strong>- पृथ्वीपाल सिंह, वनस्पति विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>घर पर ही बनाएं स्वादिष्ट चीजें</strong><br />जंक फूड का चलन अब लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अब तो घर के बाहर ही यह फूड मिलने लगा है। बाजार में पैक्ड सामान भी शरीर के लिए जहर बनता जा रहा है। ऐसे में हमें बच्चों को जंक फूड से होने वाले नुकसान के बारे में बताना होगा। उनके जिद करने पर उन्हें धीरे-धीरे समझाएं। इसके अलावा घर पर स्वादिष्ट चीजें बनानी चाहिए, जो बच्चों को अच्छी लग सके। आटा सहित अन्य खाद्य सामग्री के आयटम पीजा-बर्गर के शेप में बनाकर बच्चों को खिलाएं। शुरुआत में तो बच्चे खाने में आनाकानी करेंगे, लेकिन बाद में अच्छा टेस्ट आने पर खाने लगेंगे। हर पैरेंटस को इस तरह का प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>- सुनीता माथुर, पैरेंटस</strong></p>
<p><strong>डाइट हेल्दी होगी तो बॉडी भी हेल्दी बनेगी</strong><br />पैरेंटस बच्चों को सेहत बनाने के लिए जिम में तो भेज देते हैं, लेकिन उनके खान-पान के बारे में ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। जबकि जिम के साथ-साथ डाइट का ध्यान रखना भी जरूरी है, तभी तो शरीर स्वस्थ रह सकता है। जंक फूड के पैकेट पर क्या लिखा है इसकी समझ किसी को नहीं है। लोगों को पता होना चाहिए कि पैकेट में क्या नुकसानदायक चीज है। सरकार को इसके लिए प्रयास करने चाहिए।  मेरा मानना है कि इस मामले में पैरेंटस को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों को जंक फूड खाने से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देनी चाहिए। उन्हें बताएं कि जिम जाने का फायदा तभी होगा जब साथ में हेल्दी डाइट लोगे। जिम में आने वाले बच्चों को भी हम जंक फूड से दूर रहने की सलाह देते रहते हैं। अगर डाइट हेल्दी होगी तो बॉडी भी हेल्दी बनेगी।     <br /><strong>- विवियन तिमोती, फिटनेस ट्रेनर</strong></p>
<p><strong>असंतुलित आहार और जंक फूड कर रहा बीमार</strong><br />आजकल स्कूल कॉलेज में बर्थ डे पार्टी चॉकलेट, चिप्स, कुरकुरे बांटने का चलन चल रहा है। माता पिता को  बच्चों को खाने में विकल्प देने होंगे। कोल्ड ड्रिंक की जगह छा लस्सी, नींबू पानी के विकल्प से रिप्लेस कराएं।  मखाने दे सकते हंै। बच्चों को जंक फूड की हानियां बताएं। घर के खाना बनाने में बदलाव करें बच्चों को पौष्टिक खाने में टेस्ट बदलाव करें। बच्चों को चपाती पिज्जा, आटा व सूजी के पिज्जा बेस तैयार उसमें सब्जियों की मात्रा बढा सकते हैं। मेयोनिज सबसे हानिकार है। जंक फूड को कम करने के लिए सप्ताह बच्चा चार बार खा रहा है तो पहले उसको तीन बार करें फिर दो बार फिर सप्ताह में एक बार उसके बाद महीने में एक बार पर लाए साथ ही उसको इसके विकल्प दे दूसरी चीजों टेस्ट डवलप कराएं।      <br /><strong>- अभिलाषा मंगल, डाइटिशियन </strong></p>
<p><strong>बच्चों को जंक व फास्ट फूड्स में अंतर बताएं</strong><br />बच्चों को जंक फूड की जंग में धकेलने वाले भी माता पिता ही है। बच्चों को पौष्टिक खाने के प्रति जागरूक करने के बाजार से कुछ भी खाने की छूट उन्हें बीमारियों की ओर धकेल रही है। बच्चों को जंक फूड व फास्ट फूड में अंतर करना बताना होगा। आज माता पिता के पास बच्चों को गाइड करने का समय नहीं बच्चे क्या खा रहे क्या उनकी चॉइस है इस पर होमवर्क ही नहीं करते है।  स्कूल में टीचर के वाक्य वेद वाक्य की तरह होते ऐसे में बच्चों को जंक फूड व फास्ट फूड में अंतर टीचर बेहतर बता सकते है। कंज्यूमर एजुकेशन की सख्त आवश्यकता है। जंक फूड पर लिखे कोड को बच्चों समझाना होगा।<br /><strong>- प्रोफेसर नीरजा श्रीवास्तव, पोषण विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>बच्चों को स्पोर्ट्स से जोड़ना जरूरी</strong><br />बच्चों को स्पोर्टस से जोड़ना जरूरी है। अच्छा खिलाड़ी बनना है तो उसे अपनी डाइट पर ध्यान देना पड़ेगा। इसलिए जब बच्चे मैदान पर खेल की प्रैक्टिस करने आते हैं तो उन्हें सबसे पहले डाइट के बारे में ही बताया जाता है। ऐसे में जितने ज्यादा बच्चे खेलो से जुड़ेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि कौनसा फूड हेल्दी है और कौनसा अनहेल्दी। बच्चे जब सुबह प्रैक्टिस करने आते हैं तो उन्हें पहले बता दिया जाता है उन्हें अभी क्या खाकर आना है ताकि प्रैक्टिस में कोई दिक्कत नहीं आए। सुबह के समय केला और सेब खाना काफी फायदेमंद है। इन्हें खाने के बाद बच्चों को प्रैक्टिस के दौरान एनर्जी मिलती रहती है।     <br /><strong>- सूरज गौतम, एनआईएस कोच</strong></p>
<p><strong>जंक फूड इंटेक रोकें, करें सख्ती</strong><br />अच्छी बॉडी बनाने के लिए आजकल बाजार काफी हेल्थ सप्लीमेंट बिक रहे हैं। जबकि यह सेहत बनाने की बजाय बिगाड़ते हैं। प्रोटीन के नाम पर कई लोग इनका लगातार सेवन करते हैं जबकि उन्हें यह नहीं पता कि इससे फायदे की जगह नुकसान हो रहा है। यदि बच्चों को जंक फूड खाने से रोकना है तो पैरेंटस को सख्ती करना जरूरी है। क्योंकि बच्चे तो जिद करते रहते हैं, लेकिन उनकी हर बात मानना जरूरी नहीं है। बच्चों को खेलने के भेजा जाए ताकि वहां पर उन्हें हेल्दी डाइट के बारे में काफी जानकारी मिल सकेगी।     <br /><strong>-डॉ. तूफेल अहमद, बीईएमएस,जिम संचालक</strong></p>
<p><strong>मम्मी ने समझाया तो कम किया जंक फूड इनटेक</strong><br />हमें पास्ता व बर्गर खाना अच्छा लगता है। इसका स्वाद बढ़िया होने से इसे खाने की इच्छा होती रहती है। वहीं मेगों शेक पीने में भी काफी आनंद आता है। बाजार में घूमने जाते हैं तो यह चीजें नजर आते ही खाने का मन करता है। अब मम्मी इन चीजों को खिलाने से मना करनी लगी है। उनका कहना है कि यह चीजें हमें नुकसान पहुंचाती है। इससे काफी बीमारियां हो सकती है। ऐसे में अब हमने इन चीजों को खाना काफी कम कर दिया है। <br /><strong>- धौविक बजाज, भाविशा बजाज</strong></p>
<p><strong>कारण भी हम, निवारण भी हम ही </strong><br />आज जो स्कूल से लेकर समाज में जंक फूड खाने का ट्रेंड चल रहा है। ऐसे में बच्चे जंक फूड नहीं खाए तो उनको पिछड़ा समझा जाता है। इसके चलते बच्चे ना चाहते हुए भी जंक फूड की तरफ आकर्षित हो ही जाते है। हमारे कल्चर में जो पाश्चात संस्कृति ने बदलाव किया है जिसके चलते माता पिता चाहकर भी बच्चों को जंक फूड खाने से नहीं रोक पा रहे है। जंक फूड खाना कल्चर बन गया है।  टीवी पर जंक फूड्स के विज्ञापनों की बाढ आई हुई है। बाजार में चिप्स, कुरकुरे, पिज्जा, बर्गर कोल्ड डिंÑक, एनर्जी ड्रिंक  से इतने विज्ञापन आते है बच्चे उस ओर आकर्षित हो जाते है। जंक फूड खाना स्टेट्स सिंबल बनता जा रहा है। शादी समारोह में सबसे ज्यादा भीड़ जंक फूड काउंटर पर ही होती है। <br /><strong>- रेणुका बजाज, पैरेंटस </strong></p>
<p><strong>तब और अब में बच्चों को फर्क करना सिखाएं</strong><br />मुझे जंक फूड ही पंसद है । इसका टेस्ट मेरे दिलो दिमाग पर हावी हो रखा है। मुझे मालूम है यह सब खाना हानिकारक है लेकर जुबां पर इसका स्वाद ऐसा चढा है कि और कुछ खाने का मन ही नहीं करता है।  मुझे कोल्ड कैफिन पीने की लत लग गई। रात के समय पढाई के दौरान भूख लगती है तो चिप्स, कैफिन  चाहिए जो दिमाग मांगता वहीं खाना पड़ता है। यह सब खाने से मेरा वजन बढ गया तो मम्मी पापा ने पिज्जा बर्गर, कोक, कैफिन खरीदने के लिए पैसा देना बंद कर दिया। मुझे योग क्लास जोड दिया अब मेरे खानपान में काफी बदलाव आया है। बच्चों को माता पिता के समय के खाने और अब के खाने में अंतर बताना होगा। बच्चा जंक फूड से तौबा कर लेगा।     <br /><strong>- आश्वि गर्ग, योग स्टूडेंट</strong></p>
<p><strong>मजबूरी में खाना पड़ता था, अब कम किया</strong><br />दिन के समय के कॉलेज और कोचिंग के लिए जाना पड़ता है। इसके लिए सुबह जल्दी घर से निकलना पड़ता है। जिससे कई बार घर से खाना लेकर नहीं जा पाती। कॉलेज के बाहर जंक फूड आसानी से मिल जाता है। इसलिए  भूख लगने पर उसे खा लेती हंू। ऐसा ही अन्य स्टूडेंट भी करते हैं। पहले यह सिलसिला आए दिन चल रहा था। जिससे हेल्थ प्राब्लम होने लगी। इसका कारण लगातार फास्ट फूड खाना था। फिर जब प्राब्लम बढ़ने लगी तो उसने अब जंक फूड खाना कम कर दिया। इससे शरीर को नुकसान पहुंचने लगता है। मेरा मानना है कि जंक फूड लम्बे समय तक खाने से दिक्कत आने लगती है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।     <br /><strong>- दीपिका कुमारी, स्टूडेंट</strong></p>
<p><strong>डाइट को किया डायवर्ट तो बच्चों ने अपनाया</strong><br />वह एक हॉस्टल में कैंटीन चलाते हैं। अधिकांश बच्चों की डिमांड फास्ट फूड की ही रहती है। यह फूड ऐसे केमिकल से बनते है, जो शरीर को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में उन्होंने इस केमिकल के बजाय आटे का पिजा बनाना शुरू कर दिया। इसका स्वाद अच्छा नहीं लगने के कारण शुरुआत में अधिकांश बच्चों ने इसे खाने से मना कर दिया। ऐसे में बच्चों को समझाया कि केमिकल से बना फास्ट फूड काफी नुकसानदेय है। इसके बाद बच्चों ने आटे से बने फास्ट फूड खाना शुरू कर दिया। इसके अलावा कैंटीन में इडली-सांभर भी बच्चों को देने लगे। इसका स्वाद बढ़िया होने से बच्चों को यह काफी पसंद आया है। यदि बच्चों को जंक फूड से दूर करना है तो उनकी डाइट को डायवर्ट करना जरूरी है।     <br /><strong>- विमल आजाद, कैंटीन संचालक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 May 2025 15:50:18 +0530</pubDate>
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                <title>चिकित्सा सुविधाओं की कमी नहीं, रेगुलेटरी सिस्टम में खामियां</title>
                                    <description><![CDATA[डॉक्टर व मरीज के मध्य संबंधों को ठीक करने की जरूरत, सरकारी ही नहीं निजी अस्पताल भी काउंसलर और हेल्प डेस्क को मजबूत करें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/there-is-no-lack-of-medical-facilities--there-are-flaws-in-the-regulatory-system/article-111836"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/news47.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । दैनिक नवज्योति कार्यालय में होने वाली मासिक परिचर्चा की श्रंखला में बुधवार को चिकित्सा व्यवस्था पर चर्चा की गई। आर क्वालिटी हेल्थकेयर फैसिलिटी इजीली असेसिबल टू एवरी वन इन कोटा विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य सेवा आसानी से लोगों को उपलब्ध हो रही हैं अथवा नहीं। पर चर्चा की गई। परिचर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने सुधार के सुझाव और खराब स्थितियों से होने वाली व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला। परिचर्चा में सामने आया कि शहर ही नहीं ग्रामीण इलाकों तक चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन सिस्टम की कमी है। पीएचसी,सीएचसी होने के बावजूद लोग बड़े अस्पताल की ओर मुंह करते हैं। इससे सारा भार बड़े अस्पतालों पर पड़ता है और सारी व्यवस्था तहस-नहस हो जाती है। इस व्यवस्था को बिगाडने में केवल आम लोग ही नहीं मरीज, चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े  सभी लोग शामिल हैं। इसके लिए जागरुकता आनी चाहिए। अस्पतालों में काउंसलर और हेल्प डेस्क के साथ पूछताछ और इमरजेंसी सेवा की खामियों को भी पुखता करने की आवश्यकता है। इस परिचर्चा में मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य,आईएमए के अध्यक्ष, पूर्व अध्यक्ष, सीएमएचओ के अधिकृत प्रतिनिधि,श्री राम मंदिर चिकित्सालय के सभापति, नर्सिंंग कॉलेज के डायरेक्टर,सहायक कर्मचारियों के अध्यक्ष, कोटा हार्ट अस्पताल,भाजपा चिकित्सा प्रकोेष्ठ के संयोजक,पैथालाजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट,नर्सिंग सहित मरीज और उनके तीमारदारों ने भी हिस्सा लिया। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश... </p>
<p><strong>मुख्य बिंदु</strong><br />- पीएचसी, सीएचसी जिला अस्पताल की सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता। <br />- अस्पतालों में बने हेल्पडेस्क।  ल्ल मरीज को सिंगल विंडो पर ही मिले सारी सुविधा<br />- इमजेंसी सेवाओं को बेहतर बनाने की आवश्यकता। <br />- डॉक्टर व मरीज के बीच का संवाद बेहतर हो। <br />- अस्पताल की वेबसाइट बने जिस अस्पताल का पूरा विवरण, डॉक्टरों ओपीडी डे, सुविधा हो जानकारी<br />- अस्पतालों में लगने वाली कतार व्यवस्था सुधार हो।<br />- डॉक्टर से मिलने के लिए आॅनलाइन रजिस्टेशन हो साथ ही बैक की तर्ज पर टोकन सुविधा हो।<br />- हेल्पडेस्क के साथ अस्पतालों में काउंसलर लगाए जो मरीजों बीमारी के लिए गाइड कर सकें। <br />- अस्पताल की सुविधाओं को ब्रोशर होना चाहिए।<br />- रेफर सिस्टम में सुधार की आश्यकता है। <br />- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का उपयोग कम हो रहा है, जिससे बड़े अस्पतालों भीड़ बढ़ रही है।<br />-  मरीज को डॉक्टर के पहुंचने के लिए एक चेनल की आवश्यकता है।<br />- आम आदमी को बीमार पड़ने नहीं है हक<br />- दवा जांच से चल रहे कमीशन के अंकुश लिए कानून बनना चाहिए। <br />- रजिस्टर्ड व एमडी पैथेलॉजिस्ट से ही जांच हो, बिना लाइसेंस के चल रही जांच केंद्र लगें अंकुश<br />- सरकारी योजनाओं को ठीक से क्रियान्वयन हो तभी आम आदमी तक सुलभ व सस्ता इलाज मिलेगा।</p>
<p><strong>प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता</strong><br />कोटा में सस्ती, सुलभ और गुणवत्ता युक्त चिकित्सा व्यवस्था मौजूद है। आम आदमी इन सुविधाओं को ठीक से उपयोग नहीं कर पा रहा है। इसके लिए उचित माध्यम को ठीक करने की आवश्यकता है। जब तक प्राथमिक स्तर की चिकित्सा व्यवस्था में सुधार नहीं होगा तब तक अस्पतालों में लंबी कतारें लगेंगी। प्राथमिक स्तर पर ही लोगों इलाज मिलेगा तो बड़े अस्पतालों में भीड़ कम होगी तो सुपर स्पेशियलेटी सुविधा लोगों को बेहतर तरीके से मिल सकेंगी। अभी लोग प्राथमिक स्तर की बीमारियों के लिए भी बड़े अस्पतालों में दौड़ लगा रहे हैं। अस्पताल में लोगों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में मरीज को हेल्प डेस्क और काउंसलर की आवश्यकता है। उसको यह ही पता नहीं उसको जाना किस डॉक्टर के पास है। <br /><strong>-डॉ. के श्रृंगी, एमआईए अध्यक्ष कोटा</strong></p>
<p><strong>इमरजेंसी सुविधाओं को बेहतर बनाने की आवश्यकता</strong><br />वर्तमान में कोटा में आमजन के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध है। यहां मरीज के पास अस्पताल से लेकर स्पेशलिस्ट डॉक्टर चुनने की सुविधा है।  आमजन को बीमारी का इलाज कराने के लिए कई विकल्प उपलब्ध है। सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं और खासतौर से मुख्यमंत्री आरोग्य योजना मां योजना में 85 प्रतिशत लोग कवर है। बाकी शेष लोग आरजीएचएस में कवर, मुख्यमंत्री नि:शुल्क निरोगी योजना में सभी लोग कवर है।  चिकित्सा सुविधा पूरी है लेकिन लोगों का अस्पताल में अनुभव कैसा रहा है इसी पर सारा सिस्टम चलता है। डॉक्टर ने मरीज को इलाज के दौरान कैसा फील कराया यह मायने रखता है। लोगों में कम्युनिकेशन और इमजेंसी में मरीज को ठीक से सुविधा युक्त इलाज मिल जाए तो यहां किसी चीज की कमी नहीं है। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए एमडी स्तर के काउंसर हों जो मरीज से ठीक से संप्रेषण कर सकें। <br /><strong>-डॉ. विजय सरदाना, पूर्व प्रधानाचार्य मेडिकल कॉलेज कोटा।</strong></p>
<p><strong>व्यवस्था में सुधार की जरूरत </strong><br />आमजन को कोटा में और शहरों की अपेक्षा बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल रही है। यहां संसाधन की कोई कमी नहीं है। मरीज के पास इलाज के लिए मल्टीपल चॉइस है। अलग अलग बीमारी के लिए सर्व सुविधाओं से लेस सरकारी व निजी अस्पताल मौजूद है। अन्य शहरों में कोटा में इलाज सस्ता है। उसके बावजूद मरीज संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। मरीज  अपने को  जांच, इलाज के नाम पर ठगा ठगा सा महसूस करता है पीएचसी व सीएचसी स्तर पर सुविधाएं बेहतर करने की आवश्यकता है। सरकार की ओर से कई योजनाए चलाई जा रही जिससे आमजन को सस्ता और सुलभ इलाज मिल रहा है। चिकित्सक व मरीज में संप्रेषण अच्छा करने की आवश्यकता है। निजी व सरकारी डॉक्टर को अपने पैसे को इमानदारी से करने की आवश्यकता है। डाक्टरों पर बेवजह तोहमत लगाई जाती है। व्यवस्था की खामियां चिकित्सकों को भुगतनी पड़ती हैं। <br /><strong>-डॉ. सुधीर उपाध्याय सभापति श्रीराम मंदिर चिकित्सालय</strong></p>
<p><strong>कोटा में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता आसान</strong><br />विदेशों की तुलना में देश और कोटा में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता काफी आसान है। यहां मरीज अपनी पसंद के डॉक्टर व अस्पताल में कम से कम खर्च में बेहतर उपचार ले सकता है। डॉक्टर भी आसानी से मरीज की एप्रोच में हैं। कई बार मरीज के एनवक्त पर आने से उसे सही उपचार मिलने में देरी हो सकती है। डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ के पास कार्यभार अधिक होने से परिस्थितिवश विवाद की स्थिति बन सकती है। जो लोग परेशान होते हैं वह अज्ञानता व जागरूकता की कमी के कारण होते है। अस्पतालों में हैल्प डेस्क बनाई जाएं और सरकारी योजनाओं को सही ढंग से लागू कर दिया जाए तो कोटा जैसी स्वास्थ्य सेवाएं कहीं नहीं हैं। कोरोना में कोटा जैसी मेडिकल सुविधाएं कहीं नहीं मिली। <br /><strong>-डॉ. अमित व्यास, संयोजक, भाजपा चिकित्सा प्रकोष्ठ</strong></p>
<p><strong>प्रशिक्षित स्टाफ की कमी, सुविधाओं का लाभ नहीं</strong><br />कोटा संभागीय मुख्यालय है। यहां मेडिकल कॉलेज व सुपर स्पेशलिटी जैसे अस्पताल है। डॉक्टर भी विशेषज्ञ हैं। लेकिन कई बार सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ के प्रशिक्षित नहीं होने से मरीजों को सही उपचार नहीं मिल पाता है। जिससे मरीजों को उपचार कम और दर्द अधिक  सहना पड़ता है। साथ ही सरकार की योजनाएं भी हैं लेकिन सरकारी अस्पतालों में अधिकतर समय जांच मशीनें खराब होने से मरीजों को सुविधाएं नहीं मिल पाता है। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने व आम आदमी की पहुंच तक बनाने के लिए व्यवस्थाओं में सुधार करने की जरूरत है। <br /><strong>-मधु ललित बाहेती, अध्यक्ष लॉयंस क्लब कोटा सेंट्रल</strong></p>
<p><strong> गांव से लेकर शहर तक चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हुई</strong><br />चिकित्सा एंव स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं को काफी बेहतर किया है। पीएचसी व सीएचसी पर अब सीजेरियन आॅपरेशन होने लगे हैं। साथ ही शहरी व ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टर से लेकर जांचों की सुविधाएं पूरी उपलब्ध है। उपस्वास्थ्य केंद्र,पीएचसी सीएचसी पर जांच इलाज और भर्ती करने सुविधाएं है। लोग बेहतर के चक्कर में शहर के बड़े अस्पतालों की ओर आते है।  प्राथमिक स्तर पर सोनोग्राफी, एक्सरे और सभी प्रकार की जांचे तक उपलब्ध हैं। सरकार ने विशेषज्ञ डॉक्टर भी सीएचसी पीएचसी पर लगा रखे हंै। सरकार की ओर से चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं को आमजन तक बेहतर तरीके से पहुंचाया जा रहा है। टीकाकरण से लेकर बच्चों के स्वास्थ्य गर्भवती महिलाओं सोनोग्राफी के लिए वाउचर जैसी सुविधा से काफी लाभ मिल रहा है। <br /><strong>-डॉ. अनिल मीणा, एसएमडी सीएमएचओ आॅफिस</strong></p>
<p><strong>नर्सिंग स्टाफ का समय-समय पर हो प्रशिक्षण</strong><br />सरकारी और निजी अस्पतालों में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ कोर्स करने के बाद ही लगते हैं। लेकिन समय-समय पर उनका रिफ्रेशर कोर्स व प्रशिक्षण किया जाना आवश्यक है। जबकि कोर्स में प्रावधान है। लेकिन कई बार किसी कारणवश स्टाफ की गलती के कारण मरीज को परेशानी का सामना करना पड़ता है तो उससे पूरे अस्पताल की छवि पर प्रभाव पड़ता है। यदि ट्रेनिंग में उन्हें उनके काम के साथ-साथ मरीज को हैंडल करना भी सिखाया जाएगा तो जो छोटी-छोटी समस्याएं आती हैं उनका समाधान हो जाएगा। <br /><strong>-डॉ. सुधीश शर्मा, डायरेक्टर नर्सिंग कॉलेज</strong></p>
<p><strong>लोगों में जागरूकता की कमी</strong><br />कोटा में स्वास्थ्य सेवाएं अन्य शहरों की तुलना में काफी बेहतर है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी है। जिसके कारण कई बार बीमारी में उन्हें परेशान होना पड़ता है। शहर के लोगों को तो डॉक्टर से लेकर मेडिकल स्टोर तक की जानकारी है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को सही जानकारी नहीं होने से वे मेडिकल स्टोर  पर जाकर अच्छे डॉक्टरों की जानकारी लेते है।  वहीं जहां तक दवाई का सवाल है दवाईयां अधिकतर जिस डॉक्टर को दिखाया उसके नजदीक मेडिकल स्टोर पर ही मिलती है।  लेकिन जब मरीज को उसकी सुविधा अनुसार जगह पर दवाई नहीं मिलती तो वह परेशान होता है। दवाईयां ऐसी लिखी जाएं जिनकी उपलब्धता आसान होगी तो मरीज की आधी परेशानी दूर हो जाती है। मरीज पैसा खर्च करने को तैयार है लेकिन वह सही उपचार व दवाई चाहता है जिससे वह समय रहते ठीक हो सके। इसके लिए व्यवस्था  में थोड़े सुधार की जरूरत है। <br /><strong>-भजन भगवानी, मेडिकल शॉप आनर,सह संयोजक चिकित्सा प्रकोष्ठ</strong></p>
<p><strong>ओपीडी क्रिएटिव होनी चाहिए</strong><br />अस्पताल में मरीज ओपीडी में आए तो उसको गुड फिल होना चाहिए। अस्पतालों की ओपीडी क्रिएटिव होनी चाहिए। हेल्दी वातावरण मरीज को मिलेगा तो आधी बीमारी वैसे ही ठीक हो जाएगी। डॉक्टर को मरीज की केस हिस्ट्री लेने के दौरान मरीज को सकारात्क करना जरूरी है। जिससे मरीज का डॉक्टर पर विश्वास बढ़ता है। मरीज बेहतर सुविधा और बेहतर इलाज में विश्वास करता है। वो अस्पताल में शत प्रतिशत अटेंशन की अपेक्षा के साथ आता उसकी अपेक्षा में खरा उतरने की जरुरत है। <br /><strong>-डॉ. अभिषेक राठौड़, न्यूरोलोजिस्ट कोटा हार्ट</strong></p>
<p><strong>शुरुआत में सुविधा मिलेगी तो नहीं होंगे मरीज परेशान</strong><br />सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों की संख्या तो काफी अधिक रहती है। उनमें अधिकतर गम्भीर व एक्सीडेंट वाले भी होते है। जिन्हें सबसे पहले स्ट्रेचर की जरूरत होती है। लेकिन वही पर्याप्त नहीं होने से मरीजो की परेशानी उसी से बढ़ने लगती है। जबकि स्ट्रेचर चलाने से लेकर संविदा पर कार्यरत अन्य कर्मचारी कम मानदेय मिलने पर भी सेवाएं देता है। लेकिन संवेदक द्वारा समय पर मानदेय तक नहीं देने से उनकी समस्याएं अधिक हो जाती है। जिस कारण से संविदा कर्मियों को मजबूरन हड़ताल करनी पड़ती है। मरीज को यदि शुरुआत में ही सुुविधाएं बेहतर मिलने लगेंगी तो किसी तरह की समस्या ही नहीं होगी। <br /><strong>-दिलीप सिंगोर, जिलाध्यक्ष ठेका संघ, मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>मरीज व डॉक्टर के रिश्ते मधुर होने चाहिए</strong><br />कोटा के सरकारी व निजी अस्पतालों में अन्य जिलों से चिकित्सा व्यवस्थाएं काफी बेहतर है। दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और जयपुर में होने वाले जटिल आॅपरेशन कोटा में कम खर्च में हो जाते है। जिससे मरीजों की बड़े शहरों की दौड़ कम हुई है। हार्ट, किडनी, कैंसर जैसी बीमारियों का कोटा में मरीजों को बेहतर इलाज मिल रहा है। कोटा में डॉक्टर और मरीज के रिश्ते मधुर होने चाहिए। साथ अस्पतालों काउंसर और नर्सिंग स्टॉफ समय समय पर ट्रेनिंग कराकर चिकित्सा सुविधाओं हुए नवाचार लिए प्रशिक्षत करना चाहिए। <br /><strong>-डॉ. ओमप्रकाश धाकड़, कोटा हार्ट इंस्टीट्यूट</strong></p>
<p><strong>दस साल में स्वास्थ्य सेवाओं में हुआ सुधार</strong><br />देश और विशेष रूप से कोटा में दस साल पहले और वर्तमान की स्वास्थ्य सेवाओं में जमीन आसमान का अंतर है। पहले की तुलना में वर्तमान में स्वास्थ्य सेवाएं कोटा में बेहतर हुई है। केन्द्र व  व राज्य सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में खूब खर्चा कर रही है। यहां जांच के लिए एक से बढ़कर एक प्रयोगशालाएं हैं। जहां बिना पैथोलोजिस्ट के हस्ताक्षर के जांच रिपोर्ट नहीं दी जाती। यह जरूर है कि लैब अधिक हैं और उनमें प्रशिक्षत टैक् नीशियन की कमी हो सकती है। यह पेशा विश्वास का है। 2014 से पहले जहां देश में 6 करोड़ लोगों की मौत इलाज नहीं मिलने के कारण हो जाती  थी। वैसे स्थिति अभी नहीं है। कोटा में डॉक्टरों की उपलब्धता से लेकर जांच तक की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो रही हैं।  <br /><strong>-डॉ. गोपाल सिंह भाटी, पैथोलोजिस्ट इंडिपेंडेंट डायरेक्टर सेल इंडिया</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Apr 2025 13:02:56 +0530</pubDate>
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                <title>ज्यादा लाभ मतलब धोखा, सतर्क रहें पाँजी स्कीम्स से</title>
                                    <description><![CDATA[लालच, इमोशन और आपसी रिश्तों से फंसते है चिटफंड कंपनियों में निवेशक, निवेश से पहले यह ध्यान रखना होगा कि कम्पनी अधिकृत जगह पर पंजीकृत है या नहीं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/more-profit-means-fraud--be-cautious-about-ponzi-schemes/article-108252"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(9)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । समाज के विभिन्न मुद्दों पर आयोजित परिचर्चा की श्रंखला में शुक्रवार को धोखाधड़ी पूर्ण निवेश घोटालों में लोगों के फंसने के बाद उसके प्रभाव और दुष्प्रभाव को लेकर दैनिक नवज्योति कार्यालय में मासिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में पांजी स्कीम्स से बचने के तरीके, व्यक्ति आखिर किन परिस्थितियों में ऐसी स्कीम का शिकार होता है, उसे शिकार बनाने में कौनसा मनोविज्ञान काम करता है। रिश्तेदारों की भूमिका ऐसे मामलों में क्या रहती है। क्यों पूरे के पूरे परिवार ऐसी खोखली योजनाओं में फंस कर लुट जाते हैं। ऐेसे सभी मुद्दों पर चर्चा की गई। चर्चा में मुख्य रूप से लालच और महत्वाकांशा के साथ परिस्थितियों का मुद्दा उठा जो ऐसी घटनाओं का बायस बनता है। परिचर्चा का विषय था व्हाई पीपल गेट ट्रेप्ड इन पॉंजी स्कीम्स। इस परिचर्चा  में चाटर्ड एकाउन्टेन्ट एन्ड इन्वेस्टमेंट बैंकर,एडवोकेट, निवेशक, सहकारिता विभाग के रिटा. अधिकारी, बिजनस मेन, कंपनी सैकेट्री,  मनोचिकित्सक, सोशल वर्कर, गृहिणी, स्कीम्स के पीड़ित  सहित सभी विषय विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी । प्रस्तुत हैं उसके अंश:-</p>
<p><strong>छोटी सी चीज की करते जांच परख, निवेश की क्यों नहीं</strong><br />व्यक्ति छोटी सी भी चीज खरीदता है तो बहुत जांच परख कर उसमें पैसा लगाता है। लेकिन पॉंजी स्कीम्स में कम्पनियों के एजेंटो के झांसे में आकर बिना सोचे समझे ही लाखों रुपए निवेश कर देता है। जबकि व्यक्ति को खुद की राशि को खुद ही सोच-समझकर सही जगह पर निवेश करना चाहिए। व्यक्ति खुद लालच में आकर इन कम्पनियों के झांसे में फंसता है।  निवेश करने से पहले यह ध्यान रखना होगा कि कम्पनी अधिकृत जगह पर पंजीकृत है या नहीं। ऐसे में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। निवेश सुरक्षित जगह पर ही करना चाहिए। लाभ कम मिले लेकिन रकम डूबने का खतरा नहीं रहेगा। <br /><strong>-पंकज लड्ढ़ा, निवेशक  व समाज सेवी</strong></p>
<p><strong>निवेश से पहले दस्तावेजों की पुष्टि जरूरी</strong><br />किसी भी प्राइवेट कम्पनी या फर्म द्वारा रकम को कम समय में अधिक लाभ देकर रिटर्न करने का दावा किया जाता है तो लोग जल्दी पैसा कमाने के लालच में उसमें फंस जाते है। उसका फायदा उठाकर कम्पनियां मोटी रकम लेकर लोगों को चूना लगाती है। हालांकि ऐसी फर्जी कम्पनियों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार ने कम्पनी एक्ट लागू किया है।  आईबीबीआई कानून बनाया है। जिसके माध्यम से निवेशक उन कम्पनियों के खिलाफ रजिस्ट्रार कार्यालय में शिकायत कर सकता है। कम्पनियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। लेकिन निवेशकों को किसी भी जगह पर मोटी रकम निवेश करने से पहले उसकी पूरी जानकारी और दस्तावेजी पुष्टि कर लेनी चाहिए। उसके बाद ही निवेश करना चाहिए। लालच में न फंसते हुए सुरक्षित जगह पर ही निवेश करना चाहिए। <br /><strong>-अक्षय गुप्ता (सीएस)चैयरमेन कोटा चैप्टर आईसीएसआई </strong></p>
<p><strong>लोगों में जागरुकता की कमी</strong><br />पॉंजी कम्पनियों में अधिकतर कम शिक्षित लोग ही फंसते है। छोटे-छोटे काम कर अपना परिवार चलाने वालों को कम समय में अधिक लाभ का लालच देकर उनकी रकम को हड़पा जा रहा है। जिसकी लोगों को जानकारी या आभास तक नहीं होता। ऐसे में आवश्यक है कि लोगों को इस तरह के फ्रॉड से बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं। विशेष रूप से घरों में काम करने वाली महिलाओं व उनके परिवारों के लिए इस तरह के कार्यक्रम करना आवश्यक है। छोटी-छोटी कमाई से की गई बचत जब डूबती है तो उन परिवारों पर व्यथा व दर्द को कोई नहीं समझ सकता। <br /><strong>- डॉ. रेणु नैनावत एसोसिएट प्रोफेसर</strong></p>
<p><strong>फ्रॉडर हमेशा आगे, लालच पर कंट्रोल करें</strong><br />लोग लालच भय और कमीशन के चक्कर में आकर ऐसी कंपनियों में बिना जानकारी के निवेश करते हैं। फ्रॉड करने वाला हमेशा निवेशक से एक कदम आगे होता है। लोगों को किसी भी कंपनी, बैंक संस्था में निवेश करने से पहले सेबी से रजिस्टर्ड सलाहकार से सलाह लेकर ही निवेश करें। बड्स एक्ट राजस्थान में लागू हो। लालच पर कंट्रोल करें। साथ निवेश के लिए जागरुकता जरुरी है। शिक्षा में निवेश शिक्षा होनी चाहिए। अपने लालच पर अंकुश लगाना होगा। एक साथ किसी संस्था में निवेश नहीं करें। लोगों को निवेश करने से पहले जोखिम और कंपनी का शैड्यूल समझकर ही निवेश करना चाहिए।  किसी निवेश में जोखिम तो रहता ही है। <br /><strong>- अभिषेक गर्ग चार्टड एकाउन्टेन्ट एंड इनवेस्टमेंट बैंकर(चीयर बुल)</strong></p>
<p><strong>भरोसा बन रहा धोखाधड़ी का कारण</strong><br />निवेशक के सलाकार को भी कंपनी के बारे में पूरा पता नहीं होता है। वो मौखिक ही निवेशक को जानकारी देता है, पेपर वर्क नहीं दिखाता है। सारा खेल भरोसे पर चलता है। यही भरोसा धोखाधडी का कारण बनता है। निवेशक यदि सेबी से रजिस्टर्ड सलाहकार से सलाह लेकर निवेश करेंगा तो जो रजिस्टर्ड सलाहकार वो कंपनी के सकारात्मक व नकारात्मक सभी पहलुओं पर निवेशक को बताएगा उसका पैसा कितना सुरक्षित कंपनी डूबेगी तो कौन जिम्मेदार होगा। यह सभी जानकारी रजिस्टर्ड सलाकार ही दे सकता है। राजस्थान में अनियमित जमा योजना प्रतिबंधित अधिनियम 2019 बड्स एक्ट  लागू हो तो निवेशकों को शीघ्र न्याय मिलेगा। चिंड फंड कंपनियों पर अंकुश लगेंगा। <br /><strong>-नवीन शर्मा, एडवोकेट</strong></p>
<p><strong>जांच पड़ताल कर निवेश किया फिर भी डूबी रकम</strong><br />हर व्यक्ति वृद्धि करना चाहता है। उसके लिए मेहनत के साथ ही यदि उसके पास रकम है तो वह उसका सुरक्षित निवेश करना चाहता है। भाई के कहने पर लाखों रुपए कम्पनी में निवेश किए। लेकिन उससे पहले उसकी पूरी जांच पड़ताल की और दस्तावेजी सत्यापन तक किया। भाई को तो लाभ हुआ लेकिन मुझे नहीं। कम शिक्षित ही नहीं शिक्षित लोग भी लालच में आकर फंस जाते है। किसी के भरोसे में आकर खुद की रकम को गलत जगह पर नहीं लगाएं। कहीं भी निवेश करें तो सोच समझकर व जांच पड़ताल के बाद ही करें। लालच में नहीं आएं वरना नुकसान होना तय है। <br /><strong>-ललित कुमार मल्होत्रा: एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>परिचितों से पहले करते हैं सम्पर्क</strong><br />पॉंजी कम्पनियों में काम करने वाले एजेंट सबसे पहले अपने नजदीकी व परिचितों से सम्पर्क कर उन्हें निवेश का लालच देते है। उनके द्वारा इस तरह की स्कीम बताई जाती है जिसमें कोई भी जल्दी  झांसे में आ सकता है। हमारे परिवार में भी कुछ लोग झांसे में आकर निवेश कर चुके है। लेकिन जिस तरह से गम्भीर बीमारी में बचाव ही उपचार है। उसी तरह से अपनी रकम को कहीं भी निवेश करने से पहले   पूरी जांच पड़ताल करें। अधिक लालच के झांसे में नहीं आए। सरकारी एजेंसी में निवेश से लाभ कम होगा लेकिन रकम सुरक्षित रहेगी। <br /><strong>-कुन्ती मूंदड़ा, सोशल वर्कर</strong></p>
<p><strong>अधिक लाभ का लालच मतलब धोखा</strong><br />व्यक्ति कम समय में अधिक लाभ के लालच में आकर बिना सोचे समझे लाखों रुपए पॉंजी कम्पनियों में निवेश कर देता है। लेकिन अपनी रकम को सुरक्षित रखना है तो अधिक लाभ के लालच से बचना होगा। कम समय में अधिक लाभ का मतलब ही धोखा है। पूर्व में ऐसे एक झांसे में फंसने के बाद अब कोई फोन भी आता है और  ज्यादा देने का नाम भी लेता है तो पूर्व के अनुभव से सबक लेकर साफ इनकार कर देती हूं। सभी को ऐसा ही करना होगा तभी बचा जा सकता है। <br /><strong>-सोनल विजयवर्गीय, एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>रजिस्टर्ड संस्थाओं में करें निवेश</strong><br />संस्थाओं में निवेश से पहले यह तय करे कि संस्था की प्रत्येक वर्ष वार्षिक साधारण सभा हो रही है या नहीं।  हर साल संस्था आडिट करा रही है या नहीं संस्था लाभांश का वितरण कर रही है या नहीं यह जानकारी करने के बाद ही निवेश करना चाहिए। संस्था का विधान के अनुसार चुनाव हो रहा है या नहीं इसकी जानकारी रखनी चाहिए। साधारण सभा में जाना चाहिए। पंजीकृत कार्यालय में जाकर संस्था की जानकारी लेने के बाद ही निवेश करना चाहिए। निवेशक को सक्रिय व जागरूक होकर ही निवेश करना चाहिए।<br /><strong>-रामगोपाल शर्मा,सहकार विद रिटायर्ड आॅफिसर कॉपरेटिव डिपार्टमेंट </strong></p>
<p><strong>कम समय में रकम दोगुना करने वाली संस्थाओं से बचें</strong><br />लोग लालच में कम समय में रकम दोगुना होने के लालच में बिना संस्था की जानकारी के निवेश कर देते हैं। निवेशक हमेशा फायदा ही देखता है। कंपनी के पेपर वर्क पर ध्यान नहीं देता । कंपनी के नियम और शर्त को ठीक से अध्ययन करकर निवेश करें तो ऐसे फ्रॉड से बच सकता है। सीबी से रजिस्टर्ड संस्थाओं में ही निवेश करना चाहिए।  किसी भी कंपनी में निवेश कराने वाले अपने नजदीक वाले रिश्तेदार और परिवार के सदस्य ही होते  है। उन पर भरोसा करके लोग आंख मूंद कर निवेश कर देते है। कंपनी की वास्तविक स्थिति की कोई पड़ताल नहीं करता है। सारा खेल भरोसे का है। <br /><strong>-सुशील जांगिड़, नौकरीपैशा पीड़ित</strong></p>
<p><strong>शुरू में रिटर्न दिया, बाद में धोखा</strong><br />साथी के कहने पर अपेक्षा ग्रुप में लाखों रुपए निवेश किए। उसके द्वारा अच्छा रिटर्न मिलने का भरोसा दिलाया था। शुरुआत में अच्छा रिटर्न मिला भी। उसे देखते हुए स्वयं के अलावा अन्य रिश्तेदारों से भी इसमें निवेश कराया। मकान बनवाने की रकम अपेक्षा ग्रुप में निवेश कर दी। लेकिन बाद में जब राशि नहीं धोखा मिला तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसका केस भी चला लेकिन रकम नहीं मिली। हालत यह है कि अब मकान बनवाने के लिए लोन लेना पड़ा। इसलिए किसी भी जगह बड़ी रकम को निवेश करने से पहले उसके बारे में पूरी जांच पड़ताल करना बहुत जरूरी है। साथ ही अधिक लाभ के लालच से बचना होगा। <br /><strong>- संजीव साहनी व्यवसायी और पीड़ित</strong></p>
<p><strong>लोग फील गुड के नशे में चलते हैं</strong><br />लोग कम समय में ज्यादा आय के चक्कर में कंपनी की प्रारंभिक जानकारियों तक नजर अंदाज कर जाते हैं। कंपनी की सकारात्मक चीजों को ही एजेंट द्वारा उनको दिखाई जाती है। निवेशक नकारात्मकता छोड़ देता है। जिससे वो ऐसी धोखाधडी में फंसता है। निवेशक हमेशा फील गुड के नशे में चलता है। डोमामिन केमिकल उसको सभी अच्छा ही महसूस करता है। जिससे वो उसके नकारात्मक पहलुओं को गौण कर जाता है। निवेश का नशा अफीम के नशे जैसा होता है जिसमें स्वयं तो फंसता दूसरे को भी फंसाता है। व्यक्ति को अपनी भावनाओं और लालच पर रेड फ्लेग लगाना होगा। तभी वो अवसाद से बच सकेगा । <br /><strong>-डॉ. दीपक गुप्ता मनोचिकित्सक </strong></p>
<p><strong>कंपनी दोषी नहीं, सिस्टम में खामियों से लोगों का पैसा डूबा </strong><br />कंपनी हमेशा निवेश का पैसा देती है। लेकिन सरकारी सिस्टम कंपनियों पर ऐसे नियम लगाकर उनको बंद कर देते हंै। उनकी संपत्ति जब्त कर लेते हैं उसके बाद निवेशकों को उनका पैसा नहीं लौटाते है। पल्स ग्रीन में जमीन में इन्वेस्ट किया लेकिन सरकार ने कंपनी सीज कर दी। उसकी पूूंजी ले ली लेकिन निवेशकों को लौटाई नहीं । ऐसे में सबसे ज्यादा परेशानी एजेंट को होती है। वो ही निवेशक के सीधे संपर्क में होता है। आमजन कंपनी पर नहीं एजेंट पर भरोसा कर निवेश करता है। कंपनी बंद हो जाती तो मरण एजेंट का होता है। सरकार कंपनी को बंद करती तो निवेशकों को पैसे समय पर लौटाने चाहिए। सहारा, पल्स ग्रीन, आदर्श कॉपरेटिव संस्थाओं ने लोगों के अभी तक पैसे वापस नहीं किए हंै। <br /><strong>-रघुराज सिंह प्राइवेट सहायक व पीड़ित</strong></p>
<p><strong>लालच पर लगाएं लगाम, कम मिले पर बेहतर मिले</strong><br />लोगों को अपने लालच पर लगाम लगानी होगी। लेकिन लोगों की मजबूरी है उन्हें अपनी जरुरतों के लिए कहीं ना कहीं तो निवेश करना ही होता हैं। बेटी की शादी, बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए कुछ जमा करना अच्छी बात है लेकिन अपनी जमा पूंजी को अधिक फायदे के चक्कर में गलत हाथों में देने से बचना चाहिए। इसके लिए पूरी पड़ताल करने के बाद ही निवेश करना चाहिए। चिटफंड कंपनियां हमेशा आपके भावनाओं के साथ खेलती है और आपको ज्यादा का लालच देकर निवेश कराती है इससे बचना चाहिए। हमें छोटी छोटी बचत को अलग अलग कंपनियों में निवेश करना चाहिए। बैंक कम फायदा देता लेकिन पैसा डूबने का जोखिम अन्य कंपनियों की अपेक्षा कम होता है। <br /><strong>-सविता यादव</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Mar 2025 15:08:57 +0530</pubDate>
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                <title>परिचर्चा : नशा मुक्ति के लिए जरूरी है सामूहिक प्रयासों की चोट, नशे की हो रही होम डिलिवरी </title>
                                    <description><![CDATA[ समाज के विभिन्न मुद्दों पर आयोजित परिचर्चा की श्रंखला में शुक्रवार को ड्रग्स के समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर दैनिक नवज्योति कार्यालय में मासिक परिचर्चा का आयोजन किया गया
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/discussion--collective-efforts-are-necessary-for-de-addiction/article-105137"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer90.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। समाज के विभिन्न मुद्दों पर आयोजित परिचर्चा की श्रंखला में शुक्रवार को ड्रग्स के समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर दैनिक नवज्योति कार्यालय में मासिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में ड्रग्स के उत्पादन, सप्लाई, डिमांड, तस्करी, मादक पदार्थों की अवेलिबिलिटी, रोकने के इंतजाम के साथ समाज पर पड़ रहे प्रभाव पर चर्चा की गई। परिचर्चा का विषय था ड्रग्स आर लाइक टरमाइट्स विच ईट्स द बॉडी था। इस परिचर्चा में सेन्ट्र ब्यूरो आॅफ नारकोटिक्स के डिप्टी कमिश्नर, एडिश्नल एपपी, विभिन्न एनजीओ के सदस्य,साइकेटिस्ट, समाज शास्त्री, प्रोफेसर ,ब्रह्मा कुमारी की बहनें, किसान नेता सहित कुछ ऐसे लोगों को भी आमंत्रित किया गया था जो स्वयं ड्रग्स के दलदल में फंस चुके थे। परिचर्चा के दौरान सभी विषय विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी । प्रस्तुत हैं उसके अंश </p>
<p><strong>नशे की हो रही होम डिलिवरी </strong><br />कोटा शहर को यदि नशे से मुक्त कराना है तो रुट्स को पहचानना और उसे तोड़ना होगा, जो प्रतिबंधित नशा सामग्री है, वह ब्लैक से बिक रही है। ऐसे में सप्लाई चैन को खत्म करना जरूरी है। हालात यह है, नाबालिगों से न केवल नशा बिकवाया जा रहा है बल्कि होम डिलिवरी भी करवाई जा रही है। ऐसे में जनजागरण को साथ लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। <br /><strong>- कुलदीप अडसेला,सचिव परिवर्तन सेवा संस्थान नशा मुक्ति केंद्र कुन्हाड़ी</strong></p>
<p><strong>5 साल के अथक प्रयास से छूटा नशा</strong><br />सन 1984-85 में तिनका-तिनका जोड़कर मकान बनाया था।  वर्ष 1986  में बाढ़ आई तो मकान ढह गया। जिससे मैं तनाव में रहने लगा। काम-घंधे भी छूट गए। इसी दौरान साथियों के साथ पहली बार स्मैक पी तो कुछ समय के लिए अपने गम भूल गया। फिर स्मैक की लत लग गई। फिर इंजेक्शन लगाने लगा। लेकिन यह नशा महंगा होने के कारण इंजेक्शन वाला नशा करने लगा। बाद में कुछ लोगों की मदद से नशा मुक्ति केंद्र पहुंचा, जहां पांच साल इलाज चला और अथक प्रयासों से आज नशे की गिरफ्त से आजाद हो सका।<br /><strong>- सत्यनारायण, नशा पीड़ित</strong></p>
<p><strong>नशे का कारोबार जड़ से खत्म करने की जरूरत</strong><br />गांजा कॉमन हो चुका है, कोई कॉलेज ऐसा नहीं बचा, जहां गांजे का सेवन नहीं होता हो। अफीम के बाद स्मैक का नशा तेजी से बढ़ रहा है। हालात यह है कि कोई स्मैक के नशे में पड़ जाता है तो फिर उसे छोड़ नहीं पाता। इस समय सबसे ज्यादा नशे का रेशो स्मैक का आ रहा है। घर-परिवार बर्बाद हो जाता है। नशे की ग्रोथ तेजी से बढ़ रही है, जिसे खासकर किशोरावस्था से युवाअवस्था तक नशे की गिरफ्त में हैं, जिन्हें बचाने के लिए नशे के कारोबार को जड़ से खत्म करने की जरूरत है।  <br /><strong>- रजनीश मेहरा, ड्रग्स डिएडिक्शन साइक्लोजिस्ट</strong></p>
<p><strong>नशा मुक्त  कोटा अगला लक्ष्य</strong><br />चित्तौड़ व नीमच के अलावा अब कोटा में नॉर्थ ईस्ट से भी  बड़ी मात्रा में नशा कोटा में आ रहा है। इसमें सभी अधिक घातक एमडी अर्थात सिंथेटिक नशा है। नारकोटिक्स विभाग ने आॅपरेशन युवा रक्षा नशा मुक्त नाम से अभियान शुरु किया है। इस अभियान के तहत विभाग का लक्ष्य है कि कोटा को नशा मुक्त बनाया जाए। विभाग द्वारा नशा उत्पादन से सप्लायर व उपभोग करने वालों तक की चैन को तोड़ने की दिशा में कार्रवाई की जा रही है। कुछ संस्थाएं नशा छुड़ाने के नाम पर अवैध रूप से दवाओं का सेवन करवा रहे हैं। जबकि वह दवा भी बिना अधिकृत डॉक्टर की सलाह से ही दी जा सकती है। सप्लाई के साथ ही नशे की डिमांड को भी कम करने की जरूरत है। <br /><strong>- नरेश बुंदेल, उप नारकोटिक्स आयुक्त केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो </strong></p>
<p><strong>प्रोडक्शन व सप्लाई चैन तोड़ने की जरूरत </strong><br />नशे का कारोबार को जड़ से उखाड़ने फैंकने के लिए प्रोडक्शन, सप्लाई चैन और इनकम सोर्स को खत्म करने की जरूरत है। नशा प्रोडक्शन केंद्र  झालावाड़, चित्तौड़ व मध्यप्रदेश के कुछ जगहों पर है। गांजा हिमाचल व उड़िसा से आ रहा है। ऐसे में हमें नशे का प्रोडक्शन खत्म करना होगा। इसी तरह नशा जिन रुट्स से आता है, वहां बड़ा सिंडिकेट काम करता है। माल स्टोर करने वाला, सप्लाई करने वाला, बेचने वाला सब अलग-अलग होते हैं, यही सप्लाई चैन है, जिसे नष्ट करने की जरूरत है। साथ ही पैसे से संबंधित जो क्राइम है, यदि उसे अन इकोनोमिक बना दिया जाए तो नशे का कारोबार खत्म किया जा सकता है।  हमने पिछले साल वर्ष 2024 में 156 मुकदमें दर्ज किए हैं, जबकि वर्ष 2025 की जनवरी-फरवरी के डेढ़ माह में ही 66 केस दर्ज किए हैं। वहीं, पहले 223 लोगों को गिरफ्तार किया और अब 74 लोगों को पकड़ चुके हैं। इसके अलावा गाड़ियां भी जब्त की है।  <br /><strong>- दिलीप कुमार सैनी, एडिशन एसपी कोटा शहर</strong></p>
<p><strong>नशा करना स्टेटस सिम्बल बन गया</strong><br />नशा करने के कई कारण हो सकते है। सबसे बडणा कारण अकेलापन होता है। शुरुआत में नशा अच्छा लग सकता है लेकिन यह खतरनाक होता है। नशा कराने वाले पहले इसे फ्री में देते हैं बाद में इसकी लत पड़ जाने पर व्यक्ति खुद उसे तलाशता हुआ चला जाता है। कई लोगों के लिए नशा स्टेटस सिम्बल बन गया है। जबकि नशे के कारोबार को रोकने के लिए सभी को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है।  <br /><strong>- डॉ. अशोक कुमार गुप्ता, सेवानिवृत्त प्राचार्य राजकीय कला कन्या महाविद्यालय</strong></p>
<p><strong> कॉलेज-विवि में बच्चों के ऊपर नियुक्त हो मेंटर</strong></p>
<p>नशे की दुनिया में प्रवेश करने वाले को उचित मार्गदर्शन एवं उनके प्रति सहानुभूति पूर्ण व्यवहार का अभाव मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसके लिए परिवार का खुशनुमा माहौल के साथ विद्यालयों, महाविद्यालयों  एवं विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के समूह बनाकर उनके लिए शिक्षकों को मेंटर नियुक्त किया जाए ताकि निरंतर संवाद द्वारा उचित मार्गदर्शन से उन्हें सही रास्ता दिखाया जा सके। ड्रग्स की तस्करी और अवैध व्यापार पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। नशीली दवाओं की बिक्री और सेवन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाए ।<br /><strong>- डॉ.मीनू माहेश्वरी, विभागाध्यक्ष कोटा यूनिवर्सिटी </strong></p>
<p><strong>नशे की जरूरत क्यों, समाधान खोजने की जरूरत</strong><br />युवाओं को नशे की जरूरत क्यों पड़ रही है, वह नशे की हालत में क्यों आया है,इसके कारणों को खोज समाधान निकालने की जरूरत है। व्यक्ति जन्म से नशे में नहीं आता, उसे हालात व परिस्थितियां उसे नशे में लाते हैं। जब हमने नशे में गिरफ्त लोगों से बात की तो सामने आया कि अपने गम भुलाने को वह नशे में खुशी ढूंढ रहे हैं। ऐसे में अपने आसपास का माहौल खुशनुमा बनाए। कोई व्यक्ति नशा करे तो उसे अपने बच्चों की तरफ देखना चाहिए, उनका ख्याल आएगा तो वह नशे से दूर होगा। <br /><strong>- बीके आरती, बह्माकुमारी </strong></p>
<p><strong>घर के पुरूष सदस्यों से डरने लगी महिलाएं</strong><br />कोटा की 97 कच्ची बस्तियों में 1.68 लाख परिवार रहते हैं, जब इन बस्तियों में महिलाओं के बीच जाती हूं तो पहले तो वह अपनी बात नहीं बताती थी लेकिन अब नशे के बढ़ते प्रभाव के कारण इतना चैंजेज आया कि जिन घरों में दो या तीन बेटियां हैं, उन्हें महिलाएं अकेली छोड़कर नहीं जाती। काम पर जाती हैं तो बेटियों को साथ लेकर जाती है। हालात यह हो गए कि घर में रहने वाले पिता, भाई, पति सहित अन्य पुरूष सदस्यों से महिलाओं को डर लगने लगा है, जो बड़ा चिंता का विषय है। पहले पुरूष नशा करते थे, अब महिलाएं भी सीख गई, यह क्यों हुआ, इसकी तह में जाकर समाधान खोजने की जरूरत है।  <br /><strong>- हेमलता गांधी,सोशल डवलपमेंट मैनेजर  नगर निगम कोटा</strong></p>
<p><strong>देखादेखी से नशे की चंगुल में फंस रहे किशोर</strong><br />नशे की समस्या किशोरावस्था से शुरू होती है। किशोर जब अपने घर-परिवार में पिता या अन्य सदस्य को सिगरेट, शराब पीते देखते हैं तो उनमें जिज्ञासा जाग उठती है कि इसे पीने से क्या होता है। जब वह घर से बाहर दोस्तों के बीच पहुंचता है तो वह सिगरेट, शराब या अन्य नशा करता है और शोक पूरा करते करते कब नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं, उन्हें भी पता नहीं चल पाता। शिक्षण संस्थाओं में गांजा, सिगरेट पीना आम बात हो गई। क्योंकि, यह आसानी से मिल जाता है। <br /><strong>- दीपक सिंह, सचिव, सुशीला देवी चेरिटेबल सोसायटी</strong></p>
<p><strong>बचपन में ही नशे की नुकसान बताने की जरूरत</strong><br />जन्म लेने से दस साल तक के बच्चे के दिमाग में जो बात डाली जाएगी उसका उसके पूरे जीवन पर असर पड़ता है। यदि इसी उम्र में  उसकी मां यदि समझाएगी तो बच्चा जिंदगी में कभीउस तरफ नहीं जाएगा। जबकि नशा करने वालों को सुधारना बहुत मुश्किल है। बरसों से प्रयास करने के बाद भी उतनी सफलता नहीं मिली जितनी अपेक्षा की जा रही थी। जितनों का नशा छुड़ाया जाता है उससे अधिक नए लोग नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। <br /><strong>- डॉ. आर.सी. साहनी चेयरमेन संवेदना सेवा रिसर्च समिति</strong></p>
<p><strong>अफीम की अनाधिकृत सप्लाई को रोकना होगा</strong><br />अफीम की खेती सरकार द्वारा अधिकृत पट्टे जारी करने पर किसान ही करते हैं। लेकिन किसानों से ही अफीम सरकार के अलावा अनाधिकृत रूप से बाजार में बेची जा रही है। जिससे उत्पादन केन्द्रों पर उसका उपयोग नशा बनाकर बाजार में सप्लाई करने के रूप में किया जा रहा है। सबसे अधिक भवानीमंडी में अनाधिकृत उतपदन केन्द्र संचालित हो रहे है। नारकोटिक्स विभाग को किसानों से समंवय स्थापित करके किसानों को अचछे दाम दिलाने का प्रयास करना चाहिए जिससे इसे बाजार में अनाधिकृत रूप से जाने से रोका जा सके। <br /><strong>- दुलीचंद बोरदा, जिला अध्यक्ष भारतीय किसान सभा</strong></p>
<p><strong>गायत्री परिवार नशा मुक्ति  को प्रतिबद्ध</strong><br />ड्रग्स की तस्करी और अवैध व्यापार पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। नशीली दवाओं की बिक्री और सेवन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाए। नशे की समस्या किशोरावस्था से शुरू होती है।  किशोर जब अपने घर-परिवार में पिता या अन्य सदस्य को सिगरेट, शराब पीते देखते हैं तो उनमें जिज्ञासा जाग उठती है कि इसे पीने से क्या होता है। गायत्री परिवार नशा छुड़ाने को लगातार कायर्च करता रहता है। अधिकतर युवा इसमें ही खुशी तलाशने लगते है। डॉक्टर हमेशा नशे के खिलाफ जंग में सहयोग करने को तैयार है। कई लोगों को नशा मुक्त कराया है। -हेमराज पांचाल गायत्री परिवार<br /><strong>- तनाव कम करने के लिए नशे का सेवन</strong></p>
<p>नशा कुछ पल के लिए व्यक्ति को सुकून दे सकता है। लेकिन यह बाद में जीवन बर्बाद कर देता है। विशेष रूप से युवा पढ़ाई के तनाव को कम करने के  लिए घर वालों से छिपकर नशा करने लगते है। शुरुआत में नशा करने से खुशी मिलती है तो अधिकतर युवा इसमें ही खुशी तलाशने लगते है। डॉक्टर हमेशा नशे के खिलाफ जंग में सहयोग करने को तैयार है। कई लोगों को नशा मुक्त कराया है। नशा मुक्ति केन्द्रों में जो दवाईयां दी जाती है। वह बिना डॉक्टर की सलाह से और निर्धारित मात्रा में दी जाती है। जिसे बाद में कम कर दिया जाता है। <br /><strong>- डॉ. मिथलेश खींची, असि. प्रोफेसर मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>आमजन को निभानी होगी जिम्मेदारी</strong><br />नारकोटिक्स विभाग तो अपने स्तर पर नशे की सप्लाई करने वालों पर कार्रवाई कर रहा है। बड़ी मात्रा में दूसरे प्रदेशों से आने वाली नशे की खैप को कोटा में भी पकड़ा है। लेकिन यदि आमजन भी अपनी जिम्मेदारी निभाए और विभाग को नशे से संबंधित सूचना दे तो उनकी सूचना को गुप्त रखकर कार्रवाई की जा सकती है। सामूहिक प्रयासों से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। <br /><strong>- अरविंद सक्सेना, अधीक्षक केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो</strong></p>
<p><strong>दृड़Þ इच्छा शक्ति से छोड़ा नशा</strong><br />प्रकाश कुमार,मोहित दाधीच व मनोज गौतम ने बताया कि वे पहले नशे की गिरफ्त में जकड़ चुके थे। लेकिन अब उन्होंने इसे छोड़ दिया है। नशा छोड़ चुके इन लोगों ने बताया कि किसी को जेल में तो किसी को दोस्तों से नशे की लत लगी थी। नशा करने से उन्हें अच्छा महसूस होता था। पहले नशे के बिना नींद नहीं आती थी। शरीर के साथ-साथ पैसे का भी नुकसान हुआ। कई बार नशा मुक्ति केन्द्र में गए वहां दवाई भी ली लेकिन फिर भी फर्क नहीं पड़ा। बाद में नशा मुक्ति केन्द्र में जाकर वहां नशा छोड़ने की दृढ़ इच्छा शक्ति की।  पहले जहां दवाई अधिक लेते थे और नीनद कम आती थी। उसके बाद धीरे-धीरे दवाई भी कम कर दी। अब बिना दवाई के नींद भी अच्छी आती है और जीवन खुशहाल है। नशा छोड़ने वालों ने बताया कि अब वे नौकरी कर खुशहाल जीवन जी रहे है। साथ ही अन्य लोगों को भी इससे दूर रहने की सलाह दे रहे है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sat, 22 Feb 2025 16:30:38 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदूषण के कारकों पर चर्चा, प्रदूषण ले रहा प्रतिवर्ष 23 लाख की जान</title>
                                    <description><![CDATA[अधिकांश मौत के पीछे छिपा प्रदूषण, 70 फीसदी बीमारियों का संवाहक।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/pollution-is-taking-23-lakh-lives-every-year/article-101661"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/untitled-design-(1).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति के कोटा कार्यालय में प्रतिमाह आयोजित होने वाली परिचर्चा की श्रंखला के तहत मंगलवार को प्रदूषण के कारकों पर चर्चा की गई। पॉल्यूशन केन बी डेंजरस फॉर एक्जीसटेन्स ऑफ लिविंग बीइंग विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में 17 विषय विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इनमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निगम,श्वांस रोग विशेषज्ञ, पर्यावरण विद, इंटेक के कन्वीनर,पर्यावरण संरक्षण कार्य में जुटी संस्थाएं, नदी संरक्षण से जुड़े सदस्य,बायो वेस्ट मैनेजमेंट, परिवहन विभाग, राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर,इनवायरमेंट साइंस,वनस्पति,जमीन,अर्थात जल, थल और नभ के प्रदूषण से बन रहे हालातों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की और यह माना कि प्रदूषण को रोकना केवल सरकार के भरोसे नहीं हो सकता। इसकी भयावहता को लोग समझ नहीं रहे हैं। अब जागरुकता नहीं अपितु सख्ती से प्रदूषण नियंत्रण करवाने की जरूरत है अन्यता हालात खतरनाक स्थर पर पहुंच जाएंगे। आने वाली पीढ़ियां इस समस्या के कारण बन रही स्थिति का सामना तक नहीं कर पाएंगी।  प्रस्तुत है परिचर्चा के मुख्य अंश:-</p>
<p><strong>पूरे देश में सीओपीडी बीमारी में राजस्थान अव्वल</strong><br />एक-एक महीने तक खांसी ठीक नहीं होती,क्योंकि यह एलर्जी में तब्दील हो गई। जिसका मुख्य कारण पॉल्यूशन इम्पैक्ट है। कोहरे के कारण प्रदूषण के कण वायुमंडल में नहीं जा पाते और हवा में ही रहते हैं, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं जो बीमारियों का कारण बनता है। धुएं में अनगिनत कैमिकल्स होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में जाने से दमा, अस्थमा, एलर्जी, खांसी, आंखों में जलन, दिमाग, गुर्दे, फेफड़े के कैंसर, सांस का अटैक व दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा रहता है। हालांकि, दमा बीड़ी पीने से होता है लेकिन यह रोग उन लोगों को भी होता है जो बीड़ी नहीं पीते। यह बीमारी मुख्यत: पॉल्यूशन से होती है। पूरी दुनिया में सीओपीडी बीमारी में इंडिया टॉप पर है और भारत में राजस्थान अव्वल है। इस बीमारी के मरीज पूरी दुनिया के कई देशों के मुकाबले राजस्थान में सबसे ज्यादा हैं।  मुख्य कारण 70% पॉल्यूशन है। हर साल  23 लाख मौत वायु प्रदूषण से होती है। सीओपीडी बीमारी फेफड़ों को हमेशा के लिए डेमेज कर सकती है।  <strong>- डॉ. राजेंद्र ताखर, श्वांस रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>प्रदूषण नियंत्रण सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं</strong><br />पॉल्यूशन कंट्रोल नियमों की पालना के लिए जो संसाधनों की आवश्यकता होती है वो पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को सरकार उपलब्ध नहीं करवा रही। पर्यावरण विभाग को विकास में व्यवधान मानते हुए पर्यावरण कानून व नियमों को दिन-प्रतिदिन कमजोर करने पर तुली है। जिसके उदारहण शहरभर में देखने को मिल रहे हैं। चंबल नदी में गिरते सीवरेज, चंद्रलोही व नालों में इंडस्ट्री का कैमिकलयुक्त  वाटर गिर रहा है। सरकार पम्प स्टोरेज प्रोजेक्ट लगाकर प्रदेशभर में 4 हजार हैक्टेयर वनभूमि में फैला जंगल को तबाह करने पर तुली है। बरसों पुराना जंगल खत्म होने से इंसान ही नहीं जानवरों व पक्षियों का अस्तित्व भी संकट में आ जाएगा।<br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p><strong>पॉल्यूशन के खिलाफ सख्ती की जरूरत</strong><br />शहर का सीवरेज बिना ट्रीटमेंट के चंबल में गिर रहा है। जिससे चंबल नदी व घड़ियाल सेंचूरी प्रदूषित हो रही है। जल प्रदूषण रोकने की दिशा में प्रभावी पहल नहीं हो पा रही, क्योंकि आम आदमी इससे कनेक्ट नहीं हो रहा। जबकि, इसे जनजागरण आंदोलन बनाकर लोगों को जागरूक करना चाहिए कि पॉल्यूशन किस तरह से हमारा जीवन बर्बाद कर रहा है। जब लोग जागरूक होंगे तो सरकारी मशीनरी प्रदूषण कंट्रोल करने को प्रभावी कदम उठाने को मज् ाबूर होगी। यह प्रयास स्वस्थ समाज के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। <br /><strong>- डॉ. अमित व्यास, संयोजक चिकित्सा प्रकोष्ठ भाजपा, पूर्व अध्यक्ष आईएमए</strong></p>
<p><strong>जल-मिट्टी प्रदूषण ज्यादा घातक</strong><br />प्रदूषण का मुख्य कारण वाहनों व इंडस्ट्रीज से निकलने वाला धुआं है। अन्य कारक भी जीवन के लिए उतने ही घातक है, जितना वायु प्रदूषण। पानी और मिट्टी का पॉल्यूशन हमारी खाद्य शृंखला में शामिल हो जाते हैं, जो भोजन के रूप में शरीर में जाते हैं और कैंसर तक की बीमारियों का खतरा उत्पन्न हो जाता है। पानी के जरिए पॉल्यूशन पॉटिकल्स मिट्टी में आते हैं और फसलों के द्वारा हमारे खाद्य पदार्थ में आ जाते हैं। वायु प्रदूषण तो दिखाई देता है लेकिन जल व मिट्टी का पॉलयूशन दिखाई नहीं देता। जबकि, यह प्रदूषण शरीर के लिए ज्यादा घातक होता है। वहीं, रेडिएशन भी शरीर को कई तरह से बीमारियों के जाल में जकड़ता है। इनसे बचाव के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। <br /><strong>- पूनम जायसवाल, प्रोफेसर बोटनी, जेडीबी साइंस कॉलेज</strong></p>
<p><strong>वाहनों से सबसे अधिक प्रदूषण</strong><br />कोटा समेत प्रदेश के बड़े शहरों  में आईआईटी जोधपुर की टीम ने प्रदूषण को लेकर सर्वे किया था। जिसमें यह बात सामने आई कि कोटा में  सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाहनों से हो रहा है। वैसे यहां उद्योगों से भी प्रदूषण तो हो रहा है लेकिन वह इतना अधिक नहीं है। ऐसे में सड़कों पर दौड़ रहे पुराने वाहनों पर रोक लगाने की जरूरत है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर कार्रवाई करता रहता है। <br /><strong>- डॉ. रिंकु सिंघल, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p><strong>अस्पताल में रखे 4 रंग के वेस्ट डस्टबिन के प्रति जागरूक करना चाहिए</strong><br />अस्पताल में 4 रंग के अलग-अलग डस्टबिन रखे होते हैं, जिसमें काले रंग का डस्टबिन जनरल वेस्ट के लिए होता है और शेष नीला, पीला और सफेद रंग का डस्टबिन मेडिकल बायोवेस्ट के लिए होता है। यह बात लोगों को पता होनी चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। अक्सर जानकारी के अभाव में तीमारदार मरीज की मरहम पट्टी, दवा, इंजेक्शन, स्केल्टर को जनरल वेस्ट के डस्टबिन में पटक देते हैं। यह वेस्ट नगर निगम के डम्पिंग यार्ड में जाता है। जहां संक्रमण का खतरा  बना रहता है। मेडिकल बायोवेस्ट के निस्तारण के लिए निर्धारित तापमान में जलाया जाता है, इसका प्लांट झालावाड़ में है। वहीं, अस्पतालों से निकलने वाला वाटर वेस्ट को ईपीपी व एसटीपी द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने की आवश्यकता है। अब मेडिकल कॉलेज में एसटीपी का निर्माण हो चुका है। <br /><strong>- डॉ. प्रवीण कुमार, नोडल आॅफियर बायो मेडिकल वेस्ट </strong></p>
<p><strong>मौत का प्रतिशत बढ़ा रहा प्रदूषण </strong><br />चार बड़े विश्वविद्यालयों की टीम ने रिसर्च किया है। जिसमें सामने आया कि देश  में पीएम 2.5 सबसे अधिक खतरनाक स्थिति है।  देश में हर साल करीब 23 लाख लोगों की मौत हो रही है। जिसमें पीएम 2.5 के कारण मृत्यु दर 5 फीसदी बढ़ जाती है। वायु प्रदूषण का इतना अधिक खतरनाक असर होता है कि नॉन स्माकर भी रोजाना सामान्य तौर पर 3 से 4 सिगरेट का धुंआ रोजाना अपने शरीर में ले रहे है। प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर यह  मात्रा दोगुनी तक हो जाती है। शहर में सबसे अधिक प्रदूषण चौराहों पर है। प्रदूषण के कारण कई तरह की बीमारियां लोगों में हो रही है। जिसके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। <br /><strong>- डॉ. केवल कृष्ण डंग श्वांस व अस्थमा रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़े चलन</strong><br />15 साल से अधिक पुराने वाहनों से अधिक वायु प्रदूषण होता है। इस कारण से उन वाहनों को हटाया जा रहा है। आने वाले समय में अधिकतर इलेक्ट्रिक वाहनों का ही उपयोग अधिक होगा। परिवहन विभाग के पास प्रदूषण फेलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई के लिए 18 स् कवायर्ड वैन है। लेकिन उनमें स्टॉफ की कमी है। इसकी टीम को अन्य स्थानों पर काम में लेने से पूरी तरह से कार्रवाई नहीं  हो पाती।  <br /><strong>- राजीव त्यागी, अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी कोटा </strong></p>
<p><strong>हार्ट अटैक व स्ट्रॉक का कारण प्रदूषण</strong><br />वायु प्रदूषण मनुष्य के  लिए सबसे अधिक खतरनाक है। चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक का सिपाही इससे सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। प्रदूषण के कारण केवल  अस्थमा  रोग ही नहीं होता। यह जन्म लेने वाले बच्चे से लेकर युवा तक को प्रभावित कर रहा है। इन दिनों जो हष्ट पुष्ट  व सैर करने वाले लोगों की अचानक मौत हो रही है। इसमें हार्ट अटैक व स्ट्रॉक का सबसे बड़ा कारण प्रदूषण है। इसे रोकने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक उपयोग हो। साथ ही पार्किंग स्थानों पर उनके चार्जिंग पॉइंट दिए जाएं। <br /><strong>- डॉ. सुधीर गुप्ता, नेत्र विशेषज्ञ, संयोजक हम लोग</strong></p>
<p><strong>एंटी स्मॉग गन का नियमित संचालन</strong><br />वायु प्रदूषण के कारण धूल के करण हवा में रहकर लोगों को प्रभावित करते है। इसके लिए नगर निगम के माध्यम से सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों व चौराहों पर एंटी स्मॉग गन से पानी का छिड़काव किया जा रहा है।जिससे धूल के कण नीचे बैठने से धीरे तौर पर लोगों  पर असर नहींडाल रहे। वहीं आने वाले समय मे‘कोटा में निगम के माध्यम से 100 इलेक्ट्रिक बसें आने वाली है। जिससे शहर के प्रदूषण स्तर को कम करने में मदद मिलेगी।  <br /><strong>- दीपक मेहरा, पर्यावरण विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>थर्मल को बंद करना होगा</strong><br />शहर में सबसे अधिक प्रदूषण थर्मल के कारण हो रहा है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए इसे बंद किया जाना चाहिए। जब कई बड़े शहरों में थर्मल बंद किए जा सकते है तो यहां क्योंनहीं हो सकता। इसकी इकाइयों को बार-बार बंद भी तो किया जाता है। इसके स्थान पर सौर ऊर्जा का अधिक उपयोग हो। शहरों  में ग्रीन एनर्जी का अधिक उपयोग होगा तो प्रदूषण पर कंट्रोल किया जा सकता है। वाहन इलेक्ट्रिक हों और हर पार्किंग में इसके चार्जिंग स्टेशन व पाइंट बनाए जाएं। चार्जिंग के हिसाब से उनका यूपीआई से चार्ज लिया जाएगा तो प्रदूषण पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। <br /><strong>- राजू गुप्ता, सेवानिवृत्त सीईओ</strong></p>
<p><strong>जागरूकता की जरुरत</strong><br />शहर में बढ़ता प्रदूषण सभी के लिए खतरनाक है। प्रदूषण से होने वाले नुकसान के बारे में जानते तो सभी है लेकिन लोगों में उससे बचने के प्रति जागरूकता की कमी है। लोग प्रदूषण की भयावयता को समझ नहीं पा रहे है। जागरूक होंगे तो प्रदूषण को रोकने व कम करने में सहयोग करेंगे।  <br /><strong>- डॉ. अभि गर्ग, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p><strong>पुरानी इमारतें व मॉन्यूमेंट भी प्रभावित</strong><br />शहर में प्रदूषण का कारण थर्मल है। इसे बंद किया जाना चाहिए। साथ ही इससे निकलने वाले फ्लाईएश और भी अधिक खतरनाक है। फ्लाई एश को जोराबाई तालाब में भर दिया। जिससे वहां पक्षियों का आना बंद हो गया है। मछलियों के मरने से उनकी संख्या भी कम हो गई है।  वायु प्रदूषण न केवल प्राणियों को प्रभावित कर रहा है वरन् इससे पुरानी इमारतें व मॉन्यूमेंट तक प्रदूषित हो रहे है। जिससे 500 साल तक टिकने वाली इमारतें 100 साल भी नहीं टिक रही है। उनका रंग फीका हो रहा है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। <br /><strong>- नखिलेश सेठी, संयोजक, इनटेक </strong></p>
<p><strong>कोयले की जगह गैस पर बने बिजली </strong><br />थर्मल पावर प्लांट कितना प्रदूषण कर रहा है, इसके आंकड़े सार्वजनिक कर पब्लिक को बताना चाहिए। दिखने में तो पॉल्यूशन ज्यादा नजर आता है लेकिन उसके मैजरमेंट क्या आ रहे हैं, इससे लोगों को पता लगेगा कि थर्मल से कितना पॉल्यूशन हो रहा है। इसके अलावा थर्मल की जो यूनिट पुरानी हो गई है, उसे गैस से कनेक्ट किया जाए। गैस की पाइप लाइन को बॉयलर से जोड़ा जाए तो बिजली बनाने के लिए कोयले की निर्भरता खत्म होगी और प्रदूषण भी नहीं होगा। इसके लिए सरकार बजट का प्रावधान करे। वहीं, सौलर को प्रमोट करने की आवश्यकता है। लेकिन समस्या यह है कि सौलर दिन में उपलब्ध होता है, रात को नहीं। ऐसे में सरकार बिजली की रेट  दिन में कम और रात को थोड़ी ज्यादा रख दे। इससे लोग सौलर की बिजली का उपयोग करने को प्रेरित हो सकेंगे। <br /><strong>- डॉ. आनंद चतुर्वेदी, प्रोफेसर मेकैनिकल हैड इंजीनियरिंग, आरटीयू</strong></p>
<p><strong>जीवन के लिए खतरा बन रही पॉलिथीन</strong><br />सिंगल यूज्ड पॉलिथीन के उपयोग पर सरकार ने बैन लगा रखा है, लेकिन बाजार में इसका असर नहीं दिखता। जबकि, पॉलिथीन जीवन के लिए  खतरा है। मिट्टी में फेंकी गई पॉलिथीन से मृदा में रहने वाले सुक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचाती है। क्योंकि, इसमें ऐसे रसायन होते हैं जो मिट्टी के कणों के भीतर पौधों व जीवों के लिए जहरीले हैं और  फसलों के द्वारा यह जहर हमारे फूड चैन में शामिल हो रहा है। वहीं, पानी को भी प्रदूषित कर रही है। जिससे जीवन चक्र गंभीर बीमारियों की जद में आ गया। इसे रोकने की शुरुआत हमें घर से ही करनी होगी। <br /><strong>- प्रियंका गुप्ता, फाउंडर एंड प्रेसीडेंट अभिलाषा क्लब </strong></p>
<p><strong>सुंदरता के नाम पर शहर में लग रहे एलर्जिक पौधे </strong><br />शहर में सुदंरता के नाम पर बाहर से लाई गई विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगा दिए गए। जिनमें कोनोकार्पस, लेंटाना, पार्थेनियम हिस्टेरोपफोरस, बबूल सहित कई प्लांट शामिल हैं, जो दिखने में जितने सुंदर हैं उतने ही दुष्परिणाम भी हैं। असल में यह प्लांट एलर्जिक है। वहीं, एयर पॉल्यूशन कंट्रोल करने में इनकी भूमिका नगण्य है। इनकी जगह पीपल, आंवला, बरगद, नीम, धौंक सहित नेचुरल उगने वाले पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाए जाना चाहिए, जो एयर पॉल्यूशन को कंट्रोल करने में कारगर होते हैं।  <br /><strong>- डॉ. मृदुला खंडेलवाल, एसोसिएट प्रोफेसर बोटनी, कोटा यूनिवर्सिटी</strong></p>
<p><strong>पौधे लगाने से पहले विशेषज्ञों की राय लेना आवश्यक</strong><br />हाड़ौती में पौधरोपण किया जाए तो नेगेटिव स्पीसीज की जगह इंडिजेन्स प्लांट ही लगाना चाहिए। एक्जोटिक प्लांट जैसे कोनोकार्पस, लेंटाना, बबूल सहित अन्य प्रजातियों के पौधे न लगाए जाए। इसके अलावा प्लांटेशन में ऐसे पौधे भी लगाए जाए, जिससे पक्षियों को भोजन  मिल सके। क्योंकि, ईको सिस्टम में पक्षियों का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वहीं, जब भी सामाजिक वानिकी की जाए तो विशेषज्ञों की सलाह जरूर लेनी चाहिए ताकि, पौधे लगाने के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। <br /><strong>- डॉ. पृथ्वीपाल सिंह सिरोहिया, वनौषधि विशेषज्ञ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jan 2025 15:33:49 +0530</pubDate>
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                <title>सोशल मीडिया बैन नहीं, कंट्रोल होना चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[मोबाइल यूज के लिए अभिभावक ही दोषी नहीं, समाज और व्यवस्था भी जिम्मेदार है। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/social-media-should-be-controlled--not-banned/article-98153"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/5554.mp4" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति की ओर से जारी मासिक परिचर्चा की श्रृंखला के तहत गुरुवार को शुड सोशल मीडिया बी बैन फॉर चिल्ड्रन्स (किशोरवय के बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो रहे सोशल मीडिया को क्या प्रतिबंधित किया जाना चाहिए) विषय पर आयोजित की गई। इस परिचर्चा में समाज शास्त्री, मनोचिकित्सक, बाल विज्ञानी, पीडियाट्रिशन एंड डवलपमेंट स्पेशलिस्ट, स्कूल प्रिंसीपल, सीनियर स्पीच फिजीयोलॉजिस्ट,पुलिस अधिकारी, स्कूल आॅनर,सहित किशोरवय के बच्चों ने हिस्सा लिया। दो घंटे चले परिचर्चा के  सत्र में  लोगों ने मुख्य रूप से कहा कि सोशल मीडिया को बैन किया जाना आज के हालात में संभव नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से इसका दुरूपयोग हो रहा है उससे हमारी आने वाली पीढ़ी पर दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं। ऐसे में पैरेन्टस के साथ स्कूल की यह जिम्मेदारी है कि वह सोशल मीडिया के दुषप्रभाव से बच्चे को बचाएं। इसके लिए पैरेन्ट्स को घर से शुरूआत करनी होगी। टीनेजर्स पैरेन्टस की बात नहीं मानते ऐसी स्थिति में स्कूल की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसके दूरुपयोग को रोकने का काम करें। इसे बैन तो नहीं किया जा सकता लेकिन इसका कंट्रोल किया जाना अति आवश्यक है। </p>
<p>- सोशल मीडिया विकासमुखी भी है और विनाशक  भी,संभल कर उपयोग करें।<br />- बच्चे को स्पोर्ट्स एक्टिविटी में बिजी करें। स्कूल कॉलेज में गैम्स कंपलसरी हो।<br />- सोशल मीडिया पर  एकाउंट बनाते समय उम्र वेरिफाई के लिए  आधार कार्ड जरूरी हो<br />- माता-पिता के साथ स्कूल टीचर भी बच्चे द्वारा उपयोग किए जा रहे गेजेट पर ध्यान दें।</p>
<p><strong>आॅनलाइन गेमिंग में अधिकतर बच्चे शामिल</strong><br />मोबाइल व सोशल मीडिया का उपयोग बच्चे पढ़ाई व ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही  अधिकतर आॅनलाइन गेमिंग में कर रहे है। आॅनलाइन गेमिंग  सबसे अधिक बच्चे खेल रहे है। उसमें बच्चों के परिजनों के बैंक खाते से रकम जा रही है। जिसके बाते में परिजनों को पता ही नहीं है। बाद में जब धोखाधड़ी होती है तब परिजनों की आंखें खुलती है। ऐसे में परिजनों को अपनी नजर में बच्चों को रखते हुए मोबाइल का सीमित उपयोग करने देना चाहिए। तब तो  बच्चे उसका सही उपयोग करेंगे। <br /><strong>- सतीश चंद चौधरी, सर्किल इंस्पैक्टर साइबर थाना कोटा</strong></p>
<p><strong>बच्चा गर्भ में ही मोबाइल सीख रहा</strong><br />बच्चे संसार में आने के बाद तो मोबाइल का उपयोग कर ही रहे है। हालत यह है कि अब तो बच्चे मांग के पेट में गर्भावस्था के दौरान ही मोबाइल सीख रहे है। मोबाइल व सोशल मीडिया का प्रभाव इतना अधिक हो गया है कि बच्चे सब कुछ इसी से सीख रहे है। परिजनों को चाहिए कि बच्चों के लिए मोबाइल का जितना उपयोग  हो उतना ही उन्हें करने दे। मोबाइल का अधिक उपयोग बच्चों के लिए नुकसान दायक है। बच्चे मोबाइल पर क्या कर रहे हैं इस बारे में अधिकतर परिजनों को तो पता ही नहीं रहता।  बच्चों को मोबाइल का उपयोग परिजनों की निगरानी में ही करने देना चाहिए। <br /><strong>- प्रियदर्शनी जैन, प्रिंसीपल जैन दिवाकर कमला कॉलेज</strong></p>
<p><strong> हमे रील से रियलिटी की ओर जाना होगा</strong><br />मोबाइल यूज के लिए अभिभावक ही दोषी नहीं है। समाज और व्यवस्था भी जिम्मेदार है। आज सिंगल मदर जो जॉब में तो वो अपने बच्चे की देखभाल कैसे करेंगी बच्चे को मोबाइल देगी जिससे बच्चा व्यस्त रहे।  कोटा में बच्चों की देखभाल करने लिए पालनाघर ही नहीं जहां बच्चे को छोडा जा सके । पति पत्नी दोनों सर्विस में है ऐसे बच्चा अपने एकाकीपन को दूर करने के लिए मोबाइल और सोशल साइट पर जाएगा ही।  रोकने के लिए पहले माता पिता को वर्कप्लेस पर सुविधा दें। वर्तमान में सामाजिक ताना बाना पूरा बिगड़ गया है। आज पड़ोसी पड़ोसी से बात नहीं करता है। बच्चे आउटडोर गेम नहीं खेलते हैं। मोबाइल को अपना दोस्त मानते है।  हमें रील से निकलकर रियलिटी की ओर जाना होगा।<br /><strong>- डॉ. मेघा माहेश्वरी, शिशु रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>बच्चों को किताबों पर फोकस करवाना होगा</strong><br />मोबाइल के उपयोग कैसे करना है। इसके लिए स्कूलों में क्लॉस वाइज बच्चों और अभिभावकों की काउंसलिंग की जा रही है। बच्चों को होम वर्क डायरी में दिया जा रहा है। जिससे बच्चे मोबाइल कम से कम उपयोग करें। बच्चों को किताबों की ओर फोकस कराया जा रहा है। स्कूलों में साइबर क्राइम की सेमिनार होना चाहिए। सोशल मीडिया छोटे बच्चों के लिए ठीक नहीं इसके लिए अभिभावकों ही जागरूक होना होगा। इस पर बैन तो नहीं लगा सकते हैं। लेकिन इसके लिए सावचेत करते रहना अत्यंत जरूरी है।<br /><strong>- संजय शर्मा, सचिव प्राइवेट स्कूल वेलफेयर सोसाइटी</strong></p>
<p><strong>बच्चों के लिए मोबाइल का हो सीमित उपयोग</strong><br />जिस तरह से देश तकनीकी युग की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। उसमें मोबाइल व इंटरनेट का उपयोग किए बिना रहना संभव नहीं है। बच्चों को भी इससे दूर नहीं किया जा सकता। लेकिन यह परिजनों को समझना होगा कि बच्चों के लिए मोबाइल व सोशल मीडिया का उपयोग सीमित किया जाए। बच्चों को मोबाइल की लत डालने वाले भी परिजन ही होते है। ऐसे में परिजनों को चाहिए कि वह छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल नहीं दे। एक निर्धारित उम्र के बाद ही बच्चों को आवश्यकतानुसार  मोबाइल का उपयोग करने देंगे तो उससे अधिक नुकसान नहीं होगा। <br /><strong>- डॉ. अजय धर, सीनियर स्पीच थैरेपिस्ट एंड आॅटिज्म</strong></p>
<p><strong>प्रतिबंध समाधान नहीं, लेकिन लत खराब</strong><br />बच्चों के लिए मोबाइल  व सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करना कोई समाधान नहीं है। लेकिन मोबाइल की लत बच्चों के लिए खराब है। कोरोना के बाद स्कूल से लेकर घर तक बच्चों को मोबाइल पर ही आॅनलाइन पढ़ाया जा रहा है। स्कूलों में तो बच्चों के  लिए मोबाइल बंद होना चाहिए। परिजनों को चाहिए कि वह छोटे बच्चों को मोबाइल की लत नहीं डालकर उन्हें परिवार के साथ बैठना व किस्से कहानियां सुनाने की आदत डालनी होगी। <br /><strong>- सावित्री गुप्ता, निदेशक शिव ज्योति सी.सै. स्कूल वल्लभ नगर गुमानपुरा</strong></p>
<p><strong>पहली गुरु मां है उसको जागरूक होना होगा</strong><br />बच्चों की पहली गुरु मां ही है उसको जागरूक होना होगा। बच्चा डिप्रेशन में आ रहा है। यह सिखाने वाली भी मां ही होती है। पहले इसकी शुरुआत घर से ही करनी होगी। आज 12 साल के बच्चे का फेसबुक पर एकाउंट, स्ट्राग्राम में एकाउंट है।  जबकि 18 साल से कम उम्र के बच्चों का एकाउंट नहीं बन सकता है। लेकिन बच्चे अपनी उम्र ज्यादा डालकर एकाउंट बना लेते हैं और फेसबुक, स्ट्राग्राम का उपयोग कर रहे हैं।  सोशल एकाउंट बनाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करना चाहिए। दूसरा बच्चों को मोबाइल में क्या देखना क्या नहीं यह अभिभावकों को तय करना होगा। बच्चा कहां से गलत सीख रहा इस पर निगाह होनी चाहिए।  <br /><strong>- हरलीन चड्ढा, शिक्षाविद व अभिभावक</strong></p>
<p><strong>पैरेंट्स, स्कूल व स्टेट तीनों को मिलकर करना होगा काम</strong><br />सोशल मीडिया बैन करना समाधान नहीं है।नई शिक्षा नीति में तो सारा कार्य ही डिजिटलाइज  है। ऐसे में एजुकेशन, पेरेंट्स और स्टेट तीनों को मिलकर इसका समाधान निकालना होगा। सरकारी स्कूल व कॉलेज में आउटडोर खेलकूद की सुविधाओं बढ़ानी होगी। बच्चों को सोशल मीडिया के उपयोग व उसके दुष्परिणाम से अवगत कराना होगा। अभिभावक, शिक्षक और एजुकेशन पॉलिस बनाने वालों मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा। लोगों को जागरूक करना होगा। स्कूल कॉलेज में इसके उपयोग को लेकर सेमिनार आयोजित कराने होंगे। बच्चों के साथ अभिभावकों संवाद करना होगा।  अभी मोबाइल स्मार्ट हो रहा है। स्मार्ट मैन की जरुरत है, र्स्माट मशीन की नहीं । <br /><strong>- ज्योति सिडाना,  एसोसिएट प्रोफेसर गवर्नमेंट आर्टस गर्ल्स कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>गर्भ संस्कार जरूरी</strong><br />आज बच्चा अभिमन्यु की तरह मां की कोख से ही मोबाइल चलाना सीखकर आता है। कारण की हमारे समाज में गर्भसंस्कार देना खत्म हो गया है। गर्भवती महिलाएं घंटो टीवी और मोबाइल पर समय बिताती है। जो वो देखती और करती वो गर्भ में पल रहा भी सीख जाता है। इसलिए एक माह के बच्चे को मोबाइल देते वो स्क्रीन स्क्रॉल कर देता है। गर्भ में पल रहा बच्चा गर्भवस्था में ही आवाज, रोशनी और भावनाओं को महसूस करने में सक्षम होता है। गर्भ संस्कार के दौरान बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास के लिए आध्यात्मिकता जोड़ने के लिए  गर्भ संस्कार जरूरी है। <br /><strong>- मोनिका सोनी, जैन दिवाकर कमला कॉलेज</strong></p>
<p><strong>परिजन बच्चे के लिए समय निकालें</strong><br />छोटी उम्र  में बच्चों द्वारा मोबाइल का अधिक उपयोग करना उनके लिए हानिकारक है। शुरुआत में मां या परिजन बच्चों के साथ अधिक समय नहीं बिता पाने के कारण उन्हें मोबाइल पकड़ा देते है। बच्चे बिना मोबाइल देखे खाना तक नहीं खाते।  एक उम्र के बाद यदि मोबाइल का उपयोग किया जाए तो उससे इतना अधिक नुकसान नहीं होगा। लेकिन मोबाइल व सोशल मीडिया को बच्चों केलिए पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए मोबाइल के उपयोग के साथ ही परिजनों का उनके साथ  अधिक समय बिताना आवश्यक है। <br /><strong>-इशान जौहरी,  शिक्षक सेंट्रल एकेडमी  सी.सै. (शिक्षांतर) स्कूल</strong></p>
<p><strong>मोबाइल यूज की समय सीमा तय होनी चाहिए</strong><br />वर्तमान में सारी पढ़ाई आॅनलाइन हो रही है। ऐसे में बच्चे मोबाइल से दूर नहीं रह सकते है। लेकिन उनको मोबाइल में क्या देखना है। कितना समय देखना यह सब माता पिता को तय करना चाहिए। अभी सारा होमवर्क से लेकर सारी सूचना व्हाट्सअप पर दी जाती है। बच्चे को मोबाइल यूज करना ही पड़ेगा लेकिन माता पिता को बच्चे मोबाइल देते समय उस पर निगरानी भी रखनी होगी वो पढ़ाई के अलावा गेम तो नहीं खेल, रहा बैन साइट पर नहीं जा रहा। आॅन लाइन गेम तो नहीं खेल रहा इसकी निगरानी माता पिता को ही रखनी होगी।<br /><strong>- प्रियांशी, स्टूडेंट (किशोरी)</strong></p>
<p><strong>अभिभावक को कठोर होना होगा</strong><br />मोबाइल के उपयोग को लेकर पैरेंट्स को ही कठोर होना होगा। मेरे दोनों बच्चों को मैने मोबाइल नहीं दे रखा है। उनकी पढ़ाई के लिए मैं अपना मोबाइल देता हूं और पूरी निगरानी रखता हूं ।बच्चा पढ़ाई के अलावा अन्य साइट पर नहीं जाए।  सोशल मीडिया पर बैन लगाना समस्या का समाधान नहीं अभिभावकों ही जागरूक होना होगा।  बच्चे को  आवश्यकता होने पर कीपैड मोबाइल दें। इंटरनेट का सोशल मीडिया का उपयोग कैसे करें ।  अभिभावकों को ही बच्चों के लिए नियम तय करने होंगे। <br /><strong>- सुनील सूंडा, अभिभावक</strong></p>
<p><strong>बच्चों के लिए खेल व अन्य गतिविधि हो </strong><br />पहले जब मोबाइल व सोशल मीडिया नहीं थे उस समय बच्चोंको परिवार में किस्से कहानियां सुनाई जाती थी। खेल व अन्य गतिविधियों  में बच्चों को व्यस्त रखा जाता था। परिवार में सभी लोग आपस में बातचीत करते थे। लेकिन वर्तमान में छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल होने से उनका समाज से जुड़ाव कम हो गया है। परिजनों को चाहिए कि बच्चों को खेल  व अन्य गतिविधियां इतनी अधिक करवाई जाएं। <br /><strong> -आदित्य भारती, स्टूडेंट (किशोर)</strong></p>
<p><strong>मुख्य बिंदु</strong><br />- सोशल मीडिया यूजर्स  की गाइड लाइन बने और उम्र तय हो।<br />- फेसबुक, इस्ट्रग्राम एकाउंट बनाने के लिए उम्र के लिए आधार कार्ड अनिवार्य हो।<br />- सोशल मीडिया का मिस यूज रोकने के लिए माता- पिता दोनों को सावचेत होना होगा।<br />- बच्चों का लर्निंग के लिए अलग एप होना चाहिए।<br />- सोशल मीडिया यूज की उम्र तय होनी चाहिए।<br />- मोबाइल स्मार्ट होने पर फोकस ज्यादा, मनुष्य के स्मार्ट होने पर नहीं देते ध्यान।<br />- बच्चों, पेरेंट्स और शिक्षक के बीच संवाद का गेप ज्यादा आ रहा।<br />- स्कूल्स में सोशल मीडिया के उपयोग और इसके दुष्परिणाम पर लगातार सेमिनार हों।<br />- बच्चों को संवाद के लिए की पैड मोबाइल दें।<br />- होम वर्क, मोबाइल की जगह नोटबुक देना जरूरी।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 20 Dec 2024 11:58:15 +0530</pubDate>
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