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                <title>opinion - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>घबराहट और तनाव के शिकार होते बच्चे</title>
                                    <description><![CDATA[देखा जाए तो कोरोना के बाद से बच्चों में डिप्रेशन और एंजाइटी का रोग तेजी से बढ़ता जा रहा है। कोरोना की दहशत के हालात, लॉकडाउन, वर्क फ्राम होम और बच्चों की ऑनलाईन पढ़ाई के साइड इफेक्ट सामने आने लगे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/children-suffering-from-anxiety-and-stress/article-85830"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/anxiety.png" alt=""></a><br /><p>देखा जाए तो कोरोना के बाद से बच्चों में डिप्रेशन और एंजाइटी का रोग तेजी से बढ़ता जा रहा है। कोरोना की दहशत के हालात, लॉकडाउन, वर्क फ्राम होम और बच्चों की ऑनलाईन पढ़ाई के साइड इफेक्ट सामने आने लगे हैं। ऑनलाईन स्टडी के चलते बच्चें मोबाइल के अधिकांश इस तरह के ऐप्स से रुबरु होने लगे जो बालपन को कहीं ना कहीं सीधे सीधे प्रभावित करने लगा। एक और जहां चाहे-अनचाहे आनलाईन गेमों की बच्चों में लत लगी वहीं सोशियल मीडिया साइट्स भी बच्चों में लत के रूप में लगने के साथ ही बच्चों के दिलों दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव डालने में सफल रही है। देखा जाए तो खेल-खेल में बच्चे ना चाहते हुए भी तनाव और एंजाइटी के दौर में प्रवेश कर गए हैं। बदलती जीवनशैली और सामाजिक आर्थिक सिनेरियों में सर्दी जुकाम की तरह एंजायटी यानी कि घबराहट और डिप्रेशन यानी कि अवसाद आज के बच्चों में आम होता जा रहा है।  मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान 11 से 15 साल के बच्चों के बीच अध्ययन किया और खासतौर से यह समझने की कोशिश की गई कि जिस तरह से सर्दी जुकाम संक्रामक बीमारी है और एक से दूसरे में फैल जाती है उसी तरह से एंजायटी या डिप्रेशन भी एक बच्चे से दूसरे बच्चे को प्रभावित कर सकता है क्या? अध्ययन में पाया गया कि घबराहट या एंजाइट प्रभावित बच्चें के लक्षण साथ वाले बच्चें में भी विकसित होने के देखे गए हैं। यह अध्ययन भी एक दो नहीं बल्कि सात लाख बच्चों में किया गया है। चिंता की बात यह है कि सर्दी जुकाम संक्रामक रहा है व संपर्क में आने वालों को गिरफ्त में लेने की प्रबल संभावनाएं रहती है, लगभग यही हालात एंजाइटी और डिप्रेशन को लेकर देखी जाने लगी है। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिनलैंड विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के अध्ययन में यह साफ हुआ है कि छह में से एक व्यक्ति बैचेनी यानी कि एंजायटी से प्रभावित रहने लगा है। कोरोना के बाद इस तरह के मरीजों की संख्या में 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। यदि अध्ययन कतार्ओं की मानें तो कोविड 19 अर्थात कोरोना के बाद हालात तेजी से विकट हुए हैं। खासतौर से पैसों वालों व बुजुर्गों की बीमारी से बच्चें प्रभावित होने लगे हैं। बैचेनी, घबराहट, हाथों में कंपनए नींद ना आना, चिडचिडापन, तनावग्रस्त कुंठा आदि लक्षण दिखने लगते हैं। इससे  बच्चों में नकारात्मकता भी आती जा रही है। अधिक चिंता की बात यह है कि यह बीमारी बच्चों में सक्रामक रोग की तरह फैलती जा रही है। कोराना के लॉकडाउन के साथ ही पेरेंट्स की अंधी प्रतिस्पर्धा और अधिक से अधिक पाने की लालसा, बच्चों के बीच परस्पर सहयोग, समन्वय, मित्रता, सहभागिता के स्थान पर संवेदनहीनता और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के परिणाम सामने आने लगे हैं। बच्चों में कुंठा तो आम होती जा रही है। रही सही कसर सोशियल मीडिया ने पूरी कर दी है। सोशियल मीडिया जो परस्पर संवाद का माध्यम बन सकता है चह तनाव का प्रमुख कारण बनता जा रहा है।  लाइक अनलाइक और कमेंट्स बालमन को नकारात्मक रुप से प्रभावित करता जा रहा है। ऑनलाईन अध्ययन के चलते बच्चों में मोबाइल का शोक लग गया है और उसका नकारात्मक असर वीडियो गेम्स के रुप में देखा जा सकता है जो बच्चों को गेम के चक्कर में डिप्रेशन में जाते हुए देखा जा सकता है। गेम्स बच्चों में तनाव का कारण बनते जा रहे हैं। ओटीटी प्लेटफार्म भी अपना असर दिखाता जा रहा है। रील्स का तो कहना ही क्या? लगता है बच्चों के बालमन को नकारात्मक रुप से प्रभावित करने वाले सभी कारक सामने आते जा रहे हैं। शिक्षण संस्था हो या परिवार खासतौर से एकल परिवार के हालात हालात और भी गंभीर करते जा रहे हैं। हालात यहां तक होते जा रहे हैं कि बच्चे आक्रामक होते जा रहे हैं।  </p>
<p>समाज विज्ञानियों के सामने यह गंभीर समस्या दस्तक दे रही है। हालात बद से बदतर हो उससे पहले ही समस्या की गंभीरता को समझना होगा। दादा-दादी और नाना- नानी कहीं पीछे छुट रहे हैं, पेरेंट्स अवकाश भी परिवार के साथ बिताने के स्थान पर कहीं घूमने जाना पसंद करने लगे हैं जिससे परिवार और परिवार से मिलने वाले संस्कार खोते जा रहे हैं। हालात दिन प्रतिदिन बदतर होते जा रहे हैं और इसके परिणाम आए दिन सामने आते जा रहे हैं। अत्यधिक तनाव के कारण बच्चों को आत्महत्या जैसे कदम उठाते देखा जा रहा है। वहीं बदले की भावना,बात- बात में गुस्सेल होना, तुनक मिजाजी आदि तो बस पूछो ही मत। अत्यधिक महत्वाकांक्षा भी तनाव का कारण बनती जा रही है। समाज विज्ञानियों और मनोविज्ञानियों के सामने अधिक चुनौती पूर्ण समय आ गया है। समय रहते इसका समाधान खोजना ही होगा नहीं तो दुनिया के देशों में जिस तरह से बच्चों को छोटी उम्र में ही हिंसक होते देखा जा रहा है उसमें कमी होने के स्थान पर गंभीरता पूर्वक हालात बदतर ही होंगे। इसका समाधान खोजना होगा नहीं तो आने वाली पीढ़ी किसी भी हालत में हमें माफ नहीं करेगी।<br />   <strong>-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong><br /><strong>   (ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jul 2024 14:19:54 +0530</pubDate>
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                <title>नाटो के सामने अब नई चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर त्रिदिवसीय शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/nato-now-faces-new-challenges/article-84924"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/111u1rer-(2)4.png" alt=""></a><br /><p>पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर त्रिदिवसीय शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। इस सम्मेलन पर पूरे विश्व की नजरें टिकी हुई थीं। सम्मेलन में सभी सदस्यों ने एक स्वर से यूक्रेन के साथ एकजुटता दिखाते हुए उसे पर्याप्त सुरक्षा सहायता जारी रखने का फैसला लिया गया। तो दूसरी ओर चीन को आड़े हाथों लेकर उस पर तीखे प्रहार किए। सम्मेलन में यह भी तय हुआ कि अगला शिखर सम्मेलन अगले वर्ष जून माह में नीदरलैंड की राजधानी हेग में आयोजित किया जाएगा। 75 वां शिखर सम्मेलन ऐसे वक्त पर हुआ जब इसका नेतृत्व करने वाले देश अमेरिका में अगले नवंबर माह में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के कीर स्टॉर्मर नए प्रधानमंत्री बने हैं। अमेरिकी चुनाव के नतीजे आने के बाद ही सम्मेलन में लिए गए तमाम महत्वपूर्ण फैसलों का क्रियान्वयन और रणनीति की दशा और दिशा सुनिश्चित हो पाएगी। </p>
<p>शिखर सम्मेलन को मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन ने संबोधित किया है। उन्होंने अपने संबोधन में यह समझाने की पूरी कोशिश की कि नाटो को इस अवसर का उपयोग जश्न मनाने के लिए इसलिए करना चाहिए , क्योंकि अमेरिका को इस गठबंधन से काफी लाभ मिला है। इसकी सदस्यता में एक ओर जहां वृद्धि हुई तो दूसरी ओर रक्षा पर यूरोपीय राज्यों के बढ़े बजटीय व्यय की रूपरेखा भी तैयार हुई। </p>
<p>उन्होंने यूक्रेन युद्ध में रूस की सहायता करने पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कड़ी निंदा की। चेतावनी दी कि यदि बीजिंग ने मास्को को सहायता देना तुरंत बंद नहीं किया तो उसे इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। लेकिन सम्मेलन में बाइडन की जुबान की लड़खड़ाहट ने उनकी कमजोरी को भी जाहिर कर दिया। जब उन्होंने पास खड़े यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को पुतिन और कमला हैरिस को ट्रंप के नाम से संबोधित किया। इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव के लिए हुई पहली बहस में बाइडन को ट्रंप के मुकाबले मिली हार तथा उनकी जुबानी फिसलन ने उनकी बढ़ती उम्र की ओर डेमोक्रेटिक पार्टी को गंभीरता से सोचने को विवष कर दिया है। पार्टी के भीतर उनसे चुनावी मैदान से हटने का दबाव बन रहा है। लेकिन इसके बावजूद वे चुनाव लडने पर अड़े हुए हैं। यदि वे मैदान पर डटे रहे तो चुनावी नतीजे रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में जा सकते हैं। दूसरी ओर नाटो को लेकर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के नजरिए पर भी गौर करना होगा। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में टं्रप ने नाटो गठबंधन में शामिल देशों की व्यय साझा करने की अनिच्छा की खुलकर आलोचना की थी। ऐसे में उनका मत था कि वैश्विक सुरक्षा की जिम्मेदारी के वहन से अमेरिका को मिलता क्या है? हालांकि अब हालात में काफी बदलाव आ चुका है। अधिकांष यूरोपीय देश, अपनी जीडीपी के दो फीसदी हिस्से के बराबर धन देने के दायित्व को पूरा कर रहे हैं। ट्रंप को लेकर यह धारणा भी है कि वे पुतिन के करीबी हैं। </p>
<p>खैर, अमेरिकानीत इस सैन्य संधि संगठन के सामने मौजूदा वैष्विक परिदृश्य में दो प्रमुख चुनौतियां उभर कर सामने आ रही हैं। एक तो यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेड़े रूस को चीन की ओर से मदद मिलना। तो दूसरी ओर चीन का हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में वर्चस्व बढाने की नीति, इस के साथ उसकी परमाणु हथियारों और अंतरिक्ष क्षेत्र में आक्रामक क्षमता हासिल कर लेना। सम्मेलन के केंद्र में चीन का मुद्दा हालांकि पहले भी वर्ष 2019 के सम्मेलन में उठा था। लेकिन तब नाटो के वक्तव्य में चीन के जिक्र की भाषा इतनी कड़ी नहीं थी। लेकिन इस बार की तीखी घोषणा के तुरंत बाद चीन ने प्रतिक्रिया दी। उसने रूस की मदद के लगाए आरोपों को सरासर झूठ बताया है। उसकी ओर से जोर देकर कहा गया है कि रूस और चीन के बीच व्यापार और मैत्री का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाना नहीं है। लेकिन नाटो की ताजा घोषणा की भाषा ने रूस-यूक्रेन युद्ध को अब नाटो-चीन के बीच छद्म युद्ध में बदल दिया है। खैर, इतना जरूर हुआ कि नाटो की शिखर वार्ता शुरू होने से पहले यूक्रेन को अमेरिकी एफ-16 लड़ाकू विमानों की पहली खेप डेनमार्क और नीदरलैंड से भेज दी गई है। आने वाले दिनों में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। उसे रूसी हवाई हमलों से बचाव करने में भी मदद मिलेगी।</p>
<p>सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की ओर से यूक्रेन की नाटो संगठन की सदस्यता को लेकर स्पष्ट और मजबूत सेतू की बात तो जरूर कही गई है। लेकिन अंतिम फैसला युद्ध समाप्ति के बाद ही संभव हो पाएगा। तेजी से बदलते वैश्विक माहौल में आने वाली नई चुनौतियों से नाटो अब कैसे निपटता है, यह कठिन परीक्षा की घड़ी होगी।</p>
<p><strong>-महेश चंद्र शर्मा<br /></strong><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jul 2024 10:49:08 +0530</pubDate>
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                <title>ऑनलाइन गेम खेलने की बढ़ती लत </title>
                                    <description><![CDATA[कुछ वर्षों पहले जब इंटरनेट की इतनी उपलब्धता नहीं थी, बच्चे पार्कों में जाकर दोस्तों के साथ आउटडोर गेम खेला करते थे। जिससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता था, लेकिन धीरे-धीरे इंटरनेट सस्ता हो गया और कई ऑनलाइन गेम्स और उनकी ऐप्स आ जाने से बच्चों का रुझान आउटडोर और इनडोर गेमों से हटकर इन वर्चुअली गेमों की ओर बढ़ गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/growing-addiction-of-playing-online-games%C2%A0/article-84441"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/online-games.png" alt=""></a><br /><p>कुछ वर्षों पहले जब इंटरनेट की इतनी उपलब्धता नहीं थी, बच्चे पार्कों में जाकर दोस्तों के साथ आउटडोर गेम खेला करते थे। जिससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता था, लेकिन धीरे-धीरे इंटरनेट सस्ता हो गया और कई ऑनलाइन गेम्स और उनकी ऐप्स आ जाने से बच्चों का रुझान आउटडोर और इनडोर गेमों से हटकर इन वर्चुअली गेमों की ओर बढ़ गया।</p>
<p>हमारे देश में बच्चों, किशोरों और युवाओं में ऑनलाइन गेम खेलने की प्रवृत्ति अब इस कदर बढ़ती जा रही है कि ये एक महामारी का रूप लेती जा रही है। इसके शिकार लोग चौबीसों घंटे बिना रुके ऑनलाइन गेम खेलना पसंद करते हैं। भारत में 23 वर्ष तक के 88 प्रतिशत युवा समय बिताने के लिए ऑनलाइन गेम खेलते हैं। शौक के लिए या समय बिताने के लिए कुछ देर को ऑनलाइन गेम खेलना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन समस्या तो तब पैदा होती है जब ये एक बुरी आदत बन जाती है, जिसे गेमिंग एडिक्शन कहते हैं। ये समस्या आज भारत के हर राज्य, हर शहर में फैलती जा रही है और करोड़ों मां-बाप अपने बच्चों की इस लत से बहुत परेशान हैं। ऑनलाइन गेम्स खेलने से हिंसा की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है ये गेम अक्सर हिंसक घटनाओं से भरे होते हैं। ऑनलाइन गेम की दुनिया ही बिल्कुल अलग है उसमें मरने- मारने की बातें होती हैं। यह गेम बच्चों और युवाओं में हिंसक प्रवृति को बढ़ा रहे हैं। लॉक डाउन के बाद से भारत में ऑनलाइन गेम खेलने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है, इसमें बच्चों के साथ- साथ बड़े भी शामिल हैं। वर्ष 2018 में भारत में ऑनलाइन गेम्स खेलने वाले यूजर्स की संख्या करीब 26 करोड़ 90 लाख थी, वर्ष 2020 में ये संख्या बढ़कर करीब 36 करोड़ 50 लाख हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2022 में लगभग 55 करोड़ से ज्यादा की आबादी यानी लगभग आधी आबादी ऑनलाइन गेम्स खेलने में व्यस्त होगी। भारत के लोग अब 1 दिन में औसतन 218 मिनट ऑनलाइन गेम खेलते हुए बिता रहे हैं। पहले ये औसत 151 मिनट था। वर्ष 2020 में जब पहली बार लॉकडाउन लगा था, तब इसके शुरूआती कुछ महीनों में भारत  में 700 करोड़ से ज्यादा बार ऑनलाइन गेम्स अलग- अलग डिजिटल डिवाइस पर इनस्टॉल किए गए थे। बच्चे, किशोर और युवा सभी आउटडोर गेम्स और इनडोर गेम्स खेलना छोड़कर, ऑनलाइन गेम्स में व्यस्त हो गए हैं। जीतने की होड़ में बच्चे लगातार डिवाइस से चिपके रहते हैं और इस खेल में कब घंटों बीत जाते हैं, उन्हें पता तक नहीं चलता, यहीं से शुरू होता है गेमिंग एडिक्शन। पिछले साल ब्रिटेन में हुए एक सर्वे में हर छह में से एक बच्चे ने माना था कि गेम खेलने के लिए उन्होंने माता- पिता का पैसा चोरी किया है इसके लिए ज्यादातर बच्चों ने अपने माता- पिता के डेबिट या क्रेडिट कार्ड का उन्हें बिना बताए इस्तेमाल किया था। यहीं से बच्चों में चोरी की बुरी आदत पड़नी शुरू हो जाती है और धीरे-धीरे करके ये उनके चरित्र और भविष्य को चौपट कर देती है। कुछ ऑनलाइन गेम्स फ्री होते हैं, कुछ में पैसा देना होता है। बच्चे अगला स्टेप पार करने के लिए अभिभावकों की जमा पूंजी से चोरी करते हैं। कई गेम्स जीतने पर रिवॉर्ड भी मिलता है, इससे लालच बढ़ता जाता है। हार जाने पर डूबा पैसा वापस पाने की जिद होती है। बच्चे लगातार झूठ बोलने और लोन लेने जैसी आदतों के शिकार हो जाते हैं। ऑनलाइन गेम्स जरूरत से ज्यादा खेलने से बच्चों के मन मस्तिष्क पर बहुत बुरा असर पड़ता है,वे चिड़चिड़े और हिंसक बन रहे हैं। दुनिया भर में 15 प्रतिशत गेमर्स इसकी लत के शिकार हो जाते हैं और मानसिक तौर पर बीमार हो जाते हैं। इस बीमारी के कुछ लक्षण होते हैं, जिन्हें समय पर पहचान लेना बहुत जरूरी है जैसे, गेम के अलावा हर काम से खुद को अलग कर लेना, भूख कम हो जाना, आंखों और कलाइयों में दर्द होना, सिर में दर्द, नींद कम आनाए न खेल पाने पर चिड़चिड़ापन आदि।</p>
<p>इसके अलावा खीज, भूलने की बीमारी, निराशा, टेंशन और डिप्रेशन जैसी बीमारियां भी जन्म लेने लगती हैं। लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर गेम्स खेलने के कारण मोटापा, ब्लड प्रेशर और डायबिटीज सहित अन्य शारीरिक समस्याएं भी बच्चों और युवाओं में देखी गई हैं। बच्चे अब देश- दुनिया और परिवार की बातों से अनभिज्ञ,एकांत में इन गेमों में गुम रहना चाहते हैं। लेकिन माता- पिता का फर्ज बनता है कि उन्हें इस ओर ध्यान देना चाहिए कि उनके बच्चे आखिर कितना समय ये गेम खेलने में बिता रहे हैं, उन्हें बच्चों को प्यार से और कुछ कड़ाई के साथ भी, ज्यादा देर गेम खेलने से रोकना चाहिए। ज्यादा देर गेम खेलने की वजह से बच्चों की आंखें भी कमजोर हो रही है और उनका पढ़ाई से भी मन उचट जाता है। यह समस्या हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में घातक रूप लेती जा रही है, जिस पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी है।  <br /><strong>-रंजना मिश्रा</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jul 2024 10:23:12 +0530</pubDate>
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                <title>समानता के लिए महिलाएं अपने अधिकारों को पहचानें</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिला समानता की आवश्यकता को न केवल समाज, परिवारों, बल्कि सरकार के स्तर से भी अनुभव किया जा सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/women-should-recognize-their-rights-for-equality/article-55513"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/gan-(8).png" alt=""></a><br /><p>आज विश्व स्तर पर महिलाओं का बहुमुखी विकास सामने आ रहा है। महिलाओं को समानता का अधिकार मिलना ही लोकतंत्र की बहुत बड़ी ताकत है। लेकिन आज भी अनेक स्थानों पर महिलाओं को समानता के अधिकार प्राप्त नहीं है। महिलाएं अपनी हक की लड़ाई निरन्तर लड़ रहीं है। जिस प्रकार एक महिला अपने परिवार में रहते हुए हर काम जिम्मेदारी से करती हुए अपने बच्चों का लालन-पालन करती है, वैसे ही राष्टÑ निर्माण व समाज विकास में महिलाओं का योगदान भी जरूरी है। विश्व के अनेक देश है जहां महिलाओं को समानता का अधिकार आज भी प्राप्त नहीं है। इस संघर्ष एवं लड़ाई के दौर को जारी रखने के लिए प्रति वर्ष भारत सहित अनेक देशों में 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ उत्साह मनाया जाता है। सही मायने में इस लड़ाई की शुरूआत अमेरिका से 1853 में हुई थी, जहां महिलाओं ने शादी के बाद सम्पत्ति के अधिकार की मांग को उठाया। उस समय अमेरिका सहित अनेक देशों में महिलाओं को कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं थे। इस लम्बे चले संघर्ष के दौरान 1890 में अमेरिका में ‘नेशनल अमेरिकन वुमेन सफरेज एसोसिएशन’ का गठन हुआ। इस संगठन के माध्यम से महिलाओं के वोट डालने के अधिकार की आवाज को पुरजोर उठाया गया। जिसके कारण 26 अगस्त 1920 को महिलाओं को वोट डालने का अधिकार मिला। इसी दिन को ‘महिला समानता दिवस’ के रूप में मनाने की परम्परा आरम्भ हुई।<br /><br />अब दौर आ गया है कि महिलाओं के उत्थान एवं विकास के लिए हम सबको अपनी कुत्सित एवं रूढ़िवादी मानसिकता से बाहर निकलना होगा। उन्हें समानता के साथ-साथ शिक्षा, व्यवसाय, नौकरी व अन्य सभी स्थानों पर समान दर्जा देना होगा। भारतीय महिलाओं ने देश की प्रगति में अपना अधिकाधिक योगदान देकर देश को शिखर पर पहुंचाने के लिए सदैव तत्पर रही हैं। सच पूछो तो महिला शक्ति ही वह सामाजिक शक्ति है, जिनका विकास बहुत जरूरी है। महिलाओं के उत्थान के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही नीतियों में पूर्ण सहयोग देकर उसको परिणाम तक पहुंचाना हम सबका कर्तव्य बनता है। समाज में केवल पाश्चात्य व आधुनिकता को अपनाना ही महिला समानता का स्वरूप नहीं है, बल्कि महिला समानता में महिलाओं के व्यक्तित्व का विकास, शिक्षा प्राप्ति, व्यवसाय, परिवार में निर्णय को समान अवसर मिले, वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो, शारीरिक व भावनात्मक रूप से अपने को सुरक्षित महसूस करें तथा सभी रूढिवादी व अप्रासंगिक रिवाजों, बंधनों से पूरी तरह स्वतंत्र हो। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो जाति महिला शक्ति का सम्मान करना नहीं जानती, वह न तो अतीत में उन्नति कर सकी, और न आगे कभी कर पाएगी। हमें भारतीय सनातन संस्कृति के यत्र नार्यस्तु पू’यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ को स्वीकार करते हुए महिलाओं को आगे बढ़नें में सहयोग करना चाहिए।<br /><br />वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिला समानता की आवश्यकता को न केवल समाज, परिवारों, बल्कि सरकार के स्तर से भी अनुभव किया जा सकता है। हमारे देश के संविधान में महिला और पुरुष के आधार पर नागरिकों में भेद नहीं किया गया है, बल्कि समान अवसर प्रदान किए गए है। भारत में मतदान का अधिकार महिलाओं को भी दिया गया, जो कि स्वयं में एक क्रांतिकारी कदम था। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि अमेरिका एवं यूरोप के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने के कई दशकों बाद महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया गया था। केंद्र व राज्य सरकार के स्तर से महिलाओं एवं बालिकाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं यथा नि:शुल्क शिक्षा व्यवस्था, स्कूटी वितरण, मोबाइल वितरण, अतिरिक्त पोषाहार, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना तथा स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देना, छात्रवृति तथा व्यवसायिक प्रशिक्षण देने आदि के माध्यम से महिलाओं को सहायता दी जा रही है। शैक्षिक, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न कार्य किए जा रहे हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम भी आ रहे है। इसकी मिसाल कुछ राज्यों में हुए पंचायत चुनाव, जिनमें पचास प्रतिशत तक पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक शानदार पहल साबित हुआ है। इसके बावजूद अभी भी महिलाओं के सम्पूर्ण समानता की दिशा में बहुत अधिक प्रयासों की आवश्यकता महसूस होती है। आज भी महिला को वास्तव में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्रदान दिए जाने के लिए समाज में परिवर्तन लाकर महिला के उत्थान एवं विकास को समझना होगा, सभी महिला समानता की लड़ाई साकार रूप ले सकती है। महिला समानता पर चिंतन करते समय महिलाओं की वास्तविक स्थिति को देखना बहुत जरूरी है। महिला समानता के दौर में महिला समाज, राजनीति और प्रशासन में कितना आगे बढ़ सकी है, यह देखना है। महिलाओं की विकास की यह सजगता प्राय: बड़े शहरों तक केंद्रित हैं या अति सम्पन्न, सुसम्पन्न और सुशिक्षित परिवारों में परिलक्षित होता है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की स्थिति आज भी बदलने के लिए समानता का संघर्ष कर रही है। <br /><br />-डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Aug 2023 12:38:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>जाने राजकाज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[आम तौर पर चुनावों से पहले ब्यूरोक्रेट्स का रंग बदला-बदला सा नजर आने लगता है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होने से जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब का कॉन्फिडेंस लेवल कम होने का नाम ही नहीं ले रहा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-rajkaj/article-53165"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p>चर्चा में लाल रंग <br />सूबे में इन दिनों लाल रंग की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों ना, सूबे की राजनीति भी तो लाल रंग में रंगी हुई है। गुजरे जमाने में तो लाल रंग को देख कर सांड चमकते थे, लेकिन आज के जमाने में तो मिनख सबसे ज्यादा चमकते नजर आ रहे हैं। अब देखो ना, उदयपुरवाटी वाले नेताजी ने लाल रंग की डायरी क्या लहरा दी, दिल्ली वाले छोटा भाई-मोटा भाई तक चमक गए। कई लीडर तो उछलकूद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। अब इन नेताओं को कौन समझाए कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए लालरंग की आड़ में खूब गला फाड़ लो, अंत तो सबको पता है कि इससे कुछ भी नहीं होने वाला। चूंकि लाल डायरी प्रकरण ने ईडी और आईटी वालों की रेड पर भी सवाल खड़े करने वालों की लंबी लाइन कर दी। भगवा वालों को यह बात बाद समझ में आई, जब तक देर हो चुकी थी।<br /><br />तलाश ए दवा<br />इन दिनों दोनों दलों के नेताओं को एक अजीब सी बीमारी है। इसके चलते वे ऐसे बयान जारी कर देते हैं, जो लोगों के गले नहीं उतरते, जो भी सुनता है, हंसे बिना नहीं रहता। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि गलत फहमी नाम की इस बीमारी के जो भी लपेटे में आता है, उसको झूंठ भी सच नजर आता है। अब देखो ना, अगले राज को लेकर दोनों तरफ से बढ़ चढ़ कर दावे किए जा रहे हैं। हाथ वाले भाई लोग तो ठोक बजाकर ढिंढोरा पीट रहे हैं कि भगवा वाले लीडर्स की आपसी जंग में हम तो बिना लड़े ही फिर जीते हुए हैं। भगवा वाले एक नेताजी तो उनसे भी दो कदम आगे हैं। अभी से ही मंत्री मंडल की सूची लेकर सूबे में घूम रहे हैं। अब इनको कौन समझाए कि यह पब्लिक है, यह सब जानती है कि किसको कैसे निपटाना है।<br /><br />ठिकानों पर कानाफूंसी<br />इन दिनों दोनों दलों के ठिकानों पर ऐसे लोग सक्रिय हंै, जो अपने ही नेताओं में खोट निकालने में कोई चूक नहीं करते। और तो और अपने-अपने ठिकानों पर ऐसा जुमला भी फेंक जाते हैं, जो बिना वजह चर्चा बन जाती है। अब देखो ना इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वाले के ठिकाने पर कानाफूसी है कि मेवाड़ में हाथ की लकीरें भी कम होती दिखाई देती नजर आ रही हैं, तो मारवाड़ में भी किसान पुत्रों की नाराजगी असर दिखा सकती है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के  ठिकाने पर बातूनी बतियाते हैं कि अल्टरनेटिव गवर्नर्मेंट की बात नहीं होने से छोटे जोशी जी की यात्राओं का असर दिखाई नहीं दे रहा। और तो और हर कदम पर गुटबाजी से वर्कर्स में आशाओं के संचार की कमी बनी हुई है।<br /><br />साहब का नहीं बदला रंग<br />आम तौर पर चुनावों से पहले ब्यूरोक्रेट्स का रंग बदला-बदला सा नजर आने लगता है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होने से जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब का कॉन्फिडेंस लेवल कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। राज का काज करने वाले भी अंतिम बजट की घोषणाओं को भाग-भाग कर पूरा कर रहे हैं। चुनावी गणित में जुटे विशेषज्ञ को भी माजरा समझ में नहीं आ रहा। अब उनको कौन समझाए कि यह सारा खेल यूपी वाली मैडम और सीकर वाले मेष राशि वाले भाईसाहब की मेहरबानी से है। दोनों कुर्सियों का कामकाज का तरीका कुछ ऐसा ही है, जिनके ऊपर राज का कोई असर नहीं पड़ता। राज बदलने पर भी उसी गति और वफादारी से काम में जुट जाते हैं। <br /><br />एक जुमला यह भी<br />सरदार पटेल मार्ग बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी सीटों की संख्या को लेकर है। भाई लोग दिन में कई बार अंगुलियों पर गिनते हैं, मगर आंकड़ा ऊपर-नीचे हो रहा है। जुमला है कि जब बसंती मौसम में चित्तौड़गड़ वाले जोशी जर सूबे के सदर बने थे, तो हर किसी का आंकड़ा 125 से कम नहीं था। दिल्ली से पिंकसिटी तक हर कोई राज के लिए दिन में भी सपनों में खोये रहते थे, लेकिन अब मानसून की बरखा के बीच कोई भी सैकड़ा तक भी नहीं गिन पा रहा। चर्चा है कि सीटों की संख्या बढ़ने के बजाय कम होने के लिए क्षेत्रीय क्षत्रपों की नजरअंदाजी तो बड़ा कारण नहीं। भगवा वाले बुजुर्ग भी बड़बड़ाने लगे हैं कि घर का पूत कुंवारा डोले, पाड़ोसी के फेरे। अब चाहे पोस्टमार्टम कितना ही करते रहो, होगा वो ही जो मंजूर ए खुदा होगा।<br /><br />-एल.एल शर्मा<br />(यह लेखक के अपने विचार हैं) </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Jul 2023 10:04:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>देश में भूमिगत जल पर बढ़ता दबाव</title>
                                    <description><![CDATA[भूमिगत जल के अंधाधुंध एवं अनियंत्रित दोहन के फलस्वरूप देश में भूमिगत जल का स्तर खतरनाक सीमा तक नीचे चला गया है, भू-जल पर संकट के बादल मंडरा रहे है जो कि चिन्ताजनक तथ्य है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-pressure-on-underground-water-in-the-country/article-52894"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/news-(9)1.png" alt=""></a><br /><p>वर्षा जल के पूर्ण संरक्षण एवं समुचित उपयोग नहीं होने की वजह से देश में भू-जल संकट की त्रासदी बढ़ती जा रही है। समुचित जल-प्रबंधन ,समुचित भंडारण  व संचालन व्यवस्था नहीं होने के कारण अधिकांश बरसाती जल बाढ़ के रूप में जान-माल को गहरी क्षति पहुंचाता है। गांव के गांव, शहर के शहर जलमग्न होकर तबाही के कगार पर पहुंच जाते हैं। ज्ञातव्य है कि वर्षा के जल का अधिकांश भाग बरसाती नदियों व नालों के माध्यम से समुद्र में मिल जाता है, जबकि इस जल का उपयोग किया जाकर भूमिगत जल पर दबाव कम किया जा सकता है।<br /><br />भूमिगत जल के अंधाधुंध एवं अनियंत्रित दोहन के फलस्वरूप देश में भूमिगत जल का स्तर खतरनाक सीमा तक नीचे चला गया है, भू-जल पर संकट के बादल मंडरा रहे है जो कि चिन्ताजनक तथ्य है। देश में नलकूपों, हैण्डपम्पों व बोरिंगो की बढ़ती संख्या भू-जल के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्हृ लगा रही है। तीव्र जनसंख्या वृद्धि, उच्च उत्पादकता वाली फसलों को प्राथमिकता तथा जीवन स्तर में सुधार के कारण जल की खपत उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। सतही जल की अपर्याप्तता के कारण भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ रही है। वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल का 90 प्रतिशत भाग तथा सिंचाई का 40 प्रतिशत भाग भू-जल से ही प्राप्त हो रहा है। इसके अतिरिक्त घरेलू कार्यों व औद्योगिक उत्पादन में भी भूमिगत जल का उपयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा हैं।<br /><br />कृषि प्रधान देश होने के कारण भूमिगत जल की सर्वाधिक खपत सिंचाई कार्यों में होती है। देश में साठ के दशक से सिंचाई के लिए भूमिगत जल का उपयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। खाद्यानों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए खेती में जल की मांग में निरन्तर बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। देश के प्रमुख राज्यों यथा पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु व राजस्थान में भू-जल में गिरावट के कारण इन राज्यों की कृषि व्यवस्था खतरे में पड़ गई है। ऐसी स्थिति में कृषकों को गरीबी, भूखमरी व कुपोषण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। गुजरात, तमिलनाडु, सौराष्टÑ व राजस्थान के सूखते हुए जल स्रोत जल-प्रबंधन व्यवस्था पर प्रश्न चिन्हृ लगा रहे हैं। विचारणीय बिन्दु है कि देश के लगभग आधे जिले सूखे की त्रासदी से ग्रस्त हैं। हैण्डपम्प व नलकूपों में पानी की मात्रा निरन्तर घटती जा रही है। ऐसी स्थिति में उत्तरप्रदेश व राजस्थान के किसानों ने सबमर्सिबल पंपों के माध्यम से भूमि के निचले स्तर से जल का दोहन प्रारम्भ कर दिया है। यही चिन्ताजनक हालात बिहार, गुजरात, महाराष्टÑ व मध्यप्रदेश जैसे राज्यों की है। विभिन्न राज्यों में अवस्थित कुएं, बावड़ी, तालाब व झीलें भी विलुप्त होने के कगार पर है। देश का उर्वरा क्षेत्र सूखे एवं जलाभाव के कारण रेगिस्तान में परिवर्तित होता जा रहा है, जिसके विस्तार को रोकना एक अहम् व विकट चुनौती है।  भू-जल के अति दोहन के लिए  ऋणियों की सहज व निम्न ब्याज दर पर उपलब्ध, बिजली से चलने वाले पंपों का प्रसार व विद्युत अनुदान जैसे तत्व भी उत्तरदायी है। यह तथ्य भी उभर कर सामने आया है कि किसान वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में कृषि कार्यों के लिए आवश्यकता से 15 प्रतिशत अधिक जल का उपयोग करके भूमिगत जल के संकट को बढ़ा रहे हैं। यही नहीं देश में सिंचाई परियोजना के रख-रखाव व संरक्षण में कमी के कारण सिंचाई के लिए निष्कासित जल का 45 प्रतिशत भाग खेत तक पहुंचते हुए नालियों में रिस जाता है एवं शेष 55 प्रतिशत का ही उपयोग हो पाता है। ऐसा भी पाया गया है कि धर्मार्थ संचालित जल की कीमत नहीं वसूली जाने से इस जल के दक्ष व पूर्ण उपयोग पर प्रश्नचिन्हृ लग जाता है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि जो वस्तु सहज व निशुल्क सुलभ होती है उसका दक्ष, अनुकूलतम व पूर्ण उपयोग संदिग्ध है। इसके साथ, नकद फसलों व जेनेटीकली मोडीफाइड (जी एम) फसलों को ,जिन्हे अधिक जल की आवश्यकता होती है, प्राथमिकता व प्रोत्साहित करने के फलस्वरूप भू-जल पर संकट गहराता जा रहा है। यही नहीं, किसानों में अतिरिक्त जल को विक्रय करके मुनाफा कमाने की प्रवृति भी देखने को मिल रही है। गुजरात के अनेक किसान अलग-अलग मौसमों के आधार पर विभिन्न दरों पर जल का विक्रय करते हैं, जिससे भूमिगत जल पर दबाव बढ़ता जा रहा है। <br /><br />इसके साथ,यही नहीं, बरसाती जल के साथ कृषि भूमि की उर्वरा परत बह जाने से देश खाद्य संकट की स्थिति से गुजर रहा है। यदि इसी बरसाती जल के संचयन एवं प्रबंधन हेतु भू-गर्भ टंकियो, टांकों एवं सोखते गड्डों के साथ पारम्परिक जल-स्रोतों के निर्माण व पुनर्निर्माण की व्यवस्था की जाए तो दो तरफा लाभ होगा। एक तरफ  बाढ़ की भीषण त्रासदी, खाद्य संकट, गांवों व शहरों के पेयजल पर मंडराते संकट के बादलों से मुक्ति मिलेगी तो दूसरी तरफ भूमिगत जल स्तर में बढ़ोतरी होने से जल संबंधित अनेक समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी। भूतपूर्व राष्टÑपति डॉ. अब्दुल कलाम ने भी स्पष्ट किया है कि बाढ़ के 1500 अरब घन मीटर पानी को इस प्रकार से नियंत्रित किया जाए कि इसका उपयोग सूखाग्रस्त क्षेत्रों तथा देश के अन्य इलाकों को पर्याप्त जल उपलब्ध हो सके। <br /><br />-डॉ. अनीता मोदी<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Jul 2023 12:18:37 +0530</pubDate>
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                <title>समाज को कलंकित करती बाल यौन उत्पीड़न की घटनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[आज यदि हम समाज पर समाचारों में  यत्र-तत्र सर्वत्र बाल यौन उत्पीड़न की घटनाएं सुनने-देखने को मिल जाएंगी। इसका एक कारण समाज में नारी को उपभोग की वस्तु बनाकर एक ‘ब्रांड’ की तरह पेश करना भी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/incidents-of-child-sexual-abuse-stigmatizing-the-society/article-52682"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/news-(6).png" alt=""></a><br /><p>स्वतंत्रता बाद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिला एवं बाल सुधार के लिए बड़ी तेजी से सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं लेकिन फिर भी जब देश  में बालक-बालिकाओं की दशा पर दृष्टि डाली जाती है तो सहसा बलात्कार एवं बाल यौन उत्पीड़न की घटनाओं में उत्तरोत्तर हो रही वृद्धि यह सोचने को मजबूर कर रही है कि समाज आज किस खतरनाक मुहाने पर खड़ा है। होशियारपुर कांड में छह वर्ष  की बालिका से बलात्कार के बाद उसको जिÞंदा जला देना हैवानियत को भी शर्मसार करता है। यमुनानगर में अपनी ही बेटी के साथ यौन उत्पीड़न का मामला आज के सुसंस्कृत सामाज को कलंकित कर रहा है। न्यायालय ने भले ही इस मामले में पिता को आजीवन कारावास की सजा दे दी हो किन्तु फिर भी यह घटना बेहद शर्मनाक है। इसी तरह की घटनाएं मथुरा मुंबई, उत्तराखंड और शिमला में भी विगत दिनों प्रकाश में आई जहां अपने ही जिसमें स्वजन ही पवित्र रिश्तों को कलंकित करने मे दोषी पाए गए। हर रोज इस तरह की दरिंदगी के किस्से किसी ना किसी राज्य से भले ही कश्मीर हो या पंजाब या फिर उत्तरप्रदेश या राजस्थान कहीं ना कहीं से सुनने को मिलते ही रहते हैं। इसका एकमात्र कारण समाज के प्रत्येक वर्ग में शिक्षा का अभाव है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में प्रतिदिन देश में 109 बच्चों के साथ यौन शोषण किया गया तथा बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या में अगले वर्षों वृद्धि देखी गई। देश की न्याय पालिका द्वारा ऐसे कुकृत्य करने वाले  दरिंदों को कड़ी सजा भी दी गई है ताकि समाज में फिर किसी की हिम्मत इस तरह के कुत्सित कदम की ओर ना जाए पर फिर भी इन घटनाओं में हो रही वृद्धि चिंताजनक है।<br /><br />बाल शोषण से जुड़े यौन अपराधों के लिए भारत सरकार ने पोक्सो एक्ट 2012 में संशोधन को मंजूरी देकर यौन अपराधों के लिए मृत्युदंड का दंडात्मक प्रावधान भी किया किन्तु फिर भी समाज की गंदी सोच नहीं बदल पा रही है। इस कानून के संशोधन में दंडात्मक प्रावधानों में स्पष्टता लाते हुए यह उम्मीद की गई थी कि बालक-बालिकाओं से यौन जुड़े  अपराध में कमी आएगी और बालक-बालिकाओं के हितों में सुरक्षा आएगी। पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत एक बालक की आयु को 18 वर्ष की कम उम्र के व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है और हर स्तर पर बच्चों के हितों और उनके कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित किया गया है। इसके साथ ही बाल दुर्व्यवहार की श्रेणी में भावनात्मक स्तर पर किए जाने वाला व्यवहार ही भी इस श्रेणी में रखा गया है जिसमें जानबूझ कर या पूरी सूझबूझ से अश्लील सामग्री देना दिखाना या गलत तरीके से छूना अथवा बाल नग्न और अश्लील चित्र या वीडियो क्लिप बनाना भी बाल यौन दुर्व्यवहार माना गया है ।<br /><br />आज का समाज बालक-बालिकाओं के अधिकारों के प्रति सजग है और न ही यह वर्ग स्वयं में इन अत्याचारों से लड़ पाने की निजी शक्ति जुटा पा रही है। कमजोर होने पर बाल बालिका समाज में सॉफ्ट टारगेट बने हुए हैं उनमें इतना साहस नहीं होता कि वे इन घटनाओं का प्रतिकार कर सकें। समाज में बालिका के यौन उत्पीड़न की घटनाएं, बालकों के अनुपात में ज्यादा हैं। इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार अक्सर पास पड़ोस और रिश्तेदार या कोई निकट संबंधी ही अधिकतर होते हैं, जो अपनी यौन कुंठाओं की शान्ति के लिए इस वर्ग को लक्ष्य बना रहे हैं। अधिकतर मामले तो समाज में दबे ही रह जाते हैं जहां भी किसी प्रकार की छेड़छाड़ होती है या तो वह पीड़ितों द्वारा चुपचाप सहन कर ली जाती है और यदि कहीं प्रतिकार होता भी होता है तो परिवारजन या तो मौन धारण कर लेते हैं या अपने रिश्तेदारों के दबाव में आकर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। आस-पास की व्यंग्यपूर्ण नजरों से वह पीड़ित परिवार स्वयं को अकेला पाता है। यहां तक कि परिवार की महिलाएं भी आवाज उठाने में हिचक महसूस करती हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उन्हें भी इसी तरह की हिंसा का पात्र नहीं बना दिया जाए। लेकिन वास्तव में यह जरूरी है कि बजाए तमाशा बनने के अपनी आवाज को बुलंद किया जाए। <br /><br />आज यदि हम समाज पर समाचारों में  यत्र-तत्र सर्वत्र बाल यौन उत्पीड़न की घटनाएं सुनने-देखने को मिल जाएंगी। इसका एक कारण समाज में नारी को उपभोग की वस्तु बनाकर एक ‘ब्रांड’ की तरह पेश करना भी है। त्याग व ममता की प्रतिमूर्ति को बाजारू वस्तु बनाकर, अश्लीलता का नंगा नाच किया जा रहा है, जिससे समाज में चारिर्त्य व नैतिकता का हृास हो चुका है। सौंदर्य प्रदर्शन तो कोई बुरी बात नहीं पर जब देह प्रदर्शन व अश्लीलता को मनोरंजन के नाम पर परोसा जाता है तो यह इक्कीसवीं सदी के महिला जगत का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। कोई ना कोई किसी ना किसी रूप में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अश्लीलता फैला रहा है। समाज में इस तरह का वातावरण तैयार किया जा रहा है जिसमें अश्लीलता को समाज का अभिन्न अंग मानकर प्रस्तुत किया जा रहा है। यह समाज के नैतिक व चारित्रिक दिवालिएपन का ही परिणाम है कि समाज में संयम समाप्त हो रहा है। भारत में घटित हो रही ऐसी उच्छृंखल यौनाचार की घटनाएं समाज में फैल रही असहय अश्लीलता के फलस्वरूप ही घटित हो रही हैं।यह सर्वविदित है कि जरा से रिन की तरह जरा-सी अश्लीलता भी समाज को कामुक बनाने में सर्वथा समर्थ है। <br />-मुनीष भाटिया<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>
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<p>रोज कोई ना कोई बालिका के निर्भया घोषित हो रही है । आए दिन समाचारों में छ: वर्ष की बाला से लेकर साठ वर्ष की वृद्धा तक के साथ यौन उत्पीड़न की ख़बरें सुनने को मिलती रहती हैं। इसी दौरान बच्चों के अपहरण के भी मामले सैंकड़ों में दजर्Þ हुए। आज समय की यह मांग है कि कड़े से कड़े कानून बनाकर और ऐसे मामलों में फास्ट ट्रेक कोर्ट में निबटारा करने का प्रावधान किया जाए और समाज की इन नकारात्मक प्रवृत्तियों पर लगाम कसी जाए। अत: बेहद जÞरूरी है कि सर्वप्रथम घर.घर फैल रही अश्?लीलता का विरोध किया जाए। नारी को उपभोग की वस्तु न मानकर उसे समाज में उचित सम्मान दिलाने में सार्थक कÞदम उठाए जाएं।<br />अपने को कमजÞोर समझने की अपेक्षा परिवार की महिला खुद अपने मन को मजÞबूत करे और खुल के इन घटनाओं के प्रति आवाजÞ बुलंद करे । इसकी शुरूआत समाज की प्रथम इकाई परिवार से ही की जाए। शुरू से बालक बालिका के मन में सामाजिक अत्याचारों से लड़ने की शक्?त?ि का संचार किया जाए। साथ ही यह भी  जरूरी है बच्चों से मिलने वालों एवं उनके साथ खेलने वालों के प्रति नजर रखी जाये वहीं बच्चों को भी असामान्य ष्व्यवहारष् के जागरूक किया जाये । इस तरह वह भविष्य में न तो अत्याचार सहन करेंगे और न ही अत्याचार होते देख सकेंगे । समाज में ऐसा साहस उत्पन्न करना होगा कि जहां कहीं भी घरए गली.मुहल्लेए शिक्षण संस्थानए बस अथवा कहीं भी बाल यौन उत्पीडन की घटना हो तो उन अपराधियों के खÞिलाफÞ सामूहिक कार्रवाई की जाए। अपने अधिकारों के प्रति सजगता व अपनी कमजÞोरी की भावना को तिलांजलि देनी होगी तभी बाल बालिकाओं पर होने वाले घरेलू व सामाजिक यौन उत्पीडन की घटनाओं  पर अंकुश लग सकेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Jul 2023 10:31:48 +0530</pubDate>
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                <title>शहीद बीरबल ने अपने खून से किया मां भारती को तिलक</title>
                                    <description><![CDATA[ दो जुलाई, 1946 को बीरबल सिंह की शव यात्रा निकली तो उसका नेतृत्व आजाद हिन्द फौज के कर्नल अमरसिंह ने हाथों में तिरंगा उठाए किया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/martyr-birbal-did-tilak-to-mother-bharati-with-his-blood/article-50406"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-06/630-400-size-(4)29.png" alt=""></a><br /><p>स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में वीर प्रसूता भूमि राजस्थान के अनेक सपूतों ने अपने प्राणों से मां भारती को तिलक किया है। उसी श्रृंखला में श्रीगंगानगर जिले के रायसिंह नगर के बीरबल सिंह जीनगर ने अत्याचारी ब्रितानी हूकुमत से लोहा लेते हुए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। उनके पिता सालगराम जीनगर परम्परागत जूती बनाने और रूई की आढ़त का काम करते थे। बाल्यवस्था से ही शारीरिक रूप से हष्ठपुष्ठ और पहलवानी के बेहद शौकीन बीरबल सिंह सामान्य परिवार में जन्म लेने के बावजूद राष्टÑीय घटनाक्रम में रूचि रखते थे। यह वह दौर था, जब आजादी के लिए युवा आगे बढ़कर मातृभूमि को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के लिए बेचैन थे।<br /><br />आजादी का सपना साकार होने बेहद करीब था। वे पश्चिमी राजस्थान में गठित बीकानेर प्रजा परिषद के सदस्य बने और सामंती अत्याचारों का विरोध करने, नागरिक अधिकारों के लिए होने वाले संघर्ष में हमेशा आगे रहते थे। उनका मानना था कि जनता के संगठित होने से ही राज्य की दमनकारी और शोषणकारी शक्तियों से मुकाबला किया जा सकता है। थोड़े ही समय में अपनी लगनशीलता और कर्तव्य का भाव होने से प्रजा परिषद के कर्मठ कार्यकर्ता बन गए। </p>
<p>30 जून और एक जुलाई, 1946 को रायसिंह नगर में बीकानेर प्रजा परिषद का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ। सम्मेलन के अध्यक्ष बीकानेर षड्यंत्र केस के प्रमुख सेनानी सत्यनारायण सराफ  थे। श्रीगंगानगर और आसपास के हिस्सों से सैकड़ों की संख्या में लोग हाथों में तिरंगा लिए सम्मेलन स्थल पर पहुंच रहे थे। इसी दौरान अत्याचार करने पर आमदा पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर रेस्ट हाउस में ले गई। सम्मेलन स्थल पर यह खबर आग की तरह फैल गई कि कुछ आजादी के दीवानों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। भीड़ के रेस्ट हाउस की तरफ जाने पर पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज कर दिया। जिनके हाथों में तिरंगे थे, उन्हें बूटों से कुचला गया। रेस्ट हाउस के बाहर बैठे सरकारी अधिकारी बढ़ती हुई भीड़ को देखकर घबरा गए और अन्दर की तरफ  भागने लगे। हजारों की संख्या में उमड़ रही भीड़ का नेतृत्व करते बीरबल सिंह जीनगर अपनी मूछों पर ताव दिए आगे बढ़ते ही चले जा रहे थे। भीड़ के जुलूस को देखते हुए सरकारी अधिकारियों ने घबराकर पास के फौजी कैम्प से कुछ सशस्त्र सैनिक सुरक्षा की दृष्टि से बुला लिए गए। सैनिकों ने बिना चेतावनी देते हुए जलियावाला बाग हत्याकांड की तरह दनादन गोलियां चला दी। बीरबल सिंह गोलियों की चिंता किए बिना ही आगे बढ़ते गए। भारत माता की जय इंकलाब जिन्दाबाद के नारों से उन्होंने आकाश को गूंजा दिया। दूश्य देखने योग्य था-एक तरफ आजादी के निहत्थे वीर थे तो दूसरी तरफ  सामंती सैनिक निहत्थे भारत माता के बेटों को गोलियों से छलनी करने के लिए मोर्चाबंदी करने लगे थे। तीन गोलियां बीरबल सिंह की जांघ में लगी, फिर भी वे रुके नहीं आगे बढ़ते गए। वन्देमातरम, झण्डा ऊंचा रहे हमारा का जयघोष करते रहे। रक्त शरीर से गिरने लगा। कुछ लोगों ने उन्हें अस्पताल भेजने की व्यवस्था करने की सोची, लेकिन पुलिस और सेना के जवानों ने पांडाल को चारों ओर से घेर लिया। भीड़ ने उन्हें पांडाल के नीचे चारपाई पर लिटा दिया और चारपाई के नीचे एक तसला रख दिया गया, रक्त शरीर से निकलकर तसले को भरने लगा। शरीर की एक-एक बूंद निकलने लगी, इससे शरीर कमजोर होकर शिथिल होने लगा था। चेहरे पर सफेदी उभरने लगी थी, लेकिन मुखमण्डल पर अभी भी तेजस्वी आभा थी। मौत के आगोश में भी रह-रह कर तिरंगा ऊंचा रहे हमारा का जयघोष कर रहे थे। <br /><br />आखिर में उनके शरीर ने प्राण त्याग दिए। दो जुलाई, 1946 को बीरबल सिंह की शव यात्रा निकली तो उसका नेतृत्व आजाद हिन्द फौज के कर्नल अमरसिंह ने हाथों में तिरंगा उठाए किया। हजारों गणमान्य लोग कंधा देने के लिए होड़ में देखे गए। उनकी शहादत का जनता में अब ऐसा रंग चढ़ा कि वे तिरंगे के बिना कोई जुलूस या कार्यक्रम करना ही नहीं चाहते थे। रायसिंह नगर के रेस्ट हाउस के पास जहां उनको गोली लगी थी, उसी पावन स्थल पर जनता ने उनकी संगमरमर की मूर्ति स्थापित की, जहां प्रति वर्ष 30 जून और एक जुलाई को मेला लगता है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 अप्रैल, 1983 को उनकी मूर्ति का अनावरण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए थे।<br /><br />-डॉ.गोमाराम जीनगर <br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Jun 2023 11:07:10 +0530</pubDate>
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                <title>जाने राजकाज में क्या है खास</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-rajkaj/article-50049"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-06/raj_kaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>अब नींद उड़ी समर्थकों की</strong><br />सूबे में राज की कुर्सी के लिए तीन साल तक उछलकूद करने वाले नेताजी के तेवर ढीले क्या पड़ गए, उनके समर्थकों की नींद उड़ गई। उड़े भी क्यों नहीं, बेचारों ने अपने लीडर के लिए बोलते समय न आगा सोचा था और न ही पीछा। न रात देखी थी और न ही दिन। कइयों ने तो पानी पी पीकर जोधपुर वाले भाईसाहब को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब जब से नेताजी के तेवर ढीले पड़े हैं, तब से समर्थकों के समझ में नहीं आ रहा कि माजरा क्या है। न तो उनको नेताजी हिंट दे रहे हैं और न ही उनकी कोहनी के गुड़ लगाने वाले बता रहे हैं। समर्थकों की नींद उड़ना भी लाजमी है, चूंकि बेचारों को चुनावी जंग में टिकट तक के लाले पड़ते दिख रहा है।</p>
<p><strong>मगर हम चुप नहीं रहेंगे </strong><br />मरुधरा का पानी ही ऐसा है कि जो भी पीता है, उस पर जल्द असर दिखाई देता है। अब देखो ना, हाथ वाले भाई लोगों ने तीन साल तक दो-दो हाथ करने के बाद एकदम चुप हैं। मगर उनका चुप रहना भी उन्हीं के लोगों के गले नहीं उतर रहा। अब देखो ना, दिल्ली वालों ने जितना मुंह बंद रखने का संकेत दिया, राज के रत्नों ने उतना मुंह चौड़ा कर बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। और तो और दोनों गुटों में समझौता कराने आए सरदारजी पर भी मरुधरा के पानी ने असर दिखाया, तो वे भी जुबान खोलने में एक कदम आगे निकल रहे हैं। अब दिल्ली वालों को कौन समझाए कि चंबल के साथ ही बीसलपुर के पानी का ही असर है कि चाहे कितनी ही लाल आंखें दिखाओ, मगर हम चुप नहीं रहेंगे।</p>
<p><strong>चर्चा में पर्दे के पीछे का रहस्य</strong><br />सूबे में इन दिनों एक रहस्य को लेकर चर्चा जोरों पर है। रहस्य भी नेताओं से नहीं, बल्कि ब्यूरोक्रेट्स से ताल्लुक रखता है। चर्चा है कि दौसा वाले मीनेश भाईसाहब ने जेजेएम एंड माइंस में करप्शन का मामला उठाते समय जो दस्तावेज उजागर किए हैं, वो भी किसी लम्बे हाथों वाले ब्यूरोक्रेट्स के बिना संभव नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि ब्यूरोक्रेट्स का मकसद करप्शन को उजागर करना नहीं, बल्कि ब्यूरोक्रेसी की नंबर एक की कुर्सी के लिए किसी को रोकना है। जिसको रोकना है, वह भी यूपी से ताल्लुक रखते हैं और रुकवाने वाले भी उसी धरा का पानी पीकर बड़े हुए हैं। भाईसाहब का मकसद भी पूरा होते दिख रहा है।</p>
<p><strong>जो दिख रहा है, वो नहीं है</strong><br />भगवा वाली पार्टी में भी इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं है। सारे भोपे अपने-अपने हिसाब से चल रहे हैं। भोपों के भगतों को समझ में नहीं आ रहा कि भगताई के लिए कौनसा चबूतरा चुना जाए, जो ऊंचा-नीचा नहीं, बल्कि समतल हो। सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले वर्कर भी एसी की हवा खाने के बहाने चार कौनों में बैठे नजर आते हैं। उनके हाव भाव और बात करने के अंदाज से आसानी से पता चल जाता है कि कौन से कोणे में किस भोपे के भगत हैं। लेकिन बंगले में दूजी दिशा के कोणे में एक कमरा ऐसा भी है, जिसमें अलग ही मूड के वर्कर बैठते हैं, जिनको सिर्फ सांवरिया जी की तस्वीर से ताल्लुक है। अब इन भोपों को कौन समझाए कि पॉलिटिक्स में जो होता है, वो दिखता नहीं है और जो दिखता है, वो होता नहीं है। </p>
<p><strong>ऐसी बनी मजबूरी</strong><br />राजनीति तो राजनीति होती है। इसमें कब क्या हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। वक्त बदलता है, तो कइयों की हेकड़ी भी निकल जाती है। अब देखो ना, सूबे में भगवा वाले नेताओं के सामने ऐसी मजबूरी बन गई कि न चाहते हुए भी अब मैडम की फोटो लगाने के सिवाय कोई चारा ही नजर नहीं आ रहा। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने कमल वालों के ठिकाने पर चर्चा है कि साढ़े चार साल से उछलकूद करने वालों को भी समझ में आ गया कि सूबे में होने वाले चुनावों में लाज बचाना मैडम के चेहरे के बिना मुश्किल है, चूंकि ये पब्लिक है जो सब जानती है, उसको सिर्फ एक इशारे की दरकार है।</p>
<p><br /><strong>-एलएल शर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Jun 2023 14:50:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>बदलाव के लिए सफाईकर्मी स्वयं प्रयास करें</title>
                                    <description><![CDATA[यह व्यवस्था समाज विशेष को सरकारी नौकरी में सुरक्षा प्रदान करती है और उनका भविष्य सुरक्षित अवश्य बनाती है, लेकिन समाज में सामाजिक समानता की स्थापना नहीं करती है बल्कि असंतुलन पैदा करती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/cleaners-themselves-try-to-make-a-difference/article-47482"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-06/z-11.png" alt=""></a><br /><p>वर्तमान में सफाई कर्मियों की भर्ती में वाल्मीकि समाज को 50 प्रतिशत एचबी आरक्षण की मांग को स्वीकार कर वर्ग विशेष पर सफाई व्यवस्था बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई है। हालांकि मांग भी समाज विशेष की ही थी जो मान ली गई है। यह  व्यवस्था समाज विशेष को सरकारी नौकरी में सुरक्षा प्रदान करती है और उनका भविष्य सुरक्षित अवश्य बनाती है, लेकिन समाज में सामाजिक समानता की स्थापना नहीं करती है बल्कि असंतुलन पैदा करती है। संविधान सामाजिक समानता की बात  कहता है जहां सभी को समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए। प्राचीन काल में चतुर्वर्ण्य समाज की स्थापना से पूर्व सभी मनुष्य एक समान थे। सभी के अधिकार, अवसर भी एक समान थे और जीवनशैली भी लगभग समान  ही थी , लेकिन सामाजिक, मानसिक, शारीरिक विकास क्रम के तहत  मनुष्य ने  गुण, कर्म, आधारित समाज की स्थापना की और धीरे-धीरे  कर्म के अनुसार वर्ण निर्धारित हुए और कालांतर में  वर्ण व्यवस्था कर्म और गुणों से बाहर निकलकर जन्म आधारित बना दी गई और समाज जातियों में और मनुष्य जातिवादी मानसिकता में बंट गया। अब कोई व्यक्ति  किसी भी प्रकार का कर्म  करें, जाति तो जन्म से ही निर्धारित होगी।</p>
<p>इस सामाजिक विकास की  दौड़ में कुछ वर्ग, कुछ जातियां पिछड़ गई या कहें कि उन्हें दौड़ से अलग कर अवसरों से वंचित कर उनके मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक विकास की राह को अवरूद्ध कर दिया गया। समाज के  ऊंच और नीच के विभाजन ने वर्ग और जाति भेद की गहरी खाई खोद दी गई। जो आज भी काफी हद तक अपना प्रभाव बनाए हुए हैं। इस वर्ग भेद और असमानता की खाई को पाटने के लिए संविधान में  समानता, सुरक्षा, संवैधानिक अधिकार, अवसर की समानता, आरक्षण जैसे तत्वों का समावेश कर समाज के सभी वर्गों को एक स्तर पर लाने का भरपूर प्रयास भी  किया गया और आजादी के 75 साल में काफी हद तक सफलता प्राप्त भी हुई है। पर एक वर्ग विशेष सफाई वर्ग, जिसे समय-समय पर अलग-अलग नाम देकर सम्मान देने का भी प्रयास किया गया। वह वर्तमान में वाल्मीकि वर्ग आज भी समाज के सामाजिक स्तर पर अंतिम पंक्ति में उसी तरह खड़ा है।</p>
<p>आज भी समाज में वह सामाजिक स्वीकार्यता को उस तरह प्राप्त नहीं कर सका है, जिस तरह अन्य वर्ग जो वंचित और कमजोर या दलित के रूप में पहचान रखते हैं। आज भी वाल्मीकि वर्ग एक अलग कॉलोनी में, वर्षों से एक ही व्यवसाय में, एक अलग समुदाय के रूप में जीवन बसर कर  रहा है। आज भी उसका अन्य समाजों के साथ  उसका  खाना-पीना, उठना बैठना, रहना, उत्सव, शादी ब्याह उसके लिए बहुत दुर्लभ है। समाज आज भी उसे तभी याद करता है जब सफाई करवानी हो, श्मशान में कार्य के लिए डेड बॉडी हटाने या सीवर, फिर वोट बैंक के रूप में ही याद किया जाता है। और सबसे खतरनाक कार्य सीवर लाइन की मैनुअल सफाई और मौत को गले लगाने का जोखिम भरा काम सस्ते में करवाना हो तो  यही याद आते हैं।</p>
<p>लेकिन सामाजिक बदलाव एक तरफा नहीं हो सकता है। यदि इस वर्ग विशेष को समाज में सम्मान, हक अधिकार, समानता एवम स्वीकार्यता चाहिए तो  आवश्यक है कि उसे भारत देश के गुण आधारित कर्म प्रधान सिद्धांत को स्वयं वापस अपनाना होगा। इन्हें स्वयं अपने शिक्षा और बौद्धिक विकास के लिए संवैधानिक अधिकार को काम लेना होगा। इन्हें स्वयं त्यागना पड़ेगा। उस पुरातन सफाई कार्य को जिसे इन्होंने परमानेंट अपना रोजगार और अधिकार बना लिए है। जब यह कौम सफाई के कार्य में स्वयं के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग करती है तो यह जाहिर है कि वह स्वयं पर लगे ठप्पे सफाई कर्मी से बाहर नहीं निकलना चाहती है अर्थात् स्वयं के लिए गंदगी और झाड़ू का चयन आज के आधुनिक समाज में वह खुद कर रही है, जबकि पुरातन समाज में इस पर थोपा गया था। सरकारी नौकरी जीवन पर्यंत सुरक्षा अवश्य करती है और आरक्षण नौकरी को सुरक्षित भी करता है सफाई कर्मी के रूप में आप जीवन की सुरक्षा और रोटी का जुगाड़ कर सकते है, लेकिन आप एक नई पीढ़ी के विकास को अवरूद्ध कर रहे हैं। उसके गुणों को विकसित होने से रोक रहे है उन्हें आसान नौकरी दिलाकर। आप समाज की मुख्य धारा में आने से रोक रहे हैं। नए कर्म, नए व्यवसाय, नई दुनिया, नई व्यवस्था में अपनी जगह बनाने की आवश्यकता है जैसे की आरक्षण से अन्य जातियों ने भी बनाई है। आपके लिए आरक्षण हर सरकारी नौकरी में उपलब्ध है तो कुछ प्राइवेट सेक्टर में भी। तो नई पीढ़ी को नए रोजगार के लिए संघर्ष करने के अवसर दें, वहां के लिए प्रेरित करें और अवसरों की जानकारी भी दें। हालांकि इस बदलाव में एक दो पीढ़ियों को काफी संघर्ष करना होगा, पर शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी। इस सफाई करने की दुनिया से बाहर आने की। फिर दूसरे वर्ग, समाज के लोगों को भी इस व्यवसाय सफाई व्यवस्था में आने से इस कार्य और इस कौम विशेष की महत्ता की जानकारी भी होगी। स्वत: ही सामाजिक समानता और गुण कर्म प्रधान समाज भी बनेगा।वो गलियां, मोहल्ले, वो वर्ग विभेद भी तभी खतम होगा जब सफाई के काम को सभी व्यक्ति, सभी वर्गों का काम माना जाएगा। किसी वर्ग विशेष का काम नहीं जैसे विदेशों में किया जाता है।</p>
<p>अत: अब समय स्वयं को और स्वयं के कार्य को बदलने का है ताकि सफाई कर्मियों की नई पीढ़ी भी खुली स्वतंत्र, समानता आधारित और कार्य की विविधता वाले समाज में सम्मान से  जी सकें और अपनी पुरातन जीवन शैली जो कूड़े कचरे के ढेर और गटर की नालियों से बाहर निकलकर नई दुनिया के लिए स्वयं परिवर्तन कर,  नए स्वच्छ वातावरण और समानता आधारित समाज में  खुद भी सांस ले सकें और समाज में बदलाव भी नजर आए।<br />           </p>
<p><strong>-सीमा हिंगोनिया</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jun 2023 10:50:25 +0530</pubDate>
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                <title>सीजेरियन डिलीवरी के बढ़ते मामले चिंताजनक</title>
                                    <description><![CDATA[ सीजेरियन डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चे का विकास प्रभावित होता ही है, साथ ही मां भी शारीरिक कमजोरी का शिकार हो जाती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-cases-of-caesarean-delivery-worrying/article-46585"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/x-72.png" alt=""></a><br /><p>वाकई यह बेहद चिंताजनक है कि देश में हर साल सर्जरी से पैदा होने वाले बच्चों की तादाद बढ़ रही है। यह संख्या सिर्फ  निजी अस्पतालों में ही नहीं बल्कि सरकारी अस्पतालों में भी बढ़ी है। यह जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि सीजेरियन आपरेशन की मदद से पैदा होने वाले बच्चों की वजह से मानव जाति के विकास पर असर पड़ता है। सीजेरियन डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चे का विकास प्रभावित होता ही है, साथ ही मां भी शारीरिक कमजोरी का शिकार हो जाती है। गौरतलब है कि भारत में बड़े पैमाने पर सीजेरियन आपरेशन हो रहे हैं और पिछले एक दशक में यह अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकड़ों के मुताबिक 2010 तक भारत में सिर्फ साढ़े आठ फीसदी बच्चे सीजेरियन आपरेशन से होते थे। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक 10-15 फीसदी से कम ही था, लेकिन राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वे-5 (एनएचएफएस) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में सीजेरियन आॅपरेशन के मामले में भारत इससे बहुत आगे चला गया है। राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वे-5 (एनएचएफएस) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल औसतन 2.40 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं, जिनमें से करीब 80 फीसदी अस्पतालों में पैदा होते हैं। इनमें से 21.5 फीसदी यानी करीब 41 लाख बच्चों का जन्म हर साल सीजेरियन प्रसव से होता है। सर्वे के मुताबिक सीजेरियन प्रसव के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2019-2021 के बीच देश में सीजेरियन प्रसव के मामले 21.5 फीसदी दर्ज किए गए हैं। मगर शहरी क्षेत्रों के निजी अस्पतालों में कमोबेश दो में से एक प्रसव सीजेरियन हो रहा है। इससे पूर्व जब 2015-16 में एनएचएफएस-4 सर्वे किया गया था, तब देश में सीजेरियन प्रसव के मामले 17.2 फीसदी थे। यानी पांच वर्षों में इसमें चार फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली यानी एचएमआईएस ने 2019-20 में सीजेरियन डिलीवरी के 20.5 फीसदी की सूचना दी है, जो 2020-21 में बढ़कर 21.3 फीसदी और फिर 2021-22 में 23.29 फीसदी हो गया। भारतीय राज्यों में, सीजेरियन डिलीवरी का उच्चतम फीसदी तेलंगाना में देखा गया।</p>
<p>अगर हम निजी और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर होने वाले सीजेरियन डिलीवरी की बात करें तो निजी स्वास्थ्य केंद्रों में सीजेरियन प्रसव ज्यादा किए जाते हैं। ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि ज्यादा बिल बनाने के लिए ऐसा किया जाता है। एनएचएफएस-5 सर्वे के आंकड़े भी इसी बात की तरफ ईशारा ज्यादा करते हैं। इसमें पाया गया कि जो प्रसव निजी स्वास्थ्य केंद्रों में हुए, वहां 47.4 फीसदी सीजेरियन हुए हैं। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 49.3 फीसदी तक दर्ज किया गया है। जबकि, ग्रामीण क्षेत्रों में 46 फीसदी पाया गया। एनएचएफएस-4 सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, निजी अस्पतालों में 40.9 फीसदी प्रसव सीजेरियन हो रहे थे। यानी यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। जो वाकई बेहद चिंताजनक है।</p>
<p>यह सही है कि कई मामलों में सीजेरियन डिलीवरी के माध्यम से बच्चों का जन्म होना मां और बच्चे दोनों की सेहत के लिए फायदेमंद रहता है। तमाम महिलाओं को डिलीवरी के समय कुछ कारणों से जान जाने का भी खतरा होता है जिसकी वजह से सीजेरियन डिलीवरी करानी पड़ती है। लिहाजा मेडिकल साइंस की इस प्रगति को जीवन रक्षक भी माना जाता है। लेकिन, हमें यह समझना होगा कि सीजेरियन डिलीवरी का महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। कई शोध और अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि सीजेरियन डिलीवरी का महिलाओं के स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन प्रभाव रहता है। यह डिलीवरी महिलाओं के साथ-साथ पैदा होने वाले बच्चों की सेहत पर भी असर डालती है। बता दें कि जिन महिलाओं की नॉर्मल डिलीवरी होती है उनकी तुलना में सीजेरियन डिलीवरी वाली महिलाओं की रिकवरी में अधिक समय लगता है। जैसा कि सीजेरियन डिलीवरी से रिकवरी करने में औसतन 4 से 6 सप्ताह का समय लगता है। साथ ही, नॉर्मल डिलीवरी की तुलना में सीजेरियन डिलीवरी के कारण महिलाओं का शरीर अधिक कमजोर हो जाता है। इस डिलीवरी में महिलाओं के शरीर से अधिक मात्रा में रक्त निकलता है। जिसके कारण कमजोरी हो जाती है। कई बार सीजेरियन डिलीवरी के दौरान हुई दिक्कतों की वजह से महिला को लंबे समय तक इसके साइड इफेक्ट्स से जूझना पड़ता है। इसके अलावा, सीजेरियन डिलीवरी के बाद शरीर में नॉर्मल डिलीवरी की तुलना में अधिक बदलाव देखने को मिलते हैं जिसके कारण आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बना रहता है। शरीर में मोटापे के अलावा कई अन्य बदलाव भी होते हैं। इन बदलावों के कारण कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। हालांकि नॉर्मल डिलीवरी के बाद भी शरीर में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं, लेकिन इनका खतरा सीजेरियन डिलीवरी से कम होता है।लिहाजा, सीजेरियन डिलीवरी के लगातार बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने की दिशा में कोशिशें होनी चाहिए। यह देखा गया है कि पिछले एक दशक के भीतर महिलाओं की जीवनशैली और खान-पान में बड़े स्तर पर बदलाव हुआ है।  </p>
<p><strong>-अली खान</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 May 2023 10:08:55 +0530</pubDate>
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                <title>कर्नाटक में मुरझाया कमल का फूल</title>
                                    <description><![CDATA[लगभग दो वर्ष पूर्व बीजेपी नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री  बनाया। तभी से कहा जाने लगा था कि  बीजेपी का ग्राफ  अब ढलान की ओर जाएगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/withered-lotus-flower-in-karnataka/article-46359"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/e2.jpg" alt=""></a><br /><p>दक्षिण के कर्नाटक राज्य में लगभग दो दशक पूर्व पहली बार विधानसभा के चुनावों  में बीजेपी को इतनी सीटें आई थीं कि उसने राज्य के एक  क्षेत्रीय  दल जनता दल-स के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। उस समय तक यह पार्टी और इसका पूर्व रूप जनसंघ  केवल उत्तर  भारत के राज्यों तक ही सीमित थी। इसलिए जब यहां सरकार बनी तो पार्टी के नेताओं ने कहा कि दक्षिण में कमल खिल गया है। इन नेतओं यह भी कहा कि वह दिन दूर नहीं जब दक्षिण के अन्य राज्यों में भी शीघ्र ही कमल खिलना शुरू हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। दक्षिण में यह दल केवल  कर्नाटक तक ही सीमित रहा। इसकी ताकत यहां घटती बढ़ती रही। एक समय ऐसा भी आया जब इसने राज्यों में अपने ही बलबूते पर सरकार बनाई। इस दौर में इसके  सबसे बड़े नेता येद्दयुरप्पा थे, जिनके नेतृत्व में राज्य में बीजेपी की सरकार चार बार बनी। वे लिंगायत समाज, जो यहां राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से सबसे प्रभावी समुदाय है, से आते हैं तथा राज्य की राजनीति में उनका कद बड़ा रहा है।</p>
<p>हाल के विधानसभा चुनावों में पहला मौका था कि बीजेपी की चुनावी कमान उनके हाथ में नहीं थी। लगभग दो वर्ष पूर्व बीजेपी नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री  बनाया। तभी से कहा जाने लगा था कि  बीजेपी का ग्राफ  अब ढलान की ओर जाएगा। हालांकि बोम्मई भी लिंगायत समाज से आते हैं, लेकिन समुदाय में उनका दर्जा उतना ऊंचा दर्जा नहीं है जितना  येद्दियुरप्पा का है। पद से हटते वक्त येद्दियुरप्पा ने कहा था कि वे  अब  चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन राजनीति  में सक्रिय  रहकर पहले की भांति काम करते रहेंगे। वे पार्टी के लिए काम करते रहे, इसलिए पार्टी ने उन्हें संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया। राज्य में बीजेपी की ओर से पहला ऐसा मौका था जब चुनाव बिना उनके नेतृत्व के लड़ा गया। राज्य में बीजेपी की अन्य कारणों सहित हार का एक बड़ा कारण यह भी था कि वे सीधे तौर पर चुनाव की रणनीति किए हुए नहीं थे।<br />हालांकि बोम्मई की छवि एक साफ  नेता की है, लेकिन प्रशासन और पार्टी पर उनकी वह पकड़ नहीं थी, जो येद्दियुरप्पा की थी। पिछले दो सालों में एक के बाद एक  भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए, जिससे सरकार की  छवि पर दाग लग गए। इसके बावजूद पार्टी के नेताओं को   भरोसा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तिलस्म से राज्य में पार्टी को जितवाने में सफल रहेंगे। लेकिन राज्य में पार्टी की सरकार के खिलाफ  हवा इतनी बिगड़ चुकी थी कि मोदी भी राज्य में उनकी नैया पार नहीं लगा सके।</p>
<p>कांग्रेस ने  भ्रष्टाचार को ही  चुनावी  मुद्दा बनाया, जिसके सामने बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग धरी की धरी रह गई। चुनावों की घोषणा से कुछ दिन पूर्व ही  बीजेपी सरकार ने राज्य के दो बड़े और प्रभावी समुदायों, लिंगायत और वोक्कालिंगा को खुश करने के लिए आरक्षण में उनके प्रतिनिधित्व को 2.2 प्रतिशत बढ़ा दिया। इस आरक्षण को बढ़ाने से   मुस्लिम समुदाय के 4 प्रतिशत आरक्षण को किसी अन्य श्रेणी में डाल दिया गया,पर  इससे न तो बीजेपी के लिंगायत और न ही  वोक्कालिंगा  समुदाय के मतों में इजाफा हुआ। दूसरी और मुस्लिम समुदाय ने खुलकर कांग्रेस का साथ दिया। कांग्रेस ने वायदा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो  बीजेपी सरकार के इस कदम को वापस ले लेगी। इसके अलवा कांग्रेस पार्टी ने रेवड़ियां बांटने के वायदे में भी कमी नहीं  रखी। इसने पांच बड़ी गारंटियां मतदाताओं  को दीं, जिनमें 200 यूनिट मुफ्त बिजली भी शामिल हैं। इसमें कोई शक नहीं कि लगभग चार वर्ष पूर्व राज्य पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद डीके शिवकुमार ने पार्टी  संगठन को मजबूत बनाने में कोई कमी नहीं रखी। पार्टी में गुटबंदी काफी हद तक घटी। पार्टी संगठन ने चुनावी तैयारियां बहुत पहले से ही शुरू कर दी थीं। ऐसा पहली बार हुआ कि  पार्टी ने  कुल 224 सीटों में 160  सीटों के उम्मीदवार के नाम चुनाव की तिथियां घोषित होने से पूर्व ही सार्वजनिक कर दिए। इसका श्रेय काफी हद तक  पार्टी के राष्टÑीय अध्यक्ष  मल्लिकार्जुन खडगे को भी  जाता है, जो खुद कर्नाटक से आते हैं तथा लम्बे समय से राज्य की राजनीति में रहे हैं।</p>
<p>चूंकि इस चुनाव को जितवाने का बड़ा श्रेय  शिवकुमार को  जाता है। इसलिए उन्हें भरोसा था कि जीत के बाद  राज्य की सरकार के कमान उन्हें ही सौंपी जाएगी। लेकिन पार्टी ने सिद्धारमैया को  इस पद के लिए चुना। वे 2013 से 2015 तक राज्य में कांग्रेस शासनकाल में मुख्यमंत्री रहे हैं। बीजेपी शासनकाल में वे विपक्ष के नेता भी थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 May 2023 10:37:39 +0530</pubDate>
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