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                <title>Playback Singer - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Playback Singer RSS Feed</description>
                
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                <title>आशा भोसले के निधन पर सोनिया गांधी ने जताया शोक : परिजनों को लिखा भावुक पत्र; कहा-भारतीय संगीत का स्वर्णिम युग समाप्त, रविवार को ब्रीच कैंडी अस्पताल में ली थी अंतिम सांस</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सुरों की मलिका आशा भोसले के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने उनके पुत्रों, आनंद और हेमंत भोसले को लिखे पत्र में आशा जी को एक "राष्ट्रीय धरोहर" बताया। सोनिया गांधी ने कहा कि उनकी बहुमुखी आवाज़ ने सात दशकों तक करोड़ों दिलों को छुआ है और उनके जाने से भारतीय संगीत का एक स्वर्णिम युग समाप्त हो गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/sonia-gandhi-expressed-grief-over-the-demise-of-asha-bhosle/article-150423"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/sonia-gandhi.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोसले के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उनके परिजनों को एक भावुक शोक पत्र लिखा है। सोनिया गांधी ने आशा भोसले के बेटे आनंद और हेमंत भोसले को संबोधित पत्र में कहा कि आशा भोसले के निधन के साथ भारतीय संगीत का एक स्वर्णिम युग समाप्त हो गया है। उन्होंने आशा जी को एक महान कलाकार, प्रतीक और करोड़ों लोगों को अपनी आवाज़ से खुशी देने वाली हस्ती बताया। पत्र में उनकी बहुमुखी प्रतिभा का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने शास्त्रीय, लोक और पॉप संगीत में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने लिखा कि आशा भोसले की आवाज़ और उनका संगीत हमेशा जीवित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।</p>
<p>उन्होंने उन्हें "राष्ट्रीय धरोहर" बताते हुए कहा कि देशभर के संगीत प्रेमी उनके निधन से शोकाकुल हैं। पत्र में आगे उन्होंने परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि इस दुख की घड़ी में उनके विचार और प्रार्थनाएं परिवार के साथ हैं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को शांति मिले और परिवार को इस अपार दुख को सहने की शक्ति प्रदान हो। गौरतलब है कि मशहूर गायिका आशा भोंसले ने रविवार को 92 वर्ष की उम्र में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 17:41:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>Happy Birthday: अनुराधा ने 14 से अधिक भाषाओं में अपनी आवाज़ का चलाया जादू </title>
                                    <description><![CDATA[अपने सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/happy-birthday-anuradha-used-the-magic-of-her-voice-in/article-93992"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-10/630400-sizee-(3)7.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। बॉलीवुड की मशहूर पाश्र्वगायिका अनुराध पौडवाल आज 70 वर्ष की हो गयीं। अनुराधा पौडवाल का जन्म 27 अक्टूबर 1954 को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ करवार में हुआ। अनुराधा पौडवाल ने अपनी पढ़ाई मुंबई के जैवियर कॉलेज से की। बचपन से ही उनका रुझान संगीत की ओर था और वह पाश्र्वगायिका बनने का सपना देखा करती थी। अपने सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया।</p>
<p>आरंभिक दिनों में उन्हें हालांकि काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ''अभिमान'' से अपने करियर की शुरूआत की। सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म में उन्हें मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन के निर्देशन में एक संस्कृत के श्लोक गाने का अवसर मिला जिससे अमिताभ बच्चन काफी प्रभावित हुये।</p>
<p>वर्ष 1974 में अनुराधा पौडवाल को मराठी फिल्म यशोदा में भी पाश्र्वगायन करने का अवसर मिला। वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म कालीचरण में उनकी आवाज में एक बटा दो दो बटा चार उन दिनों बच्चों में काफी लोकप्रिय हुआ था। इस बीच अनुराधा ने आपबीती, उधार का सिंदूर, आदमी सड़क का, मैने जीना सीख लिया, जाने मन और दूरियां जैसी बी और सी ग्रेड वाली फिल्मों में पाश्र्यगायन किया लेकिन इन फिल्मों से उन्हें कोई खास फायदा नहीं पहुंचा।</p>
<p>लगभग सात वर्ष तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद 1980 में जैकी श्रॉफ और मीनाक्षी शेषाद्रि अभिनीत फिल्म हीरो में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत निर्देशन में तू मेरा जानू है तू मेरा दिलवर है की सफलता के बाद अनुराध पौडवाल बतौर पाश्र्वगायिका फिल्म जगत में कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गयी।</p>
<p>वर्ष 1986 में प्रदर्शित फिल्म उत्सव बतौर पाश्र्वगायिका उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुयी। शशि कपूर के बैनर तले बनी इस फिल्म में अनुराधा को लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत निर्देशन में मेरे मन बजा मृदंग गीत गाने का अवसर मिला जिसके लिये वह सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका के फिल्म फेयर पुरस्कार से भी सम्मानित की गयी। अनुराधा पौडवाल की किस्मत का सितारा वर्ष 1990 में प्रदर्शित फिल्म आशिकी से चमका।</p>
<p>बेहतरीन गीत-संगीत से सजी इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने न सिर्फ अभिनेता राहुल राय, गीतकार समीर और संगीतकार नदीम-श्रवण और पाश्र्वगायक कुमार शानू को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया बल्कि उनको भी फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया। फिल्म के सदाबहार गीत आज भी दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।</p>
<p>नदीम-श्रवण के संगीत निर्देशन में अनुराधा पौडवाल की आवाज में रचा बसा सांसो की जरूरत हो जैसे, नजर के सामने जिगर के पार, अब तेरे बिन जी लेंगे हम, धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना, मैं दुनिया भूला दूंगा तेरी चाहत में और मेरा दिल तेरे लिये धड़कता है। श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुए। उनकी आवाज ने फिल्म को सुपरहिट बनाने में अहम भूमिका निभायी। फिल्म में अनुराधा पौडवाल को नजर के सामने जिगर के पार गीत के लिये सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका का फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। आशिकी की सफलता के बाद अनुराधा पौडवाल को कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गये। इनमें बागी, बहार आने तक, कुर्बान, साजन, साथी, फूल और कांटे तथा सड़क, जैसी बड़े बजट की फिल्में शामिल थी।</p>
<p>इन फिल्मों की सफलता के बाद अनुराधा पौडवाल ने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और एक से बढकऱ एक गीत गाकर श्रोताओं को मंत्रमुंग्ध कर दिया। नब्बे के दशक में अनुराधा उन्होंने निश्चय किया कि वह केवल टी-सीरीज द्वारा जारी भक्ति भावना से प्रेरित फिल्मों या एलबम के लिये ही पाश्र्वगायन करेगी। इस क्रम में उन्होंने टी-सीरीज द्वारा जारी कई एलबमों के लिये पाश्र्वगायन किया। अनुराधा पौडवाल फिल्म इंडस्ट्री की पहली पाश्र्वगायिका बनी जिन्हें कैसेट के कवर पर फिल्म अभिनेता या अभिनेत्रियों की तुलना में अधिक प्रमुखता के साथ दिखाया गया। पाश्र्वगायन के लिये चार बार उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म उत्सव के गीत मेरे मन में बजा मृदंग के लिये उन्हें यह पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1990 में फिल्म आशिकी के गीत नजर के सामने जिगर के पार, वर्ष 1991 में दिल है कि मानता नही के गीत दिल है कि मानता नहीं और वर्ष 1992 में फिल्म बेटा में धक धक करने लगा के लिये अनुराधा पौडवाल सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गयी।</p>
<p>वर्ष 1989 में प्रदर्शित मराठी फिल्म कलट नकलट के लिये वह सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित की गयी। उन्हें भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। अपने पांच दशकों के करियर में पौडवाल ने गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मराठी, संस्कृत, बंगाली, तमिल, तेलुगु, ओडिया, असमिया, पंजाबी, भोजपुरी, नेपाली और मैथिली सहित कई भाषाओं में 9000 से अधिक गाने और 1500 से अधिक भजन रिकॉर्ड किए हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 27 Oct 2024 17:01:25 +0530</pubDate>
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                <title>सुरों के रंग, लता के संग' में गूंजें सदाबहार नगमे</title>
                                    <description><![CDATA[ये शाम जब भी आएगी तुम हमको याद आओगे’ गीत से दी लता को स्वरांजली]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/may-the-evergreen-songs-resonate-with-the-colors-of-the/article-91921"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/630400-size-(23)2.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। किसी का प्यार लेके तुम नया जहां बसाओगे, ये शाम जब भी आएगी तुम हमको याद आओगे। ऐसी ही एक यादगार शाम का नजारा सुरीले नगमों से सजी महफिल में देखने को मिला। सुकून आर्ट एंड म्यूजिक एकेडमी की ओर से रविवार को रिद्धी सिद्धी सर्किल स्थित 'द पार्क क्लासिक होटल' में ‘सुरों के रंग, लता के संग’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अस्मिता ने गणेश वंदना पर नाट्य प्रस्तुति देकर की। म्यूजिकल प्रोग्राम में 30 से अधिक प्रतिभागियों ने लता मंगेशकर के गीत गाए। </p>
<p>लता के गीतों के साथ-साथ कलाकारों ने अन्य कई लेजेंड गायकों के गीतों को गुनगुनाया और शाम को और रंगीन बनाया। कार्यक्रम की अतिथि अर्पणा वाजपेयी ने 'महलों का राजा मिला' गीत से महफिल सजाई। सोलो परफॉर्मेंस में राकेश श्रीवास्तव ने आंखे खुली हो या हो बंद, दीदार उनका होता है, अतुल माथुर ने चंदन सा बदन, चंचल चितवन, एस.डी माथुर ने मैं एक राजा हूं और कीर्ती माथुर ने तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा गीत गाकर माहौल को सुरमयी बनाया। ईश्नर माथुर व एस.डी माथुर ने ईमली का बूटा बेरी के बेर गीत पर डूएट परफॉर्मेंस दी। इसके अलावा डॉ. डॉली व सुनील ने तुम आ गए हो नूर आ गया है, अतुल व रीता ने हाल कैसा है जनाब का, प्रमोद व बबीता ने याद किया दिल ने कहां हो तुम, जितेंद्र व हेमलता ने देखो मौसम क्या बहार है गीत पर प्रस्तुती दी। जितेंद्र नाग ने मंच संचालन किया।</p>
<p>एकेडमी की डायरेक्टर नीरा राजबंशी ने बताया कि म्यूजिकल प्रोग्राम के माध्यम से सभी कलाकारों ने सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को सुरमयी श्रृद्धांजलि दी है और सभी कलाकारों ने अपने गीतों से लता मंगेशकर के जन्मदिन को खास बनाने का प्रयास किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 Sep 2024 17:47:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Happy Birthday Sonu: अपनी सुरीली आवाज़ से लोगों के कानों में घोल रहे मधुरता</title>
                                    <description><![CDATA[ उन्होने अपने पिता के साथ महज तीन वर्ष की उम्र से स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/happy-birthday-sonu-adding-sweetness-to-peoples-ears-with-your/article-86268"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/sonu-bhai-ji.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। बॉलीवुड के जानेमाने पाश्र्वगायक सोनु निगम आज 50 वर्ष के हो गये। सोनू निगम का जन्म हरियाणा के फरीदाबाद शहर में 30 जुलाई 1973 को हुआ। उनके पिता माता-पिता गायक थे। बचपन से ही सोनू निगम का रूझान संगीत की ओर था और वह भी अपने माता-पिता की तरह गायक बनना चाहते थे। इस दिशा में शुरुआत करते हुए उन्होने अपने पिता के साथ महज तीन वर्ष की उम्र से स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।</p>
<p>सोनू निगम 19 वर्ष की उम्र में पाश्र्वगायक बनने का सपना लेकर अपने पिता के साथ मुंबई आ गये। यहां उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । अपने जीवन यापन के लिये वह स्टेज पर मोहम्मद रफी के गाये गानो के कार्यक्रम पेश किया करते थे। इसी दौरान प्रसिद्ध कंपनी टी.सीरीज ने उनकी प्रतिभा को पहचान उनके गाये गानो का एलबम रफी की यादें निकाला।</p>
<p>सोनू निगम ने पाश्र्वगायक के रूप में अपने सिने करियर की शुरूआत फिल्म जनम से की, लेकिन दुर्भाग्य से यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी। लगभग पांच वर्ष तक वह मुंबई में पाश्र्वगायक बनने के लिये संघर्ष करने लगे। आश्वासन तो सभी देते लेकिन उन्हें काम करने का अवसर कोई नही देता था। इस बीच सोनू निगम ने बी और सी ग्रेड वाली फिल्मों में पाश्र्वगायन किया लेकिन इन फिल्मों से उन्हें कोई खास फायदा नहीं पहुंचा। सोनू निगम के कैरियर के लिये 1995 अहम वर्ष साबित हुआ और उन्हें छोटे पर्दे पर कार्यक्रम सारेगामा में होस्ट के रूप में काम करने का अवसर मिला। इस कार्यक्रम से मिली लोकप्रियता के बाद वह कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये।</p>
<p>इस बीच उनकी मुलाकात टी.सीरीज के मालिक गुलशन कुमार से हुयी, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचान करके अपनी फिल्म बेवफा सनम में पाश्र्वगायक के रूप में काम करने का मौका दिया। इस फिल्म में उनके गाये गीत अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का.. उन दिनों श्रोताओ के बीच क्रेज बन गया। फिल्म और गीत की सफलता के बाद वह पाश्र्वगायक के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये। बेवफा सनम की सफलता के बाद सोनू निगम को कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गये, जिनमें दिल से, सोल्जर, आ अब लौट चले, सरफरोश, हसीना मान जायेगी और ताल जैसी बड़े बजट की फिल्में शामिल थी। इन फिल्मों की सफलता के बाद उन्होंने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और एक से बढकऱ एक गीत गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।</p>
<p>सोनू निगम को वर्ष 1997 में अनु मलिक के संगीत निर्देशन में बार्डर फिल्म में पाश्र्वगायन करने का अवसर मिला। इस फिल्म में उन्होंने '' संदेशे आते है'' गीत के जरिये अपने ऊपर लगे मोहम्मद रफी के क्लोन के ठप्पे को सदा के लिये मिटा दिया। वर्ष 1997 में ही सोनू निगम को शाहरुख खान अभिनीत फिल्म परदेस में पाश्र्वगायन करने का अवसर मिला। नदीम श्रवण के संगीत निर्देशन में उन्होने ..ये दिल दीवाना गीत गाकर न सिर्फ अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया बल्कि युवाओं के बीच क्रेज भी बन गये।</p>
<p>सोनू निगम अब तक दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके है। सबसे पहले उन्हे 2002 में फिल्म साथिया के साथिया गाने के लिये सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद 2003 में फिल्म कल हो ना हो के गीत कल हो ना हो के लिये भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक के फिल्म फेयर पुरस्कार के साथ ही राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया। उन्होंने हिन्दी के अलावा उर्दू, अंगेजी, तमिल, बंगला, पंजाबी, मराठी, तेलुगू, भोजपुरी, कन्नड़, उडिय़ा और नेपाली फिल्मों के गीतों के लिये भी अपना स्वर दिया है।</p>
<p>बहुमुखी प्रतिभा के धनी सोनू निगम ने कई फिल्मों में अभिनय भी किया है। उन्होनें प्यारा दुश्मन ,कामचोर, उस्तादी उस्ताद से ,बेताब , हमसे है जमाना और तकदीर जैसी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम किया है और जानी दुश्मन एक अनोखी प्रेम कहानी, लव इन नेपाल तथा काश आप हमारे होते जैसी फिल्मों में भी बतौर अभिनेता के रूप में काम कर दर्शको को मंत्रमुग्ध किया है। सोनू निगम पाश्र्वगायन के अलावा सामाजिक उत्थान में सक्रिय भूमिका निभाते रहे है और कई कल्याणकारी संगठनों से सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं। इनमें कैंसर रागियों, कुष्ठ रोगियों और अंधों के कल्याण के लिये चलायी जाने वाली संस्था खास तौर पर उल्लेखनीय है। इसके अलावा सोनू निगम ने कारगिल युद्ध और भूकंप से पीड़ति परिवारों और बच्चों के उत्थान के लिये चलायी जाने वाली संस्था क्रेआन में भी सक्रिय योगदान दिया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jul 2024 13:06:18 +0530</pubDate>
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                <title>Birth Anniversary: पार्श्वगायक नहीं अभिनेता बनना चाहते थे मुकेश</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/birth-anniversary-mukesh-wanted-to-become-an-actor-and-not/article-85535"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/111u1rer-(2)15.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। दर्द भरे नगमों के बेताज बादशाह मुकेश ने अपने पाश्र्वगायन ने लगभग तीन दशक तक श्रोताओं को अपना दीवाना बनाया लेकिन वह अभिनेता के तौर पर अपनी पहचान बनाना चाहते थे।</p>
<p>मुकेश चंद माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर एक इंजीनियर थे और वह चाहते थे कि मुकेश उनके नक्शे कदम पर चलें, लेकिन वह अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के प्रशंसक थे और उन्हीं की तरह गायक अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे। मुकेश ने दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल छोड़ दिया और दिल्ली लोक निर्माण विभाग में सहायक सर्वेयर की नौकरी कर ली। जहां उन्होंने सात महीने तक काम किया। इसी दौरान अपनी बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर वह उन्हें 1940 में वह मुंबई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया।</p>
<p>इसी दौरान मुकेश को एक हिन्दी फिल्म (निर्दोष (1941) में अभिनेता बनने का मौका मिल गया, जिसमें उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन में अपना पहला गीत..दिल ही बुझा हुआ हो तो..भी गाया। हालांकि, यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह से नकार दी गयी। इसके बाद मुकेश ने दुख-सुख, आदाब अर्ज जैसी कुछ और फिल्मों में भी काम किया लेकिन पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके। मोतीलाल प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास के पास मुकेश को लेकर गये और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं। वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म 'पहली नजर' में अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में दिल जलता है तो जलने दे..गीत के बाद मुकेश कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये।<br />मुकेश ने इस गीत को सहगल की शैली में ही गाया था। सहगल ने जब यह गीत सुना तो उन्होंने कहा था..अजीब बात है (मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है। इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सहगल की गायकी के अंदाज से प्रभावित रहने के कारण अपनी शुरूआती दौर की फिल्मों में मुकेश सहगल के अंदाज मे ही गीत गाया करते थे लेकिन वर्ष 1948 मे नौशाद के संगीत निर्देशन में फिल्म (अंदाज) के बाद मुकेश ने गायकी का अपना अलग अंदाज बनाया।</p>
<p>मुकेश के दिल में यह ख्वाहिश थी कि वह गायक के साथ साथ अभिनेता के रूप मे भी अपनी पहचान बनाये। बतौर अभिनेता वर्ष 1953 में प्रदर्शित माशूका और वर्ष 1956 में प्रदर्शित फिल्म अनुराग की विफलता के बाद उन्होने पुन: गाने की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। इसके बाद वर्ष 1958 मे प्रदर्शित फिल्म यहूदी के गाने ये मेरा दीवानापन है की कामयाबी के बाद मुकेश को एक बार फिर से बतौर गायक अपनी पहचान मिली। इसके बाद मुकेश ने एक से बढ़कर एक गीत गाकर श्रोताओ को भाव विभोर कर दिया ।</p>
<p>मुकेश ने अपने तीन दशक के सिने कैरियर मे 200 से भी ज्यादा फिल्मों के लिये गीत गाये। गायक मुकेश को उनके गाये गीतो के लिये चार बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावे वर्ष 1974 मे प्रदर्शित रजनी गंधा के गाने कई बार यूही देखा के लिये मुकेश राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किये गये। राजकपूर की फिल्म (सत्यम.शिवम.सुंदरम) के गाने..चंचल निर्मल शीतल की रिकार्डिंग पूरी करने के बाद वह अमरीका में एक कंसर्ट में भाग लेने के लिए चले गए जहां 27 अगस्त 1976 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया । उनके अनन्य मित्र राजकपूर को जब उनकी मौत की खबर मिली तो उनके मुंह से बरबस निकल गया। मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा..दोनों चली गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jul 2024 15:42:57 +0530</pubDate>
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