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                <title>dainik navajyoti opinion - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जाने राज काज में क्या हैं खास</title>
                                    <description><![CDATA[वैसे मेम को आधी आबादी की आयोग की चैयरपर्सन मराठी ताई से उम्मीद हैं, लेकिन उन पर भी दोनों मेंबर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-the-kingdom/article-126193"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/rajkaj.png" alt=""></a><br /><p>चर्चा में नए समीकरण<br />समीकरण बनते-बिगड़ते हैं, तो उसकी चर्चा हुए बिना नहीं रहती। सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोगों में भी नए समीकरण को लेकर काफी चर्चा है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वाले ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में नई तिगड़ी को लेकर चर्चा हुए बिना नहीं रहती। तिगड़ी भी और किसी की नहीं बल्कि बॉर्डर डि्ट्रिरक्ट के साथ ही शेखावाटी वाले भाई साहब और नवाबों के शहर से ताल्लुक रखने वाले लीडर की है। ठिकाने पर सालों से आने वाले बुजुर्गवार भाई साहब की मानें, तो तिगड़ी भी सूर्यनगरी में सेंधमारी कर मैसेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि ठिकाने पर कहानी तो कुछ और होती है, और सुनाई कुछ और जाती है।</p>
<p>परेशानी हरिराम नाई से<br />सूबे में इन दिनों हाथ वाले कुछ भाई लोग हरिराम नाई से काफी परेशान हैं। हरिराम भी शोले फिल्म वाला नहीं बल्कि संगठन का मजबूत खंभा है, इसलिए उससे कोई बात भी छुपी नहीं रहती। मेष राशि वाले हरिराम के कान और नजरें भी बहुत तेज हैं तथा सूंघने की क्षमता भी लाजवाब। संगठन वाले नेताजी अपना मुंह खोलने से पहले उससे सावधानी तो बरतते हैं, लेकिन कभी-कभी चूक भी हो जाती है। इस हरिराम की वजह से इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने की पल-पल की खबरें लाग लपेट के साथ सिविल लाइन्स में बने बंगले तक पहुंचने में कोई चूक नहीं होती। अब संगठन के भाई लोगों को ऐसे वीरू और जय की तलाश है, जो हरिराम नाई को सबक सीखा सके।</p>
<p>अब नजरें आरयू की तरफ<br />सूबे के शिक्षाविद्धों की नजरें अब आजादी के साल बने शिक्षा के सबसे बड़े मंदिर की तरफ टिकी हुई हैं। टिके भी क्यों नहीं भरतपुर, जोधपुर, बीकानेर और अलवर कुलगुरु पर राज की टेढ़ी नजरें जो हो चुकी है। सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के दो सदस्यों की आरयू की कुलगुरु मेम को लेकर पहले से ही आंखें लाल हैं। वैसे मेम को आधी आबादी की आयोग की चैयरपर्सन मराठी ताई से उम्मीद हैं, लेकिन उन पर भी दोनों मेंबर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।</p>
<p>एक जुमला यह भी<br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि राहत को लेकर है। राहत भी बाढ़ से प्रभावित लोगों से ताल्लुक रखती है। जुमला है कि मीनेश वंशज डॉक्टर साहब और अटारी वाले भाई साहब एक साथ हवा में उड़ने के बाद भी 193 में से केवल 26 को ही राहत देने के पीछे का कारण राज को बदनाम करने की मंसा तो नही है। अब इस राज को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं) </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Sep 2025 11:16:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
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                <title>राजस्थान दिवस विशेष : गौरवपूर्ण है वीरभूमि राजस्थान का स्थापना दिवस </title>
                                    <description><![CDATA[नवंबर 1956 को आबू, देलवाड़ा तहसील का भी राजस्थान में विलय हुआ, मध्य प्रदेश में शामिल सुनेल टप्पा का भी विलय हुआ। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/rajasthan-day-is-a-special-pride-of-the-foundation-day/article-109050"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(4)35.png" alt=""></a><br /><p>राजस्थान की धरती पर रणबांकुरों ने जन्म लिया है। प्रत्येक वर्ष 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है। 30 मार्च, 1949 के दिन जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर और बीकानेर रियासतों का विलय होकर  राजस्थान संघ बना था। यही राजस्थान की स्थापना का दिन माना जाता है। राजस्थान हमेशा से ही भारत के लिए प्रमुख राज्य रहा है, क्योंकि राजस्थान में कई वीरों ने जन्म लिया था। कई वीरों की गाथा राजस्थान को वीरों की भूमि कहे जाने की ओर प्रेरित करती है। आतो सुरगां न सरमावे, इ पर देव रमण न आवे ईरो जस नर नारी गावे, धरती धोरां री राजस्थान जिसके कण-कण में साहस, त्याग और बलिदान की गाथा रची बसी है। जहां वीरांगनाओं ने भी अपने त्याग और बलिदान से मातृभूमि को सींचा है। अंग्रेजी कवि किप्लिंग लिखता है। कि दुनियाभर में राजस्थान एक ऐसा स्थान हैं जहां वीरों की हड्डियां मार्ग की धूल बनी हैं राज्य में वीरों की ऐसी ऐसी कथाएं हैं, जिन्हें सुनकर भी नसों में वीरभाव दौड़ने लगता है। इस धरती के सपूतों ने अपनी मिट्टी की खातिर समय समय पर बलिदान दिए है। राजस्थान की धरती पर रणबांकुरों ने जन्म लिया है। प्रत्येक वर्ष 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है। 30 मार्च, 1949 के दिन जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर और बीकानेर रियासतों का विलय होकर  राजस्थान संघ बना था। यही राजस्थान की स्थापना का दिन माना जाता है। राजस्थान हमेशा से ही भारत के लिए प्रमुख राज्य रहा है, क्योंकि राजस्थान में कई वीरों ने जन्म लिया था। कई वीरों की गाथा राजस्थान को वीरों की भूमि कहे जाने की ओर प्रेरित करती है। </p>
<p>जब राजस्थान राज्य की उत्पत्ति हुई तब राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री के रूप में हीरालाल शास्त्री को चुना गया था। शौर्य और साहस ही नहीं बल्कि हमारी धरती के सपूतों ने हर क्षेत्र में कमाल दिखाकर देश-दुनिया में राजस्थान के नाम को चांद-तारों सा चमका दिया। ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत को आजाद करने की घोषणा करने के बाद जब सत्ता-हस्तांतरण की कार्यवाही शुरू की, तभी लग गया था कि आजाद भारत का राजस्थान प्रांत बनना और राजपूताना के तत्कालीन हिस्से का भारत में विलय एक दूभर कार्य साबित हो सकता है। आजादी की घोषणा के साथ ही राजपूताना के देशी रियासतों के मुखियाओं में स्वतंत्र राज्य में भी अपनी सत्ता बरकरार रखने की होड़ सी मच गई थी, उस समय वर्तमान राजस्थान की भौगालिक स्थिति के नजरिए से देखें तो राजपूताना के इस भूभाग में कुल बाईस देशी रियासतें थी। राजस्थान की धरती पर रणबांकुरों ने जन्म लिया है। यहां वीरांगनाओं ने भी अपने त्याग और बलिदान से मातृभूमि को सींचा है। यहां धरती का वीर योद्धा कहे जाने वाले पृथ्वीराज चौहान ने जन्म लिया, जिन्होंने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को पराजित किया। कहा जाता है कि गोरी ने 18 बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था, जिसमें 17 बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा था। </p>
<p>जोधपुर के राजा जसवंत सिंह के 12 साल के पुत्र पृथ्वी ने हाथों से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था। राणा सांगा का जन्म राजस्थान में हुआ था, जिन्होंने सौ से भी ज्यादा युद्ध लड़कर साहस का परिचय दिया था। पन्ना धाय के बलिदान के साथ बुलन्दा के मोहकम सिंह भी राजस्थान के थे, जिनकी रानी बाघेली का बलिदान भी अमर है। जोधपुर के राजकुमार अजीत सिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए वे अपनी नवजात राजकुमारी की जगह छुपाकर लाई थीं। 18 मार्च, 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली रियासतों का विलय होकर मत्स्य संघ बना। धौलपुर के तत्कालीन महाराजा उदयसिंह राजप्रमुख व अलवर राजधानी बनी। 25 मार्च, 1948 को कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, किशनगढ़ व शाहपुरा का विलय होकर राजस्थान संघ बना। 18 अप्रेल 1948 को उदयपुर रियासत का विलय। नया नाम संयुक्त राजस्थान संघ रखा गया। उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भूपाल सिंह राजप्रमुख बने। 30 मार्च, 1949 में जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर और बीकानेर रियासतों का विलय होकर राजस्थान संघ बना था। यही राजस्थान की स्थापना का दिन माना जाता है। 26 जनवरी, 1950 को सिरोही रियासत को भी वृहत्तर राजस्थान संघ में मिलाया गया।</p>
<p>नवंबर, 1956 को आबू, देलवाड़ा तहसील का भी राजस्थान में विलय हुआ, मध्य प्रदेश में शामिल सुनेल टप्पा का भी विलय हुआ। प्रत्येक वर्ष 30 मार्च को राजस्थान  स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस दिन पूरे राजस्थान में तरह-तरह के कार्यक्रम किए जाते है। सभी सरकारी डिपार्टमेंटो में राजस्थान दिवस मनाया जाता है और मिठाइयां बांटी जाती है। राजस्थान राज्य के स्थापना दिवस के अवसर पर 30 मार्च की शाम को जयपुर स्थित जनपथ पर राजस्थान दिवस समारोह के तहत कई तरह के रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनके अलावा लोक कलाकारों द्वारा प्रस्तुतियां, साउंड व लाइट शो भी आयोजित किए जाते है। इस दौरान पुलिस के घोड़ों और ऊंटों का एक जुलूस भी निकाला जाता है। समारोह का समापन डांस ग्रुप द्वारा वंदे मातरम की प्रस्तुति के साथ होता है। यहां के किलो की दीवारों पर पुरानी संस्कृति एवं कला दिखती है। प्राचीन समय में जब राजा महाराजा हाथी की सवारी करते हुए शहरों का भ्रमण करते थे तब उनको देखने के लिए चारों तरफ की जनता एकत्रित हो जाती थी। आज राजस्थान के किले राजस्थान की संस्कृति एवं कला को देश-विदेशों में पसंद किया जाता है। हम सभी लोगों को यह कोशिश करनी चाहिए कि हम हमारे राजस्थान को बेहतर से बेहतर बनाए रखने का ध्यान रखें। <br />-प्रकाश चंद्र शर्मा<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Mar 2025 14:39:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>नदियों को विवाद नहीं, विकास का माध्यम बनाएं </title>
                                    <description><![CDATA[घरेलू और औद्योगिक गंदा पानी बहकर जाता है, जलवायु नियंत्रण में मदद करती हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/make-rivers-a-medium-of-development-not-dispute%C2%A0/article-107784"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(1)56.png" alt=""></a><br /><p>जैव विविधता को बढ़ावा देने से लेकर जलवायु को नियंत्रित करने और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने तक स्वस्थ, निर्मल एवं पवित्र मुक्त बहने वाली नदियां इंसानी जीवन के साथ प्रकृति, कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं। नदियां मानव अस्तित्व का मूलभूत आधार हैं और देश एवं दुनिया की धमनियां हैं, इन धमनियों में यदि प्रदूषित जल पहुंचेगा तो शरीर बीमार होगा, लिहाजा हमें नदी रूपी इन धमनियों में शुद्ध जल के बहाव को सुनिश्चित करना होगा। नदियों के समक्ष आने वाले खतरों, जैसे प्रदूषण, आवास की क्षति और जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के बारे में जागरूकता बढ़ाएं। नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किए जाने की जरूरत है। बढ़ते नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए उनमें अपशिष्ट या सीवेज, कारखानों से निकलने वाले तेल, कैमिकल, धुंआ, गैस, एसिड, कीचड़, कचरा, रंग को डालने से रोकना होना, हमने जीवनदायिनी नदियों को अपने लोभ, स्वार्थ, लापरवाही के कारण जहरीला बना दिया है। दुनियाभर में नदी जल एवं नदियों के लिए कानून बने हुए है, आवश्यक हो गया है कि उस पर पुनर्विचार कर देश एवं दुनिया के व्यापक हित में विवेक से निर्णय लिया जाना चाहिए। हमारे राजनीतिज्ञ, जिन्हें सिर्फ वोट की प्यास है और वे अपनी इस स्वार्थ की प्यास को इस पानी से बुझाना चाहते हैं। नदियों को विवाद बना दिया है, आवश्यकता है तुच्छ स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक मानवीय हित के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। जीवन में श्रेष्ठ वस्तुएं प्रभु ने मुफ्त दे रखी हैं- पानी, हवा और प्यार। और आज वे ही विवादग्रस्त, दूषित और झूठी हो गईं। जैव विविधता को बढ़ावा देने से लेकर जलवायु को नियंत्रित करने और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने तक स्वस्थ, निर्मल एवं पवित्र मुक्त बहने वाली नदियां इंसानी जीवन के साथ प्रकृति, कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में भारत सहित दुनिया की तमाम नदियां संकट के दौर से गुजर रही हैं। नदियों के सामने जहां प्रदूषण व अतिक्रमण जैसी भयावह चुनौतियां खड़ी हैं, वहीं उनमें निरंतर घट रही पानी की मात्रा भी गंभीर चिंता में डालने वाला है। कस्बों व शहरों के घरेलू, औद्योगिक कचरे एवं गन्दगी के बहिस्राव के कारण नदियों ने गंदे नाले का रूप लेना प्रारंभ कर दिया है। सैकड़ों बरसाती नदियां बहुत पहले ही अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। आज जब नदियां प्रदूषित हो रही हैं तो किनारे बसा समाज भी उस प्रदूषण के असर से बच नहीं पा रहा है। हमारी कृषि व्यवस्था का कुछ हिस्सा भी उससे प्रभावित हो रहा है। आज गंदे पानी को नदी जल से अलग रखने के विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। इस गंदे पानी को उपचारित करके उसे कृषि कार्यों व उद्योगों में उपयोग में लाया जा सकता है। समूची दुनिया में पीने का शुद्ध पानी एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। पानी अत्यधिक जहरीला हो चुका है। इस कारण पीने के पानी की आपूर्ति भी नहीं हो पा रही है। लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। भारत नदियों का एक अनोखा देश है, जहां नदियों को पूजनीय माना जाता है लेकिन दुर्भाग्य से प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। गंगा, यमुना, महानदी, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु (सिंधु), और कावेरी जैसी नदियों को देवी-देवताओं के रूप में पूजा जाता है।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में बनाया गया जल शक्ति मंत्रालय, नदी घाटियों में आर्द्रभूमि के पुनरुद्धार और संरक्षण और नदी प्रदूषण के खतरनाक स्तर से निपटने पर ध्यान केंद्रित करता है। देश के समक्ष वाटर विजन 2047 प्रस्तुत किया गया है यानी आजादी के सौ वर्ष पूरे होने तक देश को प्रत्येक वह कार्य करना है, जो देश को पानी के मामलों में सबल बना सके। इसमें हमारी नदियां भी शामिल हैं। हमें अपनी नदियों को 2047 तक निर्मल व अविरल बनाने के संकल्पित लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ना होगा। भारत की नदियों की दिन-ब-दिन बिगड़ती हालत एवं बढ़ते प्रदूषण पर पिछले चार दशकों से लगभग हर सरकार कोरी राजनीति कर रही है, प्रदूषणमुक्त नदियों का कोई ईमानदार प्रयास होता हुआ दिखाई नहीं दिया है। नदियां हमारे जीवन की जीवन रेखा है, गति है, ताकत है। ये पानी, बिजली, परिवहन, मछली और मनोरंजन के लिए स्रोत हैं। नदियां पर्यावरण के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं। नदियों के किनारे बसे शहरों की वजह से ये आर्थिक रूप से भी अहम हैं, इनसे ताजा पीने का पानी मिलता है, बिजली बनती है, खेती के लिए जरूरी उपजाऊ मिट्टी मिलती है। नदियों से जल परिवहन होता है। घरेलू और औद्योगिक गंदा पानी बहकर जाता है, जलवायु नियंत्रण में मदद करती हैं। नदियां प्राकृतिक संपदा हैं। </p>
<p>नदियां आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रमुख स्रोत हैं, जिनके किनारे कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं। नदियों के किनारे ही कई प्रमुख शहर, शैक्षिक और पर्यटन से जुड़े शहर बसे हैं। नदियों की  सफाई के नाम पर कई हजार करोड़ रुपए बहा दिए गए हैं, लेकिन लगता है सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। आधुनिक शोधों से भी प्रमाणित हो चुका है कि गंगा की तलहटी में ही उसके जल के चमत्कारी होने के कारण मौजूद है। यद्यपि औद्योगिक विकास ने गंगा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, किन्तुु उसका महत्व यथावत है। उसका महात्म्य आज भी सर्वोपरि है। गंगा स्वयं में संपूर्ण संस्कृति है, संपूर्ण तीर्थ है, जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है। गंगा ने अपनी विभिन्न धाराओं से, विभिन्न स्रोतों से भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया, गंगा विश्व में भारत की पहचान है। <br />- ललित गर्ग <br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 10:54:19 +0530</pubDate>
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                <title>जलवायु परिवर्तन के असर से कैसे हो बचाव</title>
                                    <description><![CDATA[कीट नाशकों के बेतहांसा इस्तेमाल से भू-उर्वरता खत्म हो रही है और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/how-to-protect-yourself-from-the-effects-of-climate-change/article-98889"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer59.png" alt=""></a><br /><p>भारत में जिस तेजी से लोगों में खेती पर निर्भरता लगातार कम हो रही है, अपने कृषि प्रधान देश के लिए बहुत चिंता की बात है। रिपोर्ट बताती है भारत सहित एशिया के किसानों को पिछले तीन दशकों के दौरान करीब 143.2 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि भारत ही नहीं, दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन का असर किसानों पर सीधे पड़ रहा है। सर्वेक्षण बताते हैं जलवायु परिवर्तन का असर भारत में सबसे ज्यादा कृषि और किसानों पर हुआ है। पिछले एक दशक में भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में हीटवेट, अतिशीत, अतिवृष्टि, बाढ़, तूफान और बादल फटने की घटनाओं से जान-माल का नुकसान तो हुआ ही करोड़ों हेक्टेयर खेत में खड़ी फसल नष्ट हो गई। आग की घटनाओं की वजह से अरबों रुपये का जो नुकसान हुआ, उसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। सवाल यह है जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से हुए जान-माल के नुकसान का रहनुमा कौन है भारत में केंद्र और राज्य सरकारें ऐसे वक्त में किसानों के लिए राहत की पोटली तो खोलती हैं, लेकिन उस पोटली का फायदा कितने प्रभावित किसानों के पास पहुंचता है, बताने की जरूरत नहीं है। किस वजह से नहीं पहुंचता, यह भी सभी जानते हैं। सवाल यह है जिस किसान के ऊपर अन्न, सब्जी, फल, दूध, ऊन पैदा करने की जिम्मेदारी है उस किसान की हालात कब तक ऐसी बनी रहेगी। भारत में किसानों को अन्न-देवता कहकर सम्मान दिया जाता रहा है। जिन झंझावातों को सहकर किसान अन्न उपजाता है और दुनिया का पेट भरता है, उन झंझावातों के बारे में वही जानता है, जो किसान परिवार से होता है। इस तरह की बात लिखने का हमारा मकसद यह है कि भारत सहित दुनिया भर का किसान प्राकृतिक आपदाओं और दूसरी तमाम समस्याओं को झेलता रहता है, लेकिन अपने कार्य से मुख नहीं मोड़ता।  </p>
<p>यह बात भी सच है कि अब करोड़ों लोग कृषि-कार्य से खुद को अलग कर रहे हैं। इसका कारण खेती का घाटे में जाना और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं की वजह से हर साल 10.2 लाख करोड़ का घाटा उठाते रहना है। खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुनियाभर के किसानों के ऊपर हर साल गहरी आर्थिक चपत पड़ रही है। यह चपत किसान को बर्बादी के कगार पर खड़ा होने के लिए मजबूर कर रही है। रिपोर्ट बताती है कि किसानों पर पड़ रही यह भयंकर मार वैश्विक स्तर पर करीब पांच फीसदी है। प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं पिछले तीस वर्षों में तेजी के साथ बढ़ी हैं। ऐसे में आने वाले सालों में किसानों को और ज्यादा आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ सकता है। कृषि क्षेत्र में रुचि वैश्विक स्तर पर लगातार कम होती जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 21 वर्षों में कृषि में श्रम बल 40 से घटकर 27 फीसदी पहुंच गया। आंकड़े के अनुसार जहां साल 2000 में करीब 102.7 करोड़ लोग यानी वैश्विक श्रम बल का करीब 40 फीसदी हिस्सा कृषि से जुड़ा था वह 2021 में घटकर महज 27 फीसदी ही रह गया। यानी अब केवल 87.3 करोड़ लोग अपनी जीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं। भारत में जिस तेजी से लोगों में खेती पर निर्भरता लगातार कम हो रही है, अपने कृषि प्रधान देश के लिए बहुत चिंता की बात है। रिपोर्ट बताती है भारत सहित एशिया के किसानों को पिछले तीन दशकों के दौरान करीब 143.2 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।लेकिन अमेरिका और यूरोप अपने कृषि क्षेत्र के सम्बंध में आनुपातिक रूप से अधिक प्रभावित हुए हैं। प्राकृतिक आपदाएं भारत के किसानों के लिए ही नहीं वैश्विक स्तर पर किसानों के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हो रही हैं, इसलिए वैश्विक स्तर पर इस पर गहन विचार करना चाहिए और वैश्विक स्तर पर ऐसी नीति जरूर बनानी चाहिए, जिससे हर देश के किसान को प्राकृतिक आपदाओं की मार से बचाने के लिए कुछ ऐसी योजना बनाकर लागू करना जिससे किसानों को राहत हासिल हो। सर्वेक्षण बताते हैं कि खेती में लागत पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ गई है। इस वजह से भारत के करोड़ों किसान सालभर कर्ज से दबे रहते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की कोई अत्यंत सकारात्मक नीति न होने की वजह से भारत के लाखों किसान जहां तमाम आर्थिक समस्याओं में उलझा रहता है वहीं पर पारिवारिक समस्याओं से भी परेशान रहता है। रसायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल पर्यावरण प्रदूषण की एक बड़ी वजह है। वैज्ञानिक शोध के मुताबिक ग्रीनहाउस गैसों की वजह से प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं, इससे फसल-चक्र पर असर पड़ रहा है जिससे तमाम तरह की समस्याएं और बीमारियां बढ़ रही हैं इससे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। परीक्षण से यह पता चला है कि रसायनिक कीटनाशकों की वजह से अन्न-उत्पादन में ऐसे हानिकारक तत्व पाए जाने लगे हैं, जो कई गम्भीर बीमारियों की वजह बन रहे हैं। भारत सहित एशिया के देशों में कीटनाशकों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इसलिए इसके विकल्प के रूप में जैविक कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए किसानों को प्रोत्साहन देने की नीति अच्छी साबित हो रही है ऐसी नीति एशिया के दूसरे देशों में भी बनाई जानी चाहिए, इससे होने वाली तमाम हानियों से बचा जा सके। कीट नाशकों के बेतहांसा इस्तेमाल से भू-उर्वरता खत्म हो रही है और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।  </p>
<p>अखिलेश आर्येन्दु<br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Dec 2024 11:02:46 +0530</pubDate>
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                <title>महाराजा सूरजमल पानीपत की लड़ाई के रणनीतिकार</title>
                                    <description><![CDATA[अठारहवी शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन के साथ दक्षिण भारत में मराठा, पंजाब मे सिक्ख और उत्तर भारत में जाट शक्ति का अभ्युदय अपने चरम पर था। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/maharaja-surajmal-strategist-of-the-battle-of-panipat/article-98628"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(10)5.png" alt=""></a><br /><p>वर्तमान राजस्थान के पूर्वी सिंहद्वार तत्कालीन भरतपुर राज्य को भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने वाले महानायक महाराजा सूरजमल 25 दिसम्बर 1763 को दिल्ली के निकट शाहदरा इलाके में नवाब नजीबुद्दोल्ला के खिलाफ  युद्व मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए। भारत के इतिहास में मुख्यत: दो अवसरों पर भरतपुर की निर्णायक भूमिका रही। मार्च 1727 में खानवा के मैदान में बाबर एवं राणा सांगा के बीच हुए युद्व में सांगा की पराजय ने मुगल शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। सांगा का भाला बाबर से एक इंच की दूरी से निकल गया, जिसने भारत की तकदीर बदल दी। इसी प्रकार पानीपत की तीसरी लड़ाई में यदि मराठाओं ने महाराजा सूरजमल की रणनीति का अनुसरण किया होता तो भारत के इतिहास का स्वरूप अलग होता। इतिहास का विचित्र संयोग यह है कि 1707 में मुगल शासक औरगंजेब का निधन हुआ और इसी साल भरतपुर की पुरानी राजधानी डीग के राजा बदन सिंह की पटरानी देवकी के गर्भ से फरवरी 1707 को सूरजमल का जन्म हुआ। अठारहवी शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन के साथ दक्षिण भारत में मराठा, पंजाब मे सिक्ख और उत्तर भारत में जाट शक्ति का अभ्युदय अपने चरम पर था। इनमें भरतपुर राज्य के महाराजा सूरजमल अग्रणी थे, जिन्होंने अपने असाधारण व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बलबूते सियासत तथा साहसिक संघर्ष की महागाथा लिखी। विडम्बना यह है कि ऐसे महापराक्रमी का अपेक्षित ऐतिहासिक मूल्यांकन नहीं हो पाया। उन्हें व्यावहारिक समझबूझ, रचनात्मक दृष्टिकोण, दूरदर्षिता, साहस एवं धैर्य, राजनीतिक परिपक्वता,नजरिया, कूटनीतिक चातुर्य, युद्ध रणनीति के विशेषज्ञ  को गुणों का प्रतीक माना जाता है। अपने नाम के अनुरूप सूरजमल ने सूर्य के समान प्रचण्ड तेज से अपने युग को आलोकित किया। जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने भरतपुर के जाट राज्य के संस्थापक राजा बदनसिंह और उनके यशस्वी पुत्र सूरजमल को समुचित संरक्षण दिया। पानीपत की तीसरी लड़ाई जनवरी 1761 में हुई। इससे पूर्व युद्ध की रणनीति पर सदाशिव भाऊ की उपस्थिति में उच्चस्तरीय चर्चा के दौरान मराठा नेताओं की समझाईश के बावजूद भाऊ ने सूरजमल की बुद्विमतापूर्ण एवं व्यावहारिक सलाह को अनदेखा किया। नतीजतन युद्व में मराठा सेना परास्त हुई। पानीपत की तीसरी लड़ाई में पेशवा बाजीराव की प्रेयसी मस्तानी से उत्पन्न पुत्र शमशेर बहादुर घायल हो गया था।</p>
<p>भरतपुर में मथुरा गेट के पास मस्तानी की सराय के सामने उसे दफनाया गया। बाद में वहां मकबरा बनाया गया। भरतपुर स्थापना दिवस 19 फरवरी पर लोहागढ़ विकास परिषद द्वारा प्रकाशित स्मारिका में प्रकाशित लेख के अनुसार पेशवा बाजीराव की प्रेयसी मस्तानी को पूना से जिस गुप्त स्थान पर भिजवया गया था वह स्थान सम्भवत: भरतपुर था। बाजीराव की मृत्यु से आहत मस्तानी ने भी प्राण त्याग दिए उसकी याद मे मथुरा गेट पर रियासत कालीन सराय बनी हुई है जिसे अब पक्की सराय के नाम से जाना जाता है। अपनी घोर उपेक्षा के बावजूद सूरजमल की मराठों के प्रति सहानुभूति बनी रही। युद्व में पराजित मराठा सेना को जाट रियासत में ससम्मान आश्रय मिला और आगे की यात्रा के लिए सक्षम होने पर उन्हे भावपूर्ण विदाई दी गई। पानीपत की तीसरी लड़ाई से सात वर्ष पूर्व जनवरी से मई 1754 के दौरान भरतपुर डीग के मध्य कुम्हेर में मराठा-मुगल की सम्मिलित लगभग 80 हजार सेना का सूरजमल ने मुकाबला किया। पानीपत की तीसरी लड़ाई में विजयी होने पर अहमदशाह अब्दाली का दिल्ली पर आधिपत्य हो गया। विभिन्न युद्वों तथा अन्य अवसरों पर अर्जित अतुल धन सम्पत्ति की सूचना मिलने पर अब्दाली ने भरतपुर की तरफ  कूच करने का मानस बनाया। सूरजमल ने इस गंभीर खतरे को अपनी बुद्धमता से टाल दिया। सम्राट मुहम्मद शाह के 1748 के निधन के बाद सिंहासन के संघर्ष में दिल्ली पहुंचकर सूरजमल ने अहमदशाह के शीर्ष पर ताज रखकर सम्राट निर्माता की भूमिका निभाई और सफदरजंग को वजीर बनाया। सूरजमल ने मुगलों के सेनापति बख्शी मीर सलावत को आत्मसमर्पण के लिए बाध्य कर दिया। पथरी की प्रसिद्ध लड़ाई में रोहलो के सेनाध्यक्ष का सिर काटने तथा रोहेलों को शक्तिहीन करने पर दिल्ली सम्राट से राजेन्द्र की उपाधि मिली। घसेरा की लड़ाई जीतने के बाद सूरजमल ने जून 1761 को आगरा पर अधिकार किया। किसी जमाने में मुगलों की शक्ति एवं समृद्वि का प्रतीक लाल किला जाटों के कब्जे में था।    फर्रूखनगर विजय और मसावी खां को भरतपुर में कैद करने से महाराज सूरजमल और नजीबुद्वौला के बीच दुष्मनी बढ़ गई। 25 दिसम्बर को अपरान्ह में सूरजमल ने लगभग छ: हजार घुड़सवारों के साथ शत्रु सेना पर हमला बोला। इस युद्व में महाराज सूरजमल वीर गति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु तथा शव की पहचान को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत है। मथुरा जिले के गोवर्धन तीर्थ पर सूरजमल की प्रतीकात्मक अंत्येष्टि की गई। बाद में वहां कुसुम सरोवर ताल खोदा गया, जिसके पूर्वी किनारे पर महाराज सूरजमल की स्मृति में भव्य कलात्मक छतरी का निर्माण कराया गया।</p>
<p>-गुलाब बत्रा<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Dec 2024 11:45:51 +0530</pubDate>
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                <title>भारत में तस्करी से बढ़ती चुनौतियां  </title>
                                    <description><![CDATA[इसके अलावा भारतीय तारे वाले कछुए, जो अपनी औषधीय और सजावटी उपयोगिता के लिए प्रसिद्ध हैं को अवैध रूप से तस्करी करके विदेशों में भेजा जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/growing-challenges-from-smuggling-in-india-%C2%A0/article-98249"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer43.png" alt=""></a><br /><p>भारत में तस्करी के मुख्य स्रोतों और मार्गों में बदलाव आ रहे हैं और इनमें मादक पदार्थों, सोने, वन्यजीव उत्पादों और अन्य अवैध वस्तुओं की तस्करी प्रमुख रूप से शामिल है। तस्करी की विभिन्न प्रवृत्तियां भारत में विविध रूपों में देखने को मिलती हैं। रिपोर्ट में कई प्रमुख प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं। इनमें कोकीन और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी, सोने की तस्करी, वन्यजीवों की तस्करी और सिंथेटिक ड्रग्स का बढ़ता कारोबार शामिल हैं। </p>
<p>भारत में तस्करी एक बड़ी समस्या बन गई है, जो सिर्फ कानून व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति, समाज और पर्यावरण पर भी असर डाल रही है। तस्करी का प्रभाव केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे देश की सुरक्षा, स्वास्थ्य, समाज और पर्यावरण को प्रभावित करता है। राजस्व खुफिया निदेशालय द्वारा जारी की गई भारत में तस्करी रिपोर्ट 2023-24 में तस्करी की बढ़ती घटनाओं के बारे में चेतावनी दी गई है और इसके समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। तस्करी का मतलब है, अवैध रूप से मादक पदार्थों, सोने, रत्नों और वन्यजीवों के अवशेषों जैसे सामानों का व्यापार करना। भारत में तस्करी के मुख्य स्रोतों और मार्गों में बदलाव आ रहे हैं और इनमें मादक पदार्थों, सोने, वन्यजीव उत्पादों और अन्य अवैध वस्तुओं की तस्करी प्रमुख रूप से शामिल है। तस्करी की विभिन्न प्रवृत्तियां भारत में विविध रूपों में देखने को मिलती हैं। रिपोर्ट में कई प्रमुख प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं। इनमें कोकीन और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी, सोने की तस्करी,   वन्यजीवों की तस्करी और सिंथेटिक ड्रग्स का बढ़ता कारोबार शामिल हैं। इसके अलावा म्यांमार, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ भारत की सीमाओं का भी इस्तेमाल तस्करी के लिए किया जा रहा है। कोकीन की तस्करी 2023-24 में 47 मामलों तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के 21 मामलों से कहीं अधिक है। इसका मुख्य कारण दक्षिण अमेरिका और अफ्रीकी देशों से सीधे हवाई मार्गों और समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत में मादक पदार्थों का प्रवेश है। तस्कर इन मादक पदार्थों को हवाई अड्डों या समुद्र के रास्ते भारत में भेजते हैं। इसके अलावा ब्लैक कोकीन नामक एक नया प्रकार भी सामने आया है, जो अन्य सामान्य कोकीन से अलग है। इसको ऐसे रासायनिक पदार्थों से ढ़ककर तस्करी की जाती है, जो इसे सामान्य डिटेक्शन से बचने में मदद करते हैं, जैसे कि चारकोल या लोहे का ऑक्साइड। इस प्रकार की तस्करी को रोकने के लिए नए और उन्नत तकनीकी उपायों की आवश्यकता है। भारत में सोने की तस्करी विशेष रूप से बढ़ी है, क्योंकि देश में सोने पर उच्च आयात शुल्क लगाया जाता है। इसके कारण अवैध तस्करी को बढ़ावा मिलता है। रिपोर्ट में यह पाया गया है कि सोने की तस्करी पश्चिम एशिया से विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से की जा रही है।  इसके अलावा भारत में वन्यजीवों की तस्करी भी एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। हाथी दांत, तेंदुओं की खाल, पैंगोलिन, मोर और अन्य संरक्षित प्रजातियों की तस्करी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इन प्रजातियों की तस्करी से जैव विविधता पर संकट बढ़ रहा है और पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो रहा है। विशेष रूप से हाथी दांत की तस्करी दक्षिण-पूर्व एशिया में उच्च मांग के कारण बढ़ी है। इसके अलावा भारतीय तारे वाले कछुए, जो अपनी औषधीय और सजावटी उपयोगिता के लिए प्रसिद्ध हैं को अवैध रूप से तस्करी करके विदेशों में भेजा जा रहा है।</p>
<p>इसी तरह भारत में म्यांमार, लाओस और थाईलैंड जैसे देशों से सिंथेटिक ड्रग्स और हेरोइन की तस्करी की घटनाएं बढ़ी हैं। ये ड्रग्स मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों के माध्यम से भारत में प्रवेश करते हैं। यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से तस्करी के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यहां की सीमाएं न तो पूरी तरह से सुरक्षित हैं और न ही इन क्षेत्रों में निगरानी प्रणाली पर्याप्त है। भारत में तस्करी के लिए मुख्यत: तीन प्रमुख मार्गों का उपयोग किया जाता है हवाई मार्ग, समुद्री मार्ग और जमीनी मार्ग। हवाई मार्ग तस्करों के लिए एक सुविधाजनक मार्ग बन चुका है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात में वृद्धि हुई है। तस्कर मादक पदार्थों को सूटकेस, पार्सल या शारीरिक रूप से निगलकर भारत भेजने का प्रयास करते हैं। एयरपोर्ट्स पर सुरक्षा उपायों को चकमा देकर यह पदार्थ विदेशों से बड़ी आसानी से भारत में लाए जाते हैं। जब ये वस्तुएं अवैध रूप से आयात या निर्यात की जाती हैं,  तो सरकार को उनका कर और शुल्क नहीं मिल पाता, जिससे देश की आर्थिक वृद्धि बाधित होती है। मादक पदार्थों की तस्करी विशेष रूप से चिंता का विषय है, क्योंकि यह युवा पीढ़ी को नशे की लत में डाल देती है। नशे के कारण युवाओं में अपराध की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, जो न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि समाज में असंतुलन का कारण भी बनती हैं। इसके परिणामस्वरूप अपराध दर में वृद्धि होती है और समाज में असुरक्षा की भावना पनपती है। इसके अलावा सोने और अन्य कीमती धातुओं की तस्करी से सरकार को राजस्व की हानि होती है। तस्करी के जरिए ये वस्तुएं अवैध रूप से आयात होती हैं, जिससे भारतीय बाजार में इनकी आपूर्ति बढ़ जाती है, इससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारत में तस्करी को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले सीमा सुरक्षा को मजबूत करना आवश्यक है। इसके लिए नई तकनीकों का उपयोग जैसे ड्रोन, कैमरा निगरानी और सेंसर आधारित सुरक्षा उपायों को लागू करना चाहिए, ताकि तस्करी की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा सके।   </p>
<p>-देवेन्द्रराज सुथार<br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Dec 2024 10:46:13 +0530</pubDate>
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                <title>ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूकता जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[आने वाली पीढ़ियों के सुखद भविष्य के लिए हमें अपने व्यवहार में ऊर्जा संरक्षण की आदतों को शामिल करना ही होगा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/awareness-about-energy-conservation-is-important/article-97967"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/5554-(12)1.png" alt=""></a><br /><p>भविष्य में उपयोग हेतु ऊर्जा के स्रोतों को बचाने के लिए विश्वभर में ऊर्जा संरक्षण की ओर विशेष ध्यान देते हुए इसके प्रतिस्थापन के लिए अन्य संसाधनों को विकसित करने की जिम्मेंदारी बढ़ गई है। ऊर्जा के अपव्यय को कम करने, ऊर्जा बचाने और इसके संरक्षण के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए ही देश में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस प्रतिवर्ष एक खास विषय के साथ कुछ लक्ष्यों तथा उद्देश्यों को मद्देनजर रखते हुए लोगों के बीच इन्हें अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए मनाया जाता है।</p>
<p>उर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा वर्ष 2001 में देश में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम लागू किया गया था। दरअसल दुनियाभर में पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है और उसी के अनुरूप ऊर्जा की खपत भी निरन्तर बढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर जिस तेजी से ऊर्जा की मांग बढ़ रही है, उससे भविष्य में परम्परागत ऊर्जा संसाधनों के नष्ट होने की आशंका बढ़ने लगी है। अगर ऐसा होता है, तो मानव सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। यही कारण है कि भविष्य में उपयोग हेतु ऊर्जा के स्रोतों को बचाने के लिए विश्वभर में ऊर्जा संरक्षण की ओर विशेष ध्यान देते हुए इसके प्रतिस्थापन के लिए अन्य संसाधनों को विकसित करने की जिम्मेंदारी बढ़ गई है। ऊर्जा के अपव्यय को कम करने, ऊर्जा बचाने और इसके संरक्षण के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए ही देश में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस प्रतिवर्ष एक खास विषय के साथ कुछ लक्ष्यों तथा उद्देश्यों को मद्देनजर रखते हुए लोगों के बीच इन्हें अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को न्यूनतम करते हुए लोगों को मानवता के सुखद भविष्य के लिए ऊर्जा की बचत के लिए प्रेरित करना ही है। विद्युत मंत्रालय द्वारा देश में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए शुरू किया गया राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान है। देश में ऊर्जा संरक्षण तथा कुशलता को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1977 में केन्द्र सरकार द्वारा पैट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन का गठन किया गया था।</p>
<p>ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा संरक्षण के महत्व के बारे में आम जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ष 2001 में एक अन्य संगठन ऊर्जा दक्षता ब्यूरो स्थापित किया गया। ब्यूरो का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति छोटे-छोटे कदम उठाकर अपने घर अथवा कार्यालय में लाईट, पंखे, हीटर, कूलर, एसी तथा बिजली के अन्य किसी भी उपकरण के अनावश्यक उपयोग पर नियंत्रण करते हुए ऊर्जा की बचत कर सकता है। अपनी पुस्तक प्रदूषण मुक्त सांसें में मैंने विस्तार से उल्लेख किया है कि किस प्रकार छोटे-छोटे स्तर पर ऊर्जा संरक्षण के लिए कदम उठाकर भी प्रत्येक नागरिक देश के राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान में बहुत बड़ी मदद दे सकता है और इस प्रकार बड़ी मात्रा में ऊर्जा संरक्षण किया जा सकता है। अगर ऐसे ही कुछ छोटे उपायों का उल्लेख किया जाए तो पुराने बल्बों के स्थान पर सीएफएल या एलईडी बल्बों का इस्तेमाल किया जाए। आई.एस.आई, चिन्हित विद्युत उपकरणों का ही उपयोग करें। यथासंभव दिन के समय सूर्य की रोशनी का अधिकतम उपयोग किया जाए और जरूरत न होने पर लाइटें, पंखे, कूलर, ए.सी, हीटर, गीजर इत्यादि विद्युत उपकरण बंद रखें। खाना पकाने के लिए बिजली के उपकरणों के बजाय सोलर कुकर और पानी गर्म करने के लिए बिजली के गीजर के बजाय सोलर वाटर हीटर के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। भवन निर्माण के समय प्लाट के चारों ओर वृक्ष लगाए जाएं तो प्रचण्ड गर्मी में भी भवन गर्म होने से बचेंगे और कूलर, एसी इत्यादि की जरूरत कम होगी। मकानों या कार्यालयों में दीवारों पर हल्के रंगों के प्रयोग से कम रोशनी वाले बल्बों से भी कमरे में पर्याप्त रोशनी हो सकती है। इससे न केवल ऊर्जा संरक्षण अभियान में सहभागी बनकर हम भविष्य के लिए ऊर्जा बचाने में मददगार बनेंगे बल्कि अपना बिजली बिल भी सीमित रख सकेंगे। सार्वजनिक स्थानों पर सौर लाइटों की व्यवस्था होनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार कार्यस्थल पर दिन के समय प्राकृतिक रोशनी में कार्य करने वाले लोगों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है और ऊर्जा की खपत में अपेक्षित कमी आती है, वहीं तेज कृत्रिम रोशनी वाले स्थानों पर काम करने से कर्मियों में तनाव, सिरदर्द, रक्तचाप, थकान जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं देखी जाती हैं, और उनकी कार्यकुशलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>इसलिए ऑफिस में यदि पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी का व्यवस्था हो तो इससे ऊर्जा संरक्षण होने के साथ-साथ कर्मचारियों की कार्यक्षमता भी बढ़ती है। प्रतिवर्ष देश में हजारों गैलन पानी बर्बाद होता है, इसलिए ऊर्जा संरक्षण की बात करते समय जल की बर्बादी को रोकने पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना भी बेहद जरूरी है। न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के समक्ष बिजली जैसी ऊर्जा की महत्वपूर्ण जरूरतें पूरी करने के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं, साथ ही पर्यावरण असंतुलन और विस्थापन जैसी गंभीर चुनौतियां भी हैं। ऐसी गंभीर समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए अक्षय ऊर्जा ऐसा बेहतरीन विकल्प है, जो पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के साथ-साथ ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने में भी कारगर साबित होगा लेकिन ऊर्जा के संसाधन गैर-अक्षय हों या अक्षय हमें अपने जीवन में ऊर्जा के महत्व को समझते हुए ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूक होना ही होगा। देश के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि ऊर्जा चाहे किसी भी रूप में हो, वह उसे व्यर्थ में नष्ट न करे। अपने और आने वाली पीढ़ियों के सुखद भविष्य के लिए हमें अपने व्यवहार में ऊर्जा संरक्षण की आदतों को शामिल करना ही होगा। </p>
<p>-योगेश कुमार गोयल<br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Dec 2024 12:10:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>भयावह  होता जा रहा पेयजल संकट  </title>
                                    <description><![CDATA[जल संकट हमारे देश की ही नहीं, समूची दुनिया की समस्या है। सुरक्षित पानी के मामले में संकट की भयावहता का आलम यह है कि आधी दुनिया साफ और सुरक्षित पानी के संकट से जूझ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/drinking-water-crisis-is-becoming-dire-%C2%A0/article-91587"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/tap-water-bisalpur.jpg" alt=""></a><br /><p>जल संकट हमारे देश की ही नहीं, समूची दुनिया की समस्या है। सुरक्षित पानी के मामले में संकट की भयावहता का आलम यह है कि आधी दुनिया साफ और सुरक्षित पानी के संकट से जूझ रही है। यही नहीं पूरी दुनिया में पानी के लिए लोग एक-दूसरे का खून बहा रहे हैं। साल 2023 इसका जीता जागता सबूत है, जिसमें पानी से जुड़े हिंसा के 347 मामले सामने आए हैं। हमारा देश भी इस मामले में पीछे नहीं है, जहां इस दौरान हिंसा के 25 मामले सामने आए। जबकि 2022 में इस तरह के देश में कुल 10 मामले सामने आए थे। यह प्रमाण है कि 2022 की तुलना में पानी के मामले में हिंसा में 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। इन मामलों में कई लोग मारे भी गए हैं। दरअसल पानी से सम्बन्धित हिंसा के मामलों में बांधों, पाइप लाइनों, कुओं, उपचार संयंत्रों और संयंत्रों पर कार्यरत कामगारों पर हमले प्रमुख हैं। हकीकत यह है कि हिंसा के इन मामलों में सिंचाई के पानी के संघर्ष ज्यादा चर्चा में रहे हैं। </p>
<p>इनके अलावा सूखे और आपसी विवादों ने इन संघर्षों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। वैश्विक स्तर पर दुनियाभर में मध्य पूर्व में इनमें अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इनमें खासतौर पर लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व, सब सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देश शीर्ष पर हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन की माने जिसका निष्कर्ष साइन्स पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, के अनुसार आज दुनिया में 4.4 अरब लोगों के पास सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। यह आंकड़ा पहले से जारी संख्या से भी ज्यादा है, जो भयावह खतरे का संकेत है। जबकि अभी तक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया की तकरीबन 26 फीसदी आबादी स्वच्छ पेय जल संकट का सामना कर रही थी। उसके अनुसार आने वाले 27 वर्षों यानी 2050 तक दुनिया की 1.7 से 2.4 अरब शहरी आबादी को पेय जल संकट का सामना करने का अंदेशा जाहिर किया गया था। इससे सबसे ज्यादा भारत के प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई थी। यूनेस्को की मानें तो हालात इतने गंभीर हैं कि इस वैश्विक संकट के नियंत्रण से बाहर जाने से पहले मजबूत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तत्काल स्थापित करने की जरूरत है। विश्व जल विकास रिपोर्ट 2023 के अनुसार 2030 तक दुनिया के सभी लोगों को स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की उपलब्धता का लक्ष्य काफी दूर है। असलियत यह है कि बीते 40 वर्षों में दुनिया में जल के उपयोग की दर प्रति वर्ष एक फीसदी बढ़ी है। दुनिया की आबादी बढ़ने और सामाजिक  -आर्थिक बदलावों को देखते हुए इसके वर्ष 2050 तक इसी तरह बढ़ने के आसार हैं। यह एक गंभीर चुनौती है।   सच्चाई यह भी है कि पानी में दूषित पदार्थों की मौजूदगी और बुनियादी ढांचे में कमी के चलते दक्षिण एशिया, उप सहारा अफ्रीका, पूर्वी एशिया और कई अफ्रीकी देशों के लगभग 690 मिलियन से अधिक लोग ऐसी जगहों पर रहने को विवश हैं जहां पानी पहुंचाने की व्यवस्था ही नहीं है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 1.96 करोड़ आवासों में रहने वाले लोगों की फ्लोराइड और आर्सेनिक युक्त पानी पीना नियति बन गया है। पानी से होने वाली बीमारियों पर हर साल करीब 42 अरब रुपये का आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।  </p>
<p>जहां तक एशिया का सवाल है, एशिया की तकरीबन 80 फीसदी खासकर पूर्वोत्तर चीन, भारत और पाकिस्तान की आबादी भीषण पेयजल संकट से जूझ रही है। इस संकट से जूझने वाली वैश्विक शहरी आबादी वर्ष 2016 के 93.3 करोड़ से बढ़कर 2050 में 1.7 से 2.4 अरब होने की आशंका है,  जिसकी सबसे ज्यादा मार भारत पर पड़ेगी। यदि इस वैश्विक अनिश्चितता को खत्म नहीं किया गया और इसका शीघ्र समाधान नहीं निकाला गया तो निश्चित ही इस संकट का सामना करना बेहद मुश्किल होगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस भी कहते हैं कि पेयजल मानवता के लिए रक्त की तरह है। इसलिए जल की बर्बादी रोकना और संचय बेहद जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि जलवायु परिवर्तन और मौसम के बदलाव के चलते दुनिया में जल सुरक्षा के खतरे दिनो-दिन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इससे दुनिया के पांच अरब लोगों पर यह संकट भयावह रूप अख्तियार करता जा रहा है। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप के कारण पानी की यह विकट स्थिति होती जा रही है। कारण लोगों को अभी भी मौसम से जुड़े पर्यावरणीय खतरों की कोई जानकारी नहीं है। यही नहीं वे जलवायु परिवर्तन और जल सुरक्षा के बीच के सम्बन्ध को जानते तक नहीं हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अगले 20 वर्ष में यह संकट भयावह रूप अख्तियार कर लेगा और लोगों के लिए पानी गंभीर खतरा बन जाएगा। दरअसल सबसे बड़ी जरूरत पर्यावरणीय मुद्दों को ठोस और प्रासंगिक बनाने की है तभी कुछ बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। साथ ही यह भी गौर करने वाली बात है कि दुनिया में बहुतेरे ऐसे देश हैं, जहां के लोगों को साफ  पानी के लिए लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है। हमारे यहां भी कुछ राज्य इस स्थिति का सामना करने को विवश हैं। और क्या सबसे ज्यादा साफ पानी दक्षिणी यूरोप के लोगों को उपलब्ध है। क्या भारत इस दिशा में ईमानदारी से सुधार कर पाएगा और उस स्तर तक पहुंचने में कामयाब हो पाएगा। यदि ऐसा हो सका तो यह दुनिया का आठवां आश्चर्य और एक महान उपलब्धि होगी। </p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Sep 2024 10:54:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>भारत की भाषिक सांस्कृतिकी और हिन्दी की तासीर</title>
                                    <description><![CDATA[भाषा किसी भी राष्ट्र और संस्कृति की धुरी कहलाती है तथा अस्तित्व व अस्मिता का महत्वपूर्ण अभिधान भी भाषा ही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/linguistic-culture-of-india-and-style-of-hindi/article-90599"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/hindi.png" alt=""></a><br /><p>भाषा किसी भी राष्ट्र और संस्कृति की धुरी कहलाती है तथा अस्तित्व व अस्मिता का महत्वपूर्ण अभिधान भी भाषा ही है। यही उपादान एक व्यक्ति का दूसरे से संपर्क साधने की भूमिका का निर्वहन करता है। साथ ही मनुष्य के चिंतन, विचार-विनिमय एवं मनोगत भावों के प्रकटीकरण में भी सहायक होता है। </p>
<p>उसके बिना न तो अभिव्यक्ति संभव है, ना ही वैचारिक विमर्श की अन्य कोई प्रक्रिया। इन सभी परिभाषाओं का निहितार्थ यह है कि भाषा ही एकमात्र राष्ट्रीय धरोहर है। किसी भी भाषा के माध्यम से उस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति का अंदाजा सहज ही हो जाता है। इसी सांस्कृतिक मानदंड के साथ यदि दुनिया की महत्वपूर्ण संप्रेषणशील भाषाओं पर दृष्टि डाली जाए, तो हिंदी का उनमें अग्रणी स्थान है। दरअसल सभी विश्व भाषाएं, हिन्दी से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। </p>
<p>शायद इसीलिए दिनकर ने कहा है कि भारतीय संस्कृति समुद्र की तरह है, जिसमें अनेक धाराएं आकर विलीन होती रही हैं। इन अनेक धाराओं में एकत्व का निर्वाह करती हुई हमारी भाषा संपूर्ण देश को एकत्व में बांधने का महत्वपूर्ण काम कर रही है। हिंदी भाषा का उद्भव और विकास लगभग ग्यारह सौ वर्षों की यात्रा को समेटे हुए है। किंतु आदिकाल की हिंदी भाषा,  मध्यकाल की हिंदी भाषा और वर्तमान हिंदी भाषा के स्वरूप में मूलभूत अंतर है। जब हम हिंदी अनुप्रयोग की चर्चा करते हैं तो वहां अवधी, ब्रज, राजस्थानी का जिक्र नहीं करते, वहां खड़ी बोली हिंदी के मानक रूप की ही चर्चा करते हैं। इसका कारण यह है कि साहित्य की भाषा या बोलचाल की भाषा तकनीक की भाषा नहीं हो सकती। अनुप्रयोग की भाषा अवधारणात्मक शब्दों और पारिभाषिक शब्दों पर निर्भर करती है। वे शब्द एकार्थी, एकरूपी होते हैं। इन शब्दों में स्रोत शब्दों की अवधारणा को विधिवत उपस्थित किया जाता है। इन शब्दों के निर्माण में अपने कुछ नियम होते हैं। ये शब्द अधिकांशत: कृत्रिम या बनाए गए,  गढ़े गए होते हैं। इसलिए कठिन प्रतीत होते हैं, कठिन होते नहीं।</p>
<p>वैश्विक समाज की भाषा की क्या विशेषताएं हैं, यह विकास के किन रास्तों से गुजर कर आज के मुकाम तक पहुंची है,  इस पर बहुत चिंतन हुआ है, निरंतर हो भी रहा है। इस चिंतन में जो सर्वमान्य तथ्य है, वह यह है कि भाषा का स्वरूप सदा-सर्वदा परिवर्तित-परिवर्द्धित होता रहा है। पिछले कुछ दशकों में भाषा का स्वरूप तेजी से बदला है तथा आगामी दशकों में अनेक बार और आंतरिक प्रभावों से इसका स्वरूप बदलने की पुरजोर संभावना है। जनमानस का भाषा के सरलीकरण की ओर झुकाव बढ़ रहा है। आजकल हर भाषा को जनभाषा बनाने की कवायद को लेकर भाषा के मूल रूप से खिलवाड़ किया जा रहा है। ये बदलाव भाषा के लचीलेपन के आग्रह का कारण बताकर अनवरत किए जा रहे हैं। वर्तमान में अगर कोई शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी प्रयोग में लेता है तो उसे क्लिष्ट कहकर,  उसके भाषा कौशल का उपहास उड़ाया जाता है। बदलाव के लिए प्रयुक्त सरलीकरण के इन विकल्पों के सुझावों के स्थान पर भाषा को सुसंस्कृत भी तो किया जा सकता है फिर हमारा ध्यान उसके विकृत रूप को अपनाने पर ही अधिक क्यों है। क्या सरलीकरण की ओर उन्मुख होकर ही भाषा का संवर्धन,  संरक्षण किया जा सकता है।<br />संपर्क भाषा के रूप में जब हिंदी शिक्षण,  विशेषकर एशिया के देशों के संबंध में बात करते हैं तो वहां व्यापारिक भाषा के रूप में हिंदी का चलन काफी पहले से हो रहा है। वहां पर व्याकरण,  बोलचाल की हिंदी का शिक्षण,  द्विभाषिक कोश के अध्ययन तथा अनुवाद के माध्यम से हिंदी शिक्षण को प्रभावी बनाया जा सकता है। व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण का प्रयोग, पत्र-पत्रिकाओं तथा सांस्कृतिक महत्व के अनेक कार्यक्रम,  रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न भाषाई समूहों का छात्र स्तर पर आदान-प्रदान भाषाई शिक्षण के लिए हितकर होगा। यह सुखद है कि विश्व की प्रमुख संप्रेषणीय भाषा के रूप में हिंदी उभर रही है। अत: हिंदी के शिक्षण को गति देने के लिए बोलचाल की हिंदी एवं संस्कृति और भाषा के गठबंधन को पाठ्यक्रम में केन्द्रीय विषय के रूप में रखना होगा। भाषा सहज, सरल और तरल है और यह हिन्दी के गुणधर्म के सबसे निकट है। हिन्दी मन के पर्दे पर आत्मीय दस्तक देती है, पर यह आत्मीयता उसे बरतने के ढब में है,  और यह ढब और सलीका हिन्दी को उसकी बोलियां प्रदान करती हैं। </p>
<p><strong>-डॉ. विमलेश शर्मा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Sep 2024 10:57:57 +0530</pubDate>
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