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                <title> festival - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description> festival RSS Feed</description>
                
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                <title>वसंत पंचमी 23 जनवरी को श्रद्धा और उल्लास से मनाई जाएगी, उदयात तिथि के अनुसार 23 जनवरी को ही वसंत पंचमी का पर्व मनाया जाएगा</title>
                                    <description><![CDATA[वसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा। पंचमी तिथि प्रात: 2.28 बजे शुरू होकर 24 जनवरी को 1.46 बजे समाप्त होगी। सरस्वती पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 6.43 से दोपहर 12.15 बजे तक रहेगा। यह दिन विद्या, कला और संगीत से जुड़े लोगों के लिए शुभ माना जाता है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/vasant-panchami-will-be-celebrated-with-devotion-and-gaiety-on/article-140454"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(5)15.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला वसंत पंचमी का पावन पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा। पंचमी तिथि 23 जनवरी को प्रात: 2.28 बजे प्रारंभ होकर 24 जनवरी को 1.46 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार 23 जनवरी को ही वसंत पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। मां सरस्वती की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त प्रात: 6.43 बजे से दोपहर 12.15 बजे तक रहेगा। मान्यता है कि इसी दिन ज्ञान, वाणी और संगीत की देवी मां सरस्वती की उत्पत्ति हुई थी। विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, साहित्यकारों और संगीत से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा में पीले वस्त्र, पीले पुष्प, हल्दी, केसर, पीली मिठाई और पीले व्यंजन का प्रयोग शुभ माना जाता है।</p>
<p><strong>क्या हैं धार्मिक मान्यता ?</strong></p>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की लग्न भी लिखी गई थी। साथ ही कामदेव और रति की पूजा का भी विधान है। मां सरस्वती की सच्चे मन से की गई आराधना कभी निष्फ ल नहीं जाती और साधक को ज्ञान, बुद्धि व विवेक का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 13:00:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकआस्था का पर्व छठ : आज नहाय खाय, 26 को खरना, 27 को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य, 28 को उदयकालीन सूर्य को अर्घ्य देकर होगा पर्व का समापन </title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर में लोक आस्था का महापर्व डाला छठ 25 अक्टूबर से शुरू होगा। सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा के इस चार दिवसीय पर्व में नहाय-खाय, खरना, अस्ताचलगामी सूर्य अर्घ्य और उदयाचलगामी सूर्य अर्घ्य शामिल हैं। व्रती महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि हेतु 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। यह पर्व शुद्धता और आत्मसंयम का प्रतीक है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/chhath-the-festival-of-folk-faith-today-nahay-khay-kharna/article-130479"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news28.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। लोक आस्था का महापर्व डाला छठ शनिवार से शुरू होगा। सूर्यदेव और छठी मैया की आराधना को समर्पित इस पर्व को लेकर गुलाबी नगरी में रह रहे पूर्वांचल और बिहार राज्यों के लोगों में भारी उत्साह है। जीवन में शुद्धता, आत्मसंयम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के प्रतीक छठ पूजा को डाला छठ या सूर्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है। त्रेतायुग में माता सीता, द्वापर में द्रौपदी और कर्ण द्वारा भी छठ पूजा किए जाने का उल्लेख मिलता है, जो इस पर्व की प्राचीनता और सनातन परंपरा को दर्शाते हैं। छठ महापर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह प्रकृति, अनुशासन और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है। सूर्योपासना के माध्यम से यह पर्व जीवन में ऊर्जा, संतुलन और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रेरणा देता है। व्रती महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं।</p>
<p><strong>किस दिन क्या होगा ?</strong></p>
<p>पहले दिन 25 अक्टूबर को नहाय-खाय, दूसरे दिन 26 अक्टूबर को खरना होगा। तीसरे दिन 27 अक्टूबर को अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य प्रदान किया जाएगा। चौथे और अंतिम दिन 28 अक्टूबर को कमर तक पानी में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व पूर्ण होगा। बिहार समाज संगठन के सुरेश पंडित ने बताया कि पहले दिन व्रती महिलाएं स्नान कर लौकी-भात का शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसी दिन व्रत की पवित्र शुरुआत होती है। दूसरे दिन खरना के साथ 36 घंटे के निर्जला व्रत की शुरुआत होगी। खरना के दिन व्रती महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। शाम को गुड़ की खीर और घी से बनी रोटी बनाकर सूर्यदेव की पूजा करती हैं। पूजा के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ होता है। तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Oct 2025 11:03:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>त्योहारों की मिठास, सेहत पर भारी न पड़ने पाए</title>
                                    <description><![CDATA[भारत विविधता और उत्सवों की भूमि है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-sweetness-of-festivals-should-not-outweigh-your-health/article-129834"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news-(2)8.png" alt=""></a><br /><p>भारत विविधता और उत्सवों की भूमि है। वर्ष भर चलने वाले त्योहारों की श्रृंखला में धनतेरस से लेकर दिवाली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज तक का समय विशेष रूप से उल्लासपूर्ण होता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि परिवार, मित्रों और समाज के साथ मिलकर आनंद मनाने का अवसर होता है। दीपों की जगमगाहट, उपहारों का आदान-प्रदान, पारिवारिक मेल-मिलाप और विशेष रूप से स्वादिष्ट पकवान इन सभी की सम्मिलित अनुभूति ही त्योहारों की असली मिठास है।किन्तु जैसे-जैसे समय बदला है, त्योहार मनाने का स्वरूप भी बदलता गया है। आज बाजार में उपलब्ध रेडीमेड मिठाइयों, पैक्ड स्रैक्स और केमिकल युक्त प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों ने जगह बना ली है। यह सुविधा भले ही समय की बचत करे, लेकिन इसके गंभीर दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। त्योहारों की यह कृत्रिम मिठास अब कई बार हमारे स्वास्थ्य पर कड़वी छाप छोड़ जाती है।</p>
<p><strong>मिठास में घुला जहर : </strong></p>
<p>त्योहारों के दौरान मिठाइयों की मांग अत्यधिक बढ़ जाती है। इसी अवसर का लाभ उठाकर बाजार में मिलावटी मिठाइयों की बाढ़ आ जाती है। खाद्य सुरक्षा विभाग की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में त्योहारों के समय बिकने वाली करीब 20-25 प्रतिशत मिठाइयों में मिलावट पाई जाती है। मिलावटी मावा, सिंथेटिक रंग, कृत्रिम सुगंध, और सस्ते तेलों में तला हुआ नकली घी ये सभी तत्व सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह होते हैं। इन नकली और हानिकारक तत्वों का सेवन पाचन तंत्र को कमजोर करता है, लिवर और किडनी पर अतिरिक्त भार डालता है, और कई बार विषाक्तता जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर देता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार व्यक्तियों के लिए यह स्थिति और भी घातक हो सकती है। आज भारत तेजी से मधुमेह, मोटापा,हृदय रोग,उच्च रक्तचाप और फैटी लिवर जैसी जीवनशैली जनित बीमारियों की चपेट में आ रहा है।</p>
<p><strong>रिपोर्ट के अनुसार :</strong></p>
<p>विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और 13 करोड़ से ज्यादा प्री-डायबिटिक हैं अर्थात वे जल्द ही मधुमेह की चपेट में आ सकते हैं यदि जीवनशैली न बदली जाए। इसी तरह,नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे बताता है कि शहरी क्षेत्रों में हर तीसरा वयस्क व्यक्ति मोटापे से ग्रस्त है। त्योहारों के समय जब मिठाइयों, तले भुने व्यंजनों और अधिक कैलोरी युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन अचानक बढ़ जाता है, तब यह स्थिति और गंभीर हो जाती है। भारत में मिठाइयों का महत्व केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। यह हमारी संस्कृति, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी हुई हैं। किसी के घर मिठाई भेजना, उपहार में देना या साथ मिलकर खाना इन सभी क्रियाओं में अपनापन झलकता है। परंतु, आज मिठाइयां कहीं न कहीं दिखावे और सामाजिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम भी बन गई हैं।</p>
<p><strong>आकर्षक पैकेजिंग :</strong></p>
<p>कई लोग अब महंगी ब्रांडेड मिठाइयां या आकर्षक पैकेजिंग वाली वस्तुएं देने को प्राथमिकता देते हैं, भले ही उनमें पोषण शून्य हो। कभी-कभी यह प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ जाती है कि लोग खुद के स्वास्थ्य और परिवार की सेहत की भी अनदेखी कर देते हैं। बिल्कुल नहीं। त्योहारों का उद्देश्य खुशी और सामूहिकता मनाना है, न कि असंयम और अपव्यय करना। हमें यह समझना होगा कि हम परंपराओं को निभाते हुए भी सजग रह सकते हैं। यदि कुछ साधारण उपाय अपनाए जाएं, तो मिठास के साथ सेहत भी बनी रह सकती है। घर की बनी मिठाइयों को प्राथमिकता दें,ये न केवल स्वादिष्ट होती हैं, बल्कि उनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर भी हमारा नियंत्रण रहता है। बाजार से मिठाई खरीदते समय पैकिंग पर नंबर अवश्य जांचें, इससे पता चलता है कि उत्पाद भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा प्रमाणित है या नहीं। कृत्रिम रंग, अत्यधिक चाशनी या सुगंध से युक्त मिठाइयों से बचें, ये पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। प्राकृतिक विकल्पों का प्रयोग करें जैसे गुड़, शहद, खजूर, स्टीविया, नारियल, ड्राई फू्रट्स आदि से बनी मिठाइयां। मात्रा पर नियंत्रण रखें,मिठाइयों का स्वाद जीभ पर हो, आदत न बने। संयम ही स्वास्थ्य की कुंजी है।</p>
<p><strong>सावधानी बरतें :</strong></p>
<p>डायबिटीज और मोटापे के रोगी विशेष सावधानी बरतें,दवाओं का नियमित सेवन, ब्लड शुगर मॉनिटरिंग, और हल्का व्यायाम न छोड़ें। बच्चों को सीमित मात्रा में मिठाई दें उनकी आदतें इसी समय बनती हैं। उन्हें स्वस्थ विकल्पों की आदत डालें। अतिथि सत्कार में भी संतुलन रखें,मिठाई के साथ फल, मेवे या हेल्दी स्रैक्स भी परोसें। सरकार और समाज दोनों को मिलकर मिलावटी खाद्य पदार्थों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। आमजन को भी अपने अधिकारों और खाद्य सुरक्षा के नियमों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। हर व्यक्ति यदि दुकानदार से सही जानकारी मांगने लगे तो अनियमितताएं स्वत: कम होंगी। त्योहारों की मिठास तभी सार्थक है, जब वह मन के साथ शरीर को भी प्रसन्न करे। असली मिठास वह नहीं जो जीभ को भाए, बल्कि वह है जो शरीर को नुकसान न पहुंचाए और आत्मा को तृप्त करे। शुद्धता, संतुलन और सजगता से ही हम त्योहारों के मूल उद्देश्य सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकते हैं। इस बार जब दीपावली का दीप हर कोने में उजाला फैलाए, तो एक दीप मन में भी जलाएं,सेहत की सुरक्षा का, जिम्मेदार परंपरा का और संयमित जीवनशैली का। तभी त्योहारों की खुशी वास्तव में संपूर्ण कहलाएगी।</p>
<p><strong>-राजेंद्र कुमार शर्मा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Oct 2025 12:56:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करवा चौथ भारतीय संस्कृति का लोकप्रिय पर्व</title>
                                    <description><![CDATA[हर साल कार्तिक मास की चतुर्थी को जब शाम का सूरज डूबता है, तो भारत के कोने-कोने में सजी-संवरी महिलाएं थाली में दीप, छलनी और करवा सजाकर चांद के दर्शन करती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/karva-chauth-is-a-popular-festival-of-indian-culture/article-129275"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/_4500-px)2.png" alt=""></a><br /><p>हर साल कार्तिक मास की चतुर्थी को जब शाम का सूरज डूबता है, तो भारत के कोने-कोने में सजी-संवरी महिलाएं थाली में दीप, छलनी और करवा सजाकर चांद के दर्शन करती हैं। उनके माथे पर लाल बिंदी, हाथों में मेंहदी, आंखों में इंतजार और होठों पर एक ही सवाल चांद निकला क्या,यह दृश्य भारतीय संस्कृति की सुंदरता का प्रतीक भी है और उसकी गहराई में छिपे सामाजिक अर्थों का आईना भी। करवा चौथ का व्रत उत्तर भारत में विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा,राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। परंपरा के अनुसार यह व्रत सुहाग की स्थिरता और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है, और दिनभर की तपस्या के बाद जब चांद निकलता है तो पत्नी छलनी से पति का चेहरा देख कर व्रत तोड़ती है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह व्रत सिर्फ प्रेम और आस्था की अभिव्यक्ति है या समाज की पितृसत्तात्मक जड़ों में गहरे धंसा एक प्रतीक।</p>
<p><strong>सुहाग से जोड़ा गया :</strong></p>
<p>भारतीय समाज में स्त्री के जीवन को सुहाग से जोड़ा गया है,उसकी खुशी, उसकी प्रतिष्ठा और उसकी पहचान तक। विवाह के बाद उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका पति माना गया, और उसकी मृत्यु को अभिशाप समझा गया। ऐसे में करवा चौथ जैसे व्रत स्त्री के समर्पण, त्याग और सहनशीलता का उत्सव बन गए। लेकिन क्या यह प्रेम का उत्सव है या स्त्री के अस्तित्व को पति की उम्र के साथ बांध देने का सांस्कृतिक औचित्य। आज की पढ़ी-लिखी स्त्री जब करवा चौथ का व्रत रखती है, तो उसके कारण परंपरागत नहीं भी हो सकते। कई महिलाओं के लिए यह पति के प्रति प्रेम का, साथ निभाने का, रिश्ते में सामंजस्य का प्रतीक बन चुका है। वहीं कई पुरुष भी अब पत्नी के साथ समान भाव से व्रत रखने लगे हैं,यह बदलाव सकारात्मक है। परंतु यह भी उतना ही सच है कि करवा चौथ आज एक कल्चरल इवेंट बन गया है,टीवी धारावाहिकों, फिल्मों और सोशल मीडिया पर यह व्रत जितना ग्लैमरस दिखाया जाता है, उतनी ही गहराई में उसका मूल अर्थ खोता जा रहा है। कभी यह व्रत गांव की औरतों के बीच अपनापन और सहयोग का प्रतीक था। महिलाएं एक-दूसरे के घर जातीं, मिट्टी के करवे में जल भरतीं, गीत गातीं, करवा चौथ का व्रत है भाई, करवा लाना भूली न जाई।</p>
<p><strong>इंस्टा रील्स का युग :</strong></p>
<p>यह त्योहार उनके लिए आपसी मिलन का अवसर था, जहां वे जीवन की तकलीफों को साझा करतीं। पर अब यह व्रत सोने के करवे, महंगे साज-श्रृंगार और डिजाइनर साड़ियों का प्रदर्शन बन गया है। उपवास के बजाय अब इंस्टा रील्स का युग है,जहां सजना-संवरना ही मुख्य उद्देश्य बन गया है। परंपराओं को केवल अंधविश्वास कहकर नकार देना भी उचित नहीं। हर संस्कृति की अपनी आत्मा होती है। करवा चौथ के पीछे जो भाव है प्रेम, समर्पण और आस्था का, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी जरूरी है कि हम परंपरा को आधुनिक दृष्टि से देखें। आज जब हम समानता, स्वतंत्रता और पारस्परिक सम्मान की बात करते हैं, तो यह व्रत भी एकतरफा नहीं रहना चाहिए। यदि पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है, तो पति भी पत्नी की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए समान भाव से प्रार्थना करें, यही सच्चा प्रेम और समानता है। दिलचस्प बात यह है कि करवा चौथ का धार्मिक या पौराणिक आधार उतना स्पष्ट नहीं है, जितना कि इसके लोकप्रचलन का प्रभाव। करवा यानी मिट्टी का घड़ा, जो प्राचीन भारत में जल का प्रतीक था और चौथ यानी चतुर्थी का दिन।</p>
<p><strong>प्रेम का उत्सव :</strong></p>
<p>आधुनिक समाज में करवा चौथ की व्याख्या के कई अर्थ हैं। एक ओर यह प्रेम का उत्सव है, तो दूसरी ओर यह स्त्री पर आदर्श पत्नी बनने का सामाजिक दबाव भी। यह द्वंद्व हमें सोचने पर मजबूर करता है,क्या हर प्रेम का प्रमाण त्याग से ही मापा जाएगा, क्या भूखे रहकर ही सच्ची निष्ठा सिद्ध होती है,और क्या यह परंपरा पति-पत्नी के बीच समान संबंधों का उत्सव बन पाई है या अब भी पति-प्रधानता का ही प्रतीक है। यह सच है कि समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव आया है। अब कई जगह पति भी व्रत रखते हैं, यह बदलाव बताता है कि समाज धीरे-धीरे समानता की ओर बढ़ रहा है। त्योहार का अर्थ वही रहता है, पर दृष्टिकोण बदल जाता है। करवा चौथ का भी यही हाल है,जहां पहले यह स्त्री के कर्तव्य का प्रतीक था, वहीं अब यह रिश्तों की साझेदारी का रूप ले रहा है। आज जरूरत है कि हम परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाएं। करवा चौथ को न तो केवल रूढ़िवादिता समझें, न ही सिर्फ दिखावे का त्योहार बनाएं। इसके भीतर के प्रेम, भाव और समर्पण को सच्चे अर्थों में आत्मसात करें,बिना किसी सामाजिक दबाव के। हर स्त्री को यह अधिकार होना चाहिए कि वह चाहे तो व्रत रखे या न रखे,क्योंकि प्रेम की परिभाषा उपवास से नहीं, आपसी समझ और सम्मान से तय होती है।</p>
<p><strong>-डॉ.प्रियंका सौरभ</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/karva-chauth-is-a-popular-festival-of-indian-culture/article-129275</link>
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                <pubDate>Fri, 10 Oct 2025 12:13:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संघ शताब्दी वर्ष-विजयादशमी उत्सव : राजस्थान में 9 हजार स्थानों पर हुए कार्यक्रम, जयपुर प्रांत में 2500 से ज्यादा स्थानों पर हुए कार्यक्रमों में तीन लाख स्वयंसेवक हुए शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विजयादशमी उत्सव 28 सितम्बर से 5 अक्टूबर तक मनाया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/sangh-centenary-year-vijayadashami-festival-programs-held-at-9-thousand-places/article-128972"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(9)3.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विजयादशमी उत्सव 28 सितम्बर से 5 अक्टूबर तक मनाया गया। इस बार पूरे राजस्थान में प्रत्येक बस्ती व मंडल स्तर पर करीब 9 हजार स्थानों पर कार्यक्रम हुए। इनमें संघ के सभी आयु वर्ग के स्वयंसेवक सम्मिलित हुए। कार्यक्रम में समाज के सभी वर्गों की सहभागिता रही। उल्लेखनीय है कि संघ की रचना के अनुसार चार पांच गांव मिलकर एक मंडल होता है और शहरों में दो हजार घर की एक बस्ती होती है।</p>
<p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जयपुर प्रान्त संघचालक सरदार महेंद्र सिंह मग्गो ने बताया कि जयपुर प्रांत में 2500 से ज्यादा स्थानों पर कार्यक्रम हुए, जिनमें लगभग तीन लाख स्वयंसेवकों ने भाग लिया। एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने नया गणवेश बनवाया। इन कार्यक्रमों में करीब पांच लाख जनता भी सहभागी रही। बड़ी संख्या में महिलाएं और युवाओं ने विजयादशमी के कार्यक्रमों में भाग लिया। जयपुर शहर में 291 स्थान पर विजयादशमी उत्सव का आयोजन हुआ।</p>
<p><strong>कार्यक्रमों में यह रहे मुख्य वक्ता :</strong></p>
<p>इन कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य दुर्गादास, शंकर लाल, सुरेश कुमार, सेवा भारती के अखिल भारतीय अधिकारी मूलचंद, क्षेत्र संघचालक डॉ. रमेश अग्रवाल, क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम, क्षेत्र कार्यवाह जसवंत खत्री, सह क्षेत्र कार्यवाह गेंदालाल और प्रांत प्रचारक बाबूलाल समेत संघ के कई अधिकारियों ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित किया। इस अवसर पर भारत की प्राचीन परंपरा के अनुसार उत्साह से शस्त्र पूजन भी किया गया। अनेक स्थानों पर स्वयंसेवकों ने संचलन भी निकाला।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Oct 2025 13:37:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अहंकार के प्रतीक रावण के पुतले को फूंका : ‘अन्याय पर न्याय’ की जीत का दिया संदेश, 51 फीट का रावण बारिश में भीगने से कई जगह से फट गया कागज </title>
                                    <description><![CDATA[गुलाबी नगरी में अहंकार, अन्याय और दंभ के प्रतीक रावण के पुतले का जगह-जगह दहन कर समाज में ‘अन्याय पर न्याय’ की जीत का संदेश दिया गया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/the-message-of-the-victory-of-justice-on-injustice-to/article-128570"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/111-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। गुलाबी नगरी में अहंकार, अन्याय और दंभ के प्रतीक रावण के पुतले का जगह-जगह दहन कर समाज में ‘अन्याय पर न्याय’ की जीत का संदेश दिया गया। शहर के अनेक हिस्सों में शाम ढलने के साथ ही हल्की-हल्की बारिश होने से रावण के पुतले कुछ जगह भीग गए, लेकिन शहरवासियों का उत्साह कम नहीं हुआ। राम ने जैसे ही रावण की नाभि पर अग्नि बाण छोड़ा, उसके साथ ही रावण धू-धू कर जलने लगा और पटाखों की अनुगूंज से वातावरण गुंजायमान हो गया। रावण के दहन के साथ ही ‘जयश्री राम’ के जयघोष के साथ वातावरण गूंज उठा।  </p>
<p>आदर्शनगर, विद्याधरनगर, न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, शास्त्री नगर में राष्ट्रपति मैदान, झोटवाड़ा में नांगल जैसा बोहरा, कालवाड़ रोड, प्रतापनगर, सांगानेर सहित शहर में सैकड़ों स्थानों पर रावण के पुतले जलाए गए। लोगों ने परिवार सहित रावण दहन के दृश्य का आनंद लिया। कई स्थानों पर दशहरा मेलों का आयोजन हुआ, जहां खाने-पीने और बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले एवं स्टॉल्स का विशेष प्रबंध किया गया। आदर्शनगर दशहरा मैदान में 105 फीट ऊंचे रावण और 90 फीट ऊंचे कुंभकरण के पुतलों का दहन हुआ। रावण दहन से पूर्व रंगीन आतिशबाजी का नजारा देखने को मिला। नियाग्रा फॉल्स जैसे झरने, स्टार वार जैसी झलक और आकाश में धूमकेतु, चमकीली अशरफि यां और फू लों की वर्षा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। जैसे ही भगवान श्रीराम के स्वरूप ने रावण की नाभि में अग्निबाण छोड़ा, रावण धू-धू कर जल उठा। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयकारों के बीच दृश्य को अपनी आंखों में कैद कर लिया। इसके बाद राम मंदिर में भगवान श्रीराम का राजतिलक सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>बारिश से रावण दहन में हुई परेशानी :</strong></p>
<p>शहर में कई जगह छिटपुट और कुछेक जगह तेज बारिश ने रावण दहन में खलल डाल दिया। रावण पानी में भीग गए और उसमें रखे पटाखे भी भीगने से रावण को जलाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। आदर्श नगर में रावण दहन के दौरान बारिश होने से लोगों ने कुर्सियों को सिर पर रख लिया और जब तक बारिश होती रही, उसका छाते के रूप में इस्तेमाल करते रहे।</p>
<p><strong>ऑनलाइन रूपी रावण का दहन :</strong></p>
<p>वैशाली नगर व्यापार मंडल समिति की ओर से आम्रपाली सर्किल पर ऑनलाइन रूपी रावण का दहन किया गया। जयपुर व्यापार मंडल अध्यक्ष डॉ. ललित सांचौरा ने कहा कि आज के समय में व्यापारियों के लिए तथा आम जनता के लिए अगर कोई रावण है तो वे विदेशी ऑनलाइन कंपनिया हैं, जो इस स्वदेशी भारतीय बाजार को खत्म किया जा रहा है। भारत डेढ़ सौ करोड़ जनसंख्या का देश है, यहां पर सभी व्यक्तियों को रोजगार चाहिए, जिसके चलते गिनी-चुनी ऑनलाइन विदेशी कंपनिया झूठे प्रचार कर अधिकतर सेल का हिस्सा अपने नाम कर रही है, जिसके चलते बेरोजगारी और स्वदेशी स्थानीय दुकान बंद होने के कगार पर है। अगर यही चलता रहा तो लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे, अर्थव्यवस्था ठप हो जाएगी। रावण दहन के समय व्यापार मंडल महासचिव वीरेंद्र राघव, रमेश शर्मा, दिलीप सिंह एवीरेंद्र सिंह लोग मौजूद रहे।</p>
<p><strong>मुरलीपुरा में रामलीला का समापन, रावण का दहन :</strong></p>
<p>मुरलीपुरा सर्किल पर चल रही ग्यारह दिवसीय रामलीला का गुरुवार रात समापन हुआ। आदर्श रामलीला मंडल समिति की ओर से आयोजित रामलीला में अंतिम दिन रावण वध की लीला ने माहौल को भक्तिमय कर दिया। इसके बाद 60 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े। जैसे ही राम ने तीर चलाया, अग्नि की लपटों में घिरा रावण का पुतला धू-धू कर जलने लगा। आसमान में आतिशबाजियां छूटने लगीं और  जय श्रीराम के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। इसके बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने की झांकी निकाली गई और उनका राजतिलक किया गया। मंच पर फू लों की वर्षा के बीच कलाकारों ने राजा राम का राज्याभिषेक किया।  समिति अध्यक्ष अभिनव शर्मा और समाजसेवी राकेश शर्मा ने मंच पर पहुंचकर रामलीला के सभी कलाकारों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया।</p>
<p><strong>जलता हुआ रावण नीचे गिर गया :</strong></p>
<p>आदर्श नगर में जलता हुआ रावण जमीन पर गिर गया। उसके बाद उसमें से धुंआ निकलता रहा। गनीमत रही कि कोई रावण के आस-पास नहीं था, नहीं तो बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Oct 2025 10:15:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सत्य की जीत का सन्देश देता है दशहरा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहां अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/dussehra-gives-the-message-of-victory-of-truth/article-128508"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(4)2.png" alt=""></a><br /><p>भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहां अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। यहां साल भर अनेक त्योंहार मनाए जाते हैं, जो न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक भी होते हैं। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है और इसका भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान है। दशहरा का पर्व भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसे विजयादशमी कहा जाता है, जिसका अर्थ है विजय प्राप्त करने वाला दसवां दिन। रामायण के अनुसार भगवान राम ने रावण का वध कर अपनी पत्नी सीता को उसके बंदीगृह से मुक्त कराया था। यह पर्व यह संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो अंत में जीत सत्य और धर्म की ही होती है। यह त्योहार लोगों को नैतिक मूल्यों, सत्यए और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। दशहरा अथवा विजयदशमी पर्व को भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में। दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा का पर्व है। शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है।</p>
<p><strong>रावण का संहार :</strong></p>
<p>दशहरा भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसी दिन भगवान राम ने बुराई के प्रतीक दस सिर वाले रावण का संहार किया था, तो देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार करने वाले महिषासुर का 10 दिन तक चले भयंकर युद्ध के बाद मां दुर्गा ने वध किया था। इसीलिये इसको विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं। इस दिन शस्त्र पूजा की जाती है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का समापन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक व शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में फसल उगाकर अनाज घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के लिये वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए उनका पूजन करता है। भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है।</p>
<p><strong>विशेष पूजा :</strong></p>
<p>बंगाल, ओडिशा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह बंगालियों, ओडिया और आसमिया लोगों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। बंगाल में दशहरा पूरे पांच दिनों के लिए मनाया जाता है। ओडिशा और असम मे चार दिन तक त्योहार चलता है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं। देश के नामी कलाकारों को बुलवा कर दुर्गा की मूर्ति तैयार करवाई जाती हैं। यहां दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और प्रसाद वितरण किया जाता है। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर लगाती हैं व सिंदूर से खेलती हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। अन्त में देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं, जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है। इस दिन विद्यालय जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन शुभ माना जाता है। लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त समझते हैं। इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है।</p>
<p><strong>मैसूर का दशहरा :</strong></p>
<p>कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालिकाओं से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग टार्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा का आनंद लेते हैं। पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। अन्य स्थानों की ही भांति यहां भी दस दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। स्त्रियां और पुरुष सभी ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि वाद्य यंत्रों को लेकर बाहर निकलते हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूम धाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है। बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय ना मानकरलोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं,जो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह पर्व पूरे 75 दिन चलता है। यहां दशहरा श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। बस्तर में यह समारोह लगभग 15वीं शताब्दी से शुरु हुआ था। इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है।</p>
<p><strong>-रमेश सर्राफ धमोरा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 12:35:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>इस नवरात्रि अपने मन में बैठे महिषासुर का नाश करें</title>
                                    <description><![CDATA[भारत अपनी प्राचीन संस्कृति और विविध पर्व-त्योहारों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/destroy-mahishasura-sitting-in-your-mind-this-navratri/article-127760"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(2)20.png" alt=""></a><br /><p>भारत अपनी प्राचीन संस्कृति और विविध पर्व-त्योहारों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां प्रत्येक त्योहार केवल एक सामाजिक या धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि उसमें कोई गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ छुपा होता है। परंतु खेद की बात यह है कि आज के समय में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो इन त्योहारों के पीछे छिपे गहरे रहस्यों को समझते हैं। नवरात्रि भी ऐसा ही एक पर्व है जिसे आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक बड़े ही उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती जैसी शक्तियों की आराधना का प्रतीक माना जाता है। लोग घरों में मिट्टी का कलश स्थापित करते हैं, अखंड दीप जलाया जाता है, कन्याओं का पूजन किया जाता है, उपवास रखे जाते हैं और माता का जागरण होता है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जहां लगातार 9 दिनों तक स्त्री शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।</p>
<p><strong>आध्यात्मिक रहस्य :</strong></p>
<p>क्या कभी हमने यह सोचा है कि ये देवी-स्वरूप वास्तव में कौन हैं नवरात्रि के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्य क्या हैं। इन सवालों के उत्तर हमें उन पौराणिक आख्यानों में मिलते हैं, जिन्हें हम कथा के रूप में सुनते हैं-जैसे कि महिषासुर वध की कथा। इस कथा के अनुसार, जब महिषासुर नामक असुर ने देवताओं को पराजित कर दिया, तब त्रिदेवों की सामूहिक शक्ति से आदि शक्ति का प्रकट रूप हुआ-जो अष्टभुजा, त्रिनेत्री और दिव्य शस्त्रों से सुसज्जित थीं। उन्होंने महिषासुर का वध किया और देवताओं को मुक्त कराया। इसी कारण उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है। यदि इस आख्यान को गहराई से देखा जाए, तो यह केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक कहानी नहीं है, बल्कि इसमें एक गहरा आध्यात्मिक रूप छिपा है। महिषासुर का तात्पर्य किसी विशेष व्यक्ति से नहीं, बल्कि एक मनोवृत्ति से है, महिष अर्थात भैंसा, जो मंद बुद्धि, तमोगुण और आलस्य का प्रतीक है। वही तमसिक प्रवृत्तियां हमारे मन में भी बसती हैं, जो हमें आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति से दूर रखती हैं। ऐसे ही अन्य असुर भी प्रतीकात्मक हैं -मधु और कैटभ राग और द्वेष के प्रतीक हैं। धूम्रलोचन यानी धुएं जैसी दृष्टि ,जो ईर्ष्या और भ्रम का सूचक है। शुम्भ और निशुम्भ हिंसा और द्वेष के प्रतिनिधि हैं। रक्तबीज उस आदत या दोष का प्रतीक है, जो जितना नष्ट किया जाए, उतना ही अधिक बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>असुरों का अर्थ :</strong></p>
<p>इन सभी असुरों का अर्थ है हमारे भीतर की नकारात्मक,अवांछनीय और विनाशकारी प्रवृत्तियां। जब ये प्रवृत्तियां हमारे जीवन में हावी हो जाती हैं, तब भीतर की दिव्यता दब जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब कलियुग के प्रारंभ में अज्ञान, अधर्म और असुरी शक्तियां चारों ओर फैल चुकी थीं, तब स्वयं परमपिता परमात्मा ने त्रिदेवों के माध्यम से भारत की सुकन्याओं को दिव्य ज्ञान, योगबल और सात्विक गुणों से सुसज्जित किया। वे कन्याएं आत्मिक दृष्टि से जागृत थीं। उनका तीसरा नेत्र ज्ञान और विवेक का प्रतीक था और अष्ट भुजाएं,उनके अंदर की दिव्य शक्तियों-जैसे सहनशीलता, करुणा, त्याग, आत्मबल आदि का प्रतीक थीं। इन कन्याओं ने ही आत्मज्ञान से अपने भीतर और समाज में बसे हुए असुरतत्वों को परास्त किया। यही कारण है कि वे आदि शक्ति के रूप में पूजी गईं। उन्होंने न केवल स्वयं को तमोगुण से मुक्त किया, बल्कि अन्य लोगों को भी दिव्यता की ओर प्रेरित किया। नवरात्रि पर्व के प्रमुख प्रतीक कलश स्थापना, अखंड दीप, कन्या पूजन और जागरण सब इसी आध्यात्मिक घटना की स्मृति में हैं। कलश आत्मा का प्रतीक है, जिसमें दिव्यता और सात्विकता की स्थापना होती है। अखंड दीप आत्मिक जागृति और परमात्मा के ज्ञान का प्रकाश है, जो नव दिनों तक सतत जलता है।</p>
<p><strong>अज्ञान से जगाना :</strong></p>
<p>कन्या पूजन उस शक्ति की स्मृति है, जो इन कन्याओं ने संसार को अज्ञान से जगाने में दिखाई। जागरण अज्ञान की नींद से बाहर आने का प्रतीक है। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम नवरात्रि को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न मानें, बल्कि इसके पीछे छिपे आध्यात्मिक सन्देश को समझें। यह पर्व हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देता है, जहां महिषासुर, रक्तबीज, शुम्भ-निशुम्भ जैसी प्रवृत्तियां आज भी सक्रिय हैं आलस्य, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, लालच, मोह, और घमंड। इस नवरात्रि पर संकल्प लें कि हम केवल बाह्य पूजा या जयघोष तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने भीतर की इन असुर प्रवृत्तियों का नाश करेंगे। अपने भीतर के तम को दूर कर ज्ञान का दीप जलाएंगे। यही सच्चे अर्थों में नवरात्रि मनाना होगा। तो आइए, इस नवरात्रि हम केवल कन्याओं का पूजन न करें, बल्कि अपने भीतर की आत्मिक कन्या यानी आत्मा में स्थित शुद्धता, पवित्रता, सहनशीलता और दिव्यता को जागृत करें। इसी के माध्यम से हम महिषासुर जैसे तमोगुणी विचारों का नाश कर सकते हैं और अपने जीवन को सच्चे अर्थों में दिव्य बना सकते हैं। नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक आत्मिक अभियान है स्वयं को पहचानने, आंतरिक अशुद्धियों से युद्ध करने और आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का। यह पर्व हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर के अंधकार को दूर कर आत्मिक प्रकाश से जगमगाएं।</p>
<p><strong>-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 12:29:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>त्योहारों से पहले पीएम ने दिया नारा : जो भी खरीदें, उसमें हिंदुस्तान की मिट्टी की महक हो- मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[मोदी ने कहा कि अब त्योहारों का समय आ रहा है, इस पूरे समय में हमें स्वदेशी का मंत्र लगातार दोहराना है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/before-festivals-the-pm-gave-the-slogan-whatever-the-soil/article-127164"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)9.png" alt=""></a><br /><p>भैंसोला (धार)। आने वाले त्योहारों के पहले बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को विकसित भारत की दिशा में ले जाने के उद्देश्य से देशवासियों से स्वदेशी अपनाने का आग्रह करते हुए 'गर्व से कहो, ये स्वदेशी है' का नया नारा दिया। मोदी मध्यप्रदेश के धार जिले के भैंसोला में आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने देश के पहले 'पीएम मित्रा' पार्क की आधारशिला रखी। मोदी ने कहा कि अब त्योहारों का समय आ रहा है, इस पूरे समय में हमें स्वदेशी का मंत्र लगातार दोहराना है। लोग अपने जीवन में इस मंत्र को उतारें। जो भी खरीदें, देश में ही बना हो, उसमें हिंदुस्तान की मिट्टी की महक हो। </p>
<p><strong>ये नया भारत है, किसी की परमाणु धमकियों से नहीं डरता</strong><br />मोदी ने एक बार फिर पाकिस्तान के लिए चेतावनी भरे शब्दों में दोहराया कि ये नया भारत है, जो किसी की परमाणु धमकियों से नहीं डरता और घर में घुस कर मारता है। उन्होंने जैश-ए-मुहम्मद के कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी की हालिया स्वीकारोक्ति के संदर्भ में कहा कि हमारा देश मां भारती की रक्षा को सवार्च्च प्राथमिकता देता है। पाकिस्तान से आए आतंकियों ने हमारी माताओं और बहनों का सिंदूर उजाड़ा था, हमने ऑपरेशन सिंदूर करके आतंकियों के किाने उजाड़ दिए। हमारे वीर जवानों ने पलक झपकते ही पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया।  </p>
<p><strong>कोई भी वस्तु खरीदने से पहले देख लें, अपने देश में ही बनी हैं ना</strong><br />उन्होंने व्यापारी वर्ग का आह्वान करते हुए कहा कि ये वर्ग भी देश की मदद करे। 2047 तक हमें देश को विकसित भारत बनाना है, उसका रास्ता 'आत्मनिर्भर भारत' से होकर जाता है। व्यापारी जो भी बेचें, भारत में ही बना हो। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने स्वदेशी को आजादी का माध्यम बनाया था, हमें अब स्वदेशी को विकसित भारत का माध्यम बनाना है। लोग अपने बच्चे के लिए खिलौना भी खरीदें, तो वो भारत का हो। कोई भी चीज़ खरीदने के पहले देखें कि वो देश में बनी हो।</p>
<p><strong>देश का पैसा देश में ही रहना चाहिए</strong><br />प्रधानमंत्री ने कहा कि जब हम स्वदेशी खरीदते हैं तो वो पैसा देश में ही रहता है। ये पैसा देश के विकास के काम आता है। उस पैसे से गरीब कल्याण की योजनाएं बनती हैं। स्वदेशी से रोजगार भी पैदा होता है। इसी क्रम में उन्होंने राज्य सरकार से कहा कि वो ये अभियान चलाए, हर दुकान पर बोर्ड हो,'गर्व से कहो, ये स्वदेशी है'।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Sep 2025 09:45:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिंजारा आज, हरियाली तीज कल : मिट्टी से शिव-पार्वती, गणेश जी और सखियों की मूर्तियां बनाकर उनका विधिवत किया जाता है पूजन</title>
                                    <description><![CDATA[हरियाली तीज शुभ संयोग के साथ मनाई जाएगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/sinjara-today-hariyali-teej-tomorrow-is-duly-worshiped-by-making/article-121650"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news66.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। हरियाली तीज शुभ संयोग के साथ मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार-श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 26 जुलाई की रात 10.41 बजे से शुरू होकर 27 जुलाई की रात 10.41 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार पर्व 27 जुलाई को मनाया जाएगा। इस दिन रवि योग का शुभ संयोग भी बन रहा है, जो शाम 4.23 से शुरू होकर 28 जुलाई की सुबह 5.40 बजे तक रहेगा। रवि योग में व्रत और पूजन विशेष फ लदायी माना जाता है। हरियाली तीज को श्रावणी तीज भी कहा जाता है। यह पर्व सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना के लिए किया जाता है।</p>
<p>इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं, शिव-पार्वती और गणेश जी की पूजा करती हैं। साथ ही सखी-सहेलियों संग झूला झूलती हैं और सावन के लोकगीत गाकर उत्सव का आनंद लेती हैं। कुंवारी कन्याएं भी योग्य वर की प्राप्ति के लिए इस दिन व्रत करती हैं। ज्योतिषाचार्य डॉ.अनीष व्यास ने बताया कि हरियाली तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसे सौंदर्य, प्रेम और प्रकृति से जुड़ा पर्व माना जाता है।  जिन लड़कियों के रिश्ते तय हो चुके उनके ससुराल से भी सिंजारा आएगा। नवविवाहितों के भी सिंंजारा आने की परम्परा रही हैं।</p>
<p><strong>घेवर का विशेष महत्व :</strong></p>
<p>तीज का गुलाबी नगरी में विशेष महत्व है, तीज और बसंजारा पर घेवर खाने की एक परम्परा रही है। बाजार में मिठाई की दुकानें घेवर से सजी हुई हैं। बाजार में घेवर तीन सौ रुपए किलो से लेकर एक हजार रुपए तक उपलब्ध हैं। बाजार में पचास ग्राम से लेकर एक किलो तक में घेवर बेचे जा रहे हैं। देशी घी और दूध से बने घेवर के भाव अधिक हैं। शहर में परम्परागत घेवर के साथ ही फ्लेवर युक्त घेवर भी बाजार में बिक रहे हैं। बाजार में मावा, पनीर, मैंगो, चॉकलेट फ्लेवर में घेवर मिल रहे हैं।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Jul 2025 10:41:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुरु गीता पाठ के साथ गुरु पूर्णिमा महोत्सव शुरू, पर्व महोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा </title>
                                    <description><![CDATA[अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से गुरु पूर्णिमा महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/guru-purnima-festival-starts-with-guru-geeta-recitation-festival-festival/article-119893"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/882roer-(4)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से गुरु पूर्णिमा महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। जयपुर की तीनों शक्तिपीठों, मानसरोवर के वेदना निवारण केन्द्र सहित सभी प्रज्ञा केन्द्रों में आयोजन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। गायत्री शक्तिपीठ ब्रह्मपुरी में तीन दिवसीय गुरु पूर्णिमा पर्व महोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा।</p>
<p>शक्तिपीठ के व्यवस्थापक सोहनलाल शर्मा ने बताया कि मंगलवार को गुरु गीता का सामूहिक पाठ किया गया। गायत्री परिवार की सैंकड़ों महिला कार्यकर्ताओं ने गुरु गीता का संगीतमय पाठ किया। प्रारंभ में वेदमाता गायत्री और गुरू सत्ता का पूजन किया गया। बुधवार को सुबह 6 से शाम 5 बजे तक गायत्री महामंत्र का अखंड जप किया जाएगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु सबके लिए सद्बुद्धि की कामना करते हुए गायत्री महामंत्र का जाप करेंगे। शाम को दीपयज्ञ होगा। गुरू पूर्णिमा महोत्सव 10 जुलाई को मनाया जाएगा। सुबह 8 से 11 बजे तक नौ कुंडीय महायज्ञ, गुरु चरण पादुका पूजन, गुरु दीक्षा एवं अन्य संस्कार आयोजित किए जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Jul 2025 12:19:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रामनवमी पर निकलेगी भव्य शोभायात्रा :पांच हाथी, आठ ऊंट, आठ घोड़े और श्रीराम दरबार की झांकी होगी शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[श्रीरामकृष्ण जयन्ती महोत्सव समिति ट्रस्ट, जयपुर की ओर से रामनवमी के अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकलेगी, जिसमें तीन दर्जन से अधिक झांकियां और बैंड-बाजे शामिल होंगे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/a-grand-procession-will-come-out-on-ramnavami-five-elephants/article-109641"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/257rtrer-(12).png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। श्रीरामकृष्ण जयन्ती महोत्सव समिति ट्रस्ट, जयपुर की ओर से रामनवमी के अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकलेगी, जिसमें तीन दर्जन से अधिक झांकियां और बैंड-बाजे शामिल होंगे। शोभा यात्रा में पांच हाथी, आठ ऊंट, आठ घोड़े और श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघन स्वरूप की विशेष सजी हुई झांकी रहेगी। करीब छह किमी की यात्रा में जगह-जगह यात्रा का जगह-जगह स्वागत किया जाएगा। ट्रस्ट के महामंत्री प्रवीण (बड़े भैया) और उपाध्यक्ष अलबेली माधुरीशरण महाराज ने गुरुवार को मीडिया को बताया कि यात्रा सूरजपोल अनाज मण्डी से छह अप्रैल को त्रिवेणी धाम के संत रामरिछपालदास महाराज रवाना करेंगे। शोभा यात्रा रामगंज बाजार, बड़ी चौपड़, जौहरी बाजार, सांगानेरी गेट, बापू बाजार, चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया बाजार, छोेटी चौपड़ से होती हुई चांदपोल बाजार स्थित रामचंद जी मंदिर में पहुंचेगी। प्रेस वार्ता में गोविन्द देवजी मंदिर के सेवाधिकारी मानस गोस्वामी भी मौजूद थे। </p>
<p><strong>मानस के प्रसंगों पर झांकियां होंगी : </strong>शोभायात्रा में श्रीराम चरित्र मानस के प्रसंगों पर आधारित झांकियां होंगी। गोरांग महाप्रभु संकीर्तन मडल हरि गुणगान करते हुए चलेगा। </p>
<p><strong>यहां होगा स्वागत :</strong> शोभा यात्रा का हीदा की मोरी पर सामाजिक संस्थाएं, वर्तमान एवं पूर्व विधायक स्वागत करेंगे। रामगंज चौपड़ पर शांति एवं विकास समिति एवं पूर्व मंत्री, फूटाखुर्रा पर पुलिस कमिश्नर, जिला कलक्टर, आईजी, लाड़ली जी का मंदिर आरती दर्शन, बड़ी चौपड़ सर्राफा बाजार व्यापार मण्डल एवं सामाजिक संस्थाएं, गोलछा टॉकिज पर प्रमुख समाजसेवी एवं प्रशासनिक अधिकारी, ताड़केश्वर मंदिर पर ट्रस्ट के प्रशासनिक अधिकारी और रामचन्द मंदिर में मंदिर परिवार स्वागत करेगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Apr 2025 14:50:10 +0530</pubDate>
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