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                <title> children - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description> children RSS Feed</description>
                
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                <title>16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की मांग तेज : राजस्थान में भी रोक लगाने की अपील, विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए बताया साहसिक कदम</title>
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                        <![CDATA[संयुक्त अभिभावक संघ ने कर्नाटक सरकार के 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का स्वागत। अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग बच्चों की पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा। प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने राजस्थान में भी इसी तरह प्रभावी प्रतिबंध की मांग। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/demand-for-social-media-ban-on-children-below-16-years/article-145630"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/200-x-60-px)13.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। संयुक्त अभिभावक संघ ने कर्नाटक सरकार द्वारा 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय का स्वागत किया है और इसे विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए साहसिक कदम बताया है। संघ ने कहा कि डिजिटल युग में सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों की पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।</p>
<p>संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने राजस्थान सरकार से भी कर्नाटक की तर्ज पर राज्य में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि छोटे बच्चे घंटों मोबाइल और सोशल मीडिया पर समय बिता रहे हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है और मानसिक तनाव व नकारात्मक सामग्री का खतरा बढ़ रहा है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि संयुक्त अभिभावक संघ पिछले एक वर्ष से सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहा है और इस संबंध में कई बार पत्र भी लिख चुका है। संघ का मानना है कि बच्चों के हित में सोशल मीडिया के अनियंत्रित उपयोग पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट नीति और ठोस कानून बनाना समय की आवश्यकता है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Mar 2026 19:01:06 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>बच्चों की मानसिक सेहत : एक अनदेखा संकट</title>
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                        <![CDATA[भारत में बचपन अब केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं रहा, बल्कि निरंतर दबाव का अनुभव बनता जा रहा है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/childrens-mental-health-an-unseen-crisis/article-138958"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px-(2)10.png" alt=""></a><br /><p>भारत में बचपन अब केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं रहा, बल्कि निरंतर दबाव का अनुभव बनता जा रहा है। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, सवाल पूछते हैं और दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं, उसी उम्र में वे प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं की कसौटी पर तौले जा रहे हैं। शिक्षा, जो कभी विकास का माध्यम थी, अब कई बच्चों के लिए चिंता और डर का स्रोत बन गई है। इस पूरे बदलाव में सबसे ज़्यादा उपेक्षित मुद्दा है आंकड़ों के अनुसार किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य विकार से प्रभावित पाए गए हैं। इसका अर्थ है कि हर स्कूल, हर कक्षा और हर मोहल्ले में ऐसे बच्चे मौजूद हैं जो भीतर ही भीतर संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p><strong>विशेषज्ञ मानते हैं :</strong></p>
<p>विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि मानसिक समस्याओं को आज भी खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता। 2024 में ही तेलंगाना और कर्नाटक के स्कूलों में किए गए एक बड़े सर्वे में सामने आया कि लगभग 24 प्रतिशत बच्चों में गंभीर मानसिक तनाव के लक्षण थे। इनमें से6 से 10 प्रतिशत बच्चों को तत्काल परामर्श और उपचार की आवश्यकता बताई गई। यह स्थिति किसी एक राज्य या वर्ग तक सीमित नहीं है, यह पूरे देश में फैलता हुआ संकट है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह शोर बनकर सामने आता है और कहीं खामोशी में दबा रह जाता है।</p>
<p><strong>शैक्षणिक दबाव :</strong></p>
<p>इस संकट का सबसे बड़ा कारण है शैक्षणिक दबाव। आज बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन उनके अंकों, रैंक और तुलना से किया जाता है।अच्छा बच्चा वही माना जाता है, जो बेहतर परिणाम दे सके। असफलता का डर, माता-पिता की अपेक्षाएँ और सामाजिक तुलना बच्चों के मन में स्थायी तनाव पैदा कर रही हैं। परीक्षा अब ज्ञान की जाँच नहीं, बल्कि मानसिक सहनशक्ति की परीक्षा बनती जा रही है। कई बच्चे इसी डर में अपनी नींद, रुचियाँ और आत्मविश्वास खो बैठते हैं।</p>
<p><strong>डिजिटल दुनिया में :</strong></p>
<p>इस शैक्षणिक दबाव के साथ-साथ डिजिटल दुनिया ने बच्चों की मानसिक दुनिया को और जटिल बना दिया है। एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार, भारत में60 प्रतिशत से अधिक बच्चे रोज़ तीन घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। सोशल मीडिया बच्चों के सामने एक ऐसी दुनिया रखता है, जहाँ सब कुछ सुंदर, सफल और परिपूर्ण दिखता है। इस निरंतर तुलना में बच्चा स्वयं को अधूरा और असफल महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे यह भावना आत्म-सम्मान को कमजोर करती है और चिंता व अवसाद को जन्म देती है।</p>
<p><strong>अत्यधिक स्क्रीन-टाइम :</strong></p>
<p>मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन-टाइम का सीधा संबंध एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और सामाजिक अलगाव से है। लेकिन विडंबना यह है कि इन संकेतों को अक्सर मोबाइल की लत या अनुशासन की कमी कहकर टाल दिया जाता है, जबकि असल समस्या कहीं गहरी होती है। घरेलू वातावरण भी बच्चों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डालता है। पारिवारिक तनाव, आर्थिक दबाव, माता-पिता के बीच तनाव या अत्यधिक नियंत्रण ये सभी बच्चे के मन में असुरक्षा पैदा करते हैं।</p>
<p><strong>सर्वे में सामने आया :</strong></p>
<p>उत्तराखंड में हुए एक सर्वे में सामने आया कि बच्चे और किशोर मानसिक विकारों, व्यवहारिक समस्याओं और विकास संबंधी चुनौतियों के साथ जीवन जी रहे हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट केवल महानगरों की समस्या नहीं, बल्कि गाँवों और कस्बों तक फैला हुआ है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे बच्चों को कोई पेशेवर सहायता नहीं मिल पाती। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, प्रशिक्षित काउंसलरों का अभाव और सामाजिक कलंक इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। कई परिवार आज भी मानसिक परेशानी को कमजोरी या बदतमीज़ी मान लेते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा अकेला पड़ जाता है।</p>
<p><strong>अकेलापन खतरनाक है :</strong></p>
<p>यह अकेलापन ही सबसे खतरनाक है। जब बच्चा अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता, जब उसकी चिंता को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब वह भीतर-ही-भीतर टूटने लगता है। कई बार यह टूटन पढ़ाई छोड़ने, आत्म-अलगाव या आत्म-नुकसान जैसे गंभीर रूप भी ले लेती है। ये घटनाएँ हमें झकझोरती हैं, लेकिन हम अक्सर उन्हें अपवाद मानकर आगे बढ़ जाते हैं। हकीकत यह है कि बच्चों की मानसिक सेहत को नज़रअंदाज़ करना उनके भविष्य को जोखिम में डालना है। बचपन में अनदेखी गई समस्याएँ आगे चलकर कम आत्मविश्वास, संबंधों में कठिनाई, कार्यक्षमता में कमी और गंभीर मानसिक रोगों का कारण बन सकती हैं। एक समाज के रूप में यह हमारी सामूहिक विफलता होगी।</p>
<p><strong>बच्चों की मानसिक सेहत :</strong></p>
<p>अब समय आ गया है कि हम बच्चों की मानसिक सेहत को दया या शर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समझ के साथ देखें। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श को अनिवार्य करना, शिक्षकों को भावनात्मक संकेत पहचानने के लिए प्रशिक्षित करना और अभिभावकों को बच्चों से संवाद के लिए तैयार करना, ये कदम अब टाले नहीं जा सकते। बचपन को बोझ से मुक्त करना केवल सरकारी नीतियों का सवाल नहीं है, यह हमारे समाज की सोच की परीक्षा है। यदि हम सचमुच एक सशक्त और मानवीय भारत का सपना देखते हैं, तो हमें अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना होगा।</p>
<p><strong>-डॉ सुनिधि मिश्रा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Jan 2026 12:44:31 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>कोमल मन पर भारी कठोर परवरिश</title>
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                        <![CDATA[कई बार बच्चे सच बोल रहे होते हैं, तो भी उन्हें गलत मान लिया जाता है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/gentle-ranging-on-soft-mind/article-116449"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtroer25.png" alt=""></a><br /><p>कई बार बच्चे सच बोल रहे होते हैं, तो भी उन्हें गलत मान लिया जाता है। परिवार को सही-गलत के निर्णय पर पहुंचने से पहले कई बार सोचना होगा। हर बात पर बाल मन का तिरस्कार करना सही नहीं कहा जा सकता। हर बच्चे को कृष्णेंदु बनने से बचाना होगा। हाल ही में पश्चिम बंगाल के पंसकुरा में 7वीं क्लास में पढ़ने वाले बच्चे ने इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसकी मां ने सबके सामने उसको डांट दिया था। बच्चा अपने पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ गया है, जो झकझोर देने वाला है। अपने सुसाइड नोट में बच्चे ने लिखा था कि मां मैंने चोरी नहीं की। बच्चे के ये आखिरी शब्द दिल को झकझोर कर रख देने वाले हैं। दरअसल स्कूल में पढ़ने वाले 13 साल के कृष्णेंदु दास पर एक मिठाई की दुकान से चिप्स के तीन पैकेट चुराने का आरोप लगा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि बच्चे ने दुकान से चिप्स के तीन पैकेट चुरा लिए थे। दुकान मालिक ने बच्चे को दुकान से थोड़ी दूर चिप्स के पैकेट के साथ देखा, तो उसके पीछे दौड़ पड़ा। उससे चोरी के बारे में पूछताछ की गई। उसने दुकानदार को पांच रुपए के हिसाब से तीन चिप्स के पैकेट के 15 रुपए दे दिए। इसके बाद भी दुकानदार नहीं माना। वह पैसे लौटाने के बहाने बच्चे को वापस दुकान पर ले गया और उसको मारा-पीटा। इतना ही नहीं, दुकानदार ने बच्चे से सार्वजनिक रूप से माफी भी मंगवाई। बच्चे के साथ ये सब अभी हुआ ही था कि उसकी मां को जैसे ही इस बारे में पता चला, वह भी उसे फिर से उसी मिठाई की दुकान पर लेकर गई और सबके सामने डांटा। इस बात से 13 साल का लड़का इस कदर आहत हो गया कि घर लौटते ही उसने कीटनाशक पीकर आत्महत्या करने की कोशिश की। गंभीर हालत में उसे तुरंत तामलुक मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि बच्चे के कमरे से एक सुसाइड नोट बरामद किया गया है। इसमें कृष्णेंदु ने आत्महत्या करने से पहले अपनी नोटबुक में लिखा है कि मां मैंने कुरकुरे नहीं चुराए। मुझे वो सड़क पर पड़े मिले थे। मैंने चोरी नहीं की है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि मिठाई दुकानदार के बर्ताव की वजह से बच्चा ऐसा खौफनाक कदम उठाने को मजबूर हो गया। तब से दुकान मालिक फरार है।</p>
<p>परिवार इस बात को भी मान रहा है कि मां के सार्वजनिक रूप से डांटे जाने का भी बच्चे के मन पर गहरा असर हुआ। मां की डांट से बच्चा बहुत दुखी था। यह डांट उसके मन में घर कर गई। वह इस तरह के व्यवहार को सहन नहीं कर सका। असल में यह घटना उन मां-बाप के लिए किसी सबक से कम नहीं है, जो बात-बात पर सबके सामने अपने बच्चों को बुरी तरह डांट देते हैं, क्योंकि उम्र के इस पड़ाव में बच्चे बहुत ही कोमल और संवेदनशील होते हैं। वह हर बात को अपनी बेइज्जती से जोड़ लेते हैं। कई बार वह ऐसा कदम उठा लेते हैं, जिसके बाद पछताने के अलावा कोई और रास्ता परिवार के पास भी नहीं होता, इसलिए माता-पिता को बच्चों के साथ पेश आने में बहुत ही सतर्कता बरतनी चाहिए। किसी भी बात पर उनको समझाएं, न कि सबके सामने उन्हें डांटें। अगर डांटना बहुत जरूरी है, तो अकेले में ही डांटें। सबके सामने ऐसा करने से बचें, ताकि उनको बेइज्जती महसूस न हो। चाइल्ड एक्सपर्ट का कहना है कि आज के दौर में बच्चों की परवरिश करना बिल्कुल भी आसान नहीं है। उन्हें अच्छे या बुरे की अहमियत समझाना बहुत जरूरी है, लेकिन प्यार और अपनेपन के साथ।</p>
<p>हर बात पर उन्हें डांटना या पीटना ठीक नहीं है। कुछ एक्सपर्ट कहते हैं कि माता-पिता बच्चों को नहीं डांटें तो वे मनमानी करते हैं और अगर डांटें तो बच्चे दिल पर ले लेते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि मां-बाप बच्चों को कैसे समझाएं, क्योंकि बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। छोटी-छोटी बातों का उनके मन पर गहरा असर होता है। अगर सबके सामने उनको डांट दिया जाए, तो वे इसे अपनी बेइज्जती समझ लेते हैं। आहत होकर कई बार वह गलत कदम उठा लेते हैं। असल में परिवार को अब इस बात को समझना होगा कि बदलते माहौल में बच्चों की परवरिश यदि उसके अनुसार न हो, तो उसके परिणाम गंभीर होते हैं। आमतौर पर कुछ बच्चे काफी सहज और सरल होते हैं, तो कुछ बेहद ही संवेदनशील। ऐसे में उनके स्वभाव के अनुसार ही उनकी देखभाल करने की जरूरत होती है। बच्चों की भावनाओं का ख्याल रखना बेहद जरूरी होता है। उनके कोमल मन को समझना भी बहुत जरूरी है।</p>
<p><strong>-अमित बैजनाथ गर्ग</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/gentle-ranging-on-soft-mind/article-116449</link>
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                <pubDate>Thu, 05 Jun 2025 12:48:46 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>आक्रामकता के शिकार बच्चों की पीड़ा</title>
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                        <![CDATA[बच्चों को देश एवं दुनिया के भविष्य की तरह देखा जाता है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-pain-of-children-victims-of-aggression/article-116329"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/rtroer18.png" alt=""></a><br /><p>बच्चों को देश एवं दुनिया के भविष्य की तरह देखा जाता है, लेकिन उनका यह बचपन रूपी भविष्य लगातार हो रहे युद्धों की त्रासदी एवं खौफनाक स्थितियों के कारण गहन अंधेरों एवं परेशानियों से घिरा है। आज का बचपन हिंसा, शोषण, यौन विकृतियों, अभाव, उपेक्षा, नशे एवं अपराध की दुनिया में धंसता चला जा रहा है। बचपन इतना उपेक्षित, प्रताड़ित, डरावना एवं भयावह हो जाएगा, किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। आखिर क्यों बचपन बदहाल होता जा रहा है? बचपन इतना उपेक्षित क्यों हो रहा है? बचपन के प्रति न केवल अभिभावक, बल्कि समाज, सरकार एवं युद्धरत देशों की सत्ताएं इतनी बेपरवाह कैसे हो गई हैं? ये प्रश्न 4 जून को आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों के दिवस को मनाते हुए हमें झकझोर रहे हैं। इस दिवस को मनाने की प्रासंगिकता आज के परिप्रेक्ष्य में ज्यादा महसूस हो रही है। इस दिवस का उद्देश्य आक्रामकता के शिकार बच्चों की पीड़ा और उनके दर्द को स्वीकार करना, बाल अधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता को दोहराना, समाज में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और हिंसा के खिलाफ जागरूकता बढ़ाना, बच्चों के साथ हिंसा रोकने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से प्रयास करना, बच्चों के लिए सुरक्षित, हिंसामुक्त और अनुकूल वातावरण बनाना एवं बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें हिंसा से सुरक्षित रखने के लिए जागरूकता फैलाना है। </p>
<p>संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की शुरुआत 1982 में की थी, जब फिलिस्तीनी और लेबनानी बच्चों पर हुए अत्याचारों के बाद यह दिवस घोषित किया गया था, जिसे मनाते हुए हमें दुनिया भर में बच्चों द्वारा झेले गए दर्द को स्वीकारना होगा, जो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण के शिकार हैं। यह दिन बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। बच्चे दुनिया की आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं और किसी भी समाज की भलाई के लिए बच्चों का सुरक्षित एवं संरक्षित होना जरूरी हैं। वे समाज के सबसे कमजोर सदस्य हैं, जिन्हें निष्कंटक, खुशहाल और सफल जीवन जीने के लिए समान अवसर दिए जाने और उनकी रक्षा किए जाने की आवश्यकता है। लेकिन, हर साल संघर्ष और युद्धों के कारण बच्चों की एक बड़ी संख्या हिंसा, विस्थापन, अपंगता और दुर्व्यवहार का शिकार होती है। यह केवल इस बात को साबित करता है कि बच्चों पर किसी भी संघर्ष का गंभीर एवं घातक प्रभाव पड़ता है। </p>
<p>निश्चित ही रूस एवं यूक्रेन, गाजा एवं इजरायल जैसे लम्बे समय से चल रहे युद्धों के कारण हर दिन, दुनिया भर में बच्चे अकथनीय भयावहता एवं त्रासदियों का सामना कर रहे हैं। वे अपने घरों में सोने या बाहर खेलने, स्कूल में पढ़ने या अस्पतालों में चिकित्सा देखभाल प्राप्त करने में सुरक्षित नहीं हैं। हत्या और अपंगता, अपहरण और यौन हिंसा से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमले नई बन रही विश्व संरचना के लिए गंभीर चुनौती है। बच्चे चौंका देने वाले पैमाने पर युद्धरत दलों के निशाने पर आ रहे हैं। हाल के वर्षों में, कई संघर्ष एवं युद्ध क्षेत्रों में, महामारियों एवं प्राकृतिक आपदाओं के कारण बच्चों के खिलाफ उल्लंघन की संख्या में वृद्धि हुई है। संघर्ष, युद्ध, हिंसा एवं महामारियों से प्रभावित देशों और क्षेत्रों में रहने वाले 250 मिलियन बच्चों की सुरक्षा के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।</p>
<p>हिंसक अतिवादियों द्वारा बच्चों को निशाना बनाने से बचाने के लिए, अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून को बढ़ावा देने के लिए और बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रयासों एवं संकल्पों की जरूरत है ताकि बच्चों के बेहतर भविष्य को सुरक्षित एवं सुनिश्चित किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र के नए एजेंडे में पहली बार बच्चों के खिलाफ हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट लक्ष्य शामिल था और बच्चों के दुर्व्यवहार, उपेक्षा और शोषण को समाप्त करने के लिए कई अन्य हिंसा-संबंधी लक्ष्यों को मुख्यधारा में शामिल किया गया। विश्वस्तर पर बालकों के उन्नत जीवन के ऐसे आयोजनों के बावजूद आज भी बचपन उपेक्षित, प्रताड़ित एवं नारकीय बना हुआ है, आज बच्चों की इन बदहाल स्थिति की प्रमुख वजहें हैं, वे हैं-सरकारी योजनाओं का कागज तक ही सीमित रहना, बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, दुनिया की महाशक्तियों की ओर से बच्चों के ज्वलंत प्रश्नों पर आंख मूंद लेना, इनके प्रति समाज का संवेदनहीन होना एवं गरीबी-शिक्षा के लिए जागरुकता का अभाव है।</p>
<p>युद्धों एवं ऐसी ही स्थितियों में 11,649 बच्चे मारे गए या अपंग हो गए। अधिकांश मामलों में, विस्फोटक आयुध और बारूदी सुरंगों का उपयोग आबादी वाले क्षेत्रों में किया गया, जिसके कारण बच्चों की मृत्यु हुई और वे अपंग हो गए। 8,655 बच्चों का इस्तेमाल संघर्ष में किया गया और 4356 का अपहरण किया गया, जिनमें से सबसे ज्यादा संख्या कांगो, सोमालिया और नाइजीरिया के लोकतांत्रिक गणराज्य में पाई गई। बच्चे खुश, स्वस्थ और सुरक्षित होने चाहिए। उन्हें जाने-अनजाने में भी कोई पीड़ा नहीं दी जानी चाहिए। बच्चों की खुशी में देश एवं दुनिया का उज्ज्वल भविष्य छुपा है।</p>
<p><strong>-ललित गर्ग</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Jun 2025 11:33:41 +0530</pubDate>
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