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                <title>scientists - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>वैज्ञानिकों ने खोजा हीरे बनाने का नया तरीका, न तो गर्मी और न ही दबाव की आवश्यकता </title>
                                    <description><![CDATA[टोक्यो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि एक विशेष कार्बन-आधारित पदार्थ पर इलेक्ट्रॉनों की धारा डाली जाए, तो उसे सीधे हीरे में बदला जा सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/scientists-discovered-a-new-way-to-make-diamonds-that-requires/article-131020"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/6622-copy163.jpg" alt=""></a><br /><p>टोक्यो। वैज्ञानिकों ने हीरे बनाने का एक नया तरीका खोज निकाला है, जिसमें न तो गर्मी की ज़रूरत है और न ही दबाव की। आमतौर पर हीरे धरती के भीतर अत्यधिक गर्मी और दबाव के कारण बनते हैं या फिर प्रयोगशालाओं में इन परिस्थितियों की नकल कर के बनाए जाते हैं, लेकिन जापान के शोधकर्ताओं की एक टीम ने हीरे बनाने का एक बिल्कुल अलग तरीका विकसित किया है, जिसमें न तो अत्यधिक तापमान चाहिए और न ही भारी दबाव की आवश्यकता है। </p>
<p>टोक्यो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि एक विशेष कार्बन-आधारित पदार्थ पर इलेक्ट्रॉनों की धारा डाली जाए, तो उसे सीधे हीरे में बदला जा सकता है। यह प्रक्रिया कमरे के तापमान और कम दबाव पर होती है, जो कृत्रिम हीरे बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया को पूरी तरह बदल सकती है।रोचक बात यह है कि यह तरीका संवेदनशील जैविक पदार्थों की भी रक्षा करता है, जिससे जीवविज्ञान और पदार्थ विज्ञान (मटेरियल साइंस) में शोध के लिए नए अवसर खुल सकते हैं। यह अध्ययन Science नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।</p>
<p>पारंपरिक रूप से कृत्रिम हीरे दो मुख्य तरीकों से बनाए जाते हैं। पहला तरीके में उच्च तापमान और दबाव के ज़रिए कार्बन को क्रिस्टल रूप में बदलना है। दूसरे तरीके में  केमिकल वेपर डिपोज़िशन, जिसमें गैस से हीरे की परत दर परत संरचना बनाई जाती है। दोनों तरीके ऊर्जा-गहन होते हैं और इन्हें नियंत्रित करना भी कठिन होता है। नया जापानी तरीका इन सभी सीमाओं को दूर कर सकता है, क्योंकि इसमें न तो भारी ऊर्जा की आवश्यकता है और न ही महंगे उपकरणों की आवश्यकता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Oct 2025 10:15:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिकों ने बनाया दुनिया का पहला कैमरा जो शरीर के अंदर झांक लेगा, डॉक्टरों को शरीर के अंदर छिपी बीमारियों को देखने में मिलेगी मदद </title>
                                    <description><![CDATA[तकनीक के मामले में दुनिया काफी तरक्की कर चुकी है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/scientists-made-the-worlds-first-camera-which-will-peek-inside/article-127643"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/111-(6).png" alt=""></a><br /><p>बीजिंग। तकनीक के मामले में दुनिया काफी तरक्की कर चुकी है। ऐसे-ऐसे डिवाइस बन रहे हैं, जिनके बारे में जानकर लोग चौंक रहे हैं। अब चीनी रिसर्चर्स ने नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी की मदद से एक नया डिटेक्टर बनाया है, जिसे क्रिस्टल कैमरा कहा जा रहा है। यह कैमरा पेरोव्स्काइट क्रिस्टल से बना है, जो गामा किरणों को तेजी से कैच करता है। इससे स्पैक्ट स्कैन जैसी तकनीकों में सुधार होगा। यह कैमरा इंसानी शरीर के अंदर झांक सकता है, जिससे डॉक्टरों को हार्ट की एक्टिविटी, रक्तचाप और शरीर के अंदर छिपी बीमारियों को देखने में मदद मिलेगी। चलिए, जान लेते हैं कि यह कैसे काम करता है और जो यह काम करेगा, वह अब तक भी होता था, फिर भी इसे बनाने की क्या जरूरत थी ?</p>
<p><strong>कमजोर सिग्नल को भी पकड़ता है :</strong></p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक, नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी और चीन की सूजौ यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने यह कैमरा बनाया है। चीन द्वारा विकसित की गई नई तकनीक से से मरीजों को कम रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा। रिसर्चर मकूर्री कनात्जिदिस और यिहुई हे ने इस क्रिस्टल को विकसित किया और इसे एक पिक्सलेटेड सेंसर में बदला, जैसे स्मार्टफोन कैमरे में पिक्सल होते हैं। यह गामा रेज की अलग-अलग ऊर्जा को आसानी से डिटेक्ट कर लेता है, कमजोर सिग्नल को भी पकड़ता है। इससे मेडिकल रेडियोट्रेसर से साफ और उससे जल्दी ही तस्वीरें मिल जाती हैं।</p>
<p><strong>क्यों पड़ी इस क्रिस्टल कैमरे की जरूरत ?</strong></p>
<p>जो पुराने स्पैक्ट स्कैन हैं, उनमें एक रेडियोट्रेसर को मरीज के शरीर में डाला जाता है, जो गामा रेज छोड़ता है। यह रेज डिटेक्टर पकड़ता है और कंप्यूटर पर 3डी तस्वीर में बदल देता है। अभी के डिटेक्टर कैडमियम जिंक टेल्यूराइड या सोडियम आयोडाइड से बनते हैं। सीजेटी बहुत महंगा है और इसे बनाना मुश्किल है। दूसरी ओर सोडियम आयोडाइड सस्ता है, लेकिन इसकी तस्वीरें कम साफ होती हैं। ये दिखने में ठीक वैसी होती हैं, जैसे धुंधले शीशे से देखना।</p>
<p><strong>सिग्नल बिना नुकसान के पकड़ेगा :</strong></p>
<p>रिसर्चर्स द्वारा बनाए गए इस नए क्रिस्टल कैमरा से मरीजों को फायदा होगा। उन्हें कम रेडिएशन झेलनी होगी, इसके अलावा यह डिटेक्टर स्थिर है और लगभग सारा सिग्नल बिना नुकसान के पकड़ लेता है। इससे डॉक्टरों को सही-सही इलाज करने में मदद मिलेगी। यह पुराने डिटेक्टरों के मुकाबले सस्ता है, जिससे छोटे अस्पताल और क्लिनिक भी इसे खरीद सकेंगे। इससे ज्यादा मरीजों को बेहतर स्कैन की सुविधा मिलेगी।</p>
<p><strong>जल्द बाजार में आएगी यह तकनीक :</strong></p>
<p>नॉर्थ वेस्टर्न की कंपनी एक्टिनिया इंक जल्द ही इस तकनीक को बाजार में लाने की कोशिश कर रही है। रिसर्चर्स का कहना है कि यह तकनीक न्यूक्लियर मेडिसिन को बदल सकती है। इससे न केवल स्कैन बेहतर होंगे, बल्कि ज्यादा लोगों तक यह सुविधा पहुंचेगी। इसे और बेहतर करने और बड़े पैमाने पर बनाने की योजना है, ताकि यह तकनीक दुनिया भर के अस्पतालों में पहुंच सके। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Sep 2025 11:16:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2 अगस्त 2027 को होगा ग्रहण : वैज्ञानिकों का दावा- अगले 100 वर्ष तक नहीं होगी ऐसी खगोलीय घटना, साल 2114 तक नहीं देख पाएंगे ऐसा नजारा</title>
                                    <description><![CDATA[अगर आप सदी के सबसे लंबे सूर्यग्रहण का अनुभव करना चाहते हैं तो तैयार हो जाइए। साल 2027 में एक दुर्लभ पूर्ण सूर्यग्रहण होने जा रहा है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/eclipse-scientists-will-be-claimed-on-august-2-2027-such/article-121281"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news-(10)5.png" alt=""></a><br /><p>वॉशिंगटन। अगर आप सदी के सबसे लंबे सूर्यग्रहण का अनुभव करना चाहते हैं तो तैयार हो जाइए। साल 2027 में एक दुर्लभ पूर्ण सूर्यग्रहण होने जा रहा है। इसे सदी की होने वाली सबसे महत्वपूर्ण खगोलीय घटनाओं में से एक बताया जा रहा है। खगोलविदों के अनुसार 2 अगस्त 2027 को आसमान में पूर्ण सूर्यग्रहण का नजारा देखने को मिलेगा। यह एक असामान्य सूर्यग्रहण होगा और इस दौरान दुनिया के कुछ हिस्सों में दिन में ही अंधेरा छा जाएगा। यह सूर्यग्रहण अपनी लंबी अवधि के चलते बहुत खास हो जाता है, जो खगोलविदों को ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने का मौका देगा। हालांकि, पूर्ण सूर्यग्रहण हर साल या फिर दूसरे साल में होता है, और सभी पूर्ण सूर्यग्रहण आकर्षक होते हैं लेकिन इतने लंबे समय तक दुनिया भर में इतने सारे लोगों को दिखाने देने के चलते यह बहुत खास हो जाता है।  वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी घटना 100 वर्षों तक नहीं होने वाली है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2 अगस्त 2027 को लगने वाले पूर्ण सूर्यग्रहण 6 मिनट 21 सेकंड का होगा। यानी इतने समय तक चंद्रमा इतने समय तक सूर्य के कोरोना को पूरी तरह ढंक लेगा और आसमान में अंधेरा फैल जाएगा।ं</p>
<p><br /><strong>खगोल वैज्ञानिकों के लिए रहेगा विशेष</strong><br />अधिकांश पूर्ण सूर्यग्रहण अक्सर तीन मिनट से भी कम समय के होते हैं और सूर्य के कोरोना की संक्षिप्त झलक की देते हैं। ऐसे में अगस्त 2027 में लगने वाला पूर्ण सूर्यग्रहण खगोल वैज्ञानिकों के लिए भी बहुत खास है। अंधेरे की यह लंबी अवधि उन्हें अंतरिक्ष के दुर्लभ अवलोकन का मौका देगी। स्पेस डॉट कॉम के अनुसार, यह 1991 से 2114 के बीच धरती से दिखाई देने वाला सबसे लंबा पूर्ण सूर्यग्रहण होगा।</p>
<p><strong>इतना लंबा सूर्यग्रहण क्यों हो रहा?</strong><br />इसे समझने कारणों को समझना होगा। सूर्यग्रहण उस खगोलीय घटना को कहते हैं, जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी क्रमश: एक सीध में होते हैं। 2 अगस्त 2027 को पृथ्वी सूर्य से अपने सबसे दूर बिंदू पर होगी। इसके चलते सूर्य आकाश में छोटा दिखाई देगा। वहीं, चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकटतम बिंदु के करीब होगा,जिससे वह बड़ा दिखाई देगा। इस संयोजन के चलते चंद्रमा सूर्य के प्रकाश को अधिक समय तक रोकने में सफल होगा, जिससे ग्रहण की अवधि लंबी हो जाएगी।</p>
<p><strong>पूर्ण सूर्यग्रहण भारत में दिखाई देगा या नहीं?</strong><br />सूर्यग्रहण अटलांटिक महासागर के ऊपर से शुरू होगा और इसकी लगभग 258 किलोमीटर चौड़ी छाया पड़ेगी। पूर्ण सूर्यग्रहण स्पेन, मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया और मध्य मिस्र के कुछ हिस्सों से होते हुए गुजरेगा। यह सूडान, यमन, सऊदी अरब और सोमालिया के क्षेत्र को भी कवर करेगा। आखिर में यह हिंद महासागर के ऊपर से निकलकर चागोस द्वीपसमूह से गुजरेगा। इसे देखने की इच्छा रखने वालों के लिए लीबिया और मिस्र के क्षेत्रों को अच्छा बताया गया है। जैसा कि इसके पथ से बता चलता है कि यह भारत में नहीं दिखाई देगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 22 Jul 2025 14:05:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या यह कैंसर का अंत हो सकता है ? वैज्ञानिकों ने विकसित की क्रांतिकारी mRNA वैक्सीन </title>
                                    <description><![CDATA[फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में नई उपलब्धि हासिल की है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/can-it-end-the-end-of-cancer-scientists-developed-revolutionary/article-121165"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news-(8)5.png" alt=""></a><br /><p>तल्हासी। फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में नई उपलब्धि हासिल की है। इस अध्ययन से यह पता चलता है कि इम्यूनोथेरेपी दवाओं के साथ संयुक्त mRNA वैक्सीन चूहों में कैंसर से लड़ने की प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा देती है।</p>
<p>कैंसर अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण प्रगति की ओर फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक प्रायोगिक mRNA वैक्सीन विकसित की है, जो ट्यूमर के विरुद्ध शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाती है। नेचर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में हुए इस अध्ययन से पता चलता है कि इस वैक्सीन को, इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर नामक मानक इम्यूनोथेरेपी दवाओं के साथ मिलाने पर, चूहों में एक मज़बूत ट्यूमर-रोधी प्रभाव उत्पन्न हुआ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Jul 2025 11:59:49 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>ऑस्ट्रेलिया में वैज्ञानिकों ने बनाया नया सिंथेटिक प्रोटीन : एआई की ली मदद, बैक्टीरिया को मारने में है सक्षम  </title>
                                    <description><![CDATA[इस उपलब्धि से ऑस्ट्रेलियाई टीम अधिक किफायती दवा बनाने और बीमारियों के निदान के लिए अनेक प्रकार के प्रोटीन तेजी से विकसित करने वाले अमेरिका और चीन जैसे देशों की कतार में आ गयी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/scientists-in-australia-made-a-new-synthetic-protein-ais-help/article-120051"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/scientist.png" alt=""></a><br /><p>कैनबरा। ऑस्ट्रेलिया में वैज्ञानिकों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से एक सिंथेटिक प्रोटीन बनाया है, जो ई. कोलाई जैसे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को मारने में सक्षम है। मेलबर्न स्थित मोनाश विश्वविद्यालय ने कहा कि यह पहली बार है, जब किसी ऑस्ट्रेलियाई टीम ने एआई का प्रयोग कर जैविक प्रोटीन बनाया है। इस उपलब्धि से ऑस्ट्रेलियाई टीम अधिक किफायती दवा बनाने और बीमारियों के निदान के लिए अनेक प्रकार के प्रोटीन तेजी से विकसित करने वाले अमेरिका और चीन जैसे देशों की कतार में आ गयी है।</p>
<p>मोनाश विश्वविद्यालय के एक बयान के मुताबिक टीम ने उन्नत एआई-संचालित उपकरणों का उपयोग करके एआई प्रोटीन डिजाइन प्लेटफ़ॉर्म विकसित किया है।  इसमें हाल ही में विकसित सॉफ़्टवेयर भी शामिल है, जो दवा और चिकित्सकीय प्रयोगों के लिए प्रोटीन बनाने में सक्षम है।<br />इस शोध दल के प्रमुख मोनाश विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र डैनियल फॉक्स ने </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
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                <pubDate>Thu, 10 Jul 2025 14:53:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिकों ने खोजी ‘सुपर अर्थ’ : हमारी पृथ्वी से दोगुना बड़ी और 4 गुना ज्यादा भारी, नया ग्रह धरती से करीब 154 प्रकाश वर्ष दूर</title>
                                    <description><![CDATA[ इसकी उम्र 7.2 अरब साल हो सकती है। वहीं इसे अपने सोलर सिस्टम के तारे का चक्कर पूरा करने में करीब 4 दिन लगते हैं। अनुमान है कि यहां का एक्सपेक्टेड टेम्प्रेचर 568.1 केल्विन है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/scientists-have-discovered-super-earth-twice-as-big-and-4/article-119805"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/8888882roer-(2).png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। मोरक्को के वैज्ञानिकों ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की सैटेलाइट की मदद से धरती के जैसे एक ‘सुपर अर्थ’ की खोज की है। नया ग्रह धरती से करीब 154 प्रकाश वर्ष दूर है। वैज्ञानिकों ने इसे टीओआई-1846 बी नाम दिया है। यह आकार में भी पृथ्वी से दोगुना बड़ा और चार गुना ज्यादा भारी है।  वैज्ञानिकों ने कहा कि इस ग्रह पर पानी मिलने की संभावना है। उन्होंने बताया है कि इसकी उम्र 7.2 अरब साल हो सकती है। वहीं इसे अपने सोलर सिस्टम के तारे का चक्कर पूरा करने में करीब 4 दिन लगते हैं। अनुमान है कि यहां का एक्सपेक्टेड टेम्प्रेचर 568.1 केल्विन है। </p>
<p><strong>रेडियल वेलोसिटी से पता लगाएंगे पानी है या नहीं</strong><br />वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सुपर अर्थ पर भरपूर पानी हो सकता है। हालांकि, इसकी सटीक जानकारी के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है। वैज्ञानिकों ने बताया कि टीओआई-1846 बी की संरचना जानने के लिए रेडियल वेलोसिटी का इस्तेमाल होगा। रेडियल वेलोसिटी के जरिए बेहतर तरीके से यह पता लगाया जा सकेगा कि ग्रह पर पानी मौजूद है या नहीं है।</p>
<p><strong>इस साल मिली दूसरी सुपर अर्थ</strong><br />इसी साल की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने एचडी 20794 डी नाम के एक सुपर अर्थ की खोज की थी। यह पृथ्वी से छह गुना ज्यादा भारी है। इस ग्रह की सतह पर भी पानी होने का अनुमान है। यह धरती से 20 प्रकाश वर्ष दूर है। यह एक तारे की परिक्रमा करता है। हालांकि,पृथ्वी की तरह इसका आॅर्बिट गोल नहीं है। इसलिए ऐसा कहना मुश्किल है कि इस पर जीवन की संभावना हो सकती है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 08 Jul 2025 12:52:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नई खोज : इंडोनेशिया में 1,40,000 वर्ष पुराने मानव जीवाश्म मिले, पशुओं और अन्य जीवों के भी छह हजार से अधिक जीवाश्म मिले </title>
                                    <description><![CDATA[ इंडोनेशिया की मदुरा खाड़ी में अत्यधिक प्राचीन जीवाश्म मिलने से प्राचीन मानव के जीवन के बारे में नई जानकारियां हासिल होने की उम्मीद बंधी है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/scientists-got-a-big-success-in-the-excavation-of-sea/article-115561"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/news-(6)15.png" alt=""></a><br /><p>जकार्ता। इंडोनेशिया की मदुरा खाड़ी में अत्यधिक प्राचीन जीवाश्म मिलने से प्राचीन मानव के जीवन के बारे में नई जानकारियां हासिल होने की उम्मीद बंधी है। ये प्राचीन मानव होमो इरेक्टस (सीधे तन कर चलने वाले मनुष्य) थे। वे विकास की प्रक्रिया में बंदरों से विकसित ही हुए थे और आधुनिक मानव के रूप में सीधे तन कर चलना अभी सीखा ही था। उनके बारे में नए शोध इन जीवाश्मों के मिलने से किए जा सकते हैं। </p>
<p><strong>अच्छी पारिस्थितिकी में थे होमो इरेक्टस</strong><br />ये जीवाश्म 1,40,000 (एक लाख 40 हजार) साल पुराने हैं। इनसे पता चलता है कि इंडोनेशिया के इस भाग में होमो इरेक्टस अच्छी पारिस्थितिकी में थे। शोधकर्ताओं को ये जीवाश्म समुद्र की सतह से भी नीचे मिले हैं। वहां मनुष्य के अलावा पशुओं और अन्य जीवों के भी छह हजार से अधिक जीवाश्म मिले हैं। </p>
<p><strong>दक्षिण पूर्व एशिया मानव के विकास में महत्वपूर्ण रहा</strong><br />शोधकर्ताओं ने बताया कि दक्षिण पूर्व एशिया प्रारम्भिक मानव के विकास और सभ्य जीवन की ओर उनके अग्रसर होने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा है। उल्लेखनीय है कि सीधे खड़े होकर चलने वाले प्रारम्भिक मनुष्यों के जीवाश्म इस क्षेत्र में मिलते रहे हैं। इसीलिए उन्हें जावा मानव नाम दिया गया था। </p>
<p><strong>समुद्र का जल स्तर बढ़ने से डूबा भूभाग</strong><br />शोधकर्ताओं ने बताया कि हजारों साल पहले समुद्र का जल स्तर किसी कारण से ऊपर उठने के कारण  इस क्षेत्र का विशाल भूभाग समुद्र में डूब गया और सभ्यता उसमें नष्ट गई। इन जीवाश्मों से कई नई जानकारियां मिल सकती हैं और मानव सभ्यता के विकास के बारे में नई बातें सामने आ सकती हैं। </p>
<p><strong>लाखों क्यूबिक मीटर गाद हटाने के बाद मिले जीवाश्म</strong><br />ये जीवाश्म होमो इरेक्टस के बारे में बहुत कुछ बताते हैं। ये जीवाश्म जावा और मदुरा द्वीपों के बीच में मिले हैं। इन्हें लाखों क्यूबिक मीटर गाद को वहां से हटाने के बाद हासिल किया गया है। इस क्षेत्र को सुंडालैंड कहते हैं। इन जीवाश्मों पर किए गए शोध से पता चलता है कि यहां अनेक प्रजातियों की मछलियां, कछुए, शार्क मछलियां,गैंडे, हिप्पोपोटामस और हाथी मिलते थे। उनका होमो इरेक्टस(सीधे तन कर चलने वाले) मनुष्यों से सम्बंध था। तब होमो इरेक्टस उनका शिकार करते थे। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 May 2025 19:23:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सरस्वती नदी के पुनरुद्धार को लेकर डेनमार्क से सकारात्मक बातचीत, बैठक में वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने लिया भाग</title>
                                    <description><![CDATA[सरस्वती नदी के पुनरुद्धार को लेकर राजस्थान सरकार और डेनमार्क दूतावास के प्रतिनिधियों के बीच अहम बैठक आयोजित की गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/scientists-and-officials-participated-in-a-positive-conversation-meeting-with/article-112570"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/jal-sansadhan-department.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सरस्वती नदी के पुनरुद्धार को लेकर राजस्थान सरकार और डेनमार्क दूतावास के प्रतिनिधियों के बीच अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव अभय कुमार ने की। बैठक में डेनमार्क ने सरस्वती नदी के पैलियो चैनल के पुनरुद्धार में पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। डेनमार्क प्रतिनिधिमंडल ने जल शोधन और अन्य जल परियोजनाओं में भी सहयोग की प्रतिबद्धता जताई। यह बैठक राइजिंग राजस्थान 2022 के दौरान डेनमार्क के साथ हुए समझौता ज्ञापन के संदर्भ में आयोजित की गई थी।</p>
<p>बैठक में काजरी (जोधपुर) के वैज्ञानिकों और जल संसाधन विभाग (WRD) के अधिकारियों ने भी भाग लिया। इस दौरान सरस्वती पुराप्रवाह को लेकर विस्तृत चर्चा हुई और डेनमार्क की विशेषज्ञता का लाभ उठाने पर सहमति बनी। सरकार और डेनमार्क के बीच इस सहयोग से सरस्वती नदी के पुनरुद्धार के प्रयासों को मजबूती मिलने की उम्मीद है, जिससे क्षेत्र के जल संसाधनों का संरक्षण और उपयोग बेहतर तरीके से किया जा सकेगा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Apr 2025 18:12:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Noble Prize 2023: तीन वैज्ञानिकों को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार</title>
                                    <description><![CDATA[साल बढ़ाकर 1.1 करोड़ स्वीडिश क्राउन करीब 10 लाख अमेरिकी डॉलर कर दी गई है। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज की ओर से प्रदान किया जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/noble-prize-2023-nobel-prize-for-physics-to-three-scientists/article-58667"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/noble.png" alt=""></a><br /><p>स्टॉकहोम।  भौतिकी में 2023 का नोबेल पुरस्कार पियरे एगोस्टिनी, फेरेंक क्रॉस्ज और ऐनी एल'हुइलियर को प्रदान किया गया है। पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता का अध्ययन करने के तरीके विकसित करने के लिए इन वैज्ञानिकों को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया है।नोबेल समिति ने मंगलवार को यह जानकारी दी।</p>
<p>नोबेल समिति ने एक्स पर कहा, रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने पदार्थ में इलेक्ट्रॉन गतिशीलता के अध्ययन के लिए प्रकाश के एटोसेकंड पल्स उत्पन्न करने वाले प्रयोगात्मक तरीकों के लिए पियरे एगोस्टिनी, फेरेंक क्रूज और ऐनी एल'हुइलियर को भौतिकी में 2023 का नोबेल पुरस्कार देने का फैसला किया है।</p>
<p>पदार्थ में इलेक्ट्रॉन गतिशीलता के अध्ययन के लिए प्रकाश के एटोसेकंड पल्स उत्पन्न करने के प्रायोगिक तरीकों के लिए  यह पुरस्कार इन वैज्ञानिकों को दिया जाएगा। इस पुरस्कार के तहत दी जाने वाली राशि इस साल बढ़ाकर 1.1 करोड़ स्वीडिश क्राउन करीब 10 लाख अमेरिकी डॉलर कर दी गई है। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज की ओर से प्रदान किया जाता है।</p>
<p>यह इस सप्ताह यह दूसरा नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया है। चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार काटालिन कारिको और ड्रयू वीसमैन को एमआरएनए कोविड-19 टीकों के विकास में योगदान के लिए देने की घोषणा सोमवार को की गई थी। हंगरी के वैज्ञानिक कैटालिन कारिको और अमेरिकी सहयोगी ड्रयू वीसमैन को एमआरएनए मॉलीक्यूल की खोज के लिए पुरस्कार जीता है।</p>
<p>वर्ष 1901 से अब तक भौतिकी में 116 नोबेल पुरस्कार दिए गए हैं।इनमें चार महिलाएं शामिल हैं। वर्ष 1903 में मैरी क्यूरी, 1963 में मारिया गोपेर्ट मेयर,  2018 में डोना स्ट्रिकलैंड और 2020 में आंद्रिया घेज को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया  था।</p>
<p>नोबेल पुरस्कार डायनामाइट के आविष्कारक और व्यवसायी अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के तहत स्थापित पुरस्कार है। यह पुरस्कार विज्ञान, साहित्य और शांति लाने के लिए हासिल की गई उपलब्धियों के लिए 1901 से निरंतर प्रदान किए जा रहे हैं। यह दुनिया भर में वैज्ञानिकों के लिए सर्वोच्च सम्मान  है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Oct 2023 18:18:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिकों को डीजीपी डिस्क से किया सम्मानित</title>
                                    <description><![CDATA[डॉ. राजेश सिंह के नेतृत्व में एफएसएल जयपुर के डीएनए प्रोफाइलिंग यूनिट की क्यूआरटी टीम ने 12 वर्ष तक के अबोध बालक-बालिकाओं के साथ जघन्य दुष्कर्म प्रकरणों में डीएनए परीक्षण रिपोर्ट मात्र 3 से 5 दिन में देकर पुलिस जांच में सहयोग किया है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/scientists-honored-to-the-with-dgp-disc/article-54838"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/333-copy1.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। केसों में बेहतर काम करने वाले राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला जयपुर के डॉ. राजेश सिंह उप निदेशक सहित दो अन्य वैज्ञानिकों डॉ. आरके कुमावत एवं धीरज सिंह खिड़िया को डीएनए परीक्षण में विशेष योगदान देने रपर डीजीपी डिस्क एवं प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया गया। </p>
<p>डॉ. राजेश सिंह के नेतृत्व में एफएसएल जयपुर के डीएनए प्रोफाइलिंग यूनिट की क्यूआरटी टीम ने 12 वर्ष तक के अबोध बालक-बालिकाओं के साथ जघन्य दुष्कर्म प्रकरणों में डीएनए परीक्षण रिपोर्ट मात्र 3 से 5 दिन में देकर पुलिस जांच में सहयोग किया है। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Aug 2023 10:19:56 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिकों ने एआई से केवल 5 घंटे में बना डाला कंप्यूटर</title>
                                    <description><![CDATA[एआई से बने सीपीयू की पर्फोमेंस आधुनिक कंप्यूटरों की तुलना में मामूली है। वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि यह 1991 इंटेल 80486SX सीपीयू के लेवल पर परफॉर्म कर सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/scientists-made-computer-with-ai-in-just-5-hours/article-50876"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/630-400-size-की-कॉपी-(1)4.png" alt=""></a><br /><p>एआई की दुनिया में रोज नए-नए अपडेट आ रहे है। अब टेक वर्ल्ड से एक और हैरान कर देने वाला कारनामा सामने आया है। चीन के रिसर्चर ने एक ऐसा एआई टूल बनाया है जो केवल 5 घंटे के अंदर एक कंप्यूटर बना देता है। </p>
<p>पांच अलग-अलग संस्थानों के 19 कंप्यूटर वैज्ञानिकों की टीम ने इस टूल को ईजाद किया है। इसकी मदद से मशीन खुद ही एक कंप्यूटर चिप तैयार कर देगी। इतना ही नहीं इससे इंसानों की तुलना में 1000 गुना ज्यादा तेजी से काम किया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट में औद्योगिक पैमाने के आरआईएससी-वी सीपीयू का लेआउट शामिल था जो लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम को चलाने और सत्यापन परीक्षणों में 99.99 प्रतिशत की सटीकता प्राप्त करने में सक्षम है। एआई से बने सीपीयू की पर्फोमेंस आधुनिक कंप्यूटरों की तुलना में मामूली है। वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि यह 1991 इंटेल 80486SX सीपीयू के लेवल पर परफॉर्म कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Jul 2023 11:03:10 +0530</pubDate>
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                <title>बिल्ली से नहीं केले से डरता है चूहा, अनजाने में वैज्ञानिकों ने की अजीबोगरीब खोज</title>
                                    <description><![CDATA[चूहों को लेकर आपने सुना होगा कि वह बिल्ली से डरते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं ने चूहों के डर से जुड़ी एक अबीजोगरीब खोज की है। उन्होंने पता लगाया है कि चूहा केले से डरता है। हालांकि यह खोज अनजाने में हुई है। वैज्ञानिक गर्भवती और स्तनपान कराने वाली मादा चूहों को लेकर नर चूहों की प्रतिक्रिया का अध्ययन कर रहे थे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/-rat---afraid---bananas--not-cats--scientists---unknowingly---made---strange---discoveries/article-11087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/uu.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>ओटावा।</strong> चूहों को लेकर आपने सुना होगा कि वह बिल्ली से डरते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं ने चूहों के डर से जुड़ी एक अबीजोगरीब खोज की है। उन्होंने पता लगाया है कि चूहा केले से डरता है। हालांकि यह खोज अनजाने में हुई है। वैज्ञानिक गर्भवती और स्तनपान कराने वाली मादा चूहों को लेकर नर चूहों की प्रतिक्रिया का अध्ययन कर रहे थे। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि केले का रासायनिक यौगिक नर चूहों में तनावपूर्ण प्रतिक्रिया पैदा करता है। साइंस एडवांस में पब्लिश एक स्टडी में बताया गया कि नर चूहों में तनाव देखने को मिला। मॉन्ट्रियल में मैगकिल विश्वविद्यालय की शोध टीम ने पाया कि गर्भवती और स्तनपान कराने वाली मादा चूहों ने अजनबी नर चूहों को आक्रामकता दिखाई और मूत्र चिन्ह के साथ प्रतिक्रिया दी। नर चूहों को उनकी आक्रामक के लिए जाना जाता है लेकिन उन्हें भगाने और उन्हें चेतावनी देने के लिए मादा चूहे ने रसायन छोड़ा। जिसके बाद नर चूहे ने दूरी बना ली।</p>
<p><strong>सूंघने की शक्ति से समझ जाते हैं संकेत</strong></p>
<p>अध्ययन के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर जेफरी मोगिल के मुताबिक चूहे और कई अन्य स्तंधारी अपनी सूंघने की शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। अलग-अलग समय पर जानवरों में यूरिन की गंध के अपने मतलब होते हैं। लेकिन हमें इस रिसर्च में जो मिला है वह कुछ अलग है। सूघने वाले संकेत आमतौर पर नर किसी मादा को भेजते हैं, लेकिन मादा का नर को भेजने के कम उदाहरण हैं।  शोधकर्ताओं ने स्तनपान कराने वाली और मादा चूहों के मूत्र में एन-पेंटाइल एसीटेट नाम का एक यौगिक पाया। केला समेत कई फलों में पाए जाने यौगिक के ये समान है। केले का अर्क बनाने के लिए इसे फल से निकाला जाता है। ये वह रसायन है जो नर चूहों में हार्मोन बदलाव पैदा करते हैं।<br /> टीम ने जब केले के अर्क को नर चूहों के पिंजरे में डाला तो उनका तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया। ये तनाव चूहों के लड़ाई के दौरान होने वाले तनाव के बराबर था। इससे पता चला कि अगर मादा चूहा न भी हो तो कैमिकल नर चूहे को भड़का सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jun 2022 15:27:11 +0530</pubDate>
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