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                <title>सरकारी स्कूलों को पीपीपी मोड पर क्यों नहीं चलाया जा सकता?</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी संसाधनों के साथ निजी भागीदारी से शिक्षा व्यवस्था को मिल सकती है नई दिशा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/why-can-t-government-schools-be-run-on-the-ppp-mode/article-164733"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-09/111200-x-600-px)-(5)6.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। देश में आईआईटी, आईआईएम और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों ने उत्कृष्टता के मानक स्थापित किए हैं, लेकिन स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। आज यदि छात्रों और अभिभावकों को सरकारी और निजी स्कूलों में से चुनने का विकल्प दिया जाए, तो बड़ी संख्या में लोग निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं। इसका मुख्य कारण बेहतर शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और प्रभावी प्रबंधन माना जाता है। बच्चों को समान अवसर और अच्छी शिक्षा मिल सके, इसी उद्देश्य से शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम भी लाया गया था। लेकिन अब चुनौती केवल बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की है।</p>
<p><strong>निजी भागीदारी से शिक्षा में सुधार</strong><br />यदि सरकारी स्कूल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं, तो उन्हें पीपीपी यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर चलाने पर विचार किया जा सकता है। सरकार का बुनियादी ढांचा और संसाधन बरकरार रखते हुए निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता, आधुनिक तकनीक, शिक्षण पद्धतियां और प्रबंधन क्षमता जोड़ी जा सकती हैं। इससे सरकारी स्कूलों में निजी स्कूल जैसा बेहतर शैक्षणिक वातावरण विकसित हो सकता है और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निजी स्कूलों का रुख करने की आवश्यकता कम होगी। इससे सरकारी स्कूलों की कार्यसंस्कृति और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा तथा आम परिवारों को महंगे निजी स्कूलों पर निर्भरता भी कम होगी।<br />इस मुद्दे पर दैनिक नवज्योति ने शहर के लोगों की प्रतिक्रिया जानी। इसमें शिक्षाविदों, डॉक्टरों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और समाजसेवियों ने अपनी राय रखी।</p>
<p>सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के परिणाम अपेक्षित रूप से दिखाई देने में समय लग रहा है सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जिनका प्रभाव आने वाले समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। आईआईएम जैसे संस्थानों में परिणाम सीधे नजर आते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में सुधार एक सतत प्रक्रिया है। सरकारी स्कूलों का स्तर लगातार सुधर रहा है और यह कहना उचित नहीं होगा कि वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही। सभी वर्गों और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से आने वाले बच्चों को सामान्य शैक्षिक स्तर तक पहुंचाना बड़ी उपलब्धि है, विशेषकर उन बच्चों के लिए जिन्हें घर पर पढ़ाई में पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता। सरकारी स्कूलों के अधिकांश बच्चे 50 प्रतिशत तो अच्छा डिजर्व करते हैं। निजी स्कूलों में भी कई बार चयन प्रक्रिया के कारण बेहतर परिणाम दिखते हैं। गिने चुने नामी प्राइवेट स्कूलों को छोड़ दें तो वहीं, कुछ निजी स्कूलों के बच्चों में भी बुनियादी गणितीय ज्ञान और सवाल हल करने की क्षमता का अभाव देखने को मिलता है।सरकारी स्कूलों में निरंतर हो रहे सुधार भविष्य में समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा तय करेंगे।<br /><strong>-आशा मंडावत, संयुक्त निदेशक, शिक्षा विभाग</strong></p>
<p>शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए सरकारी स्कूलों को पीपीपी मोड पर देना चाहिए। निजी क्षेत्र को पर्याप्त अधिकार और जिम्मेदारी मिलने पर ही गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार संभव है। सरकारी शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से प्रशिक्षण दिया जाता है, लेकिन प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है प्राइवेट सेक्टर को प्रशिक्षण देना चाहिए । गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए टेस्ट की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार स्कूलों में डिजिटल बोर्ड, स्मार्ट बोर्ड और कंप्यूटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। सरकारी शिक्षकों से शिक्षण कार्य के अलावा अन्य गैर-शैक्षणिक कार्य नहीं करवाए जाने चाहिए, ताकि वे पूरी तरह बच्चों की शिक्षा और गुणवत्ता सुधार पर ध्यान केंद्रित कर सकें।<br /><strong>- प्रोफ़ेसर (डॉ.) अमित सिंह राठौर, निदेशक ओम कोठारी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट</strong></p>
<p>पीपीपी मॉडल के माध्यम से सरकारी स्कूलों के विकास को नई दिशा मिल सकती है। इससे शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान दिया जा सकेगा। सरकारी स्कूलों में योग्य शिक्षक हैं, लेकिन आज के समय में आधुनिक तकनीक, खेल, गतिविधियों और बेहतर बुनियादी सुविधाओं की भी जरूरत है। पीपीपी मॉडल से स्कूलों में निजी संस्थानों जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे स्कूल भवनों और परिसंपत्तियों का बेहतर रखरखाव होगा तथा रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इसका लाभ बच्चों, अभिभावकों और समाज को मिलेगा। इसके लिए सरकार को शिक्षा बजट में भी आवश्यक वृद्धि करनी चाहिए।<br /><strong>- गौरव सेन झाला, निदेशक, सेन्ट्रल एकेडमी शिक्षान्नतर</strong></p>
<p>पीपीपी मोड पर स्कूलों के संचालन से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। साथ ही, बुनियादी ढांचे का विकास होगा और जिन संसाधनों की वर्तमान में कमी है, उनकी उपलब्धता भी बेहतर हो सकेगी।<br /><strong>-डॉ. पवन सिंघल, कार्डियोलॉजिस्ट</strong></p>
<p> सरकारी स्कूलों को पीपीपी मोड पर संचालित करने से शिक्षा कुछ महंगी हो सकती है, लेकिन इससे गुणवत्ता में सुधार की संभावना है। अभिभावकों की आर्थिक भागीदारी बढ़ने से वे बच्चों की पढ़ाई के प्रति अधिक जिम्मेदार और सजग हो सकते हैं। कई एनजीओ और भामाशाह पहले से सरकारी स्कूलों को गोद लेकर शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। पीपीपी मॉडल में सरकार, निजी संस्थाओं और जनता की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे स्कूलों की स्थिति बेहतर हो सकती है। सरकार नीति और संसाधन उपलब्ध कराए तथा समाज सक्रिय भूमिका निभाए तो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार संभव है। शिक्षा ही देश के विकास की आधारशिला है।<br /><strong>- ऋतु बोहरा, सीए</strong></p>
<p>सरकारी स्कूलों को पीपीपी मोड पर देने से सबसे अधिक नुकसान बच्चों का होगा। निजी हाथों में जाने से स्कूलों का स्वरूप व्यावसायिक हो सकता है और फीस बढ़ने की संभावना रहेगी। शिक्षा के व्यावसायीकरण के बजाय सरकार को मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। निजी स्कूलों में अभिभावक बच्चों की पढ़ाई और शिक्षकों की कार्यप्रणाली को लेकर अधिक सजग रहते हैं। इसी तरह सरकारी स्कूलों के अभिभावकों को भी जागरूक और सक्रिय किया जाना चाहिए, ताकि वे शिक्षकों के शिक्षण कार्य की नियमित निगरानी कर सकें। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अभिभावकों की भागीदारी और प्रभावी मॉनिटरिंग जरूरी है।<br /><strong>- दीप्ति राजावत, अध्यक्ष, रोटरी क्लब पद्मिनी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 12:31:09 +0530</pubDate>
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                <title>सरकार के साथ निजी भागीदारी बढ़ेगी आधुनिक तकनीक का होगा इस्तेमाल </title>
                                    <description><![CDATA[भारत सरकार के खान मंत्रालय के निदेशक योगेन्द्र भांभू ने कहा कि देश में माइनिंग सेक्टर में रिफार्मस लागू हो रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/private-partnership-with-government-will-increase-modern-technology-will-be/article-101017"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/5554-(14)6.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। खनन को मिनरल्स एक्सप्लोरेशन को लेकर राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में देश-प्रदेश के एक्सपर्ट जुटे। राजस्थान में मिनरल्स एक्सप्लोरेशन में निजी सहभागिता बढ़ाने और आधुनिक तकनीक का उपयोग करने पर जोर दिया गया। खान विभाग के प्रमुख शासन सचिव टी.रविकांत ने कहा कि क्रिटिकल और स्ट्रेटेजिक मिनरल डिपोजिट्स का डेटा 31 जनवरी तक पब्लिक डोमेन पर केन्द्र व राज्य की एक्सप्लोरेशन संस्थान के साथ ही एनपीईएज व पीईएज के साथ साझा किया जाएगा। प्रदेश में एक्सप्लोरेशन का रोडमैप बनाया जा रहा है। राजस्थान में 89 फीसदी पोटाश के भंडार हैं। देश दुनिया के खनिज खोज व खनन की आधुनिक तकनीक का उपयोग माइनिंग सेक्टर में सुनिश्चित करने का काम हो रहा है। आज मेजर मिनरल ब्लॉकों की नीलामी में केवल एक वर्ष में ही राजस्थान शीर्ष पर आ गया है। निदेशक माइंस भगवती प्रसाद कलाल ने कहा कि राजस्थान में क्रिटिकल और स्ट्रेटिजिक मिनरल्स के व्यापक डिपोजिट मिलने की उम्मीद है। भारत सरकार के खान मंत्रालय के निदेशक योगेन्द्र भांभू ने कहा कि देश में माइनिंग सेक्टर में रिफार्मस लागू हो रहे हैं। हमें एक दूसरे के आइडियाज और बेस्ट प्रेक्टिसेज को साझा करना होगा।</p>
<p>जीएसआई के निदेशक संजय सिंह ने कहा कि क्रिटिकल और स्ट्रेटेजिक मिनरल्स की प्रोसेसिंग में चीन का एकाधिकार है। हमारे यहां अच्छे डिपोजिट्स होने के बावजूद हमें समन्वित प्रयासों से अभी काफी काम करना होगा। एनएमईटी के जयन्त गुप्ता ने कहा कि माइनिंग एक्सप्लोरेशन में निजी क्षेत्र की भागीदारी के संबंध में आवश्यक प्रावधानों व लाइसेंस प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी। भारतीय गुणवत्ता परिषद के वरिष्ठ निदेशक डॉ. एके झा ने प्राइवेट प्लेयर्स के लिए भी गुणवत्ता और मानव संसाधन पर खास जोर दिया। क्रिटिकल मिनरल ट्रेकर्स के निदेशक ऑपरेशन विक्रम के. वाई ने कहा कि एआई के उपयोग की अहमियत बताई। आईबीएम के चन्द्रेश कुमार बोहरा ने कहा कि 29 क्रिटिकल और स्ट्रेटेजिक मिनरल्स के एक्सप्लोरेशन के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी तय की जा रही है। उन्होंने इसमें रेवेन्यू शेयर और रिवर्स ऑक्शन के बारे में बताया। भूविज्ञान विभाग के डॉ. सीपी दाधीच ने राजस्थान के मिनरल संपदा की जानकारी दी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jan 2025 10:05:48 +0530</pubDate>
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