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                <title>नहाय-खाय के साथ बिहार में शुरू हुआ लोकआस्था का महापर्व चैती छठ: नवरात्रि की तर्ज पर साल में दो बार जाता मनाया</title>
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                        <![CDATA[बिहार और उत्तर भारत में चार दिवसीय चैती छठ महापर्व नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। सूर्य उपासना के इस कठिन व्रत में श्रद्धालु 36 घंटे का निर्जला उपवास रख भगवान भास्कर को अर्घ्य देंगे। आरोग्यता और संतान सुख के लिए किया जाने वाला यह पर्व बिना किसी पंडित या मंत्रोच्चार के, केवल पवित्रता और लोकगीतों के साथ संपन्न होता है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/chaiti-chhath-the-great-festival-of-folk-faith-started-in/article-147417"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/chat-parav.png" alt=""></a><br /><p>पटना। बिहार में लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व चैती छठ आज नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। चैती छठ व्रत पूर्वांचल एवं उत्तर भारत के अलावा पूरे देश में संयम एवं पवित्रता के साथ मनाया जाता है। यह महापर्व नवरात्रि की तर्ज पर साल में दो बार मनाया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास में प्रथम तथा कार्तिक मास में दूसरी बार छठ महापर्व बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में मनाया जाने वाला सबसे लोकप्रिय पर्व है। चैती छठ के पहले दिन व्रती नर-नारियों ने नहाय-खाय के संकल्प के तहत स्नान करने के बाद अरवा भोजन ग्रहण कर इस व्रत को शुरू किया। महापर्व के दूसरे दिन श्रद्धालु पूरे दिन बिना जलग्रहण किये उपवास रखने के बाद सूर्यास्त होने पर पूजा करते हैं और उसके बाद एक बार ही दूध और गुड़ से बनी खीर खाते हैं तथा जब तक चांद नजर आये तब तक पानी पीते हैं। इसके बाद से उनका करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।</p>
<p>इस महापर्व के तीसरे दिन व्रतधारी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी और तालाब में खड़े होकर प्रथम अर्घ्य अर्पित करते हैं। व्रतधारी डूबते हुए सूर्य को फल और पकवान (ठेकुआ) से अर्घ्य अर्पित करते हैं। महापर्व के चौथे और अंतिम दिन फिर से नदियों और तालाबों में व्रतधारी उदीयमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य देते हैं । भगवान भाष्कर को दूसरा अर्घ्य अर्पित करने के बाद ही श्रद्धालुओं का 36 घंटे का निर्जला व्रत समाप्त होता है और वे अन्न ग्रहण करते हैं।</p>
<p>परिवार की सुख-समृद्धि तथा कष्टों के निवारण के लिए किये जाने वाले इस व्रत की एक खासियत यह भी है कि इस पर्व को करने के लिए किसी पुरोहित (पंडित) की आवश्यकता नहीं होती है और न ही मंत्रोचारण की कोई जरूरत है। छठ पर्व में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।</p>
<p>आचार्य राकेश झा ने बताया कि छठ का व्रत आरोग्यता, सौभाग्य व संतान के लिए किया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार राजा प्रियव्रत ने भी यह व्रत रखा था। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। भगवान भास्कर से इस रोग की मुक्ति के लिए उन्होंने छठ व्रत किया था। स्कंद पुराण में प्रतिहार षष्ठी के तौर पर इस व्रत की चर्चा है। वर्षकृत्यम में भी छठ का वर्णन मिलता है। छठ महापर्व के पूजन एवं प्रसाद सामग्री के रूप में व्रती सिंदूर, चावल, बांस की टोकरी, धूप, शकरकंद, पत्ता लगा हुआ गन्ना, नारियल, कुमकुम, कपूर, सुपारी, हल्दी, अदरक, पान, दीपक, घी, गेहूं, गंगाजल आदि का उपयोग करते हैं। इस महापर्व में प्रसाद के लिये ठेकुआ एवं अन्य पकवान को घरों में पूरी शुद्धता एवं पवित्रता के साथ लोकगीत गाते हुए तैयार किया जाता हैं।अर्घ्य में नए बांस से बनी सूप एवं डाला का इस्तेमाल किया जाता है। सूप से वंश वृद्धि तथा उनकी रक्षा होती है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 15:03:49 +0530</pubDate>
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                <title>शाही ठाठ-बाट से निकली गणगौर माता की शोभायात्रा: 210 लोक कलाकारों के अलग-अलग समूह ने लोक कला की ऐसी रंगत बिखेरी कि दर्शक निहारते ही रहे</title>
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                        <![CDATA[जयपुर में गणगौर की शाही सवारी ने शनिवार को चारदीवारी में रंगत बिखेर दी। उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी द्वारा विधिवत पूजन के बाद सिटी पैलेस से निकली इस शोभायात्रा में 210 लोक कलाकारों और 32 पारंपरिक लवाजमों ने समां बांध दिया। भारी गहनों से सजी माता के दर्शन के लिए उमड़े जनसैलाब ने गुलाबी नगरी को भक्ति और परंपरा के उत्सव में सराबोर कर दिया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/the-procession-of-gangaur-mata-took-place-in-royal-pomp/article-147379"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/scaled_1003862522.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। जयपुर की विश्व प्रसिद्ध गणगौर की शोभायात्रा को देखने के लिए शनिवार को जयपुरवासी उमड़ पड़े। चारदीवारी पूरी तरह गणगौर और ईसर के रंग में रंग गई। पहली बार 210 लोक कलाकारों के अलग-अलग समूह ने लोक कला की ऐसी रंगत बिखेरी कि दर्शक निहारते ही रहे। वहीं, 32 पारंपरिक लवाजमों के भव्य संयोजन ने गणगौर माता की शाही सवारी में चार चांद लगा दिए। लोक कला और परंपरा की जुगलबंदी ने शहरवासियों और पर्यटकों को आनंदित कर दिया।</p>
<p>सिटी पैलेस में उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी और पूर्व राजपरिवार की महिलाओं ने गणगौर माता का विधिवत पूजन किया। इसके बाद जनानी ड्योढ़ी से शाही सवारी में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, लोक कलाकारों की रंगारंग प्रस्तुतियों और बैंड की स्वर लहरियों के साथ लाल वस्त्रधारी कहार माता को कंधों पर उठाकर त्रिपोलिया गेट से चौड़ा रास्ता पहुंचे। शाही परंपरा के अनुसार गणगौर माता चलायमान सिंहासन पर विराजमान रही। यहां गणगौर माता के दर्शन के लिए काफी देर से खड़े श्रद्धालुओं ने जयकारों से वातावरण को गूंजायमान कर दिया।</p>
<p>सजी-धजी झांकियों और पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित कलाकारों ने राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक मार्ग के दोनों ओर एकत्र होकर माता के दर्शन करते नजर आए। गणगौर माता का श्रृंगार आकर्षण का केन्द्र रहा। माता को लगभग 1.5 किलो के मुकुट, 150 ग्राम के मांग टीका, 900 ग्राम के चंपाकली हार सहित पारंपरिक शाही आभूषणों से अलंकृत किया गया।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 18:37:31 +0530</pubDate>
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                <title>अल्बर्ट हॉल पर भव्य सांस्कृतिक संध्या: मुख्यमंत्री की गरिमामयी उपस्थिति में मनाया गया राजस्थान दिवस</title>
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                        <![CDATA[मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की उपस्थिति में जयपुर के अल्बर्ट हॉल पर राजस्थान दिवस का भव्य आयोजन हुआ। पद्मश्री अनवर खां और तगाराम भील की सुरीली प्रस्तुतियों के साथ 100 से अधिक लोक कलाकारों ने समां बांध दिया। दो घंटे तक चली इस सांस्कृतिक संध्या का समापन शानदार आतिशबाजी और जोश के साथ हुआ।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/rajasthan-day-celebrated-in-grand-cultural-evening-at-albert-hall/article-147113"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/albert-hall.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की गरिमामयी उपस्थिति में गुरुवार को राजस्थान दिवस के अवसर पर राज्य स्तरीय सांस्कृतिक संध्या का अल्बर्ट हॉल पर भव्य आयोजन हुआ। मुख्यमंत्री की पहल पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाए गए राजस्थान दिवस में पद्मश्री अनवर खां मांगणियार एवं दल और पद्मश्री तगाराम भील एवं दल की ओर से सुरीली प्रस्तुतियां दी गई। वहीं 100 से अधिक लोक कलाकारों एवं कथक नृत्यांगनाओं ने विभिन्न आकर्षक प्रस्तुतियों दी।  </p>
<p><strong>भव्य आतिशबाजी ने भरा जोश</strong></p>
<p>अल्बर्ट हॉल पर 2 घंटे से अधिक समय तक आयोजित हुई राज्य स्तरीय भव्य सांस्कृतिक संध्या का समापन रंग-बिरंगी आतिशबाजी से हुआ। इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी एवं डॉ. प्रेमचंद बैरवा, संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल, सांसद, विधायक, मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास, गणमान्य सहित बड़ी संख्या में आमजन उपस्थित रहे।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 08:51:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दाऊदी बोहरा समाज ने अदा की ईद-उल-फितर की नमाज, एक-दूसरे को दी मुबारकबाद</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[अजमेर के शिवाजी पार्क स्थित बोहरा मस्जिद में गुरुवार सुबह दाऊदी बोहरा समाज ने ईदुल फितर की नमाज अदा की। रमजान के तीस रोजे पूरे होने के बाद समाज के लोगों ने शांति की दुआ मांगी। एक-दूसरे को गले लगकर ईद की मुबारकबाद दी और सेवइयां खिलाकर आपसी भाईचारे के साथ त्योहार मनाया।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/ajmer/dawoodi-bohra-community-offered-eid-ul-fitr-prayers-and-congratulated-each-other/article-147057"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/ajmer-1.png" alt=""></a><br /><p>अजमेर। दाऊदी बोहरा समाज के मौहम्मद बोहरा ने बताया कि बुधवार की शाम समाज के लोगों ने रमजान महीने के तीस रोजे पूरे कर लिए है। गुरुवार से शव्वाल महीना शुरू हो गया। इसलिए बोहरा समाज के लोगों ने आज सुबह 7.40 बजे शिवाजी पार्क स्थित बोहरा मस्जिद में इंद उल-फितर की नमाज अदा कर दुआ मांगी और एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद देकर सेवईया खिलाई और दिन भर घरों पर ईद का त्योहार मनाया।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अजमेर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 17:59:17 +0530</pubDate>
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                <title>पंचतत्व पूजन के साथ मनाया जन्मदिन संस्कार महोत्सव: एकादशी पर वैदिक विधि से मनाया जन्मदिन, पौधारोपण का लिया संकल्प</title>
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                        <![CDATA[जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा "जन्मदिन संस्कार महोत्सव" आयोजित किया गया। श्रद्धालुओं ने केक काटने के बजाय पंचकुंडीय यज्ञ, दीप प्रज्ज्वलन और मंत्रोच्चार के साथ भारतीय संस्कृति के अनुरूप अपना दिन मनाया। इस पहल का उद्देश्य समाज में सांस्कृतिक मूल्यों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है।]]>
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                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/birthday-celebrated-with-panchatattva-worship-sanskar-mahotsav-birthday-celebrated-with/article-146590"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/jai.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। चैत्र कृष्ण एकादशी  पर गोविंद देव जी मंदिर के सत्संग भवन में जन्मदिन को भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाने की परंपरा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वावधान में मंदिर के महंत अंजन कुमार गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में सत्संग भवन में “जन्मदिन संस्कार महोत्सव” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मार्च माह में जन्मदिन वाले एक दर्जन से अधिक श्रद्धालुओं ने वैदिक विधि-विधान से अपना जन्मदिन मनाकर समाज में सांस्कृतिक जागरण का संदेश दिया।</p>
<p>महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं ने पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश जैसे पंचतत्वों का पूजन किया तथा दीप प्रज्ज्वलन और हवन के माध्यम से अपने जीवन को संस्कारित करने का संकल्प लिया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुए इस कार्यक्रम में जन्मदिन को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और संस्कार का पर्व बनाने का संदेश दिया गया।</p>
<p>आचार्य पीठ से वर्षा गुप्ता ने कहा कि जन्मदिन केवल केक काटने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, कृतज्ञता और जीवन में सद्गुणों को अपनाने का दिन है। जिस प्रकार हम भगवान और महापुरुषों की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं, उसी प्रकार हमें अपना और अपने परिजनों का जन्मदिन भी भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाना चाहिए।</p>
<p>गायत्री शक्तिपीठ ब्रह्मपुरी के सह-व्यवस्थापक मणिशंकर पाटीदार के निर्देशन में भक्त भूषण वर्मा, नीलम वर्मा, वर्षा गुप्ता एवं सुमन शर्मा ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पंचकुंडीय गायत्री महायज्ञ संपन्न कराया। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भविष्य में दीप प्रज्ज्वलित कर जन्मदिन मनाने और भारतीय संस्कृति की इस परंपरा को समाज में आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान कैलाश चंद्र अग्रवाल, रमेश चंद्र अग्रवाल सहित अन्य वरिष्ठजनों ने पुष्पवर्षा कर जन्मदिन मना रहे श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। एकादशी के अवसर पर गीता पाठ का भी आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया।<br /><br />महोत्सव में जिन श्रद्धालुओं का जन्मदिन था, उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में जन्मदिन को भारतीय संस्कृति के अनुसार मनाएंगे तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रत्येक वर्ष कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएंगे, ताकि समाज में संस्कारों के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी प्रसारित हो सके।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 16:46:02 +0530</pubDate>
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                <title>सरस्वती पूजा की परंपरा और आधुनिकता </title>
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                        <![CDATA[सरस्वती पूजा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत पवित्र, सूक्ष्म और अर्थपूर्ण पर्व है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/tradition-and-modernity-of-saraswati-puja/article-140579"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(1)56.png" alt=""></a><br /><p>सरस्वती पूजा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत पवित्र, सूक्ष्म और अर्थपूर्ण पर्व है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना में रची बसी उस जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें ज्ञान, विवेक, वाणी, कला और संस्कार को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। मां सरस्वती को श्वेत वस्त्रों में विराजमान, शांत, सौम्य और करुणामयी देवी के रूप में देखा गया है, जिनके एक हाथ में वीणा है, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथे में वर मुद्रा। यह स्वरूप स्वयं यह संदेश देता है कि जीवन में ज्ञान का संगीत, अध्ययन की निरंतरता, साधना का अनुशासन और विवेकपूर्ण आचरण कितना आवश्यक है।</p>
<p><strong>ऋतु परिवर्तन होना : </strong></p>
<p>बसंत पंचमी के दिन मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा का संबंध ऋतु परिवर्तन से भी है,जब प्रकृति नवजीवन से भर उठती है और मानव मन भी सृजन, अध्ययन और आत्मविकास की ओर प्रवृत्त होता है। परंपरागत रूप से सरस्वती पूजा का वातावरण अत्यंत शांत, मर्यादित और सात्त्विक रहा है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, गुरुकुलों और घरों में इस दिन पुस्तकों, कॉपियों, कलम, वाद्य यंत्रों और कला से जुड़े उपकरणों की पूजा की जाती रही है। विद्यार्थी मां सरस्वती से केवल परीक्षा में सफलता नहीं, बल्कि सही विवेक, एकाग्रता और सद्बुद्धि की कामना करते रहे हैं। भजन, श्लोक, वंदना और मधुर संगीत के माध्यम से ऐसा वातावरण बनाया जाता था यह पर्व जीवन में मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली शक्ति है।</p>
<p><strong>हमारी सांस्कृतिक चेतना :</strong></p>
<p>किन्तु वर्तमान समय में सरस्वती पूजा के स्वरूप में जो परिवर्तन देखने को मिल रहा है, वह गहरी चिंता का विषय है। कई स्थानों पर यह पवित्र पर्व अब शोर, प्रदर्शन और उन्माद का पर्याय बनता जा रहा है। तेज़ डीजे, कानफोड़ू आर्केस्ट्रा, फिल्मी और अश्लील गीत, तथा उन्मादी नृत्य पूजा की मूल भावना को पूरी तरह से विकृत कर रहे हैं। विद्या की देवी, जिनका स्वरूप ही शांति और संयम का प्रतीक है, उन्हीं के नाम पर जब अश्लीलता, अभद्रता और अनुशासनहीनता परोसी जाती है, तो यह केवल धार्मिक भावना को आहत करने का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना के पतन का स्पष्ट संकेत बन जाता है।</p>
<p><strong>पूजा का उद्देश्य :</strong></p>
<p>आज पूजा समितियों के बीच यह होड़ देखी जाती है कि कौन बड़ा पंडाल लगाएगा, किसका साउंड सिस्टम सबसे ज़्यादा तेज़ होगा और किसकी भीड़ सबसे अधिक होगी। श्रद्धा का स्थान प्रदर्शन ने ले लिया है और साधना का स्थान शोर ने। ऐसे में पूजा का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और आयोजन केवल मनोरंजन या शक्ति प्रदर्शन का मंच बनकर रह जाता है। इस माहौल में युवा वर्ग, जो स्वाभाविक रूप से ऊर्जा और उत्साह से भरा होता है, अक्सर बहक जाता है और मर्यादा की सीमाएं टूटने लगती हैं। जब धार्मिक आयोजनों में अनुशासन और स्पष्ट दिशा का अभाव होता है, तब सामाजिक अव्यवस्था जन्म लेती है। तेज़ संगीत, नशे का सेवन, उकसाने वाले गीत और भीड़ का उन्माद मिलकर हिंसा तक की स्थिति पैदा कर देते हैं।</p>
<p><strong>शैक्षिक और सांस्कृतिक पर्व :</strong></p>
<p>सरस्वती पूजा जैसे शैक्षिक और सांस्कृतिक पर्व पर यदि ऐसी घटनाएं घटित हों, तो यह समाज के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक संकट भी है, जो धीरे धीरे समाज की जड़ों को खोखला करता है। इस स्थिति का सबसे गंभीर प्रभाव बच्चों और विद्यार्थियों पर पड़ता है। सरस्वती पूजा का पर्व उनके लिए विद्या, अनुशासन और संस्कार सीखने का अवसर होना चाहिए, परंतु जब वे देखते हैं कि इसी पर्व पर शोर, अश्लीलता और झगड़े हो रहे हैं, तो उनके मन में पूजा और परंपरा के प्रति सम्मान कम होने लगता है। यह सोच आने वाली पीढ़ी के चरित्र निर्माण के लिए अत्यंत घातक हो सकती है।</p>
<p><strong>अंधकार से प्रकाश की ओर :</strong></p>
<p>यह भी विचारणीय है कि मां सरस्वती का दर्शन भारतीय दर्शन में केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं है। सरस्वती ज्ञान की धारा हैं, जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती हैं। उनका वाहन हंस विवेक का प्रतीक है, जो दूध और पानी को अलग कर सकता है। ऐसे में यदि हम सरस्वती पूजा के नाम पर अविवेक, उन्माद और अराजकता को बढ़ावा देते हैं, तो यह स्वयं देवी के प्रतीकात्मक संदेश का अपमान है। यह विरोधाभास हमारी सोच और आचरण के बीच बढ़ती दूरी को उजागर करता है।इस समस्या का समाधान केवल प्रशासनिक सख्ती से संभव नहीं है। यद्यपि ध्वनि प्रदूषण और कानून व्यवस्था को लेकर नियम आवश्यक हैं।</p>
<p><strong>ज्ञान और संस्कृति का उत्सव :</strong></p>
<p>सरस्वती पूजा को फिर से ज्ञान और संस्कृति का उत्सव बनाया जा सकता है। इस अवसर पर कवि गोष्ठियां, पुस्तक प्रदर्शनियां, वाद विवाद प्रतियोगिताएं, शास्त्रीय संगीत, लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और शैक्षिक संवाद आयोजित किए जा सकते हैं। ऐसे कार्यक्रम न केवल पूजा की गरिमा बनाए रखते हैं, बल्कि युवाओं को सकारात्मक दिशा भी देते हैं। रंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आधुनिक साधनों का उपयोग हो, परंतु मूल भाव और मर्यादा सुरक्षित रहें। सरस्वती पूजा का मूल भाव शांति, ज्ञान और संयम है, और जब हम इस भाव को अपने आचरण में उतारेंगे, तभी यह पर्व अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा और समाज को सही दिशा देने में सक्षम होगा।</p>
<p><strong>-नृपेन्द्र अभिषेक नृप</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 Jan 2026 12:11:32 +0530</pubDate>
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                <title>देश की राजधानी नई दिल्ली में इस वर्ष राजस्थान  स्थापना का भव्य आयोजन 15 मार्च को आयोजित किया जाएगा</title>
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                        <![CDATA[राजस्थान फाउंडेशन दिल्ली चैप्टर ने घोषणा की कि इस वर्ष राजस्थान स्थापना दिवस हिंदू तिथि पर मनाया जाएगा, जिसमें गणगौर उत्सव और सामूहिक घूमर मुख्य आकर्षण होंगे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/this-year-the-grand-event-of-rajasthan-sthapana-will-be/article-139338"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/rajasthan-diwas.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। राजस्थान फाउंडेशन दिल्ली चेप्टर के अध्यक्ष सीए आर ए किला ने राजस्थान  स्थापना दिवस समारोह के संरक्षक मंडल एवं सक्रिय सदस्यों की  उपस्थिति में नई दिल्ली के अध्यात्म साधना केंद्र, छतरपुर में आयोजित बैठक में यह जानकारी दी। </p>
<p>उन्होंने बताया कि राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के निर्णय अनुसार इस वर्ष राजस्थान स्थापना दिवस को तीस मार्च के स्थान पर राजस्थान की स्थापना की हिन्दू तिथि के अनुसार आयोजित किया जाएगा तथा इसमें कई विशेष अतिथियों को आमंत्रित किया जाएगा। यह आयोजन राजस्थान की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और एकता का भव्य उत्सव होगा।</p>
<p>किला ने बताया कि राजस्थान स्थापना दिवस के साथ भव्य गणगौर उत्सव भी मनाया जाएगा । जिसकी सबसे बड़ी विशेषता हजारों महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सामूहिक घूमर नृत्य रहेगा। राजस्थान दिवस के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में 30 दल भाग लेंगे, जिनमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रथम तीन दलों को क्रमशः 51,000, 31,000 एवं 21,000 की नकद पुरस्कार राशि भी प्रदान की जाएगी। घूमर नृत्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाले दलों के लिए पंजीकरण लिंक 1 फरवरी से प्रारंभ किए जाएंगे।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Jan 2026 17:34:19 +0530</pubDate>
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                <title>राहुल गांधी का गंभीर आरोप, विपक्ष के नेता को विदेशी मेहमानों से नहीं मिलने देती सरकार</title>
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                        <![CDATA[राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को विपक्ष के नेता से मिलने नहीं देती, जबकि यह पूर्व सरकारों में परंपरा थी। पुतिन की भारत यात्रा पर उन्होंने कहा कि सरकार जानबूझकर विपक्ष को अलग रखती है। शशि थरूर ने भी लोकतांत्रिक मुलाकातों का समर्थन किया।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/rahul-gandhis-serious-allegation-on-the-central-government-the-government/article-134747"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/rahul-gandhi-on-parliament.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि सरकार में विपक्ष के नेता को विदेशी गणमान्य मेहमानों से मिलने नहीं दिया जाता है। राहुल गांधी ने आज यहां संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा कि पहले जो भी विदेशी मेहमान आते थे, तो उन्हें विपक्ष के नेता से मिलने दिया जाता था। यह परंपरा सरकार के आने से पहले तक जारी रही है, लेकिन अब नहीं मिलने दिया जाता। उनका कहना था कि विपक्ष के नेता का एक अलग दृष्टिकोण होता है और उसे विदेशी गणमान्य अतिथि से मिलने की इजाजत होनी चाहिए लेकिन सरकार और विदेश मंत्रालय इन मानदंडों का पालन नहीं करते हैं।</p>
<p>रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की भारत यात्रा को लेकर पूछे गये सवाल पर राहुल गांधी ने कहा, आमतौर पर यह परंपरा है कि जो भी बाहर से आता है वह विपक्ष के नेता से भी मिलता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी और डॉ मनमोहन सिंह की सरकारों के दौरान यही होता था। यह एक परंपरा रही है, लेकिन अब विदेशी गणमान्य मेहमान आते हैं या जब मैं विदेश यात्रा पर जाता हूं, तो सरकार उन्हें विपक्ष के नेता से नहीं मिलने के लिए कहती है। यह उनकी नीति है और वे हर बार ऐसा ही करते हैं। मैं भी जब विदेश जाता हूं तो बताया जाता है कि सरकार का परामर्श है कि इनसे नहीं मिलना है।</p>
<p>रूसी राष्ट्रपति के साथ संबंधों को लेकर पूछे गये एक प्रश्न पर उन्होंने कहा, हमारे सभी के साथ संबंध हैं। एलओपी एक अलग दृष्टिकोण देता हैं। हम भी भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिर्फ सरकार ही प्रतिनिधित्व नहीं करती है। सरकार नहीं चाहती कि विपक्ष बाहर से आने वाले लोगों से मिले जबकि मिलने की परंपरा रही है लेकिन विदेश मंत्रालय इस नियम और ऐसे मानदंडों का पालन नहीं करते हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राहुल गांधी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया में कहा कि लोकतंत्र में देश में आने वाले गणमान्य मेहमान से मिलने की इजाजत देना अच्छा है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 17:18:41 +0530</pubDate>
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                <title>800 साल से भी अधिक पुराना है कोटा का आशापुरा माता मंदिर, दशहरा मेले की शुरूआत होती है मंदिर की पूजा से</title>
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                        <![CDATA[कोटा के दशहरा मैदान के पास स्थित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और लोकमान्यताओं का संगम है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-ashapura-mata-temple-in-kota-is-over-800-years-old/article-127651"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/11-(1)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नवरात्रि का पर्व शुरू होते ही कोटा शहर भक्ति और आस्था में सराबोर हो उठता है। हर गली-मोहल्ले में देवी के जयकारे गूंजने लगते हैं, माता की चौकियां सजती हैं और भक्तजन व्रत-उपवास रखते हुए माता की साधना में लीन हो जाते हैं। ऐसे पावन अवसर पर कोटा का आशापुरा माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। कोटा के दशहरा मैदान के पास स्थित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और लोकमान्यताओं का संगम है। माना जाता है कि यह मंदिर करीब 800 साल से भी अधिक पुराना है। इसकी स्थापना रियासतकाल में हुई है। आज यह मंदिर केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि राजस्थान भर के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है। दशहरा और नवरात्र के दिनों में यहां देशभर से भक्त पहुंचते हैं। वर्तमान में भी मंदिर का रख-रखाव और पूजा-पाठ परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार ही किया जाता है। यह आशापुरा माता हाड़ौती व चौहानों की कुलदेवी है। इसके लिए अन्य समाज में भी माता की आस्था है तथा कई जने कुलदेवी मानते है।</p>
<p><strong>आशापुरा मंदिर के दर्शन से होती हैं दशहरा मेले की शुरूआत</strong><br />कोटा का दशहरा मेला आज विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी शुरूआत भी इसी मंदिर से होती है। परंपरा के अनुसार, दशहरे के शुभारंभ से पूर्व राजपरिवार के सदस्य यहां विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जब तक माता की आराधना पूरी नहीं हो जाती, तब तक मेले के कार्यक्रमों की शुरूआत नहीं होती। नगर निगम के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पूजा में शामिल होते हैं। इसके बाद ही दशहरा मैदान का विशाल आयोजन प्रारंभ होता है। कोटा का यह मंदिर एक ऐसा स्थल है, जहां राजपरिवार और आमजन दोनों समान रूप से श्रद्धा अर्पित करते हैं। दशहरा मेला हो या नवरात्र, दोनों अवसरों पर यहां की भव्यता देखते ही बनती है। यहां पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद वितरण की परंपरा है, जिसे ग्रहण करने के लिए भक्त उत्सुक रहते हैं।</p>
<p><strong>समाधि और चमत्कारी किंवदंतियां</strong><br />मंदिर परिसर में स्थित सिद्धयोगी महाराज की समाधि स्थित है यह भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। भक्त मानते हैं कि यहां समाधि से निकलने वाली ऊर्जा हर व्यक्ति का कल्याण करती है। कहा जाता है कि जो भी यहां सच्चे मन से मनोकामना मांगता है, माता उसकी हर इच्छा पूर्ण करती हैं। यही कारण है कि मंदिर का नाम आशापुरा पड़ा  जो सबकी आशा पूरी करती हैं।</p>
<p><strong>आशापुरा से बनीं आशापाला</strong><br />मंदिर के पुजारी सिद्धनाथ योगी बताते हैं कि यहां आने वाले भक्त खाली हाथ नहीं लौटते। माता हर मनोकामना को पूर्ण करती हैं। यही कारण है कि माता का नाम आशापुरा पड़ा। लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा यह मंदिर आज भी उसी महिमा और चमत्कार से परिपूर्ण है, जैसे सदियों पहले हुआ करता था। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं ने बताया कि  माता आशापुरा का प्राकट्य एक अशोक वृक्ष से हुआ था। इसी कारण इस मंदिर को लंबे समय तक आशापाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता रहा। समय के साथ जब भक्तों ने महसूस किया कि माता उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं, तब यह मंदिर आशापुरा माता मंदिर कहलाने लगा। </p>
<p><strong>नवरात्र के दिन होते हैं विशेष कार्यक्रम</strong><br />- भजन संध्या और जागरण आयोजित होते हैं।<br />- भक्तों द्वारा सुंदरकांड पाठ और माता की चौकी सजाई जाती है।<br />- बड़ी संख्या में महिलाएं गरबा और डांडिया खेलकर माता का आह्वान करती हैं।</p>
<p><strong>नवरात्र में उमड़ती है आस्था की गंगा</strong><br />- नवरात्रि आते ही इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है। सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं।<br />- सुबह 5 बजे मंदिर खुलता है और दोपहर 12.30 बजे तक दर्शन होते हैं।<br />- शाम को 4 बजे मंदिर पुन: खुलता है और रात 10 बजे तक दर्शनार्थियों की भीड़ रहती है।<br />- नवरात्रि में मंदिर पूरे दिन खुला रहता है ताकि कोई भी भक्त दर्शन से वंचित न रह जाए। अष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं की संख्या बड़ी संख्या में पहुंचते है। अष्टमी के दिन मंदिर में खड़े होने के लिए भी जगह नहीं मिलती।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Sep 2025 14:26:05 +0530</pubDate>
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                <title>पितृपक्ष की परंपरा से कारोबार को मिली संजीवनी</title>
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                        <![CDATA[श्राद्ध पक्ष में पितरों को देवता तुल्य माना जाता है। इसलिए इन दिनों पूजन सामग्री की भी खरीदारी बढ़ी है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-tradition-of-pitru-paksha-has-given-a-new-lease-of-life-to-the-business/article-126546"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/11-(2)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। पितृ पक्ष में भी कोटा के बाजारों में रौनक बनी हुई है। परंपरागत रीति-रिवाजों के निर्वाह के लिए लोग बड़ी मात्रा में मिठाई, सूखे मेवे और पूजन सामग्री की खरीदारी कर रहे हैं। इसका सीधा असर कारोबार पर पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि इस बार पिछले साल की तुलना में बिक्री में 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने का अनुमान है। कोटा के घंटाघर, छावनी, गुमानपुरा, तलवंडी सहित अन्य बाजारों में मिठाई की दुकानों पर पितृ पक्ष के दौरान अच्छी बिक्री हो रही है। लड्डू, पेड़ा, बूंदी और बेसन की मिठाइयों की सबसे अधिक मांग है। श्राद्ध के दौरान ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता है। ऐसे में भोजन में मिष्ठान सामग्री को भी परोसा जाता है। ऐसे में श्राद्ध पक्ष में भी मिठाई कारोबार रफ्तार पकड़ रहा है। अधिकांश ग्राहक लड्डू और पेड़े की अधिक खरीदारी कर रहे हैं।</p>
<p><strong>पूजन सामग्री की खरीदारी में भी उछाल</strong><br />किराना व्यापारी योगेश भारद्वाज ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में तिल, चावल, आटा, घी, गुड़, तेल, काला कपड़ा, लौंग, सुपारी, अगरबत्ती, दीपक और पीतल-तांबे के बर्तन की बिक्री में भी जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है।  श्राद्ध पक्ष के दौरान ही इस साल 30 लाख रुपए का कारोबार सिर्फ पूजन सामग्री से होने का अनुमान है। किराना व्यापारियों का कहना है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान दान देने की परम्परा है। इसके चलते पीतल और तांबें के बर्तनों की भी खरीदारी हो रही है। श्राद्ध पक्ष में पितरों को देवता तुल्य माना जाता है। इसलिए इन दिनों पूजन सामग्री की भी खरीदारी बढ़ी है। </p>
<p><strong>खीर के लिए सूखे मेवों की डिमांड</strong><br />श्राद्ध पक्ष में तर्पण और भोजन सामग्री में सूखे मेवों का विशेष महत्व है। कोटा के प्रमुख बाजार में काजू, किशमिश, बादाम व पिस्ता की खरीदारी जोरों पर है। व्यापारियों का कहना है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों के लिए अधिकांश घरों में खीर बनाई जाती है। खीर में सूखे मेवों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके चलते अन्य दिनों की तुलना में अभी सूखे मेवे की बिक्री अधिक हो रही है। वर्तमान में काजू और किशमिश की मांग सबसे आगे है। क्योंकि  खीर को स्वादिष्ट बनाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है। अभी त्यौहारी सीजन नहीं होने से भावों में ज्यादा तेजी नहीं हो रही है। इस कारण भी सूखे मेवों की बिक्री में इजाफा हो रहा है। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />पितृ पक्ष हमारे पूर्वजों की स्मृति में किया जाने वाला विशेष कर्म है, इसमें शुद्ध सामग्री से व्यंजन बनाकर पितरों को अर्पण किया जाता है। इसलिए बाजार से कई तरह की चीजें लेनी ही पड़ती हैं। <br /><strong>-मनोज कुमार, निवासी रायपुरा</strong></p>
<p>श्राद्ध पक्ष के पहले सप्ताह में ही मिठाई की बिक्री करीब 10 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है। अगर यही रफ्तार रही तो पूरे पखवाड़े में अच्छा कारोबार होने की उम्मीद है।<br /><strong>-महावीर अग्रवाल, मिठाई व्यवसायी</strong></p>
<p>हर साल श्राद्ध पक्ष पर मिठाई और पूजन सामग्री की खरीदारी करते हैं। साल में एक बार ही पितरों को तृप्त करने का अवसर मिलता है। ऐसे में उनकी पसंद ख्याल करते हुए व्यंजन बनाते हैं।<br /><strong>-मंजू देवी, निवासी बंगाली कॉलोनी</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Sep 2025 16:23:00 +0530</pubDate>
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                <title>चार सौ साल पुराना गणेश मंदिर आस्था और रहस्य का है अनोखा संगम</title>
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                        <![CDATA[रियासतकालीन तालाब किनारे बने चबूतरे से जुड़ी है प्राचीन परंपरा]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-four-hundred-year-old-ganesh-temple-is-a-unique-confluence-of-faith-and-mystery/article-125789"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/(630-x-400-px)-(5)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के हृदय स्थल पर, पुरानी सब्जी मंडी स्थित विशाल पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान हैं श्री खड़े गणेश। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और अध्यात्म का संगम है। श्रद्धालुओं का कहना है कि पहले यहां सब्जी मंडी लगती थी। अब वर्तमान में पुरानी सब्जी के नाम से ही इस जगह को जानते है। सड़क के दोनों तरफ बाजार स्थित है। रियासतकालीन समय में यहां एक तालाब हुआ करता था। उसी तालाब किनारे बने चबूतरे पर खड़े गणेशजी स्थापित थे। पहले यहां उनके साथ रिद्धी सिद्धी विराजमान नहीं थी। लेकिन वर्तमान में पूजा-अर्चना के साथ उनके साथ रिद्धी-सिद्धी को भी विराजमान करवाया। इस दौरान हवन भी हुए, प्राण-प्रतिष्ठा भी करवाई। स्थानीय श्रद्धालुओं और पुजारियों के अनुसार यह मंदिर लगभग चार सौ साल से भी अधिक पुराना है। खास बात यह है कि गणेशजी यहां खड़े रूप में विराजमान हैं और उनकी सूंड बांयी ओर है। मंदिर की प्राचीनता और रहस्य ने ही इसे आज एक अनूठे तांत्रिक गणेश मंदिर के रूप में पहचान दी है। मंदिर के पास राजा-कृष्ण का मंदिर, भैरूजी का मंदिर, माता का मंदिर भी मौजूद है। श्रद्धालुओं के अनुसार भैरूजी की मूर्ति प्राचीन बावड़ी से मिली थी। इस कारण इन्हें बावड़ी वाले भैरूजी भी कहते हैं।</p>
<p><strong>तंत्र साधना का केंद्र रहा है गणेश मंदिर</strong><br />मुख्य पुजारी लोकेश गौतम बताते हैं कि उनके दादाजी प्रभूलाल जी इस मंदिर के प्रमुख पुजारी थे और वर्षों तक इसकी देखरेख उन्होंने ही की। उन्होंने बताया कि  यह मंदिर तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा है। पहले यहां तांत्रिक क्रियाएं की जाती थीं। समय बदला, परंपराएं बदलीं, लेकिन गणेशजी की महिमा और श्रद्धा आज भी वैसी ही है।श्रद्धालुओं ने बताया कि किंवदती के अनुसार रियासतकाल में जब कोटा दरबार तंत्र साधना और आध्यात्मिक अनुष्ठानों का बड़ा केंद्र था, उस समय खड़े गणेश मंदिर साधकों की साधना स्थली रहा। धीरे-धीरे यहां भक्ति और पूजा-अर्चना का रंग गहराता गया और आज यह हर वर्ग के श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र है।</p>
<p><strong>खड़े गणेश का लोकजीवन में महत्व</strong><br />हाड़ौती शहर में होने वाले बड़े आयोजनों, शादियों, व्यापारिक शुभारंभ और यहां तक कि छात्रों की परीक्षा से पहले भी लोग खड़े गणेश के दर्शन करने पहुंचते हैं। आस्था है कि गणेशजी की बांयी सूंड समृद्धि और शुभता का प्रतीक है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि जब भी कोई नई शुरूआत करनी होती है, सबसे पहले खड़े गणेश को याद किया जाता है। इस परंपरा ने मंदिर को केवल धार्मिक ही नहीं, सामाजिक जीवन का भी केंद्र बना दिया है। श्रद्धालु गिरीराज ने बताया कि मंदिर में धार्मिक कार्यक्रम होते रहते हैं।  चार सौ साल से अधिक पुराने इस मंदिर ने कोटा की सांस्कृतिक और धार्मिक धारा को न केवल संजोया है, बल्कि आस्था का एक अटूट केंद्र भी बना हुआ है।</p>
<p><strong>चार सौ से अधिक श्रद्धालु रोजाना लगाते हैं धोक</strong><br />मुख्य सड़क पर स्थित होने के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या रोजाना चार से पांच सौ तक पहुंच जाती है। गिरीराज प्रसाद, जो वर्षों से यहां रह रहे है, उन्होंने बताया कि हमारे हर शुभ कार्य की शुरूआत खड़े गणेशजी को धोक लगाकर ही होती है। यहां आकर मन को शांति और ऊर्जा मिलती है। स्थानीय लोगों में आज भी विश्वास है कि गणेशजी को सच्चे मन से स्मरण करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी हो या सामान्य बुधवार, मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।</p>
<p><strong>गणेश चतुर्थी पर दस दिन का उत्सव</strong><br />गणेश चतुर्थी के दिन मंदिर का नजारा बिल्कुल अलग होता है। सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। खास शृंगार किया जाता है और दिनभर विशेष अनुष्ठान चलते हैं।-गणेश चतुर्थी से लेकर दस दिनों तक प्रतिदिन अलग-अलग भोग अर्पित किए जाते हैं।-भोग के बाद प्रसाद वितरण की परंपरा है, जिसमें दूर-दराज से आए श्रद्धालु भी शामिल होते हैं।-गणेशजी के शृंगार में साढ़े पांच घंटे से भी अधिक समय लगता है। फूलों, वस्त्रों और गहनों से गणेशजी को सजाया जाता है।</p>
<p><strong>मंदिर के समय और व्यवस्थाएं</strong><br />- गणेश चतुर्थी पर होते हैं भव्य कार्यक्रम<br />- बुधवार को पूरे दिन मंदिर खुला रहता है<br />- सामान्य दिनों में  सुबह 7 से 10 बजे तक और शाम 5 से 11 बजे तक दर्शन<br />- मंदिर प्रबंधन श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखता है।<br />- पीढ़ी दर-पीढ़ी हो रही है मंदिर की पूजा</p>
<p><strong>पीपल के नीचे खड़े गणेश</strong><br />मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान है। माना जाता है कि पीपल स्वयं देववृक्ष है और इसके नीचे गणेशजी की उपस्थिति आस्था को कई गुना बढ़ा देती है। शुरूआत में गणेशजी अकेले विराजमान थे। समय के साथ रिद्धि-सिद्धि को भी उनके साथ विराजमान किया गया। मंदिर के संरक्षक लालचंद प्रजापत हैं उनके अनुसार मंदिर के विकास में श्रद्धालुओं का सहयोग लगातार मिलता रहता है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Thu, 04 Sep 2025 15:00:06 +0530</pubDate>
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                <title> मुकणा गणेश करते हैं श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी</title>
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                        <![CDATA[आज भी यह मंदिर अपने मूल स्वरूप में संरक्षित है ।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mukna-ganesh-fulfills-the-wishes-of-devotees/article-125568"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/1ne1ws-(630-x-400-px)-(4)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा शहर के भीतरी हिस्से में मोखापाड़ा क्षेत्र में स्थित मुकणा गणेश मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और विश्वास का जीवंत प्रतीक है। माना जाता है कि यह मंदिर लगभग तीन सौ साल पुराना है और आज भी उसी प्राचीन शैली में खड़ा है। पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा करने वाले पुजारियों और श्रद्धालुओं की भक्ति इस मंदिर को विशिष्ट बनाती है। यह मंदिर रियासतकालीन के समय का बना हुआ है। इस मंदिर में पीढ़ी-दर पीढ़ी सेवा कर रहे है। इस मंदिर की मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना मुकणा गणेश जी पूरा करते हैं। इस मंदिर में सात सीढ़ियां बनी हुई है। इस मंदिर आज भी प्राचीन की शैली में बना हुआ है। मंदिर में मुकणा गणेश की मूर्ति पत्थर की बनी हुई है। इस मंदिर में जो भी श्रद्धलु अपनी व्यथा लेकर आते हैं उनकी मनोकामना जरूरी पूरी होती है।</p>
<p><strong>पांच कंकर गणेश के रूप में ले जाते हैं </strong><br />मुकणा गणेश मुदिर के मुख्य पुजारी पं. आलोक शर्मा ने बताया कि विवाह की इच्छा रखने वाले युवक-युवतियां यहां आते हैं और अपनी शादी की मनोकामना करते हैं। जब विवाह तय हो जाता है तो परिवार मंदिर से पांच छोटे-छोटे कंकर गणेश जी का प्रतीक मानकर घर ले जाते हैं। शादी सम्पन्न होने के बाद इन्हीं कंकरों को वापस मंदिर में अर्पित कर दिया जाता है।  यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है और इसे श्रद्धालु आस्था का अद्वितीय चिह्न मानते हैं। मुकणा गणेश जी को क्षेत्रवासी हर शुभ अवसर पर सबसे पहले न्योता भेजते हैं। चाहे वह विवाह हो, गृह प्रवेश, नामकरण संस्कार या अन्य धार्मिक आयोजन—गणेश जी का निमंत्रण प्रथम होता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसा करने से सभी कार्य सहजता और सरलता से सम्पन्न होते हैं।</p>
<p><strong>भीतरी शहर के अंदर स्थित है मुकणा गणेश</strong><br />यह मंदिर कोटा शहर के भीतरी शहर में स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए परकोटे के अंदर होकर जाना पड़ता है। यहां अधिकांश घर प्राचीनकालीन के बने हुए है। यहां की गलियां आज भी पुराने शहर की शैली को संजोए हुए है। वर्तमान में इस मंदिर की शैली के दर्शन करने के लिए लोग आज भी यहां पहुंचते है। इस मंदिर में मुकणा गणेश के चांदी के मुकुट, चांदी के दांत तथा चांदी का छत्र से सुशोभित हो रह है। यहां गणेश जी अकेले ही विराजमान है। इनकी सूंड दांयी तरफ है। यहां पूजा-अर्चना सिद्धी-विनायक की तर्ज पर ही होती है। इस मंदिर के दर्शन के लिए रोजाना दौ सौ श्रद्धालु आ जाते हैं। इस मंदिर का प्राचीन शिलालेख नहीं होने से इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद नहीं है। यहां पीढी दर पीढ़ी जो श्रद्धालु आ रहे है उनके अनुसार तीन सौ साल पुराना मंदिर बताते है। मंदिर तक पहुंचते समय श्रद्धालु पुरानी हवेलियों और संकरी गलियों से गुजरते हैं, जो उन्हें अतीत की याद दिलाती हैं।</p>
<p><strong>चार सौ साल पुराना है सदापूरण गणेश मंदिर</strong><br />सदापूरण गणेश मंदिर भी मोखापाड़ा में स्थित है। यह अपनी अनूठी मान्यतों को संजोए हुए है। श्रद्धालु नीरज जोशी व तन्मय जोशी ने बताया कि यह मंदिर रियासतकालीन के समय का बना हुआ है। यह मंदिर पहले मिट्टी व गोबर से प्रतीक के रूप में बना हुआ था उस दौरान पुराने घर भी मिट्टी से ही बने होते थे। इस मंदिर की मान्यता है कि श्रद्धालु अपने मन में अपनी इच्छा मांगते है। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु धोक लगाकर अपनी ईच्छानुसार भेंट भी चढ़ाते हैं। इस मंदिर में सदापूरण गणेश मंदिर में मूषक भी विराजमान है। वर्तमान में यह मंदिर आस्था का केन्द्र बना हुआ है। इस मंदिर में पुजारी प्रमोद शर्मा के अलावा सुरेन्द्र शर्मा, सागर शर्मा भी पूजा-अर्चना करवाते हैं। </p>
<p><strong>मंदिर दर्शन कार्यक्रम</strong><br />- हर बुधवार को पूरे दिन मंदिर खुला रहता है।<br />- बुधवार के लिए मंदिर सुबह 6 बजे खुलता है।<br />- रोजाना मंदिर में महाआरती सुबह और शाम होती है<br />- महआरती के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है।<br />- दूर क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालु कभी भी मंदिर के दर्शन <br />कर सकते हैं।<br />- यहां सालाना जागरण, व धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते है।<br />- मंदिर तक पहुंचने के लिए सात सीढ़ियां लगी हुई है।<br />- मुकणा गणेश के दर्शन व पूजा-अर्चना के बाद चारों तरफ फेरी भी लगा सकते हैं।</p>
<p><strong>पीढ़ी दर पीढ़ी होती हैं सेवा</strong><br />मुख्य पुजारी पं. आलोक शर्मा ने बताया कि इस मुकणा गणेश मंदिर के लिए कोई ट्रस्ट बना हुआ नहीं है। इस मंदिर में पीढ़ी-दर पीढ़ी सेवाभाव चला आ रहा है। इस मंदिर में पं. मोतीलाल शर्मा व सक्षम शर्मा भी पूजा का कार्य करते हैं। यहां आने वाले कई ऐसे श्रद्धालु है जो पीढ़ी-दर पीढ़ी यहां मुकणा गणेश के दर्शनार्थ के लिए आते हैं। यहां कोटा के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग आते हैं। गणेश चतुर्थी के विशेष दिन में वीआइपी लोग भी आते हैं। यहां पूजा-अर्चना कर मनोकामना करते है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 15:41:52 +0530</pubDate>
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