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                <title> supreme court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description> supreme court RSS Feed</description>
                
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                <title>राष्ट्रपति संदर्भ मामला : कहा- फैसला इस आधार पर नहीं होगा कि कौन-सी राजनीतिक व्यवस्था सत्ता में है या थी</title>
                                    <description><![CDATA[इस पर तमिलनाडु सरकार का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी उत्तर दिया कि विधेयकों पर मान्य स्वीकृति एक परिणाम हो सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/the-presidents-reference-case-said-the-decision-will-not-be/article-125630"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति संदर्भ मामले की सुनवाई के छवें दिन मंगलवार को स्पष्ट किया कि वह इस आधार पर फैसला नहीं करेगा कि कौन-सी राजनीतिक व्यवस्था सत्ता में है या थी। वह केवल संविधान की व्याख्या करेगा और विशिष्ट उदाहरणों पर विचार नहीं करेगा। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति विक्रांत नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान ये स्पष्ट किया। </p>
<p><strong>क्या कोर्ट यह कर सकता है?</strong><br /> पीठ ने पूछा कि क्या न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करके राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों के प्रयोग के लिए एक सीधा सूत्र निर्धारित कर सकता है। यदि विलंब के व्यक्तिगत मामले हैं तो पीड़ित पक्ष राहत पाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। न्यायालय यह निर्देश दे सकता है कि निर्णय एक समय सीमा के भीतर लिया जाए, हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि न्यायालय राज्यपाल और राष्ट्रपति की कार्रवाई के लिए एक सामान्य समय-सीमा निर्धारित कर दे।</p>
<p><strong>पीठ ने पूछा सवाल</strong><br />पीठ ने याचिकाकर्ताओं से जानना चाहा कि अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल तमिलनाडु के मामले में आठ अप्रैल, 2025 को अपने फैसले में इस न्यायालय द्वारा तय की गई विधेयकों को मंजूरी देने की समय-सीमा का पालन नहीं करते हैं तो इसके क्या परिणाम होंगे? साथ ही, अदालत ने सभी विधेयकों के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय करने की शक्ति पर भी संदेह व्यक्त किया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने पूछा, अगर विधेयक समय-सीमा के भीतर पारित नहीं होते हैं तो क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति पर अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया जा सकता है?</p>
<p>इस पर तमिलनाडु सरकार का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी उत्तर दिया कि विधेयकों पर मान्य स्वीकृति एक परिणाम हो सकती है। न्यायालय ने कहा कि विधेयकों को स्वीकृति देने में देरी के कुछ मामलों को देखते हुए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के अनुसार कार्य करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता। सिंघवी ने तर्क दिया कि राज्यपालों द्वारा विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोके रखने की बार-बार की घटनाओं को देखते हुए ये समय-सीमाएं आवश्यक थीं। उन्होंने कहा कि विधेयक को 'रद्द' करने का अधिकार केवल मंत्रिमंडल को है, किसी और को नहीं। यह राज्यपाल द्वारा नहीं किया जा सकता। इस न्यायालय के पास संविधान की कोई योजना नहीं बचेगी (यदि इसकी अनुमति दी जाती है)। उन्होंने ने तर्क दिया कि राज्यपाल किसी विधेयक का अंतिम मध्यस्थ नहीं हो सकता। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Sep 2025 09:30:50 +0530</pubDate>
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                <title>प्रशिक्षु सैन्य कैडेटों को बीमा लाभ देने पर विचार करे केंद </title>
                                    <description><![CDATA[पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर कैडेटों के लिए सामूहिक बीमा होगा तो संबंधित विभाग पर भी बोझ नहीं पड़ेगा, बल्कि बीमाकर्ता पर पड़ेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/center-should-consider-giving-insurance-benefits-to-trainee-military-cadets/article-124003"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न सैन्य प्रतिषनों में कमीशन अधिकारी बनने के लिए कठोर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कैडेटों को दिव्यांगता या गंभीर चोट लगने से संबंधित किसी भी आपातस्थिति से निपटने के लिए उन्हें बीमा दायरे में लाने की संभावना तलाशने के मामले में स्वत: संज्ञान सुनवाई करते हुए सोमवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने एक अखबार के लेख पर स्वत: संज्ञान कार्यवाही करते हुए केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया।</p>
<p>पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर कैडेटों के लिए सामूहिक बीमा होगा तो संबंधित विभाग पर भी बोझ नहीं पड़ेगा, बल्कि बीमाकर्ता पर पड़ेगा। देखिए, जोखिम बहुत ज्यादा है। हम चाहते हैं कि बहादुर लोग सेना में आएं लेकिन अगर उन्हें पर्याप्त सुविधा नहीं दी गई तो वे निराश हो जाएंगे। लेख में कैडेटों के घायल होने वाला पर उनके दर्द और दुख पर प्रकाश डाला गया था। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि हमने उस  लेख पर गौर किया। हमने विचार-विमर्श किया और इसे स्वत: संज्ञान वाली रिट याचिका के रूप में मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का संकल्प लिया। मुख्य न्यायाधीश ने इसे पीठ के समक्ष रखा है। हम स्वत: संज्ञान वाली इस रिट याचिका पर नोटिस जारी करते हैं।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Tue, 19 Aug 2025 09:26:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur PS]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को जबाव तलब किया। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-sought-reply-from-center/article-123595"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को जबाव तलब किया। मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह इस मामले में जहूर अहमद भट और इरफान हाफिज लोन द्वारा दायर याचिकाओं पर आठ हफ़्ते के भीतर अपना रुख स्पष्ट करें।</p>
<p>पीठ के समक्ष मेहता ने कहा कि निर्णय लेने (राज्य का दर्जा बहाल करने के बारे में) की प्रक्रिया में कई तथ्यों पर विचार किया जाता है। हमने (सरकार ने) चुनावों के बाद राज्य का दर्जा देने का आश्वासन दिया था लेकिन देश के इस हिस्से की स्थिति कुछ अजीब सी है। इस पर आवेदकों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्य का दर्जा बहाल करने के संबंध में अनुच्छेद 370 को कमजोर करने (निष्क्रिय) की वैधता पर सुनवाई के दौरान इस अदालत को आश्वासन दिया था। उस आश्वासन के समय से अब तक 21 महीने बीत चुके हैं।</p>
<p>उनकी इस दलील पर पीठ ने कहा कि पहलगाम में जो हुआ (आतंकी हमला) उसे आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। संसद और कार्यपालिका को फैसला राज्य के दर्जे के बारे में  लेना है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के एक समूह ने 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में 26 पर्यटकों की कथित तौर पर धर्म पूछकर हत्या कर दी थी, जिसके बाद पाकिस्तान में आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत सफल सशस्त्र अभियान चलाया गया। अक्टूबर, 2024 में  दायर याचिका में दावा किया गया था कि जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे को समयबद्ध तरीके से बहाल न करना संघवाद के उस विचार का उल्लंघन है जो संविधान के मूल ढांचे का एक हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम- 2019 पारित होने के बाद पांच अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पुनर्गठित किया गया था।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Thu, 14 Aug 2025 16:16:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बढ़ते हमले, आंकड़े दे रहे हैं चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली एनसीआर में आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/increasing-attack-figures-are-warning/article-123569"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws43.png" alt=""></a><br /><p>दिल्ली एनसीआर में आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली/ एनसीआर के नागरिक प्रशासन और स्थानीय निकाय को सख्त निर्देश जारी किए हैं। इनमें आवारा कुत्तों को पकड़ने, उनकी नसबंदी करने और उन्हें आश्रय गृह में रखने के निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन आवारा कुत्तों के खिलाफ कार्रवाई में अड़ंगा डालता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई करें। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि एनसीटी-दिल्ली, एमसीडी, एनएमडीसी तुरंत आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए अभियान शुरू करें और खासकर उन इलाकों में जहां आवारा कुत्तों का खतरा ज्यादा है। पीठ ने स्थानीय निकायों को निर्देश दिया कि आठ हफ्तों में वे आवारा कुत्तों को रखने के लिए आश्रय स्थल बनाने की जानकारी दें। अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों के खिलाफ कार्रवाई में कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>सख्त कार्रवाई होगी :</strong></p>
<p>पीठ ने कहा कि अगर इस मामले में लापरवाही की गई, तो हम सख्त कार्रवाई करेंगे।अदालत ने कहा आवारा कुत्तों के बारे में शिकायत मिलने के चार घंटे के भीतर कार्रवाई होनी चाहिए और कुत्तों की नसबंदी के बाद उन्हें वापस पुरानी जगह न छोड़ा जाए। अदालत ने कहा कि रेबीज की वैक्सीन की उपलब्धता भी चिंता का कारण है। अदालत ने वैक्सीन की उपलब्धता की भी पूरी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने एक हेल्पलाइन स्थापित करने के भी निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि एक हफ्ते में हेल्पलाइन स्थापित की जाए, ताकि इस पर लोग कुत्तों के काटने की घटनाओं को रिपोर्ट कर सकें। न्यायालय ने कहाकि आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में रखें, अड़ंगा डालने वालों पर कार्रवाई करें।</p>
<p><strong>आवारा कुत्तों से मुक्त :</strong></p>
<p>जस्टिस पारदीवाला ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नसबंदी हो चुकी है या नहीं, सबसे पहली चीज है कि समाज आवारा कुत्तों से मुक्त होना चाहिए। एक भी आवारा कुत्ता शहर के किसी इलाके या बाहरी इलाकों में घूमते हुए नहीं पाया जाना चाहिए। हमने नोटिस किया है कि अगर कोई आवारा कुत्ता एक जगह से पकड़ा जाता है और उसकी नसबंदी करके उसे उसी जगह छोड़ दिया जाता है, ये बेहद बेतुका है और इसका कोई मतलब नहीं बनता। पीठ ने कहा कि हालात बेहद खराब हैं और इस मामले में तुरंत दखल दिए जाने की जरूरत है। सवाल यह है कि ये आदेश दिल्ली /एनसीआर के लिए ही क्यों हैं। देश में भी तो नागरिक रहते हैं। उनके लिए क्यों नही।</p>
<p><strong>कुत्तों का आंतक :</strong></p>
<p>आवारा कुत्तों का आंतक तो पूरे देश में है। देश में कुत्तों के काटने से औसतन प्रति वर्ष 29 हजार से ज्यादा व्यक्ति मरते हैं। यह तो संख्या वह है, जो रिपोर्ट हो जाती है। गांव देहात के मामले से रिपोर्ट ही नही हो पाते। न वे खबरों की सुर्खियां बनते हैं।</p>
<p>उत्तर प्रदेश का बिजनौर बहुत छोटा जिला है। यहां हाल ही में 24 जुलाई की शाम थाना अफजलगढ़ क्षेत्र के गांव झाड़पुरा भागीजोत में खेत पर काम कर रहीं 65 वर्षीय वृद्धा को आवारा कुत्तों के झुंड ने नोच कर मार डाला। तीन अगस्त को हीमपुर दीपा के गांव गांगू नंगला में हिंसक कुत्ते ने हमला कर दो बच्चों सहित 10 लोगों को बुरी तरह से घायल कर डाला। मीडिया खबरों के मुताबिक 49 साल के पराग पिछले हफ्ते अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक पर निकले थे। इस दौरान आवारा कुत्तों ने उन पर हमला कर दिया। खुद को बचाने में वह फिसलकर गिर गए और उन्हें ब्रेन हेमरेज होने से निधन हो गया।</p>
<p><strong>हमलों के शिकार :</strong></p>
<p>भारत सरकार के स्वास्थ्य एंव परिवार कल्याण मंत्रालय ने पिछले साल संसद में हुए एक सवाल का जवाब देते हुए बताया कि 2019 में 72 लाख 77 हजार 523 कुत्तों के हमले रिपोर्ट हुए। वहीं साल 2020 में कुल 46 लाख 33 हजार 493 कुत्तों के हमलों रिपोर्ट हुए, जबकि साल 2021 में कुल 1701133 कुत्तों के काटने के मामले रिपोर्ट हुए। साल 2022, जुलाई तक भारतीय लोगों पर हुए कुत्तों के हमले की कुल संख्या 14 लाख 50 हजार 666 थी। इन हमलों में कई लोगों ने अपनी जान भी गंवाई है। ये हमले आवारा और पालतू दोनों कुत्तों के हैं। इसके साथ ही इन हमलों के शिकार, बच्चे, बुजुर्ग और जवान तीनों हुए हैं।</p>
<p><strong>रेबीज के कारण :</strong></p>
<p>साल 2018 में एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में हर साल 20 हजार लोग रेबीज के कारण मरते हैं, इनमें से ज्यादातर रेबीज के मामले कुत्तों द्वारा इंसानों तक पहुंचे हैं। ऐसा नहीं है कि हर कुत्ते के काटने से आपको रेबीज हो सकता है, लेकिन ज्यादातर आवारा कुत्तों के काटने से रेबीज का खतरा रहता है। कुत्तों के इन हमलों के सबसे ज्यादा शिकार छोटे बच्चे, महिलाएं और जवान होते हैं। यह समझना होगा कि अवारा कुत्तों की परेशानी दिल्ली- एनसीआर में ही नही है, ये पूरे भारतवर्ष की समस्या है। देश के देहात में तो मरे जानवर डालने के स्थान के पास रहने वाले कुत्ते तो और भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। ये महिलाएं,बीमार और बच्चों समेत अकेले आते जाते व्यक्ति को मारकर अपना पेट भरतें हैं।आवारा कुत्तों की समस्या भारत व्यापी है। इसलिए इस मामले पर कार्रवाई भी देशव्यापी होनी चाहिए।</p>
<p><strong>-अशोक मधुप</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 Aug 2025 12:34:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आवारा कुत्तों पर सुप्रीम की सख्ती, सीजेआई ने मामले की सुनवाई पर दी हरी झंडी</title>
                                    <description><![CDATA[सामुदायिक कुत्तों के मुद्दे पर दायर एक याचिका में हाल ही में आए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ता ने पशुओं के साथ संवेदनशील और मानवीय व्यवहार की आवश्यकता पर जोर दिया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-strictness-on-stray-dogs-gave-green-signal-on-hearing/article-123474"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सामुदायिक कुत्तों के मुद्दे पर दायर एक याचिका में हाल ही में आए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ता ने पशुओं के साथ संवेदनशील और मानवीय व्यवहार की आवश्यकता पर जोर दिया। </p>
<p>इस दौरान बताया गया कि न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2024 में स्पष्ट किया था कि “किसी भी परिस्थिति में कुत्तों की अंधाधुंध हत्या नहीं की जा सकती” और प्रशासन को मौजूदा कानून की भावना और प्रावधानों के अनुरूप ही कार्रवाई करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने बुधवार (13 अगस्त 2025) को इस मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने के अनुरोध पर विचार करने की सहमति दी।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Aug 2025 14:50:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मतदाता सूची से गायब 65 लाख लोगों के विवरण दें चुनाव आयोग : फिर हम देख पाएंगे क्या खुलासा हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आयोग अपना जवाब रिकॉर्ड पर रखें </title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह विशेष पुनरीक्षण के दौरान बिहार मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख लोगों का विवरण तक दें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/give-details-of-65-lakh-people-missing-from-the-voter/article-122847"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court2.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह विशेष पुनरीक्षण के दौरान बिहार मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख लोगों का विवरण तक दें। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्ल भुयान और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण की गुहार पर यह निर्देश दिया। पीठ ने निर्वाचन आयोग के अधिवक्ता से कहा कि शनिवार तक जवाब दाखिल करें और भूषण को इसे देखने दें। फिर हम देख पाएंगे कि क्या खुलासा हुआ है और क्या नहीं।</p>
<p>पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार हर राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों को यह जानकारी दी जाएगी। इस पर चुनाव आयोग के अधिवक्ता ने कहा कि वह प्रस्तुत करेगा कि यह जानकारी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ जानकारी साझा की गई है। अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि वह अपना जवाब रिकॉर्ड पर रखें।</p>
<p>पीठ ने निर्वाचन आयोग के अधिवक्ता से कहा- उन राजनीतिक दलों की सूची दीजिए जिन्हें यह जानकारी दी गई है। हम 12 अगस्त को मामले की सुनवाई करेंगे। तब तक अपना (निर्वाचन आयोग का) जवाब दाखिल करें। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता  की  ङ्क्षचताओं पर कहा, ''हम यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रभावित होने वाले प्रत्येक मतदाता को आवश्यक जानकारी मिले।</p>
<p>एडीआर ने अपने आवेदन में कहा कि 25 जुलाई को निर्वाचन आयोग ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसमें कहा गया था कि लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। भूषण ने पीठ के समक्ष गुहार लगाते हुए कहा, ''ड्राफ्ट मतदाता सूची में 65 लाख नामों के छूटने की बात कही गई है, लेकिन इन नामों की कोई सूची नहीं दी गई। इसमें 32 लाख लोगों के पलायन की बात कही गई, लेकिन कोई अन्य विवरण नहीं दिया गया है।</p>
<p>उन्होंने आगे कहा कि उन्हें (चुनाव आयोग) यह बताना चाहिए कि 65 लाख लोग कौन हैं? कौन पलायन कर गए हैं। कौन मर गए हैं? जाहिर है, बीएलओ ने उस व्यक्ति को हटाने या न हटाने की सिफ़ारिश की है। भूषण ने दलील दी थी कि चुनाव आयोग ने दो निर्वाचन क्षेत्रों सूची प्रकाशित की है। अन्य क्षेत्रों का क्या हुआ?</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Aug 2025 14:32:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट सख्त, छात्रों की सुरक्षा जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[देश में छात्रों की खुदकुशी बहुत ही चिंताजनक है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/security-of-strict-students-is-necessary/article-122385"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne14ws-(5).png" alt=""></a><br /><p>देश में छात्रों की खुदकुशी बहुत ही चिंताजनक है। इस संदर्भ में हाल ही में हमारे देश के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वत संज्ञान लिया है। दरअसल, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा में छात्रों की आत्महत्या के मामले में गंभीर सवाल उठाए हैं। कहना गलत नहीं होगा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का छात्रों की आत्महत्या पर सख्त होना सही ही है, क्यों कि प्रबंधन, लापरवाही का परिचय दे रहे हैं और छात्रों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य, उनकी समस्याओं, सुरक्षा की ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। वास्तव में छात्रों की सुरक्षा, खासकर उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, संस्थानों की पहली नैतिक जिम्मेदारी और कर्तव्य होना चाहिए।</p>
<p><strong>संवेदनशील विषय है :</strong></p>
<p>वास्तव में, यह गंभीर चिंता का एवं संवेदनशील विषय है कि आज देशभर में अनेक संस्थान छात्र-छात्राओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए न तो कोई नीतियां ही बनातें हैं और न ही इन्हें ठीक प्रकार से लागू ही करते हैं। शैक्षणिक संस्थानों यह चाहिए कि वे छात्र-छात्राओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक समान नीति बनाएं,उस नीति की समय-समय पर समीक्षा करें,उसे अद्यतन करें, इसे संस्थान की वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक एवं अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएं। छात्र-छात्राओं की अधिक संख्या वाले संस्थानों को यह चाहिए कि वे अपने यहां प्रशिक्षित काउंसलर,मनोवैज्ञानिक या सोशल वर्कर की नियुक्ति अनिवार्य करें, ताकि बच्चों की समय-समय पर काउंसलिंग की जा सके और समय रहते समाधान किया जा सके।</p>
<p><strong>मार्गदर्शन और सहायता :</strong></p>
<p>छात्र-छात्राओं की कम संख्या वाले संस्थानों में रिलायबल तथा ट्रेंड आउटर मेंटल हेल्थ स्पेशलिस्ट से औपचारिक रूप से सहयोग लिया जा सकता है और छात्र-छात्राओं को मार्गदर्शन और सहायता प्रदान की जा सकती है। कोचिंग संस्थानों समेत सभी शैक्षणिक संस्थानों से कहा है कि वे छात्रों को मेरिट के आधार पर बैच में न बांटें, क्यों कि ऐसा करने से छात्रों में शर्मिंदगी और मानसिक दबाव पैदा होता है। संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके यहां कार्यरत सभी स्टाफ सदस्यों को वंचित और हाशिए पर खड़े छात्रों के साथ संवेदनशील, समावेशी और भेदभाव रहित व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षित हों। सभी शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न, रैगिंग और जाति, वर्ग, लिंग, दिव्यांगता, धर्म या जातीयता के आधार पर होने वाली बदसलूकी की शिकायतों के लिए एक मजबूत,गोपनीय और सुलभ शिकायत व निवारण तंत्र बनाया जाना आवश्यक है।</p>
<p><strong>संस्थानों की जिम्मेदारी :</strong></p>
<p>शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के लिए एक आंतरिक समिति भी संस्थानों में होनी चाहिए। इतना ही नहीं, कमजोर और वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों के साथ संवेदनशीलता से व्यवहार किया जाना चाहिए। दिशा-निर्देशों में यह भी साफ कहा गया है कि छात्रों की सुरक्षा, खासकर उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, संस्थानों की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए। अगर किसी मामले में समय पर या पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई और इससे छात्र आत्महानि या आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो यह संस्थान की लापरवाही मानी जाएगी और प्रशासन पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। आज हमारे देश में अनेक कोचिंग संस्थान मौजूद हैं, जहां हर वर्ष हजारों लाखों की संख्या में छात्र-छात्राएं नीट, बैंकिंग, आईआईटी जेईई मेन्स और एडवांस के साथ ही साथ अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं।</p>
<p><strong>सभी शिक्षण संस्थान :</strong></p>
<p>इन कोचिंग संस्थानों में छात्र-छात्राओं की मेंटल हेल्थ की सुरक्षा बहुत ही आवश्यक और जरूरी है, क्यों कि कोचिंग संस्थानों में तैयारी करते समय घर से दूर रहने की स्थिति में इन छात्र-छात्राओं को अनेक प्रकार की समस्याओं से गुजरना पड़ता है। पढ़ाई का अच्छा खासा दबाव छात्र-छात्राओं पर रहता है। ऐसे में जरुरत इस बात की है कि इन कोचिंग संस्थानों में छात्र-छात्राओं की मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा और रोकथाम के विशेष उपाय लागू किए जाएं। माननीय सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जो अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं, ये दिशा-निर्देश देश के सभी शिक्षण संस्थानों पर लागू होंगे, चाहे वे सरकारी हों या निजी, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, ट्रेनिंग सेंटर, कोचिंग संस्थान,रेजिडेंशियल एकेडमी या छात्रावास उनकी मान्यता या संबद्धता चाहे जो भी हो।</p>
<p><strong>शैक्षणिक और सामाजिक :</strong></p>
<p>छात्रों की आत्महत्याओं के पीछे मुख्य कारण शैक्षणिक और सामाजिक-पारिवारिक तनाव व दवाब के साथ-साथ कॉलेजों या संस्थाओं से मदद ना मिलना और जागरूकता का अभाव है। बच्चों के बीच पढ़ाई में लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा,अंकों की होड़ और बच्चों से माता-पिता/अभिभावकों की बहुत सी अपेक्षाएं भी सुसाइड का प्रमुख कारण बन रहीं हैं। यह विडंबना ही है कि छात्रों की मेंटल हेल्थ को लेकर न तो परिवार, ही गंभीर होते हैं, न ही शिक्षण संस्थान। हताश, तनावग्रस्त व अवसाद वालों को मनोवैज्ञानिक मदद के सहारे काफी हद तक उबारा जा सकता है। सारा काम सरकार नहीं कर सकती है। जिम्मेदारी सरकार के साथ ही साथ हमारी स्वयं की, अधिकारियों की, प्रशासन की तथा संस्थानों की भी है। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, काउंसलिंग, शिकायत निवारण और संस्थागत जवाबदेही पर हम सभी को सामूहिकता के साथ काम करना होगा।</p>
<p><strong>-सुनील कुमार महला</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Aug 2025 12:22:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तेलंगाना विधायकों की अयोग्यता विवाद : विधानसभा अध्यक्ष 3 महीने में करें फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश </title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए भारत राष्ट्र समिति के 10 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर 3 महीने में निर्णय लेने का राज्य विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/telangana-mlas-disqualified-dispute-dispute-speaker-to-decide-in-3/article-122226"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court2.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के 10 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर 3 महीने में निर्णय लेने का राज्य विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति ए जी मसीह की पीठ यह निर्देश देते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मुद्दे पर उनकी नोटिस के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने सात महीने बाद ही संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया  कि विधायक सुनवाई में शामिल होने में किसी तरह से कोई भी टालमटोल करते हैं, तो उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है। न्यायमूर्ति गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि संसद को विधायकों की अयोग्यता की वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करने वाले दलबदलुओं के खिलाफ कार्रवाई को विफल करने के लिए ऐसी कार्यवाही (सुनवाई और फैसला) में अत्यधिक देरी करते हैं।</p>
<p>पीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय की खंडपीठ के 22 नवंबर, 2024 के फैसले के खिलाफ दायर बीआरएस नेता पाडी कौशिक रेड्डी और के टी रामा राव की अपील को स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अध्यक्ष को चार हफ्तों के भीतर सुनवाई के लिए तारीखें तय करने के एकल पीठ के निर्देश को रद्द कर दिया गया था। दोनों बीआरएस नेताओं की याचिका में सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल होने वाले 10 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता कार्यवाही पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष द्वारा समय पर कार्रवाई करने की मांग की गई थी।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता कार्यवाही में निर्णायक भूमिका में कार्य करते हैं। इस भूमिका  विधानसभा अध्यक्ष उच्च न्यायालय और शीर्ष न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अधीन एक न्यायाधिकरण के रूप में भी कार्य करते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष को ऐसे मामलों में कोई संवैधानिक छूट प्राप्त नहीं है। शीर्ष अदालत ने यह तथ्य पर गौर करते हुए कि राजनीतिक दलबदल राष्ट्रीय चर्चा का विषय रहा है और अगर इसे रोका नहीं गया तो यह लोकतंत्र के लिए बाधा बन सकता है। अदालत ने कहा कि किसी भी विधायक को अध्यक्ष के समक्ष लंबित अयोग्यता कार्यवाही को लंबा खींचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 31 Jul 2025 17:03:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बड़ा झटका, ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले में ट्रायल पर रोक लगाने से किया इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बड़ा झटका लगा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/lalu-prasad-yadav-refused-to-ban-trial-in-the-land/article-122089"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/1ne1ws.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बड़ा झटका लगा है। ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले में लालू यादव की तरफ से दायर याचिका को सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच द्वारा यह अहम फैसला सुनाया गया।</p>
<p>लालू प्रसाद यादव ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाई कोर्ट ने ट्रायल पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चर्चा करते हुए कहा- ‘हम रोक नहीं लगाएंगे। हम अपील को खारिज कर देंगे और कहेंगे कि मुख्य मामले का फैसला होने दें। हम इस छोटे मामले को क्यों रखें ?’ सुप्रीम कोर्ट का इसमें कहना है कि जब हाई कोर्ट पहले से ही इस मामले पर सुनवाई कर रहा है, तो सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Jul 2025 16:07:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में 12 दोषियों को बरी करने के फैसले पर लगाई रोक, फिलहाल नहीं होंगे गिरफ्तार </title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में दोषी सभी 12 लोगों को बरी करने के बम्बई उच्च न्यायालय के 21 जुलाई के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-imposed-a-ban-on-the-decision-to-acquit/article-121518"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court2.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में दोषी सभी 12 लोगों को बरी करने के बम्बई उच्च न्यायालय के 21 जुलाई के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि फिलहाल उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस संबंध में आदेश पारित किया। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें कहा गया था कि उच्च न्यायालय के फैसले को अन्य लंबित महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) मामलों में मिसाल नहीं माना जाएगा। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले की वैधता को चुनौती देने वाली एक विशेष अनुमति याचिका पर संबंधित सभी आरोपियों को नोटिस जारी किया। पीठ ने इस दलील पर गौर किया और स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के फैसले को मिसाल नहीं माना जाएगा।</p>
<p>उच्च न्यायालय ने सोमवार 21 जुलाई 2025 को फैसला सुनाया था। विशेष मकोका अदालत के वर्ष 2015 के फैसले को पलटते हुए उसके उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें पांच आरोपियों को मौत की सजा और सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। मकोका अदालत ने कमाल अंसारी (अब मृत), मोहम्मद फैसल शेख, एहते-शाम सिद्दीकी, नवीद हुसैन खान और आसिफ खान को मौत की सजा सुनाई थी।</p>
<p>अदालत ने तनवीर अहमद इब्राहिम अंसारी, मोहम्मद माजिद शफी, शेख मोहम्मद, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मुजम्मिल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख और जमीर अहमद शेख को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मुंबई की लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई, 2006 को सात बम विस्फोट हुए थे। इस घटना में 189 लोग मारे गए थे और 820 लोग घायल हुए थे।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Jul 2025 18:54:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>कांवड़ यात्रा भोजनालय विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, कहा- कांवड़ यात्रा में भोजनालय मालिक लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करें</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने कांवड़ यात्रा मार्ग के भोजनालयों पर 'क्यूआर कोड' प्रदर्शित करने संबंधी विवाद पर मंगलवार को राज्य सरकारों को कोई निर्देश नहीं दिया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/the-supreme-court-directed-on-the-kandar-yatra-restaurant-dispute/article-121340"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/supreme-court--32.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कांवड़ यात्रा मार्ग के भोजनालयों पर 'क्यूआर कोड' प्रदर्शित करने संबंधी विवाद पर मंगलवार को राज्य सरकारों को कोई निर्देश नहीं दिया, लेकिन दुकानदारों से कहा कि वे लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करें।</p>
<p>न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन के सिंह की पीठ ने कहा कि ग्राहकों को यह जानने का अधिकार है कि क्या संबंधित भोजनालय में पहले मांसाहारी भोजन परोसा जाता था। अगर कोई केवल कांवड़ यात्रा के दौरान शाकाहारी भोजन परोसता है तो इसके बारे में ग्राहकों को जानकारी होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि "हमें सूचित किया गया है कि आज यात्रा का अंतिम दिन है। इस समय हम सभी संबंधित होटल मालिकों से अनुरोध करते हैं कि वे वैधानिक रूप से आवश्यक लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करने के आदेश का पालन करें। हम अन्य विवादित मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।"</p>
<p>पीठ ने कांवड़ यात्रा मार्ग के भोजनालयों पर 'क्यूआर कोड' प्रदर्शित करने संबंधी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों के निर्देश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह कहते हुए कोई भी आदेश जारी करने से इनकार कर दिया कि मंगलवार (22 जुलाई) यात्रा का आखिरी दिन है।</p>
<p>प्रो. अपूर्वानंद झा की ओर से दायर इस याचिका में दलील दी गई थी कि ये निर्देश शीर्ष अदालत के 2024 के एक आदेश के खिलाफ है। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि कांवड़ यात्रा मार्ग पर विक्रेताओं को अपनी पहचान उजागर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऐसे निर्देश संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17, 19 और 21 का उल्लंघन है।</p>
<p>याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों को सभी क्यूआर कोड-आधारित पहचान संबंधी अनिवार्यताओं या किसी भी अन्य ऐसी व्यवस्था को तुरंत वापस लेने का निर्देश देने की अपील की, जिससे विक्रेताओं के मालिक होने की पहचान या धार्मिक पहचान का खुलासा होता हो। याचिका में राज्यों को हलफनामा दायर करके यह बताने का निर्देश देने की भी अपील की गई थी कि वर्तमान अनिवार्यताएं संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कैसे नहीं करती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 22 Jul 2025 18:57:46 +0530</pubDate>
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                <title>लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से झटका : जमीन के बदले नौकरी घोटाले से संबंधित याचिका पर सुनवाई से इनकार, न्यायालय को मुख्य याचिका का शीघ्र निपटारा करने का दिया निर्देश </title>
                                    <description><![CDATA[शीर्ष अदालत ने हालांकि याचिकाकर्ता को राहत देते हुए कहा कि निचली अदालत में उनकी उपस्थिति की अनिवार्यता समाप्त की जा सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/lalu-yadav-directed-the-supreme-court-to-refuse-to-hear/article-120941"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को झटका देते हुए जमीन के बदले नौकरी घोटाले से संबंधित उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग वाली पूर्व मुख्यमंत्री की याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया। यादव  दिल्ली उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलने पर शीर्ष अदालत की शरण में गये थे। न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने पूर्व रेल मंत्री  की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के आरोप-पत्र को रद्द करने की यादव की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय फैसला करेगा। सर्वोच्चय न्यायालय ने साथ ही, दिल्ली उच्च न्यायालय को मुख्य याचिका का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने हालांकि याचिकाकर्ता को राहत देते हुए कहा कि निचली अदालत में उनकी उपस्थिति की अनिवार्यता समाप्त की जा सकती है।</p>
<p>दिल्ली उच्च न्यायालय ने 29 मई को यादव की निचली अदालत की कार्रवाई पर रोक लगाने की याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि कार्यवाही पर रोक लगाने का कोई ठोस कारण नहीं है। राजद अध्यक्ष ने अपनी याचिका में दावा किया कि  निष्पक्ष जांच के उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हुए अवैध और दुर्भावना से प्रेरित जांच के जरिए उन्हें परेशान किया जा रहा है।उन्होंने मामले में खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि नए सिरे से जाँच शुरू करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इससे पहले उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की प्राथमिकी रद्द करने की यादव की याचिका पर सीबीआई को नोटिस जारी किया था। इस मामले में उच्च न्यायालय 12 अगस्त को सुनवाई करेगा।</p>
<p>सीबीआई ने 18 मई, 2022 को मामला दर्ज किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2004 से वर्ष 2009 के दौरान, श्री यादव ने ग्रुप डी रेलवे की नौकरियों के बदले अपने परिवार के लिए जमीन हासिल करने के लिए अपने (रेल) मंत्री पद का दुरुपयोग किया था। एजेंसी ने यह आरोप लगाया था कि ये नियुक्तियां बिना किसी सार्वजनिक विज्ञापन के की गईं। जाँच से पता चला कि पश्चिम मध्य रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों ने श्री यादव के निर्देश में इन नियुक्तियों में मदद की। सीबीआई ने दावा किया कि ये नियुक्तियाँ भारतीय रेलवे के भर्ती के लिए स्थापित मानकों और दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं थीं। सीबीआई ने सबूत जुटाने के लिए दिल्ली और बिहार में कई स्थानों पर छापेमारी भी की थी। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Jul 2025 16:20:37 +0530</pubDate>
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