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                <title> awareness - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>जानलेवा बनते जा रहे हैं कीटनाशक</title>
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                        <![CDATA[आजकल कीटनाशक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का कारण बनते जा रहे हैं। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/pesticides-are-becoming-deadly/article-147804"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)71.png" alt=""></a><br /><p>आजकल कीटनाशक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का कारण बनते जा रहे हैं। हालिया शोध और अध्ययनों से यह खुलासा हुआ है कि इनकी वजह से दिनोंदिन कैंसर, थायरॉइड, हार्मोन दबाव, उच्च रक्तचाप, उच्च स्तरीय कोलेस्ट्राल में बढ़ोतरी, लिवर और अल्सरेटिव कोलाइटिस का जोखिम गंभीर रूप से बढ़ता जा रहा है। इसकी अहम वजह विषाक्त पदार्थों का व्यापक संपर्क है जिसका खुलासा बेंगलूर स्थित आंतरिक स्वास्थ्य स्टार्टअप माइक्रोबायोटेक्स द्वारा किए गये नवीनतम अध्ययन में हुआ है। देखा गया है और शोध अध्ययन इसके प्रमाण हैं कि कीटनाशकों के संपर्क में आने से वयस्कों की तुलना में अक्सर शिशु और बच्चे ज्यादा और जल्दी प्रभावित होते हैं क्योंकि एक तो वह अधिक संवेदनशील होते हैं और उनके अंग, तंत्रिका तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली अभी विकसित हो रही होती है। बच्चे कीटनाशकों को शरीर से बाहर निकालने और अवशोषित करने में भी कम सक्षम होते हैं। यहां इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि कीटनाशक विषाक्तता के प्रति अधिक संवेदनशील होने के साथ बच्चों का व्यवहार और उनकी शारीरिक संरचना उन्हें वयस्कों की तुलना में कीटनाशकों के अधिक संपर्क में आने का कारण बनती है।</p>
<p><strong>हवा में मौजूद कीटनाशक :</strong></p>
<p>अधिकांश कीटनाशक त्वचा के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं और बच्चों की त्वचा का क्षेत्रफल उनके आकार के अनुपात में वयस्कों की तुलना में अधिक होता है। फिर बच्चों की श्वसन दर अधिक होती है, इसलिए वे हवा में मौजूद कीटनाशकों को वयस्कों की तुलना में जल्दी ग्रहण करते हैं। चूंकि बच्चे वयस्कों की तुलना में आनुपातिक रूप से अधिक भोजन और पानी का सेवन करते हैं और कीटनाशक अवशेषों को भी अधिक ग्रहण करते हैं। फर्श, खेल के मैदान के साथ बच्चों का अधिक संपर्क होने के कारण, बच्चों का व्यवहार भी कीटनाशकों के संपर्क में आने की उनकी संभावनाओं को बढ़ाता है। कीटनाशकों के संपर्क में आने से कैंसर, तंत्रिका सम्बंधी विकार जैसे पार्किंसंस, प्रजनन क्षमता में कमी, बच्चों में मानसिक व शारीरिक विकास में कमी जैसे स्वास्थ्य जोखिम अहम हैं। इसके अलावा तात्कालिक स्वास्थ्य प्रभावों में आंखों, नाक, गले व त्वचा में जलन, चुभन, खुजली, चकत्ते आना, छाले, मतली व चक्कर आना, दस्त, सांस लेने में दिक्कत और विषाक्तता जैसी समस्यायें आमतौर पर पाई जाती हैं।</p>
<p><strong>भूजल व पर्यावरणीय :</strong></p>
<p>अस्थमा से पीड़ित लोगों पर कुछ खास प्रतिक्रिया होती है जबकि मस्तिष्क, स्तन, प्रोस्टेट व कोलन कैंसर, अल्जाईमर, गर्भपात, बांझपन और पार्किंसंस आदि का खतरा गंभीर स्तर तक रहता है। हां पायरेथ्रिन, पाइरेथ्राइडए आर्गेमेंफास्फेट और कार्बोमाट आदि रसायनिक कीटनाशक मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर हानिकारक गैसों की तरह असर करते हैं। इससे तंत्रिका संकेतों का संचरण बाधित होता है। नतीजतन सीने व मांसपेशियों में दर्द, सांस लेने में ज्यादा परेशानी और कोमा की स्थिति आ सकती है और मृत्यु भी हो सकती है। तंत्रिका तंत्र में विषमता के चलते अक्सर समूची दुनिया में लाखों लोग प्रभावित होते हैं। बंगलुरू स्थित आंतरिक स्वास्थ्य स्टार्टअप माइक्रोबायोटेक्स के नवीनतम अध्ययन के मुताबिक भारत में आबादी के 78 फीसदी शहरी लोग तीन या तीन से ज्यादा कीटनाशकों के अवशेषों के संपर्क में पाये गये हैं, जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रहे हैं। अध्ययन में विषाक्त पदार्थों के व्यापक संपर्क का खुलासा हुआ है जो दैनिक खाद्य उपभोग, प्लास्टिक के उपयोग, भूजल व पर्यावरणीय प्रदूषण के जरिये शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। इसके अलावा 54 फीसदी नमूनों में एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी पाई गई है।</p>
<p><strong>चिंतनीय और खतरनाक संकेत :</strong></p>
<p>अध्ययन के मुताबिक 39 फीसदी लोग स्टेराइड के संपर्क में पाये गये जो एंडोक्राइन व्यवधान और कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं। 38 फीसदी लोग फारएवर कैमिकल्स के टैस्ट में पॉजिटिव पाये गये। अध्ययन का निष्कर्ष है कि विषाक्त पदार्थों का व्यापक संपर्क दैनिक खाद्य उपभोग, प्लास्टिक के उपयोग, भूजल और पर्यावरणीय प्रदूषण के माध्यम से शरीर से हो रहा है मायक्रोबायोटेक्स द्वारा नयी विषाक्तता पहचान क्षमता के तहत नौ भारतीय राज्यों और 14 शहरों में शहरी आबादी के नमूनों का विश्लेषण करने पर खुलासा हुआ है कि कीटनाशकों, एंटीबायोटिक्स, स्टेराइड ग्रोथ रेग्युलेटरी और फारएवर केमिकल्स के प्रति महत्वपूर्ण संपर्क है जो 200 से अधिक भारतीयों के रक्त के नमूनों पर आधारित है। यह अध्ययन इस बात का प्रमाण है कि प्राणी मात्र के शरीर में कीटनाशक किस तरह जहर घोल रहे हैं। इनके अवशेष मानव शरीर में फलों एवं सब्जियों के जरिये प्रवेश करते हैं और स्नायु तंत्र को प्रभावित करते हैं। यही नहीं कीटनाशकों का अत्याधिक प्रयोग पानी के स्रोत और मिट्टी के प्रदूषित होने में अहम भूमिका निबाहता है। नतीजतन पारिस्थितिक तंत्र को भारी नुकसान होता है। इसके चलते मित्र कीट, मधुमक्खियों और पक्षियों खासकर गौरय्या की तादाद में खासी कमी आ रही है। यह बेहद चिंतनीय और खतरनाक संकेत है। इसलिए जरूरी है कि कीटनाशकों का छिड़काव करते समय मास्क, दस्ताने और सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक कपड़े पहनें। फलों और सब्जियों का इस्तेमाल करने से पहले उनको अच्छी तरह धो लें। इसके अलावा जैविक खेती और प्राकृतिक कीट नियंत्रण के तरीकों का इस्तेमाल करना ही श्रेयस्कर है। इसके बाद भी यदि आपको ऐसा लगता है कि आप कीटनाशक विषाक्तता के शिकार हुये हैं तो ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता लें।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/pesticides-are-becoming-deadly/article-147804</link>
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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 12:05:53 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>स्पर्श कुष्ठ जागरुकता अभियान का हुआ समापन, विभिन्न जागरूकता गतिविधियों द्वारा &quot;कुष्ठ रोग&quot; के प्रति आमजन को किया गया जागरूक</title>
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                        <![CDATA[जिले में स्पर्श कुष्ठ जागरुकता अभियान का समापन हो गया है। गत 30 जनवरी को प्रारंभ हुए अभियान में विभिन्न जागरूकता गतिविधियों द्वारा "कुष्ठ रोग" के प्रति आमजन को जागरूक किया गया। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/sparsh-leprosy-awareness-campaign-concludes-general-public-made-aware-of/article-143094"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(1)17.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। जिले में स्पर्श कुष्ठ जागरुकता अभियान का समापन हो गया है। गत 30 जनवरी को प्रारंभ हुए अभियान में विभिन्न जागरूकता गतिविधियों द्वारा "कुष्ठ रोग" के प्रति आमजन को जागरूक किया गया। यह कार्यक्रम 13 फरवरी तक चलाया गया।</p>
<p>सीएमएचओ जयपुर प्रथम डॉ. रवि शेखावत और सीएमएचओ जयपुर द्वितीय डॉ. मनीष मित्तल ने बताया कि 'स्पर्श कुष्ठ जागरुकता अभियान के तहत कुष्ठ रोग जागरूकता संबंधित विभिन्न गतिविधियां आयोजित की गई। साथ ही सोशल मीडिया, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सहित विभिन्न माध्यमों द्वारा आमजन को इस रोग के बारे में जानकारी दी गई।</p>
<p>उपमुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (स्वास्थ्य) प्रथम डॉ. इंद्रा गुप्ता और उपमुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (स्वास्थ्य) द्वितीय डॉ. सुरेंद्र कुमार गोयल ने बताया कि विद्यालयों में कुष्ठ जागरूकता से सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित किए गए। साथ ही जिला, ब्लॉक एवं अभियान के अंतर्गत स्लोगन लेखन, माइकिंग, पम्फलेट्स वितरण, प्रचार वाहन, फ्लैक्स बैनर प्रदर्शन आदि गतिविधियों का आयोजन किया गया।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 17:28:23 +0530</pubDate>
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                <title>अरावली पर्वतमाला को बचाना जरुरी </title>
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                        <![CDATA[आज देश में खासकर अरावली पर्वत माला अंतर्गत आने वाले राज्यों में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, आंदोलन हो रहे हैं, आमजन को अरावली पर आए खतरे के बारे में सचेत किया जा रहा है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/it-is-necessary-to-save-the-aravalli-mountain-range/article-137413"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(10)1.png" alt=""></a><br /><p>आज देश में खासकर अरावली पर्वत माला अंतर्गत आने वाले राज्यों में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, आंदोलन हो रहे हैं, आमजन को अरावली पर आए खतरे के बारे में सचेत किया जा रहा है। यह सब इतना हाहाकार इसलिए है कि अरावली पर्वत माला आज खतरे में है। दरअसल उत्तर भारत की सबसे पुरानी इस पर्वतमाला पर आज अपने अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। आज 670 मिलियन साल पुराने इतिहास को जमींदोज करने का प्रयास किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के 20 नवम्बर के आदेश पर ध्यान दें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अगर यह लागू हो गया तो यह निश्चित है कि अरावली तो हरियाली विहीन हो ही जायेगी, यह समूचा अंचल, भूजल क्षेत्र, भूजल भंडार, वन्य-जीव,उनके आश्रय स्थल सहित इस क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों करोड़ लोगों के खाद्य एवं सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।</p>
<p><strong>आमजन की चिंता :</strong></p>
<p>यह खतरा केवल राजस्थान, हरियाणा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे अरावली परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती राज्य दिल्ली और गुजरात भी अछूते नहीं रहेंगे। वन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट ने भी इस आशंका को बल प्रदान किया है कि क्या अरावली बचेगी पर्यावरणविदों, वन्यजीव विशेषज्ञों और आमजन की चिंता का सबब यही है। यदि सुप्रीम कोर्ट के 20 नवम्बर के आदेश और वन मंत्रालय की रिपोर्ट का जायजा लें, तो अरावली की पहाड़ियों की जो नयी परिभाषा है, उसके मुताबिक अरावली का 90 फीसदी इलाका कानूनी संरक्षण से बाहर हो जायेगा। उसके हिसाब से जिस जमीन पर मौजूदा समय में पहाड़ हैं और जंगल हैं, यदि यह फैसला लागू हो गया, तो वहां जल्द ही कंक्रीट के जंगल और खनन माफियाओं का कब्जा हो जायेगा। नतीजतन पूरी अरावली खंड हो जाएगी।</p>
<p><strong>खनन से पहले :</strong></p>
<p>जहां खनन से पहले अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से काफी ऊंची थी। जिले में अरावली का रकबा करीब 10 हजार हैक्टेयर है। यह रकबा करीब करीब 20 गांवों में आता है। इस हिस्से में पिछले लगभग 40 सालों में पत्थर और सिल्का सेंड के लिए बराबर खनन किया जाता रहा है। इसके चलते खनन कारोबारियों कहें या खनन माफियाओं ने पहले तो अरावली में पहाड़ियों को खत्म किया। उसके बाद उन्होंने वहां करीब 500 फीट गहरी खदानें बना डालीं। यह सिलसिला यहां पूरे जिले में आज भी जारी है। यहां आज भी करीब 300 से ज्यादा क्रैशर बेरोकटोक चल रहे हैं। यह हालत केवल अकेले फरीदाबाद जिले की ही नहीं,बल्कि पूरे अरावली क्षेत्र में कमोबेश जारी है।</p>
<p><strong>पहाड़ियां चिन्हित :</strong></p>
<p>फॉरेस्ट सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट की मानें तो वर्तमान में अरावली क्षेत्र में कुल मिलाकर छोटी-बड़ी 19 हजार पहाड़ियां चिन्हित हैं। लेकिन नयी परिभाषा के मुताबिक पहाड़ी के मानक बदल दिये गये हैं। जाहिर है कि नयी परिभाषा अरावली को नष्ट करने वाली साबित होगी। इससे न केवल काफी नुकसान होगा,बल्कि समूची अरावली पर इसका व्यापक दुष्प्रभाव पड़ेगा और वह खण्ड- खण्ड हो जायेगी। सुप्रीम कोर्ट ने तो पहले भी सीईसी की रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए अरावली में खनन पर रोक लगाई थी। जहां तक पहाड़ की ऊंचाई का सवाल है, पहाड़ की ऊंचाई का पैमाना समुद्र तल से तय होता है। जबकि देखा जाए तो अमूमन अरावली की फैली अधिकांश पहाड़ियों की ऊंचाई 300 मीटर के आसपास है।</p>
<p><strong>खनन माफिया :</strong></p>
<p>दिल्ली और गुरग्राम के धरातल की ऊंचाई समुद्र तल से 240 से 260 मीटर के आसपास है। ऐसे में नयी परिभाषा के मुताबिक अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम यानी 40 से 60 मीटर तक हो जाती है। इसके चलते तकरीबन 90-95 फीसदी वानिकी क्षेत्र अरावली के दायरे से बाहर हो जाएगा। केवल एक फीसदी ही पहाड़ियां बाकी बची रह पायेंगीं। रिपोर्ट के पैराग्राफ 30-31 में विशेषज्ञों ने यही चिंता जाहिर की है। इसके चलते अरावली पर्वत श्रृंखला का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। यही सबसे बड़ा खतरा है। जहां तक एनसीआर का सवाल है, यहां पर एक तरह से खनन माफियाओं का एकछत्र राज रहा है। एनसीआर में लगभग 31 पहाड़ का तो खनन माफियाओं ने अस्तित्व ही मिटा दिया है।</p>
<p><strong>केवल पहाड़ नहीं है :</strong></p>
<p>अरावली हमारे लिए जीवनदायिनी है, धरोहर है। वह केवल पहाड़ नहीं है, वह हमारे इन चारों राज्यों दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात की जीवन रेखा है। वन्य जीव विशेषज्ञों तथा जानकारों का मानना है कि अरावली की 25 प्रतिशत पहाड़ियां तो नष्ट हो ही चुकीं हैं या वे नष्ट होने के कगार पर है, 100 मीटर वाला नियम लागू हो जाने पर यहां की 90 प्रतिशत से ज्यादा पहाड़ियां नष्ट हो जाएंगी, किसान बर्बाद हो जाएगा, वन्य जीवों का जीवन जीना दुर्लभ हों जाएगा, प्रदूषण और तापमान बढ़ेगा। नदियां मर जाएंगीं, शुद्ध हवा पानी एका संकट बढ़ेगा। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक होगा। अरावली पर्वत माला को बेचने की साजिश देश के भविष्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। अरावली मिटेगी,तो भविष्य मिटेगा। और इस सबके लिए आने वाली पीढ़ियां हमें कतई माफ नहीं करेंगी।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Dec 2025 12:57:40 +0530</pubDate>
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                <title>ब्रेन ईटिंग अमीबा का खतरा, जागरूकता ही बचाव</title>
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                        <![CDATA[भारत के दक्षिणी राज्य केरल में हाल ही के महीनों में एक दुर्लभ परंतु अत्यंत घातक संक्रमण ने स्वास्थ्य विभाग और आम जनता की चिंता बढ़ा दी है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-risk-of-brain-eating-amoeba-is-awareness/article-127855"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(6)5.png" alt=""></a><br /><p>भारत के दक्षिणी राज्य केरल में हाल ही के महीनों में एक दुर्लभ परंतु अत्यंत घातक संक्रमण ने स्वास्थ्य विभाग और आम जनता की चिंता बढ़ा दी है। यह संक्रमण एक विशेष प्रकार के अमीबा नेगलेरिया फाउलेरी के कारण होता है, जिसे सामान्य भाषा में ब्रेन ईटिंग अमीबा या मस्तिष्क खाने वाला अमीबा कहा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसे प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफेलाइटिस के नाम से जाना जाता है। केरल में वर्ष 2025 की शुरुआत से अब तक इस संक्रमण के 69 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 19 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। यह आंकड़े बीते वर्ष की तुलना में दोगुने हैं, जब 36 मामलों में 9 लोगों की जान गई थी। इस बढ़ोतरी ने स्वास्थ्य तंत्र को सतर्क कर दिया है और अब राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार इस पर गंभीरता से कार्य कर रही हैं।</p>
<p><strong>क्या है ब्रेन ईटिंग अमीबा ?</strong></p>
<p>नेगलेरिया फाउलेरी एक स्वतंत्र रूप से रहने वाला एककोशकीय यूकैरियोटिक जीव है। यह अमीबा आमतौर पर गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले गर्म मीठे पानी के स्रोतों में रहता है-जैसे कि झीलें, तालाब, नदियां, गर्म पानी के झरने तथा कभी-कभी स्विमिंग पूल भी, यदि उनकी सफाई सही ढंग से न हुई हो। प्राकृतिक पर्यावरण में यह जीव हानिरहित होता है और बैक्टीरिया को खाकर जीवित रहता है। लेकिन जब यह नाक के रास्ते मानव शरीर में प्रवेश करता है, तब यह जानलेवा साबित हो सकता है। संक्रमित पानी के नाक में प्रवेश करने पर यह अमीबा श्लेष्मा झिल्ली से होते हुए ऑल्फैक्टरी नर्व के जरिए सीधे मस्तिष्क तक पहुंच जाता है। वहां यह न्यूरॉन्स को नष्ट करने लगता है, जिससे मस्तिष्क की सूजन, ऊतकों को नुकसान और अंतत: रोगी की मृत्यु तक हो सकती है।</p>
<p><strong>दूषित पानी के संपर्क में :</strong></p>
<p>इस संक्रमण के लक्षण आमतौर पर दूषित पानी के संपर्क में आने के 1 से 9 दिन के भीतर सामने आते हैं। प्रारंभिक लक्षणों में तेज बुखार,सिरदर्द,मतली और उल्टी। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं जैसे गर्दन में अकड़न ,भ्रम की स्थिति,दौरे चेतना में बदलाव,मानसिक असंतुलन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई यह बीमारी इतनी तेजी से बढ़ती है कि 5 से 7 दिनों के भीतर ही मृत्यु हो सकती है। अब तक केवल कुछ ही लोगों को इससे बचाया जा सका है। संक्रमण की पहचान समय रहते नहीं हो पाती, जिससे उपचार में देरी हो जाती है और तब तक मस्तिष्क को व्यापक नुकसान पहुंच चुका होता है। केरल में वर्ष 2025 में इस संक्रमण के सबसे अधिक मामले अगस्त और सितंबर के महीनों में सामने आए, जो कि मानसून के बाद का समय होता है। इस दौरान वातावरण में उच्च तापमान और नमी होती है, जो इस अमीबा के लिए उपयुक्त परिस्थितियां प्रदान करती हैं। पिछले वर्ष भी राज्य के कोझिकोड, मलप्पुरम और कन्नूर जिलों में ऐसे कई मामले सामने आए थे। इस पर केंद्र सरकार ने जांच के आदेश दिए और स्वास्थ्य दिशा-निर्देश भी जारी किए गए। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन भी इस समस्या को बढ़ा रहा है। बढ़ता तापमान और जलवायु में बदलाव नेगलेरिया के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रहे हैं।</p>
<p><strong>सतर्कता ही सुरक्षा है :</strong></p>
<p>इस संक्रमण का इलाज अत्यंत जटिल और सीमित है। अभी तक कोई सटीक और प्रमाणित उपचार उपलब्ध नहीं है। फिर भी, कुछ एंटिफंगल और एंटीबायोटिक दवाओं का संयोजन उपयोग किया जा रहा है। इनमें मिल्टेफोसिन को हाल के वर्षों में संभावित उपयोगी दवा के रूप में देखा गया है। लेकिन यह तभी कारगर साबित हो सकता है जब प्रारंभिक अवस्था में निदान हो और तुरंत उपचार शुरू किया जाए। इसके साथ ही, मस्तिष्क में उत्पन्न हुए दबाव को कम करना भी इलाज का एक अहम हिस्सा है। इस संक्रमण से बचाव के लिए सबसे कारगर तरीका है दूषित पानी के संपर्क से बचाव। खासकर गर्म मौसम और मानसून के बाद इन बातों का ध्यान रखें, तालाब, झील, नदी या अनजाने जलस्रोतों में तैरने या नहाने से बचें। अगर पानी में जाना आवश्यक हो, तो नाक को बंद रखने के लिए क्लिप या नाक बंद करने वाले सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग करें।</p>
<p><strong>संक्रमण पर नियंत्रण :</strong></p>
<p>बढ़ते मामलों को देखते हुए केरल सरकार ने एक टास्क फोर्स गठित की है, जो संक्रमण पर नियंत्रण के लिए कार्यरत है। इसके तहत स्वास्थ्य विभाग की निगरानी टीमों द्वारा जल स्रोतों की जांच,स्कूलों और समुदायों में जागरूकता अभियान,त्वरित जांच और रिपोर्टिंग प्रणाली,इसके अलावा,केंद्र सरकार भी इस संक्रमण पर कड़ी नजर बनाए हुए है और राज्यों को आवश्यक मार्गदर्शन व संसाधन मुहैया करा रही है। ब्रेन ईटिंग अमीबा एक खतरनाक लेकिन रोके जा सकने वाला संक्रमण है। इसकी रोकथाम के लिए लोगों में जागरूकता और सतर्कता अत्यंत आवश्यक है। अगर कोई व्यक्ति गर्मी के मौसम में जलस्रोतों के संपर्क में आने के कुछ दिनों बाद तेज बुखार, सिरदर्द, भ्रम या न्यूरोलॉजिकल लक्षण महसूस करता है,तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। इस घातक रोग से डरने की नहीं, बल्कि समझदारी से निपटने की जरूरत है।</p>
<p><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Sep 2025 12:27:34 +0530</pubDate>
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                <title>आखिर कैसे बचेंगे पेड़ और जंगल</title>
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                        <![CDATA[दुनिया में आज जलवायु परिवर्तन से मुकाबले की दिशा में पेड़ और जंगलों की महत्ता की चर्चा जोरों पर है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/how-will-trees-and-forests-survive/article-127203"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)13.png" alt=""></a><br /><p>दुनिया में आज जलवायु परिवर्तन से मुकाबले की दिशा में पेड़ और जंगलों की महत्ता की चर्चा जोरों पर है। इसका अहम कारण जलवायु परिवर्तन के कारण समूची दुनिया में संतुलित और समग्र विकास के लक्ष्य का लगातार भीषण चुनौती बनकर सामने आना है। दुनिया में जिस तेजी से पेड़ों की तादाद कम होती जा रही है, उससे पर्यावरण तो प्रभावित हो ही रहा है, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, कृषि और मानवीय जीवन ही नहीं, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी भीषण खतरा पैदा हो गया है। जहां तक जंगलों के खत्म होने की गति का सवाल है,उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जाएगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जाएंगे। हकीकत में हर साल दुनिया में एक करोड़ हेक्टेयर जंगल लुप्त होते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र भी इसकी पुष्टि करता है। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इसका खुलासा किया है। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है।</p>
<p><strong>संरक्षण बेहद जरूरी :</strong></p>
<p>जैव विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है। यहां इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि यदि वनों की कटाई पर अंकुश नहीं लगा तो प्रकृति की लय बिगड़ जाएगी। ऐसी स्थिति में सूखा और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम से आर्थिक हालात और भी प्रभावित होंगे, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। सबसे बड़ी बात यह कि पेड़ों का होना हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बेहद जरूरी है। यह न केवल हमें गर्मी से राहत प्रदान करते हैं, बल्कि जैव विविधता को बनाए रखने,कृषि की स्थिरता सुदृढ़ करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने और जलवायु को स्थिरता प्रदान करने में भी अहम योगदान देते हैं। विडम्बना यह है कि यह सब जानते समझते हुए भी हम पेड़ों के दुश्मन क्यों बने हुए हैं, यह समझ से परे है।</p>
<p><strong>लोभ का नतीजा :</strong></p>
<p>आज जो देश-दुनिया की स्थिति है, वह सब मानव के लोभ का नतीजा है। क्योंकि उसने प्रकृति से इतनी छेड़छाड़ की है, जिसका दुष्परिणाम हमारे सामने मौसम में आए भीषण बदलाव के रूप में सामने आया, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र ही नहीं हमारा आर्थिक -सामाजिक ढांचा तक चरमरा गया है। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके बारे में बीते कई बरसों से दुनिया के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और वनस्पति व जीव विज्ञानी चेता रहे हैं कि अब हमारे पास पुरानी परिस्थिति को वापस लाने के लिए समय बहुत ही कम बचा है। यह भी कि हम जहां पहुंच चुके हैं वहां से वापस आना आसान काम नहीं है, वह बहुत ही टेड़ा काम है। कारण वहां से हमारी वापसी की उम्मीद केवल और केवल पांच फीसदी से भी कम ही बची है।</p>
<p><strong>अस्तित्व ही मिटा दिया :</strong></p>
<p>यदि देश की बात करें, तो उत्तराखंड में बीते 8-9 बरसों के दौरान ढाई लाख से ज्यादा पेड़ काट दिए गए हैं। इनमें एक लाख से ज्यादा पेड़ आल वैदर रोड के नाम पर और शेष पर्यटन, देहरादून से लेकर दिल्ली तक सड़क चौड़ी के करण, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना व सुरंग आधारित परियोजनाओं आदि के नाम पर देवदार, बांज, राई, कैल जैसी दुर्लभ प्रजातियों के पेड़ों का अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। उत्तराखंड तो एक उदाहरण है, जबकि विकास के नाम पर पेड़ों के अंधाधुंध कटान का सिलसिला पूरे देश में जारी है। साल 2008 के बाद से इन घटनाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।</p>
<p><strong>अंधाधुंध कटाई :</strong></p>
<p>हर साल जितना जंगल खत्म हो रहा है, वह एक लाख तीन हजार वर्ग किलोमीटर में फैले देश जर्मनी, नार्डिक देश आइसलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों के क्षेत्रफल के बराबर है। लेकिन सबसे दुख की बात यह है कि इसके अनुपात में नए जंगल लगाने की गति बेहद धीमी है। जहां तक दक्षिण अमेरिका के अमेजन बेसिन के बहुत बड़े भूभाग पर फैले अमेजन के वर्षा वनों का सवाल है, वे विनाश के कगार पर हैं। बढ़ते तापमान, भयावह सूखा, वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं के चलते अमेजन के जंगल खतरे के दायरे में हैं। इसमें जलवायु परिवर्तन के चलते पड़ने वाले सूखा और गर्मी व आग सहित बहुतेरे कारकों की बड़ी भूमिका है।</p>
<p><strong>जंगलों का खात्मा :</strong></p>
<p>एक रिपोर्ट के मुताबिक 1990-2020 के बीच के तीस वर्षों में 42 करोड़ हैक्टेयर जंगलों का खात्मा हुआ है। भले इसके वह प्राकृतिक कारण हों या मानवीय। इसमें देश के पांच राज्यों यथा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश शीर्ष पर हैं। दरअसल जैव विविधता को संरक्षित करने में वन की उपयोगिता जगजाहिर है लेकिन विडम्बना है कि हम उन्हीं के साथ खिलवाड़ कर अपने जीवन के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन आज की सबसे बड़ी जरूरत है। तभी सामुदायिक प्रयासों को प्रोत्साहित कर धरती को बचाया जा सकता है।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Sep 2025 12:18:26 +0530</pubDate>
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                <title>डिजिटल अरेस्ट की धमकी देकर साइबर ठगी, राजस्थान साइबर पुलिस की एडवाइजरी</title>
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                        <![CDATA[राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम शाखा ने आमजन को सावधान करते हुए एडवाइजरी जारी की है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/cyber-thugs-by-threatening-digital-arrest-rajasthan-cyber-police/article-121054"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/arest.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम शाखा ने आमजन को सावधान करते हुए एडवाइजरी जारी की है कि साइबर ठग “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर लोगों से ठगी कर रहे हैं।</p>
<p>साइबर अपराधी आम नागरिकों को कॉल कर खुद को CBI, Mumbai Police, Custom, Income Tax, या ED का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर वर्दी व नकली वारंट दिखाते हैं। वे दावा करते हैं कि पीड़ित या उनके परिवार के किसी सदस्य का नाम ड्रग्स, रेप, देशविरोधी गतिविधि या मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराधों में आ रहा है।</p>
<p>इसके बाद वे “पुलिस वेरिफिकेशन” के नाम पर पीड़ित से उसकी FD, बैंक अकाउंट या अन्य निवेश की राशि साइबर अपराधियों द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर करने को कहते हैं, यह कहकर कि वेरिफिकेशन के बाद पैसा वापस कर दिया जाएगा। साथ ही वे धमकी देते हैं कि वेरिफिकेशन पूरा होने तक वीडियो कॉल पर बने रहें और किसी को भी जानकारी न दें। डर के कारण लोग बड़ी धनराशि ट्रांसफर कर देते हैं।</p>
<p><strong>साइबर सेल की आमजन को सलाह :</strong></p>
<p>1. सावधान रहें – कोई भी पुलिस या सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या अपराध में लिप्त होने की धमकी नहीं देती।</p>
<p>2. धनराशि ट्रांसफर न करें – ऐसे किसी भी कॉल पर बैंक खाते या UPI के माध्यम से कोई राशि ट्रांसफर न करें।</p>
<p>3. तुरंत रिपोर्ट करें – ऐसी किसी भी संदिग्ध कॉल या घटना की जानकारी तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन, साइबर थाने, www.cybercrime.gov.in या साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930, 9256001930, 9257510100 पर दें।</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 19 Jul 2025 18:40:57 +0530</pubDate>
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                <title>नशा मुक्ति भारत की बड़ी चुनौती</title>
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                        <![CDATA[विश्व के अनेक देशों में लोगों में और खासकर युवाओं में नशीले पदार्थों के सेवन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/drug-addiction-is-a-big-challenge-of-india/article-118787"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtroer-(8)3.png" alt=""></a><br /><p>विश्व के अनेक देशों में लोगों में और खासकर युवाओं में नशीले पदार्थों के सेवन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। जहां तक भारत की बात है, चिंता का विषय यह है कि अब यह प्रवृत्ति केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी नशे का जाल फैलता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में अफीम, चरस, गांजा, हेरोइन आदि के अलावा इंजेक्शन के जरिए लिए जाने वाले मादक पदार्थों का भी इस्तेमाल होने लगा है। वास्तव में मादक पदार्थों का सेवन अब मानवता के प्रति सबसे बड़े अपराध का रूप धारण कर चुका है। रईसजादे युवक-युवतियों की रेव पार्टियां तो नशे का भयावह आधुनिक रूप है, जहां राजनीतिक संरक्षण के चलते प्राय: पुलिस भी हाथ डालने से बचती है। हालांकि कभी-कभार रेव पार्टियों पर छापा मारकर नशे में मदमस्त लड़के-लड़कियों को गिरफ्तार किया जाता रहा है, जिससे पता चलता रहा है कि देश का आज कोई भी महानगर ऐसा नहीं है, जहां ऐसी रेव पार्टियां जीवनशैली का हिस्सा न हों।</p>
<p>वास्तव में रेव पार्टियां धनाढ़य बिगड़ैल युवाओं की नशे की पार्टियों का ही आधुनिक रूप हैं। कोकीन हो या ऐसे ही अन्य मादक पदार्थ, जिनमें गंध नहीं आती, रसूखदार परिवारों के बिगड़े हुए युवाओं का मनपसंद नशा बनते जा रहे हैं। इस बात से बेखबर कि ये तमाम मादक पदार्थ सीधे शरीर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करते हैं और शरीर को भयानक बीमारियों की सौगात देते हैं । भारत में नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों में करीब चालीस फीसदी कॉलेज छात्र हैं, जिनमें लड़कियों की संख्या भी ज्यादा है। देश के अनेक कॉलेजों में तो, अब स्थिति यह है कि बहुत से कॉलेजों के अंदर ही आसानी से नशीले पदार्थ उपलब्ध हो जाते हैं। मानव जीवन की रक्षा के लिए बनाई जाने वाली कुछ दवाओं का उपयोग भी लोग अब नशा करने के लिए करने लगे हैं। देश में नशे के फैलते जाल का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मादक पदार्थ न सिर्फ मानव शरीर की सुंदरता को नष्ट कर शरीर को खोखला बनाते हैं, बल्कि इनका उपयोग युवा पीढ़ी की क्षमताओं को नष्ट कर उनकी सृजनशीलता को भी मिटा रहा है तथा देश के सामाजिक और आर्थिक ढ़ांचे को पंगु बना रहा है। एक बार मादक पदार्थों की लत लग जाए, तो व्यक्ति इनके बिना रह नहीं पाता।</p>
<p>यही नहीं, उसे पहले जैसा नशे का प्रभाव पैदा करने के लिए और अधिक मात्रा में मादक पदार्थ लेने पड़ते हैं। इस तरह व्यक्ति इनका गुलाम बनकर रह जाता है। अधिकांश लोगों में गलत धारणाएं विद्यमान हैं कि मादक पदार्थों के सेवन से व्यक्ति की सृजनशीलता बढ़ती है और इससे व्यक्ति में सोच-विचार की क्षमता, एकाग्रता बढ़ती है, लेकिन वास्तविकता यही है कि नशे के शिकार लोगों की सोच-विचार की क्षमता और इसकी स्पष्टता खत्म हो जाती है तथा उनके कार्यों में भी कोई तालमेल नहीं रहता। इनके सेवन से कुछ समय के लिए संकोच की भावना जरूर मिट जाती है, इससे शरीर की सामान्य कार्यक्षमता में गिरावट आती है। दरअसल नशीली दवाएं या नशीले पदार्थ ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं, जो हमारे शरीर की कार्यप्रणाली को बदल देते हैं। कोई भी रसायन, जो किसी व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक कार्यप्रणाली में बदलाव लाए, मादक पदार्थ कहलाता है और जब इन मादक पदार्थों का उपयोग किसी बीमारी के इलाज या बेहतर स्वास्थ्य के लिए दवा के तौर पर किया जाए, तो यह मादक पदार्थों का सही उपयोग कहलाता है, लेकिन जब इनका उपयोग दवा के रूप में न होकर इस प्रकार किया जाए, कि इनसे व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचे तो इसे नशीली दवाओं का दुरूपयोग कहा जाता है।</p>
<p>मादक पदार्थों के सेवन का आदी हो जाने पर व्यक्ति में प्राय: कुछ लक्षण प्रकट होते हैं, जिनमें खेलकूद और रोजमर्रा के कार्यों में दिलचस्पी न रहना, भूख कम लगना, वजन कम हो जाना, शरीर में कंपकंपी छूटना, आंखें लाल, सूजी हुई रहना, दिखाई कम देना, चक्कर आना, शरीर में दर्द, नींद न आना, चिड़चिड़ापन,निराशा प्रमुख हैं। सुई के जरिए मादक पदार्थ लेने वालों को एड्स का खतरा भी रहता है। देशभर में नशे का अवैध व्यापार तेजी से फल-फूलने के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि नशे के सौदागरों के लिए मादक पदार्थों की तस्करी सोने का अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो रही है। आज युवा पीढ़ी जिस कदर मादक पदार्थों के शिकंजे में फंस रही है, उसके मद्देनजर समाज का कर्त्तव्य है कि वह युवा वर्ग का मार्गदर्शन करते हुए उसे उचित मार्ग दिखला, और गलत मार्ग पर चलने से रोके। ऐसे कार्यों को केवल सरकार के ही भरोसे छोड़ देना उचित नहीं, बल्कि समाज को भी इस दिशा में ठोस पहल करनी होगी।</p>
<p><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Jun 2025 12:44:33 +0530</pubDate>
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                <title>तेजी से बढ़ रहे ब्रेन ट्यूमर के मामले : शुरुआती लक्षणों पर ध्यान नहीं देना हो सकता है जानलेवा, देश में हर साल 28 हजार से ज्यादा नए मामले आ रहे सामने</title>
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                        <![CDATA[इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ कैंसर रजिस्ट्रीज के अनुसार भारत में ब्रेन ट्यूमर के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/cases-of-rapidly-growing-brain-tumor-may-not-pay-attention/article-118656"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtroer139.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ कैंसर रजिस्ट्रीज के अनुसार भारत में ब्रेन ट्यूमर के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2020 की रिपोर्ट के अनुसार ब्रेन ट्यूमर देश में दस सबसे मोस्ट कॉमन प्रकार के ट्यूमर में से एक है, जिसमें हर साल 28000 से अधिक नए मामले सामने आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से लगभग 20 प्रतिशत बच्चे पाए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक उपकरणों से अब इस बीमारी का निदान आसान हो गया है। आज की मेडिकल तकनीक से मस्तिष्क ट्यूमर का सटीक और शुरुआती चरण में पता लगाना संभव हो गया है।</p>
<p><strong>इन जांचों से चलता है बीमारी का पता :</strong></p>
<p>डॉ. शर्मा ने बताया कि उन्न्त जांचों के जरिए बे्रन ट्यूमर का पता लगाया जा सकता है। इसमें एमआरआई स्कैन जो कि विस्तृत इमेजिंग जो मस्तिष्क की संरचना को दिखाती है। एमआरआई स्पेक्ट्रोस्कोपी जो कि सर्जरी से पहले डॉक्टरों को ट्यूमर की रासायनिक प्रकृति को समझने में मदद करती है। सीटी स्कैन जो रक्तस्राव या असामान्य वृद्धि का पता लगाने में उपयोगी है। वहीं पीईटी स्कैन ट्यूमर कोशिकाओं के गतिविधि स्तर को दिखाता है और खतरनाक क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करता है।</p>
<p><strong>शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही इलाज मिलना जरूरी :</strong></p>
<p>संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल में वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. डीपी शर्मा ने बताया कि ब्रेन ट्यूमर भारत में बढ़ती स्वास्थ्य चिंता का विषय है, लेकिन अक्सर इस पर तब तक ध्यान नहीं दिया जाता जब तक कि यह बहुत गंभीर न हो जाए। ब्रेन ट्यूमर खोपड़ी के अंदर चुपचाप बढ़ता है, जिससे कोई स्पष्ट संकेत दिखने से पहले ही नुकसान हो जाता है। दुर्भाग्य से बहुत से लोग शुरुआती लक्षणों को अनदेखा कर देते हैं। यह सोचकर कि यह सिर्फ  तनाव या थकान है, लेकिन समय पर निदान और उपचार से गंभीर मामलों में भी जान बचाई जा सकती है।</p>
<p><strong>चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज न करें :</strong></p>
<p>ब्रेन ट्यूमर के लक्षणों को अक्सर रोजमर्रा की समस्या समझ लिया जाता है। उन्हें पहचानने में यह देरी खतरनाक हो सकती है। डॉ. डीपी शर्मा ने बताया इस बीमारी से जुड़े चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जैसे कि सिरदर्द जो समय के साथ बदतर हो जाता है। अचानक दौरे आना, खासकर यदि आपको पहले कभी दौरा नहीं पड़ा हो बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार मतली या उल्टी होना, धुंधला या दोहरी दृष्टि, बोलने में कठिनाई, स्मृति समस्याएं या व्यक्तित्व में परिवर्तन, अंगों में कमजोरी या सुन्नता। यदि किसी को ये लक्षण अनुभव होते हैं, विशेषकर यदि वे बिगड़ जाते हैं या अचानक उत्पन्न होते हैं तो तत्काल किसी विशेषज्ञ से परामर्श करना महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>उपचार और सर्जरी :</strong></p>
<p>जब सर्जरी की जरूरत होती है तो सटीकता सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाती है। वह और उनकी टीम सुरक्षा और शीघ्र रिकवरी सुनिश्चित करने के लिए अत्याधुनिक सर्जिकल तकनीकों का उपयोग करते हैं। इसमें न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी जो कि उपचार समय को कम करने के लिए माइक्रोस्कोप या एंडो स्कोप के साथ किया जाता है। न्यूरो नेविगेशन सिस्टम जो कि उच्च सटीकता के लिए मस्तिष्क के अंदर जीपीएस की तरह काम करते हैं। इस बीमारी में उपचार केवल सर्जरी तक ही सीमित नहीं है। रोगियों को व्यापक पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल में आवश्यकता पड़ने पर रेडियोथेरेपी और कीमोथेरपी भी शामिल है। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Jun 2025 12:45:43 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur PS]]>
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                <title>साइबर अपराधियों के बढ़ते हौसले</title>
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                        <![CDATA[साइबर ठगी के समाचारों की भरमार के बावजूद देश में केवल 18 फीसदी लोग ही ऐसे हैं, जिन्हें साइबर अपराध होने पर उसकी शिकायत कहां और कैसे करनी है कि जानकारी है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-spirits-of-cyber-criminals/article-117166"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtroer-(2)35.png" alt=""></a><br /><p>देश दुनिया में साइबर अपराध के बढ़ते आंकड़े जहां चिंतित करने वाले हैं, वहीं यह और भी आश्चर्यजनक और चिंताजनक हालात है कि लाख अवेयरनेस प्रोग्राम व मीडिया में आए दिन साइबर ठगी के समाचारों की भरमार के बावजूद देश में केवल 18 फीसदी लोग ही ऐसे हैं, जिन्हें साइबर अपराध होने पर उसकी शिकायत कहां और कैसे करनी है कि जानकारी है। यह तो सरकारी आंकड़ा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जनवरी-मार्च, 2025 में कराए गए ताजातरीन सर्वे से यह आंकड़ें प्राप्त हुए हैं। दूसरी और यूपीआई से भुगतान में खासा बढ़ोतरी हुई हैं। आज ठेले पर सब्जी बेचने वाले से लेकर दो-पांच रुपए का सामान विक्रेता भी आसानी से यूपीआई से भुगतान प्राप्त कर रहा है। 2022-23 में जहां केवल 38 फीसदी लोग ऑनलाइन पेमेंट करते थे, वह आज बढ़कर 50 प्रतिशत के लगभग हो गया है। वास्तविकता तो यह है कि आज ऑनलाइन पेमेंट करना लोगों की आदत में आ गया है। जेब में रुपया-पैसा रखना या कहीं जाते समय साथ पैसा ले जाना लोगों की आदत में अब लगभग नहीं ही रहा है। पर तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि साइबर अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और पिछले तीन सालों में ही साइबर अपराध के आंकड़ें तीन गुणा बढ़ गए हैं।</p>
<p>सरकार की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि आज मोबाइल पर किसी का नंबर डायल करते ही पहले साइबर अपराध से सचेत रहने की कॉलर ट्यून सुनने को मिलती है और उसके बाद बात होती है। मोबाईल पर नंबर मिलाते ही नहीं अपितु सोशियल मीडिया के प्लेटफार्म खासतौर से इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि पर आजकल साईबर ठगी, डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन या ब्लेक मेलिंग से सतर्क रहने का संदेश सुनने को मिलता है। इतने के बावजूद ठगी के आंकड़ें चेताने वाले हैं। मजे की बात यह है कि साइबर ठगी के इन रुपों से सबसे अधिक शिकार पढ़े लिखे और समझदार लोग ही हो रहे हैं। ठगों के हौसले बुलंद हैं, तो ठगी के शिकार होने वाले लोगों की संख्या और राशि में मल्टीपल बढ़ोतरी हो रही है। खास बात यह है कि ठगी के केन्द्र व ठगी के तरीके से वाकिफ होने के बावजूद यह होता जा रहा है। हांलाकि झारखण्ड के जमातड़ा से ठगों के तंत्र को तोड़ दिया गया पर देश में एक दो नहीं अपितु 74 जिलों में इस तरह की ठगी करने वालों के हॉटस्पॉट विकसित हो गए। झारखण्ड, राजस्थान, हरियाणा और बिहार के केन्द्र पहले पांच प्रमुख सेंटर विकसित हो गए। ऐसा नहीं है कि साइबर अपराध केवल और केवल भारत में हो रहे हैं अपितु यह विश्वव्यापी समस्या होती जा रही है। दुनिया के देशों में देखा जाए तो साईबर ठगी के मामलों में रशिया पहले पायदान तो यूक्रेन दूसरे स्थान पर है। इनके बाद चीन, अमेरिका, नाइजेरिया और रोमानिया का नंबर आता है। इससे एक बात तो साफ हो जाती है साइबर ठगों की सारी दुनिया में सहज पहुंच है। लोगों की गाढ़ी कमाई को हजम करने में इन्हें विशेषज्ञता हासिल है।</p>
<p>लोगों की कमजोरी को यह समझते हैं और उसी कमजोरी के चलते पढ़े लिखे लोगों को भी आसानी से ठगी का शिकार बना लेते हैं। हमारे देश में साइबर ठग या तो किसी तरह का लालच देकर लिंक भेजकर ठगी करते हैं या फिर डरा धमकाकर आसानी से ठगी का शिकार बना लेते हैं। सरकार प्रचार के सभी माध्यमों से बार बार व लगातार आगाह कर रही है कि ठगों द्वारा डराने वाले तरीके वास्तविक नहीं है। बैंक कभी भी बैंक डिटेल या ओटीपी ऑनलाइन नहीं मांगते पर पता नहीं कैसे ठगों के जाल में फंसकर अपनी मेहनत की कमाई लुटा बैठते हैं। ओटीपी दे देते हैं तो लिंक खोलने के लिए लाख मना करने के बावजूद लिंक खोलकर लुट जाते हैं। पुलिस अधिकारी बन कर जिस तरह से डिजिटल अरेस्ट कर ठगी का रास्ता अपनाया जा रहा है उस संबंध में अवेयरनेस अभियान के बावजूद ठगी का शिकार होने वालों की संख्या में कमी नहीं हो रही है। डिजिटल अरेस्ट में डॉक्टर, रिटायर्ड जज, प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी सहित संभ्रात वर्ग के लोगों को आसानी से जाल में फंसाकर ठगी हो रही हैं वह भी करोड़ों तक की ठगी के उदाहरण मिल रहे हैं। झूठे मामलों में परिजनों को फंसने से बचाने का झांसा देकर ठगी हो रही है। मजे की बात यह है कि इस स्तर तक डर या भयाक्रांत हो जाते हैं कि किसी अन्य या पुलिस से समस्या साझा करने की हिम्मत भी नहीं कर पाते और ठगी के बाद हाथ मलते रह जाते हैं। डिजिटल अरेस्ट के मामलें तो दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। दरअसल इसमें पुलिस, सरकारी जांच एजेंसी या प्रवर्तन निदेशालय के नकली अधिकारी बन कर इस कदर डरा देते हैं कि कई दिनों तक लगातार ऑडियो या वीडियो कॉल करके ठगी का शिकार बना लेते हैं। </p>
<p>ऐसा नहीं है कि सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हों। सरकार व वित्तदायी संस्थाओं द्वारा मीडिया के माध्यम से सजग किया जा रहा है। इसके साथ ही झारखण्ड के बड़े केन्द्र जमातड़ा को लगभग समाप्त कर ही दिया है। पर देश में 74 हॉट स्पॉट विकसित हो गए हैं। मीडिया द्वारा भी समय समय पर स्ट्रिंग कर इस तरह के केन्द्रों को एक्सपोज किया है पर ठगी कम होने को ही नहीं है। दरअसल आमनागरिकों को भी सजग होना ही होगा। अनजान नंबरों पर बात ही ना करें। ज्योंही कोई डराए धमकाएं तो बहकावें में आने के स्थान पर पड़ताल करें। इस तरह के हालात सामने आए तो परेशान होने के स्थान पर परेशानी को साझा करें, पुलिस का सहयोग लेने में भी संकोच ना करें। </p>
<p>देखा जाए तो सजगता इस समस्या का समाधान हो सकती है। सबसे ज्यादा जरुरी यह हो जाता है कि लाख सजगता के बावजूद भी यदि साइबर ठगी का शिकार हो जाते हैं, तो उस स्थिति में बिना किसी घबराहट और संकोच के कहां ओर कैसे शिकायत की जा सकती है इसकी जानकारी देने के लिए सरकारी संस्थाओं के साथ ही गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा नहीं तो साइबर अपराध का जिस तरह से दायरा दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा है उस पर अंकुश नहीं लग सकेगा।</p>
<p><strong>-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Jun 2025 12:03:37 +0530</pubDate>
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                <title>विनाश के बीज हैं व्यसन</title>
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                        <![CDATA[हम सभी इस तथ्य से वाकिफ हैं की किसी भी प्रकार के नशेबाजी की दुष्प्रवृति से व्यक्ति और समाज को असीम हानि उठानी पड़ती है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/seeds-of-destruction-are-addiction/article-115940"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtroer65.png" alt=""></a><br /><p>हम सभी इस तथ्य से वाकिफ हैं की किसी भी प्रकार के नशेबाजी की दुष्प्रवृति से व्यक्ति और समाज को असीम हानि उठानी पड़ती है, स्वास्थ्य बिगड़ता है, बुद्धिबल घटता है, क्रिया शक्ति क्षीण होती है, निंदा होती है, परिवार में विक्षोभ पनपता है, बच्चे कुसंस्कारी बनते हैं। दुर्व्यसनों के इतने सारे नकारात्मक असर के बावजूद भी सभी प्राणियों में श्रेष्ठ होने का दावा करने वाले मनुष्य को क्यों यह सब समझ नहीं आ पाता हैं, अपनी बुद्धि पर बड़ा गर्व करनेवाले मनुष्य को क्या इतनी भी समझ नहीं है की उसे किस वस्तु का सेवन करना है और किससे दूर रहना है। जन साधारण के स्वास्थ्य को बर्बाद करनेवाले दुर्व्यसनों में नशा सेवन सर्वाधिक व्यापक है और उसमें भी प्रमुख्त: तंबाकू और शराब ने तो सर्वसाधारण को अपने चंगुल में इस कदर फंसाकर रखा है की पीढ़ी की पीढ़ीयां उसमें बर्बाद हो चुकी हैं। </p>
<p>तंबाकू एक ऐसा विषैला पदार्थ है, जो मनुष्य की प्रकृति और शारीरिक स्थिति में समाविष्ट कराए जाने पर सुखद परिणाम कभी भी उत्पन्न नहीं कर सकता, उसमें केवल हानि ही हानि है, लाभ तनिक भी नहीं। फिर भी न जाने क्यों लोग उसे खाने, पीने से लेकर सूंघने, दांतों पर रगड़ने आदि कामों से लेकर अपने धन, और स्वास्थ्य की बर्बादी ही करते चले जा रहे है। स्पष्ट है कि तंबाकू एक ऐसा विषैला पदार्थ है, जिसमें कई घातक जहर होते हैं, जैसे कि निकोटिन, कोलतार, कार्बन मोनोआॅक्साइड, कोयले की गैस आदि-आदि। इन घातक जहरीले पदार्थों के प्रभाव से तंबाकू सेवन करने वाले व्यक्ति को कैंसर, हार्टअटैक, पक्षाघात, हाथ-पैर गलना, रक्तचाप असंतुलन तथा शारीरिक कमजोरी जैसे रोग हो जाते हैं। मस्तिष्क की क्षमता शिथिल हो जाती है। स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। अनिद्रा, बेचैनी, उदासी व निराशा के भाव तंबाकू के प्रभाव से व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं। ऐसे मनुष्य का व्यक्तित्व इतना विकृत हो जाता है की कोई भी व्यक्ति उसके नजदीक संपर्क में आने से ग्लानि अनुभव करता है, क्योंकि उसके दांत व चेहरा गंदे व वीभत्स हो जाते हैं तथा बदबू फैलाते हैं। कई लोग यह भ्रम पाल लेते हैं कि तंबाकू और सिगरेट से तनाव में कमी आती है।</p>
<p>सिनेमा संस्कृति और मनमौजीपन के प्रभाव में आकर भी कई लोग धूम्रपान की आदत के शिकार हो जाते हैं। विज्ञापनों का आकर्षण व धूम्रपान करते हुए आकर्षक चित्रों को देखकर भी कुछ लोग धूम्रपान अपना लेते हैं, किंतु ऐसे भोले-भाले लोगों को इसके दुष्परिणामों का तब पता लगता है, जब वे जीवन में बहुत कुछ खो चुके होते हैं। किंतु यदि धूम्रपान से पीड़ित कोई व्यक्ति स्वयं को इससे मुक्त करना चाहता है, तो यह बिल्कुल भी कठिन नहीं है, केवल एक संकल्प की आवश्यकता है और बस! तत्क्षण इसका त्याग हो सकता है। दुनिया में ऐसे कई उदाहरण प्रत्यक्ष देखे गए हैं कि लगातार धूम्रपान करने वालों ने सद्बुद्धि आते ही एक क्षण में इसका त्याग किया है। किन्तु कुछ लोगों को यह भ्रम रहता है कि बरसों तक धूम्रपान करने के बाद अब इसको छोड़ देने से जीवन और स्वास्थ्य पर कोई न कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा किंतु यह वास्तविकता नहीं है। सच्चाई तो यह है कि जब जागे तब सवेरा। मनुष्य को भगवान ने बुद्धि, विवेक तर्क और ज्ञान की शक्तियां किसी महत्वपूर्ण उपयोग के लिए दी होती हैं, परन्तु जब वही शक्तियां मनुष्य के कल्याण के विपरीत काम करने लगती हैं, तब मनुष्य की मूर्खता स्पष्ट हो जाती है। </p>
<p>यह दुर्भाग्य है हमारे देश का कि आज वह पश्चिम की बुरी आदत को तेजी से अपनाता और बुराइयों की जड़ सींचता चला जाता है, जबकि हमारे ही विद्वानों द्वारा इन बुराइयों से अवगत होने के बाद करोड़ों अंग्रेज सिगरेट-शराब छोड़कर शुद्ध और सात्विक जीवन की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अब अपने देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को छोड़ किसी और संस्कृति की सिखाई हुई बातों का अनुसरण करके हम अपने भविष्य की पीढ़ियों के लिए कौनसी मिसाल बना रहे हैं, इसका उत्तर तो हमें अपनेआप से ही मांगना होगा।</p>
<p><strong>-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज</strong><br /><strong>आध्यात्मिक शिक्षा विश्लेषक ।</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 31 May 2025 12:15:19 +0530</pubDate>
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                <title>तंबाकू सेवन देश की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या, इसे रोकना बेहद जरूरी : विशेषज्ञ </title>
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                        <![CDATA[राजस्थान तंबाकू मुक्त एलायंस की ओर से राज्य स्तरीय मीडिया आमुखीकरण कार्यशाला का एमआई रोड स्थित एक होटल में आयोजन किया गया। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/tobacco-consumption-is-very-important-to-stop-the-fastest-growing/article-115740"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtroer-(1)29.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान तंबाकू मुक्त एलायंस की ओर से राज्य स्तरीय मीडिया आमुखीकरण कार्यशाला का एमआई रोड स्थित एक होटल में आयोजन किया गया। इस अवसर पर एलायंस के पदाधिकारी डॉ. रमेश गांधी, धरमवीर कटेवा, राजन चौधरी, डॉ. राकेश गुप्ता सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे। इस अवसर पर विशेषज्ञों ने जानकारी दी कि तम्बाकू सेवन देश की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या है। हर साल भारत में तम्बाकू सेवन से होने वाले रोगों से 15 लाख से अधिक मौत हो रही है। यह देश की उत्पादकता और अर्थव्यवस्था के लिए भी एक रोगों और मौतों को पूर्णतया बहुत आसानी से रोका जा सकता है। वर्तमान में तम्बाकू का सेवन पूरे विश्व के लिए चिन्ता का विषय बना हुआ है, लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इसका कारोबार और उपभोग विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। तम्बाकू उद्योग तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को अपने उत्पादों के प्रति आकर्षित करता है। इसलिए हमारी सरकार से मांग है कि तंबाकू पर ज्यादा से ज्यादा टैक्स लगाया जाए, तंबाकू मुक्त पीढी को लेकर सरकार नीति बनाए, वेंडर लाइसेंसिंग प्रक्रिया को अपनाया जाए। इससे काफी हद तक तंबाकू उत्पादों पर रोक लगाई जा सकती है। </p>
<p><strong>ये जानकारी भी आई सामने :</strong></p>
<p>विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार द्वारा सम्पन्न वैश्विक वयस्क तम्बाकू सर्वेक्षण के दूसरे चरण (गेट्स 2, 2016-2017) के अनुसार भारत में लगभग 27 करोड़ तम्बाकू उपभोगकर्ता हैं, उनमें से लगभग 17 करोड मूलतः चबाने वाली तम्बाकू खाते हैं। लगभग 10 करोड़ धूम्रपान करने वालों में 3.2 करोड़ वे वयस्क भी हैं, जो कि धूम्रपान के साथ चबाने वाली तम्बाकू का भी सेवन करते हैं। हर वर्ष 15 लाख से अधिक लोग तम्बाकू के उपभोग और लगभग एक लाख से हैड स्मोक को सूंघने से उत्पन्न रोगों से मर जाते हैं।<br />क्षेत्रफल के आधार पर राजस्थान सबसे बड़ा राज्य है। यह 1.2 करोड़ तम्बाकू उपभोक्ताओं का घर भी है। इनमें से अधिकांश तम्बाकू उपभोगी या तो बीड़ी पीते हैं या फिर तम्बाकू चबाते हैं। इन दोनों प्रकार के उपभोक्ताओं की संख्या समान ही है जो लगभग 60 लाख है। इन्हीं में से लगभग 12 लाख धूम्रपान करने के साथ तम्बाकू भी चबाते हैं। वर्तमान में राजस्थान में लगभग 200 मृत्यु प्रतिदिन तथा 80,000 मृत्यु प्रतिवर्ष तम्बाकू सेवन के कारण होती हैं। पूरे संसार में तम्बाकू उपभोग अधिकांशतः सिगरेट के रूप किया जाता है। भारत में इसके उपभोग में बीडी, हुक्का, गुल, गुडाकू, जन कियाम, खैनी, गुटखा आदि के रूप में किया जाता है। तम्बाकू का सेवन किसी भी रूप में किया जाए, यह शरीर के लिए हानिकारक ही है।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 May 2025 16:21:12 +0530</pubDate>
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                <title>विश्व पर्यावरण दिवस, जयपुर मंडल में एकल प्रयोग प्लास्टिक पर रोक के लिए होगा जागरूकता अभियान</title>
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                        <![CDATA[उत्तर पश्चिम रेलवे जयपुर मंडल पर विश्व पर्यावरण दिवस अभियान के अन्तर्गत 22 मई से 5 जून तक जयपुर मंडल में मनाया जा रहा है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/there-will-be-awareness-campaign-to-stop-single-experiment-plastic/article-115723"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/rtroer-(3)18.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। उत्तर पश्चिम रेलवे जयपुर मंडल पर विश्व पर्यावरण दिवस अभियान के अन्तर्गत 22 मई से 5 जून तक जयपुर मंडल में मनाया जा रहा है, जिसके अन्तर्गत ‘प्लास्टिक प्रदूषण समाप्त करें’ थीम पर प्लास्टिक प्रदूषण समाप्त करने के महत्व को उजागर करने के उद्देश्य से अभियान चलाया जा रहा है। </p>
<p>वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक पूजा मित्तल ने बताया कि मंडल पर अभियान के अन्तर्गत शुरुआत 22 मई 2025 को जयपुर मण्डल के प्रमुख रेलवे स्टेशनों जैसे जयपुर, गांधीनगर जयपुर, दौसा, बांदीकुई, अलवर, रींगस, सीकर एवं फुलेरा आदि स्टेशनों एवं रेलवे कॉलोनियों में रैली का आयोजन कर रेल यात्रियों एवं रेलवे कर्मचारियों को विश्व पर्यावरण दिवस की थीम के अनुसार प्लास्टिक छोडों प्रकृति से नाता जोड़ों के लिए जागरूक किया गया। लोगों को अपने आस-पास पेड़ लगाने के लिए आह्वान किया गया एवं यात्रा के दौरान अपने साथ अपनी बिना प्लास्टिक की पानी बोतल एवं खानपान का सामान रखने के लिए कपडेÞ के थैले का प्रयोग करने के लिए जागरूक किया।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 May 2025 13:31:57 +0530</pubDate>
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